मुस्लिम शासन में नागरी की तरक्की पर एक नजर
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भारत में मुसलमानों का युग पृथ्वीराज की पराजय और शाहबुद्दीन गौरी (मोहम्मद गौरी) की विजय के बाद ही प्रारंभ हुआ। भारत में मुसलमानों के राजत्व काल के प्रारम्भ से ही देवनागरी लिपि और हिन्दी भाषा के अतिरिक्त फारसी लिपि और फारसी भाषा का प्रचार हुआ।
मुसलमानी राजत्व के प्रारम्भ से राज्यकार्य बहुधा हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि में ही सम्पन्न किए जाते थे। हिसाब और जमाखर्च के दफ्तर मोहम्मद कासिम से अकबर राजत्व कल तक हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि में ही थे। मुंशी देवी प्रसाद के अनुसार, ‘इसका कारण कुछ यह नहीं था कि मुसलमान लोग हिसाब नहीं जानते हों। किन्तु वे ऐश्वर्यवान और सिपाही पेशा होने से हिसाब करने और जोड़-तोड़ लगाने का परिश्रम कम उठाना चाहते थे और इसको अपनी सिपहगीरी और विजय प्राप्ति के आगे कुछ बड़ा काम नहीं समझते थे, इसलिए जो देश फतह करते थे वहीं के दीवानों, दफ्तरों और लेखकों को ज्यों का त्यों बना रखते थे और उन पर शासन करने के लिए अपनी एक बड़ी कचहरी बना देते थे। जिसका काम या तो आप या उसके मुसलमान मंत्री किया करते थे।
मोहम्मद कासिम ने सन् 711 ई0 में सिंध प्रदेश का राज्य दाहर से विजय प्राप्त कर हस्तगत करने पर, वहां के दीवान को राज्य-कार्य सौंपकर ब्राह्मणों को अपने कार्यालय में नियुक्त किया जिनके द्वारा प्रजा से राज्य कर प्राप्त किया जाता था। अतः वहां का माल दफ्तर हिन्दी भाषा और लिपि देवनागरी में ही रह गया।
मुहम्मद गजनवी ने विक्रम संवत् 1070 में पंजाब राज्य पर विजय प्राप्त की और उसने भी वहां के हिसाब का दफ्तर हिन्दी और हिन्दुओं के हाथ में रहने दिया। राजपूत काल में मुहम्मद गजनवी ने देवनागरी लिपि में लिखित संस्कृत भाषा के महत्व को मान्यता प्रदान की और राजनीतिक तथा प्रशासनिक दृष्टियों से उसने अपने सिक्कों पर देवनागरी लिपि में लिखित संस्कृत में शब्द अंकित कराए। इन सिक्कों पर अरबी में कलमा है और साथ ही संस्कृत अनुवाद भी। राजपूत कालीन प्रशासन में हिन्दी का प्रयोग व्यापक रूप से किया जाता था। शाहाबुद्दीन गौरी ने विक्रम संवत 1250 (सन् 1193 ई0) में दिल्ली राज्य पर विजय प्राप्त करने के बाद ऐसा ही किया।
दिल्ली के खिलजी अलाउद्दीन खिलजी (शासन काल सन 1296 ई0- 1315 ई0) ने भी अपने सिक्कों पर देवनागरी लिपि को बहिष्कृत नहीं किया था और यह लिपि उसके शासन की सहलिपि थी।
शाहबुद्दीन ने अपने शासन का कामकाज देवनागरी लिपि और हिन्दी भाषा के माध्यम से करने का आदेश प्रदान किए। दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य (शासन काल मुख्यतः 1336 ई0- 1564 ई0) के सिक्कों पर देवनागरी लिपि थी। इस साम्राज्य के संस्थापक संगम कुल के नरेश हरिहर प्रथम (शासन काल 1336 ई0-1357 ई0) के प्रधानमंत्री माधव (वेदों के भाष्यकार सायण के भ्राता) ने आदेश प्रदान किया था कि केवल सिक्कों पर ही अपितु सभी राजकीय कार्यों में देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाये।
जून 1977 ई0 में हैदराबाद से प्रायः 140 मील दूर बोधन (जिला निजामाबाद) के निकट एक नहर की खुदाई के क्रम में भूमि के गर्भ से 32 स्वर्ण मुद्राएं प्राप्त हुई थीं। इन स्वर्ण मुद्राओं पर एक ओर मूर्ति अंकित हैं, दूसरी और देवनागरी लिपि में राजा का नाम उल्लिखित है। ये स्वर्ण मुद्राएं विजयनगर के तीन शासकों से संबंधित हैं- हरिहर (द्वितीय), देवराय (शासनकाल 1377 ई0- 1404 ई0), श्री कुष्णर देवराय (शासनकाल 1509 ई0) और अच्युतदेव राय (शासन काल 1530 ई0- 1542 ई0)।
तात्पर्य यह कि बोधन में प्राप्त देवनागरी लिपि की बत्तीस विजयनगर स्वर्ण मुद्राओं का काल 1377 ई0- 1542 ई0 है। चैदहवीं शती से सोलहवीं शती के मध्य तक दक्षिण काल के आंध्र के कृष्णा और तुंगभद्रा का दुआबा तटवर्ती क्षेत्र, कृष्णा के दक्षिण स्थित कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल क्षेत्र, विजयनगर और दक्षिण भारत के शेष भाग वहमनी एवं कालांतर में गोलकुंडा, बीजापुर, अहमदनगर और बीदर के मुसलमान शासकों के द्वारा शासित थे। विजयनगर साम्राज्य कालीन (1336 ई0- 1564ई0) आंध्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के सिक्कों पर देवनागरी लिपि को गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त था। चैंदहवी शताब्दी से सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक देवनागरी लिपि दक्षिण भारत की राज्यलिपि थी।
साभार- नागरी संगम