हिन्दी की समस्या, अथार्त भारत की समस्या

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डा राम चौधरी

सितंबर 2000

डा राम चौधरी (भौतिकी में डाक्ट्रेट) का सम्बंध भूलपुर‚ उत्तरप्रदेश से है। वे भूलपुर के सर्व प्रथम हाई–स्कूल पास विद्यार्थी हैं। 
डा राम चौधरी   न्यूयार्क स्टेट युनिर्वसिटी में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर  हैं। 


भारत की स्वतंत्रता का मूल–मंत्र था स्वदेशी‚ तथा स्वावलंबन। नेहरू की नीति‚ विज्ञान और प्रौद्योगिकी में स्वावलंबन‚ सही नीति थी‚ लेकिन इसके कार्यान्वयन में सब से भयंकर भूल थी‚ राजभाषा हिन्दी की अवहेलना। यह याद दिलाना आवश्यक है कि हिन्दी सर्वसम्मति से भारत की राजभाषा चुनी गई थी‚ इसके पीछे दो मुख्य तथ्य थे —

१) हिन्दी की शताब्दियों पुरानी सार्वभौमिकता तथा भारतीय संस्कृति को धारण करने की क्षमता

२) समाज के नेताओं द्वारा पहले तथ्य की स्वीकृति और तथ्यत: हिन्दी का एकमत समर्थन।


इस अवहेलना के अनेक विनाशकारी परिणाम हुए। पहला परिणाम था - संविधान का क्षरण। हिन्दी सहजतापूर्वक राजभाषा का स्थान ले सके‚ इसलिए यह आवश्यक समझा गया कि संविधान के आरंभ से 15 साल तक अंग्रज़ी ही राजभाषा रहे। इस अवधि में हिन्दी विकसित हो‚ तथा हिन्दीतर राज्यों को हिन्दी में काम करने के लिये तैयार किया जा सके। राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया था कि वे आदेश द्वारा संघ के राजकीय कामों के लिए 15 साल के अन्तरिम काल में भी अंग्रज़ी के साथ हिन्दी का प्रयोग भी प्राधिकृत कर सकते हैं। इस प्राधिकरण का उपयोग कभी नहीं किया गया। संविधान में हिन्दी के विकास के लिये निर्देशित किया गया था‚ कि प्रशासनिक तथा तकनीकी शब्दावली का निर्माण इस प्रकार किया जाय जिससे नव–निर्मित शब्दावली भारतीय भाषाओं में भी प्रयुक्त की जा सके ताकि भारतीय भाषाएं एक दूसरे के निकट आएं। हिन्दी की अवहेलना भारतीय संविधान की अवहेलना थी‚ और इस अवहेलना का परिणाम हुआ विधान से खिलवाड एक के बाद एक संशोधन‚ आरक्षण‚ जातिवाद और समाजवाद के नाम पर लूट–खसोट का वातावरण। विधान के क्षरण में हिन्दी के प्रस्थापन में टाल–मटोल पहला क़दम था‚ फिर जो श्रंखला प्रारम्भ हुई‚ उसके परिणामस्वरूप भारतीय संविधान बेडौल तथा प्रभावरहित दस्तावेज़ बनकर रह गया है।


दूसरा परिणाम हुआ‚ हिन्दी की छवि को आघात। हिन्दी एक अक्षम और घटिया भाषा मानी जाने लगी। प्रश्न उठा‚ शासन के समर्थन के पश्चात भी यदि हिन्दी राजभाषा न बन सकी‚ तो इसकी क्या उपयोगिता है? हिन्दी से अनभिज्ञ‚ प्रबुद्ध वर्ग भी‚ जिसमें अधिकांश हिन्दी–भाषी वैज्ञानिक‚ डॉक्टर‚ इन्जीनियर भी शामिल हैं‚ अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में हिन्दी को ओछा समझने लगे। राजन्ौतिक कारणों से‚ हिन्दीक्षेत्र वासियों की उदासीनता से‚ हिन्दी भाषी क्षेत्र‚ उद्योग तथा शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ते गये और इस की परछाई हिन्दी साहित्य के ऊपर भी पड़ी — हिन्दी प्रदेशों में यह धारणा सी बन गई कि पिछड़े प्रदेश की भाषा भी पिछड़ी होगी। वास्तविकता यह है कि अन्य भारतीय भाषाओं की तरह हिन्दी भी एक विकासशील भाषा है‚ परन्तु यह बात कोई मानने को तैयार नहीं है। हिन्दी की प्रतिभामंडित संस्थाएं‚ नागरी प्रचारिणी सभा‚ हिन्दी साहित्य सम्मेलन‚ इस छवि का निराकरण करने में असफल रहीं हैं। उनकी भी अब वह प्रतिष्ठा नहीं है जो मदनमोहन मालवीय अथवा पुरूषोत्तम दास टंडन के समय में थी।


तीसरा परिणाम हुआ भारत की भाषाओं की अवनति। यदि हिन्दी राजभाषा‚ तथा हिन्दी प्रदेशों में ही सही‚ आधुनिक ज्ञान–विज्ञान तथा अनुसंधान की भाषा बन जाती तो इसका लाभ सभी भारतीय भाषाओं को होता। हिन्दी की अवनति अन्य भाषाओं की अवनति के प्रमुख कारणों में से है‚ उसी प्रकार जैसे भारत की अवनति का अर्थ है भारत के प्रदेशों की अवनति।


चौथा परिणाम हुआ भारत की 98 प्रतिशत जनता के विकास का मार्ग अवरूद्व होना। अंग्रेज़ी शासनकाल से लेकर आज तक‚ भारत दो समूहों में बंटा हुआ है – एक तो वे जो अंग्रेज़ी जानते हैं – अफ़सर – जो भारत की आबादी का 2 प्रतिशत भाग हैं‚ दूसरे वे जो अंग्रेज़ी नहीं जानते थे – जनता – जो आबादी का 98 प्रतिशत भाग हैं। दूसरे वर्ग को हम हिन्दी–भाषी वर्ग की संज्ञा देंग इस उपबन्ध के साथ कि हिन्दी के वर्ग के लिये द्वार बन्द हैं‚ क्योंकि उच्च शिक्षा का माध्यम हिन्दी नहीं है। आज भी प्रतियोगिता काकोइ भी क्षेत्र क्यों न हो – क्रिकेट‚ टैनिस‚ प्रौद्योगिकी‚ उसमें हिस्सा लेने के लिये चुने जाने वाले लोग‚ भारत के पहले तबके से आते हैं। यहि कारण है कि भारत सभी विधाओं में पराजित होता है।


भारतीय भाषाओं कि दुबर्ल स्थिति‚ भारत में तथा भारत के बाहर भी उस मानसिकता से सम्बन्धित है जिसकी उत्पत्ति भारत मे अपनी भाषाओं की अवहेलना से हुई। अधिकांश हिन्दी भाषी आप्रवासी इंजीनियर‚ डाक्टर‚ वैज्ञानिक अथवा विशेषज्ञ हैं‚ भारत में भी ये हिन्दी के प्रति उदासीन और तटस्थ थे‚ और यहां भी वह उदासीनता भारत से लेकर आए हैं। भारत की शिक्षा पद्धति आत्मकेद्रित व्यक्ति पैदा करती है। शिक्षा का उद्देश्य सुरक्षित तथा अच्छे वेतन के कैरियर की तालाश - भारतीय प्रशासनिक सेवी‚ डाक्टर‚ इंजीनियर‚ वैज्ञानिक आदि बनना होता है‚ सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं। अत: वे अपनी संतति को भी हिन्दी सीखने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते।


देश की उन्नति के लिये राज्य तथा नागरिकों की भागीदारी आवश्यक है। यह बात निर्विवाद है कि सुशिक्षित नागरिक देश की सबसे बड़ी सम्पात्ति तथा सामथ्र्य है। सुशिक्षित शब्द की परिभाषा में नागरिकता के उत्तरदायित्वों की प्रतिबद्धता प्रधान त<व है। सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने के लिये सुशिक्षित व्यक्तियों के लिये जनभाषा में कुशल होना अनिवार्य है‚ इस कुशलता में भाषा के साहित्यिक तथा सांस्कृतिक पक्ष से भी अधिक महत्वपूर्ण है‚ आधुनिक ज्ञान–विज्ञान के विषयों में लेखन तथा अभिव्यक्ति की क्षमता। यदि हम इस बात से सहमत हैं तो केवल अंग्रेज़ी में शिक्षित प्रकांड विद्वान‚ भारत के परिपेक्ष्य मे सुशिक्षित नहीं कहे जा सकते। परन्तु यदि वे चाहें तो भारत की भाषाएं सीखकर‚ सुगमता से‚ सुशिक्षित वर्ग मे आ सकते हैं। उन्हें केवल एक शब्दकोष की आवश्यकता पड़ेगी।


जटिल समस्याओं के सरल हल हुआ करते हैं‚ यदि हम उन पर सचाई के साथ सोच–विचार करें। हम जब हिन्दी को शासन में तथा शिक्षा के हर विषय तथा हर स्तर में प्रयोग करने लगेंगे‚ हिन्दी अनायास ही भारत की राजभाषा बन जायगी‚ राष्ट्रसंघ की भाषा भी बन जायगी। आप्रवासी भी उसे सांस्कृतिक भाषा के रूप में उसका सम्मान और स्वागत करेंगे। जब ऐसा होगा‚ तभी स्वतंत्र चिंतन होगा और तभी भारत की 98 प्रतिशत जनता सबल बनेगी‚ प्रतिभा का विकास होगा और भारत को भी विज्ञान‚ साहित्य तथा खेल–कूद की प्रतियोगिताओं मे स्वर्ण पदक मिलेंगे।


भारत की समस्याओं का सब से बड़ा निदान हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं को सक्षम बनाना होगा। एकै साधे सब सधे‚ सब साधे सब जाय। अब समय आ गया है कि हम हिन्दी की शक्ति और सामर्थ्य को पहचाने।


[संपादन] इन्हें भी देखें

भारत की भीषण भाषा समस्या और उसके सम्भावित समाधान

वैयक्तिक औज़ार