हिन्दी के हत्यारे

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प्रभु जोशी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अपने जलरंगो के अविस्मरणीय प्रयोगों से वे समकालीन कला की दुनिया मे खासे चर्चित और सम्मानित रहे हैं। उन्होने ८० के दशक मे 'पितृ-ऋण' जैसी कालजयी कहानी के द्वारा अपनी सृजनात्मक कथा सामर्थ्य का भी परिचय दिया था। उन्होने फ़िल्म के माध्यम मे भी महत्वपूर्ण काम किया है। अन्ग्रेजी और हिन्दी दोनो भाषाओ मे लिखने वाले प्रभु जोशी खामोशी मे काम करने वाली बौद्धिक प्रतिभाओं मे से है। अभी हाल मे हिन्दी के भविष्य को लेकर उन्होंने एक उद्वेलित करने वाला आलेख लिखा है।



भूमण्डलीकरण के विश्व-विजय में पहले निशाने पर हिन्दी ही है । इसका एक कारण यह कि यह हिन्दुस्तान में संवाद, संचार और व्यापार की सबसे बड़ी भाषा बन चुकी है। दूसरे इसको राजभाषा या राष्ट्रभाषा का पर्याय बना डालने की संवैधानिक भूल गांधी की उस पीढ़ी को पार कर चुकी, जो यह सोचती थी कि कोई भी मुल्क अपनी राष्ट्रभाषा के अभाव में स्वाधीन नहीं रह सकता । चूंकि भाषा सम्पे्रषण का माध्यम भर नहीं, बल्कि चिन्तन प्रक्रिया एवं ज्ञान के विकास और विस्तार का भी हिस्सा है, उसके नष्ट होने का अर्थ एक समाज, एक संस्कृति और एक राष्ट्र का नष्ट हो जाना है । जब मध्यप्रदेश के एक स्थानीय अख़बार ने विज्ञापनों को हड़पने की होड़ में व्यावसायिक रणनीति के तहत अपने कर्मचारियों को हिन्दी में 40 प्रतिशत अंग्रेजी के शब्दों को मिलाकर ही किसी खबर के छापे जाने के आदेश दिये और समाचार पत्र में हिंग्लिश चलाने की शुरूआत की तो मैं अपने पर लगने वाले आरोप - प्रतिगामी, अतीतजीवी, अंध-राष्ट्रवादी और फासिस्ट आदि जैसे लांछनों से डरे बिना एक पत्र लिखा ।


`प्रिय भाई, हमने अपनी नई पीढ़ी को बार-बार बताया और पूरी तरह उसके गले उतारा कि अंग्रजों की साम्राज्यवादी नीति ने ही हमें ढाई सौ साल गुलाम बनाये रक्खा । दरअसल ऐसा कहकर हमने एक धूर्त - चतुराई के साथ अपनी कौम के दोगलेपन को इस झूठ के पीछे छुपा लिया । जबकि, इतिहास की सचाई तो यही है कि गुलामी के विरूद्ध आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले नायकों को, अंग्रेजों ने नहीं, बल्कि हमीं ने मारा था । आज़ादी के लिए `आग्रह´ या `सत्याग्रह´ करने वाले भारतीयों पर कू्ररता के साथ लाठियां बरसाने वाले बर्बर हाथ, अंग्रेजों के नहीं, हम हिन्दुस्तानी दारोगाओं के ही होते थे । अपने ही देशवासियों के ललाटों को लाठियों से लहू-लुहान करते हुए हमारे हाथ ज़रा भी नहीं कांपते थे । कारण यह कि हम चाकरी बहुत वफादारी से करते हैं और यदि वह गोरी चमड़ी वालों की हुई तो फिर कहने ही क्या ?


पूछा जा सकता है कि इतने निर्मम और निष्करूण साहस की वजह क्या थी ? तो कहना न होगा कि `सारे जहां से अच्छा´ ये हमारा ही वो मुल्क है, जिसके वाशिन्दों को बहुत आसानी से और सस्ते में खरीदा जा सकता है । देश में जगह-जगह घटती आतंकवादी गतिविधियों की घटनाएं, हमारे ऐसे चरित्र का असंदिग्ध प्रमाण हैं । दूसरे शब्दों में हम आत्मस्वीकृति कर लें कि `भारतीय´, सबसे पहले `बिकने´ और `बेचने´ के लिए तैयार हो जाता है और, यदि वह संयोग से व्यवसायी और व्यापारी हुआ तो सबसे पहले जिस चीज़ का सौदा वह करता है, वह होता है उसका ज़मीर । `भाषा, संस्कृति और अिस्मता´ आदि चीजों को तो वह खरीददार को यों ही मुफ्त में बतौर भेंट या `कमीशन´ के दे देता है । बहरहाल, अब ऐसी हिंसा हिन्दी के खिलाफ शुरू हो चुकी है । इस हिंसा के जरिए भाषा की हत्या की सुपारी आपके अखबार ने ले ली है । वह भाषा के खामोश हत्यारे की भूमिका में बिना किसी तरह का नैतिक-संकोच अनुभव किए खासी अच्छी उतावली के साथ उतर चुका हैं । उसे कोई चिंता नहीं कि एक भाषा अपने को विकसित करने में कितने युग लेती है । (डेविड क्रिस्टल एक शब्द की मृत्यु को एक व्यक्ति की मृत्यु के समान मानते हैं । ऑडेन तो बोली के शब्दों को इरादतन अपनी कविता में शामिल करते थे कि कहीं वे शब्द मर न जायें - और टीण्एसण् इलियट प्राचीन शब्द, जो शब्दकोष में निश्चेष्ट पड़े रहते थे, को उठाकर समकालीन बनाते थे कि वे फिर से सांस लेकर हमारे साथ जीने लगे।) आपको शब्द की तो छोिड़ये, भाषा तक की परवाह नहीं है, लगता है आप हिन्दी के लिए हिन्दी का अखबार नहीं चला रहे हैं, बल्कि अंगेजी के पाठकों की नर्सरी का काम कर रहे हैं । आप हिन्दी के डेढ़ करोड़ पाठकों का समुदाय बनाने का नहीं, बल्कि हिन्दी के होकर हिन्दी को खत्म करने का इतिहास रचने जा रहे हैं । आप धन्धे में धुत्त होकर जो करने जा रहे हैं, उसके लिए आपको आने वाली पीढ़ी कभी माफ नहीं करेगी । आपका अखबार उस सर्प की तरह है, जो बड़ा होकर अपनी ही पूंछ अपने मुंह में ले लेता है और खुद को ही निगलने लगता है ।


सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से उपजी `भाषा-चेतना´ ने इतिहास में कई-कई लम्बी लड़ाइयां लड़ी हैं । इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आप पायेंगे कि आयरिश लोगों ने अंग्रेजी के खिलाफ एक निर्णायक लड़ाई लड़ी, जबकि उनकी तो लिपि में भी भिन्नता नहीं थी । फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश आदि भाषाएं अंग्रेजी के साम्राज्यवादी वर्चस्व के विरूद्ध न केवल इतिहास में बल्कि इस `इंटरनेट युग´ में भी फिर नए सिरे से लड़ना शुरू कर चुकी हैं ।´


मेरे इस पत्र का उत्तर अखबार मालिक ने नहीं दिया, और वे भला देते क्या ? और देते भी क्यों ? सिर्फ उनके सम्पादक और मेरे अग्रज ने कहा कि हिन्दी में कुछ जनेऊधारी तालिबान पैदा हो गये हैं, जिससे हिन्दी के विकास को बहुत बड़ा खतरा हो गया है । यह सम्पादकीय चिंतन नहीं अखबार के कर्मचारी की विवश टिप्पणी थी । क्योंकि उनसे तुरंत कहा जायेगा कि श्रीमान, अपने भाषा प्रेम और नौकरी में से कोई एक चुन लो । अब तो हिन्दी में अंग्रेजी की अपराजेयता का बिगुल बजाते बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के दलालों ने, विदेशी पूंजी को पचा कर मोटे होते जा रहे हिन्दी के लगभग सभी अखबारों को यह स्वीकारने के लिए राजी कर लिया है कि इसकी नागरी-लिपि को बदल कर, रोमन करने का अभियान छेड़ दीजिए और वे अब इस तरफ कूच कर रहे हैं । उन्होंने इस अभियान को अपना पहला एजेण्डा बना लिया है । क्योंकि बहुराष्ट्रीय निगमों की महाविजय इस सायबर युग में रोमन लिपि की पीठ पर सवार होकर ही बहुत जल्दी संभव हो सकती है । यह विजय अश्वों नहीं, चूहों की पीठ पर चढ़कर की जानी है । जी हां कम्प्यूटर माऊस की पीठ पर चढ़कर ।


एक लेखक ने लिखा था - `अंग्रेजों की विशेषता ही यही होती है कि वे आपको बहुत अच्छी तरह से यह बात गले उतार सकते हैं कि आपके हित में आप स्वयं का मरना बहुत जरूरी है । हिन्दी के अखबारों के चिकने और चमकीले पन्नों पर नई नस्ल के ये चिंतक यही बता रहे हैं कि हिन्दी का मरना, हिन्दुस्तान के हित में बहुत जरूरी हो गया है । यह काम देश सेवा समझकर जितना जल्दी हो सके करो, वर्ना, तुम्हारा देश ऊपर उठ ही नहीं पाएगा । सावधान, वे हिन्दी को बिदा कर देश को ऊपर उठाने के लिए कटिबद्ध हो गये हैं ।

ये हत्या की अचूक युक्तियां भी बताते हैं, जिससे भाषा का बिना किसी हल्ला-गुल्ला किए `बाआसानी संहार´ किया जा सकता है ।

वे कहते हैं कि हिन्दी का हमेशा-हमेशा के लिए खात्मा करने के लिए आप अपनाइये। `प्रॉसेस ऑफ कॉण्ट्रा-ग्रेज्युअलिज़म´ ।

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