हिन्दी के हत्यारे - 2
विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से
( प्रभु जोशी के विचारोत्तेजक आलेख की दूसरी कडी़ )
प्रॉसेस ऑफ कॉण्ट्रा-ग्रेज्युअलिज़म - यानी बाहर किसी को पता ही नहीं चले कि भाषा को `सायास´ बदला जा रहा है । बल्कि, `बोलने वालों´ को लगे कि यह तो एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। कुछ अखबारों की भाषा में, यह परिवर्तन उसी प्रक्रिया के तहत हो रहा है । इसका एक तरीका है कि अपने अखबार की भाषा में आप हिन्दी के मूल दैनंदिनी शब्दों को हटाकर, उनकी जगह अंग्रेजी के उन शब्दों को छापना शुरू कर दो, जो बोलचाल की भाषा में `शेयर्ड - वकैब्युलरि´ की श्रेणी में आते हैं । जैसे कि रेल, पोस्टकार्ड, मोटर, स्टेशन, पेट्रोल पंप आदि-आदि । फिर धीरे-धीरे इस शेयर्ड वकैब्युलरि में रोज-रोज अंग्रेजी के नये शब्दों को शामिल करते जाइये । जैसे पिता-पिता की जगह छापिये पेरेंट्स, छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स, विश्वविद्यालय की जगह युनिवर्सिटी, रविवार की जगह संडे, यातायात की जगह ट्रेफिक आदि-आदि । अंतत: उनकी तादाद इतनी बढ़ा दो कि मूल भाषा के केवल कारक भर रह जायें ।
यह चरण, `प्रोसेस ऑव डिलोकेशन´ कहा जाता है । यानी की हिन्दी के शब्दों को धीरे-धीरे बोलचाल के जीवन से उखाड़ते जाने का काम । ऐसा करने से इसके बाद भाषा के भीतर धीरे-धीरे `स्नोबॉल थियरी´ काम करना शुरू कर देगी - अथाZत बर्फ के दो गोलों को एक दूसरे के निकट रख दीजिए, कुछ देर बाद वे घुलमिलकर इतने जुड़ जाएंगे कि उनको एक दूसरे से अलग करना संभव नहीं हो सकेगा । यह थियरी भाषा में सफलता के साथ काम करेगी और अंग्रेजी के शब्द हिन्दी से ऐसे जुड़ जायेंगे कि उनको अलग करना मुश्किल होगा । इसके बाद शब्दों की बजाय पूरे के पूरे अंग्रेजी के वाक्यांश छापना शुरू कर दीजिए। अथाZत `इनक्रीज द चंक ऑफ इंग्लिश फ्रेज़ेज़´ । मसलन `आऊट ऑफ रीच/बियाण्ड डाउट/नन अदर देन/ आदि आदि । कुछ समय के बाद लोग हिन्दी के उन शब्दों को बोलना ही भूल जायेंगे । उदाहरण के लिए हिन्दी में गिनती स्कूल में बंद किये जाने से हुआ यह है कि यदि आप बच्चे को कहें कि अड़सठ रूपये दे दो, तो वह अड़सठ का अर्थ ही नहीं समझ पायेगा, जब तक कि उसे अंग्रेजी में सिक्सटी एट नहीं कहा जायेगा । इस रणनीति के तहत बनते भाषा रूप का उदाहरण एक स्थानीय अखबार से उठाकर दे रहा हूं ।
´मािर्नंग अवर्स के ट्रेफिक को देखते हुए, डििस्ट्रक्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने जो ट्रेफिक रूल्स अपने ढंग से इम्प्लीमेंट करने के लिए जो जेनुइन एफट्Zस किये हैं, वो रोड को प्रोन टू एक्सीडेंट बना रहे हैं । क्योंकि, सारे व्हीकल्स लेफ्ट टर्न लेकर यूनिवर्सिटी की रोड को ब्लॉक कर देते हैं । इन प्रॉब्लम का इमीडिएट सोल्यूशन मस्ट है ।´
इस तरह की भाषा को लगातार पांच-दस वर्ष तक प्रिंट माध्यम से पढ़ते रहने के बाद अखबार के पाठक की यह स्थिति होगी कि उसे कहा जाय कि वह हिन्दी में बोले तो वह गूंगा हो जायेगा । उनकी इस युक्ति को वे कहते हैं `इल्यूज़न ऑफ स्मूथ ट्रांजिशन´। अथाZत हिन्दी की जगह अंग्रेजी को निर्विघ्न ढंग से स्थापित करने का सफल छद्म । एक भली चंगी भाषा से उसके रोजमर्रा के सांस लेते शब्दों को हटाने और उसके व्याकरण को छीन कर उसे बोली में बदलने की प्रक्रिया को `क्रियोलीकरण´ कहते हैं । अथाZत हिन्दी का हिंग्लिश बनाना उसका वैसा ही क्रियोलीकरण है, जैसा पहले फ्रांस या इंगलैंड का उपनिवेश रह चुके कैरेबियाई देशों भाषाएं हैं। ऐसी भाषा को लंबे काल तक बोलने वाले जन समुदाय को कुछ पीढ़ियों के बाद यह स्मृतिभ्रम हो जाता है, कि दरअसल दोनों मिश्रित भाषाओं को बोलने वाले समुदायों की उत्पत्ति और विकास के सूत्र एक ही हैं। यानी `इल्यूज़न ऑफ कॉमन ओरिजिन ऑफ रेस एंड कल्चर।
भाषा की हत्या के एक योजनाकार ने अगले चरण को नाम दिया है - `फायनल असाल्ट ऑन हिन्दी´ । यानी हिन्दी को नागरी लिपि के बजाय रोमन लिपि में छापने की शुरूआत करना । यानी हिन्दी पर अंतिम प्राणघातक प्रहार । बस हिन्दी की हो गई अन्त्येष्टि । क्योंकि हिन्दी को रोमन में लिख पढ़कर बड़ी होने वाली अगली पीढ़ी में अब तक नागरी में लिखी जाने वाली हिंदी नितांत अबूझ और अपठनीय हो जायेगी । इसी युक्ति से गुयाना में जहां 43 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते थे को फ्रेंच द्वारा डि-क्रियोल कर दिया गया और अब वहां देवनागरी की जगह रोमन लिपि को चला दिया गया है । यही काम त्रिनिदाद में इस षड्यंत्र के जरिए किया गया है ।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के धूर्त दलालों के दिशा निर्देश में संसार की इस दूसरी बड़ी बोले जाने वाली भाषा से उसकी लिपि छीन कर, उसे रोमन लिपि थमाने की दिशा में हिन्दी के कई अखबार जुट गए हैं । क्योंकि, देर सबेर इसी को ही तो भारत की राष्ट्रभाषा बनाना है । प्राथमिक शिक्षा के लिए विश्व बैंक द्वारा प्राप्त धन का यही तो आखरी सुफल है, क्योंकि आगे जाकर समूची आरंभिक शिक्षा के कायान्तरण के कर्मकाण्ड को पूरा किया जाना एक अघोषित यज्ञ है, जिसमें हिन्दी के कई अखबार मिल-जुलकर आहुतियां दे रहे हैं ।
इसी किस्म की इच्छा और संकल्प की अनुगूंज गुरूरणदास जैसे लोगों के प्रायोजित लेखों से सुनाई देती है, जो इन अखबारों के सम्पादकीय पृष्ठों पर छपते रहते हैं । वे बार-बार कहते हैं कि जल्द ही हिन्दुस्तान दुनिया की आने वाले दो सौ वर्षों के लिए `भाषाशक्ति´ बनने वाला है - जबकि वे जानते हैं कि इससे बड़ा धोखा और कोई हो ही नहीं सकता ।
अंग्रेजी की विरुदावली गा-गाकर गला फाड़ते ये किराये के कोरस गायक, यह क्यों भूल जाते हैं कि चीनी (जिसमें ढाई हजार चिन्हनुमा अक्षर हैं)- जापानी जैसी चित्रात्मक लिपियों वाली भाषाओं ने अंग्रेजी की वैसाखी के बगैर ही बीसवीं सदी के सारे ज्ञान-विज्ञान को अपनी उन्हीं चित्रात्मक लिपियों वाली भाषा में ही विकसित किया और आज जब संसार में व्यापार, तकनॉलाजी या आर्थिक क्षेत्रों के संदर्भ खुलते हैं तो कहा जाता है, लिंचपिन आव वल्र्ड-इकोनॉमी एण्ड टेकनोलॉजी हेज शिफ्टेड फ्रॉम अमेरिका टू जापान । कुछ लोग अब जापान के साथ चीन का भी नाम लेने लगे हैं और यह किसी से छुपा नहीं है कि अब अमेरिका चीन से भी डरने लगा है । क्योंकि वह शीघ्र ही सूचना प्रौद्योगिकी पर कब्जा करने वाला है । अमेरिका में पढ़ रहा एक चीनी छात्र, यदि वहां रहकर कोई कम्प्यूटर सॉफ्टवेअर विकसित करता है तो वह उसे वह अपनी चीनी भाषा में भी विकसित करता है और अपने देश में पहुंचते ही वह उसे स्थापित कर देता है । जबकि, हिन्दी की नागरी लिपि, जो संसार भर की तमाम भाषाओं की लिपियों में श्रेष्ठ और वैज्ञानिक है को अंग्रेजी का रास्ता साफ करने के लिए निर्दयता के साथ मारा जा रहा है । वे अपने धूर्त मुहावरे में बताते हैं कि अखबार इस तरह हिन्दी को नष्ट नहीं कर रहे हैं, बल्कि ग्लोबल बना रहे हैं । वे हिन्दी को एक फ्रेश लिंिग्विस्टक लाइफ दे रहे हैं । हम जानना चाहते हैं कि भैया आप किसे मूर्ख बना रहे हैं - जिस हिन्दी को राष्ट्र संघ की भाषा सूची में शामिल नहीं करवा सके, उसे `हिंग्लिश´ बनाकर ग्लोबल बनायेंगे ? और हिंग्लिश बन कर, हिन्दी ग्लोबल होगी कि वह अंग्रेजी के साम्राज्यवादी `महामत्स्य´ के उदर में पहुंच जाएगी? क्या हमारे हिंग्लिशियाते अखबार इस पर कभी सोचते है कि पाओलो फ्रेरे से लेकर पाल गुडमेन तक सभी ने प्राथमिक शिक्षा के सर्वश्रेष्ठ माध्यम को मातृभाषा ही माना है और हम हिन्दुस्तानी है कि हमारे रक्त में रची बसी भाषा को उसके मास मज्जा सहित उखाड़कर फेंकने का संकल्प कर चुके हैं ।