अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय की संविधि

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अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय की संविधि
अनुच्छेद 1

संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख न्यायिक अंग के रूपमें संयुक्त राष्ट्र के चार्टर द्वारा स्थापित अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय का गठन वर्तमान संविधि के उपबन्धों के अनुसार होगा और तदनुसार ही वह कार्य करेगा।

अध्याय एक[सम्पादन]

न्यायालय का गठन
अनुच्छेद 2

यह न्यायालय स्वतन्त्र न्यायाधीशों का पुंज होगा। वे न्यायाधीश उच्च नैतिक चरित्र वाले उन व्यक्तियों से चुने जाएंगे जिनकी ऐसी अर्हताएं हों जिनके आधार पर वे अपने देश में भी उच्च न्यायिक पदों पर नियुक्त किए जा सकते हों अथवा अन्तरराष्ट्रीय विधि क्षेत्र में माने हुए न्यायिक परामर्शदाता हों, भले हीउनकी राष्ट्रीयता कुछ भी हो।

अनुच्छेद 3
  • 1. इस न्यायालय के पन्द्रह सदस्य होंगे जिनमें एक ही राष्ट्रियता के दो सदस्य नहीं होंगे।
  • 2. यदि कोई व्यक्ति न्यायालय की सदस्यता के प्रयोजन से एक से अधिक राज्य की राष्ट्रियता वाला माना जाए तो वह केवलउसी राज्य की राष्ट्रियता वाला समझा जाएगा जिसमें सामान्यतः वह नागरिक औरराजनीतिक अधिकारों का प्रयोग कर सकता है।
अनुच्छेद 4
  • 1. न्यायालय के सदस्यों का निर्वाचन महासभा और सुरक्षा परिषद् द्वारा उन व्यक्तियों की सूची में से किया जाएगा जिन्हें स्थायी विवाचन न्यायालय के राष्ट्रीय समूहों द्वारा आगे दी जाने वाली व्यवस्था के अन्तर्गत नामांकित किया गया हो।
  • 2. यदि संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों का स्थायीविवाचन न्यायालय के प्रतिनिधित्व न हो तो उनकी सरकारों द्वारा राष्ट्रीय समूहों द्वारा अभ्यार्थी नामांकित किए जाएंगे। इस कार्य के लिए उन्हीं शर्तो के अधीन जो अन्तरराष्ट्रीय विवादों के शान्ति पूर्ण निपटान के लिए 1907 की द हेग उपसंधि के अनुच्छेद 44 के द्वारा स्थायी विवाचन न्यायालय के सदस्यों के लिए निर्धारित है।
  • 3. जिन शर्तां के अधीन कोई राज्य जो वर्तमान संविधि का हस्ताक्षकर्ता तो हो परन्तु संयुक्त राष्ट्र का सदस्य न हो, किसी विशिष्ट करार की अनुपस्थिति में, न्यायालय के सदस्यों के निर्वाचन में भाग ले सकता है, वे महासभा द्वारा सुरक्षा परिषद् की सिफारिश पर ही बनाई जाएंगी।
अनुच्छेद 5
  • 1. निर्वाचन की तिथि से कम से कम तीन महीने पहले संयुक्त राष्ट्र का महासचिव सभी स्थायी विवाचन न्यायालय के उन राज्यों के जो वर्तमान संविधि के हस्ताक्षरकर्ता हों तथा उन राष्ट्रीय समूहों के जिनको अनुच्छेद 4 पैरा 2 केअन्तर्गत नियुक्त किया गया हो, सदस्यों के नाम एक लिखित प्रार्थना भेजेगा तथा उनसे यह निवेदन करेगा कि वे निर्धारित अवधि के अन्दर राष्ट्र समूहों द्वारा ऐसे व्यक्तियों का नामांकन करें जो न्यायालय की सदस्यता के कत्तर्व्यों को स्वीकार करने की स्थिति में हों।
  • 2. कोई भी समूह चार व्यक्तियों से अधिक को नामांकित नहीं कर सकेगा। इनमें से दो से अधिक सदस्य उनकी अपनी राष्ट्रियता के नहीं होंगे। किसी भी दशा में एक समूह द्वारा नामांकित अभ्यार्थियों की संख्या भरे जाने वाले स्थानों की संख्या के दुगने से अधिक नहीं होनी चाहिए।
अनुच्छेद 6

इस प्रकार के नामांकन प्रस्तुत करने से पहलेप्रत्येक राष्ट्र से यह सिफारिश की जाती है कि वे अपने उच्चतम न्यायालय विधिक विभागों और विधि-स्कूलों और राष्ट्रीय अकादमियों और विधि के अध्ययन में रत अन्तरराष्ट्रीय अनुभागों से भी परामर्श कर लें।

अनुच्छेद 7
  • 1. महासचिव इस प्रकार नामांकित व्यक्तियों कीवर्ण क्रमानुसार सूची तैयार करेगा तथा यदि अनुच्छेद 12 पैरा 2 उपबन्ध बाधक न हो तो केवल वही व्यक्ति प्रवेश योग्य समझे जाएंगे।
  • 2. महासचिव इस सूची को महासभा और सुरक्षा परिषद् के सम्मुख प्रस्तुत करेगा।
अनुच्छेद 8

महासभा और सुरक्षा परिषद् न्यायालय के सदस्यों को निर्वाचित करने के लिए अपनी-अपनी कार्यवाही अलग-अलग करेंगे।

अनुच्छेद 9

प्रत्येक निर्वाचन में निर्वाचक न केवल यही ध्यान रखेंगे कि निर्धारित योग्यता रखने वाले ही व्यक्ति निर्वाचित किए जाएं बल्कि उन्हें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि उस निकाय में सभ्यता के प्रमुख विधिक पद्धतियों का भी प्रतिनिधित्व अवश्य रहे।

अनुच्छेद 10
  • 1. जो अभ्यार्थी महासभा और सुरक्षा परिषद् के मतदान में पूर्ण बहुमत प्राप्त करेंगे उन्हें निर्वाचित समझा जाएगा।
  • 2. सुरक्षा परिषद् का कोई भी मत, चाहे वह न्यायाधीशों के निर्वाचन के लिए हो अथवा अनुच्छेद 12 के अनुसार सम्मेलन (कान्फ्रेंस) के सदस्य की नियुक्ति के लिए हो, सुरक्षा परिषद् के स्थायी और अस्थायी सदस्यों केबीच किसी भेद-भाव के बिना ही लिया जाएगा।
  • 3. यदि महासभा और सुरक्षा परिषद् दोनों में एक ही राज्य के एकसे अधिक नागरिकों को पूर्ण बहुमत प्राप्त हो जाए तो ऐसी स्थिति दशा में उनमें से जो आयु में बड़ा होगा वही निर्वाचित माना जाएगा।
अनुच्छेद 11

निर्वाचन के लिए बुलाई गई पहली बैठक में यदि एक या एक से अधिक स्थान खाली रह जाएं, तो आवश्यकतानुसार दूसरी और तीसरी बैठक भी बुलाई जा सकती है।

अनुच्छेद 12
  • 1. यदि तीसरी बैठक के बाद भी एक या एक से अधिक सीट खाली रह जाए तब एक छः सदस्यों का संयुक्त सम्मेलन किसी भी समय महासभा अथवा सुरक्षा परिषद् की प्रार्थना पर किया जाएगा जिसके तीन सदस्य महासभा द्वारा और तीन सदस्य सुरक्षा परिषद् द्वारा नियुक्त किए जाएंगे। यह सम्मेलन प्रत्येक खाली सीट के लिए एक-एक नाम का चयन पूर्ण बहुमत के आधार पर करेगा और उन नामों को अलग-अलग महासभा तथा सुरक्षा परिषद् की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत करेगा।
  • 2. यदि संयुक्त सम्मेलन सर्वसम्मति से किसी व्यक्ति के बारे में, जो निर्धारित शर्तां को पूरा कर रहा हो, सहमत हो जाए तो उसका नाम भी इसी सूचीमें सम्मिलित किया जा सकता है, भले ही उसका नाम अनुच्छेद 7 के संदर्भ में बनाई गई नामांकन सूची में न हो।
  • 3. यदि संयुक्त सम्मेलन की राय जो कि वहनिर्वाचन कराने में सफल नहीं हो सकेगा, तो न्यायालय में पहले के निर्वाचन सदस्य सुरक्षा परिषद् द्वारा निर्धारित अवधि के भीतर ही उन सीटों को उन अभ्यार्थियों में से चुनकर भर देंगे जिनको महासभा अथवा सुरक्षा परिषद् में अधिक मत प्राप्त हुए हों।
  • 4. यदि दोनों पक्षों में न्यायाधीशों के मतबराबर हों तो ऐसी स्थिति में सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश निर्णायक मत का प्रयोग करेगा।
अनुच्छेद 13
  • 1. न्यायालय के सदस्यों का निर्वाचन नौ वर्ष केलिए होगा और वे पुनः निर्वाचित भी हो सकेंगे, बशर्ते कि पहले निर्वाचन में निर्वाचितन्यायाधीशों में से पांच का कार्यकाल तीन वर्ष के बाद और अन्य दूसरे पांच का कार्यकाल 6 वर्ष के बाद समाप्त हो जाएगा।
  • 2. जिन न्यायाधीशों का कार्यकाल उपर्युक्त बताई गई प्रारम्भिक तीन वर्षां और 6 वर्षों की अवधि के बाद समाप्त होना है, उनके नाम का चयन स्वयं महासचिव द्वारा पहले निर्वाचन की समाप्ति के तुरन्त बाद लाटरी डाल कर किया जाएगा।
  • 3. जब तक न्यायालय के सदस्यों की जगहें न भरी जाएं तब तक वे कार्य करते रहेंगे। उन जगहों को भरे जाने के बाद भी जिन मामलों को वे शुरू कर चुके हों उनका निबटारा वे स्वयं करेंगे।
  • 4. यदि न्यायालय के किसी सदस्य को त्यागपत्र देना हो तो त्यागपत्र महासचिव को अग्रेषित करने के निमित न्यायालय के अध्यक्ष को सम्बोधित किया जाएगा, इस अंतिम अधिसूचना द्वारा स्थान रिक्त माना जाएगा।
अनुच्छेद 14

जो पद्धति प्रथम निर्वाचन के लिए निर्धारित की गई है उसी के अनुसार रिक्त स्थान भरे जाएंगे लेकिन ऐसा करते हुए यह शर्त रहेगीः महासचिव स्थान रिक्त होने के एक माह के अन्दर ही अनुच्छेद 5 के उपबन्धानुसार निमंत्रण जारी करने की कार्यवाही करेगा और निर्वाचन की तिथि सुरक्षा परिषद् द्वारा निश्चित की जायेगी।

अनुच्छेद 15

न्यायालय के किसी ऐसे सदस्य के स्थान पर जिसका कार्यकाल अभी समाप्त न हुआ हो, यदि कोई दूसरा सदस्य निर्वाचित होगा तो उसके पूर्वाधिकार के कार्यकाल में से जितना समय शेष रहेगा, उतने समय तक ही वह कार्य करेगा।

अनुच्छेद 16
  • 1. न्यायालय का कोई भी सदस्य किसी भी राजनीतिक अथवा प्रशासनिक कार्य में भाग न ले सकेगा और न ही वह कोई अन्य व्यावसायिक कार्य ही कर सकेगा।
  • 2. इस विषय पर किसी भी शंका का निवारण न्यायालय के निर्णय द्वारा किया जाएगा। अनुच्छेद 17
  • 1. न्यायालय का कोई भी सदस्य किसी मामले मे एजेण्ट, परामर्शदाता अथवा अधिवक्ता के रूप में कार्य नहीं कर सकेगा।
  • 2. कोई भी सदस्य ऐसे किसी मामले के निर्णयमें भाग नहीं ले सकेगा जिसमें वह किसी पक्ष के अभिकर्ता, परामर्शदाता, अथवा अधिवक्ता अथवा किसी राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय के सदस्य अथवा जाँच आयोग के सदस्य के रूप में अथवा किसी अन्य हैसियत से पहले भाग ले चुका हो।
  • 3. इस विषय पर किसी भी शंका का निवारण न्यायालय के निर्णय द्वारा किया जाएगा।
अनुच्छेद 18
  • 1. न्यायालय के किसी भी सदस्य को तब तकपदच्युत नहीं किया जा सकता जब तक अन्य सभी सदस्यों की एकमत से यह राय न हो कि अब वह अपेक्षित शर्तां का पालन नहीं कर रहा।
  • 2. इसकी औपचारिक अधिसूचना रजिस्ट्रार द्वारा महासचिव को भेजी जाएगी।
  • 3. यह अधिसूचना जारी होते हीवह स्थान रिक्त समझा जाएगा।
अनुच्छेद 19

न्यायालय के सदस्य जब न्यायालय के कार्यमें लगे होंगे तब वे राजनयिक विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों का उपभोग करेंगे।

अनुच्छेद 20

न्यायालय का प्रत्येक सदस्य अपना पद भार ग्रहण करने से पूर्व खुले न्यायालय में औपचारिक रूप से यह घोषणा करेगा कि वह अपनी शक्तियों का निष्पक्षता और निष्ठापूर्वक प्रयोग करेगा।

अनुच्छेद 21
  • 1. न्यायालय अपने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का निर्वाचन तीन वर्ष के लिए करेगा; उन्हें दुबारा निर्वाचित किया जा सकेगा।
  • 2. न्यायालय अपने रजिस्ट्रार की और अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति भी स्वयं ही करेगा।
अनुच्छेद 22
  • 1. न्यायालय द हेग नगर में स्थापित कियाजाएगा। इससे न्यायालय पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं होगा कि वह जब कभी उचित समझे, कहीं और अपना अधिवेशन और कार्य संचालन न कर सके।
  • 2. अध्यक्ष और रजिस्ट्रार का निवास उसी जगह होगा जहाँ न्यायालय स्थित होगा। अनुच्छेद 23
  • 1. न्यायालय से सम्बन्धित छुट्टियों के अतिरिक्त न्यायालय का सत्र चलता रहेगा। इन छुट्टियों की तारीखें और अवधि न्यायालय द्वारा निश्चित की जाएंगी।
  • 2. न्यायालय के सदस्यों को आवधिक छुट्टी मिल सकती है। इन छुट्टियों की तारीख और अवधि न्यायालय, हेग से प्रत्येक न्यायाधीश के घर की दूरी को ध्यान रखते हुए निश्चित करेगा।
  • 3. न्यायालय के सदस्यों को न्यायालय की सेवामें उपस्थित रहना अनिवार्य होगा, बशर्ते कि वे छुट्टी पर न हों अथवा रोग अथवा अन्य किसी गम्भीर कारण से जो कि अध्यक्ष को विधिवत सूचित किए गए हों न्यायालय में आने में समर्थ न हों।
अनुच्छेद 24
  • 1. यदि किसी विशेष कारण से न्यायालय का कोई सदस्य यह समझता है कि उसे विशेष मामले के निर्णय में भाग नहीं लेना चाहिए तो वह इसकी सूचना अध्यक्ष को देगा।
  • 2. यदि अध्यक्ष यह समझता है कि किसी विशेष कारण से किसी सदस्य को किसी विशेष मामले में भाग नहीं लेना चाहिए तो वह सदस्य को तदनुसार सूचित करेगा।
  • 3. यदि किसी मामले में न्यायालय के सदस्य और अध्यक्ष के बीच मतभेद हो जाता है तो वह मामला न्यायालय के निर्णय केद्वारा निश्चित किया जायेगा।
अनुच्छेद 25
  • 1. केवल उन अवसरों के अतिरिक्त जिनके संबंध में प्रस्तुत संविधि में स्पष्ट रूप से व्यवस्था की गई है पूरान्यायालय लगा करेगा।
  • 2. न्यायालय के नियमों में परिस्थिति के अनुसार यह व्यवस्था की जा सकती है कि बारी-बारी से एक या अधिक न्यायाधीशों को अदालत में बैठने की छुट्टी दे दी जाए, बशर्ते इस कारण न्यायालय में सुनवाई करनेके लिए उपलब्ध न्यायाधीशों की संख्या ग्यारह से कम न हो।
  • 3. न्यायालय की कार्यवाही चलाने के लिए नौ न्यायाधीशों का कोरम पर्याप्त होगा।
अनुच्छेद 26
  • 1. न्यायालय समय-समय पर एक या अधिक चेम्बर बना सकता है। प्रत्येक चेम्बर में तीन या अधिक न्यायाधीश, जितने भी न्यायालय निश्चित करे, रहेंगे। ये चेम्बर विशेष प्रकार के मामलों पर, उदाहरणार्थ, श्रम सम्बन्धी मामलों और संक्रमण और संचार सम्बन्धी मामलों पर विचार करने के उद्देश्य से बनाए जाएंगे।
  • 2. न्यायालय किसी भी समय किसी विशेष मामले पर विचार करने के लिए चेम्बर बना सकता है। इस प्रकार के चेम्बर में न्यायाधीशों की संख्या को न्यायालय, सम्बन्धित पक्षों के अनुमोदन से निश्चित करेगा।
  • 3. यदि सम्बन्धित पक्ष अनुरोध करे तो ये चेम्बर जिनकी व्यवस्था इस अनुच्छेद में की गई है, मामलों की सुनवाई करेंगे और उनपर अपना निर्णय देंगे।
अनुच्छेद 27

अनुच्छेद 26 और 29 में जिन चेम्बरों की व्यवस्था की गई है उनमें से किसी चेम्बर के द्वारा किया गया निर्णय न्यायालय द्वारादिया गया निर्णय माना जाएगा।

अनुच्छेद 28

अनुच्छेद 26 और 29 में जिन चेम्बरों की व्यवस्था की गई है वे सम्बन्धित पक्षों की सहमति से द हेग के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर भी अपनी बैठक कर सकते हैं और अपना कार्य कर सकते हैं।

अनुच्छेद 29

कार्य को शीघ्रता से निपटाने के उद्देश्य सेन्यायालय प्रत्येक वर्ष पांच न्यायाधीशों का एक चेम्बर बनाएगा। ये सम्बन्धित पक्षों के अनुरोध पर संक्षिप्त कार्यवधि द्वारा मामलों की सुनवाई कर सकते हैं और उन पर अपना निर्णय दे सकते हैं। इसके अतिरिक्त जिन न्यायाधीशों का चेम्बर की कार्यवाही में भाग लेना सम्भव न हो उनके स्थान पर काम करने के लिए दो अन्य न्यायाधीश चुने जाएंगे।

अनुच्छेद 30
  • 1. न्यायालय अपना कार्य चलाने के लिए स्वयं नियम बनाएगा। विशेष रूप से वह क्रिया-विधि सम्बन्धी नियम बनाएगा।
  • 2. न्यायालय द्वारा की गई व्यवस्था के अनुसार निर्धारक न्यायालय की अथवा न्यायालय के किसी चेम्बर की कार्यवाही में भाग ले सकेंगे, किन्तु उन्हें मत देने का अधिकार नहीं होगा।
अनुच्छेद 31
  • 1. जो न्यायाधीश संबंधित पक्षों के राष्ट्रों के राष्ट्रिक हैं उनको न्यायालय के सामने प्रस्तुत किसी मामले में बैठने का अधिकार बना रहेगा।
  • 2. यदि न्यायालय न्यासपीठ में एक पक्ष की राष्ट्रीयता के न्यायाधीश को सम्मिलित कर लेता है तो कोई भी दूसरा पक्ष न्यायाधीश के रूप में न्यासपीठ में बैठने के लिए किसी व्यक्ति को चुन सकता है अधीमानतः ऐसा व्यक्ति उन व्यक्तियों में से चुना जाएगा जो अनुच्छेद 4 और 5 में की गई व्यवस्था के अनुसार प्रत्याशी के रूपमें नामांकित किए जा चुके हों।
  • 3. यदि न्यायालय न्यायपीठ में संबंधित पक्षों की राष्ट्रियता के न्यायाधीश को सम्मिलित नहीं करता है तो इनमें से प्रत्येक पक्ष इस अनुच्छेद के पैरा 2 में की गई व्यवस्था के अनुसार एक-एक न्यायाधीश चुन सकता है।
  • 4. इस अनुच्छेद के उपबन्ध अनुच्छेद 26 और29 के मामले में भी लागू होंगे। ऐसे मामलों में अध्यक्ष चेम्बर के सदस्यों में सेएक, अथवा यदि आवश्यकता हुई, तो दो सदस्यों से अनुरोध करेगा कि वे संबंधित पक्षों की राष्ट्रिकता के न्यायाधीशों के हेतु और यदि ऐसे न्यायाधीश न हों या वे उपस्थित नहीं हो सकें तो, सम्बन्धित पक्षों द्वारा विशेष रूप से चुने गए न्यायाधीशोंके हेतु अपने स्थान छोड़ दें।
  • 5. यदि कई पक्षों के हित समान हों तो ऊपर बताए उपबन्धों के प्रयोजन के लिए उन्हें एक ही पक्ष समझा जाएगा इस सम्बन्ध में किसी भी संदेह के विषय में निर्णय न्यायालय के द्वारा किया जाएगा।
  • 6. इस अनुच्छेद के पैरा 2, 3 और 4 के अनुसार चुने गए न्यायाधीश प्रस्तुत संविधि के अनुच्छेद 2, 17 (पैरा 2 ), 20 और 24 की अपेक्षित शर्तों को पूरा करेंगे। वे अपने सहयोगियों के साथ पूरी बराबरी केआधार पर निर्णय में भाग लेंगे।
अनुच्छेद 32
  • 1. न्यायालय के प्रत्येक सदस्य को वार्षिक वेतन मिलेगा।
  • 2. अध्यक्ष को विशेष वार्षिक भत्ता मिलेगा
  • 3. उपाध्यक्ष जिस दिन अध्यक्ष के पद पर काम करेगा उस दिन का उसे विशेष भत्ता मिलेगा।
  • 4. अनुच्छेद 31 के अधीन न्यायालय के सदस्योंके अतिरिक्त जो न्यायाधीश चुने जाएंगे उनको भी, जिस दिन वे कार्य करेंगे, उसदिन के लिए प्रतिपूरक राशि मिलेगी।
  • 5. ये वेतन, भत्ते और प्रतिपूरक राशि महासभा द्वारा निश्चित किए जाएं। इन्हें कार्यकाल के बीच में कम नहीं किया जाएगा।
  • 6. रजिस्ट्रार का वेतन न्यायालय के प्रस्तावपर महासभा द्वारा निश्चित किया जाएगा।
  • 7. महासभा द्वारा बनाए गए विनियमों के द्वारा उन उपबन्धों को निश्चित किया जाएगा जिनके अधीन न्यायालय के सदस्यों और रजिस्ट्रार को सेवा निवृत्त पेंशन दी जाएगी और जिनके अधीन न्यायालय के सदस्यों और रजिस्ट्रार को यात्रा व्यय का प्रत्यर्पण किया जाएगा।
  • 8. उपर्युक्त वेतन, भत्ते और प्रतिपूरकराशि सभी प्रकार से मुक्त होंगे।
अनुच्छेद 33

न्यायालय का व्यय संयुक्त राष्ट्र उसी प्रकार वहन करेगा जिस प्रकार महासभा द्वारा इसका निर्णय किया जाएगा।

अध्याय दो[सम्पादन]

न्यायालय की सुयोग्यता
अनुच्छेद 34
  • 1. न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत मामलों में केवल राज्य ही पक्ष होंगे।
  • 2. अपने नियमों के अधीन और अनुरूप न्यायालय सार्वजनिक अर्न्राष्ट्रीय संगठनों से ऐसी सूचना देने का अनुरोध करेगा जो न्यायालय के समक्ष उपस्थित मामलों से सम्बन्धित हों, और यदि इस प्रकार के संगठन अपनी ओर से कोई ऐसी सूचना दें तो वह उन्हें भी स्वीकार करेगा।
  • 3. जब कभी न्यायालय के सामने किसी सार्वजनिक अन्तरराष्ट्रीय संगठन या उसके अधीन स्वीकार किए गए किसी अन्तरराष्ट्रीय अभिसमय के संविधायी लेखपत्र की रचना के संबंध में कोई विवाद उपस्थित हो तो रजिस्ट्रार संबंधित सार्वजनिक अन्तरराष्ट्रीय संगठन को सूचना देगा और सम्पूर्ण लिखित कार्यवाही की प्रतिलिपियां उसके पास भेजेगा।
अनुच्छेद 35
  • 1. न्यायालय उन सब राष्ट्रों के लिए खुला होगा जो प्रस्तुत संविधि्ा के समर्थक हों।
  • 2. जिन शर्तां के अधीन न्यायालय अन्य राष्ट्रों के लिए खुला रह सकेगा वे सुरक्षा परिषद् के द्वारा निर्धारित की जाएंगी। यह उन संधियों में निहित विशेष उपबन्धों के अधीन किया जाएगा जो कि उस समय प्रभावी होगी परन्तु किसी भी दशा में इस प्रकार की शर्तां से न्यायालय के समक्ष सम्बन्धित पक्षों की स्थिति में कोई असमानता नहीं आएगी।
  • 3. यदि किसी मामले से संबंधित पक्ष का कोई ऐसा राष्ट्र हो, जो संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं है तो न्यायालय यह निश्चित करेगा किउस राष्ट्र को कितनी राशि न्यायालय के व्यय के रूप में देनी होगी। यह वह राष्ट्र न्यायालय के व्यय का कोई भाग पहले से ही वहन कर रहा हो तो यह उपबन्ध उसपर प्रभावी नहीं होगा।
अनुच्छेद 36
  • 1. न्यायालय के अधिकारक्षेत्र में वे समस्त मामले आएंगे जो विभिन्न पक्षों के द्वारा न्यायालय के सामने रखे जाएं अथवा जिनकी विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र में अथवा प्रभावी संधियों या अभिसमयों में व्यवस्था होगी।
  • 2. प्रस्तुत संविधि को स्वीकार करने वाले राष्ट्र किसी समय भी यह घोषणा कर सकते हैं कि वे न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को, यथातथ्यतः और बिना किसी विशेष समझौते के आधार पर, इस प्रकार के दायित्व को मानने वाले किसी अन्य राष्ट्र के सम्बन्ध में उन सभी विधिक विवादों में अनिवार्य मानतेहैं जिनका सम्बन्ध निम्नलिखित हो

(क) किसी संधि का निर्वाचन।

(ख) अन्तरराष्ट्रीय विधि की समस्या

(ग) किसी भी ऐसे तथ्य की विद्यमानता, जिसका अर्थ अन्तरराष्ट्रीय दायित्व का उल्लंघन हो बशर्तें कि वह प्रभावित हो जाए।

(घ) विशिष्ट अन्तरराष्ट्रीय दायित्व के भंगहोने पर दी जाने वाली क्षतिपूर्ति का स्वरूप और उसकी सीमा।

  • 3. उपर्युक्त घोषणाएं बिना किसी शर्त के अथवा अनेक अथवा कुछ विशेष राष्ट्रों की अन्योन्यता की शर्त पर अथवा कुछ निश्चित समय के लिए की जा सकती है ;
  • 4. इस प्रकार की घोषणाएं संयुक्त राष्ट्र केमहासचिव के पास जमा की जाएंगी और वह उनकी प्रतिलिपियां संविधि को स्वीकार करने वाले राष्ट्रों और न्यायालय के रजिस्ट्रार के पास भेजेगा।
  • 5. स्थायी न्यायालय की संविधि के अनुच्छेद 36 के अधीन की गई ऐसी घोषणाओं को जो अब भी प्रभावी हों, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय केअनिवार्य अधिकारक्षेत्र की स्वीकृतियों के रूप में, उस अवधि तक के लिए जिस अवधि तक के लिए प्रभावी हों, और उनकी शर्तो के अनुसार उसी प्रकार मानी जांएगी जिस प्रकार की वे प्रस्तुत संविधि के समर्थक पक्षों के बीच में की गई हों।
  • 6. न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के संबंध में किसी विवाद के प्रस्तुत हेने पर न्यायालय के निर्णय के द्वारा ही वह मामला तय किया जाएगा।
अनुच्छेद 37

जब कभी किसी प्रभावी संधि या अभिसमय में यह व्यवस्था की गई हो कि किसी मामले को ऐसे अधिकरण में भेजा जाए, जो लीग आफ नेषन्स द्वारा बनाया गया हो अथवा अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय में भेजा जाए तो उस मामले को प्रस्तुत संविधि के समर्थक पक्षों के बीच के किसी मामले की भाँति अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय के समक्ष रखा जाएगा।

अनुच्छेद 38
  • 1. न्यायालय जिसका दायित्व उसके समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले विवादों का अन्तरराष्ट्रीय विधि के अनुसार निर्णय करनाहै, निम्नलिखित को व्यवहार में लाएगा -

(क) प्रतिवादी राज्यों द्वारा स्पष्ट रूप सेमान्य नियमों की स्थापना करने वाली अन्तरराष्ट्रीय प्रथाएँ चाहे वे सामान्य हों अथवा विषिष्ट हों ;

(ख) विधि के समान स्वीकृत सामान्य प्रथा के साक्ष्य रूप में अन्तरराष्ट्रीय प्रथा;

(ग) सभ्य राष्ट्रों द्वारा अभिस्वीकृत विधि के सामान्य सिद्धान्त;

(घ) अनुच्छेद 59 के उपबन्धों के अधीन, नियमों के निर्धारण के लिए सहायक, माध्यमके रूप में, विधि के न्यायिक निर्णयऔर विभिन्न राष्ट्रों के सर्वाधिक योग्य अन्तरराष्ट्रीय विधिवेत्ताओं की षिक्षायें।

  • 2. इस व्यवस्था से, पक्षों के द्वारा सहमत होने पर, समान न्याय और हित के आधार पर किसी मामले के सम्बन्ध में निर्णय देने के न्यायालय के अधिकार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

अध्याय तीन[सम्पादन]

क्रियाविधि
अनुच्छेद 39
  • 1. न्यायालय की सरकारी भाषाएं फ्रेंच, और अंग्रेजी होंगी। यदि पक्ष सहमत हों कि मामले के संबंध में कार्यवाही फ्रेंच में की जाए तो उसका निर्णय फ्रेंच में दिया जाएगा। यदि पक्षों को यह स्वीकार्य हो कि मामले पर विचार अंग्रेजी में किया जाए तो उस संबंध मे निर्णय भी अंग्रेजी में दिया जाएगा।
  • 2. मामले पर विचार किस भाषा में किया जाए इससम्बन्ध में यदि सर्वसम्मति न हो तो प्रत्येक पक्ष अपने अभिवचनों में अपनी-अपनी रुचि की भाषा का प्रयोग कर सकता है; न्यायालय उसी समय यह भी निर्धारित कर देगा कि दोनों पाठों में से कौन सा पाठ प्रामाणिक माना जाएगा।
  • 3. न्यायालय किसी भी पक्ष के अनुरोध पर उस पक्ष को, फ्रेंच और अंग्रेजी को छोड़कर, अन्य किसी भी भाषा को प्रयोग में लाने का अधिकार दे सकता है।
अनुच्छेद 40
  • 1. न्यायालय के सामने मामले, यथास्थिति, विषिष्ट सहमति की अधिसूचना द्वारा अथवा रजिस्ट्रार के नाम प्रार्थनापत्र द्वारा लाए जातेहैं। दोनों ही स्थितियों में विवाद के विषय तथा विवादी पक्षों का उल्लेख किया जाएगा।
  • 2. रजिस्ट्रार तुरन्त सभी संबंद्ध पक्षों में लिखित प्रार्थनापत्र परिचालित कर देगा।
  • 3. वह महासचिव के माध्यम से, संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों को तथा सभी अन्दर ऐसे राज्यों को अधिसूचित करेगा जिन्हें न्यायालय में उपस्थित होने का अधिकार प्राप्त है।
अनुच्छेद 41
  • 1. न्यायालय को, परिस्थितियों की आवष्यकतासमझते हुए, ऐसे अन्तिम उपाय सुझाने का अधिकार प्राप्त होगा जो कि किसी भी पक्ष के अपने-अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए अपनाए जाने चाहिए।
  • 2. अन्तिम निर्णय न होने तक, पक्षों तथा सुरक्षा परिषद् को इन प्रस्तावित उपायों की सूचना तुरन्त दी जानी चाहिए।
अनुच्छेद 42
  • 1. पक्षों का प्रतिनिधित्व उनके प्रतिनिधि करेंगे।
  • 2. वे न्यायालय में परामर्शदाता अथवा अधिवक्ताओं की सहायता ले सकते हैं।
  • 3. न्यायालय में पक्षों के प्रतिनिधियों, परामर्शदाताओं और अधिवक्ताओं को ऐसे विषेषाधिकार और निरापदता प्राप्त होगी,जो उनके कत्तर्व्यों में स्वतन्त्र पालन के लिए आवष्यक है।
अनुच्छेद 43
  • 1. क्रियाविधि के दो अंग होंगे- लिखित और मौखिक।
  • 2. लिखित कार्यवाहियों में न्यायालय और पक्षों को किए अन्यावेदनों, प्रत्याभिवेदनों और यदि आवष्यक हो तो उत्तरों के संप्रेषण, तथा इसके साथ ही समर्थन करने वाले सभी कागजात और प्रलेख भी होंगे।
  • 3. ये संप्रेषण, न्यायालय द्वारा निर्धारित व्यवस्था और अवधि में, रजिस्ट्रार के माध्यम से किए जाएंगे।
  • 4. एक पक्ष द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रत्येक प्रलेखकी प्रमाणित प्रति दूसरे पक्ष को भेजी जाएगी।
  • 5. मौखिक कार्यवाहियों में साक्षियों, विषेषज्ञों, प्रतिनिधियों, परामर्शदाताओं और अधिवक्ताओं की न्यायालय द्वारा सुनवाई सम्मिलित होगी।
अनुच्छेद 44
  • 1. प्रतिनिधियों, परामर्शदाताओं और अधिवक्ताओं को छोड़कर अन्य व्यक्तियों को सभी प्रकार के नोटिस भिजवाने के कार्य के लिए न्यायालय सीधा उस राज्य की सरकार को प्रार्थनापत्र भेजेगा जिसके प्रवेष में नोटिस दिया जाना है।
  • 2. घटनाक्रम पर साक्ष्य सामग्री लेने की कार्यवाही की स्थिति में भी यही व्यवस्था लागू होगी।
अनुच्छेद 45

सुनवाई अध्यक्ष के नियंत्रण में अथवा उसके द्वारा अध्यक्षता न कर पाने की स्थिति में उपाध्यक्ष के नियंत्रण में होगी; यदि दोनों में से कोई भी अध्यक्षता न कर पाये तो उपस्थित वरिष्ठ न्यायाधीष अध्यक्षता करेगा।

अनुच्छेद 46

न्यायालय में पेषी सार्वजनिक रूप से होगी जबतक कि न्यायालय इस सम्बन्ध में कोई अन्य निर्णय न दे दे, अथवा जबतक कि पक्ष यह आग्रह न करे कि जनसाधारण को प्रवेष न करने दिया जाये।

अनुच्छेद 47
  • 1. प्रत्येक सुनवाई में कार्यवृत्त तैयार कियाजाएगा और उस पर रजिस्ट्रार तथा अध्यक्ष हस्ताक्षर करेंगे।
  • 2. केवल यही कार्यवृत्त प्रामाणिक माना जाएगा।
अनुच्छेद 48

न्यायालय मामले पर कार्यवाही करने के लिए आदेष तैयार करेगा, प्रत्येक पक्ष अपने तर्क किस रूप में देने अथवा कितने समय में समाप्तकरने होंगे,- इसका निर्णय करेगा और गवाही लेने से सम्बद्ध सभी प्रबन्ध करेगा।

अनुच्छेद - 49

न्यायालय सुनवाई ष्षुरू होने से पहले ही प्रतिनिधियों को किसी भी प्रकार का प्रलेख प्रस्तुत करने तथा किसी भी प्रकार के स्पष्टीकरण देने केलिए कह सकता है। प्रत्येक अस्वीकृति को औपचारिक रूप से नोट कर लिया जाएगा।

अनुच्छेद 50

न्यायालय किसी भी समय किसीभी व्यक्ति, निकाय, ब्यूरो, आयोग अथवा अन्य संगठन को चुनकर उसे जाँच करने अथवा विषेष राय देने का कार्य सौंप सकता है।

अनुच्छेद 51

सुनवाई के दौरान, साक्षियों से सभी प्रकार के संबद्ध प्रश्न, न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 30 में दी गई क्रियाविधि के नियमों में निर्धारित ष्षर्तों केअधीन, पूछे जा सकते हैं।

अनुच्छेद 52

न्यायालय इस प्रयोजन के लिए निर्दिष्ट समय के अन्तर्गत, प्रमाण और साक्ष्यसामग्री प्राप्त कर लेने के बाद, जब तक कि दूसरा पक्ष सम्मति न दे दे, ऐसी और अधिक मौखिक अथवा लिखित साक्ष्यसामग्री स्वीकार करना अस्वीकृत कर सकता है जिसे एक पक्ष प्रस्तुत करना चाहता हो।

अनुच्छेद 53
  • 1. जब कभी एक पक्ष न्यायालय में उपस्थित नहीं होता अथवा वह अपने मामले का प्रतिवाद नहीं कर पाता तो दूसरा पक्ष न्यायालय को अपने दावे के पक्ष में निर्णय देने के लिए कह सकता है।
  • 2. न्यायालय को ऐसा करने से पहले न केवल इससम्बन्ध में ही संतुष्ट होना होगा कि अनुच्छेद 36 और 37 के अनुसार ऐसा करना उसके क्षेत्राधिकार में है बल्कि यह भी दावा भली प्रकार से तथ्य और कानून पर आधारित है।
अनुच्छेद 54
  • 1. जब न्यायालय के नियंत्राधीन प्रतिनिधियों, परामर्शदाताओं और अधिवक्ताओं ने मामले को प्रस्तुत करने का कार्य पूरा कर लिया हो तो अध्यक्ष मामले की सुनवाई बन्द करने की घोषणा कर देगा।
  • 2. न्यायालय निर्णय पर विचार करने के लिए उठ जाएगा।
  • 3. न्यायालय के विचार-विमर्ष गुप्त रूप से होंगे और उन्हें गोपनीय रखा जाएगा।
अनुच्छेद 55
  • 1. सभी प्रश्नों पर निर्णय उपस्थित न्यायाधीषों के बहुमत द्वारा किया जाएगा।
  • 2. जिन मामलों में बराबर के मत हों, उनमें अध्यक्ष अथवा उसके स्थान पर कार्य कर रहे न्यायाधीष का मत निर्णायक मत होगा।
अनुच्छेद 56
  • 1. निर्णय में वे कारण भी दिए जाएंगे जिनपर निर्णय आधारित है।
  • 2. इसमें उन न्यायाधीषों का नाम भी होगा जिन्होंने निर्णय में भाग लिया है।
अनुच्छेद 57

यदि निर्णय समग्र अथवा आंषिक रूप में न्यायाधीषों की सर्वसम्मतिको प्रस्तुत नहीं करता तो किसी भी न्यायाधीष को अलग फैसला देने का हक होगा।

अनुच्छेद 58

निर्णय पर अध्यक्ष या रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर होंगे। यह खुले न्यायालय में पढ़ा जाएगा और प्रतिनिधियों को यथोचित सूचना पहले से ही दे दी जाएगी।

अनुच्छेद 59

न्यायालय के निर्णय की केवल उन पक्षों को तथा उसी विषिष्ट मामलों को छोड़ कोई बाध्यकारी ष्षक्ति नहीं है।

अनुच्छेद 60

निर्णय अन्तिम होता है और इसके लिए कोई अपील नहीं होती। निर्णय के अर्थ अथवा इसकी परिधि के विषय में विवाद खड़ा हो जाने पर न्यायालय किसी भी पक्ष के अनुरोध पर उसका अर्थ निर्धारण करेगा।

अनुच्छेद 61
  • 1. निर्णय के पुनरीक्षण के लिए प्रार्थनापत्र तभी दिया जा सकता है जबकि यह किसी ऐसे तथ्य की खोज पर आधारित हो जो कि निर्णायक तथ्य हो सकता हो तथा निर्णय दिए जाने के समय न्यायालय को तथा इसके साथ ही पुनरीक्षण का दावा करने वाले पक्ष को भी ज्ञात हो किन्तु इसके साथ सदैव ष्षर्त यह है कि इस प्रकार की अज्ञानता का कारण असावधानी न हो।
  • 2. पुनरीक्षण की कार्यवाही न्यायालय के निर्णयद्वारा ष्षुरू की जाएगी जिसमें उसे नए तथ्य की विद्यमानता स्पष्ट रूप से रिकार्ड होगी और यह भी स्वीकार किया जाएगा कि तथ्य इस प्रकार का है कि जिससे एक मामले का पुनरीक्षण आवष्यक हो जाता है; इसमें प्रार्थनापत्र को इसी आधार पर स्वीकार किए जाने की घोषणा भी होती है।
  • 3. न्यायालय यह मांग कर सकता है कि पुनरीक्षण की कार्यवाहियां किये जाने से पहले, निर्णय की ष्षर्तों का पालन किया जाए।
  • 4. पुनरीक्षण के लिए प्रार्थनापत्र नए तथ्य का पता लगाने के बाद छः मास के अन्दर दे दिया जाना चाहिए।
  • 5. निर्णय की तारीख से दस वर्षों की अवधि के बाद पुनरीक्षण के लिए कोई प्रार्थनापत्र नहीं दिया जा सकता।
अनुच्छेद 62
  • 1. यदि कोई राज्य यह समझे किइसका ऐसा अधिक हित है जिस पर मामले के निर्णय से विपरीत प्रभाव पड़ सकता है तो वह न्यायालय को प्रार्थनापत्र भेज सकता है कि उसे हस्तक्षेप करने की अनुमति दी जाए।
  • 2. इस प्रार्थना को स्वीकार अथवा अस्वीकार करना न्यायालय का कार्य है।
अनुच्छेद 63
  • 1. जब कभी किसी ऐसी परिपाटी की व्याख्याविचाराधीन हो जिससे, मामले से संबद्ध राज्य भी संबद्ध हों, तो उस स्थिति में रजिस्ट्रार ऐसे सभी राज्यों को तुरन्त इसकी सूचना भेजेगा।
  • 2. इस प्रकार की सूचना भेजे गए प्रत्येक राज्य को कार्यवाहियों में हस्तक्षेप करने का हक होगा, किन्तु यदि वह अपने इस अधिकार का प्रयोग करता है तो निर्णय द्वारा की गई व्याख्या उस पर बाध्य होगी।
अनुच्छेद 64

जब तक कि न्यायालय में कोई अन्य निर्णय न दिया हो, प्रत्येक पक्ष अपना खर्चा स्वयं वहन करेगा।

अध्याय चार[सम्पादन]

परामर्शीय विचार
अनुच्छेद 65
  • 1. न्यायालय सभी प्रकार के विधिक प्रश्नों पर किसी ऐसे निकाय की प्रार्थना पर परामर्श मत दे सकता जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा अथवा इसके घोषणापत्र के अनुपालन में इस प्रकार का अनुरोध करने के लिए प्राधिकृत हो।
  • 2. जिन प्रश्नों पर न्यायालय का परामषात्मक मत मांगा जाता है, वे एक लिखित प्रार्थनापत्र द्वारा न्यायालय के सामने रखे जाते हैं जिसमें राय मांगे गए प्रश्न का यथार्थ विवरण होता है और इसके साथ वेसभी प्रलेख भी होते हैं जिनसे उस प्रश्न पर कुछ प्रकाष पड़ सकता हो।
अनुच्छेद 66
  • 1. रजिस्ट्रार परामर्शात्मक मत की प्रार्थना की सूचना तुरन्त उन सभी राज्यों को देगा जिन्हें न्यायालय में उपस्थित होने का अधिकार प्राप्त है।
  • 2. रजिस्ट्रार, विषेष और स्पष्ट सन्देश द्वारा न्यायालय में आने के अधिकार प्राप्त किसी भी राज्य को अथवा किसी भी ऐसे अन्तरराष्ट्रीय संगठन को जो कि न्यायालय के खुला होने अथवा न्यायालय के खुला न होने की स्थित में अध्यक्ष के विचार में प्रश्न के सम्बन्ध में जानकारी दे सकता हो, यह सूचना भेजेगा कि न्यायालय, अध्यक्ष द्वारा निर्धारित समयावधि में प्रश्न से संबन्ध लिखित विवरण प्राप्त करेगा अथवा इस प्रयोजन के लिए की जाने वाली सार्वजनिक बैठक में मौखिक विवरण सुनेगा।
  • 3. यदि न्यायाल में आने के अधिकार प्राप्त किसीराज्य को, इस अनुबन्ध के पैरा 2 में उल्लिखित विषिष्ट संसूचना न मिले तो वहलिखित विवरण भेजने अथवा मौखिक कथन की इच्छा प्रकट कर सकता है। इस संबन्ध में निर्णय न्यायालय का कार्य होगा।
  • 4. लिखित अथवा मौखिक अथवा दोनों ही प्रकार के विवरण प्रस्तुत करने वाले राज्यों और संगठनों द्वारा दिये गये विवरणों पर टिप्पणी करने की अनुमति होगी
अनुच्छेद 67

न्यायालय अपना परामर्शात्मक मत खुले रूप में देगा, इसकी सूचना महासचिव और सुयक्त राष्ट्र के सदस्यों के प्रतिनिधियों तथा सीधे सम्बद्ध अन्य राज्यों और अन्तरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों को पहले से ही दे दी गई होती है।

अनुच्छेद 68

अपने परामर्शीय कार्यों के निष्पादन में न्यायालय का मार्गदर्शन वर्तमान संविधि के उपबन्धों द्वारा जो विवादास्पद मामलों में उसी सीमा तक लागू होंगे जिस सीमा तक न्यायालय ने उनका लागू होना स्वीकार किया हो।

अध्याय पांच[सम्पादन]

संशोधन
अनुच्छेद 69

वर्तमान संविधि में संशोधन उसी क्रियाविधि से किये जायेंगे जोकि संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र में, घोषणापत्र के संशोधन के लिए दी गई है। किन्तु इसके साथ वे उपबन्ध भी है जिन्हें ऐसे राज्यों के शामिल होने से सम्बद्ध सुरक्षा परिषद् की सिफारिश पर महासभा अपना सकती है जिन राज्यों का वर्तमान संविधि में हाथ तो हो किन्तु जो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य न हों।

अनुच्छेद 70

न्यायालय को वर्तमान संविधि में आवश्यक समझे जाने वाले संशोधन प्रस्तावित करने का अधिकार होगा। ये संशोधन, अनुच्छेद 69 के उपबन्धों के अनुसार, महासचिव को लिखित संदेष में विचारार्थ भेजे जाएंगे।

इन्हें भी देखें[सम्पादन]

स्रोत[सम्पादन]