आज प्रेम चंद्र होते तो कहानिया कुछ और होती
कथा विमर्श:‘काश! आज प्रेमचन्द होते तो कहानिया कुछ और होती ’
रामनाथ शिवेंद्र


प्रेमचन्द जी की क्रान्किारी प्रतिभा की स्मृति में लिखा हुआ यह आलेख है। मेरे मन में कई वर्षों से यह सवाल कुलबुलाता रहा है कि अगर आज प्रेमचन्द जी जीवित होते तो कथासाहित्य की दुनिया में कैसी कहानी लिखते, कैसा उपन्यास लिखते? वे बाजार तथा उपभोक्ता संस्कृति द्वारा फैलाई जा रही पूंजीमूल्यवोध वाली निष्ठुर चेतनाओं से कैसे टकराते। सबसे आवश्यक बात कि वे समय को विश्लेषित करते हुए लोकचेतना के मूल्यों को किस तरह से स्थापित करते। उनका होरी जो अब पूरी दुनिया का होरी है, उनका माधव जो आज पूरी दुनिया का माधव है, आज वह किस भूमिका में होता, क्या वह परधान बन गया होता, माधव ने दारू पीना छोड़ दिया होता? कई तरह के सवाल हैं जो हमें सोचने के लिए विवश करते हैं जो प्रेमचन्द जी की कथा चेतना से हमें विरासत में मिले हैं। वैसे तो यह भी सच है कि पुरखों की सुनता कौन है? उनकी आखिरी विदाई के लिए तो गोदान ही काफी है। बाजार में तो कहीं न कहीं गाय तो मिल ही जायेगी और हम पारंपरिकतौर पर उनकी स्मृति में गोदान कर देंगे। पुरखों को इससे अधिक और चाहिए भी क्या? तो प्रेमचन्द जी से आगे की जो कथा है वह तो पूंजीमूल्यवोध वाली चेतना से टकराने की कथा है उसमें गोता लगाने की नहीं। चाहे बाजार की बाजारू गंध हो या मुलायम बिस्तरों पर फुदकते रहने की सुविधावादी इच्छा हो, हमें टकराना दोनों से है। आइए समय को परख कर आगे का रास्ता तय करें। आज के जटिल और खुरदुरे समय में ज्ञान के सभी क्षेत्रों में बाजार की जो स्थिति है उससे साफ जाहिर हो रहा है कि वह सामाजिक समरसता ही नहीं राष्ट्र के सारे मानवीय आधारों एवं संप्रभुता को भहरा कर ही रहेगा। यह जो बाजार नाम की चीज है, आदमी और आदमी के बीच बढ़ती खाईं को पाटने को कौन कहे उसे और चौड़ा कर रहा है। इतना ही नहीं ज्ञान और उससे उपजी चेतना को भी विरासतों, वसीयतों व उŸाराधिकारों के जाल में फसा हुआ किसी उत्पाद का नमूना बना रहा है। बना भी चुका है। किसे नहीं पता कि शिक्षा को ज्ञान का तथा ज्ञानात्मक सभी चेतनाओं का आधार माना जाता है। शिक्षा है तो ज्ञान ह,ै और ज्ञान है तो चेतना और विवेक भी है। शिक्षित जनता ही किसी भी देश को चमकता सितारा बना सकती है। ज्ञान है तो विज्ञान भी है, और विज्ञान है तो तमाम तरह के वैज्ञानिक उत्पाद हैं। जिसे ज्ञान का वैज्ञानिक उत्पाद भी कहा जा सकता है। ज्ञान के वैज्ञानिक उत्पादों और ज्ञान की चेतना से उपजे नैतिक उत्पादों में कोई समानता नहीं। क्योंकि विज्ञान ज्ञान का एक एक ऐसा क्षेत्र है जिसके लिए नैतिकता का कोई प्रयोजन नहीं। नैतिकता का विज्ञान के संदर्भों में कोई मूल्य नहीं। ऐसी सूरत // 12 // में अगर किसी समाज का बहुसंख्यक हिस्सा अशिक्षित है या दूसरे शब्दों में उसे अशिक्षित बनने के लिए विवश रखा जा रहा है, तो ऐसे समाज या राष्ट्र से आशा नहीं की जा सकती कि वह अपने भूगोल या देश की समग्र ज्ञानात्मक चेतना का विकास करते हुए संपूर्ण मानव संसाधन का गुणवŸाापूर्ण उपयोग कर सकेगा तथा अपनी संप्रभुता को चोटिल होने से बचा पाएगा। समग्र मानव संसाधनों की क्षमताओं का उपयोग न किया जाना यह अक्षम्य है तथा जघन्य अपराध तो है ही। वैसे यह सच है कि जो अशिक्षित हैं उन्हें अनैतिक नहीं कहा जा सकता पर जो शिक्षित हैं उनकी नैतिकता सवालों के घेरे में है फिर भी शिक्षा तो सभी के लिए अनिवार्य होनी ही चाहिए। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जो राष्ट्र अपने मानव संसाधनों को बोझ या भार समझता है उसे नष्ट होने में देर नही लगती, ऐसा समाज अपने बोझ से ही दब कर समाप्त हो जाता है। किसी भी विकसित राष्ट्र का संदर्भ ले लीजिए वहां अपने मानव संसाधनों को बोझ नहीं माना जाता बल्कि उसे राष्ट्र के विकास के लिए अनिवार्य माना जाता है। वे जानते हैं कि प्रकृति के संसाधनों का उपयोग जितना जरूरी है उससे ज्यादा जरूरी है मानव संसाधनों का उपयोग। मानव संसाधनों के उपयोगों के सवाालों पर जैसी उपेक्षात्मक प्रवृŸिा हमारे देश में है वैसी कहीं और नहीं। यहां तो मानव संसाधनों को बोझ माना व जाना जाता है। देहाती कहावत है कि एक मुंह होता है तो उसे खिलाने के लिए दो हाथ होते हैं। जाहिर है खाली हाथ क्या कर सकते हैं? उन्हें काम चाहिए और कहीं भी काम नहीं है। काम तो तब था जब एक हल की जोत वाली संस्कृति थी, प्रकृति किसी मालिकाने में नहीं थी न नदियां न पहाड़ न जंगल और न नाले, सारा कुछ सामाजिक नियंत्रण में हुआ करता था पर अब तो उन पर राजनीतिक तथा कानूनी नियंत्रण है। उस पर अप्रत्यक्ष रूप से राजसŸाा और प्रत्यक्ष रूप से समाज के ताकतवर यानि कि जो कानूनों के जानकार हैं, भाषा के जानकार हैं, जिनके पास संपŸिा है, शिक्षा है, वे काबिज हैं। और यह वर्ग ही राजसŸाा का सबसे अहम् हिस्सा होता है। और वे जो अशिक्षित हैं, जिनके पास किसी किस्म की ताकत नहीं होती, जिन्हें जानबूझ कर पढ़ने नहीं दिया जा रहा है, उनके पास क्या है? न घर, न मकान, न उनके हाथों को कोई काम। आखिर ऐसा क्यों है कि आज भी हमारे देश का बहुसंख्यक हिस्सा अशिक्षित है। देश के कुछ लोगों का ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल कर लेने से, उन्हें विकास के विभिन्न क्षेत्रों से जोड़ लेने से देश की तस्वीर नहीं बदल सकती। तस्वीर तो तब बदलेगी जब सारे मानव संसाधान को शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्रों में समान रूप से विकसित होने के अवसर दिए जाते। पर ऐसा नहीं हो रहा। हमारा समाज तो वैसे भी परतीय व्यवस्था वाला समाज है, हमारे समाज के कई खाने हैं और हर खाने अपनी विसंगतियोें के कारण एक दूसरे से भिन्न भी। हम यह भी जानते हैं कि हमारा समाज स्वामित्व की // 13 // किसिम किसिम की नस्लों में जकड़ा हुआ है और उसी हाल में है जैसा आजादी के पहले था। किसी भी मुद्दे को देख लें, चाहे भौमिक संपदा का सवाल हो या प्रकृति के दूसरे संसाधनों के उपयोग या अधिकार का। सभी संसाधनों पर ताकतवर लोग कानून के प्राविधानों के तहत काबिज हैं और वह जो काननू है जो स्वामी बनाता है, वह मानव निर्मित है, उसे कथित शिक्षित प्रशिक्षित स्वामी वर्ग के सŸााप्रभुओं ने ही सृजित किया है। किसे नहीं पता कि एक भूमिहीन आदमी को घर बनाने के लिए जमीन का लघु से लघु टुकड़ा भी इस पवित्र धरती पर खाली नहीं, जहां वह अपनी झोपड़ी लगा सके और घूप तथा वारिश से अपना बचाव कर सके। प्रकृति के संसाधनों तथा भौमिक संपदा के अलावा आज के समय में जो सबसे हसीन वस्तु है वह है ज्ञान और उसकी चेतना। ज्ञान और चेतना को वस्तु मान लेने में कोई एतराज नहीं होना चाहिए। एतराज इसलिए नहीं कि उसे हासिल करने के लिए हमें जिन जिन उपक्रमों को करना पड़ता है, उसने ज्ञान को एक उत्पाद बना दिया है आप चाहो तो उसे खरीद लो इस लिए वह एक वस्तु पहले है, बाद में और कुछ। शिक्षा प्राप्त करने की जो स्थिति है यह बाजार के हवाले है यानि जिसके पास धन, दौलत है वही शिक्षा हासिल कर सकता है, वही ज्ञान के क्षेत्रों का नागरिक बन सकता है दूसरे नहीं। यह सच है कि न्यायायिक आदेशों के तहत प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाया गया है और दिखावे की कोशिश की जा रही है कि सभी पढ़ें और बढ़ें। अगर मान लिया जाये कि प्राथमिक शिछा विकसित हो गई (वैसे ऐसा नहीं होने वाला) तो क्या प्राथमिक शिक्षा को विकसित कर लेने से ही सरकार का लोककल्याण और जनहित का कार्यभार समाप्त हो जाता है और विकसित देश होने के सपनों को पूरा किया जा सकता है। मेरा मानना है कि इससे कुछ होने जाने वाला नहीं। केवल प्राथमिक शिक्षा को केन्द्र में रख कर देश के विकसित होने का सपना देखना या दिखाना आसमान पर चमकते तारों को पकड़ना है, और वही हो रहा है। दरअसल यह सवाल बहुत पुराना है कि यह जो ज्ञान नाम की चीज है वह है क्या? क्या ज्ञान को सिर्फ कुछ हरफों में बांध दिया जाना चाहिए यानि क,ख,ग, पढ़ लेने से आदमी शिक्षित हो गया या दस्तखत बना लेने से। उसने शिक्षा हासिल कर लिया। शिक्षा का जो मानक सरकारों ने तय किया है प्राथमिक शिक्षा वाला उस पर सवाल क्यों नहीं उठाए जा रहे कि प्राथमिक शिक्षा के बाद क्या? सवाल उठाए भी नहीं जाएंगे क्योंकि लक्ष्य तो समाज विरोधी है। लक्ष्य है, समाज को कई कई खानों में बांटे रखने का और मानव संसाधनों का दुरुपयोग करने का। ऐसा करने के लिए शिक्षा को बाजार के हवाले कर दिया गया है और आज की शिक्षा बिना किसी बाधा के बाजार के हवाले है। बाजार को क्या पड़ी कि वह देखे समाज किधर जा रहा? उसे तो अपना उत्पाद बेचना है, और वह बेच रहा है। आज के समय में किसी भी तरह की शिक्षा हो उसे बिना खरीदे हासिल नहीं की जा सकती। खरीद कर // 14 // हासिल की जाने वाली शिक्षा का अर्थ ही है कि जिसके पास रुपया होगा वह पढ़ेगा और जिसके पास रुपया नहीं होगा वह अपने जीवन को क,ख,ग, की सीमाओं में बाध लेगा। तो यह है प्राथमिक शिक्षा का क,ख,ग, की सीमाओं में बाधने का प्रयास और उच्च शिक्षा हासिल करने के तरीकों को बहुमत के लिए हतोत्साहित करने का षडयंत्र। जिसका साफ अर्थ है शिक्षा को एक वस्तु के रूप में रूपांतरित कर उसे सरे आम बेचना। यह है शिक्षा के बाजारीकरण का उŸारआधुनिक रूप, शिक्षा का ही नहीं यह सरकार की कथित लोक कल्याणकारी प्रविधियों का भी उŸारआधुनिक रूप है। यानि सरकार ने मान लिया है कि उसकी कार्ययोजना में सभी को सभी स्तर की शिक्षा प्रदान करने का कोई लक्ष्य ही नहीं। यह तो शिक्षा हासिल करने वाले शिक्षार्थी की जिम्मेवारी है। जो आर्थिक रूप से समर्थ हो वह पढ़े, जो समर्थ न हो वह पढे़ हुओं को देखे, उनकी अधीनता में रहे। लगता है शिक्षा को बहुमत के लिए अनुपलब्ध बना कर उन्हें गुलाम बनाने का उŸारआधुनिक तरीका खोज लिया गया है। अपने लोकतांत्रिक देश में हमें सपना देखने की आजादी है आइए हम सपना देखें और उसी में उŸार भी देखें कि प्राथमिक शिक्षा हासिल कर लेने वाला छात्र आगे कहां पढ़ेगा? क्या वह उच्च शिक्षा वाले विश्वविद्यालयों के दरवाजों पर खड़ा भी हो सकता है? नहीं, वह वहां तक जाने के बारे में सोच भी नहीं सकता, वहां खड़ा होना तो दूर की बात है। फिर ऐसी शिक्षा तथा शिक्षा में समानता का क्या मतलब? अगर इस व्यवस्था को पलट कर देखें तो हमें एक दूसरे तरह का सपना दिखेगा सिर्फ उसमें समान शिक्षा और समान अवसर को जोड़ देना होगा। अगर समान शिक्षा तथा सभी के लिए शिक्षा यह केवल वोट लेने का नारा भर नहीं है, और हमारी सरकारों ने शिक्षा को केवल प्राथमिक शिक्षा तक ही अनिवार्य नहीं, सभी शिक्षा प्रणालियों को अनिवार्य बना दिया है फिर क्या होगा क्या तब भी हमारे देश की जो आज तस्वीर है वही रहेगी या बदल जाएगी। क्या सभी को सभी स्तरों की अनिवार्य शिक्षा की नीति से लोकतंत्र की तस्वीर पर कालिख पुत जाएगी या लोकतंत्र और मजबूत होगा। सोचना, गुनना यही है। हमें सोचना होगा कि अगर सभी के लिए पानी, खाना, स्वास्थ्य जरूरी है तो शिक्षा उससे भी जरूरी है और शिक्षा ही वह क्षेत्र है जिसे पहले के सामंतवादी समयों की तरह आज भी सरकारों की कार्ययोजनाओं से बाहर कर दिया गया है। अगर हम अपने अतीत में उतरें तो मालूम होगा कि शिक्षा को सभी के लिए खुला रखा ही नहीं गया था। लोगों को किताबें तक पढ़ने नहीं दिया जाता था। शिक्षा केवल कुलीनों तथा संभ्रांतों के लिए थी, वही आज भी हो रहा है। पहले ताकत के बल पर शिक्षा के मूल अधिकारों को प्रतिबधित किया जाता था और आज के समय में उसे बाजार के द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया है। बाजार एक ऐसी चीज है जो दिखाई नहीं देता केवल उसका // 15 // परिणाम दिखाई देता है। और परिणाम दिखाई दे रहा है कि करोड़ों लोग जो पढ़, लिख कर देश को नई दिशा प्रदान कर सकते थे, उनकी कार्यक्षमताओं का देश हित में उपयोग किया जा सकता था। उन्हें बाजार के करतबों द्वारा हतोत्साहित कर दिया गया है। इसे चाहे तो हम सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा के क्रियान्वयन से भी समझ सकते हैं। ‘मनरेगा में सौ दिन का काम मिलेगा’ इस लक्ष्य को प्रचारित प्रसारित करने के लिए सरकार द्वारा लाखों रुपया खर्च किया जा रहा है, ऐसा क्यों किया जा रहा है? अगर मनरेगा में काम करने वाली जनता शिक्षित (शिक्षा का मतलब केवल प्राथमिक शिक्षा नहीं) होती तो क्या सरकार को अपनी लोकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए प्रचार प्रसार की आवश्यकता पड़ती। मूलाधिकार की एक उपशाखा मानवाधिकार, नारी सशक्तीकरण आदि के बारे में जागृति अभियान चलाना पड़ता! और करोड़ों खर्च करना पड़ता। किसी न किसी दिन अपनी लोकतांत्रिक सरकार को जबाब देना ही होगा कि वह हर तरह तथा हर स्तर की शिक्षा को अनिवार्य व मुफ्त क्यों नहीं बनाना चाहती। योग्य प्रशिक्षित सैनिक जैसे सीमाओं की सुरक्षा करते हैं वैसे ही योग्य, प्रशिक्षित जनता भी लोकतंत्र की सुरक्षा करेगी। कम से कम ऐसा विश्वास तो सरकारों को होना ही चाहिए। लोकतंत्र की सुरक्षा को किसी भी तरह से भूगोल की सुरक्षा से कम अनिवार्य नहीं माना जाना चाहिए, लोकतंत्र बचेगा तभी भूगोल बचेगा, नहीं तो कोई ईस्ट इन्डिया कंपनी आएगी और भूगोल को निगल जाएगी। मुगलिया समय की जनता तमाशा देखती रह गई थी और राजा/नवाब आपस में लड़ते रहे थे। क्योंकि जनता को पता ही नहीं था कि क्या होती है स्वाधीनता और क्या होती है गुलामी, ऐसी जनता के लिए क्या फर्क था, चाहे जो हकूमत करे, राजा, नबाब या अंग्रेज पर जब वही जनता जागरूक हो गई फिर क्या हुआ? इसे सभी जानते हैं कि अंग्रेजों को भागना पड़ा। तो यह है जनता की जगरूकता का मामला। और जागरूकता आती है शिक्षा से या आन्दोलनों से। आन्दोलन तो आज हो नहीं रहे और शिक्षा कुछ विशेष लोगों के लिए ही संभव है। लोकंतंत्र से जनता का गहरा जुड़ाव कायम करना है, उन्हें जागरूक एवं जिम्मेवार बनाना है तो जनता को क,ख,ग, की सीमाओं से बाहर ले जा कर अधिकतम और गुणवŸाापूर्ण शिक्षा देने दिलाने की अनिवार्यता को संवैधानिक बनाना होगा तथा शिक्षा के सारे माध्यमों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित कर, उसे बाजार प्रबंधन से बाहर निकाल कर, सभी स्तरों की शिक्षा को अनिवार्य तथा मुफ्त बनाना होगा। आज हमारे बीच प्रेमचंद होते तो वे इस पर कुछ विशेष लिखते गाय के स्थान पर शिक्षा को रखते। गोदान का होरी अपने जीवन काल में एक गाय भी न खरीद सका था और मर गया। उसके मर जाने के बाद गोदान करने की बात घरी के घरी रह जाती है। उस हल वाली जोत के दौर में होरी की गाय, उत्पादकता का प्रतीक है, गाय रहेगी तो बछड़े जनेगी, बछड़े बैल बनेंगे // 16 // जिससे हल चलेगा, हल चलेगा तो खेती होगी, अनाज पैदा होगा फिर पेट भरेगा और आज तो एक भूमिहीन, गरीब, साधनहीन आदमी गाय पालने की भी कामना नहीं कर सकता, पालेगा तो उसे कहां रखेगा जब खुद के रहने के लिए ही घर न हो। गरीब अपने लड़के को पढाना चाहता है, पर कहां पढ़ाये, कैसे पढ़ाये? मैं ऐसे तमाम लड़कों को जानता हूं जो बीटेक या पोलीटेक्नीक की पढ़ाई गरीबी के कारण नहीं कर सके और वे या तो मेठ का काम कर रहे हैं या जंगल पकड़ लिए हैं, उनका कहीं अता पता नहीं है। अगर उन्हें मुफ्त शिक्षा मिली होती तो वे भी बीटेक होते, डाक्टर होते और अपनी सेवाएं देश को दे रहे होते। शिक्षा को सरकारी क्षेत्र में न रखने, तथा उसे मुफ्त न बनाने के कारण उन सामंती संस्कारों में हैं जो अतीत से आज तक बिना किसी परिवर्तन के चले आ रहे हैं। पहले शिक्षा का बाजारीकरण नहीं था केवल इतना ही अंतर आया है। गुरुकुलों की स्थापनाओं का कार्यभार रियासतों का हुआ करता था और वही कार्यभार यानि विद्यालयों व विश्वविद्यालयों को चलाने तथा स्थापित करने का काम आज के समय में चुनी हुई सरकारों का है। अब उसे बाजार के हवाले किया जा रहा है और कर भी दिया गया है। यह जो बाजार है, या इसका अस्तित्व अनायास नहीं है, इसे सरकारों से जुड़े सŸााप्रभुओं ने गढ़ा है जो दिखने में हसीन और चूमने लायक दिखता है। आज के समय में बाजार सरकार के समानांतर और सरकार द्वारा सृजित एक व्यवस्थित संरचना है जिसका नियंत्रण लोकल्याण तथा सेवाओं के सभी क्षेत्रों में दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। शिक्षा के सभी क्षेत्रों में हम उसके नियंत्रणों तथा अधिकारों को तो देख ही रहे है। डाक सेवाआ में, बीमा के क्षेत्र में, यातायात,यात्री सेवाओं, चिकित्सा का क्षेत्र हो, सभी क्षेत्रों में यह जो बाजार नाम की चीज है सरकारी सेवाओं से होड़ ले रही है और साबित कर रही है कि यह जो सरकार है अपने ही कारणों से भहरा रही है। आखिर इसे क्या कहेंगे? बाजार का राष्ट्र की संप्रभुता में दखल ही तो बोलेंगे। सरकारों को निरीह या असहाय बनाने के बाजारू प्रयासों के दूरगामी परिणाम बहुत ही खतरनाक हो सकते हैं। लोक को बाजार से जोड़ कर राष्ट्र को कमजोर बनाने की हर कोशिश लोकतंत्र के लिए घातक है। सरकार की संप्रभुता पर बाजार आज के समय में भिन्न भिन्न रूपों के द्वारा हमला कर रहा है जिसकी हमें निन्दा करनी चाहिए और उसका प्रतिरोध भी, और हर वह प्रयास करना चाहिए जिससे बाजार की बढ़ती अराजकता को रोका जा सके। हमें दुख है कि प्रेमचंद नहीं हैं, काश! आज वे होते तो वे समझते और कुछ लिखते कि आज गाय नहीं शिक्षा चाहिए वह भी समान तथा सभी के लिए मुफ्त। आज का होरी गाय के लिए नहीं मर रहा, मर रहा है शिक्षा के लिए कि वह अपने लड़के को अक्षरज्ञान से ऊपर नहीं पढ़ा पा रहा है।