आर्यसमाज : हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्णिम कलश

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आर्यसमाज : हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्णिम कलश

डॉ किरण ग्रोवर

सारांश : -आर्यसमाज हिन्दी के सम्वर्द्धन के मैदान में अग्रगामी बना। आर्य समाज की हिन्दी पत्रकारिता ने देश को राष्ट्रीय संस्कृति, धर्म चिन्तन,स्वदेशी का पाठ पढ़ाया। आर्यसमाज के माध्यम से ज्ञानमूलक व रसात्मक दोनों प्रकार से साहित्य की अभूतपूर्व वृद्धि हुई। आधुनिक काल की राष्ट्रीयता व सामाजिकता का मेरुदण्ड आर्य समाज के संस्थापक द्वारा चलाया गया आन्दोलन है। आर्य समाज की हिन्दी पत्रकारिता ने हिन्दी के प्रचार प्रसार में बहुमूल्य योगदान दिया है। हिन्दी भाषा का प्रथम पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ 30 मई 1826 को पं जुगल किशोर के सम्पादकत्व में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ। ऋषि दयानन्द पत्रकारिता द्वारा धर्म प्रचार व्यापक रूप से करना चाहते थे,वे स्वयं कोई पत्र नहीं निकाल सके परन्तु आर्य समाजिकों को पत्रों को निकालने के लिए प्रोत्साहित किया। आर्यसमाज के प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रभावों द्वारा हिन्दी को सुधारवादी जन आन्दोलन की भूमिका प्राप्त हुई। हिन्दी भाषा के प्रचार और प्रसार के लिए आर्यसमाज ने जो कार्य किया,वह तो इतिहास का एक अमर पृष्ठ बन चुका है। आर्य समाज की विभिन्न संस्थाओं द्वारा प्रसारित होने वाली पत्र-पत्रिकाओं में ‘पवमान’, ‘आत्म शुद्धि पथ’, ‘वैदिक गर्जना’, ‘आर्य संकल्प’,‘वैदिक रवि’,,‘विश्वज्योति’, ‘सत्यार्थ सौरभ’, ‘दयानन्द संदेश’, ‘महर्षि दयानन्द स्मृति प्रकाश’,‘तपोभूमि’,‘नूतन निष्काम पत्रिका’, ‘आर्य प्रेरणा’ ,‘आर्य संसार’, ‘सुधारक’, ‘टंकारा समाचार’,‘अग्निदूत’, ‘आर्य सेवक’, ‘भारतोदय’, ‘आर्य मुसाफिर’, ‘आर्य सन्देश’, ‘आर्य मर्यादा’,‘आर्य जगत’,‘आर्य मित्र’,‘आर्य प्रतिनिधि’, ‘आर्य मार्तण्ड’, ‘आर्य जीवन’,‘परोपकारी’, ‘सवंर्द्धिनी’आदि मासिक,पाक्षिक व वार्षिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं जिससे हिन्दी पत्रकारिता को नव्य आलोक मिल रहा है। आर्य समाज के माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता की जो सेवा हुई है,वह इतनी महत्ववूर्ण है कि उसके उल्लेख के बिना साहित्य और पत्रकारिता का इतिहास अधूरा रह जाता है।आर्य समाज ऐसा भट्ठा है जिसने पिछले सौ वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता के भवन को अगणित चट्टानें, ईटें, स्वर्णिम कलश कंगूरे प्रदान किये हैं। आर्य समाज द्वारा अपनाये गये उपादान हिन्दी भाषा व साहित्य को नवीनतम दिशा प्रदान करते रहेंगे।

बीज शब्द - स्वर्णिम कलश, अमर पृष्ठ, ज्ञानमूलक, आर्य भाषा, पांचवा वेद, कर्मठता।

मूल प्रतिपादन:-भारत की राष्ट्रीय अस्मिता को जगाने में आर्य समाज अग्रणी रहा। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने नया दर्शन प्रस्तुत नहीं किया अपितु ब्रह्मा से लेकर जैमिनी ऋषि पर्यन्त आर्ष विचारधारा को समाज के समक्ष प्रतिपादित किया। स्वामी दयानन्द जी ने स्त्रियों को वेदाधिकार से गौरवान्वित किया व आर्य समाज द्वारा हिन्दी भाषा को व्यापकता प्रदान की। महर्षि गुजराती थे,वे संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित भी थे। महर्षि दयानन्द जी ने 1873 में बाबू केशव चन्द्र जी के परामर्श से जन भाषा हिन्दी को अपनाया। यदि स्वामी जी भारत में सामान्य जनता द्वारा बोली जाने वाली व समझी जाने वाली लोक भाषा हिन्दी में अपना भाषण दें तो लोग उनके उपदेशों से अधिक लाभ उठा सकेंगे। जिस समय हिन्दी को उर्दू के समक्ष सिर झुकाने की बात कही जा रही थी उस समय दयानन्द जी ने हिन्दी भाषा को ‘आर्य भाषा’ के गरिमामयी शब्द से अलंकृत किया। विष्णु प्रभाकर जी ने लिखा है कि ‘मथुरा के प्रज्ञाचक्षु दण्डी विरजानन्द के बाद बंगाल के महापुरुष ने ही स्वामी दयानन्द की शक्ति और क्षमता का सही आकलन किया,वह क्षण निश्चय ही हिन्दी भाषा के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया।1

आधुनिक काल की राष्ट्रीयता व सामाजिकता का मेरुदण्ड आर्य समाज के संस्थापक द्वारा चलाया गया आन्दोलन है। आर्य समाज की हिन्दी पत्रकारिता ने हिन्दी के प्रचार प्रसार में बहुमूल्य योगदान दिया है। आर्यसमाज और हिन्दी के विषय में महाकवि निराला जी ने लिखा है कि ‘आज जो जागरण भारत में दिखाई पड़ता है,उसका पूर्ण श्रेय आर्यसमाज को है।-- राष्ट्र भाषा हिन्दी के भी स्वामी जी एक प्रवर्त्तक हैं। आर्यसमाज के प्रचार की भाषा तो हिन्दी ही रही है।2 आर्य समाज ने हिन्दी पत्रकारिता के उन्नयन में ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह किया।

पत्रकार और पत्रकारिता का अनन्य सम्बन्ध है जो रचनात्मक कार्य की प्रेरणा देता है। सूक्ष्म मन का स्वामी पत्रकार समाज की चेतना का सजग प्रहरी होता है। इन्द्रवाचस्पति जी ने पत्रकारिता को ‘वर्तमान युग का प्रभावशाली आविष्कार’ कहा है।3 आस्कर वाइल्ड ने पत्रकारिता के सम्बन्ध में लिखा है कि आज तो प्रैस ही एकमात्र रियासत है।4 सत्यदेव विद्यालंकार जी ने इसे पांचवा वेद माना है।5 अकबर इलाहाबादी ने लिखा है -

जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।

भारत में पत्र- पत्रिकाओं का आविर्भाव यूरोपीय जातियों के आगमन से हुआ। अंग्रेज़ी शासन की नींव सुस्थिर हो जाने के पश्चात् भारत में प्रथम समाचार पत्र ‘बंगाल गजट’ अथवा ‘कलक त्ता जर्नल एडवर्टाइज़र’ था, जिसका प्रकाशन जेम्स आगस्ट हिक्की द्वारा 1780 में कलक त्ता से हुआ। ईसाई मिशनरी ने बंगला भाषा में ‘दिग्दर्शन’ मासिक पत्र निकाला। जब ईसाई प्रचारकों ने ‘समाचार दर्पण’पत्र के द्वारा हिन्दू धर्म पर हमले करने प्रारम्भ किये,तब राजाराम मोहन राय जी ने ‘बंगदूत’ पत्र निकाला जिसमें बंगला,हिन्दी और फारसी भाषा के लेख छपते थे। भारतवर्ष में हिन्दी पत्रकारिता का आरम्भ उन्नीसवीं शती की तृतीय दशाब्दी से हुआ। हिन्दी के पत्र संचालन की प्रेरणा अंग्रेजी और बंगला भाषाओं से मिली। हिन्दी भाषा का प्रथम पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ 30 मई 1826 को पं जुगल किशोर के सम्पादकत्व में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ। हिन्दी भाषी प्रदेश का प्रथम साप्ताहिक पत्र ‘बनारस अखबार’ 1845 में प्रकाशित हुआ। इस पत्र की भाषा उर्दूमयी थीं।1850 में ‘सुधाकर’ नामक पत्र निकला जिसे अम्बिका प्रसाद वाजपेयी ने भाषा की शुद्धता की दृष्टि से हिन्दी का प्रथम पत्र स्वीकारा है।6 हिन्दी भाषा का सर्वप्रथम दैनिक पत्र ‘समाचार सुधावर्षण’ 1854 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ जोकि द्वैभाषिक था। इसके बाद हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में 1857 के क्रान्ति युद्ध के बाद कुछ समय के लिए गतिरोध उत्पन्न हो गया क्योंकि समाचार पत्रों पर प्रतिबन्ध लगा दिये गये।

जिस समय मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना हुई और उसके नियम निर्धारित किये गये ,उस समय साप्ताहिक पत्र ‘आर्य प्रकाश’ के प्रकाशित किये जाने का संकल्प लिया गया। मुम्बई में निर्धारित नियम 5,12,25 में ‘आर्य प्रकाश’ पत्रिका का उल्लेख इस प्रकार किया गया-‘प्रधान समाज --और एक ‘आर्य प्रकाश’ पत्र यथानुकूल आठ-आठ दिन में निकलेगा। नियम संख्या 12--पत्र की व्यवस्था के लिए आर्य सभासदों द्वारा धन दिये जाने तथा नियम संख्या 25 में ‘आर्य प्रकाश’ पत्र की दशा एवम् उन्नति के लिए आर्य सभासदों को प्रवृत्त किया गया।7

ऋषि दयानन्द पत्रकारिता द्वारा धर्म प्रचार व्यापक रूप से करना चाहते थे,वे स्वयं कोई पत्र नहीं निकाल सके परन्तु आर्य समाजिकों को पत्रों को निकालने के लिए प्रोत्साहित किया। स्वामी जी के समकालीन नेताओं, सुधारकों व साहित्यकारों ने उसके विचारों से प्रभावित होकर हिन्दी प्रसार को अपने जीवन का ध्येय बनाया। गांधी जी ने स्वामी जी के विचारों से प्रबल प्रेरणा ग्रहण की । भारतेन्दु जी ने ‘कवि वचन सुधा’ पत्रिका के सम्पादक मण्डल में स्वामी जी को समाविष्ट किया। हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में दयानन्द जी के महत्त्व का प्रतिदान करते हुए ज्ञानवती दरबार ने लिखा है कि ‘स्वामी दयानन्द के खण्डन मण्डन के उत्साह के बिना क्या सहसा देश भर में हिन्दी पत्र पत्रिकाओं का उदय होना संभव था।8

स्वामी दयानन्द जी की आवश्यक सूचनाएं,प्रतिपादित वैदिक धर्म के प्रति मिथ्या धारणाओं का निराकरण,विज्ञापन आदि तत्कालीन पत्र ‘भारत मित्र’ में छपा करते थे। इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए आर्यसमाज ने अपने पत्रों का संचालन प्रारम्भ किया। भारतेन्दु काल के पं राधाचरण गोस्वामी ने माना कि स्वामी दयानन्द प्रदर्शित मार्ग से ही हिन्दू धर्म की उन्नति हो सकती है। बाल कृष्ण भट्ट जी ने आर्य-समाज की कर्मठता तथा जीवन्तता को अनुभव करते हुए लिखा है कि ‘जीवन यदि किसी सम्प्रदाय या समाज में है तो वह आर्य समाज में है।9 स्वामी दयानन्द द्वारा संस्थापित आर्यसमाज ने हिन्दी का प्रचार कर उर्दू के माहौल को हिन्दीमय बना दिया। आर्यसमाज के माध्यम से ज्ञानमूलक व रसात्मक दोनों प्रकार से साहित्य की अभूतपूर्व वृद्धि हुई। आर्यसमाज हिन्दी के सम्वर्द्धन के मैदान में अग्रगामी बना। भारत में प्रथम शिक्षणालय जिसमें हिन्दी भाषा के माध्यम से सम्पूर्ण ज्ञान विज्ञान की शिक्षा का सफल परीक्षण किया गया,वह गुरुकुल कांगड़ी है। आर्यसमाज ने न केवल अपने सदस्यों को हिन्दी सीखने की प्रेरणा दी अपितु हिन्दी में कार्यवाही लिखने का आदेश भी दिया। आर्यसमाज ने भवानीलाल संन्यासी, स्वामी सत्यदेव परिव्राजक,स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपतराय जैसे प्रतिभाशाली वक्ता प्रदत्त किये जोकि हिन्दी में ही व्याख्यान दिया करते थे। कांग्रेस के इतिहास में 1919 में अमृतसर में कांग्रेस के स्वागताध्यक्ष स्वामी श्रद्धानन्द का व्याख्यान हिन्दी का प्रथम व्याख्यान माना जाता है। स्वामी सत्यदेव परिव्राजक जी ने 1919 में जर्मन रेडियो पर प्रथम हिन्दी व्याख्यान दिया। लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय जी ने लिखा है कि ‘आर्यसमाज के कारण व्याख्यानों की धूम मची जिससे हिन्दी भाषा का समस्त उत्तरी भारत में प्रचार हुआ।10 व्याख्यानों के समान आर्यसमाजियों ने अनेक शास्त्रार्थ महारथी यथा पंडित लेखराम,सवामी दर्शनानन्द,बुद्धदेव विद्यालंकार, पं रूद्रदत शर्मा पैदा किये,जिनके शास्त्रार्थों से हिन्दी का हित सम्पादन हुआ। इस सम्बन्ध में हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने लिखा है कि ‘इन वाद-विवादों ने भाषा को बहुत समृद्ध किया और प्रौढ़ता प्रदान करने में बड़ी सहायता पहुंचायी।11 आर्यसमाज के प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रभावों द्वारा हिन्दी को सुधारवादी जन आन्दोलन की भूमिका प्राप्त हुई ।

आर्यसमाज के मन्तव्यों के प्रचारार्थ नये साधन को अपनाया गया,वह पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन था। 1822 में लाल रत्न चन्द बेरी द्वारा ‘आर्य मैगज़ीन’ नामक मासिक पत्र निकाला गया। लाला शालिग्राम के प्रस्ताव से दो पत्रिकाएं यथा ‘रीजनरेटर ऑफ आर्यावत’र् व ‘देशोपकार’ प्रकाशित हुई। इन पत्रिकाओं के प्रकाशन में लाला लाजपत राय, लाला हंसराज, लाला शिवनाथ, और पं गुरुदत के नाम उल्लेखनीय हैं। आर्य समाज की हिन्दी पत्रकारिता ने देश को राष्ट्रीय संस्कृति, धर्म चिन्तन,स्वदेशी का पाठ पढ़ाया। लक्ष्मी नारायण दूबे जी ने लिखा है कि ‘आर्य समाजी हिन्दी पत्रकारिता वास्तव में आधुनिक काल का इतिहास तथा भारतीय स्वतंत्रता समर की प्रेरणाप्रद गाथा है।12

आर्य समाज के प्रारम्भिक काल में प्रमुख पत्र ‘आर्य दर्पण’,‘आर्य भूषण’,‘आर्य समाचार’, ‘भारत सुदशा प्रवर्तक’ आदि पत्रों में मूर्ति पूजा,अवतारवाद, श्राद्ध, विधवा विवाह आदि विषयों पर विवाद चलते थे। आर्य समाज की पत्रकारिता के द्वितीय काल में विभिन्न शिक्षण संस्थाएं, संस्कृत पाठशालाएं, अनाथालय, विधवाश्रम, दलितोद्धार सभाएं,शुद्धि सभाएं आदि प्रचारित होने लगी। गुरुकुल कांगड़ी और जवालापुर से ‘वैदिक मैगज़ीन’ और ‘भारतोदय’ जैसे उत्कृष्ट पत्र निकले। सभाओं व संस्थाओं के अतिरिक्त व्यक्तिगत प्रयत्नों ने भी आर्य समाज की पत्रकारिता को प्रभावित किया। श्रीपाद दामोदर सातवलेकर का ‘वैदिक धर्म’,स्वामी विद्यानन्द की ‘सविता’,भारतेन्द्रनाथ का ‘जनज्ञान’ संस्था की अपेक्षा संचालकों के वैयक्तिक प्रयत्नों से उन्नति कर सके। ‘सद्धर्म प्रचारक’ ने भारतेन्दु युग में उर्दू को हिन्दीमय बनाने का कार्य किया गया।

भारतेन्दु युग की ‘कवि वचन सुधा’, ‘हिन्दी प्रदीप’,‘ब्राह्मण’, ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ आदि पत्रिकाएं व ‘परोपकारी’, ‘आर्यमित्र’, ‘आर्य सेवक’ आदि पत्र नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे। व्यापक प्रचार की दृष्टि से आर्य समाजी पत्र-पत्रिकाओं ने हिन्दी को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महात्मा मुंशीराम जी ने आदर्श पत्रकार के रूप में अपने गौरव को प्रतिष्ठित किया। जब वे महात्मा मुंशीराम से स्वामी श्रद्धानन्द बने तब ‘सद्धर्म प्रचारक’ के सम्पादन का कार्यभार अपने पुत्र को सौंपकर स्वयं गुरुकुल कांगड़ी से ‘श्रद्धा’ नामक साप्ताहिक पत्र प्रारम्भ किया। साप्ताहिक पत्रकारिता से दैनिक पत्रकारिता की शिक्षा उन्होंने अपने शिष्यों को दी जोकि अत्यधिक फलवती हुई बल्कि कालान्तर में स्वामी श्रद्धानन्द जी ने ‘अर्जुन’,‘वीर अर्जुन’, ‘नवराष्ट्र’, ‘जनसत्ता’ दैनिक के सम्पादक के रूप में हिन्दी पत्रकारिता की जो नींव डाली उसी पर आज भव्य भवन की विनिर्मिति हुई है।13

द्विवेदी युग के अन्त तक मुंशी प्रेमचन्द व सुदर्शन आर्यसमाज के प्रभाव से उर्दू से हिन्दी में शामिल हुए। द्विवेदी युग में उर्दू को हिन्दीमय बनाने में साप्ताहिक ‘प्रकाश’ का प्रमुख योगदान रहा। आर्य समाज की कन्या पाठशाला में कन्याओं को हिन्दी माध्यम से शिक्षा प्रद त्त कर हिन्दीमय वातावरण तैयार किया। राजाराम शास्त्री व संतराम बी ए ने पंजाब से ‘उषा’ पत्रिका निकाली जबकि उषा शब्द भी पंजाबियों को कठिन प्रतीत होता था।14 इन्द्रविद्यावाचस्पति ने स्नातक बनने से पहले ‘सद्धर्म प्रचारक’ का सम्पादन करना प्रारम्भ कर दिया जबकि इन्द्रविद्यावाचस्पति ने दस पन्द्रह दिनों के लिए ‘सद्धर्म प्रचारक’ का दैनिक संस्करण भी प्रकाशित किया।1918 में वाचस्पति जी ने दिल्ली का प्रथम दैनिक ‘विजय’ निकालना शुरु किया। पहले दिन विजय की 70 प्रतियां बिकी किन्तु देखते ही देखते इस पत्र की 15000 प्रतियां कम पड़ने लगी। स्त्री शिक्षा के कारण महिलोपयोगी पत्र-पत्रिकाओं की संख्या में वृद्धि हुई। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने लिखा है कि ‘दिल्ली उर्दू बेगम की दिलदाद दिल्ली में हिन्दी के दैनिक की इतनी खपत होती थी कि प्रत्येक आर्या देवी को विजय के साथ प्रेम था--- राय बहादुरों तक की देवियां घर में पैर नहीं रखने देती थी जब तक वे ताजा ‘विजय’ का पर्चा हाथ में न लेकर आयें।15

1923 में वाचस्पति जी ने दिल्ली से ही ‘सत्यवादी’ साप्ताहिक पत्र का का प्रकाशन किया व सप्ताह में दो दिन निकलने वाला वैभव भी सम्पादित किया। अर्जुन के दशाब्दी समारोह पर विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने पधारकर आशीर्वाद दिया कि ‘ वीर अर्जुन के रजत जयन्ती के अवसर पर मेरी हार्दिक बधाई। पिछले 25 वर्षों से दिल्ली के प्रभावशाली क्षेत्र में शक्ति पाकर देश की सेवा की है और हिन्दी का मान रखा---वह चिरंजीवी हो और इन्द्र जी के करों में हिन्दी प्रेम गाण्डीव सदा राष्ट्रीयता की रक्षा करे।16 क्षेमेन्द्र सुमन जी ने इन्द्र जी को ‘हिन्दी पत्रकारिता गगन का प्रकाशमान नक्षत्र’ बतायाव उन्होंने लिखा है कि ‘वास्तव में यदि हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल के क्रियाकलाप पर दृष्टि डालें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि --आधुनिक काल के जितने भी प्रमुख साहित्यकार हुए हैं,वे सब आर्यसमाज से प्रभावित विचारधारा के पोषक थे।17

हिन्दी पत्रकारिता में भवानी लाल भारतीय जी का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने मासिक ‘आर्यावर्त’ व ‘धर्मवीर’ के सहकारी सम्पादक के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण किया। 5 मई 1928 को निजी साप्ताहिक हिन्दी प्रारम्भ किया-‘हिन्दी का प्रकाश फैलाने के लिए मैंने अपने तन का दिया,मन की बाती एवम् रक्त का तेल बनाया।18 स्वाधीनता प्राप्ति के बाद सितम्बर 1948 को ‘प्रवासी’ पत्र अजमेर से शुरु किया जोकि प्रतिष्ठित पत्र माना जाता है।

उच्चकोटि के पत्र लाला देवराज ने दक्षिण भारत के आर्येतर भाषाभाषी प्रदेश का एकमेव हिन्दी दैनिक ‘हिन्दी मिलाप’ हैदराबाद से निकाला। अद्भुत सामर्थ्य समपन्न लेखनी से महाशय कृष्ण ने 1955 में ‘वीर प्रताप’ दैनिक जालन्धर से निकाला। आर्यसमाजी पत्रकारों ने आचार्य चतुरसेन शास्त्री जी ने ‘संजीवन’ मासिक,कृष्णचन्द्र विद्यालंकार जी ने ‘सम्पदा’, राम नारायण जी ने ‘भूगोल’ विषयक पत्र निकाले।18 आर्यसमाज की अधिकांश प्रान्तीय सभाएं अपना मासिक पत्र प्रकाशित कर रही हैं।‘आर्य दर्पण’ मुंशी बख्तावर सिंह के सम्पादकत्व में शाहजहांपुर से निकला। फर्रुखाबाद से गणेशप्रसाद के सम्पादकत्व में ‘भारत सुदशा प्रवर्तक’ पत्र निकला। कानपुर से ‘वेद प्रकाश’, बरेली से ‘आर्य पत्र’,मेरठ से ‘आर्य समाचार’ व ‘दयानन्द पत्रिका’,प्रयाग से ‘आर्य सिद्धान्त’ व ‘वेदोदय’,उत्तर प्रदेश का ‘आर्य मित्र’,जालन्धर की ‘पांचाल पण्डिता’,नरसिंहपुर से ‘आर्य सेवक’,ज्वालापुर से ‘भारतोदय’, बनारस से ‘वेदवाणी’, अजमेर से ‘अनाथ रक्षक’लखनउ से ‘आर्य कुमार’ व ‘वेद ज्योति,अजमेर से ‘वैदिक विज्ञान’ व ‘वेद मार्ग’ इन्दौर से ‘आर्यावर्त’,बिजनौर से ‘पुण्यलोक’,दिल्ली से ‘राजधर्म’,मुजफफर नगर से ‘संस्कृति संदेश’,बहादुरगढ़ से ‘आत्मशुद्धि पथ’,मुम्बई से ‘आर्य विनय’,गाजियाबाद से ‘महर्षि संदेश’ आदि पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित होती थी। भवानी लाल भारतीय जी ने आर्यसमाज की हिन्दी सेवा के बारे में लिखा है कि ‘राष्ट्र भाषा के प्रचार और प्रसार के लिए आर्यसमाज ने जो कार्य किया,वह तो इतिहास का एक अमर पृष्ठ बन चुका है।19

आर्य समाज अपने जन्म से ही सार्वभौम मानव आन्दोलन के रूप में विकसित हुआ अतः यह स्वाभाविक था कि भारत से इतर देशों अफ्रीका, मॉरिशस, फिज़ी,गुआना,सूरीनाम, ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका आदि पश्चिमी देशों में प्रवासी भारतीयों को वैदिक धर्म व संस्कृति से परिचित करवाने हेतु विदेशों में अनेक आर्य सामाजिक पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हुई। सर्वप्रथम दक्षिण अफ्रीका से ‘धर्मवीर’ नामक हिन्दी साप्ताहिक पत्र प्रकाशित हुआ। भवानी दयाल ने अपनी पत्नी जगरानी के आग्रह पर ‘हिन्दी’ नामक मासिक पत्रिका निकाली जोकि प्रवासी भारतीयों में अत्यधिक लोकप्रिय हुई। आर्य प्रतिनिधि सभा दक्षिण अफ्रीका का ‘आर्य मित्र’ नामक मुख पत्र भी निकला । आर्य प्रतिनिधि सभा पूर्वी अफ्रीका कीनिया ‘प्रतिनिधि’ नामक मुख पत्र भी निकला। आर्य समाज नैरोबी ने ‘आर्य वीर’ नामक पत्र निकला। मॉरिशस में आर्य समाज का प्रसार हिन्दी भाषी लोगों की संख्या पर आधारित है।20

मॉरिशस से ‘आर्य पत्रिका’, ‘आर्यवीर’, ‘आर्योदय’, ‘मारिशस मित्र’ नामक पत्र का प्रकाशन हुआ। टिनिडाड से ‘आर्य संदेश’ का प्रकाशन हुआ।सूरीनाम की आर्य दिवाकर सभा ने ‘वैदिक संदेश’ ,‘प्रकाश’ नामक साप्ताहिक पत्र निकाला। फीज़ी द्वीप में कृष्ण शर्मा व विष्णुदत जी के सहयोग से साप्ताहिक पत्र ‘वैदिक संदेश’ व ‘फीज़ी समाचार’,‘जय फीज़ी’,‘फीज़ी संदेश’, ‘जागृति’ नामक पत्रों का प्रकाशन हुआ। सीलोन में क्रान्तिकारी आन्दोलन उद्घोष के परिणामस्वस्प अमेरिका में केशवदेव शास्त्री, स्वामी सत्यदेव परिव्राजक ने पत्रकारिता के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया। वर्तमान समय में आर्य समाज से समन्वित विभिन्न सभाओं द्वारा भारत के विभिन्न क्षेत्रों से प्रसारित होने वाली पत्र-पत्रिकाओं की सूची इस प्रकार हैः-

वैदिक साधन आश्रम,तपोवन का ‘पवमान’, मासिक पत्र।

आत्म शुद्धि आश्रम, बहादुरगढ़ का ‘आत्म शुद्धि पथ’ मासिक पत्रिका।

आर्य प्रतिनिधि सभा,महाराष्ट का ‘वैदिक गर्जना’, मासिक पत्रिका।

आर्य प्रतिनिधि सभा,बिहार का ‘आर्य संकल्प’, मासिक पत्रिका।

मध्य भारतीय आर्य प्रतिनिधि सभा का ‘वैदिक रवि’, मासिक पत्रिका।

विश्वेश्वरा वैदिक शोध संस्थान,‘विश्वज्योति’, मासिक पत्रिका।

श्रीमद् दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास का ‘सत्यार्थ सौरभ’, मासिक पत्रिका।

आर्य साहित्य प्रचार टस्ट, ‘दयानन्द संदेश’, मासिक पत्रिका।

महर्षि दयानन्द स्मृति भवन न्यास का ‘महर्षि दयानन्द स्मृति प्रकाश’,मासिक पत्रिका।

सत्यार्थ प्रकाशन, मथुरा का ‘तपोभूमि’, मासिक पत्रिका।

आर्य समाज, मुम्बई,‘नूतन निष्काम पत्रिका’, मासिक पत्रिका।

आर्य समाज, दिल्ली,‘आर्य प्रेरणा’, मासिक पत्रिका।

आर्य समाज, कोलकाता ,‘आर्य संसार’, मासिक पत्रिका।

गुरुकुल, झज्जर, ‘सुधारक’, मासिक पत्रिका।

श्री महर्षि दयानन्द सरस्वती स्मारक टस्ट का ‘टंकारा समाचार’, मासिक पत्रिका।

प्रान्तीय आर्य प्रतिनिधि सभा,छतीसगढ़, ‘अग्निदूत’, मासिक पत्रिका।

आर्य प्रतिनिधि सभा, मध्य प्रदेश और विदर्भ, ‘आर्य सेवक’, मासिक पत्रिका।

गुरुकुल महाविद्यालय,जबलपुर,‘भारतोदय’,मासिक पत्रिका।

केरल वैदिक मिशन,नई दिल्ली का ‘आर्य मुसाफिर’, मासिक पत्रिका।

दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा का साप्ताहिक ‘आर्य सन्देश’,साप्ताहिक पत्रिका।

आर्य प्रतिनिधि सभा,पंजाब का ‘आर्य मर्यादा’, साप्ताहिक पत्रिका।

आर्य प्रादेशिक प्रतिनिधि सभा, ‘आर्य जगत’, साप्ताहिक पत्रिका।

आर्य प्रतिनिधि सभा,उतर प्रदेश का ‘आर्य मित्र’, साप्ताहिक पत्रिका।

आर्य प्रतिनिधि सभा,हरियाणा, का ‘आर्य प्रतिनिधि’, साप्ताहिक पत्रिका।

आर्य प्रतिनिधि सभा, राजस्थान, ‘आर्य मार्त्तण्ड’, पाक्षिक पत्रिका।

आर्य प्रतिनिधि सभा,आन्ध्र प्रदेश का ‘आर्य जीवन’, पाक्षिक पत्रिका।

आर्य परोपकारिणी सभा का ‘परोपकारी’, पाक्षिक पत्रिका।

आर्य सवंर्द्धिनी सभा का ‘सवंर्द्धिनी’,वार्षिक पत्रिका।

आर्य समाज के साहित्यकारों ने मासिक,पाक्षिक, साप्ताहिक पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता को नव्य आलोक प्रदान किया। आर्य समाज के माध्यम से हिन्दी साहित्य व पत्रकारिता की जो सेवा हुई है,वह इतनी महत्त्वपूर्ण है कि उसके उल्लेख के बिना साहित्य और पत्रकारिता का इतिहास अधूरा रह जाता है। आर्य समाज हिन्दी भाषा व साहित्य के लिए सदैव पथ प्रदर्शक रहा है। आर्य समाज ऐसा भट्ठा है जिसने पिछले सौ वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता के भवन को अगणित चट्टानें, ईटें, स्वर्णिम कलश कंगूरे प्रदान किये हैं। आर्य समाज द्वारा अपनाये गये उपादान हिन्दी भाषा व साहित्य को नवीनतम दिशा प्रदान करते रहेंगे।

सन्दर्भ ग्रन्थः-

1 विष्णु प्रभाकर माचवे, स्वामी दयानन्द सरस्वती-भारतीय साहित्य के निर्माता,पृ॰ 8।

2 महाकवि निराला,लेख महर्षि दयानन्द और युगान्तर ग्रन्थ, पृ॰ 9।

3 इन्द्रवाचस्पति,पत्रकारिता के अनुभव,नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, पृ॰ 82।

4 कमलापति त्रिपाठी, पत्र और पत्रकार, पृ॰ 13।

5 सत्यदेव विद्यालंकार, समाचार पत्र-सूची की प्रस्तावना, पृ॰ 6।

6 अम्बिका प्रसाद वाजपेयी,समाचार पत्रों का इतिहास, ज्ञान मण्डल,काशी, पृ॰ 78।

7 सत्यकेतु विद्यालंकार,आर्य समाज का इतिहास,पांचवा भाग,सत्रहवां अध्याय, पृ॰ 424।

8 ज्ञानवती दरबार,भारतीय नेताओं की हिन्दी सेवा, पृ॰ 239।

9 भवानी लाल भारतीय, हिन्दी काव्य को आर्य समाज की देन,राम लाल कपूर टस्ट,अमृतसर, पृ॰ 43।

10 लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय,आधुनिक हिन्दी साहित्य, हिन्दी परिषद्,प्रयाग विश्वविद्यालय, 1941, पृ॰ 58।

11 हजारी प्रसाद द्विवेदी,हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ॰ 173।

12 लक्ष्मी नारायण दूबे, हिन्दी साहित्य में आर्य समाज की अभिव्यक्ति, पृ॰ 72।

13 चन्द्रभानु सोनटक्के, आर्य समाज और हिन्दी साहित्य, पृ॰ 251।

14 संतराम बी ए, हिन्दी साहित्य सम्मेलन-रजत जयन्ती स्मृति ग्रन्थ,मुझे क्यों और कैसे हिन्दी से प्रेम हुआ, पृ॰ 67।

15 सत्यकेतु विद्यालंकार,आर्य समाज का इतिहास,पांचवा भाग,सत्रहवां अध्याय,आर्य स्वाध्याय केन्द्र,नई दिल्ली,1982,पृ॰427।

16 स्वामी श्रद्धानन्द,कल्याण मार्ग का पथिक,महर्षि दयानन्द भवन,दिल्ली,पृ॰ 74।

17 क्षेमेन्द्र सुमन, दिवंगत हिन्दी सेवी, सन्दर्भ ग्रन्थ,खण्ड 1, मधुर प्रकाशन,दिल्ली, पृ॰ 248।

18 भवानी लाल भारतीय,वैदिक साहित्य,संस्कृति और समाज दर्शन,व्याख्यान माला, पृ॰ 409।

19 अम्बिका प्रसाद वाजपेयी,समाचार पत्रों का इतिहास, पृ॰ 80।

20 चन्द्रभानु सोनवणे, आर्य समाज और हिन्दी साहित्य,यूनिवर्सिटी पब्लिकेशन्स,दिल्ली, पृ॰ 257।