कथा आलोचना यानि कथा का समाजशास्त्र
कथा आलोचना यानि कथा का समाजशास्त्र


प्रकृति की कथा यानि कथा की प्रकृति
रामनाथ शिवेंद्र
कहानियों के बारे में बातंे होते ही अतीत की रहस्यमयी परतें खुलने लगती हैं, लगता है कि कहानी कहन का चलन बहुत पुराना है जो भले ही पहले की तरह नहीं पर आज तक चल रहा है। अतीत की परतें खुलते ही अतीत ही नहीं हमारा वर्तमान भी कलैया खाने लगता है, फिर तो अतीत और वर्तमान के बीच अपने पुरखों को लटकता हुआ देख कर मन बेचैन हो जाता है। कभी दादी की याद आती है तो कभी नानी की, पर दादा तथा नाना याद आते ही नही, याद आती हैं नानी और दादी। लगता है कि अतीत या वर्तमान की मानव सभ्यता में कहानियों से जितना मधुर रिश्ता नानी और दादी के रूप में नारियों का रहा है उतना नर रूपी जीव नाना और दादा का नहीं। कहानी कहन के मामलों में चाहे वह अतीत हो या वर्तमान नर विलुप्त दिखता है। कहानियों के प्रतिनिधि के रूप में नानी तथा तथा दादी का ही दिखना तथा उनमें से दादा तथा नाना का गायब होना, पुरुष समर्थित लिंगभेद का भी मामला हो सकता है। वैसे तो कहानियों के कहन का चलन अब कहीं नहीं दिख रहा है। नानी हों या दादी अब कहानियां नहीं कह रहीं, लोरियां नहीं सुना रहीं, इस तथ्य को इस तर्क से संतुष्ट नहीं किया जा सकता कि लोगों के पास समय ही नहीं, समय है भी तो वे कहानी कहन को अपनी कार्यसूची में नहीं डाल रहे। समान्य जीवन से कहानियों का विलुप्त होना और साहित्य में कविताओं के समानान्तर या उससे बढ़ कर कहानियों का स्थापित होना मानव सभ्यता के कई कोणों की ओर संकेत देता है। पर सामान्य जीवन से कहानियों का गायब होना विचारने वाली बात है? कहानियों की तरह ही हम विभिन्न संस्कारों के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों व गेय गारियों आदि को विलुप्त होता देख रहे हैं। साहित्य में कहानियों का स्थापित होना यह तो शुभ संकेत है पर सामान्य जनजीवन से इसका विलुप्त होना चिन्तनीय है। अगर हम परंपरा की बात करें तो हमें विचारना होगा कि कहानियों से जुड़ाव के मामलों में नारियों की तुलना में नर पीछे क्यों है? यह कभी नहीं सुना गया कि कोई नर बच्चों को सुलाने, बहलाने के लिए लोरी सुनाता है या उसे यह समझ है कि बच्चों को सुलाने के लिए उसे लोरी या उसके समकक्ष कोई चीज गा कर सुनाना है। जाहिर है उसके पास कंठ होता ही नहीं फिर वह क्या गुनगुनाएगा बच्चों को सुलाने के लिए जबकि नारी के पास कंठ होता है। नर का सामान्य जीवन तो पेट के अगल बगल ही घूमता और डोलता रहता है। नर सदैव अपने पेट के सहारे या उसे भरने के लिए ही समय का मूल्यांकन करता है और समय के साथ उसी के अनुसार छेड़, छाड़ भी। नारी ऐसा नहीं करती। नारी का सारा जीवन कंठ और पेट दोनों के अगल बगल घूमता और डोलता रहता है। अगर हम मनोविज्ञान का सहारा लें तो यह बात साफ हो जायेगी कि राग तभी निकलते हैं जब पेट और कंठ दोनों में हलचल हो, दोनों में संगति हो और दोनों में खुद को अभिव्यक्त करने की लालसा हो। कंठ की बेचैनी और पेट की जलन का विलीनीकरण या आत्मसातीकरण ही लोरी की धुनों व रागों का सर्जक हो सकता है, अन्य कोई बात नहीं। यही बात नानी और दादी को कहानियां कहने पर विवश करती थी। मेरा मानना है कि सामान्य जीवन से कहानियां गायब हो चुकी हैं और अब कहीं नहीं है, घुर से घुर देहात में भी कहानियां नहीं हैं, छठ्ठ,अन्नपं्रासन, और जिउतिया जैसे संस्कार अवसरों पर भी कहानियां नहीं कही जा रहीं। कहानियां किताबों की सामग्री बनती जा रही हैं शायद यही हमारी नियति भी है। बहरहाल ऐसा क्यों हो रहा है इस पर हमें विचार कर करना चाहिए। आज का समय न केवल जटिल है वरन क्रूर भी है, आज के समय में सामान्य को असामान्य में, सरल को जटिल में, सहज को असहज में, खंडन को विखंडन में तब्दील करने और करते रहने का चलन जीवन के सभी क्षेत्रों में विस्मयकारी ढंग से बढ़ रहा है और आदमी है कि खुद से संतुष्ट (आत्म मुग्ध नहीं) रहने की आदिम कला को भी नहीं जानता गोया वह अपनी प्रकृति के विपरीत जाने का अभ्यासी होता जा रहा है। कहानियों का नाता एक तरह से नारियों से साफ साफ दिखता है, इसका अर्थ यह नहीं कि कहानियां केवल स्त्रैणमना होती हैं और उनमें नर वाला प्रतिरोध नहीं होता, कहानियां चाहे जब की हों उनमें करुणा, दया, प्रेम, त्याग, वलिदान आदि ही नहीं प्रतिरोध व प्रतिकार भी होते हैं और उसे होना भी चाहिए। समकालीन हिन्दी कहानियों की बात करें तो सारा कुछ अन्धकार और प्रकाश के खेलों में उलझा दीख रहा है, आज की कहानी दृश्य श्रव्य माध्यमों के अराजक करतबों में उलझ कर अपना अस्तित्व तलाश रही है। कहानियों के हमारे प्रिय लेखक प्रेमचन्द के आदर्श व सिद्धान्त आज की कहानियों एवं उपन्यासों से गांधी के सिद्धान्तों की तरह गायब हो चुके हैं। आज राजनीति में गांधी के तस्वीर की पूजा ही प्रमुख है उनके विचारों या शिक्षाओं का अनुपालन नहीं। तो यह हाल है आज की कहानियों का। आज की कहानियों की जमीन ऐसी नहीं जिस पर पांव रख कर दो कदम भी चला जा सके, वहां बैठने सुस्ताने की बात सोचना बेवकूफी होगी। प्रेमचन्द के समय में यानि आजादी के पूर्व की कहानियों की जमीन देख लीजिए उसमें न केवल वह समय होगा बल्कि समय से प्रतिरोध करने की ऊर्जा भी होगी। कहा जा सकता है कि वह समय आजादी के संघर्षोे का था, सो कहानियां भी उसी मिजाज और तेवर की हुआ करती थीं जबकि आज का समय वैसा नहीं है। अब तो हम आजाद हैं सो हमारी कहानियों की जमीन भी आजादी वाली ही होगी, कुछ दूसरी होगी पर कैसी होगी? या कैसी होनी चाहिए, इस पर आप बहस करके देख लीजिए मुंहकी खानी पड़ेगी, चारो खाने चिŸा हो कर गिरने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा। आजादी के संघर्षों के दौरान कहानियों ने प्रतिरोध वाली जमीन को कहानियों का आधार बनाया था और साबित किया था कि कहानियों का अस्तित्व किसी मायने में कविताओं से कम नहीं। कहानियों को लोकसम्मान भी मिला, फलस्वरूप कहानियां कविताओं की तुलना में कुछ अधिक सम्मान पाने लगीं। लोगों ने कहानियों को चूमना चाटना शुरू किया और कविताओं को अपने दिलों से थोड़ा अलगिया दिया। हालांकि उस दौर की कवितायें भी प्रतिरोधी जमीन पर खड़ी थीं। बिना प्रतिरोध के तब साहित्य का कोई मतलब ही नहीं था। आज के समय में अनुरोध एवं प्रतिरोध दोनों वैश्विक हो गये हैं और बाजार के द्वारा चलाए जा रहे हैं। आज का समय अन्य बातों के अलावा इसलिए भी खतरनाक एवं जटिल है कि हमें क्या करना है और क्या करना चाहिए यह सारा कुछ बाजार द्वारा तय किया जा रहा है। बाजार का साहित्य पर खासतौर से कहानियों पर कैसा असर है इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि आज की भारतीय कहानियों से सारी दुनिया के तीन प्रमुख सवाल जमीन के सवाल, संपत्ति के सवाल तथा नारी के सवाल ही गायब हो चुके हैं। आज कहानियां दूसरे तरह के रहस्यमयी सवालों को उद्घाटित करने में अपनी सारी ऊर्जा का प्रयोग कर रही हैं। कम से कम भारतीय परिवेश में तो इन सवालों को कहानियों के माध्यम से प्रकाश में नहीं लाया जा रहा और कहीं लाया भी जा रहा तो उसे साहित्य के केन्द्र में नहीं, हासिए पर रखा जा रहा है, किसी कूड़ा करकट की तरह। आज बाजार ने कहानियों के बाजार के लिए नारी तन को नीति निर्देशक तत्व की तरह स्थापित कर दिया है। अभिव्यक्ति के सारे माघ्यमों में हम नारी तन के कत्थक नृत्य को देख भी रहे हैं, तथा उन दृश्यों को देखने के लिए विवश किए जा रहे हैं। क्या उसके प्रतिरोध में हम कुछ कर सकते हैं? लगता है कि जमीन, संपत्ति ,(property) तथा नारी के सवालों पर बेहद कमजोर किस्म के जो कानून बनाए गए हैं उसे साहित्यि की जनता ने पर्याप्त मान लिया और महसूस कर लिया कि समाज के सारे अन्तरविरोध खुद बखुद समाप्त हो जाएंगे पर ऐसा हुआ नहीं। सारा कुछ पहले की तरह ही चल रहा है बिना किसी बदलाव के। यह समझना थोड़ा चौंकाने वाला हो सकता है कि जब जमीनदारी विनाश हो गया, जब घरेलू हिन्सा का कानून आ गया फिर साम्राज्यवादी व्यवस्था वाले बवाल क्यों रहेंगे, साथ ही साथ मानवाधिकार का कानून भी आ गया इतना ही नहीं सूचना का अधिकार भी आ गया, बाल शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया ऐसे में तो सारा कुछ ठीक ठाक और सबका राज्य वाले वसूलों से चलना चाहिए पर क्या ऐसा है? और बतौर साहित्यकार हमें भी समझ और अनुभूति के दोनों संस्तरों पर ऐसा ही मान व जान लेना चाहिए? इतना सारा कुछ होने के बाद का जो रहस्य है, और हम वाजिब समानता से भी जो काफी दूर हैं उन कारणों पर हमारी साहित्यिक जनता सोच व गुन ही नही रही। प्रेमचन्द हमारे लिए अविस्मरणीय हैं और आदर्श भी, पर क्या हम उनसे कुछ सीख पा रहे हैं। अपने समय के खतरनाक सवालों से हम प्रेमचंद जी की तरह क्यों नहीं टकरा रहे? हमारे मन में आज के खतरनाक समय से टकराने की आवश्यक बेचैनी क्यों नहीं है? हम क्यों खुद को बाजार के चकाचौंध में झोंक रहे हैं। हमें सोचना होगा। एक साहित्यकार के नाते बाजार के कार्टूनों में बन्द होना हमारी कार्य सूची नहीं होनी चाहिए। हालांकि यह सच है कि कहानियों का भी मुकम्मिल बाजार है और कहानियों को बाजारू बनाने वाली ताकतें भी काफी मजबूत हैं फिर भी एक साहित्यकार के नाते हमारा कर्तव्य क्या होना चाहिए, कुछ न कुछ तो निर्णय लेना ही होगा भले ही वह निर्णय आत्घाती किस्म का ही क्यों न हो। निश्चित है कि बाजार से टकराने पर बाजार के सारे उपभोगवादी संस्कारों से मुक्तिवोध की तरह या प्रेमचंद की तरह खुद को अलगियाना होगा यानि खुद को बदलना होगा और उस रूप में आना होगा जो बाजार के सारे कौशलों को ठेंगा दिखाने की क्षमता रखता हो। यही प्रकृति के करीब जाना होगा तभी होरी से मुलाकात हो सकती है, तभी कोई गोदान जन्म ले सकता है। बाजार की छतरी ओढ़ कर आत्ममुग्ध तो हुआ जा सकता है और तमाम तरह के आकर्षक मंचों पर बैठा जा सकता है पर जीवन के सच के करीब कभी भी नहीं जाया जा सकता है। जीवन का सच तो वहां है जहां प्रकृति है, जहां वे लोग है जो जीवन जीने की सारी ऊर्जा पेड़, पौधों, नदी नालों से प्राप्त करते हैं। उनके लिए बाजार कोई अर्थ नहीं रखता। कहानी के लिए कहानी के विषय का चुनाव खुद को खोलना है और बताना है कि आप बाजार के हसीन करतबों में गोता लगाने वाले हैं या लुकाठी हाथ में ले कर खुद का घर जलाने वाले हैं। आप कबीर हैं या दिल्ली के अकादमिहा हीरो। यह जो कहानी के विषय के चुनाव का मामला है, बहुत ही जहरीला है इसके जहर को भविष्य कभी माफ नहीं करता, वह अदालती कटघरे में खड़ा कर देता है और साफ साफ पूछता है ‘पार्टनर तुम्हारी राजनीति क्या है?’ खैर अभी उस तरह का समय नहीं है कि प्रकृति के करीब रहने वाले बाजारू लोगों के बाजार में खड़े होकर आदेश दे सकें... ‘तय करो किस ओर हो तुम।’ यह जो ‘ओर’(side) वाला मामला है वह कहानी के विषय वस्तु से ले कर पात्रों के चयन तक का है और पात्रों की पात्रता बरतने तक का भी। कहानीकार तो सर्जक होता है वह मनचाहा सृजन के लिए स्वतंत्र होता है पर उसकी लिखी कहानी तो स्वतंत्र होती नहीं, वह पाठकों की गुलाम होती है। पाठक उसका विश्लेषण अपनी समझ और लोकनिष्ठा के अनुसार करता है। कभी वह अनुभूति को ही समझ मान लेता है जबकि समझ, समझ है और अनुभूति अनुभूति है, दोनों में किसी भी तरह की समानता नहीं, दोनों दो छोर हैं। गनीमत है कि दोनों एक दूसरे पर जानलेवा हमला नहीं करते। यह साहित्य के लिए बहुत ही खतरनाक स्थिति है, अब ऐसे में कहानीकार करे क्या क्योंकि उसके पास भी अपनी अनुभूति और समझ दोनों होती है, यहीं लेखन का द्वन्द उपस्थित हो जाता है। अगर साहित्यकार अपनी समझ एवं अनुभूति को लोक अनुभूति और समझ से नहीं जोड़ता या जोड़ पा रहा तो निश्चितरूप से वह यह तय नहीं कर सकता कि वह किस ओर है। मेरा मानना है कि कहानीकार को उस लोक की तरफ जाना ही होगा जिस लोक के लोग सारे संसाधनों से वंचित हैं, उपेक्षित हैं, जो प्रकृति की नाच से जीवन जीने की ऊर्जा पाते हैं वे ही तो प्रकृति के उत्पाद हैं। जो प्रकृति के साथ हैं, वहीं प्रकृति का असली लोक है। प्रकृति के साथ चलने वाली रचना ही कृति हो सकती है इस लिए चाहेे कहानी हो या कविता उसे प्रकृति की कृति बनना ही होगा। ऐसा नहीं है कि समकालीन कहानियां प्रकृति के बुनियादी सवालों जमीन, संपत्ति तथा नारी से नहीं टकरा रहीं, वे टकरा रही हैं पर उन्हें जिस प्रतिरोधी चेतना के साथ इन सवालों से टकराना चाहिए, नहीं टकरा रहीं। लगता है आज के समय में जो प्रतिरोधी चेतना है वह भी सुविधावादी इच्छाओं की शिकार हो गई है। कथाकारों को आज के बाजारवादी व उपभोक्तावादी समय से टकराने के लिए पूंजीमूल्यवोधों वाली चेतना से अलग हटकर लोकमूल्य वोध वाली चेतना की तरफ जाना होगा, नहीं तो पूंजी के द्वारा ही गढ़े गये औजारों के द्वारा आज के समय से नहीं टकराया जा सकता। उदाहरण के लिए अगर आप ग्रामीण संस्कृति बचाने के लिए चिंतित हैं तो आपको विचाराना होगा कि आज का जो ग्राम है वह पहले वाला ग्राम नहीं है। ग्राम की पूरी सामाजिक संरचना को पूंजीमूल्यवोध वाली सŸाा ने बदल दिया है। अब वहां परधान जी हैं, सेक्रेटरी हैं, लेखपाल हैं, जो पूरी तरह से पूंजीमूल्य वोध वाली चेतना के प्रायोगिक प्रतिनिधि हैं। ये सभी लोग सुविधावादी इच्छाओं की पूर्ति के लिए मर मिटने वाले लोग हैं, इनके लिए जीवन का मतलब एकला चलो है, पूंजी के बिछौने पर सोने की कामना है, संपत्ति के विविध रूपों को चूमना चाटना है। ये पूंजी की कुटिल चेतना द्वारा संस्कारित किये गये लोग हैं, ये नहीं जानते हैं कि समाज क्या होता है, समानता क्या होती है? सहभागिता क्या होती है? पूंजी तो वैसे भी ‘आपन भला सकल जग माही’ की कुटिल चेतना वाली होती है, सो वे अपने विकास को समाज तथा देश का विकास मानते हैं। अगर आज के ग्राम को अगर कहानी का विषय बनाना है तो कथाकारों के लिए आवश्यक होगा कि वे परधान, सेक्रेटरी, लेखपाल आदि की पूंजीमूल्यवोध वाली चेतनाओं से टकराने के लिए गांवों में लोकचेतना वाले प्रतिरोधों को सृजित करें, तभी उनसे टकराया जा सकेगा नहीं तो नहीं।
कथा के संदर्भ में नारी विमर्श
रामनाथ शिवेंद्र
नारी अस्मिता के सवालों पर वौद्धिकों की चिताएं पसीना बहाने वाली कम हसाने वाली अधिक साबित हो रही हैं। नारी मुद्दों पर पुरूष मन की आक्रामकता कब और कैसे पगलाई हरकतें करने लगती हैं इसका आभास उसे तो होता ही नहीं जो प्रतिक्रिया कर रहा होता है। आभास होता तो गंगा में से नहा कर निकली नारियों के पवित्र रूपों को सिरजने वाले पगलाये वौद्धिक, पुरूष मन की खूनी आक्रामता वाली सोच व चेतना के मकड़जाल में नहीं उलझते। वे उन्हें नहीं गरियाते जो नारियों को बराबरी के स्तर पर सम्मानित करते हुए लोकसंघर्ष की लड़ाकू भूमिका में देखना चाहते हैं। जरा ठहर कर सोचिए, हालांकि नारीविमर्श में शामिल होने वाले सभी वौद्धिक एक ही तरह की सोच व संचेतना के उत्पाद नहीं हैं, कुछ तो ऐसे हैं ही जो नारियों के बारे में बुर्के में ढकी बातें नहीं कर रहे हैं, उनकी बातें नारीविमर्श के बारे में नर और नारी के मित्रतापूर्ण सहसंबधों की ओर प्रस्थान करती हुई हैं। दिक्कत हमारी सामाजिक संरचना से गढ़ी हुई मर्दवादी सोच में है। सवाल पुरुष सोच का है, दिक्कत ऐसे पितृ सत्ता वाले चिंतकों से है जो नारीविमर्श को कथित शुचिता और सुभाषितों के मर्दवादी जड़ धारणाओं के सहारे खुद को न बदलने की तर्ज पर आगे बढ़ा रहे हैं। नारी स्वतंत्रता केे कथित आकांक्षियों के प्रदर्शनों व अभिव्यक्तियों से साफ दिखता है कि वे अपना कुछ खोना नहीं चाहते तथा अतीत का सहारा लेकर आदर्श, नैतिकता, शुचिता आदि की बातों के सहारे सुभाषितों को गढ़ रहे हैं। वैसे भी हमारे अतीत में नारी महिमामंडन व उनके देवीकरण की तमाम बातें बतौर मिसाल हैं पर व्यवहार में हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा है। सवाल है आखिर सामाजिक संरचना के इस नारी रूपी आधे हिस्से को सुभाषितों के सहारे भला कब तक चलाया जा सकता है और उन्हें कब तक मानसिक पराधीनता का शिकार बनाया जा सकता है? कुछ तो बोलना ही होगा आज के समय की जागरूक व जिम्मेवार नारियों को, और वे बोल भी रही हैं। अपनी अस्मिता का पक्ष न रखना भी तो अपराध है। वैसे मर्दवादी सोच के बारे में बोलना और अपनी अस्मिता जिसे नारीविमर्श कहते हैं, उसके लिए मन की गांठों को खोलना दोनों अलग अलग बातें हैं, कम से कम नारियां तो अपने को अभिव्यक्त नहीं ही कर पा रही हैं, वे इतनी करुणामय होती हैं कि क्रिया की प्रतिक्रिया नही जानतीं। यह एक व्यवहारिक संकट है, इसी संकट के कारण नारियां मर्दवादी आख्यानों का हिस्सा बन जाया करती हैं। नारी खुद अपने बारे में बोल नहीं रही और मर्द हैं कि लगातार उनके बारे में हितोपदेश दिए जा रहे हैं। काश नारियां बोलने लगतीं और पुरुष सत्ता की जकड़नों से परिवार के स्तर पर, मान्यताओं के स्तर पर, संपत्ति में हिस्सेदारी के स्तर पर टकराने का काम करतीं। परेशानी यही है, नारीविमर्श के मुद्दों को भी पुरुष वौद्धिकता ने तमाम दूसरे मुद्दों की तरह जैसे संपत्ति में हिस्सेदारी, संसाधनों में हिस्सेदारी, समान काम के लिए समान वेतन, राजनीतिक समानता, कानूनी समानता, सामाजिक समानता के मुद्दों की तरह कब्जिया लिया है। देखा जा रहा है कि आज के बदले हुए लोतांत्रिक समय में भी पुरुषों का सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक ही नहीं ज्ञान तथा लेखन के भी सभी क्षेत्रों, उप क्षेत्रों पर निष्ठुर और एक तरफा कब्जा है। अभी वह दिन बहुत दूर है जब नारियों के बारे में नारियों की बातें सुनी और गुनी जाएंगी फिलहाल तो ऐसा नहीं जान पड़ रहा। कथासाहित्य में भी नारियांे को अपने पैरों पर नहीं खड़ा होने दिया जा रहा। वहां तो उन्हें संघर्ष का प्रतिनिधि बनाया जा सकता है पर नहीं, ऐसा नहीं हो रहा। नारियों को अपनी अस्मिता की सुरक्षा के लिए संघर्षमय प्रयास करने होंगे और उन्हें हर स्तर पर पुरुषों के द्वारा गढ़े गये आख्यानों को आलोचनात्मक ढंग से विश्लेषित करते हुए संघर्ष को व्यावहारिक रूप देना होगा। केवल जुबानी जमा खर्च नहीं। सच यह है कि चाहे गरीबों की गरीबी मिटाने का मामला हो या नारियों के मान सम्मान की बातें हो गरीबांे तथा नारियों दोनों को बोलने और खुद को खोलने के मौके ही नहीं दिए जा रहे। मौके दिये भी नहीं जायेंगे। दिक्कत यह है कि गरीब या नारियां खुद अपने बारे में क्या बोलना चाह रही हैं, उन्हें नैतिकता, पूर्वजन्म, दैवी प्रतिफलों के हवाले देकर बोलने से रोक दिया जा रहा है। उन्हें नैतिकता तथा सामाजिक संरचना के जकड़नों में बाध दिया गया है, ऐसे में यदि वे बोलें तथा मन की गांठों को खोले भी तो उसे हसीन मजाक बना दिया जाता है। नारियों के मन में उपजने वाले तमाम सवालों को बतौर उद्धरण देखा जाना चाहिए जैसे यही कि वे विवाह क्यों करंे? अगर वे पत्नी बनने से इनकार कर रही हैं, बच्चा पैदा करने से इनकार कर रही हैं फिर उस पर चिल्ल पों किस नैतिकता या सुभाषित के आधार पर किया जा रहा? वे पत्नी के बजाय अगर मैत्री संबध चाह रही हैं तो इसमें क्या बुराई है?क्या हमारी सभ्यता में लिंगभेद प्रभावी नहीं है? अगर है तो फिर नारियों के लिंगभेद विरोध पर काहे के लिए नाक फुलाना? पुरुष सत्ता अपनी आलोचना सुनने एवं गुनने की सहनशीलता क्यों नहीं दिखाती? नारीविमर्श की पैरोकार अमेरिकी महिला एड्रियन रिच तभी तो बिना लाग लपेट के साफ साफ बोलती हैं... ‘पुरुष जब भी अपनी वस्तुएं, विषय और भाषा चुनते हैं उनके विचार में कभी भी स्त्रियां या स्त्रियों द्वारा की जाने वाली आलोचना नहीं होती’ ‘हमें स्त्रीवादी दृष्टिकोण से पुरुष केन्द्रित एन्ड्रोसैन्ट्रिक) पुस्तकों और तकनीकों का पुनरावलोकन करना होगा ऐसा करने से हम लिंगभेद की राजनीति को उजागर कर पायेंगे। जिसका काम स्त्रियों को भाषा और साहित्य से दूर रखना और अक्षम बनाये रखना है ताकि वे उनका इस्तेमाल अपने अन्दर और बाहर चल रहे द्वन्दों को व्यक्त करने में न कर सकंे। पुरुष केन्द्रत किताबों की समीक्षा होनी चाहिए ताकि स्त्रियों को अपनी बात रखने का मौका मिल सके।’ बात साफ है कि नारियां अपने बारे में क्या सोचती हैं, गुनती हैं, विमर्श का मामला यह है, न कि वह जिसे पुरुष अपने पतित्वता वाले पति परमेश्वर के भाव से उनके बारे में सोचता, गुनता, लिखता या व्याख्यान देता है। ऐसे भावों से नारियों के बारे में सोचने का मतलब तो उनके खिलाफ खतरनाक साजिश ही कही जा सकती है और कुछ नहीं। आखिर नारियों को आप किस भाव या रूप में देख रहे हैं, एक पत्नी के रूप में, मित्र के रूप में, प्रेमिका के रूप में, भोग, संभोग के प्रतीक के रूप में, बाजार की वस्तु के रूप में, सेक्स सिम्बल के रूप में, तय यही करना है कि नारियों को आप किस कोण से देख रहे हैं? वैसे तो नारियों के अन्य कई रूप भी है। स्त्रियां अपने स्त्रैणता के लिए जानी जाती हैं, करुणा, प्रेम, संवेदना, मातृत्व आदि के लिए भी, जिसके लिए उन्हें समादृत करने की भी परंपरा रही है पर ऐसी सारी सोच मर्दवाद की अभिव्यक्ति भर बन कर रह जाती है और पुरुष अपने मर्द होने को प्रमाणित करने के लिए जिसे मर्द पुरुषार्थ मानता है उसकी गोद में चला जाता है। स्त्री और मर्द का फर्क यह भी है कि मर्द का मतलब विजेता, पराक्रमी और स्त्री का मतलब, कमजोर, सब कुछ हार जाने वाली, पराधीन यानि स्वाधीनता और पराधीनता के द्वन्दों में फसी महज एक वस्तु, या तो कन्यादान के लिए या वलिदान के लिए। सामाजिक संरचना में आज के समय का यह जो लिंग भेद है उसका एक अर्थ यह भी है कि नारी पराधीनता की प्रतीक है जबकि पुरुष वह तो जन्मना ही स्वाधीन है। स्वाधीनता वाले घमंडी मनोभावों से पुरुषों का निकलना लगभग लगभग मुश्किल है। तभी तो अमरिकी लेखिका रिच पुरुष लेखन के पुनरावलोकन करने की बातें करती हैं, और स्त्रियों को पराधीनता वाले मनोभावों से बाहर निकलने का आग्रह भी। नारी विमर्श का मुद्दा आजकल कम से कम पुरुष वौद्धिकों की चिंतन की दुनिया में, कविताओं व कथाओं के माध्यम से, कई रंगांे में रंगा हुआ किताबों के पन्नों पर चमकता और थिरकता हुआ दीख रहा है। नारीविमर्श की तरह ही गरीबी मिटाने का मामला भी आजादी के बाद से ही भारत में चुनावी नारा बना हुआ है और यह मामला अपने कुछ बदले रूपों में अंग्रेजों के जमाने से ही नारों की शक्ल में अब तक चला आ रहा है। गरीबी मिटाने की तरह ही नारी सशक्तीकरण का मुद्दा भी गरमाया हुआ है, और किसी हसीन नारे की तरह सभी जगह थिरक रहा है। पत्रिकाओं में तो नारीविमर्श के नाम पर मर्दवादी वौद्धिकों द्वारा कुछ अलग और नारी विमर्शकारों द्वारा कुछ अलग कहा सुना जा रहा है। कहा जाना चाहिए कि भारत में तो नारी विमर्श मत भिन्नताओं का शिकार है। विमर्शो से पता चलता है कि नारियां जैसे कोई पोस्टर हों, पंफलेट हों और जिसे नैतिकता की दिवालों पर चिपकाया जाना जरूरी हो। जाने क्या, क्या छपने लगा है, क्या छपना चाहिए और क्या नहीं छपना चाहिए, दोनों के अन्तरों को वौद्धिकता का रोलर चलवा कर पाट दिया जा रहा है। नारी विमर्श से अलग अगर गरीबों की बात करें तो बी.पी.एल. जैसी अद्भुत किस्म की उनकी श्रेणी ही बना दी गई है जो अर्थशास्त्र की बहसों को रोचक बनाने का काम करती है। भारतीय सामाजिक संरचना में बी.पी.एल. नाम की एक अलग कोटि गढ़ और बना कर हमारे अर्थशास्त्री जाने किसी लोककल्याण की बात कर रहे हैं? बात समझ में आने लायक नहीं है। उसी तरह नारी के बारे में भी जो नारे गढ़े और रचे जा रहे हैं यह भी समझ से बाहर की चीज है। आखिर इससे बड़ा और क्या मजाक हो सकता है कि जिस समाज में पुरूषों के लिए देह और दिमाग दोनों बेचने और खरीदने की खुली आजादी हो उस समाज में नारी देह और दिमाग के बारे में शुचिता और नैतिकता की बातें कहां से उठनी चाहिए। पुरूष तो देह और दिमाग दोनों बेच लेने में ही बहादुरी के गीतों को गा गा कर मस्त हो रहा है। अपने देह और दिमाग दोनों को बेच कर पुरूष जिस नई और विकसित दुनिया का सृजन कर रहा है उस दुनिया के बारे में नहीं सोच रहा कि उसकी वैयक्तिक संप्रभुता को कुछ रुपयों के बदले लील लिया जा रहा है। जबकि भारतीय चिंतन तो उस व्यक्ति को सफल मानता है जो वैयक्तिक स्वतंत्रताओं को सुरक्षित बचा पाये चाहे जैसे भी। पर आज के समय में तो अपनी स्वतंत्रताओं को बेचने का काम चल रहा है। वैयक्तिक संप्रभुताओं को बिकने के लिए कई तरह के बाजार हैं, हाई प्रोफाइल नौकरीशाही से लेकर वौद्धिकता के तमाम विश्वविद्यालयीय संस्थानों व एकेडेमियों के रूप में। व्यक्ति मनोवैज्ञानिक रूप से इतना कमजोर बनाया जा चुका होता है कि वह इन संस्थानों में बिकना अपने अनुकूल मानने लगता है और बिना देर किए बिक जाता है। और जब वही काम नारियां करने लगती हैं, तो उसे बुरा कहा जाने लगता है। आखिर मर्दवादी विमर्शकार नारियों को किस काटि में रखना चाह रहे हैं? उन्हें कैसे पता चलेगा कि समाज में फैला हुआ यह जो क्रूर तथा घृणित लिंग भेद है उसे समाप्त किए बिना मानव सभ्यता कभी भी हसीन और खूबसूरत नहीं हो सकती। समझना यह है कि प्रकृति ने मानव सत्ता को अद्भुत वरदान दिया है देह और दिमाग के रूप में। दिमाग का बिकना या गुलाम होना इसे कभी भी नैतिकता और शुचिता के दायरों में नहीं रखा जाता जबकि देह को कम से कम नारियों के संदर्भों में कथित शुचिता और नैतिकता के मकड़जालों में फसा दिया जाता है। नारी विमर्श का मामला भी एक हद तक नारी देह का विमर्श ही बना दिया गया है, सारी बातें नारी के देह पर सुभाषितों की तरह लिखी जाने लगी हैं आखिर इससे मर्दवादी सोच वाले क्या साबित करना चाहते हैं? आज के समय की नारियां अगर पुरुष पराधीनताओं से अलग होकर अपनी स्वाधीनताओं को प्रमाणित करना चाहती हैं तो इसमें बुराई क्या है? वे पत्नित्व न स्वीकार कर मैत्री संबध चाहती हैं तो कौन सा पहाड़ टूट कर गिर जाएगा। संबधों की बात करें तो जाहिर है कि मर्दवादी सोच वालों के लिए नारियों का प्रचलित रूप जो मां वाला है, बेटी वाला है, कभी नहीं अखरता पर वह जो पत्नी वाला उनका रूप है, सारा विमर्श उसी पर केन्द्रित हो जाता है। नारियों का पत्नी बनने से इनकार ही उन्हें मर्दवादी जनों के लिए मुख्य चिंता का विषय है। और कोई दूसरी चिन्ता नहीं। पत्नी बनने से इनकार का मामला बच्चा जनने से इनकार से भी जुड़ा हुआ है। कल्पना करनी चाहिए कि तब क्या होगा इस हसीन दुनिया का जब नारियां एक जुट हो कर बच्चा जनने से ही इनकार कर देंगी, फिर किस आधार पर पुरुष सत्ता अपने पुरुषार्थ की मादकता में झूमेगी? क्या आपको उत्तराधिकारी विहीन पुरुष निरीह नहीं जान पड़ता? पति पत्नी संबधों से अलग पुरुषमुक्त स्त्री समलैंगिकता का मामला हो या स्त्री मुक्त पुरुष समलैंगिकता का दोनों मामले आज के समय में नैतिकता विरोधी खानों में रख दिए गये हैं। ऐसा करना अनायास नहीं है। ये दोनों मामले पुरुष सत्ता के वर्चस्वों को काफी तीक्ष्णता व उग्रता से खंडित करते हैं। ऐसे खंडनों के जरिए पुरुष सत्ता को जान पड़ता है कि उनके द्वारा सृजित यह जो पुरुषवादी समाज है, जो वसीयत और विरासत के आधारों पर आज तक टिका हुआ है, उसकी चूलंे हिल रही हैं। अगर ऐसा हो गया तो उनका उत्तराधिकारी कहां से आएगा जो उनके द्वारा जायज, नाजायज तरीके से अर्जित संपदा का उत्तराधिकारी होगा। वह कहां से गढ़ा जाएगा? स्त्रियों द्वारा मातृत्व का इनकार तथा खुद की अस्मिता बचा लेने की इच्छाएं भी उन्हें स्त्री समलैंगिकता की तरफ ले जा कर पुरुष सत्ता को चुनौती देती हुई सी प्रतीत होती हैं। पुरुष सत्ता का संकट है कि नारियां किस औकात से पुरुषस सत्ता के विरोध में खड़ी हो रही हैं। पुरुषस सत्ता इस विन्दु पर हताश और निराश ही नहीं विकल्पहीन भी है। उसे लगता है कि उसकी बनी बनाई सत्ता ध्वस्त हो रही है जिसे बनाने में हजारों साल लगे होंगे। तो नारीविमर्श का मामला उत्तराधिकार के विमर्श का भी गंभीर मामला है। संपत्ति के उपयोग, उपभोग व प्रबंधन का भी मामला है और यह एक ऐसा मामला है जो दुनिया की पुरुष प्रधान सत्ता को ठेंगा दिखाने वाला है। इसी लिए पुरुष सत्ता हमेशा हमारे भारतीय समाज को जाति और योनि के दो कटघरों में अतीत से ले कर आज तक बांटती रही है। हजारों साल से चली आ रही व्यवस्था का खंडन चाहे नारियां करें या गरीब दोनों समान रूप से समाज के विपथगामी माने जाते हैं। जाति और योनि के दोनों कटघरों ने कभी भी गरीबों को गरीबों की तरह और नारियों को नारियों की तरह अपनी अपनी अस्मिता के बारे में सोचने ही नहीं दिया। काश गरीबों में गरीबी की भूख जग जाती और नारियों में उनके बाबत फैलाए गये नारों से टकराने की हिम्मत आ जाती तो दुनिया बहुत ही हसीन और रंजक बन जाती। दिक्कत यह भी है कि गरीब अपनी उपयोगिताओं से गुंथित खुद की अनिवार्यताओं को नहीं रच पा रहा है। वह जहां खड़ा है, तटस्थ हो कर सूरज उगने की प्रतीक्षा कर रहा है, उसी तरह नारियां भी अपनी ताकतों को नहीं पहचान पा रहीं, न ही अपनी उत्पादकता को संभाल पा रहीं हैं। नारियां तो खुद को भुला दे रहीं है मां और बेटी का सम्मान पा कर जबकि वे हर समय और हर जगह केवल मां और बेटी ही नहीं होतीं। यह रिश्ता तो आज के समय में अपवाद की तरह है, उन गरीबों की मर्यादा की तरह जिनके घर जा कर बड़े बड़े नेता वोट पाने के लिए पानी पी लिया करते हैं या खाना खा लिया करते हैं। इसे मर्यादा की किस कोटि में रखा जा सकता है? यह मान कर चलना होगा कि यह मर्यादा नहीं है, एक धोखा है, नारियों के साथ धोखे किए जा रहे हैं। धोखा है उनके साथ मित्रता पूर्ण व्यवहार न किए जाने का। मुझे तो लगता है कि निश्चितरूप से नारियों ने अतीत में भी किसी समय पुरुष सत्ता को चुनौती देते हुए बच्चा जनने से इनकार किया होगा फिर पुरुष सत्ता ने उन्हंे मनाने और समझाने का प्रयास किया होगा, उन्हें देवी का रूप दिया होगा, उनकी पूजा अर्चना शुरू की होगी और जैसे जैसे पुरुष ताकतवर होता गया उसने नारियों को एक वस्तु में तब्दील करना शुरू कर दिया। नारियों को बाजार में खड़ा कर बेचने और खरीदने लगा। हमारे अतीत को जिस तरह से नारियों के मान सम्मान और मर्यादा को पूजने वाला दिखाया जाता है, वह छल का ही एक रूप है। एक खूबसूरत धोखा है। पहले भी व्यवहार में ऐसा कुछ नहीं था। हमल और हमलों पर टिका इतिहास कभी भी मानव सभ्यता को नर, नारी की समानता का पाठ पढ़ा ही नहीं सकता। नारियां हमल झेलती रही हैं तो जनता हमले, इसके अलावा इतिहास में है ही क्या? वैसे भी यह सुनिश्चित है जो सभ्यता जातिभेद नहीं पाट सकती, वह भला योनिभेद कैसे मिटा सकती है? नारियों के साथ मित्रता का व्यवहार कैसे दे सकती है? योनिभेद तथा जातिभेद दोनों दिखने में अलग अलग दिखते हैं, पर दोनों हैं एक दूसरे के पूरक, एक के बिना दूसरा जीवित नहीं रह सकता। दोनों सम्मिलित रूप से एक दूसरे के औचित्य को प्रमाणित करते हैं। पुरुष सत्ता के कृत्रिम मानसिक विभेदों व प्राकृतिक भिन्नताओं के कारण नारी भले ही पुरुष से अलग योनि की कोटि में होती है फिर भी उसे सायास जाति में तब्दील कर दिया जाता है। इसलिए जातिभेद है तो योनिभेद भी है, और यही योनिभेद आज के समय का लिंगभेद है। सामाजिक संबधों में जो लिंगभेद है उसको हम चाहें तो भाषा और बोलियों के विभिन्न क्रिया रूपों में भी देख सकते हैं। हिन्दी की बात करें तो इस भाषा के क्रियारूपों में लिंगभेद काफी गहरा है, यह भेद संस्कृत में भी है। तो कहा जाना चाहिए कि पुरुष सत्ता ने लिंगभेद को कायम रखने के लिए बोलियों एवं भाषाओं तक को नहीं छोड़ा। वैसे बांग्ला जैसी कुछ भाषाएं/बोलियां ऐसी हैं जिनके क्रियारूपों में योनिभेद या लिंगभेद नहीं पाया जाता है। अंग्रेजी भाषा/बोली में भी यह भेद नहीं दिखेगा। भाषा या बोली के स्तर पर कई ऐसी तमाम भाषाएं या बोलियां हो सकती हैं जिनके क्रियारूपों में लिंगभेद नहीं होगा। उन भाषाओं एवं बोलियों पर गहन अघ्ययन किया जाना चाहिए जिनमें नर और नारी दोनों के लिए एक ही क्रियारूप हों। बांग्ला तथा अंग्रेजी मातृ बोली वाले समान क्रियारूपों वाले समाजों में अन्य मातृ बोली व असमान क्रियारूपों वाले समाजों की तुलना में सामाजिक रूप से लिंगभेद का फर्क नहीं दिखता है या बहुत कम दिखता है। ऐसा क्यों है? सोचने की बात है। भाषा एवं बोली के स्तर पर यह जो लिंगभेद है, कहीं वही भेद व्यापक स्तर पर सामाजिक संबधों को तो नहीं प्रभावित कर रहा? सोनभद्र के आदिवासी समाजों में भी धांगरी बोली प्रचलित है, धांगरी बोली के क्रियारूपों में भी लिंगभेद नहीं दिखता। नर और नारी दोनों एक ही तरह के क्रियारूपों का प्रयोग करते हैं। भाषागत एवं बोलीगत कारणों की परख भी लिंगभेद के कारणों के बारे में सोच को नई दिशा प्रदान कर सकती है। इस आलेख के अंत में मैं विनोदशाही जी के विचारों का भी संदर्भ देना आवश्यक समझता हूं। उनका मानना है.... ‘हिन्दी आलोचना में अभी ‘स्त्री विमर्श’ को ‘सभ्यता विमर्श’ की तरह सोचने समझने की कोशिश करने वाली सजगता नहीं दिखायी देती। हमारा (भारतीय) यह विमर्श गोया अभी ‘स्त्री’ देह के आस पास ही केन्द्रित हुआ पड़ा है। यहां से आगे जाने के लिए रास्ते और दिशाएं तो स्पष्ट हैं पर उन पर कम लोग ही चलना चाह रहे हैं। दर असल यह जो आगे जाने वाला रास्ता है स्त्री से ‘स्त्रैण’ में और फिर ‘स्त्रैण से सभ्यता में’ छलांग लगाने से आगे खुलता है।’ यानि हम पहले देह से ‘मानसिकता’ में उतरते हैं फिर वहां से ‘सामूहिक चेतना’ में परन्तु हमारे यहां गहराइयों को अमूर्त कह कर खारिज कर देने का रिवाज जैसे एक अपसंस्कृति की तरह पनपता और डसता जाता है।’
जाहिर है भारतीय चिंतक विनोदशाही जी भी भारतीय नारी विमर्श के तौर तरीकों पर सवाल खड़ा करते हैं और कहते हैं कि जब तक नारी विमर्श को सभ्यता विमर्श की तरह मूल्यांकित और प्रतिष्ठित नहीं किया जाता तब तक नारीविमर्श मात्र देह का विमर्श बना ही रहेगा और वही हो रहा है।’
नारीविमर्श को हमें निश्चित रूप से नारी देह के कौतुकों, रहस्यों, देह से उभरने वाले प्रतीकों की मानसिकताओं से तथा नारी को नारा बनाने वाले नारों से बिल्कुल अलग, उन्हें प्रकृति का एक बेहतर उत्पाद मानकर ही आगे बढ़ाना होगा। इतना ही नहीं नारी विमर्श को मानव सभ्यता का विमर्श बनाना ही होगा। सभ्यता के विमर्श के द्वारा ही यह बात निकल सकती है कि नर, नारी संबधों में यह जो पति, पत्नी वाला रूप है, यह जो परिवार गढ़ने वाली वैवाहिक रीतियां हैं, क्या वे नर, नारी के मित्रतापूर्ण रिश्तों के लिए उपयुक्त हैं? अगर नहीं तो विमर्श सभ्यता पर ही तो होना चाहिए न कि नारियों द्वारा लगातार अर्जित की जाने वाली स्वतंत्रताओं पर। आखिर यह जो स्वतंत्रताओं का आकाश है, स्वतंत्रताओं की आकांक्षाएं हैं, केवल नर के लिए ही तो नहीं हैं वे सभी के लिए हैं यानि नारियों के लिए भी तो हैं। इस लिए जरूरी है कि मर्दवादी नारों में किकुड़ियाये नारी विमर्श को खुली हवा में लाया जाये। यही समय की मांग है और जरूरत भी।
कथा विमर्श और आज के जरूरी सवाल
रामनाथ शिवेंद्र
दुनिया बदली है और उसके साथ हमारे चिन्तन और विमर्श के आयाम भी बदले हैं। इन बदलावों ने मानव सभ्यता को दिया क्या है, यही सोचने की बात है। ज्ञानमीमांसा के सारे क्षेत्र जो समाजनीति, अर्थनीति, शिक्षानीति, राजनीति और विज्ञान जैसे वौद्धिक क्षेत्रों के उत्पाद हैं, हम देख रहे हैं कि ये सारे के सारे हमारे सिर को छूते हुए निकलते जा रहे हैं। हम पहले भी सत्य की खोज में लगे थे यही सत्य की खोज ने ज्ञानमीमांसा का विषय और चिंतन के रूप में विस्तार किया है। दुख है कि हम आज तक सत्य और परम सत्य की खोज नहीं कर पाये हैं। जगत मिथ्या वाला सत्य तो कब का अपनी आध्यात्मिक व्याख्याओं की खोह में दुबक चुका है। चरम भौतिकता के दौर में उस सत्य का कोई मतलब भी नहीं। आज जो सत्य हमारे सामने मुह बाए खड़ा है, वह है अपनी पीठ ठोंकने वाला, अपने में डूबने वाला, अपना ही भला चाहने वाला। आज के सत्यज्ञानियों और सत्यखोजियों द्वारा हमें बताया जा रहा है कि हम बाजारवाद और वैश्वीकरण के गिरफ्त में हैं और पूंजी के क्रीड़ा कौतुक बनते जा रहे हैं पर क्या इतना ही सच है। दर असल यह जो ज्ञान मीमांसा का मामला है यह है क्या आखिर? यह समाज को किस तरह से प्रभावित करता है या अपनी गिरफ्त में लेता है, क्या आज के दौर में हम पहले से प्रभावी ज्ञानमीमांसाओं से या दूसरे शब्दों में अतीत से खुराक नहीं ले रहे जिनमें हमारे पुरखों के कथात्मक तथा काव्यात्मक वर्णन हैं, शौर्यगाथा या शोक गाथा के रूप में। क्या हम उसे थोड़़ा आधुनिक तथा अपने अनुकूल बना कर उसी में गोते नहीं लगा रहे? क्या ल्योतार ने महाख्यानों के अंत की बात बदलती दुनिया को और बदल जाने तथा मानवीय समीपताओं की सारी सीमाओं को फलांग जाने के कारण कहा है। इन बातों को समझने के लिए हम कथासाहित्य के विमर्शों को आधार बना सकते हैं और समझ सकते हैं कि महाख्यानों वाली दुनिया से हमारा कथासाहित्य कितना दूर और कितना करीब है? पहली बात तो यह समझना और बूझना जरूरी है कि महाख्यान है क्या चीज? महाख्यान को हम इसके सरलीकृत व्याख्या के आधार पर समझ सकते हैं कि ऐसे वौद्धिक करतब, सिद्धांत, राजनीतिक कार्य पद्धतियां जिसने सारी दुनिया को हिलाने का काम किया हो, वही महाख्यान है। इस संदर्भ में हम मार्क्सवाद को उद्धृत कर सकते हैं। अपने समय से लेकर आज तक मार्क्सवाद सारे वौद्धिकों को उद्वेलित करता रहा है। इसके अलावा महाख्यान का एक रूप विज्ञान के कौतुकों में भी दीखता है। वैज्ञानिक करतबों ने भी दुनिया को हिलाने डुलाने का का काम किया है। विज्ञान के किसिम किसिम के उत्पादों ने दुनिया में आशा बढ़ाई है कि यह जो दुनिया है बदल सकती है पर दुनिया किस तरह से बदलेगी और किनके लिए बदलेगी, इसके बारे में सारे ज्ञानमीमांसी खामोशी साध लेते हैं और वौद्धिकता की गुफा में घुस जाते हैं। ऐसे बदलावों से हमारा कथासाहित्य भी गहरे तक प्रभावित रहा है। कहानियां जो भी चर्चित र्हुइं उनमें बाजार, विज्ञान तथा मार्क्सवाद के कौतुकों को देखा जा सकता है पर उन बिन्दुओं को चर्चित कहानियों में नहीं देखा जा सकता जो आज जनान्दोलन का रूप घर रहे हैं और कदाचित उन्हें कथाविमर्श का आधार बनाया गया भी तो उनमें आज के जरूरी सवाल जो महाख्यानों के पूर्व भी मानव सभ्यता के लिए जरूरी थे जैसे संपत्ति के सवाल, भूमि के सवाल, और नारी के सवाल इन्हें विमर्श में शामिल नहीं किया गया। इन्हें प्रतिआख्यान की श्रेणी में डाल कर हासिए पर फेंक दिया गया। मार्क्सवाद हालांकि द्वन्दात्मक भौतिकवाद की बात अवश्य करता है पर दुनिया कैसे बदलेगी इसके लिए वह जिन तरीकों की बात करता है वह मानव सभ्यता के मानसिक बुनावट के अनुकूल नहीं लगता। मनुष्य को मशीन की तरह नहीं चलाया जा सकता और किसी ऐसे काम में नहीं लगाया जा सकता जो मानसिक गतिविधियों, मन के आग्रहों और धारणाओं के विपरीत हों। मन तो स्वमेव अहिन्सात्मक होता है और मानवीय समीपता का पक्षधर भी सो वह एकांगी हो कर किसी मशीनी कार्यप्रणाली का पक्षधर नहीं हो सकता। किसी काल्पनिक समानता के लिए अकाल्पनिक कार्यप्रणालियों को नहीं स्वीकार कर सकता। भौतिकता का दर्शन अधि-आत्मिक मानस को लम्बे समय तक मशीनी कार्यपद्धतियों की तरफ नहीं टहला सकता। और इसी बिन्दुपर मार्क्सवाद आलोचना का शिकार हो जाता है वैसे यह सच है कि मानवीय समीपता के लिए राजनतिक व सामाजिक दोनों रूपों के द्वारा प्रयास किये जा सकते हैं, जो किये ही नहीं गये और नही किये जा रहे हैं। यही बिडंबना है। हमारे कथासाहित्य में मार्क्सवाद तथा विज्ञानवाद दोनों दीख पड़ते हैं, पर वे दोनों पुरुषवाद के पनाहगाह में हसियां हसते, गाते और नाचते ही दीखते हैं। पुरुषवाद की मांद में छिप कर सारे कथातत्वों को कहीं से उठा कर कहीं चस्पा कर देना वैसे भी आसान होता है। कथानायक या नायिका दोनों चाहे जितनी भी विषम परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों पर वे पुरुषवाद के बाहर कभी निकल ही नहीं पाते उसी में चक्कर लगाते दीखते हैं। पुरुषवाद का जहर परिवारवाद के मुॅह से निकलता है और यही पुरुषवाद पूंजीवाद से खुराक हासिल कर सामन्ती चरित्र का बन जाता है। जैसा कि पता है कि यह जो सामंतवाद है दुनिया का सबसे भयानक रोग है जो व्यक्ति को व्यक्ति तो बना देता है पर मनुष्य नहीं बने रहने देता। व्यक्तिवाद मनुष्यता लीलने के सबसे सुगम रास्ते का निर्माण करता है जो सभी को प्यारा भी लगता है। पुरुषवाद की व्याख्या व्यक्तिवाद में छिपी होती है और इसी व्यक्तिबाद के भीतर जनकल्याण लोककल्याण की तमाम लुभावनी बातें टहलती रहती हैं। यह जो परोपकार वाला मामला है बहुत सरल और आसान नहीं है बहुत ही जटिल और गड़बड़ है। ऐसा इसलिए है कि परोपकार को व्यक्ति के मूल्यांकन का जाने अनजाने हम आधार बना लेते हैं। भावुकता में डूब जाते हैं। ऐसी भावुकताओं से परिपूर्ण परोपकारी, दुख हरण, मनोवैज्ञानिक रूप से संवेदित करने वाली कहानियों को हम पढ़ रहे हैं और ऑसू बहा रहें हैं पर नहीं सोच पा रहे कि आदमी इतना समर्थ कैसे हो गया जो परोपकार करने लगा आखिर वह किसकी और किस तरह की पूंजी पर कुण्डली मार कर बैठा हुआ है? परोपकार, दुत्कार या तिरस्कार सभी समर्थ आदमी के अमानवीय करतब हैं जिसके विरूद्ध हम कुछ कर सकने में समर्थ नहीं होते। इतना ही नहीं अपनी पूंजी की सुरक्षा के लिए पुरुषवाद नेे तमाम तरह के प्राकृतिक दिखने वाली व्यवस्थाओं को भी सृजित कर लिया है। उसी में हम पिस रहे हैं। राजा का बेटा राजा, बाभन का बेटा बाभन, बनिया का बेटा बनिया और आधनिक दौर में कलक्टर का बेटा कलक्टर, मुख्यमंत्री का बेटा मुख्यमंत्री आदि व्यवहारों के अलावा भी यह जो वसीयत या उत्तराधिकार का मामला है आखिर यह मानव सभ्यता में कैसे शामिल हो गया क्या इसे पुरुषवाद का मजबूत औजार नहीं माना जाना चाहिए अगर ऐसा मान लिया जाता है फिर तो कहानियों को कथित उत्तराधिकार की साजिश का पर्दाफास भी करना चाहिए पर ऐसा नहीं हो रहा। कहानियों के माध्यम से भूमि के अधिकारों के बारे में भी सवाल नहीं किये जा रहे और जो सवाल उठाये भी जा रहे है वे ‘सभै भूमि गोपाल की’ अवधारणा से बाहर के हैं ‘रुपया हाथ का मैल है’ यह तो आज के समय के लिए एक भूली हुई कहावत भर है। कहानियों के वौद्धिक विमर्श नारी देह पर बौद्धिक लेप लगा रहे हैं और उनकी आजादी की बात कर रहे हैं, नारी के मन और तन दोनों की आजादी की पैरवी कर रहे है उन्हें पता होना चाहिए कि नारी तब तक आजाद नहीं हो सकती जब तक पुरुषवाद का घातक औजार उत्तराधिकार सामाजिक व कानूनी रूप से प्रभावी है। टकराना हो तो पार्टनर! उत्तराधिकार जैसे रोग से टकराओ जो पुरुष को प्रकृति से अलग आधुनिक पुरुष बनाता है। यही उत्तराधिकार आज के समय का भयानक रोग बन चुका है, इसी उत्तराधिकार ने पहले भी मानवीय समीपता के तमाम कारकों का सफाया किया था और आज भी कर रहा है वर्ना आदमी तो पहले भी आदमी था पर जब वह उत्तराधिकार विशेषाधिकार जैसे निष्ठुर और अप्राकृतिक तथा ताकत के बल पर प्राप्त किये गये अधिकारों से लैश होता है फिर तो वह आदमी ही नहीं रह जाता। पुरुष को तो प्रकृति वैसे भी अपने आप बहुत कुछ दे दिया करती है, प्रकृति और पुरुष के रिश्ते को वैसे भी विशेषाधिकार तथा उत्तराधिकार जैसे मानव सृजित कुटिल अधिकारों की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। यही तो आज के समय के पूंजीवाद की साजिश है जिसे समझना चाहिए। पूंजीवाद अपने औजारों को समय के अनुसार लगातार धार देता रहता है। वह धार देता है लोककल्याण के नाम पर, जनहित के नाम पर, इतना ही नहीं वह लोकतंत्र के नाम पर भी आपने प्रिय होने की धार चढ़ाता रहता है। इस धार को आसानी से समझा जा सकता है कि लोकतंत्र, किसका लोकतंत्र, संसद में बैठे हुए कुछ लोगों का, बड़ी बड़ी कंपनियां चलाने वालों का, संसदीय प्रणालियों द्वारा अपने हितों की सुरक्षा के लिए कानून बनवा लेने वालों का या मनचाहे ढंग से चुनी हुई सरकारों को गिरवा देने वालों का। चुनाव संपन्न हो जाने तथा सरकार गठित हो जाने के बाद हाथ मलती जनता आज के समय में मौजूदा लोकतंत्र के किस बिस्तरे पर अपना हाथ पैर फैलाये इसके बारे में कौन जबाब देगा? इस बात का भी कौन जबाब देगा कि यह जो आदमी और आदमी के बीच आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक रूप से भयानक खांई है इसके लिए कौन उत्तरदायी है? क्या जनता खुद या जनता पर राज करने वाले लोग। बहुमत कितनी कलात्मकता के साथ अल्पमत में बदल जाता है और एक खेल की शक्ल ले लेता है इसे आपातकाल वाले दौर में देखा जा चुका है। इसे उन घोटालों की शक्ल में भी देखा जा सकता है जिसे लोकतंत्र के बरगद के नीचे किया गया और नये किस्म के घोटालों के लिए जमीन भी तैयार की गई। सारे घोटाले अल्पमत की बहुमत पर जीत की तरह होते हैं, घोटालों और भ्रष्टाचारों के आगे बहुमत पानी भरता दीखता है। क्या कर लेगा बहुमत देश में होने वाले घोटालों के बाबत। अफसोस इस बात का है कि यह जो आज के समय का सच है वह कहानियों में नहीं आ रहा, कहानियों के माध्यम से नहीं बताया जा रहा कि बहुमत तो केवल देखने की चीज है, असल मामला अल्पमत का है। निर्णयात्मक क्षमताओं से लैश अल्पमत का निर्माण किसी नाटकीय परिघटना की तरह है जो अपने असली रूप में ब्यक्ति केन्द्रित हो जाता है और कल्माड़ी जैसा आरोपी उत्पादित करता है। घोटाले की राजनीति बहुमत पर संविधान सम्मत ताकतवर अल्पमत (मंत्री, प्रंधानमंत्री, कलक्टर आदि सभी अल्पमत के प्रतिनिधि हैं) की जीत है। बहुमत के पास तो सिवाय वोट देने के कोई दूसरी ताकत तो होती ही नहीं, उसके पास कोई विशेषाधिकार नहींे होते और वोट देने या चुनाव कराने का जो मामला है वह भी बहुमत की मर्जी का नहीं है। तमाम देशों में देखा जा रहा है कि चुनाव को ही खारिज कर दिया जा रहा है यानि लोकतंत्र में भी तानाशाह बनने की प्रवृत्ति कहीं न कहीं मौजूद रहती है। लोकतंत्र में उपजने वाली लोकशाही जो अप्रत्यक्ष रूप से तानाशाही की बिरादरी की ही होती है उसे कैसे रोका जा सकता है, इसे भी कहानियों का विषय बनाया जाना चाहिए। विषय तो प्रेम को भी बनाया जाना चाहिए जिसका अंत पुरूषवाद की जटिल परंपरा विवाह में जा कर होता है और घर से पलायन करने वाले नायक और नायिकाओं को अंत में परिवार में ही शरणागत होना पड़ता है, उन्हें भी जाति बिरादरी, मॉ बाप आदि का आशीर्वाद लेना पड़ता है फिर यह जो घर से भागना है वही क्यों? प्रेम तो किसी भी सामाजिक वर्जना को नहीं स्वीकारता फिर भी वर्जनाओं के कटघरों में खड़ी कहानियों से उसका लेखक अखिर क्या निष्कर्ष निकालना चाहता है, सोचना होगा। प्रेम में जो सेक्स का मामला है वह तो होगा ही, वह कहानियों में किस तरह से आ रहा है और किस तरह से उसे आना चाहिए हालांकि इस पर बहसें हो रही है और अद्भुत किस्म की कहानियां भी रची जा रही हैं पर बेजान तब हो जाती है जब उन्हें जातिवादी, परिवार वादी बिडंबनाओं में झोंक दिया जाता है। लगता है प्रेम की प्राचीन व्याख्या के लिए ऐसा किया जाता है, जब कि प्रेम को कथातत्वों तथा परिस्थितियों द्वारा निहायत आधुनिक बनाया जाता है। लगता है कि प्रेम किया नहीं जाता है, हो जाता है, प्रेम में तन नहीं होता केवल मन होता है। जाहिर है प्रेम और विवाह दोनों दो चीजे हैं उन्हें एक में गूंथा नहीं जा सकता। विवाह एक सामाजिक व्यवस्था है, जो पुरुषवाद का एक सशक्त औजार है। जो परिवारवाद तथा वंशवाद का सृजन करता है उसी से जुड़ा हुआ है उत्तराधिकार का कानूनी व सामाजिक रूप। अगर महाख्यानों का अंत हो चुका होता तो यह जो प्रेम है उसका आखिरी पड़ाव विवाह नहीं होता वह परिवारवाद या वंशवाद का मुखापेक्षी नहीं होता। जाहिर है हम आज भी महाख्यानों के दौर में हैं और पूंजी के क्रीड़ा कौतुकों के खिलाड़ी हैं। उसी खेल में हम राजनीति के तमाशा हैं तो कहानियों के शीर्षक और कविताओं के भावार्थ हैं। हमारा अपना कुछ नहीं जो हमारी कृति को प्रकृति से जोड़ता हो। हम आज भी संपत्ति के करिश्माई खेलों उससे उपजे अधिकारों, विशेषाधिकारों के नरम बिस्तरों पर नाचने के आकांक्षी है और जन से जुड़े, जाति, मजहब, संपत्ति आदि के सवालों पर खामोश हैं तथा हमारा रिश्ता ऐसे आन्दोलनों या अभियानों से तो कत्तई नहीं है जो मानवीय समीपताओं के लिए चलाये जा रहे हैं। काश! हम मानवीय समीपताओं के पक्ष में अपनी कहानियों को खड़ी कर सकते और भूमि, संपत्ति तथा नारी के सवालों से टकराते हुए यह जो पूंजी का मामला है उसके जालों को काट पाते और एक नये तरह का महाख्यान रच पाते। पर हमें लगता है आज भी वारेनहेस्टिंग्स का सॉड़ बिना रोक टोक कहानियों एवं उपन्यासों के रथ पर सवार हो कर हमारी निगरानी कर रहा है।
कथा का समाजशास्त्र और तीसरी दुनिया
रामनाथ शिवेंद्र
साहित्य और समाज के रिश्तों पर सवाल उठाना न तो पहले जायज था और न आज ही है पर अब सवाल उठाना जायज हो गया है, क्योंकि आज का समाज पहले वाला समाज नहीं है। आज के समाज का जो ताना,बाना है, इसे संचालित करने, निर्देशित करने की व्यवस्था है, उस व्यवस्था को कुदरती प्रबंधन से जबरिया छीन कर एक ऐसे मानवकृत प्र्रबंधन में डाल दिया गया है जिसे सामान्य रूप से राजनीतिक प्रबंधन कहा जाता है। अब समाज राजनीतिक प्रबंधन में है। यही राजनीति, समाज को चालित संचालित, निर्देशित भी कर रही है। मनुष्यों के लिए किसिम किसिम की मनमानी नीतियों को लागू करते हुए सर्वकल्याण की धोखेपूर्ण बातें भी कर रही है। फिर तो उस राजनीति को समझने के लिए हमें उस ग्रामगणराज्य समाजप्रबंधन को समझना होगा जो भारत के लिए अब अतीत का विषय हो चुका है। हमें ध्यान रखना होगा कि हमारा अतीत लोककथाओं, लोककलाओं, लोकविद्या तथा लोकसंस्कृति वाला था और उस समय का लोकसाहित्य, लोकसंगीत, समाज के सहसंबधों का दस्तावेज हुआ करता था यानि तब सहभागी समाज व्यवस्था पर किसी मानव रचित व गढ़ित राजनीति का प्रभाव नहीं था। कुल मिला कर उस दौर में मानव संसाधनों व कुदरती संसाधनों के दोहन के लिए तकनीकी कौशलों से युक्त संस्थान नहीं हुआ करते थे। सारे कुदरती संसाधन, नदी, पहाड़, जंगल, हवा, पानी सारा कुछ समाज के आधिपत्य में हुआ करता था पर अब वैसा समय नहीं रह गया है। आज तो सारे कुदरती संसाधनों पर किसी न किसी निजी कंपनी या कंपनियों को राज्याश्रित कानूनों द्वारा संरक्षित मालिकाना दे दिया गया है। मानवसभ्यता का द्वन्द यही है कि कुदरती संसाधनों पर मालिकाना किसका रहे।? मालिकाना के संस्थापन को कथित विकास के नाम पर आज के समय में कुदरती (मिथक की तरह) बना दिया गया है, जैसे विकास तथा मालिकाना दोनों एक दूसरे के अन्योन्याश्रित ही नहीं पर्याय भी हों। तो ऐसे कठिन समय में जब खुलेआम कुदरती संसाधनों पर निजी मालिकाना स्थापित कराये जा रहे हों, तकनीकी कौशलों को कुदरती संसाधनों के अधिकतम दोहन के लिए जरूरी बताया जा रहा हो, सार्वजनिक रूप से मानवजनित कौशलों व क्षमताओं को नकारा जा रहा हो फिर तो साहित्य के लिए अनिवार्य रूप से अनिवार्य है कि वह समाज को व्याख्यायित करने के लिए राजनीति की खोल में दुबकी सत्ताव्यवस्था की सारी पर्तों को खोले और राजनीतिक प्रबंधन में उगने वाली समाज की विडंबनापूर्ण स्थितियों, परिस्थितियों का खुलासा करे। क्योंकि आज के समय में चाहे मालिकाना स्थापित करने के सवाल हों या मालिकाना से बेदखल करते हुए सामान्य जन को उजाड़ने के सवाल हों, देशी विदेशी कंपनियों को कानूनी बना कर कुदरती संसाधनों के दोहन करने के अधिकार देने के सवाल हों, ये सब सत्ता के ही क्रीड़ा कौतुक हैं। तो यह जो सत्ता है, आज वही समाज को चालित संचालित कर रही है और समाज उसके प्रबंधन में रहने के लिए अभिशप्त हो चुका है। साहित्य के प्रति समर्पण के नाते हमें ऐसा करना भी चाहिए, आज के कठिन समय में हमारे साहित्य का समाजशास्त्र बदल चुका है, चाहे सवाल कथा का हो या कविता का, इतना ही नहीं आलोचना का समाजशास्त्र भी बदल चुका है। साहित्य के बदले हुए समाजशास्त्र के बारे में हम यहां बात करना चाहेंगे तथा उन जटिल परिस्थितियों की तरफ संकेत भी जो हमारे देश के साहित्य के लिए अनिवार्य रूप से अनिवार्य हैं। जाहिर है कि तकनीक की बारीक पर्तों, दर पर्तों को खोल लेने के दावे करने वाली आज की दुनिया, वसुधैव कुटुम्बकम् तो बहुत दूर चित्त और चेतना, विचार और व्यवहार, लक्ष्य और साधन, प्रकृति और पुरुष, तन और मन, समय और समाज आदि संदर्भों में मानवीय समीपता की पक्षधर तो कम से कम नहीं दीख रही है, और न ही मानवीय आदर्शों के प्रति दिखावटी ही सही आग्रही ही दीख रही है। आज की दुनिया संसाधनों व सुविधाओं की गुलामी में उलझी हुई अपनी वैयक्तिक संप्रभुता के कुत्सित फैलावों में जुटी हुई मानवीय समीपता के सर्वग्राही कुदरती नियमों को प्रतिस्पर्धाओं के बहाने निरंतर ठेंगा दिखा रही है। ‘एकला चलो’ वाली हमारी दार्शनिक संस्कृति अचानक ‘मैं’ के रूप में बदल जाएगी इसका आभास दूर दूर तक नहीं था। ‘मैं’ केवल ‘मैं’, मेरा काम, मेरा लाभ, मेरा हित ऐसा किसी भी मानव सभ्यता के अतीत में प्रस्तावित नहीं था, जो था, जो है सारा कुछ सभी का है सभी के लिए है, इसी बुनियाद पर समाज की नींव डाली गई थी, फिर कुटुम्ब बना था, कुटुम्बों के संगठन वाली सहयोगी व सहभागी संरचना से दुनिया की तस्वीर बनी थी, पर हाय रे दुनिया! आज वह दुनिया नहीं है। आज की दुनिया ‘मैं’ के घृणित आभामंडल में खुद को चॉद सितारा बना लेने के प्रयासों में सर्वसमाज की पीठ पर भाई चारे के पाठों के पोस्टर चिपका रही है। आज की दुनिया कम से कम दो खानों में तो निश्चितरूप से विभक्त है पहला खाना है एक ऐसी दुनिया का जिसमें मानव संसाधनों के समुचित व बराबरी के स्तर पर उपयोगों के बारे में सत्ता प्रबंधन की तरफ से निराशाजनक उदासीनता है तथा उपेक्षा है, तो दूसरा खाना है एक ऐसी दुनिया का जो अपने से इतर दुनिया के सारे मानव समाजों को तकनीकी संहारक कौशलों के द्वारा भयभीत कर अपने आधिपत्य को पोख्ता बनाए रखने के प्रयासों में सारे तकनीकी कौशलों को आजमा रही है। गोया आज की दुनिया का माहौल पहले वाला सर्वहितकारी, सहयोगी व सहभागितापूर्ण नहीं है जिसे वसुधैव कुटुुम्बकम्् के रूप में हम जानते हैं। आज हमारे सामने एक ऐसी कथित विकसित दुनिया है जो किसिम, किसिम के जनसंहारक हथियारों से लैश होकर अपनी संहारक क्षमताओं के प्रदर्शनों के उत्सवों को चॉद पर मनाने के लिए बेचैन है तथा इसे प्रमाणित करने के लिए हमारे जैसे देशों (तीसरी दुनिया के देशों) का चयन किया करती है तथा कर रही है। जाहिर है उसे ऐसे ही देश या भूगोल अनिवार्य रूप से चाहिए होते हैं जो अपने प्राकृतिक संसाधनों का ही नहीं, अपने मानव संसाधनों का भी समुचित प्रयोग तो दूर आंशिक प्रयोग भी अपनी जनता के हितों के लिए नहीं कर पाते हैं या कर पा रहे हैं। हमारा आशय तीसरी दुनिया के देशों से है खासतौर से उन देशों से जहां आज भी भूख और कर्ज से दबे किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, वे पढ़ाई करने के बजाय अपने मां बाप के कामों में सहायता करने के लिए विवश हैं। एक ऐसा हताश देश जहां मतदान करने की अनिवार्यता के बारे में लोगों को सिखाने पढ़ाने की आवश्यकता पड़ रही हो, जहां आजादी के सातवंे दशक में भोजन का अधिकार, सूचना का अधिकार व शिक्षा का अधिकार दिखावटी तौर पर विधिक बनाया जा रहा हो। एक ऐसा देश जहां आज भी शिक्षा का स्तर केवल साक्षर होना हो और जीवन निर्वाह के लिए पेट की आग में झुलसती जनता को घृणित मात्रा में सरकारी संस्थानों द्वारा खाद्यान्न वितरण योजनांए चलाई जा रही हों। जहां चालीस फीसदी घरों में आज भी दो जून का खाना नहीं पक रहा हो। जाहिर है, एक ऐसा देश जहां मानव संसाधन के उपयोग को पूरी तरह से नकारा जा रहा हो तथा विकास के एकांगी लक्ष्यों को मशीनी कुशलता से पूरा करने के प्रयास किए जा रहे हों। परोक्ष रूपसे मानव संसाधन को बेरोजगार बना कर उनकी कार्य क्षमताओं को विकलांग बनाया जा रहा हो। कुल मिला कर ऐसे देश की तस्वीर पर आप चाहें भी तो कोई रंग नहीं लगा सकते, वसंती वाला, फागुन वाला या कजरी वाला कोई भी। ऐसी कुत्सित सामाजिकता पर रंग लगाने के लिए किसी खास तथा प्रिय रंग का चुनाव आप नहीं कर पायेंगे। जाहिर है हम ऐसे ही भूगोल तथा देश के लोग हैं जहां मौसम के हसीन करतबों के सहारे ही खुद को जीवित बचाए रखना है और अपने अतीत को पीठ पर बांधे हुए शौर्य तथा वलिदान के गीतों को गाते रहना है। शायद हम ऐसा कर भी रहे हैं। हम एक ऐसे देश के लोग हैं जहां एक पहाड़ी की कीमत हजारों लाखों मनुष्यों से कहीं अधिक है, नदी का पानी हमारे ऑसुओं से कीमती है क्योंकि वह कुदरती संसाधन है, पहाड़ी के भीतर छिपा खनिज हमारे कलेजे और किडनी से कीमती है। सो हम किसी शोकगाथा की तरह हताश और निराश हैं तथा मनुष्य होने के बोझ से दबे हुए विकल्पहीन हैं, हमारे लिए जीवन जीने और जीते रहने के सुलभ विकल्पों की कोई चादर नहीं है। फिर भी मनुष्य जीवन जीने और जीते रहने के संभव समाधानों से खुद को अलगिया कर अपनी इहलीला समाप्त करने की योजना नहीं बनाता। वह जीवन जीते रहने के सपने देखता है क्योंकि वह खुद कहानी होता है। इसीलिए अपनी कहानीपना की हिफाजत में नाना प्रकार के सपने भी देखा करता है, वह सपने देखता है, समाज के बारे में तो कभी खुद के बारे में कि उसे समाज के साथ किस तरह के रिश्तों का निर्वहन करना चाहिए तथा खुद को किस तरह से संवारना व दुलारना चाहिए। ऐसा करते हुए वह अपना सारा जीवन दुखों से लड़ता हुआ, रोता, चीखता, चिल्लाता हुआ या तकलीफों में गोते लगाता हुआ या सुखों के अपने रचे गढ़े मानकों को निर्मित करता हुआ गुजार देता है। पर खुद को संभाले रखने या समय के साथ टकराने के जितने कौशलों का प्रयोग वह करता रहता है, उससे कितना आश्वस्त रहता है इसका उसके पास कोई गंभीर मूल्यांकन नहीं होता। यही है तीसरी दुनिया के मनुष्यों का सच। ऐसा मनुष्य अपनी दयनीयता, निरीहता व असमर्थता को दैवीलीला मानने से भी खुद को नहीं रोक पाता, जो किस्मत में लिखा होता है वही मिलता है या उसे भोगना ही पड़ता है। इसी सारतत्व में गोते लगाता हुआ समानता, स्वतंत्रता, बन्धुत्व के नारों में फसा तीसरी दुनिया का आदमी अपना जीवन बिताने के लिए विवश है। मनोवैज्ञानिक विश्लेषणों, निष्कर्षों तथा समाधानों को परखने के आधार पर कहा जा सकता है कि मनुष्य के चेतन तथा अचेतन मन में जाने अनजाने अंखुआने वाले सपने जो कहानी की शक्लधारी होते हैं, बिना किसी प्रयास के जड़ जमाए रहते हैं। वे सपने आभासी मात्र नहीं होते, कभी कभी सकारात्मक परिणामों व उपलब्धियों के हेतु बनते भी दिख जाते हैं सवाल है कि सपनों के रूप में ये कहानियां मनुष्य के मन में कैसे प्रवेश कर जाती है? सवाल यह भी है कि क्या उन कहानियों से मनुष्य का कोई रिश्ता बनता है जो उसे प्रभावित करती हैं। शायद इस तरह से सपनों को विश्लेषित करते हुए सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का काम मानव सभ्यता करती रही है। आज के जटिल समय में देश तथा उससे जुड़ी राष्ट्रीयता किसी सपने की तरह नहीं जान पड़ सकती है पर कभी यही राष्ट्रीयता सपना थी, इसी सपने को हासिल करने के लिए हम अपने पुरखों के परिणामकारी प्रयासों को कŸाई नहीं भूल सकते और भूलना भी नहीं चाहिए। यही राष्ट्रीयता का सपना हमें अपने अतीत की तरफ ले जाता है जो काफी संघर्षपूर्ण व उलझन भरा रहा है। हमारे पुरखों ने राष्ट्रीयता के सपने को सच करने के लिए उस समय के खतरनाक जनसंघर्षाें को जिस तरह से गतिमान किया या संचालित किया वह दुनिया के लिए किसी उदाहरण से कम नही। यानि वह वही समय था जब मनुष्य अपने सपनों को चरितार्थ करने के लिए तत्कालीन सत्ता प्रबंधन से टकाराते हुए खुद कहानी बन रहा था। यही कहानी आने वाले समय के लिए प्रेरक बन जाएगी हमारे पुरखों को पता भी था या नहीं साफ साफ नहीं कहा जा सकता। वैसे भी आने वाले समय के लिए हमारे पुरखे जो कहानी बन रहे होते थे वे आजकल के प्रायोजित मानवों की तरह होते ही नहीं थे, वे तो अपने सपनों के लिए लड़ रहे होते थे, भला ऐसे में उन्हें क्या पता होगा कि उनकी कहानी का क्या होगा? वैसे भी आज के समय में तो सारे सपने खुद की पीठ पर टंगे हुए होते हैं। समाज की राष्ट्रीयता जैसी तस्वीर रचने व गढ़ने वाले सपने अब होते ही कहां हैं? दुखद है कि हम आज ऐसे समय में है जब हम उन्हीं सपनों में गोते लगा रहे हैं जो हमें हर समय चूमते चाटते रहें तथा विपरीत परिस्थितियों में भी आज्ञाकारी बने रहें। सपनों को भी आज्ञाकारिता व अनुशासन के दायरों से बाहर न निकलने देने वाला हमारा समय कई मायनों में हमारे लिए किसी शोकगाथा से कम नहीं होता पर हमारी अभिशप्तता उसे महसूसने ही नहीं देती। आजादी के दौर वाले सपनों की बात करें तो उस समय हमारे पुरखों के सामने खुद तथा राष्ट्र को मुक्त कराने के अनिवार्य व महत्वपूर्ण कार्यभार थे पर आज हमारे सामने किस तरह के सपने हैं, और अगर सपने हैं भी तो क्या हम उसके बारे में जानते हैं? क्या हम अपने सपनों का मूल्यांकन करते हुए सपनों के साथ गतिमान रहने की कला जानते हैं? इस बारे में हमें सोचना व गुनना होगा। तो यह है आज के समय की कथा का समाजशास्त्र। ऐसा नहीं हैं कि हम आज के वैयक्तिक कुटिल प्रतिस्पर्धा वाले समय में सपने देखने की आदतें खो चुके हैं, ऐसा कŸाई नहीं है, ऐसा गुनना अप्राकृतिक होगा, ऐसा हो ही नहीं सकता। मनुष्य है तो वह सपने देखेगा ही और हम सपने देख भी रहे हैं पर आजादी के पहले वाले सपनों और आज के समय के सपनों में बेमेल घालमेल हो गया है। किसिम किसिम के वैचारिक रसायनों ने सपनों की प्रवृŸति व प्रकृति को बदल दिया है। आधी सदी गुजर चुकी है पर हम आने वाले समय से टकराने के बाबत सावधान नहीं हैं। हमें यह भी नहीं पता कि राष्ट्र के सवाल पर, केवल राष्ट्र के भूगोल को बचा लेने का काम ही राष्ट्र को बचाना नहीं होता, ठीक है बचाना तो भूगोल को भी पड़ता है पर यह भी सच है कि राष्ट्र के नागरिकों को बचाना राष्ट्र के भूगोल को बचाने से अनिवार्य रूप से अधिक जरूरी है। पर हम अपने देश के नागरिकों को बचाने के सवाल पर कितने गंभीर हैं या उत्साहित हैं इसके प्रमाण तो बिरले ही दीखते हैं। देखा जा रहा है कि हमारे वौद्धिक कारीगर भूगोल बचाने की मार्मिक सीखों के आधार पर कभी संस्कृति बचाने की बातें करते हैं तो कभी इतिहास बचाने की, वौद्धिक कारीगरों की बातों को रट, रटा कर हमारे नेता भी दिखावे के तौर पर संस्कृति बचाने लगते हैं तो कभी इतिहास बचाने लगते हैं। पर बचाना क्या है इस सवाल से वे परेशान नहीं हालांकि वे जानते होते हैं कि भूगोल, व इतिहास बचा लेने से मनुष्यों को नहीं बचाया जा सकता, मनुष्यों को तो तभी बचाया जा सकता है जब सत्ता प्रबंधन को मानवीय समीपता के सूत्रों से रचा गढ़ा जाएगा, सामाजिक संरचना की खाईं को सामाजिक बराबरी की तरफ ले जाने के लिए आर्थिक बराबरी के परिणामकारी प्रयासों को क्रियान्वित कराया जायेगा, जबकि वैसा किया नहीं जा रहा, यही तीसरी दुनिया का संकट है। सो बार बार इतिहास व संस्कृति बचाने की बातें सत्ता प्रभुओं द्वारा की जाती हैं। विडंबना है कि मनुष्य बचाने की बातें नहीं की जा रहीं जो प्रकृति की अद्भुत कृति है। अरे! भाई थोड़ी शर्म करो और यह बात साफ कर लो कि इतिहास और संस्कृति से मनुष्य नहीं पैदा होता, मनुष्य से संस्कृतियां जनमती हैं, इतिहास जनमता है, तो मनुष्य बचाने की बातें क्यों नहीं करते? मनुष्य ही जब नहीं बचेगा फिर इतिहास और संस्कृति कैसे बचेगी? आज के समय में हमारे सपनों को निश्चितरूप से मनुष्य बचाने के सवालों के आधार पर ही अपनी कथा चुनना होगा। ऐसी कथाओं का समाजशास्त्र ही सत्ता विकल्पों के बन्द दरवाजों को खोलेगा तभी मनुष्य केन्द्रित सत्ता का सर्वसमाजीरूप उभार पा सकेगा फिलवक्त तो सत्ता प्रबंधन पर भाषा, भूषा, भवन, भोजन पर कुंडली मारे हुए लोगों का कब्जा है। आज की संसद में कोई गरीब पहुंच ही नहीं सकता, आंकड़े बताते हैं कि करीब तीन सौ से अधिक सांसद करोड़पति हैं। समझ में नहीं आ पाता कि इन करोड़पतियों से हमें किस सत्ता विकल्प की आशा करनी चाहिए, क्या ऐसे लोग मनुष्य केन्द्रित सत्ता विकल्पों की तरफ एक कदम भी आगे चल सकेंगे? कत्तई नहीं। ये लोग तो समाज कल्याण के नाम पर कभी केशरिया, तो कभी हरा, गुलाबी, पीला रंगरोगन ही कर सकते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। इसलिए इनके आधार पर सिरजी गई कथाओं को किसी न किसी दिन गहरी खांई में गिरकर छटपटाना ही होगा। सो यह जो तीसरी दुनिया की बेढंगी राजनीति से उपजा समाजशास्त्र है, वह कभी भी चेतन व जागृतकथा का समाजशास्त्र नहीं हो सकता। इतिहास और संस्कृति रूपी कामधेनु से निकलने वाले दूध में नहाने वाली सत्ता के लिए तो मनुष्य केवल शासित होने के लिए होते हैं जिनकी पीठ और पेट पर कानून की धाराएं लिखी जाती हैं सो उन्हें तथा उनकी मनुष्यता बचाने की क्या आवश्यकता? वे जाएंगे कहां, रहेंगे तो शासकों के द्वारा रचे गढ़े कानूनों व भूगोलों के दायरे में ही, यही तीसरी दुनिया का संकट है। वह जो पहले वाली दुनिया है अपने द्वारा गढ़े गये सूत्रों के आधार पर खुद को सभ्यता के शिखर पर बैठा हुआ मनवाना चाहती है। उसकी मुस्कराहट से सत्ता प्रबंधन के गुर सीखने वाले तीसरी दुनिया के नीतिकार नहीं जानते कि वे गले में फासी का फन्दा डाल रहे हैं। दिक्कत सिर्फ यही नहीं है कि हमारी राजनीति उस सत्ता प्रबंधन की नकल कर रही है, जिसकी नीतियों में मनुष्य मनुष्य होता ही नहीं, वह उपभोक्ता होता है, एक वस्तु होता है, एक बाजार होता है, तथा सत्ता प्रबंधन का आज्ञाकारी उत्पाद होता है, दिक्कत यह है कि हम साहित्यिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी नकल कर रहे हैं और मनुष्यता विरोधी सत्ता प्रबंधन की प्रतिलिपि बनते जा रहे हैं। जाहिर है हम तीसरी दुनिया के लोग हैं और हमारे सामने उस कथित सभ्य दुनिया की तुलना में समय, समाज एवं साहित्य के स्तर भी दूसरे तरह की चुनौतियां व विमर्श हैं सो हमारी कवितायें व कहानियां भी अलग हैं, अतीत बचाने से किसी को रोटी नहीं मिलने वाली, साबित हो चुका है कि तकनीकी कौशलों से संवरित कारखाने हमें रोटी नहीं दे सकते, हर हाथ को काम नहीं दे सकते। ये कारखाने तो व्यक्तिगत लाभ के सूत्रों पर आधारित कुदरती संसाधनों के दोहन के महज कानूनी संस्थान हैं। केन्द्रीयकृत और तकनीकी उत्पादन व्यवस्था कभी भी कुटीर उद्योगों के लक्ष्य को नहीं हासिल कर सकती। हमारे जैसे देश में जहां आबादी का घनत्व प्रति किलोमीटर पांच सौ से अधिक मनुष्यों का है, उसके लिए विशाल तकनीकी ढांचों वाले कारखानों का कोई प्रयोजन नहीं। यहां तो हर हाथ को काम चाहिए। हम चाहें तो कारखानों के उत्पादन लक्ष्यों को कुटीर उद्योगों के द्वारा भी हासिल कर सकते हैं। तीसरी दुनिया का कार्यभार होना चाहिए मनुष्य बचाने का न कि बाजार के उपभोक्ता को बचाने का। हमारे यहां मनुष्य, मनुष्य होता है, वस्तु नहीं, हम सामाजिक सहभागी कल्याणकारी सŸााप्रबंधन के लोग हैं, न कि बमों व बन्दूकों की बारूद में नहाए हुए आज्ञाकारी, दण्डित किए जा सकने वाले लोग। हम ‘पीर पराई जानने’ वाले लोग हैं, न कि पीर का मजाक बनाने वाले लोग। मानवीयता बचाने व सुरक्षित रखने का संदर्भ अन्ततः मनुष्यों को ही बचाना है, नागरिकों को ही बचाना है, पर कैसे बचेगी मनुष्यता आज के उपभोक्तावादी समय में? मनुष्य को मनुष्य बचाए रखने के लिए सत्ता के करतबों को कितना लचीला और मानवीय बनाना होगा, मनुष्य को उपभोक्ता बनने से कैसे रोकना होगा, मनुष्य को बाजार का बाजारू पोस्टर व कार्टून बनने से कैसे रोका जाये यही सारे सवाल तीसरी दुनिया के लिए विचारण के मामले हैं। सभी को पता है कि अधिक भू क्षेत्रफलों व कम आबादी वाले देशों के लिए तकनीकी कौशलों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाना अनिवार्य रूप से अनिवार्य है पर क्या सीमित और आधे एकड़ से भी कम प्रतिव्यक्ति भू क्षेत्रफल वाले भारत जैसे देशों के लिए भी प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए मानव ऊर्जा के स्थान पर तकनीकी कौशलों की ऊर्जा का प्रयोग किया जाना चाहिए? भारत जैसे क्षेत्रों के लिए जहां आबादी का घनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर 400 व्यक्ति से अधिक है, यहां के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए अनिवार्यरूप से मानव संसाधनों पर ही आश्रित होना चाहिए न कि तकनीकी कौशलों पर, पर हो उल्टा रहा है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि तकनीकी कौशल के युग में आबादी के कम दबाव वाले क्षेत्र आज पूरी तरह से सुरक्षित क्षेत्र हैं तथा वीजा जैसे कानूनों के खोल में दुबके हुए हैं। समझना चाहिए कि क्या वीजा जैसा कानून मानवीयता के दर्दों को परिभाषित कर सकता है? आखिर मनुष्य तथा मनुष्य के बीच यह वीजा क्यों? आज की दुनिया एक तरफ तकनीकी कौशलों के बोझ से दब कर कराह रही है तो दूसरी तरफ मानव संसाधानों की कार्यक्षमता के उपयोग हीनता से तड़प रही है। मानव सभ्यता को आपस में बांटने का काम जिस प्रकार से जाति, गोत्र, रंग, धर्म आदि ने किया है उसी तरह आज के समय के कथित‘वीजा’ जैसे औपनिवेशी कानूनों ने भी मनुष्यता को बांटने का काम किया है। आखिर यह क्या है कि एक आदमी जो सिर्फ आदमी है वह दुनिया के इच्छित देशों में नहीं जा सकता, उसके लिए वीजा या पासपोर्ट की अनिवार्यता किस लिए, वह भी तब जब दुनिया के सारे सत्ता प्रतिष्ठान आदमी को बचाने की चिन्ताओं के रंगीन दावे करते हैं। मानव विवेक, चिंतन तथा धर्म तो सभै भूमि गोपल की मानता है पर वीजा जैसे कानून उनकी धज्जियां उड़ाते हैं। ऐसा किया जाना अनायास नहीं है अबादी के कम घनत्व व जरूरत से अधिक भू क्षेत्रफल वाले देश मानव जाति को अपने इच्छित स्थानों पर आबाद हो कर मानव सभ्यता के लिए काम करने की आजादी कभी नहीं देंगे। ऐसे सत्ता प्रतिष्ठानों की अनिवार्य चिन्ताओं में केवल भूगोल बचाना है, उनके यहां नागरिकरूपी मनुष्यता बचाने की चिन्ता ही नहीं है। मानव सभ्यता के स्तर पर मनुष्यता और नागरिकता का यही द्वन्द है। किसे नहीं पता कि नागरिकता एक खूबसूरत शब्द होते हुए भी किसी संप्रभु देश की संप्रभुता की मानव निर्मित सीमाओं में कैद होती है, जबकि मनुष्यता किसी भी जायज या नाजायज संप्रभुता संपन्न भूगोल में कैद की ही नहीं जा सकती। एक आदमी भूख से भारत में मरे चाहे कहीं भी मरे उसकी मृत्यु पर सारी दुनिया को शर्मशार होना चाहिए। इससे पूरी मानवता कलंकित व अपमानित होती है। पर ऐसी अनुभूति आज के कथित रूप से विश्वग्राम वाली अवधारणा में कहीं नहीं है। यह साफ है कि अगर भारत में भूख से मौतें हो रही है तो उन मौतों से अमेरिका जैसे सत्ता प्रतिष्ठानों से कुछ लेना देना नहीं। आज की दुनिया इतनी बेदर्द और बेरहम हो गई है कि उसने न केवल भूक्षेत्रों को वरन् भूख व जघन्य गरीबी से आहत मनुष्यता को भी भूगोलों में बांट दिया है। ऐसे मनुष्यता विरोधी कृत्यों पर तीसरी दुनिया के चिंतकों, विचारकों को चिन्तन, मनन करना चाहिए। साथ ही साथ न्यायशास्त्र पर भी गंभीर विचारण करते हुए उसे कुदरती न्याय की सार्वभौम मान्यताओं की तरफ ले जाने के लिए सार्थक पहल करना चाहिए। यह प्राकृतिक न्याय की अवधारणा ही है जो पारंपरिक रूप से जन, जन में रची बसी हुई है उसे गढ़ना या रचना नहीं होता। गढ़ना, रचना, सिरजना तो मानवरोधी कानूनों को होता है, जो लगातार जनहित, लोकहित के नाम पर गढे जा रहे हैं। कुदरती न्याय का संदर्भ आते ही कुदरती संसाधनों की उपयोगिता के बारे में भी सवाल खड़े हो जाते हैं।इस तरह हम देख रहे हैं कि आज के कठिन दौर में कथा का वांक्षित समाजशास्त्र बदल चुका है। आज पहले की तरह की कहानियों का कोई मतलब नहीं, आज की कहानियों में मनुष्य को बचाने की चिन्ता होनी चाहिए, मनुष्य बचेगा तभी कहानियां भी बचेंगी। आज भी भारतेन्दु जी के सवाल का उत्तर दिया जाना शेष है.. ‘होय मनुष्यहिं क्यों भये हम गुलाम ये भूप’ कथासाहित्य के लिए अनिवार्य है कि इसका उत्तर दंे और मनुष्य केन्द्रित कथा का समाज शास्त्र सृजित करे।
राजव्यवस्था व स्वामित्व,
कथा के संदर्भ में
रामनाथ शिवेंद्र
कानून, राजनीति और संपत्ति के अर्न्तसंबन्धों को आज तक मानवीय वुद्धि ने विविध तरीकों से समझने का प्रयास किया है, अनेक चर्चित अचर्चित किताबें प्रकाशित की हैं फिर भी इनके अर्न्तसंबधों की कोई सर्वस्वीकार्य धारा नहीं बहायी जा सकी है। सारी सामाजिक व्यवस्था तो तभी से गड़बड़ाने लगी जब संपत्ति के स्वामित्व के अगल बगल धर्म, राजनीति तथा कानूनों को घुमाया जाने लगा और संपत्ति को स्वामित्व की धारा में ला कर, उसे कानूनी बना कर, समाज के अस्तित्व को को डुबो दिया गया। हमें इस गड़बड़ी को कथाओं के सृजन में अनिवार्यरूप से लाने का प्रयास करना चाहिए। मुझे जान पड़ता है कि भूमि, संपत्ति और स्त्री के सवाल जो आज के समय में जितने जरूरी हैं उतने पहले भी थे, पर इस विमर्श से वौद्धिक भागते हुए जान पड़ते हैं। आज का वैश्वीकरण, उदारवाद और बाजारवाद या वैश्विक पूंजीवाद की कूटरचना उन्हें विमर्श करने ही नहीं देगी। मेरा मानना है ऐसा है भी। हम मूलरूप से समस्याओं की जड़ों तक पहुंचने वाले लोग हैं ही नहीं, हमारा समाज फुनगी बाज है, हवा में लहराने वाला, आज्ञाओं और आदेशों को मानने वाला और अपनी पीठ पर कानून की धाराओं को स्वर्णाक्षरों में लिखवाने वाला। हमारे देश का आदिवासी, वनवासी समूह जिन्हें मूलनिवासी कहा जाना चाहिए, उन्हें देख कर, उनके साथ रह कर यह तथ्य भलीभंाति समझा जा सकता है कि कानूनी और राजनीतिक खेलों को कैसे खेला गया। यह जो अधिकार का मामला है, इस बाबत विचारों व चिंतनों में सदैव एकरूपता का अभाव ही रहा है। इसे बिडंबना ही कहा जायेगा कि कानून और राजनीति की एकात्मकता पर पुराने काल से लेकर आज तक के वौद्धिक लगातार टिप्पड़ियां करते रहे हैं, और मानते रहे हैं कि कानून के साथ राजनीति का गठजोड़ हर हाल में समाज की सहिष्णुता तथा समीपता को लीलता रहा है और लीलता रहेगा तथा एक नये किस्म का अधिकारवादी वर्ग समूह पैदा करता रहेगा। कानून और राजनीति के संबन्धों को समझने के लिए आवश्यक है कि कानून तथा राजनीति की अवधरणा को समझ लिया जाये फिर देखा जाये िक ये दोनों कितने करीब हैं और कितने दूर? इन दोनों में कोई संबन्ध है भी या नहीं है और संबन्ध है भी तो क्या ये दोनों विपरीत धाराओं में चलने वाली व मानव समाज को नियंत्रित करने वाली विरोधी प्रणालियां है? या पूरक? या आज के आधुनिक समाज को इन दोनों की उपस्थिति की आवश्यकता ही नहीं, इन दोनों ने अपनी उपयोगिता स्वयं नष्ट कर दिया है? कानून तथा राजनीति के सवाल पर पहले की तरह ही आज भी मतभिन्नतायें हैं। कानून अपने प्रारंभिक स्थापनाकाल से ही अन्तर्द्वन्दों में उलझा रहा है, इसके क्रियान्वयन को लेकर उदारता और कट्टरता के संघर्ष लगातार चलते रहे हैं। उदारधारा हमेशा प्रयास करती रही है कि कानून समाज के उत्थान ही नहीं मानवीय समीपता का बाहक बने और मनुष्य की संप्रभुता की हिफाजत करे। पर राजनीति तो अपनी चाल चलती है और सर्वग्राह्य कानूनों में भी बदलाव करती रहती है। कानून की व्यावहारिक व्यापकता जो पीर पराई की अनुभूति वाली है, वहां तक इसकी पहुंच कल्पना की बात है, परिणामतः कानून लगातार अपनी उपयोगिता को शिथिल करता रहा है तथा समाज को वैयक्तिकता के उत्सवों में जकड़ता रहा हैं यानि मेरी भूमि, मेरा मकान, मेरी पूंजी आदि आदि। कानून का आदि और अन्तिम पवित्र लक्ष्य होता है मानवीय समीपता की स्थापना तथा वैयक्तिक संप्रभुता की हिफाजत करना जिसका समान्य अर्थ होता है अभिन्न समाज की स्थापना और उसका जागरण यानि कि यह जो आदमी और आदमी के बीच की दूरी व भिन्नता है वह कानून के बुनियादी आधारों के लिए स्वीकार्य नहीं अगर ऐसा है तो कहीं न कहीं कानून अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। कानून तो आचरण है, ऐसा नहीं कि जब चाहा बदल लिया। वन अधिनियम 1927 के द्वारा आखिर क्या किया गया? सोनभद्र के लाखों गरीब आदिवासियों को उनके सारे संसाधनों एवं जमीन के कब्जों से बेदखल कर दिया गया। यहां कानून का ऐसा खेल खेला गया जिसने प्राकृतिक न्याय की अवधारणा को भी धत्ता पढ़ा दिया। इस कानून को भारतीय लोकतंत्र ने अंग्रेजों के 1878 वाले कानून से उधार लिया था जिसका खुला अर्थ था सारे वनक्षेत्रों को अंग्रेजी राज्य के स्वामित्व में लाना और उन्हें सफलता भी मिली। 1878 वाला कानून तो अंग्रेजों ने सिर्फ इस लक्ष्य से बनाया था जिससे वे बिना किसी परेशानी के सारे वनक्षेत्रों को राजाओं की अधीनता से बाहर निकाल लें और उस पर अंग्रजी सत्ता स्थापित कर लें। अंग्रेजों का तर्क देखिए कितना प्राकृतिक था, तर्क था कि वन क्षेत्र तो प्रकृति का उत्पाद है, इस पर किसी का अधिकार कैसे हो सकता है? इस पर तो राज्य का ही अधिकार न्याय सम्मत है। राजाओं के पास अंग्रेजों के इस तर्क का कोई जबाब नहीं था वैसे भी वे विवश थे, वे अंग्रेजों के सामने नतमस्तक होने के अलावा कुछ कर नहीं सकते थे। कानून की सहज अभिव्यक्ति तथा आशय है पीर पराई जानने वाली, पराई पीर को अपनी पीर समझने वाली। मेरा मानना है कि आज के जटिल समय में कानून की परिभाषा पर बात करने की आवश्यकता नहीं है, आवश्यकता है उसे समाजोपयोगी बनाने की, सभी इसके बारे में जानते हैं कि इसकी उपस्थिति सदैव रही है, भले ही छीजती रही है। तो क्या आज हम जिसे राजनीति कहते और जानते हैं, यह भी आदिकाल से ही है? यानि कि मानवीय सभ्यता के प्रारंभ से ही? कबीलाई समाज वाले युग से। यह बहुत ही पेचीदा सवाल है, शायद ही इसे प्रमाणित किया जा सके कि हमारे समाज में कौन पहले स्थापित हुआ कानून या राजनीति या दोनों साथ साथ आये। राजनीति को तो राज से जोड़ कर ही देखना चाहिए, राज और राजनीति दोनों वैसे भी एक दूसरे से इतने घुले मिले हुए हैं कि इन्हें अलग अलग देखना मूर्खता ही होगी। मेरा मानना है कि राज को समझ लेना राजनीति को समझ लेना होगा, अगर यह सवाल हल हो सके कि भारत ही नहीं सारी दुनिया में राज्यों की स्थापनायें कब और कैसे हुईं? उनके कारक क्या थे तो राजनीति को समझा जा सकता है। जहां तक भारत का सवाल है वैदिक काल में हमें राज्यों के अस्तित्व नहीं दिखते। वैदिक काल के बाद से ही हमारे यहां राज्य के अस्तित्व देखने में आते हैं। राज्यों की स्थापनाओं के बाद राज्यों की सुरक्षा एवं उसकी संप्रभुता का दूसरा चरण प्रारंभ होता है जो आज तक किसी न किसी रूप में चला आ रहा है। राज्यों की सुरक्षा और संप्रभुता तथा राज्यों पर सत्ता धिकार आदि कुछ ऐसे तत्व हैं जो वैचारिक रूप से राजनीति को जन्माते हैं, कहा जाना चाहिए कि राज है तो उसकी राजनीति भी है। यहां हम इसी राजनीति की चर्चा कर रहे हैं जिसका अस्तित्व राज की स्थापना पर टिका होता है, राज के अलावा इसका कोई अस्तित्व ही नहीं और राज बिना कानूनों के चल नहीं सकता। अच्छा राज उसे ही कहा जा सकता है जिसे संचालित करने के लिए कानूनी उदारतायें व्यापक हों, पर ऐसा सोनभद्र में नहीं हुआ। अगर ऐसा हुआ होता तो सोनभद्र जो आदिवासी बहुल परिक्षेत्र है यहां पर संविधान की अनुसूची पांच के नियम चल रहे होते। सोनभद्र में तो राजनीतिक षडयंत्र के तहत आदिवासियों की सही गणना भी नहीं की गई। अधिकांश आदिवासी जन जातियों को अनुसूचित जाति में बदल दिया गया और इस परिक्षेत्र को संविधान की अनुसूची पांच का लाभ लेने से वंचित कर दिया गया। सोनभद्र की इस घटना को हम राजनीति और कानून के उलट पुलट का उदाहरण मान सकते हैं। आज के जटिल समय में कानून तथा राजनीति के बुनियादी फर्क को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा और कोशिश की जा रही कि जो थोड़े बहुत फर्क बचे भी हैं उन्हें समाप्त कर दिये जायें यानि कि राजनीति और कानून को रासायनिक विलयन बना दिया जाये, राजनीति तथा कानून दोनों को एक माना जाये, दोनों को अलग अलग ढंग से न देखा जाये। इस तरह के विलयनों को हम बौद्धकाल की राजव्यवस्थाओं में देख सकते हैं। बाद के कालों में भी ऐसे विलयनों के अनेक उदाहरण हमारे अतीत में रहे हैं पर उन विलयनों तथा रसायनों ने मानवीय समीपता के परम लक्ष्यों को हासिल कर लिया ऐसा नहीं कहा जा सकता। उससे सामाजिक समरसता खंडित हुई है तथा समाज कई कई खानों में बंटा है। आज यह प्रमाणित किया जाना शेष नहीं है कि जब समाज का अंकुश राज पर नहीं रहेगा तब न तो राज रहेगा न ही समाज दोनों को क्षतिग्रस्त होने से कोई ताकत बचा नहीं सकती। आज वही हर ओर देखा जा रहा है कि राज पर समाज का अंकुश नहीं रह गया है, इसके ठीक उलट राज का ही एकतरफा अंकुश समाज पर हो गया है और समाज है कि राज द्वारा बनाये गये कानूनों के मकड़जाल में मछली की तरह फड़फड़ा रहा है। कहने को तो कहा जा रहा है कि लोकतंत्र है, जनता का राज है पर आज की राजव्यवस्था में सिर्फ राज है और जन का कहीं अता पता नहीं। होना तो यह चाहिए था कि जन, मन हर हाल में राज के तंत्र पर प्रभावकारी ढंग से शासन करता दिखे तथा जन भी महसूस करे कि वही राज को चला रहा। पर ऐसी स्थिति को किसी कवि की कल्पना साबित कर खारिज भी किया जा सकता है भला ऐसा कहां संभव है? हमारे समाज में ऐसी अवधारणाओं की कमी भी नही,ं लोग साफ बोलते और कहते हैं कि सभी राजा तो हो नहीं सकते, राजा तो कोई एक ही होगा जिसके भाग्य में होगा। यानि कि राज और राजा दोनों मानवीय कुशलताओं के परिणाम नहीं, वरन् दैवीय परिणाम हैं। हमें ध्यान रखना होगा कि राज की स्थापनायें वौद्धिक कुशलताओं के परिणाम हैं वरना हम आज भी राज पूर्व वाली व्यवस्थाओं के जीव होते। कबीलाई समाज तक आते आते हम समूह से स्व मोह तक उतरते गये यानि कि हमारा समूह, हमारा कबीला, तब कबीला ही हमारा देश था। कबीलाई समाज तक भी कहीं न कहीं सहभागी प्रबंधन के रूप, सामूहिक रहवास, सामूहिक भोजन, सामूहिक श्रम तथा उत्पादन के मौलिक गुण दिखते हैं पर कबीलाई समाज के राज में रूपांतरण के बाद तो सामूहिकता तथा सहभागिता पूरी तरह से छिन्न भिन्न हो गयी। इस स्तर तक आते आते हम समाज से बहुत दूर छिटक कर स्व में केन्द्रित होते चले गये। इस तरह व्यक्ति और समाज पर अंकुश रखने के लिए एक नया घटक राज भी धर्म की तरह हमारी सभ्यता का अनिवार्य हिस्सा बन गया और पूरी सभ्यता धर्म के आचरण तथा राज के कानूनों के झगड़ों में उलझ कर छटपटाने लगी। किसे नहीं मालूम कि आचरण आत्मानुभूति का अंग है जबकि कानून आत्मानुभूति से बाहर सत्ता के दंड विधानों की उपज। आचरण व कानून में दूर दूर तक समानता के तत्व नहीं। जब हमारा समाज लिखित कानूनों की दुनिया से बाहर था तब धार्मिक व सांस्कृतिक विधि व विधान ही हमें नियंत्रित किया करते थे। तब हमारा आचरण हमें नियंत्रित किया करता था। आज तो स्थिति यह है कि हम कल्पना तक नहीं कर सकते कि कोई सभ्यता राजविहीन यानि कानून विहीन भी हो सकती है। व्यक्ति तथा समाज ही आचरण के आत्मानुभूति के सहारे एक दूसरे को अनुशासित करने के लिए पर्याप्त हैं, मानव सभ्यता के लिए राज जैसे दण्ड उत्पादित करने वाले घटक की आवश्यकता ही नहीं। पहले तो व्यक्ति तथा समाज के बीच परंपरा, संस्कृति, रीति रिवाज आदि के अनुशासन प्रभावी थे, संपत्ता तथा स स्वामित्व के मामले सहभागिता पर केन्द्रित थे। किसी व्यक्ति के अधिकार में कुछ नहीं होता था, सारे निर्णय सामूहिक हुआ करते थे। जबकि आज राज के अनुशासनों ने पहले के सारे अनुशासनों को रौंद दिया है। राजव्यवस्था हमेशा इस बात का दंभ भी भरती रही है कि उसी का ही अनुशासन प्रभावी है, पर ऐसा है नहीं, अगर ऐसा होता तब तो झगड़ा ही नहीं था। संपत्ति पर स्वामित्व के मिथक ने ही सोनभद्र के आदिवासियों को उनके पुश्तैनी जमीनों से बेदखल कर दिया है। निश्छल आदिवासियों के पास कब्जे वाली जमीन के कागज कहां थे, उन्हें तो पता ही नहीं था कि कब्जों के कागज भी होते हैं। ऐसे आदिवासी समूहों से जमीन के स्वामित्व के कागज मांगे गये पर वे बेचारे जमीन के स्वामित्व का कागज कहां से देते। स्वामित्व का मामला तो उनकी संस्कृति में था ही नहीं। अंग्रेजों ने लिखित कानूनों के द्वारा स्वामित्व के मुद्दे को महिमामंडित किया फिर उसी राह पर हमारी देशी हुकूमत भी चलने लगी। हमारे सोनभद्र में वन अधिनियम की धारा 4 और 20 का जैसा उपयोग हमारी तत्कालीन सरकार ने किया वैसा उपयोग शायद देश में कहीं नहीं हुआ होगा। लाखों आदिवासियों तथा वनवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीनों से विस्थापित कर दिया गया और बताया गया कि उनके वन की जमीनों पर कब्जे अवैध थे। कभी राजनीति, धार्मिकीकरण के जाल में थी पर आज देखा जा रहा है कि राजनीति, धार्मिकीकरण के साथ साथ जातीयकरण की जाल में है। लोकतंत्र के उदारवादी विधानों के तहत जातियां, जातिगत राजनीति के ध्रुवीकरण की तरफ बढ़ रही हैं। जातीयकरण के बूते सरकारें भी बनने लगी हैं जहां तक राजनीति के धार्मिकीकरण की बात है, वह प्रयोग भी फेल कर चुका है। फेल इसलिए हुआ क्योंकि उसका हिन्दूकरण या इस्लामीकरण किए जाने का अपवित्र लक्ष्य रखा गया। अगर केवल धार्मिकीकीरण का ही लक्ष्य रखा गया होता तो शायद ठीक होता, अगर वैसा हुआ होता तब सत्य, अहिंसा, अचौर्य, अपरिग्रह, दया, सहिष्णुता, सहकार, प्रेम व वंधुत्व आदि समाज के साथ साथ व्यक्ति के गुण बन जाते पर ऐसा हुआ ही कहां? और नही दूर भविष्य में ऐसा होने वाला है। डा. लोहिया ने धर्म तथा राजनीति को परिभाषित करते हुए कहा है कि ‘धर्म दूरगामी राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म।’ गांधी और लोहिया दोनों राजनीति को अल्पकालीन धर्म की तरह मानते थे तथा उसे तात्कालिकता का कर्म समझते थे। राजनीति में अवकाश है ही नहीं, सदैव कर्म करते रहना है, वह भी निष्काम कर्म, फलहीन। आज की सत्ताकांक्षी राजनीति की तरह नहीं। समाजिक विषमताओं के सवालों पर, उसे मिटाने के लिए जनतांत्रिक हस्तक्षेपों के माध्यम से आत्मवलिदान का संकल्प लेना यह अल्पकालीन धर्म है। धर्म पूजा, पाठ, आराधना में लीन रहना तथा समाज लुटता रहे, उसकी लूट के प्रति निर्पेक्ष रहना तथा केवल अपने हित अहित के लिए चिन्तित रहना यह क्रियाशील समाज के लक्षण नहीं है, न ही संस्कृति है, संस्कृति तो विषमताओं से टकराने का एक सगुण माध्यम है। यही जीवन का सच है। हमारे संत और ऋषियों ने भी तो यही किया। उन्होंने सहभागिता पूर्ण सामाजिक वातावरण पर जोर दिया तो व्यक्ति की सत्ता व महत्ता पर भी। सहभागितापूर्ण वातावरण पर जोर देते हुए ऋषियों ने जनसंगठन के अभूतपूर्व सिद्धांतों की भी खोजें कीं और बताया कि राजव्यवस्था पर हर हाल में समाज का अंकुश रहना ही चाहिए, उन्होंने समाज का सत्ता पर नियंत्रण रखने के लिए हर संभव प्रयास किये। समाज का एक अर्थ जनसंगठन भी होता है। कोई भी निरंकुश राजव्यवस्था जनहितकारी नहीं हो सकती। संत तथा ऋषि दोनों सत्ता और समाज के बीच हमेशा संतुलन स्थापित करने के प्रयास करते रहे तभी संत कहलाये, जनता आक्रामक हुई तो उसे रोका, सत्ता जन विरोधी हुई तो उस पर अंकुश लगाया। आज ऐसा कहां है? वैसा समाज तो तब होता जब राज व्यवस्था निश्चित रूप से सभी को बिना भेदभाव के रोजी, रोटी, रोजगार तथा शिक्षा देती और अपने नागरिकों के साथ पुत्रवत व्यवहार करती। राजव्यवस्था की स्थापना के तथा उसका बचाव के प्रयास दो ऐसे कारक हैं जो समाज में कई तरह की विषमताओं को उत्पादित करते हैं। यह माना हुआ सच है कि संपूर्ण सृष्टि प्राकृतिक उपहार है, मनुष्य से लेकर जीव जन्तु, वनस्पतियां, नदी नाले, पर्वत पहाड़ यानि की जो कुछ भी धरती पर दृश्य या अदृश्य है सारा कुछ। हमें समझना चाहिए कि प्रकृति के ऐसे उपहारों पर यह जो स्वामित्व वाला मामला है वह कैसे स्थापित हो गया? कहां से आगया स्वमित्व? राजव्यवस्था ने अपनी स्थापना के लिए अपने हितैषियों एवं शुभचिंतकांे को प्राकृतिक संसाधनों पर स्वमित्व देकर पूरी सभ्यता को कई कई खानों में विभक्त कर दिया। एक खाना संसाधनों के मालिकों वाला तो दूसरा खाना संसाधनों के मालिकाने से वंचितों का। जाहिर है राजव्यवस्था अपनी स्थापना ही नहीं अपना बचाव भी बहुत बारीकी से करती है, हम इसे अपने देश में देख सकते है कि संसद में क्या हो रहा? हमारे यहां सरकार बचाने या चलती सरकार गिराने के लिए कैसे कैसे प्रयास किये जा रहे हैं, संसद में पहुंचने के लिए नये नये तरीकों की खोजें की जा रही हैं, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल विधेयक की मांग की जा रही है (अब नहीं) सूचना पाने वाले अधिकार या अनिवार्य शिक्षा वाले कानूनों के परिणामों को देख कर आखिर क्या आशा रखनी चाहिए? लोकपाल विधेयक के बारे में अन्ना हजारे साहब क्या गलत बोल रहे थे, सरकार से वे ऐसा क्या मांग रहे थे? वे तो यही मांग रहे थे कि सिविल सोसाइटी के लोगों की भागीदारी विधेयक बनाने के संदर्भ में दो। यह कोई असंगत मांग है क्या? जिसे सरकार को मान लेने में पसीना छूटने लगा था। दरअसल लोकराज का भयानक रोग है आदिम शासकों का रूप धर लेना, वे भूल जाते हैं कि वे भी अन्ना जी की तरह ही एक आम जन हैं। लोकसेवक का लोकशासक में रूपांतरण बहुत ही घातक होता लोकशासक को समझना चाहिए कि वे शासक नहीं, शासक तो अतीत में दफनाये जा चुके हैं। पर ऐसा नहीं है, शासकों के नये अवतार लोकतंत्रात्मक शासन सत्ता व्यवस्था में हर ओर होने लगे हैं और जनता ऐसे शासकों के दमन से पीड़ित है। वुद्धिजीवी मानते हैं कि भारत में नये कानूनों को बनाने की उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी उनके अनुपालन और क्रियान्वयन की है, लेकिन वुद्धिजीवियों की सुनता कौन है? कहा जा रहा है कि कानून और राजनीति का हमारे देश में गठजोड़ हो चुका है, और समाज के बहुजनों को हाशिए पर धकेल दिया गया है। राजनीति को जातिगत बनाया जा रहा है? राजनीति तो राजनीति होती है, एक ऐसा आचरण जो जड़ तथा चेतन सभी के प्रति जबाबदेह होती है फिर क्या जाति, उपजाति, क्या वर्ण क्या अवर्ण, इस तरह के घृणित बटवारे के क्या मायने? समझना मुश्किल। पहले आदमी के अस्तित्व को पिछड़ा, आदिवासी, दलित, सभ्य, असभ्य, राजपोषित, कुपोषित, अधिकारी, विशेषाधिकारी के खानों में बांटा गया और अब राजनीति को भी बांटा जा रहा है। अल्पमत तथा बहुमत का डंका बजा कर जिस लोकराज की स्थापना की गयी है क्या इस लोकराज में 60 फीसदी से अधिक बहुमत वाले गरीबों की भी चल रही? दो फीसदी से भी कम अंग्रेजी बोलने वालों तथा देश के 80 फीसदी संसाधनों पर अप्राकृतिक ढंग से कब्जेदारों की ही क्यों चल रही? बहुमत तो 60 फीसदी से अधिक गरीबों का है, क्या उन्हें मतदान के अधिकार और आरक्षण के लाली पाप से अलग हट कर संसाधनों के स्वामित्व में भी हिस्सेदारी देने की कूबत लोकतांत्रिक सरकार में है? उनका हिस्सा क्या यहां के संसाधनों में नहीं है? जाहिर है ऐसी कूबत लोकतंत्र की खाल ओढ़े भेड़ियों की सरकार में नहीं हो सकती। हमें नहीं भूलना चाहिए कि पूरा देश एक बार लोकतंत्र की तानाशाही क्रूरता का दमन आपात काल के दोरान भुगत चुका है। राजनीति तो कहती है, सभै भूमि गोपाल की जिसका समर्थन हमारी संस्कृति भी करती है, फिर संसाधनों पर मालिकाना कैसे स्थापित कर दिया गया? बात साफ है राजव्यवस्था को वैयक्तिक सत्ता में रूपातंरित करना अलग बात है पर राजनीति को संस्कृति के आधारभूत तत्वों से समायोजित करके राजनीति को शुचितापूर्ण बनाना अलग बात। बांटो तथा राज करो कि व्यवस्था पर टिकी राज सत्ता से हमें ऐसी आशा करनी भी नहीं चाहिए कि वह स्वामित्व के वैयक्तिक अधिकारों को स्थापित करने के बजाय सामाजिक सत्ता को स्थापित करने का काम करेगी। अगर ऐसा हुआ होता तो आज हमारे देश का आदिवासी, वनवासी चीख नहीं रहा होता। बतौर कथाशिल्पी हमें इन सवालों से सकारात्मक ढंग से टकराने की आवष्यकता है।
कुदरती कथाभूमि की उर्वरता का सवाल
रामनाथ शिवेंद्र
मौजूदा समय में कथासाहित्य अपनी जीवंतता तथा प्रभावोत्पादकता के कारण साहित्य की सभी जनप्रिय विधाओं में विशेष दर्जे का अधिकारी बन चुका है। इस लिए अनिवार्य हो जाता है कि देशज कथाभूमि को आयातीत चिंतनों व विचारणों से बंजर बनाने की कुटिल चालों की रोकथाम किया जाये तथा कथा के सभी आयामों को देशी भूमि पर समत्वम् वाले बीज से हरा भरा किया जाये। वैसे तो समकालीन कथा के पाठक भी अन्य साहित्यिक विधाओं के पाठकों की तुलना में अपने सयानेपन पर ज्यादा मुग्ध दीख रहे हैं। यही हालत कथासाहित्य के कृतिकारों का भी है। समता, सहकार, सहयोग, भाईचारा और सामजिक हितों को बचाने के लिए अहिंसक प्रतिरोध बुनियादी रूप से कथासाहित्य के लिए प्रस्तावित थे, मानवीय समीपताओं को स्थापित करना कराना भी प्रस्तावित था, पर समकालीन कथासाहित्य का जो विकास क्रम है क्या वह अपने विषय, भाषा व प्रस्तुतीकरण के द्वारा मानवीय समीपताओं तक पहुंच सका है या सामाजिक बदलावों के लिए जो अहिंसक जनप्रतिरोध अभिष्ट थे उसे हासिल कर पाने में इसकी कोशिशें उल्लेखनीय हैं। मुझे लगता है कि आज के बाजारवादी तथा उपयोगितावादी समय ने हमारी समझ और चेतना दोनों को इतना कुन्द कर दिया है कि हम उन रास्तों पर नहीं चल पा रहे हैं जो सामाजिक तथा राजनीतिक बदलावों के लिए प्रस्तावित थे। साहित्य समाज का दर्पण है, हम जानते व मानते हैं इसी दर्पण को तोड़ने में क्या हम सभी की अचेतन भागीदारी नहीं है? सोचना यही है। आइए समकालीन कथासाहित्य के रूप और प्रवृत्तियों को जनमूलक और कुदरती जमीन से उपजने वाली आदिम कथाओं से तुलना करने का प्रयास करें और यह भी पता लगाने का प्रयास करें कि समकालीन कथायें मानवीय समीपताओं के व्यवस्थापन के लिए कल्पित श्रमसंबधों में समत्वम् स्थापित कराने के लिए किस तरह से प्रयासरत हैं। जाहिर है सारी दुनिया श्रमसंबधों के कुदरती व्यवहारों से ही चालित होती रही है। मानवीय सभ्यताओं ने श्रम संबधों के द्वारा उपजने वाले परस्पर संवाद के लिए ही भाषाओं के विविध रूपों को सृजित किया है, हमें जानना चाहिए कि कथायें भी मानव समाज में श्रम संबधों की अभिव्यक्ति होती हैं और मन के बहुत गहरे में जा कर संवाद स्थापित करते हुए अपने लिए कथाभाषा सिरजती हैं। यहीं कथाभाषा कथा विषय का चयन करते हुए कुदरतीभाषा से तालमेल बिठाते हुए अपने विषय के साथ पाठकों से अंतःक्रियायें करती हुई आगे का रास्ता तय करती हैं। यह अलग बात है कि पाठक उस कथावस्तु को किस तरह से पाठवोध में तब्दील करता है। देखना है कि समकालीन कथाभाषा ने खुद को कितना पेट के करीब रखा हुआ है और कितना कंठ के। जाहिर है पेट की भाषा कुदरती होती है, और कंठ की भाषा बनावटी और सजावटी। पेट की भाषा ‘भूख’ से सनी होती है और कंठ की भाषा सत्ता व्यवस्थापन’ के रंगों में रंगी होती है। आज के बाजारवादी व उपयोगितावादी समय में हमारा यह जो कथासमय है, कथा की भाषा है, कथा की शक्ति है, इसमें छलछलाता हुआ सेक्स है, क्या ये सब कुदरती जमीन पर उगने वाली कथा की पगडंडियों पर चल रहे हैं, इनमें प्रकृति की एकाग्रता व समत्वम् का कुछ है, समकालीन कथाओं के पात्रों के चित्त और चेतना में प्रकृति के साथ एकाकार होने की क्षमता है? इन सवालों पर सोचते हुए विचारण करना होगा कि यह जो मानव सभ्यता का विकास क्रम है क्या उसे मानव और प्रकृति की एकाकारिता कबूल नहीं। आज की सभ्यता में अवकाश ही नहीं कि मानव अपने चित्त और चेतना को व्यक्तिगत से अलग कर समूहगत बना सके। ऐसा सोचना ही किसी कपोल कल्पना में गोते लगाना है और हम गोते लगा रहे हैं। हम पैर से ले कर सिर तक ‘निजता’ के दलदल में डूबे हुए हैं। क्या हमारी मानव सभ्यता उस दौर में भी ऐसी ही थी जब हम श्रमसंबधों की अन्तःक्रियाओं से उपजी संवाद की भाषा रचने का प्रयास कर रहे थे, एक दूसरे को समझने के लिए संवाद करने के प्रयासों में थे, इशारों व संकेतों से अलग। कथाएं, कथावस्तु और रूप के अनुसार जिस पाठवोध का रचाव करती हैं उससे परिवार की संरचना का पता चलता है, रिश्तों की सूचना मिलती है, रिश्तों को बनाये जाने के कथानक का ज्ञान होता है। आधुनिक कथायें तो तरह तरह का पारिवारिक माहौल बनाते हुए दीखती हैं, ये कथायें ही हैं जिसने हमें बताया कि अब कथायें संयुक्त परिवार से होते हुए एकल परिवार की दुर्गम यात्रा पर हैं। कई कई कथाओं ने परिवार के टूटन को आधार बना कर खूब नाम भी कमाया है। कथाओं की दुनिया से परिवार की छोटी से छोटी बात भी नहीं छूट पायी है, चाहे वह संदर्भ पिता का हो, मां का हो, चाचा, चाची, भाई दोस्त किसी का भी हो, सभी रिश्तों पर किसिम किसिम की कथायें हैं, प्रेमसंबधों को ले कर तो कथाओं का एक अलग संसार ही रच बस गया है। प्रेम को प्रेम की तरह, देह से अलग, वाले संबधों की कथायें कथा संसार में कम जगह पा पायी हैं, प्रेम को तन से जोड़ कर मन को कहीं कोने में पटक देने की प्रवृित्तयों समकालीन कथाओं में हर तरफ देखी जा सकती हैं। वे कथायें चर्चित और प्रशसित भी हैं फिर भी लगता है कि कथाओं का काम पूरा नहीं हो पाया है, उन कथाओं से कथाओं का काम पूरा हो भी नहीं सकता। कथाओं का काम है, निजता को समूहगत बनाना, व्यक्त से अव्यक्त तक पहुंचना, चित्त और चेतना को संतुलित करना, पराई पीर को अपनी पीर मानना, पर क्या ऐसा हो पाया? मानवीय संवेदनशीलता को किसी कथा में ढालना बहुत ही अच्छी बात है पर कथा को व्यवहार से अलग केवल किताबों में दर्ज करा देना इसे तो अच्छा नहीं कहा जा सकता। कृति और कृतिकार दोनों में प्रकृति के ‘समत्वम्’ का कुछ तो शामिल होना ही चाहिए। दोनों को एक में गुंथा दिखना भी चाहिए, चाहे कृति पढ़ो चाहे कृतिकार को। हवाई जहाज से धरती की सतह नापना यह कुदरती कथा का काम नहीं। इस संदर्भ में कुछ उन कथाओं पर हमें विचार करना होगा जिन्हें साहित्यिक सरोकारों से विशेष धर्म द्वारा समादृत होने के कारण अलग कर दिया गया है, उन कथाओं को छुआछूत की बिमारी की तरह माना जाता है। पर कथासाहित्य की कुदरती परंपराओं पर वे कथायें जैसा प्रभाव छोड़ती हैं वैसी प्रभावोन्वति समकालीन कथाओं में देखना खुद का माथा फोड़ना होगा। हम जानते हैं कि हमारे समाज में राम और कृष्ण की कथाओं की तुलना में कोई कथा जनप्रिय नहीं है। आइए उन कथाओं को समकालीनता के संदर्भ में देखें.. कृष्ण की बात करें तो.. उन कथाओं में कृष्ण कथापात्र भर हैं, वे रहने वाले द्वारिका के हैं पर जाने जाते हैं मथुरा से, वे रूक्मणी के पति हैं पर रूक्मणी कृष्ण के नाम से उतना नहीं जाने जाते हैं जितना कि राधा कृष्ण के नाम से, वे एक ऐसे कथापात्र हैं जो देवकी नंदन से यषोदा नंदन बन जाते हैं, तो ये जो कृष्ण हैं किसी समय के कथापात्र हैं, जिनके दो दो रूप हैं, दो दो जन्म स्थान हैं, दो दो मॉ हैं इसी तरह एक कथा पात्र और उसके दो दो रूप। दोनों रूपों में कही भेद नहीं, पूरी तरह एक में एकाकार यानि प्रकृति से इतना एकाकार कि वे जहां रहते हैं, जिसके साथ रहते हैं उसी के हो जाते हैं। इतना समत्वम्, तो यह है कथा के जनमूलक या कुदरती होने की स्थिति। कृष्ण का यह जो समत्वम् वाला रूप है उससे समकालीन कथाकार सार्थक निष्कर्ष निकाल सकते हैं पर चाहें तब। कृष्ण का सारथी वाला रूप अगर गंभीरता से देखा जाये तो श्रमसंबधों को सम्मान देने वाला रूप है, ध्यान रहे कृष्ण भी नरेश हैं, अर्जुन और दुर्योधन से कम नहीं, वे सारथी हैं महाभारत के युद्ध में, सारथी यानि केवल रथ खींचने वाला एक श्रमिक, कृष्ण रूपी श्रमिक पूरी व्यवस्था खींचने और चलाने वाला बना हुआ है। पर आज क्या ऐसी कथायें रची जा सकती हैं। क्या हमें सारथी बन कर समाज का रथ खींचने काम किसी समकालीन कथा में किया? कृष्ण के सारथी वाले चरित्र से अलग उनका एक रूप प्रेम वाला भी है, उनका प्यार है रूक्मणी से, वे प्रेम करते हैं राधा से, वे यषोदा के दुलरूआ हैं और देवकी के कलेजे का टुकड़ा हैं, द्रोपदी भी उनके प्रेम की परिणति हैं, उसे वे सुभद्रा से कम नहीं मानते, तो ये हैं कृष्ण, बहुआयामी, सभी के, सभी उन्हें अपना मानते हैं, अपना ही नहीं सभी उनमें अपनापन देखते हैं। कृष्ण का प्यार प्रायोजित नहीं, स्वस्फूर्त है। कृष्ण इतना खुले हुए हैं कि उनको खोलना नहीं पड़ता, वे प्रकृति की तरह प्रकृतिमय हैं, पूरी तरह से खुले हुए, उनके खुलने के लिए खुलने लायक परिस्थितियां निर्मित नहीं करनी पड़तीं। महाभारत का कथानक ऐतिहासिक हो न हो, उसमें रचा गया कृष्ण का चरित्र तो निश्चितरूप से ऐतिहासिक और अभूतपूर्व है। वे महाभारत युद्ध के भागीदार नहीं हैं, तत्कालीन सत्ता संघर्ष का उनके लिए कोई व्यक्तिगत प्रयोजन नहीं, प्रयोजन है, मानव सभ्यता का, पथभ्रष्ट होती सत्ता के बदल का, वे तटस्थता का अपराध नहीं कर सकते थे फिर भी तटस्थ रहते हुए युद्ध का साक्षी बनते हैं। वे अर्जुन से जिन परिस्थितियों में संवाद करते हैं हमें उस तरफ लौटना होगा, परिस्थिति युद्ध की है और अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ हैं, युद्ध लड़ना चाहिए या नहीं, इसे वे तय नहीं कर पा रहे हैं, कृष्ण जो युद्ध के प्रति तटस्थ हैं वे संवाद में वहां सक्रिय हैं, अर्जुन को रास्ता दिखाते हैं, रास्ता भी ऐसा जो किसी रहस्यलोक की तरफ नहीं ले जाता है, वह रास्ता है वैज्ञानिकता का यानि पूरी सृष्टि नश्वर है फिर किस बात की चिंता? मानवीय समीपताओं की सुरक्षा के लिए युद्ध किया जाना समय की जरूरत है। महाभारत का युद्ध युद्धकालीन परंपरा का प्रतीक है, युद्धों को ही तब सत्ता बदल का उपयोगी तरीका माना जाता था। उस समय युद्ध के अलावा सत्ताबदल का कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था। एक तरह से युद्ध का समर्थन कृष्ण के व्यक्तित्व पर सवाल की तरह है पर उस समय कृष्ण कर भी क्या सकते थे, जो कर सकते थे वही किया कृष्ण ने, यानि तात्कालिकता का कर्म, तात्कालिकता का कर्म वर्तमान के द्वारा स्वस्फूर्त ढंग से चालित होता है, योजनावद्धता के लिए वहां अवसर कहां? समकालीन कथाओं की दुनिया भूख और भोजन, तन और मन, चित्त और चेतना, कृति और प्रकृति, व्यक्ति और अभिव्यक्ति, सŸाा और समाज, परंपरा और कानून, व्यवस्था व अव्यवस्था, न्याय और सामाजिक न्याय, अधिकार और मानवाधिकार आदि रंगीन शब्दों के अर्थों को खोलने में आतुरता तो दिखाती है पर क्या उन आतुरताओं के पीछे वर्चस्वी वर्गों की ऐसी दुनिया काम नहीं कर रही होती है जो न केवल शब्दों को विखंडित करती है वरन् उसकी भाषा को भी बाजार के चौराहों पर बिकने के लिए खड़ा कर देती है। जाहिर है भूख और भोजन के बीच ही सभ्यतायें पसरी होती हैं, उसी से सभ्यता के विकास का क्रम आगे बढ़ता है। अगर हम आदिम समाजों की तरफ देखें जिनमें कभी वर्ग भेद नहीं था तो साफ पता चलता है कि उस समय जो भीतरी और बाहरी प्रकृति से तालमेल, संयोजन, व रिश्ता रखने वाले लोग थे, वे ही सभ्यता के विकास क्रम में पिछड़ गये थे, विकास की पगलाई रेस में पिछड़ जाने के कारण वे दमित और शोषित हो जाने के लिए अभिशप्त थे सो उन्हें विकसित लोगों की सेवा करनी पड़ती थी। उन्हें वर्चस्वी वर्ग सेवा के काम में लगा लिया करता था वह भी बमुश्किल तमाम और प्राकृतिक मान्यताओं व नियमों से अलग एक अलग किस्म का वर्ग समाज बन जाता है। और यहीं से विकसित समाज आदिम समाजों की पूरी संस्कृति ही लीलने लग जाता है। उनकी कथाओं, गीतों, संगीतों आदि को असभ्यों की संस्कृति साबित कर खुद से अलग करने लगता है। तथा खुद को सभ्यता का कोतवाल मानने लगता है। विकास के इस क्रम ने श्रमसंबधों को सेवक और स्वामी के दो अलग अलग खानों में बांट दिया। यहीं से प्रारंभ हुआ कुदरती समाज का विघटन, यानि शोषित, दमित, प्रताड़ित और नियोजित समाज और शासक, मालिक, शोषक का अप्राकृतिक स्वरूप। वर्चस्वी वर्ग के लोग ताकत के बल पर सेवा में लगे लोगों को समाज से अलग एक खाने में फेंक देते हैं, वे प्रकृति के करीब जीवन जीने वाले लोगों को उनसे प्रकृति के सारे उपहारों को छीन कर श्रमिक आदि बना देते हैं। यह एक विस्मयकारी कथा है यह सब मानव सभ्यता के विकास क्रम में ही हुआ है, जो कि पूरी तरह से अप्राकृतिक है। तो यह है मानव सभ्यता के विकास क्रम का अतीत। हम चाहे तो अतीत से कुछ अनिवार्य सबक ले सकते हैं और वर्तमान सभ्यता के मूल्यांकन में उस सबक का उपयोग कर सकते हैं। मानव सभ्यता के दौर में यह सब किया गया सामाजिक प्रबंधन और व्यवस्थापन के नाम पर, पर क्या यह जो व्यवस्थापन किया गया मानवीय समीपता के संदर्भ में उसके परिणाम सकारात्मक निकले, हमें पता है कि आदिम समाजों में आज के सभ्य समाज वालों को जो अव्यवस्था दीखती है वह उस समय की व्यवस्था थी, आत्म चेतना वाली समूहगत व्यक्तिगत कत्तई नहीं। व्यवस्था भी अव्यवस्था हो सकती है, जबकि अव्यवस्था हर हाल में अव्यवस्था नहीं होती। प्रकृति से एकाकारिता के कारण आदिम समूहों के लोग प्रकृति से अलग नहीं हो सकते थे जबकि सभ्यता के नाम पर उनकी प्रकृति से खिलवाड़ किया जा रहा था। ऐसे में जीवन जीने के लिए वे प्रकृति में ही जीवन जीने के संवेगों व ऊर्जा की तलाश करते हैं ऐसा करने में वे खुद को जीवित बनाये रखने के लिए कल्पित देवताओं की तलाश, पेड़ों, झाड़ियों, पहाड़ों आदि में करने लगते हैं, जीवन तो जीवन होता है, वे वन में थे और वन ही उनका जीवन था। वन में ही वे अपने देवी देवता भी सिरज लेते हैं, झाड़, फूंक ओझइती आदि करने लगते हैं। तो यह है वन्य समाज का प्रकृतिमूलक उदय और दूसरी तरफ एक ऐसे समाज का गठन जो पूरी तरह बनावटी, सजावटी और कृत्रिम तथा प्रकृति विरोधी होते हुए भी खुद को सभ्य प्रमाणित करवाने वाला और वैज्ञानिकता से ओतप्रोत बताने वाला। क्षमा चाहूंगा कृष्ण की कथा का संदर्भ लेने के लिए खासतौर से उन लोगों से जो कृष्ण को धर्म से जोड़ते हैं, पर कृष्ण धार्मिक यानि पारलौकिक कम लौकिक अधिक हैं। और कुदरती कथापरंपरा के नायक हैं। कृष्ण की कथा से अलग एक जनकथा के माध्यम से मैं अपनी बात रखने का प्रयास कर रहा हूं। बात बहुत सरल है पर वह कुदरती जमीन पर किस तरह से उपजती हैं सोचना यही है, मुझे नहीं पता कि इस जनकथा को किसने कहा, कब कहा पर मैं इस कथा को कुदरती जमीन से उपजी हुई कथा मानता हूं। कथा बहुत ही सामान्य है.. इसे कथा होने पर भी सवाल दागा जा सकता है। फिर भी आइए कथा के साथ दो कदम चलें.. ‘किसी जंगल में एक सियार रहता था। वह कुआंरा था, उसकी उम्र के दूसरे नर सियारों की शादियां हो चुकी थी, उसकी शादी के लिए प्रस्ताव नहीं आते थे। उसके मॉ बाप परेशान थे। वह भी परेशान था। एक दिन वह जंगल में घूम रहा था कि उसे रास्ते में पड़ा हुआ अखबार दिखाई दिया। उसमें एक फोटो छपी थी जो उसकी तरह दीख रही थी फिर क्या था, खुशी के मारे वह उछल पड़ा। अखबार में छपी अपनी जैसी फोटो देख कर उसे लगा कि अब उसका काम हो जाएगा। उसी वक्त एक दूसरे रास्ते से एक सियारिन भी आ गयी। सियार ने उसे रोका.. ‘कहां जा रही हो, थोड़ा रुको, देखो अखबार में मेरी फोटो छपी है।’ सियारिन ने अखबार देखा.. उसने अखबार कभी देखा नहीं था, सो उसने पूछा.. ‘यह किस पेड़ का पत्ता है?’ उसे क्या पता कि अखबार क्या होता है? ‘पागल कहीं की, यह पत्ता नहीं है, अखबार है। पर तूं का जाने अखबार के बारे में मूरख कहीं की। उसने उसे अखबार के बारे में बताया कि इसमें खबरे छपती हैं और वे सच होती हैं। जंगल के उस पार जो आदमियों की शक्ल में जानवर रहते हैं उनके लिए अखबार छपता है, इसमें देश दुनिया की खबरें छपती हैं, सरकार के बारे में छपता है, राजा के बारे में छपता है’ ‘तो का हुआ, अखबार है तो है, छपा करे उसमें राजा रानी के बारे में, हमैं ओसे का लेना देना, हमें अखबार काहे दिखा रहे हो?’ ‘मतलब है, सो दिखा रहा हूं, मुझे जंगल ही नहीं जंगल के बाहर रहने बसने वाले आदमियों का इस गजट के द्वारा राजा बना दिया गया है, अब मेरा हुकुम जंगल और गांवों दोनों जगहों पर चलेगा।’ सियारिन अखबार देखने लगी, उसे भी जान पड़ा कि सियार सच बोल रहा है, फोटो तो इसी की लगती है। सियारिन ने सियार को गंभीरता से देखा। उसके मन में सियार के प्रति आकर्षण हुआ जो प्रेम का एक रूप था। सियार ने सियारिन को बाहों में भर लिया। बात आगे बढ़ी, सियार ने सियारिन के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, उसे सियारिन ने सहर्ष स्वीकार लिया फिर दोनों की शादी हो गयी। समय बीतने लगा। एक दिन दोनों का मन हुआ जंगल से बाहर निकल कर घूमने का। दोनों जंगल से बाहर निकल गये। जब दोनों गांवों की तरफ गये तब देखा कि एक खेत में ईख लहलहा रही है। सियार का मन ईख देख कर ललच गया। दोनों खेत में घुस कर ईख तोड़ कर चूसने लगे। तभी खेत के मालिक ने उन्हें देख लिया फिर क्या था मालिक ने उन्हें हंका लिया। दोनों बिना देर किए जंगल की तरफ भागे, खेत का मालिक उन्हें हंकाता हुआ उनके पीछे पीछे दोड़ रहा था। कुछ दूर भागने के बाद सियार ने पीछे देखा, मालिक लौट चुका था। उसने सियारिन से कहा.. ‘अब सुस्ता लेते हैं, लगता है गांव वाले वापस हो चुके हैं’, दोनों थक भी गये थे..सियारिन चालाक थी.. ‘तुम भागे क्यों, तुम तो जंगल और गांवों के राजा हो, भला राजा अपनी परजा से डर कर भागता है?’ ‘चुप रहो! तूं का जानो राज काज’‘काहे हम नाहीं जानते हैं का राज काज। तूं तो चोर की तरह भाग रहे थे। जब तूं राजा हो, भागे काहे? कहा जाता है कि राजा तो परजा का प्यारा होता है, फिर परजा से काहे का डर’‘अरे तूं का जानेगी औरत जात, चूल्हा चौका करने वाली, तूं का जानेगी गांव वालों के बारे में, वह मेरी मूरख परजा है, उजड्ड, अशिक्षित और असभ्य और जंगल की परजा तो बुद्धिमान और आज्ञाकारी है। राजा तो हम हैं ही, तूं नहीं जानती कुछ भी, राजनीति कहती है कि समझदार राजा को मूरख परजा से बच कर रहना चाहिए, मूरख परजा गुस्से में किसी को नहीं पहचानती, चाहे वह राजा ही क्यों न हो। मारने पीटने पर उतर जाती है इसी लिए तो हमने गांव की मूरख परजा को अपने जंगल में आने से रोक दिया है। हमें पता है कि गांव वाले जंगल में आ कर हमारी सभ्यता खतम कर देंगे और जंगल में अराजकता फैला देंगे। यहां की एक एक ईच जमीन पर अपना मालिकाना बना लेंगे, तुझे तो पता है कि जंगल हम सभी का है, यहां रहने बसने वालों के जंगल पर बराबर बराबर अधिकार हैं। जंगल की हमारी लोकतांत्रिक सभ्यता के बारे में कम पढ़े लिखे, असभ्य, गंवार गांव वाले का जानें।’सियारिन मुस्कराने लगी, उसे अपने पति पर प्यार आ गया फिर तो वह उससे लिपट गयी। उसे लगा कि उसका पति झूठ नहीं बोल रहा।’ तो यह है एक सामान्य सी पर उल्लेखनीय कुदरती कथा। ध्यान देने की बात है, अखबार, राजा, मूरख परजा, व्यवस्था, राज काज ये शब्द इस कथा में आते हैं हमें विचार करना है कि क्या इन शब्दों के अर्थोंं को खोलने में यह जो कुदरती कथा है, बिना बनावट वाली, समर्थ नहीं है। इसे समझने के लिए हमें आयातीत विचारणों की जरूरत है, क्या इसकी तुलना में हम किसी समकालीन कथा को उद्धृत कर सकते हैं, जो राजा, और परजा के बीच पसरे अर्थों के एक एक रेशे की सहज व्याख्या कर सकती हो। तो यह है कुदरती कथाभाषा का एक रूप जिसे हम संवाद मानते हैं। इस कथा में संवाद साफ साफ है, पर्दे में ढका छुपा नहीं। इस कथा में अखबार ही नहीं मूरख परजा और आज्ञाकारी परजा, सभ्य और असभ्य, राज काज का भी रूप खुलता है, राजा तो खुलता ही है। इस तरह यह जो राजा है या राजा बनाये जाने की प्रवृत्तयां हैं वह भी खुल जाती हैं। क्या आपको नहीं लगता कि ऐसी कथाओं में पाठ वस्तु और पाठ वोध में पूरी तरह समत्वम् का अर्थवोध होता है। हमें गुनना होगा कि कहीं हमारा चिंतन और विवेक सियारिन वाला तो नहीं? और हम सियार जैसे स्वघोषित राजाओं और राजप्रबंधन के मकड़जाल में तो नहीं? साफ है कि हमारे चिंतन और विचारण की जमीन कुदरती रही है, सभै भूमि गोपाल वाली, रुपया हाथ का मैल है, हमारे कुदरती चिंतन में चित्त और चेतना दोनों अलग अलग नहीं ‘समत्वम्’ वाले भाव में हुआ करते हैं। वैसे भी जहां चित्त कुदरती हो चेतना कुदरती हो ही जाती है फिर तो व्यक्ति और समष्टि में, कृति और प्रकृति में, व्यक्ति और अभिव्यक्ति मंर फर्क नहीं रहता। ये सारे बुनियादी तत्व एकमेक होते हैं, एक दूसरे में यौगिक की तरह यह जो मानव और मानव में फर्क आगया है वह तो मौजूदा समय के राजनीतिक और सामाजिक संबधों में श्रमसंबधों की अवमानना के कारण। हमें पता है कि हमारी कथाभूमि कभी बाजारभूमि नहीं रही ह,ै इसी लिए कभी भी हम बाजार का विश्वास जीतने का प्रयास नहीं करते थे और हमें करना भी नहीं चाहिए। जबकि आज के समय में हम बाजार का विश्वास जीतने का ही प्रयास कर रहे हैं। वैसे सच है कि आज हम बाजार में हैं फिर भी हमें प्रयास करना होगा लुकाठी ले कर बाजार में खड़े होने की, पर हाथ में लुकाठी लेना तो हमें प्राच्यवादी बना देगा। और प्राच्यवादी बनना आधुनिक सभ्यता में शर्मनाक बिमारी की तरह है। हम आगे देखें कि पीछे देखें इसमें फसे हुए हैं इस देखने के बारे में लियोनार्दो की प्रसिद्ध पंक्ति है ‘हमें जो दिखायी देता है, उस पर यकीन नहीं करना चाहिए; अपितु जो दिखायी देता है उसे समझना चाहिए’ दिक्कत यही है हमारे दिल, दिमाग में सदैव बाजार के करतब नाचते रहते हैं और हम वफादार उपभोक्ता की तरह बाजार में खड़े होने तथा कोई पैकेट बनने की चाह में उलझे हुए बाजार का विश्वास जीतने की प्रतिस्पर्धा की तैयारियों में लग जाते हैं। तो जैसा कि लियोनार्दो ने कहा है कि हमें जो आज का राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक बाजार दिखायी देता है उस पर यकीन नहीं कर लेना चाहिए उसे समझना चाहिए, तो यह जो समझ का मामला है दरअसल वह है क्या? कथा की जमीनी दुनिया में कथाकारों के लिए आवश्यक हो जाता है कुदरती आवश्यकताओं की झील में उतरना, वहां जो कुदरती रत्न जैसे समता, भाई चारा, सहभागिता जैसे यथार्थ दफन किए जा चुके हैं, उनकी तलाश करना उनके सहारे अपनी कथाभाषा सृजित करना उसी अनुरूप की कथावस्तु के द्वारा दुनिया से संवाद करना ही सार्थक प्रयास होगा। जरूरी कथा सृजन के लिए अतीत को पुनः आविष्कृत करना तथा उसे वर्तमान से संयुक्त कर भविष्योन्मुख बनाना भी तो एक जरूरी कार्यभार है। हमें यह मान कर चलना होगा कि समकालीन सत्ता व्यवस्था और बाजार का प्रबंधतंत्र दोनों एक दूसरे में एकाकार हैं, दोनों में परिचालन संबधी समरूपता होती है, दोनों का अपना तंत्र होता है इसी लिए वे एक दूसरे के सहयोगी भी होते हैं, एक दूसरे के हितों के रखवाले भी होते है। ऐसे जटिल समय में कथा कार के लिए आसान नहीं है कुदरती जमीन पर पांव रखने भर की जमीन भी तलाश लेना सो वह विवश है उसी जमीन पर पांव रखने के लिए जिसे सत्ता या बाजार उसे उपलब्ध कराता है यानि बतौर कथाकार हमारे सामने संकट बहुत हैं फिर भी हमें उन संकटों से तथा उनके प्रायोजित घेरों से बाहर निकलना होगा। हमें कथा की उस भूमि से खुद को हर हाल में अलग करना होगा जिसे बाजार और सत्ता पुरस्कार, सम्मान व पद जैसे पट्टे पर उपलब्ध कराती है। बाजार का हमारे लिए सुभाषित है कि ‘लिखो ऐसा लिखो जिसके खरीददार हों, जो हाथों हाथों बिके।’ हमें अकर्मण्यता और मूढ़ता के आरोपों से निकलना होगा कि हम वही लिख सकते हैं जो हमसे लिखवाया जाता है, हम वही समझ सकते हैं जो हमसे समझवाया जाता है, तो क्या हम बाजारवादी तंत्र में उलझे हुए प्रकाशकों के चौखटों पर माथा नवाने की ही योग्यता वाले लोग हैं और मूढ़ नहीं हैं। यह सवाल हमें खुद से पूछना होगा और उस जाल से बाहर निकलना होगा जिसे सत्ता और बाजार तंत्र ने अपने बफादार आलोचकों, समीक्षकों या चिंतकों के गठजोड़ से बनाया हुआ है। जाहिर है चुनौतियां बहुत हैं फिर भी हताशा या माथा फोड़ लेने से काम नहीं चलने वाला। काम तो तब चलेगा जब हम कुदरती कथा को अपने जीवन की कथा बना लेंगे और उन चीजों से दूर रहने का प्रयास करेंगे जो हमसे हमारा चित्त और चेतना दोनों छीन लेने के लिए किसिम किसिम के तंत्र विकसित कर रहे हैं। निश्चित रूप से हमें कुदरती कथाभूमि को बंजर बनने से रोकने के लिए भारतीय परिवेश के कथाबीजों को कथाखेती के लिए आविष्कृत करना होगा। जाहिर है ऐसा करने के लिए हमें सामाजिक संरचना के ताने, बाने को गंभीरता से जांचना परखना होगा। दर असल आज का समय प्रकृतिमयता से बहुत दूर कृत्रिमता की तरफ भागने वाला है। ऐसे समय में बाजार या सत्ताप्रबंधन से जुड़ी ताकतें समाज की उभरती या उभर सकने वाली प्र्रतिरोधी चेतना से लैश ताकतों का विलीनीकरण सत्ताप्रबंधन में किसी न किसी प्रकार से कर लिया करती हैं फिर जो ग्रामीण चेतना या प्रकृति की चेतना के पोषक होते हैं वे भी सत्ताप्रबंधन के मुलायम कालीनों पर आसन जमाने की लालच में पड़ जाया करते है ऐसी स्थिति में हमें सावधान रहना होगा कि सामाजिक चेतना की समानधर्मा ताकतों का विलीनीकरण सत्ताप्रबंधन की बाजारू संस्कृति में न होने पाये जिनकी पात्रता हमारे कथासाहित्य तथा कथाभाषा दोनों के लिए अनिवार्य है।
कौन लिखेगा पुरखों पर कहानियां
रामनाथ शिवेंद्र
आज के जटिल समय में पुरखों को कहानियों में जगह नहीं मिल रही, मिलनी चाहिए कि नही विमर्श का विषय है। पुरखे यानि वरिष्ठ नागरिक ये न केवल अपने बनाये घर, मकान से बेदखल किये जा रहे हैं वरन् कहानियों, लेखों, संस्मरणों आदि से भी बेदखल किये जा रहे हैं। पुरखों पर कहानियॉ लिखने का प्रचलन नहीं के बराबर है। जबकि पुरखों के मुद्दे पर चर्चा करना, उन्हें कथाओं में लाना, एक तरह से मानव सभ्यताओं द्वारा अपनाये गये सत्ता कौतुकों के विमर्श का ही मामला है। पुरखे किसी टापू से प्रकट हुए अनजाने व्यक्ति नहीं हैं, किसी दूसरी सभ्यता का यात्री नहीं, बल्कि हमारे अपने पारिवार के मुखिया ही हैं। ये वही व्यक्ति हैं जिनकी गोदी में खेलते कूदते, चूमते, चाटते हम समझदार हुए हैं। ये वही मुखिया हैं जिनका बहुत ही कूट चालाकी से वरिष्ठ नागरिक में रूपांतरण किया जा चुका है या किया जा रहा है। हमें बहुत ही गंभीरता से परिवार के मुखिया यानि हमारे पुरखों का यह जो वरिष्ठ नागरिक के रूप में रूपांतरण है उसे समझना, व बूझना होगा। ऐसा अचानक नहीं हुआ है, इस रूपांतरण का सिलसिला बहुत पहले से ही आदिवासी से वनवासी, दलितों से अनुसूचित जाति आदि से प्रारंभ हो चुका है जिसके अपने विशेष अर्थ हैं। शब्दों के रूपांतरण पर बात करें तो साफ पता चलता है कि मामला हत्या का वध में रूपांतरण जैसा है। हत्या एक अपराध है जो सही तथा मान्य है पर वध को राजनीतिक जरूरत बताया जा रहा है जबकि हत्या और वध दोनों में ताकत से जीवन छीन लेने का ही काम किया जाता है। रावण का वध होता है, हत्या नहीं, कंश का वध होता है हत्या नहीं, यानि कि एक ऐसी हत्या जो समय (राजनीति) की जरूरत है वध है, वह हत्या नहीं है। तो यह जो परिवार के मुखिया का मामला है जिसे वरिष्ठ नागरिक में रूपांतरित किया जा रहा है उसे समझने के लिए हमें मानव सभ्यता के द्वारा स्थापित कराये गये परिवार की अवधारणाओं को समझना होगा। इसे समझने के लिए मुखिया से वरिष्ठ नागरिक के रूपांतरण की यात्रा पर निकल कर हमें देखना होगा कि यह जो वरिष्ठ नागरिक है, सभ्यता के किस पायदान पर है। मुखिया से वरिष्ठ नागरिक के पदस्थापन में उसे क्या, क्या हासिल होने वाला है तथा उससे क्या, क्या छिन जाने वाला है? साथ ही साथ यह भी समझना होगा कि क्या उसे कहानियों में वर्णित क्यों नहीं किया जा रहा? मानव सभ्यता लगातार कुदरतीतौर पर समय के साथ संघर्ष करती व उसे छलांगते हुए नये नये किस्म की अवधारणाओं व विचारों को सृजित करती रही है। अधुनातन बनने के क्रम में उसे अक्सर प्रचलित मान्यताओं, परंपराओं व रीति, रिवाजों से दो चार होने के लिए विवश होना पड़ा है। मानव सभ्यता जड़ परंपराओं के पोषण के बजाय संस्कृति के विभिन्न आयामों को अपनाते व तोड़ते हुए सामाजिक रिश्तों के गठन का कार्यभार संभालती रही है। अगर हम बीते समय के अनुमानों ( जिस पर ऐतिहासिकता का लेप चढ़ाया जा चुका है) को विश्लेषित करना चाहें तो साफ, साफ दिखेगा कि गुफा व जंगलों के बसावों वाला आदमी आज कहीं नहीं दिख रहा है, न उसकी संस्कृति दिख रही है और न ही उसका आचरण दिख रहा है। मानव तो तब भी मानव था, उसकी जरूरतें थीं, उसका अपना समाज था। जरूरतों को पूरित करने के लिए हमारे पुरखों ने तत्कालीन समय से मुठभेड़ करते हुए जिन जिन प्रारंभिक खोजों, आग, जल, कुदाल, गुफा, खाद्यान्न आदि को खोजा था वे आज भी उदाहरण हैं। आज हमारे पास अपने पुरखों के समय के साथ लगातार कठिन मुठभेड़ों तथा टकराहटों की क्षमताओं को देख व जान सकने के लिए न कोई साधन हैं और नही औजार हैं, हां आधे अधूरे अनुमान हैं जिसके आधार पर हम यह जान सकते हैं कि हमारे पुरखों ने कैसे आग, व खाद्यान्न आदि को खोजा होगा। अगर हम उस समय में उतरना चाहें तो कई तरह के सवाल खुद खड़े हो जाते हैं जैसे यही कि क्या आज जो मानव संबधों में रिश्तों की सबल बुुनावट है वह उस समय भी थी या वह दुनिया पशुवत रिश्तों की तरह थी पूरी तरह से उन्मुक्त, वर्जनाओं से परे। हमें पुराने समय में उतरने के पहले यह जान लेना आवश्यक होगा कि हम जो आज मानव संबधों के पतन के बारे में चिन्तित हैं, हमें कहीं न कहीं लगता है कि हम लगातार पतित होते जा रहे हैं। हमारे समाज के पवित्र और शुचितापूर्ण रिश्तों में गिरावट आती जा रही है। हम अब मानव समीपता से कोशों दूर हो चुके हैं। हमारे लिए सहभागिता और सहकार बेमतलब के शब्द हैं। रिश्तों के बनावट की बात करें तो हमारे समाज में उसकी शुरुआत परिवार से शुरू होती है। ज्योंही हम परिवार की अवधारणाओं पर मंथन करते हैं त्योंही हमारा मन रिश्तों की शुचिता से पवित्र हो जाता है। मॉ दिखने लगती है, पिता दिखने लगते हैं, भाई दिखने लगते हैं, बहन राखी बांधने लगती है और सामने पत्नी का किकुड़िया चेहरा प्रकट हो जाता है, बच्चे किलकारियां भरने लगते हैं। उस समय दृश्य की अद्भुत दुनिया में हमें चले जाना होता है और ऐसा अचानक या आकस्मिक नहीं होता है। इसके लिए निश्चितरूप से हमारे पुरखों ने जी जान लगा दिया होगा फिर रिश्तों की पवित्रताओं को कायम करा सके होंगे। कुदरती तौर पर देखा जाये तो पशु और मानव में कई तरह के फर्क होते हुए भी कुछ मामलों में फर्क नहीं दिखता, खासतौर से नर और मादा वाले संबधों में। मानव सभ्यता के विकास क्रम में संभव है मानव, पशुओं की तरह ही रहा हो, उनमें रिश्तों की वर्जनांए न रही हों क्योंकि कुदरत तो केवल नर और मादा को ही सिरजती है, तो बहुत हद तक संभव है कि मानव भी सेक्स संबधों के मामलों में केवल नर और मादा ही रहा हो। नर और मादा वाले अव्यवस्थित कुदरती संबधों को व्यवस्थित करने के क्रम में हमारे पुरखे काफी जद्दो जेहद करते हुए परिवार और कबीले की अवधारणा तक पहुंचे होंगे फिर परिवार अस्तित्व में आये होंगे। फिर नर और मादा के रहने के तौर तरीकों में वर्जनायें आई होंगी, निषेध आये होंगे, यह सोचना कि परिवर तो यूं ही हमारे जीवन में रच, बस गये होंगे गलत है। आज हम जिस खुलेपन की बातें कर रहे है उसमें कहीं न कहीं परिवार के अस्तित्व का इनकार भी है, संबधों में चल रहे वर्जनाओं का इनकार है। आज की सभ्यता अपनी तरह से स्वीकार और अस्वीकार को सिरज रही है, रिश्तों की वर्जनाओं को नकार रही है। हम जानते व मानते हैं कि परिवार की अवधारणा में रिश्तों की वर्जनाओं का पवित्र गुंथन होता है, वर्जनायें टूटी नहीं कि परिवार की पवित्रता खतम। मानव सभ्यता अपने अस्तित्व काल से ही कहीं न कहीं लिंगभेद का शिकार रही है। यह जो लिंगभेद वाला मामला है, बहुत ही गंभीर मामला है जो सीधे , सत्ता व ताकत से जुड़ा होता है जिसके कारण अलग तरह की हमारी सामाजिक तस्वीर बनती है हालांकि कोशिशें लगातार की जा रही हैं कि मानव सभ्यता की तस्वीर कुरूप न होने पाये पर वास्तव में है कुरूप ही। मानव संबधों में रिश्तों का आधार परिवार है, जिसे हम आज टूटता और खंडित होता देख रहे हैं। हमारी सभ्यता ने जिस संयुक्त परिवार को सामाजिक संबधों का आधार बनाया था, वह आज के समय में बुरी तरह टूट रहा है, हम लगातार संयुक्त परिवार से एकल परिवार की संरचना को अपनाने लगे हैं जिसका मतलब होता है पति पत्नी और बेटे वाला परिवार, ऐसे परिवार में चाचा, चाची, भाई भाभी, मॉ, बाप आदि को शामिल नहीं किया जाता, उन्हें परिवार के एक अलग और विभत्स खाने में छोड़ दिया जाता है। यहीं से आरंभ होता है, एक नये किस्म का संकट, इस संकट के सबसे अधिक प्रताड़ित मॉ, बाप आदि होते हैं, जिन्हें परिवार का मुखिया कहा जाता था। ऐसा तब होता है जब वे उमर के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके होते हैं। निरीह और असहाय हो चुके रहते हैं। संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक की यात्रा अचानक नहीं है इसे पूंजीमूल्यवोधों ने रचा है जो निजता को बढ़ावा देती है सामाजिकता को नहीं। हमारी विधिक सभ्यता ने कानूनी रूप से ऐसे जनों के लिए एक शब्द उपहारित किया हुआ है जिसे ‘वरिष्ठ नागरिक’ कहा जाता है। दर असल समझना यह है कि यह जो वरिष्ठ नागरिक है जिसे काननू का भी समर्थन मिला हुआ है, वह आज के समय में क्या चीज है? वरिष्ठ नागरिक की बात करें तो यह जो शब्द ‘वरिष्ठ’ है बहुत ही चित्ताकर्षक है, मन को छूने वाला, सम्मान का प्रतीक पर क्या ऐसा है? कत्तई नहीं। पहले के समय में यही वरिष्ठ परिवार का मुखिया हुआ करता था, मुखिया यानि ‘मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक’ वाला, मुखिया माने परिवार का सत्ता प्रमुख। पर समय के साथ मुखिया तथा परिवार दोनों की अवधारणायें विखंडित हुई जिन्हें विखंडित होना ही था। आज का हमारा समय वैसे भी सत्ता तथा सत्ताओं के विखंडन वाला है। समाज हो, देश हो, चाहे किसी भी तरह की सामाजिक संरचना हो हर जगह सत्ता के अलग अलग केन्द्र उत्पादित होते जा रहे हैं, कुल मिला कर सत्ता की केन्द्रीयता आज संकट की स्थिति में है। इस संकट की प्रारंभिक पाठशाला हमारी पारिवारिक संरचना है जाहिर है इसे देश स्तर तक भी जाना है। सत्ता की केन्द्रीयता का विघटन आज के समय के लिए एक तरह से जरूरी होता जा रहा है। केन्द्रीय सत्ता के विघटन को हम अपने देश की राजनीतिक सत्ता प्रबधन में देख सकते हैं। ऐसा होना अनायास नहीं है। यह जो संयुक्त परिवार से एकल परिवार की यात्रा है, इसी में छिपे हुए हैं सत्ता के विघटन के कीटाड़ु जिसे आज के समय का वायरस कहा जाना चाहिए। यहां यह बहस बेमानी है कि क्या सत्ता केन्द्रों के विघटन का मामला जनहित के विपरीत है? समाज के विपरीत है? सवाल जनहित तथा समाजहित का नहीं है, सवाल है महिमामंडित किए जाने वाले वरिष्ठ नागरिक का, इस वरिष्ठ नागरिक का क्या होने वाला है? पारिवारिक स्तर पर, समाज के स्तर पर, देश के स्तर पर। मेरा मानना है कि यह जो आज के समय का वरिष्ठ नागरिक है, उसे एक ऐसा निरीह व्यक्ति बना दिया जा रहा है जिससे कत्तई प्रमाणित नहीं होता कि उसका भी अपना कोई परिवार है या था। नागरिकता वैसे भी पारिवारिकता के विपरीत होती है, उसमें वह सुगंध नहीं जो भाई, गोती में होती है। आज की दुनिया भाई, गोती से बाहर निकल चुकी है, वह पार्टनर व मेम्बर तक जा पहुंची है, थोड़ा आगे बढ़ कर नागरिकता तक। नागरिकता से पारिवारिकता का लगाव या स्नेह का दूर दूर तक कोई नाता नहीं। यह तो महज एक विधिक प्रपंच है। इससे परिवार को वोध नहीं होता, नागरिक तो महज नागरिक होता है, मत देने वाला एक व्यक्ति, कानूनों को अपनी पीठ पर चिपका कर चलने वाला एक निरीह और शारीरिक रूप से कमजोर। परिवार के मुखिया का वरिष्ठ नागरिक में रूपांतरण उसकी पारिवारिकता छीन कर उसकी पूरी मर्यादा को लील लेता है। अब तो राजनीतिक खेलों की माहिर कुछ आत्ममुग्ध सरकारें साफ साफ बोल रही हैं कि जो साठ के पार हैं, वे बेकार हैं। साठ साल के बाद रिटायर होने वाले राज्य कर्मचारियों की तरह। गोया यह जो साठ साल वाला मामला है, व्यक्ति की उपयोगिता के समापन की खुले आम विधिक घोषणा है। एक आदमी की उपयोगिता को साठ साल की उमर के आधार पर तोलने वाला समाज आखिर यह जो वरिष्ठ नागरिक है उसे क्यों और किस लिए सम्मान देगा? उसका सम्मान तो उसके साठ साल समाप्त होने के साथ चला गया। वह तो साठ साल के बाद विलुप्त हुआ एक आदमी भर है, जो जीवित है। उसका जीवित रहना और जीते रहना एक विडंबना है। वरिष्ठता एक प्रकार से सत्ता से वनवास का भी मामला है, वनवास कम से कम हम भारतीयों को तो भली भांति पता है, यह जो वनगमन का संदर्भ है वह हमें अरण्यक सभ्यता तक ले जाता है जो पूरी तरह से नागर सभ्यता से अलग तरह का संदर्भ देता है। आज तो पता ही नहीं चल रहा है यह जो वरिष्ठ नागरिक है वह किस सभ्यता का सदस्य है, अरण्यक या नागर। इन दोनों सभ्यताओं में वरिष्ठ नागरिक सत्ता व आकांक्षा विहीन महज एक व्यक्ति होता है, चाहे तो जिए या मर जाये। वैसे भी वरिष्ठ नागरिक बढ़ती उम्र के अन्तर्विरोधों व विसंगतियों के कारण पारिवारिक सत्ता प्रबंधन को संभाल सकने में उतना समर्थ नहीं हो सकता जितना कि परिवार के दूसरे अल्पायु वाले होते हैं। यहां मामला राम की खड़ाऊ वाला नहीं है। वह त्रेता का काल था राम की खड़ाऊं को सिहासन पर सुशोभित करा दिया गया था मान कर कि राम नहीं हैं तो क्या हुआ उनका खड़ाऊं तो है ही। आज तो सभी को सत्ता चाहिए, प्रदेश देश की नहीं तो कम से कम परिवार व गांव की तो मिले। हमें पता है कि परिवार भी सŸाा का केन्द्र ही होता है, कुछ अपवादों को छोड़ कर इस परिवार सत्ता पर नर ही काबिज हैं। यहां खुले आम लिंगभेद के कारकों को देखा जा सकता है। भारतीय समाज में वरिष्ठ नागरिकों के प्रति छीजते जा रहे शुचिता पूर्ण रिश्तों के लिए सत्ता विघटन एक महत्व पूर्ण कारक है क्योंकि सत्ता अधिग्रहण में रिश्ते नहीं चला करते, सत्ता महज सत्ता होती है, वह मॉ बाप, भाई बहन आदि नहीं देखा करती, सत्ता के लिए तो हर व्यक्ति (नागरिक) महज एक शासित होता है चाहे वह बाप हो मॉ हो या कोई भी। सत्ता पर बैठा आदमी शासक में तब्दील हो कर हुकूमत के दांव पेंचों को खेलने लगता है। वरिष्ठ व्यक्ति अपने घर में ही, जिसने उसे खुद बनाया और गढ़ा होता है अनजाना हो जाता है, वह अपने ही लोगों के बीच जिनसे उसका रक्तसंबध होता है सत्ता का प्रतिपक्ष बन जाता है, उससे आर्थिक ही नहीं सामाजिकप्रबंधन के सारे अधिकार बिना देर किए छीन लिए जाते हैं फिर तो उसका अपना घर भी अपना नहीं रह जाता, उसका अपना बेटा, बेटा नहीं रह जाता, वे सारे के सारे सत्ता के नियामक बन जाते हैं, उनके बनाए कानून घर में लागू किए जाने लगते हैं और वरिष्ठ नागरिक किसी आराध्य की प्रार्थना में खुद को डुबो लेने के लिए विवश हो जाता है। तो यह है वरिष्ठ नागरिक निरीहता की पीठ पर सवार, सत्ता का विकलांग जो अपने द्वारा सृजित परिवार को केवल देख व सुन सकता है, पर कुछ बोल नहीं सकता। इतना ही नहीं वह अपने उत्तराधिकारियों के सत्ता कौतुकों पर न रो सकता है और नही गुनगुना सकता है। जीवन के आखिरी पड़ाव पर जब सारा कुछ उससे छीना जा चुका होता है उसे समझ में आने लगता है कि ‘सब धन धूरि समान’ गलत नहीं कहा गया है जिसे एकत्र करने के लिए उसने क्या क्या नहीं किया। ऐसा उसके साथ क्यों किया जा रहा है, इसका उत्तर वह खुद से भी नहीं पूछ सकता, इसका उत्तर तो उसके उत्तराधिकारियों के पास है, भला उत्तराधिकारी इसका उत्तर क्यों देंगे। ऐसे पुरखों की वेदनाओं, विडंबनाओं को कहानियों में ढालना कथाकारों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं। हमें आशा करनी चाहिए कि कथाकार पुरखों के बारे में गुनेंगे।
वनवासी राम के बहाने समकालीन
कथासाहित्य पर कुछ बातें
रामनाथ शिवेंद्र
तमाम बिडंबनाओं के बावजूद हमें ‘राम, कृष्ण और शिव’ की चर्चित कथायें सदैव प्रभावित करती रही हैं। इन कथाओं के अलावा दुनिया के लोग शायद ही किसी दूसरी कथा को जानते होंगे जो इन कथाओं के मर्म को फलांग सकंे। इन कथाओं के अपूर्व होने पर मुझे सन्देह नहीं। ‘राम’ का वनवासी रूप हमें आज के भौतिकवादी समय में जितना प्रभावित करता है उतना किसी और कथापात्र का नहीं। कथा पढ़ते या सुनते ही सांसें फूलने लगती हैं। लगता है कि कोई ऐसा व्यक्ति हो ही नहीं सकता जो मर्यादा के बंधन में खुद को जकड़ ले क्योंकि बंधन कुदरती नहीं होता है। व्यक्ति सदैव स्वतंत्र रहने का आकांक्षी होता है। यह बात अलग है कि उसकी स्वतंत्रतायें बाधित कर दी जांयें या छीन ली जायें, जैसा कि हुकूमतें हर काल में किया करती रही हैं। मानव सभ्यता के विकासक्रम में कोई ऐसा काल नहीं जब मानव सभ्यता की कुदरती आजादी को तमाम पाबन्दियों में न रखा गया हो, भले ही वह काल दीर्घ न रहा हो, अल्प ही रहा हो। सत्ता तो हर काल में व्यवस्था और शान्ति स्थापनाओं के नाम पर तमाम तरह के रंगीन कानूनों के द्वारा अपने नागरिकों को आच्छादित करती रही है। बहरहाल यह प्रसंग सत्ता कौतुकों के विमर्श की तरफ ले जाता है जिसे यहां प्रस्तुत करना प्रासंगिक नहीं होगा। समझना होगा कि यह जो राम का मर्यादा वाला रूप है, खुद को नियंत्रित व प्रतिबंधित करने वाला (राम तो राज कुमार थे, उनकी आजादी को भला कौन बांध सकता था) क्या सरल और तरल है, क्या उसे बचाने में एक मनुष्य के नाते राम की जो स्वतंत्रतायें थीं, वे छिन नहीं गयीं? या उन्हांेने खुद से अपनी स्वतंत्रताओं का परित्याग नहीं किया? क्या यह अचरज नहीं है कि ‘राम’ अपनी वैयक्तिक स्वतंत्रताओं के त्याग के बाद भी पूरी मानवीय गरिमा के साथ सामान्य मनुष्य की तरह कथासमय के साथ भाग रहे हैं, यह जो राम की समान्यता है, राजा से परजा बनने की तरफ की छलांग है, विचारणीय है, जबकि ऐसा होता नहीं। लोग तो खुद को समाज के विशेषाधिकार प्राप्त खानों में स्थापित करने के लिए ही लालायित व उत्सुक रहते हैं। पर ‘राम’ ऐसा नहीं करते, वे तो राजा से परजा की तरफ छलांग लगाते हैं। आखिर खुद को नियंत्रित कर सामान्य बने रहने का चयन ‘राम’ ने क्यों किया? उनका काल था त्रेता वाला, सत्युग के ठीक बाद वाला, कहीं उसका प्रभाव तो ‘राम’ पर नहीं था? माना जाता है कि सत्युग का काल संपूर्ण मानवीय स्वतंत्रता व समत्व वाला काल था। उसके बाद के काल का नायक भी तो सत्गुण वाला ही होगा भला वह तामस प्रवृत्ति का कैसे हो सकता है? ‘राम’ का वनगमन दुनिया के इतिहास में एक असाधारण घटना है। वे वनगमन का चयन करके वनवासी हो जाते हैं पर सत्ता व्यवस्थापन पर सवाल नहीं उठाते, अपने सामान्य से अधिकारों के लिए भी सवाल नहीं उठाते, कम से कम इतना तो सत्ता व्यवस्था से पूछ ही सकते थे कि उन्हें वन में क्यों निर्वासित किया जा रहा है या उनके उŸाराधिकार को क्यों छीना जा रहा है, वह भी बिना कारण बताये। ‘राम’ का वनवास या निर्वासन तत्कालीन सत्ता व्यवस्था पर सवाल की तरह चिपका हुआ है। थोड़ा गंभीरता से सोचने पर स्पष्ट हो जाता है कि हर काल का सत्ता प्रबंधन एक ही तरह से काम करता रहा है, भले ही वह काल राम का ही क्यों न रहा हो। सत्ता प्रबंधन से जुडी कैकेई की इच्छा राज्यादेश में तब्दील हो जाती है। किसी व्यक्ति की इच्छा का राज्यादेश में तब्दील होने का यह एक चिंतित करने वाला उदाहरण है। मजा यह कि राम उस आदेश को सहर्ष स्वीकर लेते हैं और वनगमन कर जाते हैं, वे प्रतिकार नहीं करते उनके सामने मर्यादा का सवाल था, वे किसी भी हाल में मर्यादा नहीं तोड़ सकते थे। मर्यादा और अधिकार पर विमर्श का एक जरूरी आधार राम वनगमन के द्वारा छोड़ जाते हैं। सवाल है मर्यादा और अधिकार के बीच के फर्क का। मर्यादा क्या होती है और कैसे बनती है, यह सारा कुछ वैयक्तिक होता है, व्यक्ति उसका खुद मानक और प्रमाण होता है। मर्यादा निजता के अन्तर्वोध की उपज होती है, जहां चित्त और चेतना एकाकार हो कर समूहगत हो जाती हैं, वहां ‘निज’ जैसा कुछ नहीं होता। जबकि अधिकार तो सत्ता प्रबंधन द्वारा प्रदान किया गया महज एक औजार होता है जो सामन्य से विशेष की तरफ ले जा कर वगीकृत करता है। आज की उपभोक्तावादी समय में मर्यादा और अधिकार में से किसी एक का चयन करना हो तो अधिकार का पक्ष ही चुना जायेगा मर्यादा का नहीं, पर राम के लिए संकट है। वे मर्यादा का चयन करते हैं और वनगमन कर जाते हैं, वे प्रतिवाद नहीं करते। वे अपने अधिकारों को मर्यादा से ऊपर नहीं रखते। तो ये हैं राम, जो स्वेच्छया अपने कुदरती अधिकारों का परित्याग करते हैं और मर्यादा के कठिन और जटिल रास्तों पर निकल पड़ते हैं। वनगमन के अलावा आप देखें पूरी रामकथा में सीता का अपहरण एक ऐसी दूसरी परिघटना है जो राम के संपूर्ण व्यक्तित्व को खोलने का काम करती है और इस घटना के घटने का कारण होता है राज्यादेश के अनुपालन के लिए राम का वनगमन। तो यह जो राम का वनगमन है पूरी दुनिया के लिए एक कथानक के रूप में अपूर्व और अद्भुत है। ऐसे वनगमन का कथानक दुनिया के किसी सभ्यता में नहीं है। राम चाहते तो अयोध्या छोड़ कर किसी दूसरे राज्य में जा कर अपना आश्रय तलाश कर सकते थे, उन्हें उस समय का कोई राज्य राज्याश्रय दे ही देता। पर राम ऐसा नहीं करते। राज्यादेश के अनुपालना में वे सहर्ष वनगमन करते हैं, तो हमें देखना है कि यह जो राम के द्वारा लिया गया वनगमन का निर्णय है, वह क्या रामकथा को आगे छलांग लगाने भर का निर्णय है या इसके अर्थ कुछ दूसरे हैंं। जहां तक मुझे पता है राम के वन गमन वाले निर्णय पर गंभीरता से विचार ही नहीं किया गया है, जबकि पूरी रामकथा में यह जो राम का वनगमन है अपूर्व और अद्भुत कथानक है। ऐसी कथा मानव सभ्यता के इतिहास में कहीं नहीं है। किसी संभावित राजा के वनगमन का निर्णय सरल नहीं है आखिर वन ही क्यों? राम तो नागर समाज के थे पर हमें ध्यान देना है कि राम मर्यादा पुरुष हैं, मर्यादा के बंधन से बंधे हुए हैं, वे जानते हैं कि उनके लिए वन ही वह स्थान है जहां वे अपने चिŸा और चेतना दोनों को नियंत्रित रख सकते हैं। वन एक ऐसा स्थान है जहां सामाजिक व राजनीतिक प्रबंधन में कोई घालमेल नहीं है, रिश्तों में चालाकियां और कलाबाजियां नहीं होती हैं, वन के लिए नागर और अरण्यक का कोई अर्थ नहीं। सो वे वनगमन करते हैं। यह जो राम का वनगमन है, रामकथा के शुभेच्छुओं के लिए चिंतन मनन के कई दरवाजे खोल सकता है, अगर वे चाहें तब। वे मानवीय भिन्नता के भेदों के रहस्यों तक भी इस कथा के माध्यम से पहुंच सकते हैं, समझ सकते है कि आदमी और आदमी में भेद नहीं होता। हर आदमी प्रकृति का बेहतर उत्पाद होता है। राम वनगमन न करते तो सीता का अपहरण नहीं होता, बालि नहीं मारा जाता, उन्हें हनुमान जैसा भक्त भी नहीं मिलता और नही लंका विजय होता। तो ये सारे घटनाक्रम राजप्रबंधन से जुड़े हुए हैं पर जो शबरी वाला प्रसंग है वह तो दूसरी कथा के रूप में रामकथा में महत्वपूर्ण स्थान पाता है जो राम के वनवासी होने के रूप को उद्घाटित करता है। वनवासी राम और अयोध्या के राम में कोई तुलना नहीं क्योंकि अयोध्या के राम के लिए तो कुछ करना ही नहीं था। एक राजा की तरह वे उŸाराधिकार का ही तो वे सुख भोग सकते थे। जबकि वनवासी होकर राम पूरी तरह अरण्यक सभ्यता के नागरिक बन जाते हैं अरण्यक यानि आदिवासी सभ्यता, वन की सभ्यता, जो कुदरती होती है, कुदरती जमीन पर उगती है, जहां स्वामित्व और नियंत्रण के रोग नहीं होते पूरी तरह समत्व पर आधारित एक ऐसी सभ्यता जिसका जीवन ही वन हो, वन की तरह हरा भरा, उन्मुक्त, जीवन के रागों को गुनगुनाता। आदिवासियों के बीच राम का जो रूप है वह अयोध्या वाला नहीं है, वे वहां राजा नहीं हैं, वनवासी हैं, सबके प्रिय हैं, चित्त और चेतना के साधक हैं, प्रकृति की तरह प्रकृतिमय है। आदिवासियों की लोककथाओं में सीता के अपहरण का प्रसंग बहुत ही अश्रुपूर्ण है, उनकी लोक कथाओं से यह मालूम नहीं होता कि रावण विद्वान था केवल इतना पता चलता है कि रावण अत्याचारी था और उसने छल करके सीता का अपहरण किया था। यह भी मिलता है कि रावण लंका का राजा था। धांगरों और खरवार जनजातियों में एक गीत गाया जाता है जिसके बीच में आता है..
‘सीता मइया के भगाय ले गयल बभना हो, उहै बभना जवन देलेस भगाय, बिभीसन के रजवा (राज्य) से हो।
सीता के अपहरण का कथानक आदिवासियों के गीतों में कई तरह से ढला हुआ है। यहां यह ध्यान देने लायक है कि उनके गीतों में रावण को राजा के रूप में नहीं देखा जाता है, रावण उनके गीतों में उपस्थित है एक ब्राह्मण के रूप में। इससे यह पता चलता है कि आदिवासियों में सत्ता प्रबंधन या राजा के बारे में कोई विमर्श नही था, वहां विमर्श है जाति पर। ऐसा लगता है कि राम के काल में भी जाति के सवाल मौजूद रहे हैं भले ही वे प्रमुख न रहे हों, पर रहे हैं। इस गीत से दूसरी सूचना मिलती है कि वनवासी राम आदिवासियों में वनप्रसंगों के कारण अधिक लोकप्रिय हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि वे अयोध्या के राम के रूप में कम लोकप्रिय हैं। आदिवासियों के विस्थापन की कहानियां किसे नहीं मालूम। राम भी अयोध्या से विस्थापित किये गये थे। संभव है नागर सभ्यता के पोषकों ने उस समय भी तमाम अवोध व कमजोर लोगों को विस्थापित किया हो। और जंगल में विस्थापितों का ही वर्गसमूह निवास करता रहा हो, वे भला राम को क्यों नहीं मान, सम्मान देंगे? हम जानते है कि आधुनिक सभ्यता ने कारखाना बनाने के नाम पर मुख्यतः आदिवासियों, वनवासियों को ही विस्थापित किया है, उनसे सरकारों ने वन की अंतरंगता को छीन लिया है, विस्थापन की इस स्थिति पर एक आदिवासी गीत देखें जो राम को समर्पित है... ‘जनमवा काहे देला राम!
भात भात लरिका नरियांय, बनिया मांगे दाम.. जनमवा काहे देला राम! करजा काढि खेतवा रोपली, उहो गयल झुराय, बरधा बेचि के दरोगवा के देहली, बनवा से देलेस निकाल। जनमवा काहे देला राम!’
राम को समर्पित इस गीत से स्पष्ट है कि आदिवासी समूहों में राम उनके यहां भी उनके अन्य राजा लाखन, मघन्त, दूल्हा देव, बड़ा, भासुरिया, भैरव माता, आदि देवी देवताओं की तरह पूज्य हैं। पूज्य तो उनके गीतों व पारंपरिक पूजाओं में हनुमान, काली माई आदि भी हैं। सामान्यतया आज के आदिवासी पहले वाले नागर और अरण्यक सभ्यता में विखंडित आदिवासी नहीं हैं, वे अब मुख्य धारा की तरफ लौटते हुए लोगों में हैं, वे बदल रहे है, पूजा और आराधना के क्षेत्रों में तो उनमें उल्लेखनीय बदलाव हुए हैं। हां वे आर्थिक रूप से भी बदलना चाह रहे है पर यह जो स्वामित्व और पूंजी पर टिकी सŸाा है उनके बदलावों के प्रति उदार नहीं है। जहां तक आदिवासी समाज में राम की उपस्थिति का सवाल है वह एक अलग तरह का सवाल है। राम तो सभी के हैं, राम के लिए नागर और अरण्यक का कोई मतलब नहीं। पूरी रामकथा चाहे वह जिस किसी के द्वारा लिखी गयी हो उसमें वर्णित राम को किसी जाति विशेष के खानों में नहीं बांटा जा सकता। राम की असल कथा तो वनगमन से प्रारंभ होती है। वे वनगमन के बाद ही शबरी से मिल पाते हैं, वनगमन के बाद ही उन्हें पता चलता है बालि के बारे में। तो यह जो बाली और सुग्रीव है, यह जो शबरी है, सभी आदिवासी हैं। राम कथा प्रसंगों में निषाद, राक्षस, शबर, वानर, नाग आदि जैसी जन जाति का संदर्भ आता है, जाहिर है राम का संपूर्ण मानवीय कर्म वन में ही फलित होता है। अयोध्या का लंका तक का फैलाव उस और में कोई साधारण कार्य भार नहीं था पहले तो अयोध्या केवल अयोध्या था उसका फैलाव लंका तक नहीं था। इस संदर्भ में यहां डा. लोहिया को उल्लिखित करना आवश्यक है। ये वही लोहिया जी हैं जोे रामायण मेले का आयोजन अयोध्या में करवाते रहे हैं। पहली बार किसी राजनेता ने राम कथा को राजनीति की कथा की तरह देखा था, और कहा था.. ‘धर्म दूरगामी राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म’ ‘राम का जीवन बिना हड़पे (राज्य) हुए ही फैलने की कहानी है। उनका निर्वासन देष को एक षक्तिकेन्द्र के अन्दर बांधने का एक मौका था। इसके पहले प्रभुत्व के दो प्रतिस्पर्धी केन्द्र थे, अयोध्या और लंका। अपने प्रवास में राम अयोध्या से दूर लंका की ओर गये। रास्ते में अनेक राज्य और राजधानियां थीं जो एक या दूसरे केन्द्र की मातहत थीं। मर्यादित पुरुष राम की नीति निपुणता की सबसे अच्छी अभिव्यक्ति तब हुई जब राम ने रावण के राज्यों में एक बड़े राज्य को जीता, उसका राजा बालि था। बालि से उसके भाई सुग्रीव, और सेनापति हनुमान दोनों अप्रसन्न थे, वे रावण के राज्य से निकल कर राम की मित्रता और सेवा में आना चाहते थे।’^भारत माता धरती माता, डा.. राममनोहर लोहिया पृ. 69 तो यह है राम का सार्वभौम मानवीय व्यक्तित्व। वे अयोघ्या का फैलाव लंका तक कर जाते हैं पर बिना किसी साम्रज्यवादी क्रूरता से। राम सुग्रीव की व्यथा का साक्षी बनते हैं और उन्हें ही बालि के जीते हुए राज्य का राजा बना देते हैं। ये वही सुग्रीव हैं जो लंका विजय अभियान में पूरी निष्ठा के साथ राम का सहयोग करते हैं। और हनुमान, जो कभी सुग्रीव के सेनापति हुआ करते थे वे तो राम के अपूर्व भक्त हो ही जाते हैं तो ये हैं राम, अपनत्व के प्रतीक, जो भी उनके करीब आया उनका हो गया। यहां विभीषण का उल्लेख करना भी आवश्यक है, राम पूरी आत्मीयता और सहृदयता से विभीषण का साथ देते हैं और लंका विजय के बाद उन्हें लंका का राजा बनवा देते हैं। पूरे निर्वासन के दौरान हुए संघर्षों से पाया हुआ कोई भी चीज राम अयोध्या नहीं ले आते सब वहीं छोड़ देते हैं, चाहे लंका का संदर्भ हो चाहे बालि के राज्य का, दोनों राज्यों को राम स्वतंत्र छोड़ देते हैं, उन्हें पराधीन नहीं बनाते, कुल मिला कर अयोध्या में नहीं मिलाते जैसा कि साम्राज्यवादी ताकतें किया करती हैं। राम ऐसा नहीं करते। जाहिर है कि राम पराधीनता का दर्द जानते थे सो वे लंका और सुग्रीव के राज्य को स्वतंत्र ही रहने देते हैं उन्हें अयोध्या में विलीन नहीं कराते। तो यह है राम के कृत्रित्व की मानवीय समीपता। राम दूसरे राजाओं से जिस मैत्रीपूर्ण रिश्ते का निर्वहन करते हैं और जिस तौर तरीके से करते हैं उसे कम से कम उन देशों को नकल करने की आवश्यकता है जो राज्यों को हड़प करना आपना कर्तव्य मानते व जानते हैं, पर क्या ऐसा हो सकेगा? राम के वनगमन के कथानक की स्वीकार्यता का सवाल पूरी सभ्यता के स्वीकार्यता से जुड़ा हुआ है। शबरी के जूठे बैर खाने वाला कथानक तो अपने आप में एक अपूर्व उदाहरण हैं जिससे संभावना बनती है कि राम और शबरी में निश्चित रूप से कोई विशेष लगाव या बंधन रहा होगा नहीं तो समान्यतया कोई किसी का जूठा नहीं खाता। बंधन और लगाव के संदर्भ में यह प्रसंग विचारणीय है। रामकथा या केवल राम को आदिवासियों की स्वीकार्यता से परखने का प्रयास करना मानवीयता के दायरों की सीमाओं का अतिक्रमण करना होगा। राम सभी के हैं। हम जानते हैं कि बाल्मिकी रामायण के सृजन की कथा ही क्रौंच वध से शुरू होती है, क्रौंच का वध करने वाला एक निषाद था। राम के वनगमन और वनप्रवास का कथानक ही आदिवासियों के लिए प्रिय बन जाता है। आदिवासियों के लिए भी राम की कथा एक पवित्र कथा है उनके यहां दूसरी ‘करमा’ आदि कथाओं की तरह। फिर भी यह सच है कि आदिवासी समूहों में वनवासी राम ही अधिक प्रिय हैं, अयोध्या के राम नहीं। हमें सोचना होगा कि राम की कथा आज भी लोकमन का हिस्सा क्यों है, क्या सिर्फ इस लिए कि राम के चरित्र का दैवीकरण कर दिया गया है। केवल इतना भर नहीं है, संभव है कि राम के चरित्र के दैवीकरण का भी लोकमन पर प्रभाव पड़ा हो पर केवल ऐसा ही नहीं है। रामकथा का लोकमन पर जो प्रभाव आज भी कायम है वह उनका लोकसंघर्ष है, वे समय की अराजक सŸााव्यवस्था से निष्काम ढंग से टकराते हैं तथा प्रमाणित करते हैं कि उनके लिए राजा बनने का जो उत्तराधिकार है उसका कोई मतलब नहीं। वे इस प्रकार से उत्तराधिकार को खारिज करते हैं कुल मिला कर रामकथा में सत्ताप्रबंधन का मानवीय समीपता के कारकों वाला द्वन्द भी है। आधुनिक कथा साहित्य के लिए राम का वन्य जीवन, वहां का संघर्ष आदर्श हो सकता है।