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कथा के संदर्भ में नारी विमर्श

विकिपुस्तक से


कथा के संदर्भ में नारी विमर्श

                    रामनाथ शिवेंद्र 
Ramnath shivendra 99

नारी अस्मिता के सवालों पर वौद्धिकों की चिताएं पसीना बहाने वाली कम हसाने वाली अधिक साबित हो रही हैं। नारी मुद्दों पर पुरूष मन की आक्रामकता कब और कैसे पगलाई हरकतें करने लगती हैं इसका आभास उसे तो होता ही नहीं जो प्रतिक्रिया कर रहा होता है। आभास होता तो गंगा में से नहा कर निकली नारियों के पवित्र रूपों को सिरजने वाले पगलाये वौद्धिक, पुरूष मन की खूनी आक्रामता वाली सोच व चेतना के मकड़जाल में नहीं उलझते। वे उन्हें नहीं गरियाते जो नारियों को बराबरी के स्तर पर सम्मानित करते हुए लोकसंघर्ष की लड़ाकू भूमिका में देखना चाहते हैं। जरा ठहर कर सोचिए, हालांकि नारीविमर्श में शामिल होने वाले सभी वौद्धिक एक ही तरह की सोच व संचेतना के उत्पाद नहीं हैं, कुछ तो ऐसे हैं ही जो नारियों के बारे में बुर्के में ढकी बातें नहीं कर रहे हैं, उनकी बातें नारीविमर्श के बारे में नर और नारी के मित्रतापूर्ण सहसंबधों की ओर प्रस्थान करती हुई हैं। दिक्कत हमारी सामाजिक संरचना से गढ़ी हुई मर्दवादी सोच में है। सवाल पुरुष सोच का है, दिक्कत ऐसे पितृ सत्ता वाले चिंतकों से है जो नारीविमर्श को कथित शुचिता और सुभाषितों के मर्दवादी जड़ धारणाओं के सहारे खुद को न बदलने की तर्ज पर आगे बढ़ा रहे हैं। नारी स्वतंत्रता केे कथित आकांक्षियों के प्रदर्शनों व अभिव्यक्तियों से साफ दिखता है कि वे अपना कुछ खोना नहीं चाहते तथा अतीत का सहारा लेकर आदर्श, नैतिकता, शुचिता आदि की बातों के सहारे सुभाषितों को गढ़ रहे हैं। वैसे भी हमारे अतीत में नारी महिमामंडन व उनके देवीकरण की तमाम बातें बतौर मिसाल हैं पर व्यवहार में हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा है। सवाल है आखिर सामाजिक संरचना के इस नारी रूपी आधे हिस्से को सुभाषितों के सहारे भला कब तक चलाया जा सकता है और उन्हें कब तक मानसिक पराधीनता का शिकार बनाया जा सकता है? कुछ तो बोलना ही होगा आज के समय की जागरूक व जिम्मेवार नारियों को, और वे बोल भी रही हैं। अपनी अस्मिता का पक्ष न रखना भी तो अपराध है। वैसे मर्दवादी सोच के बारे में बोलना और अपनी अस्मिता जिसे नारीविमर्श कहते हैं, उसके लिए मन की गांठों को खोलना दोनों अलग अलग बातें हैं, कम से कम नारियां तो अपने को अभिव्यक्त नहीं ही कर पा रही हैं, वे इतनी करुणामय होती हैं कि क्रिया की प्रतिक्रिया नही जानतीं। यह एक व्यवहारिक संकट है, इसी संकट के कारण नारियां मर्दवादी आख्यानों का हिस्सा बन जाया करती हैं। नारी खुद अपने बारे में बोल नहीं रही और मर्द हैं कि लगातार उनके बारे में हितोपदेश दिए जा रहे हैं। काश नारियां बोलने लगतीं और पुरुषसŸाा की जकड़नों से परिवार के स्तर पर, मान्यताओं के स्तर पर, संपत्ति में हिस्सेदारी के स्तर पर टकराने का काम करतीं। परेशानी यही है, नारीविमर्श के मुद्दों को भी पुरुष वौद्धिकता ने तमाम दूसरे मुद्दों की तरह जैसे संपत्ति में हिस्सेदारी, संसाधनों में हिस्सेदारी, समान काम के लिए समान वेतन, राजनीतिक समानता, कानूनी समानता, सामाजिक समानता के मुद्दों की तरह कब्जिया लिया है। देखा जा रहा है कि आज के बदले हुए लोतांत्रिक समय में भी पुरुषों का सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक ही नहीं ज्ञान तथा लेखन के भी सभी क्षेत्रों, उप क्षेत्रों पर निष्ठुर और एक तरफा कब्जा है। अभी वह दिन बहुत दूर है जब नारियों के बारे में नारियों की बातें सुनी और गुनी जाएंगी फिलहाल तो ऐसा नहीं जान पड़ रहा। कथासाहित्य में भी नारियांे को अपने पैरों पर नहीं खड़ा होने दिया जा रहा। वहां तो उन्हें संघर्ष का प्रतिनिधि बनाया जा सकता है पर नहीं, ऐसा नहीं हो रहा। नारियों को अपनी अस्मिता की सुरक्षा के लिए संघर्षमय प्रयास करने होंगे और उन्हें हर स्तर पर पुरुषों के द्वारा गढ़े गये आख्यानों को आलोचनात्मक ढंग से विश्लेषित करते हुए संघर्ष को व्यावहारिक रूप देना होगा। केवल जुबानी जमा खर्च नहीं। सच यह है कि चाहे गरीबों की गरीबी मिटाने का मामला हो या नारियों के मान सम्मान की बातें हो गरीबांे तथा नारियों दोनों को बोलने और खुद को खोलने के मौके ही नहीं दिए जा रहे। मौके दिये भी नहीं जायेंगे। दिक्कत यह है कि गरीब या नारियां खुद अपने बारे में क्या बोलना चाह रही हैं, उन्हें नैतिकता, पूर्वजन्म, दैवी प्रतिफलों के हवाले देकर बोलने से रोक दिया जा रहा है। उन्हें नैतिकता तथा सामाजिक संरचना के जकड़नों में बाध दिया गया है, ऐसे में यदि वे बोलें तथा मन की गांठों को खोले भी तो उसे हसीन मजाक बना दिया जाता है। नारियों के मन में उपजने वाले तमाम सवालों को बतौर उद्धरण देखा जाना चाहिए जैसे यही कि वे विवाह क्यों करंे? अगर वे पत्नी बनने से इनकार कर रही हैं, बच्चा पैदा करने से इनकार कर रही हैं फिर उस पर चिल्ल पों किस नैतिकता या सुभाषित के आधार पर किया जा रहा? वे पत्नी के बजाय अगर मैत्री संबध चाह रही हैं तो इसमें क्या बुराई है?क्या हमारी सभ्यता में लिंगभेद प्रभावी नहीं है? अगर है तो फिर नारियों के लिंगभेद विरोध पर काहे के लिए नाक फुलाना? पुरुष सत्ता अपनी आलोचना सुनने एवं गुनने की सहनशीलता क्यों नहीं दिखाती? नारीविमर्श की पैरोकार अमेरिकी महिला एड्रियन रिच तभी तो बिना लाग लपेट के साफ साफ बोलती हैं... ‘पुरुष जब भी अपनी वस्तुएं, विषय और भाषा चुनते हैं उनके विचार में कभी भी स्त्रियां या स्त्रियों द्वारा की जाने वाली आलोचना नहीं होती’ ‘हमें स्त्रीवादी दृष्टिकोण से पुरुष केन्द्रित एन्ड्रोसैन्ट्रिक) पुस्तकों और तकनीकों का पुनरावलोकन करना होगा ऐसा करने से हम लिंगभेद की राजनीति को उजागर कर पायेंगे। जिसका काम स्त्रियों को भाषा और साहित्य से दूर रखना और अक्षम बनाये रखना है ताकि वे उनका इस्तेमाल अपने अन्दर और बाहर चल रहे द्वन्दों को व्यक्त करने में न कर सकंे। पुरुष केन्द्रत किताबों की समीक्षा होनी चाहिए ताकि स्त्रियों को अपनी बात रखने का मौका मिल सके।’ बात साफ है कि नारियां अपने बारे में क्या सोचती हैं, गुनती हैं, विमर्श का मामला यह है, न कि वह जिसे पुरुष अपने पतित्वता वाले पति परमेश्वर के भाव से उनके बारे में सोचता, गुनता, लिखता या व्याख्यान देता है। ऐसे भावों से नारियों के बारे में सोचने का मतलब तो उनके खिलाफ खतरनाक साजिश ही कही जा सकती है और कुछ नहीं। आखिर नारियों को आप किस भाव या रूप में देख रहे हैं, एक पत्नी के रूप में, मित्र के रूप में, प्रेमिका के रूप में, भोग, संभोग के प्रतीक के रूप में, बाजार की वस्तु के रूप में, सेक्स सिम्बल के रूप में, तय यही करना है कि नारियों को आप किस कोण से देख रहे हैं? वैसे तो नारियों के अन्य कई रूप भी है। स्त्रियां अपने स्त्रैणता के लिए जानी जाती हैं, करुणा, प्रेम, संवेदना, मातृत्व आदि के लिए भी, जिसके लिए उन्हें समादृत करने की भी परंपरा रही है पर ऐसी सारी सोच मर्दवाद की अभिव्यक्ति भर बन कर रह जाती है और पुरुष अपने मर्द होने को प्रमाणित करने के लिए जिसे मर्द पुरुषार्थ मानता है उसकी गोद में चला जाता है। स्त्री और मर्द का फर्क यह भी है कि मर्द का मतलब विजेता, पराक्रमी और स्त्री का मतलब, कमजोर, सब कुछ हार जाने वाली, पराधीन यानि स्वाधीनता और पराधीनता के द्वन्दों में फसी महज एक वस्तु, या तो कन्यादान के लिए या वलिदान के लिए। सामाजिक संरचना में आज के समय का यह जो लिंग भेद है उसका एक अर्थ यह भी है कि नारी पराधीनता की प्रतीक है जबकि पुरुष वह तो जन्मना ही स्वाधीन है। स्वाधीनता वाले घमंडी मनोभावों से पुरुषों का निकलना लगभग लगभग मुश्किल है। तभी तो अमरिकी लेखिका रिच पुरुष लेखन के पुनरावलोकन करने की बातें करती हैं, और स्त्रियों को पराधीनता वाले मनोभावों से बाहर निकलने का आग्रह भी। नारी विमर्श का मुद्दा आजकल कम से कम पुरुष वौद्धिकों की चिंतन की दुनिया में, कविताओं व कथाओं के माध्यम से, कई रंगांे में रंगा हुआ किताबों के पन्नों पर चमकता और थिरकता हुआ दीख रहा है। नारीविमर्श की तरह ही गरीबी मिटाने का मामला भी आजादी के बाद से ही भारत में चुनावी नारा बना हुआ है और यह मामला अपने कुछ बदले रूपों में अंग्रेजों के जमाने से ही नारों की शक्ल में अब तक चला आ रहा है। गरीबी मिटाने की तरह ही नारी सशक्तीकरण का मुद्दा भी गरमाया हुआ है, और किसी हसीन नारे की तरह सभी जगह थिरक रहा है। पत्रिकाओं में तो नारीविमर्श के नाम पर मर्दवादी वौद्धिकों द्वारा कुछ अलग और नारी विमर्शकारों द्वारा कुछ अलग कहा सुना जा रहा है। कहा जाना चाहिए कि भारत में तो नारी विमर्श मत भिन्नताओं का शिकार है। विमर्शो से पता चलता है कि नारियां जैसे कोई पोस्टर हों, पंफलेट हों और जिसे नैतिकता की दिवालों पर चिपकाया जाना जरूरी हो। जाने क्या, क्या छपने लगा है, क्या छपना चाहिए और क्या नहीं छपना चाहिए, दोनों के अन्तरों को वौद्धिकता का रोलर चलवा कर पाट दिया जा रहा है। नारी विमर्श से अलग अगर गरीबों की बात करें तो बी.पी.एल. जैसी अद्भुत किस्म की उनकी श्रेणी ही बना दी गई है जो अर्थशास्त्र की बहसों को रोचक बनाने का काम करती है। भारतीय सामाजिक संरचना में बी.पी.एल. नाम की एक अलग कोटि गढ़ और बना कर हमारे अर्थशास्त्री जाने किसी लोककल्याण की बात कर रहे हैं? बात समझ में आने लायक नहीं है। उसी तरह नारी के बारे में भी जो नारे गढ़े और रचे जा रहे हैं यह भी समझ से बाहर की चीज है। आखिर इससे बड़ा और क्या मजाक हो सकता है कि जिस समाज में पुरूषों के लिए देह और दिमाग दोनों बेचने और खरीदने की खुली आजादी हो उस समाज में नारी देह और दिमाग के बारे में शुचिता और नैतिकता की बातें कहां से उठनी चाहिए। पुरूष तो देह और दिमाग दोनों बेच लेने में ही बहादुरी के गीतों को गा गा कर मस्त हो रहा है। अपने देह और दिमाग दोनों को बेच कर पुरूष जिस नई और विकसित दुनिया का सृजन कर रहा है उस दुनिया के बारे में नहीं सोच रहा कि उसकी वैयक्तिक संप्रभुता को कुछ रुपयों के बदले लील लिया जा रहा है। जबकि भारतीय चिंतन तो उस व्यक्ति को सफल मानता है जो वैयक्तिक स्वतंत्रताओं को सुरक्षित बचा पाये चाहे जैसे भी। पर आज के समय में तो अपनी स्वतंत्रताओं को बेचने का काम चल रहा है। वैयक्तिक संप्रभुताओं को बिकने के लिए कई तरह के बाजार हैं, हाई प्रोफाइल नौकरीशाही से लेकर वौद्धिकता के तमाम विश्वविद्यालयीय संस्थानों व एकेडेमियों के रूप में। व्यक्ति मनोवैज्ञानिक रूप से इतना कमजोर बनाया जा चुका होता है कि वह इन संस्थानों में बिकना अपने अनुकूल मानने लगता है और बिना देर किए बिक जाता है। और जब वही काम नारियां करने लगती हैं, तो उसे बुरा कहा जाने लगता है। आखिर मर्दवादी विमर्शकार नारियों को किस काटि में रखना चाह रहे हैं? उन्हें कैसे पता चलेगा कि समाज में फैला हुआ यह जो क्रूर तथा घृणित लिंग भेद है उसे समाप्त किए बिना मानव सभ्यता कभी भी हसीन और खूबसूरत नहीं हो सकती। समझना यह है कि प्रकृति ने मानव सत्ता को अद्भुत वरदान दिया है देह और दिमाग के रूप में। दिमाग का बिकना या गुलाम होना इसे कभी भी नैतिकता और शुचिता के दायरों में नहीं रखा जाता जबकि देह को कम से कम नारियों के संदर्भों में कथित शुचिता और नैतिकता के मकड़जालों में फसा दिया जाता है। नारी विमर्श का मामला भी एक हद तक नारी देह का विमर्श ही बना दिया गया है, सारी बातें नारी के देह पर सुभाषितों की तरह लिखी जाने लगी हैं आखिर इससे मर्दवादी सोच वाले क्या साबित करना चाहते हैं? आज के समय की नारियां अगर पुरुष पराधीनताओं से अलग होकर अपनी स्वाधीनताओं को प्रमाणित करना चाहती हैं तो इसमें बुराई क्या है? वे पत्नित्व न स्वीकार कर मैत्री संबध चाहती हैं तो कौन सा पहाड़ टूट कर गिर जाएगा। संबधों की बात करें तो जाहिर है कि मर्दवादी सोच वालों के लिए नारियों का प्रचलित रूप जो मां वाला है, बेटी वाला है, कभी नहीं अखरता पर वह जो पत्नी वाला उनका रूप है, सारा विमर्श उसी पर केन्द्रित हो जाता है। नारियों का पत्नी बनने से इनकार ही उन्हें मर्दवादी जनों के लिए मुख्य चिंता का विषय है। और कोई दूसरी चिन्ता नहीं। पत्नी बनने से इनकार का मामला बच्चा जनने से इनकार से भी जुड़ा हुआ है। कल्पना करनी चाहिए कि तब क्या होगा इस हसीन दुनिया का जब नारियां एक जुट हो कर बच्चा जनने से ही इनकार कर देंगी, फिर किस आधार पर पुरुष सत्ता अपने पुरुषार्थ की मादकता में झूमेगी? क्या आपको उत्तराधिकारी विहीन पुरुष निरीह नहीं जान पड़ता? पति पत्नी संबधों से अलग पुरुषमुक्त स्त्री समलैंगिकता का मामला हो या स्त्री मुक्त पुरुष समलैंगिकता का दोनों मामले आज के समय में नैतिकता विरोधी खानों में रख दिए गये हैं। ऐसा करना अनायास नहीं है। ये दोनों मामले पुरुष सत्ता के वर्चस्वों को काफी तीक्ष्णता व उग्रता से खंडित करते हैं। ऐसे खंडनों के जरिए पुरुष सत्ता को जान पड़ता है कि उनके द्वारा सृजित यह जो पुरुषवादी समाज है, जो वसीयत और विरासत के आधारों पर आज तक टिका हुआ है, उसकी चूलंे हिल रही हैं। अगर ऐसा हो गया तो उनका उत्तराधिकारी कहां से आएगा जो उनके द्वारा जायज, नाजायज तरीके से अर्जित संपदा का उत्तराधिकारी होगा। वह कहां से गढ़ा जाएगा? स्त्रियों द्वारा मातृत्व का इनकार तथा खुद की अस्मिता बचा लेने की इच्छाएं भी उन्हें स्त्री समलैंगिकता की तरफ ले जा कर पुरुष सत्ता को चुनौती देती हुई सी प्रतीत होती हैं। पुरुषसŸाा का संकट है कि नारियां किस औकात से पुरुषस सत्ता के विरोध में खड़ी हो रही हैं। पुरुषस सत्ता इस विन्दु पर हताश और निराश ही नहीं विकल्पहीन भी है। उसे लगता है कि उसकी बनी बनाई सत्ता ध्वस्त हो रही है जिसे बनाने में हजारों साल लगे होंगे। तो नारीविमर्श का मामला उत्तराधिकार के विमर्श का भी गंभीर मामला है। संपत्ति के उपयोग, उपभोग व प्रबंधन का भी मामला है और यह एक ऐसा मामला है जो दुनिया की पुरुष प्रधान सत्ता को ठेंगा दिखाने वाला है। इसी लिए पुरुष सत्ता हमेशा हमारे भारतीय समाज को जाति और योनि के दो कटघरों में अतीत से ले कर आज तक बांटती रही है। हजारों साल से चली आ रही व्यवस्था का खंडन चाहे नारियां करें या गरीब दोनों समान रूप से समाज के विपथगामी माने जाते हैं। जाति और योनि के दोनों कटघरों ने कभी भी गरीबों को गरीबों की तरह और नारियों को नारियों की तरह अपनी अपनी अस्मिता के बारे में सोचने ही नहीं दिया। काश गरीबों में गरीबी की भूख जग जाती और नारियों में उनके बाबत फैलाए गये नारों से टकराने की हिम्मत आ जाती तो दुनिया बहुत ही हसीन और रंजक बन जाती। दिक्कत यह भी है कि गरीब अपनी उपयोगिताओं से गुंथित खुद की अनिवार्यताओं को नहीं रच पा रहा है। वह जहां खड़ा है, तटस्थ हो कर सूरज उगने की प्रतीक्षा कर रहा है, उसी तरह नारियां भी अपनी ताकतों को नहीं पहचान पा रहीं, न ही अपनी उत्पादकता को संभाल पा रहीं हैं। नारियां तो खुद को भुला दे रहीं है मां और बेटी का सम्मान पा कर जबकि वे हर समय और हर जगह केवल मां और बेटी ही नहीं होतीं। यह रिश्ता तो आज के समय में अपवाद की तरह है, उन गरीबों की मर्यादा की तरह जिनके घर जा कर बड़े बड़े नेता वोट पाने के लिए पानी पी लिया करते हैं या खाना खा लिया करते हैं। इसे मर्यादा की किस कोटि में रखा जा सकता है? यह मान कर चलना होगा कि यह मर्यादा नहीं है, एक धोखा है, नारियों के साथ धोखे किए जा रहे हैं। धोखा है उनके साथ मित्रता पूर्ण व्यवहार न किए जाने का। मुझे तो लगता है कि निश्चितरूप से नारियों ने अतीत में भी किसी समय पुरुष सत्ता को चुनौती देते हुए बच्चा जनने से इनकार किया होगा फिर पुरुष सत्ता ने उन्हंे मनाने और समझाने का प्रयास किया होगा, उन्हें देवी का रूप दिया होगा, उनकी पूजा अर्चना शुरू की होगी और जैसे जैसे पुरुष ताकतवर होता गया उसने नारियों को एक वस्तु में तब्दील करना शुरू कर दिया। नारियों को बाजार में खड़ा कर बेचने और खरीदने लगा। हमारे अतीत को जिस तरह से नारियों के मान सम्मान और मर्यादा को पूजने वाला दिखाया जाता है, वह छल का ही एक रूप है। एक खूबसूरत धोखा है। पहले भी व्यवहार में ऐसा कुछ नहीं था। हमल और हमलों पर टिका इतिहास कभी भी मानव सभ्यता को नर, नारी की समानता का पाठ पढ़ा ही नहीं सकता। नारियां हमल झेलती रही हैं तो जनता हमले, इसके अलावा इतिहास में है ही क्या? वैसे भी यह सुनिश्चित है जो सभ्यता जातिभेद नहीं पाट सकती, वह भला योनिभेद कैसे मिटा सकती है? नारियों के साथ मित्रता का व्यवहार कैसे दे सकती है? योनिभेद तथा जातिभेद दोनों दिखने में अलग अलग दिखते हैं, पर दोनों हैं एक दूसरे के पूरक, एक के बिना दूसरा जीवित नहीं रह सकता। दोनों सम्मिलित रूप से एक दूसरे के औचित्य को प्रमाणित करते हैं। पुरुष सत्ता के कृत्रिम मानसिक विभेदों व प्राकृतिक भिन्नताओं के कारण नारी भले ही पुरुष से अलग योनि की कोटि में होती है फिर भी उसे सायास जाति में तब्दील कर दिया जाता है। इसलिए जातिभेद है तो योनिभेद भी है, और यही योनिभेद आज के समय का लिंगभेद है। सामाजिक संबधों में जो लिंगभेद है उसको हम चाहें तो भाषा और बोलियों के विभिन्न क्रिया रूपों में भी देख सकते हैं। हिन्दी की बात करें तो इस भाषा के क्रियारूपों में लिंगभेद काफी गहरा है, यह भेद संस्कृत में भी है। तो कहा जाना चाहिए कि पुरुष सत्ता ने लिंगभेद को कायम रखने के लिए बोलियों एवं भाषाओं तक को नहीं छोड़ा। वैसे बांग्ला जैसी कुछ भाषाएं/बोलियां ऐसी हैं जिनके क्रियारूपों में योनिभेद या लिंगभेद नहीं पाया जाता है। अंग्रेजी भाषा/बोली में भी यह भेद नहीं दिखेगा। भाषा या बोली के स्तर पर कई ऐसी तमाम भाषाएं या बोलियां हो सकती हैं जिनके क्रियारूपों में लिंगभेद नहीं होगा। उन भाषाओं एवं बोलियों पर गहन अघ्ययन किया जाना चाहिए जिनमें नर और नारी दोनों के लिए एक ही क्रियारूप हों। बांग्ला तथा अंग्रेजी मातृ बोली वाले समान क्रियारूपों वाले समाजों में अन्य मातृ बोली व असमान क्रियारूपों वाले समाजों की तुलना में सामाजिक रूप से लिंगभेद का फर्क नहीं दिखता है या बहुत कम दिखता है। ऐसा क्यों है? सोचने की बात है। भाषा एवं बोली के स्तर पर यह जो लिंगभेद है, कहीं वही भेद व्यापक स्तर पर सामाजिक संबधों को तो नहीं प्रभावित कर रहा? सोनभद्र के आदिवासी समाजों में भी धांगरी बोली प्रचलित है, धांगरी बोली के क्रियारूपों में भी लिंगभेद नहीं दिखता। नर और नारी दोनों एक ही तरह के क्रियारूपों का प्रयोग करते हैं। भाषागत एवं बोलीगत कारणों की परख भी लिंगभेद के कारणों के बारे में सोच को नई दिशा प्रदान कर सकती है। इस आलेख के अंत में मैं विनोदशाही जी के विचारों का भी संदर्भ देना आवश्यक समझता हूं। उनका मानना है.... ‘हिन्दी आलोचना में अभी ‘स्त्री विमर्श’ को ‘सभ्यता विमर्श’ की तरह सोचने समझने की कोशिश करने वाली सजगता नहीं दिखायी देती। हमारा (भारतीय) यह विमर्श गोया अभी ‘स्त्री’ देह के आस पास ही केन्द्रित हुआ पड़ा है। यहां से आगे जाने के लिए रास्ते और दिशाएं तो स्पष्ट हैं पर उन पर कम लोग ही चलना चाह रहे हैं। दर असल यह जो आगे जाने वाला रास्ता है स्त्री से ‘स्त्रैण’ में और फिर ‘स्त्रैण से सभ्यता में’ छलांग लगाने से आगे खुलता है।’ यानि हम पहले देह से ‘मानसिकता’ में उतरते हैं फिर वहां से ‘सामूहिक चेतना’ में परन्तु हमारे यहां गहराइयों को अमूर्त कह कर खारिज कर देने का रिवाज जैसे एक अपसंस्कृति की तरह पनपता और डसता जाता है।’ कथाक्रम अंक.. अक्टूबर-दिसंबर 2013 पृ..41 जाहिर है भारतीय चिंतक विनोदशाही जी भी भारतीय नारी विमर्श के तौर तरीकों पर सवाल खड़ा करते हैं और कहते हैं कि जब तक नारी विमर्श को सभ्यता विमर्श की तरह मूल्यांकित और प्रतिष्ठित नहीं किया जाता तब तक नारीविमर्श मात्र देह का विमर्श बना ही रहेगा और वही हो रहा है।’ नारीविमर्श को हमें निश्चित रूप से नारी देह के कौतुकों, रहस्यों, देह से उभरने वाले प्रतीकों की मानसिकताओं से तथा नारी को नारा बनाने वाले नारों से बिल्कुल अलग, उन्हें प्रकृति का एक बेहतर उत्पाद मानकर ही आगे बढ़ाना होगा। इतना ही नहीं नारी विमर्श को मानव सभ्यता का विमर्श बनाना ही होगा। सभ्यता के विमर्श के द्वारा ही यह बात निकल सकती है कि नर, नारी संबधों में यह जो पति, पत्नी वाला रूप है, यह जो परिवार गढ़ने वाली वैवाहिक रीतियां हैं, क्या वे नर, नारी के मित्रतापूर्ण रिश्तों के लिए उपयुक्त हैं? अगर नहीं तो विमर्श सभ्यता पर ही तो होना चाहिए न कि नारियों द्वारा लगातार अर्जित की जाने वाली स्वतंत्रताओं पर। आखिर यह जो स्वतंत्रताओं का आकाश है, स्वतंत्रताओं की आकांक्षाएं हैं, केवल नर के लिए ही तो नहीं हैं वे सभी के लिए हैं यानि नारियों के लिए भी तो हैं। इस लिए जरूरी है कि मर्दवादी नारों में किकुड़ियाये नारी विमर्श को खुली हवा में लाया जाये। यही समय की मांग है और जरूरत भी।