कथा विमर्श और आज के जरूरी सवाल
कथा विमर्श और आज के जरूरी सवाल
रामनाथ शिवेंद्र

दुनिया बदली है और उसके साथ हमारे चिन्तन और विमर्श के आयाम भी बदले हैं। इन बदलावों ने मानव सभ्यता को दिया क्या है, यही सोचने की बात है। ज्ञानमीमांसा के सारे क्षेत्र जो समाजनीति, अर्थनीति, शिक्षानीति, राजनीति और विज्ञान जैसे वौद्धिक क्षेत्रों के उत्पाद हैं, हम देख रहे हैं कि ये सारे के सारे हमारे सिर को छूते हुए निकलते जा रहे हैं। हम पहले भी सत्य की खोज में लगे थे यही सत्य की खोज ने ज्ञानमीमांसा का विषय और चिंतन के रूप में विस्तार किया है। दुख है कि हम आज तक सत्य और परम सत्य की खोज नहीं कर पाये हैं। जगत मिथ्या वाला सत्य तो कब का अपनी आध्यात्मिक व्याख्याओं की खोह में दुबक चुका है। चरम भौतिकता के दौर में उस सत्य का कोई मतलब भी नहीं। आज जो सत्य हमारे सामने मुह बाए खड़ा है, वह है अपनी पीठ ठोंकने वाला, अपने में डूबने वाला, अपना ही भला चाहने वाला। आज के सत्यज्ञानियों और सत्यखोजियों द्वारा हमें बताया जा रहा है कि हम बाजारवाद और वैश्वीकरण के गिरफ्त में हैं और पूंजी के क्रीड़ा कौतुक बनते जा रहे हैं पर क्या इतना ही सच है। दर असल यह जो ज्ञान मीमांसा का मामला है यह है क्या आखिर? यह समाज को किस तरह से प्रभावित करता है या अपनी गिरफ्त में लेता है, क्या आज के दौर में हम पहले से प्रभावी ज्ञानमीमांसाओं से या दूसरे शब्दों में अतीत से खुराक नहीं ले रहे जिनमें हमारे पुरखों के कथात्मक तथा काव्यात्मक वर्णन हैं, शौर्यगाथा या शोक गाथा के रूप में। क्या हम उसे थोड़़ा आधुनिक तथा अपने अनुकूल बना कर उसी में गोते नहीं लगा रहे? क्या ल्योतार ने महाख्यानों के अंत की बात बदलती दुनिया को और बदल जाने तथा मानवीय समीपताओं की सारी सीमाओं को फलांग जाने के कारण कहा है। इन बातों को समझने के लिए हम कथासाहित्य के विमर्शों को आधार बना सकते हैं और समझ सकते हैं कि महाख्यानों वाली दुनिया से हमारा कथासाहित्य कितना दूर और कितना करीब है? पहली बात तो यह समझना और बूझना जरूरी है कि महाख्यान है क्या चीज? महाख्यान को हम इसके सरलीकृत व्याख्या के आधार पर समझ सकते हैं कि ऐसे वौद्धिक करतब, सिद्धांत, राजनीतिक कार्य पद्धतियां जिसने सारी दुनिया को हिलाने का काम किया हो, वही महाख्यान है। इस संदर्भ में हम मार्क्सवाद को उद्धृत कर सकते हैं। अपने समय से लेकर आज तक मार्क्सवाद सारे वौद्धिकों को उद्वेलित करता रहा है। इसके अलावा महाख्यान का एक रूप विज्ञान के कौतुकों में भी दीखता है। वैज्ञानिक करतबों ने भी दुनिया को हिलाने डुलाने का का काम किया है। विज्ञान के किसिम किसिम के उत्पादों ने दुनिया में आशा बढ़ाई है कि यह जो दुनिया है बदल सकती है पर दुनिया किस तरह से बदलेगी और किनके लिए बदलेगी, इसके बारे में सारे ज्ञानमीमांसी खामोशी साध लेते हैं और वौद्धिकता की गुफा में घुस जाते हैं। ऐसे बदलावों से हमारा कथासाहित्य भी गहरे तक प्रभावित रहा है। कहानियां जो भी चर्चित र्हुइं उनमें बाजार, विज्ञान तथा मार्क्सवाद के कौतुकों को देखा जा सकता है पर उन बिन्दुओं को चर्चित कहानियों में नहीं देखा जा सकता जो आज जनान्दोलन का रूप घर रहे हैं और कदाचित उन्हें कथाविमर्श का आधार बनाया गया भी तो उनमें आज के जरूरी सवाल जो महाख्यानों के पूर्व भी मानव सभ्यता के लिए जरूरी थे जैसे संपत्ति के सवाल, भूमि के सवाल, और नारी के सवाल इन्हें विमर्श में शामिल नहीं किया गया। इन्हें प्रतिआख्यान की श्रेणी में डाल कर हासिए पर फेंक दिया गया। मार्क्सवाद हालांकि द्वन्दात्मक भौतिकवाद की बात अवश्य करता है पर दुनिया कैसे बदलेगी इसके लिए वह जिन तरीकों की बात करता है वह मानव सभ्यता के मानसिक बुनावट के अनुकूल नहीं लगता। मनुष्य को मशीन की तरह नहीं चलाया जा सकता और किसी ऐसे काम में नहीं लगाया जा सकता जो मानसिक गतिविधियों, मन के आग्रहों और धारणाओं के विपरीत हों। मन तो स्वमेव अहिन्सात्मक होता है और मानवीय समीपता का पक्षधर भी सो वह एकांगी हो कर किसी मशीनी कार्यप्रणाली का पक्षधर नहीं हो सकता। किसी काल्पनिक समानता के लिए अकाल्पनिक कार्यप्रणालियों को नहीं स्वीकार कर सकता। भौतिकता का दर्शन अधि-आत्मिक मानस को लम्बे समय तक मशीनी कार्यपद्धतियों की तरफ नहीं टहला सकता। और इसी बिन्दुपर मार्क्सवाद आलोचना का शिकार हो जाता है वैसे यह सच है कि मानवीय समीपता के लिए राजनतिक व सामाजिक दोनों रूपों के द्वारा प्रयास किये जा सकते हैं, जो किये ही नहीं गये और नही किये जा रहे हैं। यही बिडंबना है। हमारे कथासाहित्य में मार्क्सवाद तथा विज्ञानवाद दोनों दीख पड़ते हैं, पर वे दोनों पुरुषवाद के पनाहगाह में हसियां हसते, गाते और नाचते ही दीखते हैं। पुरुषवाद की मांद में छिप कर सारे कथातत्वों को कहीं से उठा कर कहीं चस्पा कर देना वैसे भी आसान होता है। कथानायक या नायिका दोनों चाहे जितनी भी विषम परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों पर वे पुरुषवाद के बाहर कभी निकल ही नहीं पाते उसी में चक्कर लगाते दीखते हैं। पुरुषवाद का जहर परिवारवाद के मुॅह से निकलता है और यही पुरुषवाद पूंजीवाद से खुराक हासिल कर सामन्ती चरित्र का बन जाता है। जैसा कि पता है कि यह जो सामंतवाद है दुनिया का सबसे भयानक रोग है जो व्यक्ति को व्यक्ति तो बना देता है पर मनुष्य नहीं बने रहने देता। व्यक्तिवाद मनुष्यता लीलने के सबसे सुगम रास्ते का निर्माण करता है जो सभी को प्यारा भी लगता है। पुरुषवाद की व्याख्या व्यक्तिवाद में छिपी होती है और इसी व्यक्तिबाद के भीतर जनकल्याण लोककल्याण की तमाम लुभावनी बातें टहलती रहती हैं। यह जो परोपकार वाला मामला है बहुत सरल और आसान नहीं है बहुत ही जटिल और गड़बड़ है। ऐसा इसलिए है कि परोपकार को व्यक्ति के मूल्यांकन का जाने अनजाने हम आधार बना लेते हैं। भावुकता में डूब जाते हैं। ऐसी भावुकताओं से परिपूर्ण परोपकारी, दुख हरण, मनोवैज्ञानिक रूप से संवेदित करने वाली कहानियों को हम पढ़ रहे हैं और ऑसू बहा रहें हैं पर नहीं सोच पा रहे कि आदमी इतना समर्थ कैसे हो गया जो परोपकार करने लगा आखिर वह किसकी और किस तरह की पूंजी पर कुण्डली मार कर बैठा हुआ है? परोपकार, दुत्कार या तिरस्कार सभी समर्थ आदमी के अमानवीय करतब हैं जिसके विरूद्ध हम कुछ कर सकने में समर्थ नहीं होते। इतना ही नहीं अपनी पूंजी की सुरक्षा के लिए पुरुषवाद नेे तमाम तरह के प्राकृतिक दिखने वाली व्यवस्थाओं को भी सृजित कर लिया है। उसी में हम पिस रहे हैं। राजा का बेटा राजा, बाभन का बेटा बाभन, बनिया का बेटा बनिया और आधनिक दौर में कलक्टर का बेटा कलक्टर, मुख्यमंत्री का बेटा मुख्यमंत्री आदि व्यवहारों के अलावा भी यह जो वसीयत या उŸाराधिकार का मामला है आखिर यह मानव सभ्यता में कैसे शामिल हो गया क्या इसे पुरुषवाद का मजबूत औजार नहीं माना जाना चाहिए अगर ऐसा मान लिया जाता है फिर तो कहानियों को कथित उत्तराधिकार की साजिश का पर्दाफास भी करना चाहिए पर ऐसा नहीं हो रहा। कहानियों के माध्यम से भूमि के अधिकारों के बारे में भी सवाल नहीं किये जा रहे और जो सवाल उठाये भी जा रहे है वे ‘सभै भूमि गोपाल की’ अवधारणा से बाहर के हैं ‘रुपया हाथ का मैल है’ यह तो आज के समय के लिए एक भूली हुई कहावत भर है। कहानियों के वौद्धिक विमर्श नारी देह पर बौद्धिक लेप लगा रहे हैं और उनकी आजादी की बात कर रहे हैं, नारी के मन और तन दोनों की आजादी की पैरवी कर रहे है उन्हें पता होना चाहिए कि नारी तब तक आजाद नहीं हो सकती जब तक पुरुषवाद का घातक औजार उत्तराधिकार सामाजिक व कानूनी रूप से प्रभावी है। टकराना हो तो पार्टनर! उत्तराधिकार जैसे रोग से टकराओ जो पुरुष को प्रकृति से अलग आधुनिक पुरुष बनाता है। यही उत्तराधिकार आज के समय का भयानक रोग बन चुका है, इसी उत्तराधिकार ने पहले भी मानवीय समीपता के तमाम कारकों का सफाया किया था और आज भी कर रहा है वर्ना आदमी तो पहले भी आदमी था पर जब वह उत्तराधिकार विशेषाधिकार जैसे निष्ठुर और अप्राकृतिक तथा ताकत के बल पर प्राप्त किये गये अधिकारों से लैश होता है फिर तो वह आदमी ही नहीं रह जाता। पुरुष को तो प्रकृति वैसे भी अपने आप बहुत कुछ दे दिया करती है, प्रकृति और पुरुष के रिश्ते को वैसे भी विशेषाधिकार तथा उत्तराधिकार जैसे मानव सृजित कुटिल अधिकारों की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। यही तो आज के समय के पूंजीवाद की साजिश है जिसे समझना चाहिए। पूंजीवाद अपने औजारों को समय के अनुसार लगातार धार देता रहता है। वह धार देता है लोककल्याण के नाम पर, जनहित के नाम पर, इतना ही नहीं वह लोकतंत्र के नाम पर भी आपने प्रिय होने की धार चढ़ाता रहता है। इस धार को आसानी से समझा जा सकता है कि लोकतंत्र, किसका लोकतंत्र, संसद में बैठे हुए कुछ लोगों का, बड़ी बड़ी कंपनियां चलाने वालों का, संसदीय प्रणालियों द्वारा अपने हितों की सुरक्षा के लिए कानून बनवा लेने वालों का या मनचाहे ढंग से चुनी हुई सरकारों को गिरवा देने वालों का। चुनाव संपन्न हो जाने तथा सरकार गठित हो जाने के बाद हाथ मलती जनता आज के समय में मौजूदा लोकतंत्र के किस बिस्तरे पर अपना हाथ पैर फैलाये इसके बारे में कौन जबाब देगा? इस बात का भी कौन जबाब देगा कि यह जो आदमी और आदमी के बीच आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक रूप से भयानक खांई है इसके लिए कौन उत्तरदायी है? क्या जनता खुद या जनता पर राज करने वाले लोग। बहुमत कितनी कलात्मकता के साथ अल्पमत में बदल जाता है और एक खेल की शक्ल ले लेता है इसे आपातकाल वाले दौर में देखा जा चुका है। इसे उन घोटालों की शक्ल में भी देखा जा सकता है जिसे लोकतंत्र के बरगद के नीचे किया गया और नये किस्म के घोटालों के लिए जमीन भी तैयार की गई। सारे घोटाले अल्पमत की बहुमत पर जीत की तरह होते हैं, घोटालों और भ्रष्टाचारों के आगे बहुमत पानी भरता दीखता है। क्या कर लेगा बहुमत देश में होने वाले घोटालों के बाबत। अफसोस इस बात का है कि यह जो आज के समय का सच है वह कहानियों में नहीं आ रहा, कहानियों के माध्यम से नहीं बताया जा रहा कि बहुमत तो केवल देखने की चीज है, असल मामला अल्पमत का है। निर्णयात्मक क्षमताओं से लैश अल्पमत का निर्माण किसी नाटकीय परिघटना की तरह है जो अपने असली रूप में ब्यक्ति केन्द्रित हो जाता है और कल्माड़ी जैसा आरोपी उत्पादित करता है। घोटाले की राजनीति बहुमत पर संविधान सम्मत ताकतवर अल्पमत (मंत्री, प्रंधानमंत्री, कलक्टर आदि सभी अल्पमत के प्रतिनिधि हैं) की जीत है। बहुमत के पास तो सिवाय वोट देने के कोई दूसरी ताकत तो होती ही नहीं, उसके पास कोई विशेषाधिकार नहींे होते और वोट देने या चुनाव कराने का जो मामला है वह भी बहुमत की मर्जी का नहीं है। तमाम देशों में देखा जा रहा है कि चुनाव को ही खारिज कर दिया जा रहा है यानि लोकतंत्र में भी तानाशाह बनने की प्रवृत्ति कहीं न कहीं मौजूद रहती है। लोकतंत्र में उपजने वाली लोकशाही जो अप्रत्यक्ष रूप से तानाशाही की बिरादरी की ही होती है उसे कैसे रोका जा सकता है, इसे भी कहानियों का विषय बनाया जाना चाहिए। विषय तो प्रेम को भी बनाया जाना चाहिए जिसका अंत पुरूषवाद की जटिल परंपरा विवाह में जा कर होता है और घर से पलायन करने वाले नायक और नायिकाओं को अंत में परिवार में ही शरणागत होना पड़ता है, उन्हें भी जाति बिरादरी, मॉ बाप आदि का आशीर्वाद लेना पड़ता है फिर यह जो घर से भागना है वही क्यों? प्रेम तो किसी भी सामाजिक वर्जना को नहीं स्वीकारता फिर भी वर्जनाओं के कटघरों में खड़ी कहानियों से उसका लेखक अखिर क्या निष्कर्ष निकालना चाहता है, सोचना होगा। प्रेम में जो सेक्स का मामला है वह तो होगा ही, वह कहानियों में किस तरह से आ रहा है और किस तरह से उसे आना चाहिए हालांकि इस पर बहसें हो रही है और अद्भुत किस्म की कहानियां भी रची जा रही हैं पर बेजान तब हो जाती है जब उन्हें जातिवादी, परिवार वादी बिडंबनाओं में झोंक दिया जाता है। लगता है प्रेम की प्राचीन व्याख्या के लिए ऐसा किया जाता है, जब कि प्रेम को कथातत्वों तथा परिस्थितियों द्वारा निहायत आधुनिक बनाया जाता है। लगता है कि प्रेम किया नहीं जाता है, हो जाता है, प्रेम में तन नहीं होता केवल मन होता है। जाहिर है प्रेम और विवाह दोनों दो चीजे हैं उन्हें एक में गूंथा नहीं जा सकता। विवाह एक सामाजिक व्यवस्था है, जो पुरुषवाद का एक सशक्त औजार है। जो परिवारवाद तथा वंशवाद का सृजन करता है उसी से जुड़ा हुआ है उत्तराधिकार का कानूनी व सामाजिक रूप। अगर महाख्यानों का अंत हो चुका होता तो यह जो प्रेम है उसका आखिरी पड़ाव विवाह नहीं होता वह परिवारवाद या वंशवाद का मुखापेक्षी नहीं होता। जाहिर है हम आज भी महाख्यानों के दौर में हैं और पूंजी के क्रीड़ा कौतुकों के खिलाड़ी हैं। उसी खेल में हम राजनीति के तमाशा हैं तो कहानियों के शीर्षक और कविताओं के भावार्थ हैं। हमारा अपना कुछ नहीं जो हमारी कृति को प्रकृति से जोड़ता हो। हम आज भी संपत्ति के करिश्माई खेलों उससे उपजे अधिकारों, विशेषाधिकारों के नरम बिस्तरों पर नाचने के आकांक्षी है और जन से जुड़े, जाति, मजहब, संपŸिा आदि के सवालों पर खामोश हैं तथा हमारा रिश्ता ऐसे आन्दोलनों या अभियानों से तो कत्तई नहीं है जो मानवीय समीपताओं के लिए चलाये जा रहे हैं। काश! हम मानवीय समीपताओं के पक्ष में अपनी कहानियों को खड़ी कर सकते और भूमि, संपत्ति तथा नारी के सवालों से टकराते हुए यह जो पूंजी का मामला है उसके जालों को काट पाते और एक नये तरह का महाख्यान रच पाते। पर हमें लगता है आज भी वारेनहेस्टिंग्स का सॉड़ बिना रोक टोक कहानियों एवं उपन्यासों के रथ पर सवार हो कर हमारी निगरानी कर रहा है।