कामन्दकीय नीतिसार में निहित शिक्षक की संकल्पना

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आचार्य कामन्दक की कामन्दकीय नीतिसार में निहित शिक्षक की संकल्पना
मुरलीधर मिश्रा एवं ललित कुमार पोषवाल


सारांश[सम्पादन]

शिक्षक कैसा होना चाहिए? उसे किन गुणों से युक्त होना चाहिए? यह निरन्तर चिंतन एवं अध्ययन का विषय रहा है। इस चिंतन ने जहाँ भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए शिक्षण-अधिगम प्रौद्योगिकी में सुधार लाने की ओर संकेत किया है, वहीं अतीत की मूल्य निधियों में शिक्षक के स्वरूप एवं उनकी स्थिति में सुधार के सूत्रा खोजने या व्यक्त मान्यताओं को प्रतिस्थापित करने के प्रयास हुए हैं। आचार्य कामन्दक ने अपनी रचना कामन्दकीय नीतिसार में विविध सन्दर्भों में नीति सूत्रा कहे हैं, जिनके विश्लेषण से शिक्षक की संकल्पना उभर सकती है। इस मान्यता के साथ कामन्दकीय नीतिसार में निहित शिक्षक सम्बन्धी विचारों को समझने के क्रम में शैक्षिक अध्ययन करने का निश्चय किया गया। निष्कर्ष में यह पाया गया कि कामन्दकीय नीतिसार के अनुसार शिक्षक का संस्कारी होना आवश्यक है तभी तो वह अपने आचरण का आदर्श विद्यार्थियों के सामने रखकर अपने शिष्यों को सुसंस्कारी बना सकता है। शिक्षक को सहनशील, दया, दान, क्षमा, कृतज्ञता और अद्रोह इत्यादि गुणों से युक्त माना है। शिक्षक जितेन्द्रिय, अनुशासित और अध्ययनशील होने के साथ-साथ सन्तोषी प्रवृत्ति का होना चाहिए। वह शिक्षण कार्य को अर्थापार्जन न मानकर समाज सेवा माने और अपने विद्यार्थी को गलत कार्य करने से तत्काल रोक दे।

प्रस्तावना[सम्पादन]

शिक्षा व्यवस्था की मुख्य जिम्मेदारी शिक्षक की है। इसलिए आजादी के पश्चात् शिक्षा व्यवस्था में सुधार एवं परिवर्तन के लिए गठित विभिन्न आयोगों के सुझाव और निर्मित की गयी शिक्षा नीतियों में व्यक्त संकल्प में शिक्षकों के स्वरूप एवं उनकी स्थिति में सुधर की इच्छा व्यक्त हुई है। शिक्षक कैसा होना चाहिए? उसे किन गुणों से युक्त होना चाहिए? यह निरन्तर चिंतन एवं अध्ययन का विषय रहा है। इस चिंतन ने जहाँ भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए शिक्षण-अधिगम प्रौद्योगिकी में सुधार लाने की ओर संकेत किया है, वहीं अतीत की मूल्य निधियों में शिक्षक के स्वरूप एवं उनकी स्थिति में सुधार के सूत्रा खोजने या व्यक्त मान्यताओं प्रतिस्थापित करने के प्रयास हुए हैं। साहित्य न केवल विरासत को सहेजता है वरन् मानव जाति का पथ प्रदर्शन करता है। साहित्य निधि् की श्रेष्ठ रचनाएँ तात्कालिक ही नहीं वरन कालान्तर के लिए प्रासंगिक होती हैं। इस अवधारणा के आधार पर साहित्यिक रचनाओं में निहित दर्शन के आधार पर आदर्श शिक्षक की संकल्पना जानने हेतु अनेक अध्ययन हुए हैं जिसके अन्तर्गत दिवेकर (1960) ने ‘उपनिषदों के दर्शन पर आलोचनात्मक अध्ययन’ कर पाया कि गुरु के आचरण से शिष्य का चारित्रिक एवं नैतिक विकास होता है। चारलू (1971) ने ‘भगवद्गीता का शैक्षिक दर्शन’ का अध्ययन कर पाया कि परमतत्व का ज्ञान प्राप्त करने में शिक्षक छात्रा के सहयोगी बन सकते हैं। शर्मा (1976) ने ‘जैन साहित्य में शिक्षा की आवश्यकता’ का अध्ययन में पाया कि वैदिक सिद्धान्त के आश्रम और ऋषियों के समान जैन साहित्य में भी संत एवं श्रमण हैं, लेकिन ये सन्त एक स्थान पर अधिक समय नहीं रूकते। खोसला (1983) ने ‘सिक्ख गुरु के शिक्षा दर्शन’ का अध्ययन में पाया कि शिक्षक को पावन गुरु और मानव गुरु के रूप में उल्लेख किया गया है। पाण्डेय (1985) ने ‘गीता और कुरान के शैक्षिक दर्शन पर तुलनात्मक अध्ययन’ में पाया कि शिक्षक को बालक के अनुसार ज्ञान देना चाहिए। और उस पर अपना निर्णय थोपना नहीं चाहिए जिससे वह स्वतंत्रा निर्णय ले सके। चिरवालिकर (1988) ने ‘संस्कृत और गैर संस्कृत साहित्य में वर्णित शिक्षा दर्शन के साथ प्रयोजनवाद, आदर्शवाद, टैगोर के आदर्शवाद, प्रकृतिवाद से तुलना’ का अध्ययन में पाया कि शिक्षक को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त थी। उसमें वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आदर्श संयोजित थे।

पचौरी (2002) ने ‘भारतीय जीवन मूल्य आधारित शिक्षा व्यवस्था के सन्दर्भ में आचार्य श्रीराम शर्मा के शैक्षिक विचारों की प्रासंगिकता’ का अध्ययन में पाया कि शिक्षक मृदुभाषी, उदार, विषय का ज्ञाता तथा यथार्थ में विश्वास रखने वाला होना चाहिए। मलकानी (2002) ने ‘महात्मा ज्योतिराव फुले के शैक्षिक दर्शन एवं प्रभाव का समालोचनात्मक अध्ययन’ में पाया कि शिक्षक घमण्डी एवं स्वार्थी नहीं होने चाहिए। चतुर्वेदी (2004) ने ‘जिद्दू कृष्णमूर्ति के शैक्षिक चिन्तन में, बौद्ध धर्म के तत्व एक दर्शन’ का अध्ययन में पाया कि शिक्षक सत्यनिष्ठ, धार्मिक, जागरूक, प्रज्ञावान, संवेदनशील, निर्भीक, शिक्षण के प्रति समर्पित और गुणवान होना चाहिए जबकि बौद्ध दर्शन के अनुसार शिक्षक सदाचारी, संयमी, प्रज्ञावान, शीलवान, सरल, सादगीपूर्ण, सजग, शुद्ध विचारों वाला होना चाहिए। कुमावत (2010) ने ‘स्वामी विवेकानन्द एवं रवीन्द्रनाथ टैगोर के शैक्षिक विचारों का राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में एक तुलनात्मक अध्ययन’ में पाया कि दोनों महापुरूषों ने विद्यार्थियों के ब्रह्मचर्य एवं चारित्रिक विकास में गुरु की भूमिका को महत्त्वपूर्ण माना है। सिंह (2011) ने ‘जिद्दू कृष्णमूर्ति के शैक्षिक चिंतन की समसामयिक परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता’ का अध्ययन में पाया कि शिक्षक ही राष्ट्र के लिए भावी नागरिकों को तैयार करता है इसलिए उसको स्वयं तथा विद्यार्थियों के प्रति जागरूक रहना चाहिए। शिक्षक-विद्यार्थी दोनों के मध्य प्रेम व विनम्रता होना आवश्यक है। यादव (2012) ने नालन्दा एवं तक्षशिला विश्वविद्यालयों की शैक्षिक व्यवस्था का अध्ययन सम्पूर्ण शैक्षिक गुणवत्ता के सन्दर्भ में किया एवं पाया कि गुरु धर्मानुरूप आचारण करते हुए अपने कर्त्तव्य का निर्वह्न करते थे। बालक का सर्वांगीण विकास करना, बालक की जिस विषय में रूचि है उस विषय का पूर्ण ज्ञान प्रदान करना, उसकी जिज्ञासाओं को शान्त करना, धर्मानुरूप आचरण, आत्म विकास, स्वाध्याय, आत्म संयम, सेवाभाव आदि गुणों का विकास करना और पुत्रावत उसकी रक्षा करना, छात्रा की समस्त आवश्यकताओं को ध्यान रखना गुरु का धर्म था। जैन (2013) ने ‘आधुनिक तेरापंथ जैन सम्प्रदाय के साहित्य में निहित शैक्षिक विचारधारा का उनकी वर्तमान में प्रासंगिकता के सन्दर्भ में गवेषणात्मक अध्ययन’ में पाया कि गुरु अहिंसक, सत्यग्राही, ब्रह्मचारी, संयम, सात्विक, नैतिकता से पूर्ण हो तथा उसमें द्वेष, क्रोध न हो। शिक्षक विद्यार्थियों को व्यावहारिक ज्ञान दे। गुरु के पास रहकर ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है तथा सभी समस्याओं का समाधान किया जा सकता हैं। शिक्षक के पाँच सूत्रों (एकाग्रता, संकल्प शक्ति, आध्यात्मिक, अनुशासन, संवेदनशीलता, प्रामाणिकता) से युक्त होना चाहिए।

आचार्य कामन्दक की रचना ‘कामन्दकीय नीतिसार’ भी ऐसी ही श्रेष्ठ रचना है। जिसमें आचार्य कौटिल्य के शिष्य कामन्दक ने अर्थशास्त्रा का अवलम्बन लेकर व्यावहारिक विषयों को महत्त्व प्रदान करते हुए नवीन मान्यताओं की स्थापना का प्रयास किया है। कामन्दकीय नीतिसार न केवल राजनीति की दृष्टि से अपितु ज्ञान, धर्म, कर्म, समाज, मूल्य और शिक्षा के सार्वभौमिक विचारों की विशद् व्याख्या की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। आचार्य कामन्दक ने अपनी रचना कामन्दकीय नीतिसार में विविध सन्दर्भों में नीति सूत्रा कहे हैं, जिनके विश्लेषण से शिक्षक की संकल्पना उभर सकती है और यह शिक्षक संकल्पना समसामयिक परिप्रेक्ष्य में भी उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इस मान्यता के साथ शोधकर्ता द्वय ने कामन्दकीय नीतिसार में निहित शिक्षक सम्बन्धी विचारों को समझने के क्रम में अध्ययन शैक्षिक अध्ययन करने का निश्चय किया।

शोध उद्देश्य[सम्पादन]

  • (क) आचार्य कामन्दक द्वारा रचित कामन्दकीय नीतिसार में शिक्षक की संकल्पना से सम्बन्धित विचारों की पहचान करना।
  • (ख) कामन्दकीय नीतिसार में निहित शिक्षक-संकल्पना की व्याख्या करना।

शोध विधि[सम्पादन]

दर्शन जीवन का मूल मन्त्र है। भारतीय संस्कृति में इसका योगदान चिरपरिचित है। लगभग सभी प्राचीन ग्रंथ दार्शनिक विधि में लिखे गए हैं। प्रस्तुत शोध को प्रमुख रूप से दार्शनिक अनुसंधान विधि द्वारा सम्पन्न किया गया। साथ ही प्रस्तुत शोध में कामन्दकीय नीतिसार में निहित विभिन्न विचारों की विश्लेषण एवं व्याख्या करनी है अतः इस हेतु विषय वस्तु विश्लेषण प्रविधि का भी प्रयोग किया गया।

प्रदत्त स्रोत[सम्पादन]

प्रस्तुत शोध अध्ययन में कामन्दक द्वारा विरचित कामन्दकीय नीतिसार प्राथमिक स्रोत तथा कामन्दकीय नीतिसार से सम्बन्धित विभिन्न प्रकार के व्यक्तिगत प्रलेख, सार्वजनिक प्रलेख, व्यक्तिगत शोधकर्ता के प्रकाशन, शोधकर्ता के प्रतिवेदन, पत्र-पत्रिकाएँ तथा साहित्य द्वितीयक स्रोत रहे।

शास्त्रों में दस श्रेणी के व्यक्तियों को गुरु के रूप में उल्लेख किया है-

उपाध्याय, पिता, माता, ज्येष्ठो, भ्राता, महिपति।

मातुलः श्चसुरश्चैव मातामह पितामह।

वर्ण ज्येष्ठ पितृ व्यश्च सर्वते गुरवः समृताः॥

अर्थात् उपाध्याय, माता-पिता, बड़ा भाई, राजा, मामा, श्वसुर, ब्राह्माण ये दस व्यक्ति गुरु कहे गये हैं किन्तु इन सबमें आचार्य श्रेणी के गुरु की महत्ता विशेष रूप से प्रतिपादित की गई है। ‘आचार्य श्रेष्ठों गुरूणाम्’ गुरूओं में आचार्य ही श्रेष्ठ है।

कामन्दकीय नीतिसार में शिक्षक के लिए गुरु और आचार्य शब्दों का प्रयोग हुआ है। आचार्य कामन्दक में गुरु की परिभाषा निम्न शब्दों में व्यक्त करते है-

नृपस्य ते हि सुहृदस्त एव गुरवो मताः।
य एनमुत्पथगतं वारयन्त्यनिवारिताः॥
सज्जमानकार्येषु सुहृदो वारयन्ति ये।
सत्यन्तेनैव सुहृदो गुरवो गुरवो हि ते॥

राजा के जो प्रियजन हैं वे ही उसके गुरु हैं। जो राजा को गलत पथ पर जाने से तत्काल रोक देते हैं और उसके भय के कारण सदुपदेश देने से डरते नहीं हैं। जो सुहृदय अनैतिक कार्यां में लिप्त राजा को इन कार्यों से निकालने का प्रयास करते हैं वही व्यक्ति सत्य ही हितकारी है और गुरु का भी सच्चा गुरु है। उपर्युक्त विचारों का तार्किक विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि जो व्यक्ति को कुमार्ग पर जाने से या अनैतिक कार्यों में प्रवृत्त होने से तत्काल रोक देते हैं ऐसे सुहृदय महापुरुष गुरु के भी गुरु है। गुरु ही अपने शिष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का प्रयास करता है इसलिए गुरु के वचनों का पालन करना चाहिए-

सज्जमानमकार्येषु निरुन्धुर्मन्त्रिणो नृपम्।
गुरूणामपि चैतेषां श्रृणुयाद्वचनं नृपः॥

जिस समय राजा अनैतिक कार्य में प्रवृत हो तब मन्त्रियों को उसे कुकृत्य करने से दूर करना चाहिए। राजा को भी उचित है कि उसे मन्त्रियों और गुरूजनों के वचनों का पालन करना चाहिए। इनसे दो बातें सिद्ध होती हैं कि कामन्दकीय नीतिसार के अनुसार ब्राह्माण के अतिरिक्त क्षत्रिय और वैश्य भी गुरु और आचार्य होते थे। दूसरा यह की आधुनिक शिक्षा मनोविज्ञान के अनुसार माता ही बालक की प्रथम शिक्षका होती है। उसी प्रकार कामन्दकीय नीतिसार भी इस तथ्य को स्वीकार करता है कि जो भी व्यक्ति बालक को सुमार्ग पर चलाने का प्रयास करे, वही उसका गुरु है।

शिक्षक के गुण[सम्पादन]

कामन्दकीय नीतिसार में वर्णित विचारों का तार्किक विश्लेषण करने पर शिक्षक के निम्न गुण परिलक्षित होते हैं-

विषय का ज्ञाता[सम्पादन]

एक अध्यापक में तीन गुणों का होना अनिवार्य है, उनमें एक है- उस विषय पर पूर्ण अधिकार जिसका वह अध्ययन कराने जा रहा है। कामन्दक ने चार वेद, वेदांग, शिक्षा के छः अंग, मीमांसा, न्याय विस्तार, धर्मशास्त्रा सहित अनेक लौकिक विषयों को पाठ्यक्रम में स्थान दिया है। अतः गुरु का प्रथम आवश्यक गुण इन सभी विषयों का ज्ञाता होना है क्योंकि शिक्षक को स्वयं इन विषयों का ज्ञान नहीं होगा तो विद्यार्थियों को कैसे शिक्षा दे पायेगा। कामन्दकीय नीतिसार में उल्लेख किया है कि-

यदि न स्यान्नरपतिः सम्य्नेता ततः प्रजा।
अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव॥

यदि पूर्ण शिक्षा प्राप्त राजा अर्थात् शिक्षक नहीं होगा तो उसके शिष्य पर उसी प्रकार संकट बना रहेगा जिस प्रकार पतवार विहिन जहाज में यात्रा करने वाले व्यक्तियों के जीवन पर संकट बना रहता है क्योंकि पानी की लहरों के थपेड़ों से वह जहाज किसी भी दिशा में जा सकता है और किसी भी समय जल में डूब सकता है। इसी कारण वर्तमान में शिक्षा के सभी स्तरों पर शिक्षकों की आवश्यक योग्यता निर्धारित कर रखी है जिससे बालकों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो। विषय का ज्ञाता होने का यह अर्थ नहीं है कि शिक्षक किसी ऐसी खोज में लगा रहे जो अब तक प्रकट नहीं हुई अथवा जो नये तथ्यों का उद्घाटन करने वाली हो। इसको यह समझना चाहिए कि उसे अपने विषय के क्षेत्रा का विस्तृत ज्ञान होना आवश्यक है। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय में एक या दो ही शिक्षक होते हैं और उन्हीं को सभी विषयों का अध्ययन करना होता है।

जितेन्द्रिय[सम्पादन]

कामन्दकीय नीतिसार के अनुसार शिक्षक के लिए मन और इन्द्रियों पर नियंत्राण तथा विकारों के त्यागने का उल्लेख किया है-

कामःक्रोधस्तथा लोभो हर्षो मानो मदस्तथा।
षड्वर्गमुत्सृजेदेनमस्मिन्त्यक्ते सुखी नृपः॥

काम, क्रोध, लोभ, हर्ष, मान और मद यह षड्विकार राजा को सदा त्यागने चाहिए। इनके त्यागने से राजा को सुख समृद्धि प्राप्त होती है। इन षड्विकारों पर विजय प्राप्त करके ही भगवान परशुराम जितेन्द्रिय कहलाये यथा-

शत्राषड्वर्गमुत्सृज्य जामदग्न्यो जितेन्द्रियः॥

भगवान परशुराम एक श्रेष्ठ मनुष्य के साथ ही महान गुरु थे जिन्होंने भीष्म और कर्ण जैसे महापुरुषों को शिक्षा प्रदान की थी। भगवान परशुराम की इस योग्यता के आधार पर प्रत्येक शिक्षक को इन छः शत्राओं पर नियंत्राण रखकर जितेन्द्रिय होना चाहिए। क्योंकि शिक्षक-विद्यार्थी के लिए अनुकरणीय है, आदर्श है। विद्यार्थी शिक्षक के आदर्शों का अनुकरण करके जितेन्द्रिय बन सकते हैं। ब्रह्माण्ड पर्व में आचार्य का लक्ष्य स्पष्ट करते हुए कहा है कि- जो स्वयं श्रेष्ठ आचरण और अन्य को भी वैसा ही आचरण करने को प्रेरित करे वह आचार्य है।

अनुशासित[सम्पादन]

शिक्षक के लिए अनुशासित होना अत्यावश्यक है, क्योंकि वह विद्यार्थी के लिए जीता जागता उदाहरण है। विद्यार्थी अध्यापक को देखकर ही अनुशासित रहना सीखता है। इस कारण सर्वप्रथम मन को नियंत्राण में रखना चाहिए-

विषयामिषलोभेन मनः प्रेरयतीन्द्रियम्।
तन्निरुन्ध्यात्प्रयत्नेन जिते तस्मिन् जितेन्द्रियः॥

विषय भोग की लालसा से मन ही इन्द्रियों को प्रेरित करता है। इन्द्रियों का विषयों से योग न होने देना ही इन्द्रिय निग्रह है, इस कारण यत्नपूर्वक मन को नियंत्रित रखना चाहिए। मन विजय से ही इन्द्रिय विजय का मार्ग प्रशस्त होता है-

प्रकीर्णविषयारण्ये धावन्तं विप्रमाथिनम्।
ज्ञानांकुशेन कुर्व्वीत वश्यमिन्द्रियदन्तिनम्॥

विषय रूपी विशाल अरण्य में दौड़ते हुए इन्द्रिय रूपी विक्षुब्ध हाथी को ज्ञान रूपी अंकुश से नियंत्रित कर लिया जाता है। अतः संसारिक कष्टों से युक्त मार्ग में भटके हुए मनुष्य शास्त्रा ज्ञान द्वारा इन्द्रियों का निग्रह करते हुए अपने मन को नियन्त्रित कर लेता है। यदि शिक्षक इन्द्रियों को अनुशासन में नहीं रखेगा तो वह लौकिक या आध्यात्मिक जगत में कोई कार्य उचित प्रकार से नहीं कर सकता है।

विनयशीलता[सम्पादन]

कामन्दकीय नीतिसार भारत की प्राचीन राजनीति का विशिष्ट ग्रंथ है जिसमें विनयशीलता को प्रमुख रूप से उपस्थापित किया है यथा-

नयस्य विनयो मूलं विनयः शास्त्रानिश्चयः।

विनय नीति का मूल है, विनय को शास्त्रों के अध्ययन द्वारा प्रतिपादित किया गया है। इसलिए आचार्य कामन्दक अध्यापक में विनयशीलता का गुण आवश्यक मानते हैं।

विनयो हीन्द्रियजयस्तद्यक्तः शास्त्रामृच्छति।
तन्निष्ठस्य हि शास्त्राथाः प्रसीदन्ति ततः परम्॥

विनय ही इन्द्रिय जय में साधक है। इस विनय से युक्त पुरूष ही शास्त्रों का अध्ययन कर पाता है। इसमें निष्ठा करने के उपरान्त ही सम्पूर्ण शास्त्रों के अर्थ प्रकाशित होते हैं। अध्यापक राष्ट्र निर्माता है। वह विद्यार्थी को किसी भी दिशा की तरफ मोड़ सकता है। यदि शिक्षक में स्वयं में विनयशीलता का गुण नहीं होगा तो उसके विद्यार्थी कैसे विनयशील होंगे। यदि विद्यार्थी विनय सम्पन्न नहीं होंगे तो राष्ट्र का विकास अवरूद्ध होकर पापाचार की ओर उन्मुख हो जाएगा। इसलिए कामन्दकीय नीतिसार में राजा को यह निर्देश दिया है कि उसको अपने राजकुमारों के लिए विनय सिखानें की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।

विनयोपग्रहान्भृत्यैः कुर्व्वीत नृपतिः सुतान्।
अविनीतकुमारं हि कुलमाशु विनश्चति ॥

राजा के लिए आवश्यक है कि उसको अपने अनुचरों द्वारा राजकुमारों को विनम्रता सीखलाने की कोशिश करनी चाहिए। यदि राजकुमार विनयशील नहीं होगा तो वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा। इसी प्रकार गुरु को भी अपने गुरूकुल में अन्य व्यक्तियों द्वारा अपने विद्यार्थियों को विनय की शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे समाज और देश प्रगति की दिशा में आगे बढ़ सके। वर्तमान समय में हमारे विद्यार्थी उग्र, हिंसक आन्दोलन और तोड़-फोड़ करते हैं। ऐसी हिंसक गतिविधियाँ विनय की शिक्षा से स्वतः ही समाप्त हो जाएंगी। विनयी व्यक्ति परम सेव्यता को प्राप्त होता है। यथा-

परां विनीतः समुपैति सेव्यताम्॥

अतः कामन्दकीय नीतिसार के अनुसार अध्यापक का विनय ही भूषण है।

सहनशील[सम्पादन]

आचार्य कामन्दक अध्यापक में सहनशीलता का गुण आवश्यक रूप से स्वीकार करते हैं-

काले सहिष्णुर्गिरी॥

अध्यापक को समय पर पर्वत के समान सहनशील होना चाहिए। उसे समाज, विद्यालय और विद्यार्थियों की सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान धैर्यपूर्वक करना चाहिए और जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में सहनशील होना चाहिए।

सर्वक्लेशसहिष्णुता॥

अध्यापक को प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आक्रामक रवैया नहीं अपनाना चाहिए। अध्यापक को जीवन में कई प्रकार के अनुभव प्राप्त होते हैं परन्तु उसे सभी प्रकार की स्थितियों में सहनशील रहना ही श्रेयस्कर है।

मूल्यांकन में सक्षम[सम्पादन]

कामन्दकीय नीतिसार में मूल्यांकन की क्षमता के विषय में उल्लेख किया है। यथा-

साधुतैषाममात्यानां तद्विधेभ्यस्तु बुद्धिमान्।
चक्षुष्मतश्व शिल्प/ परीक्षेत गुणद्वयम्॥
स्वजनेभ्यो विजानीयात् फलस्थानानवग्रहम्।
परिकर्म्म स्वदाक्ष्य/ विज्ञानं धारयिष्णुताम्॥
गुणद्वयं परीक्षेत प्रागलभ्यं प्रतिभान्तथा।
कथायोगेन बुध्येत वाग्मित्वं सत्यवादिताम्॥
उत्साह/ प्रभाव/ तथा क्लेशसहिष्णुताम्।
घुति/वानुराग/ स्थैर्य्यें वा यदि लक्षयेत्॥
भक्ति मत्रा/ शौच/ जानीयाद्वयवहारतः।
संवासिभ्यो बलं सत्त्वमारोग्यं शीलमेव च॥

अर्थात् बुद्धिमान राजा के लिए आवश्यक है कि अमात्यों की विधेय वस्तुओं से दूरदर्शिता और शिल्पता के गुणों की परीक्षा करनी चाहिए। फल के स्थान, अवर्षण, अंगसंस्कार, चतुरता, धारण इत्यादि की जाँच अपने जनों से करानी चाहिए। उतावलापन और बुद्धि की चतुरता इन गुणों की परीक्षा करनी चाहिए। व्यक्ति से वार्तालाप द्वारा सत्यवादिता की परीक्षा की जा सकती है। उत्साह, प्रभाव, सहनशीलता, घृति, प्रेम, स्थिरता, भक्ति, मित्राता, पवित्राता व्यवहार से जाननी चाहिए तथा अपने समीप के निवासियों से बल, सत्त्व, आरोग्यता और शील को जानना चाहिए। राजा के समान ही मूल्यांकन क्षमता एक अध्यापक का भी आवश्यक गुण है। विद्यार्थी गुरुकुल या गुरूग्रह में ही विद्याध्ययन करते थे। सर्वप्रथम मूल्यांकन क्षमता अध्यापक के लिए इसलिए आवश्यक है कि कौनसा विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने योग्य है और कौनसा नहीं। अध्यापक वार्तालाप के माध्यम से विद्यार्थी की वाचालता और सत्यवादिता का मूल्यांकन कर सकता है। विद्यार्थी के व्यवहार से उसकी अध्यापक के प्रति भक्ति, श्रद्धा तथा गुरू-गृह में साथी विद्यार्थियों से उसके संबंधें से मित्राता और उसके चरित्रा की पवित्राता इत्यादि का मूल्यांकन शिक्षक कर सकता है। अध्यापक अपने साथियों या स्वजनों से विद्यार्थी की आरोग्यता, बल तथा सहनशीलता का मूल्यांकन कराना चाहिए। स्तब्धता (जड़ता) तथा चपलता इत्यादि बातें अध्यापक को शिक्षा देते समय स्वयं प्रत्यक्ष रूप से जाननी चाहिए। विद्यार्थी शिक्षा को कितना ग्रहण कर रहा है और उस पर कितना ध्यान देने की आवश्यकता है इत्यादि विभिन्न बातों का अध्यापक को मूल्यांकन करना पड़ता है। अतः अध्यापक में मूल्यांकन क्षमता का गुण होना आवश्यक है।

नैतिक गुण युक्त[सम्पादन]

कामन्दकीय नीतिसार में प्राचीन भारतीय संस्कृति का चित्राण प्रस्तुत किया गया है। इसी के अनुसार एक आचार्य के लिए अधोलिखित निम्न गुणों को अनिवार्य गया माना है-

अहिंसा सुनृता वाणी सत्यं शौचं दया क्षमा
कुलं शीलं दया दानं धर्मः सत्यं कृतज्ञता।
अद्रोह इति येष्वेतदाचार्योस्तान्प्रचक्षते॥

अर्थात् हिंसा न करना, सत्य और प्रिय वाणी का प्रयोग करना, प्रत्येक कार्य में सत्यता, मन और कर्म से पवित्राता, दयावान, क्षमाशील, श्रेष्ठ शीलवान, दानशील, धर्मात्मा, कृतज्ञता, अद्रोह यह नैतिक गुण जिसमें विद्यमान हों, वे सभी आचार्य हैं। साथ ही स्पष्ट किया है कि-

आनृशंस्यं परो धर्म्मः सर्व्वप्राणभृतां यतः॥

सभी मनुष्यों का प्रमुख कर्त्तव्य है कि प्राणियों पर क्रूरता न करे, राजा को भी दुखी मनुष्यों का प्रेम पूर्वक पालन करना चाहिए। उसी प्रकार शिक्षक के लिए अहिंसा परम धर्म है, शिक्षक हिंसक या क्रोधी न हो, सभी विद्यार्थियों से प्रेम पूर्वक बातें करना, गुरुगृह में उनका उचित प्रकार से पालन-पोषण करना तथा उनकी समस्याओं का प्रेम पूर्वक समाधान करना, शिक्षक का दायित्व है। इसलिए उसे कठोर वाणी का प्रयोग नहीं करना चाहिए-

पीडितोऽपि हि मेधावि न तां वाचमुदीरयेत्॥

पीड़ित होकर भी विद्वान व्यक्ति को कठोर वाणी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। शिक्षक से भी कटु वचनों की आशा नहीं की जा सकती है। प्रिय वचन बोलने वाले व्यक्तियों को कामन्दक ने शरीर धारी देवता के रूप में चित्रित किया है-

ये प्रियाणि प्रभाषन्ते प्रयच्छन्ति च सत्कृतिम्।
श्रीमन्तोऽनिन्द्यचरिता देवास्ते नरविग्रहाः॥

जो प्रिय वचनों का प्रयोग करते हैं और दूसरों का आदर सत्कार करते हैं वह निन्दा से रहित, उत्तम चरित्रा वाला मनुष्य शरीर धारी देवता ही है। शिक्षक को भी भारतीय समाज में गोविन्द के समकक्ष ही स्थान प्राप्त है इसलिए उनका दायित्व और भी अधिक हो जाता है। इस कारण शिक्षक को सदैव प्रिय वचन ही बोलने चाहिए। उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि शिक्षक में परनिन्दा का त्याग, स्व धर्म पालन, दया, क्षमा, प्रिय व सत्य वचनों का प्रयोग, अहिंसा का पालन इत्यादि नैतिक गुण आवश्यक रूप से होने चाहिए।

उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य[सम्पादन]

शिक्षक को शारीरिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए जिससे वह छात्रों के व्यक्तित्व का उचित प्रकार से विकास कर सके। इसलिए कामन्दकीय नीतिसार में व्यायाम को महत्त्व दिया है-

उत्साहशक्तिहीनत्वाद्वृद्धो दीर्घामयस्तथा॥

वृद्ध, दीर्घ रोगी, उत्साहहीन और शक्तिहीन ऐसे व्यक्ति स्वयं ही तिरस्कृत हैं। अर्थात् निर्बलता जीवन का सबसे बड़ा पाप है। शिक्षक को विद्यालय में शिक्षण के अतिरिक्त अन्य सह शैक्षणिक क्रियाकलाप करने होते हैं। यदि शिक्षक स्वयं दीर्घ रोगी अथवा उत्साहहीन, शक्तिहीन होगा तो वह शिक्षण कार्य ठीक प्रकार से नहीं करा पायेगा और न ही सह शैक्षणिक गतिविधियों को ठीक प्रकार से सम्पादित करा पायेगा। इसलिए कामन्दकीय नीतिसार में शिक्षक के लिए उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य प्रमुख गुण स्वीकार किया गया है।

शैक्षिक निहितार्थ[सम्पादन]

आज शिक्षक राष्ट्र निर्माता नहीं है। उन्होंने अपने कार्य को समाज सेवा न मानकर धन कमाने का साधन बना लिया है। वह उत्तरदायित्व विहीन हो गया है। लेकिन कामन्दकीय नीतिसार के अनुसार शिक्षक का संस्कारी होना आवश्यक है तभी तो वह अपने आचरण का आदर्श विद्यार्थियों के सामने रखकर अपने शिष्यों को सुसंस्कारी बना सकता है। इसलिए शिक्षक को सहनशील, दया, दान, क्षमा, कृतज्ञता और अद्रोह इत्यादि गुणों से युक्त माना है। नीतिसार के अनुसार शिक्षक जितेन्द्रिय, अनुशासित और अध्ययनशील होने के साथ-साथ सन्तोषी प्रवृत्ति का होना चाहिए जो शिक्षण कार्य को अर्थापार्जन न मानकर समाज सेवा माने। कामन्दकीय नीतिसार में उल्लेख किया है गुरु अपने विद्यार्थी को गलत कार्य करने पर तत्काल रोक देता है। अर्थात् उसका पथ प्रदर्शन करता है। इसलिए गुरु बनाने से पहले गुरु की सही पहचान कर लेना आवश्यक है नहीं तो शिष्य पतवार विहीन नौका के समान सुमार्ग से भटक जायेंगे।

इस प्रकार कामन्दकीय नीतिसार की शिक्षा के आधार पर शिक्षकों में उच्च गुणों का विकास किया जा सकता है जिससे भावी पीढ़ी का भविष्य उज्ज्वल बनाया जा सकता है। कामन्दकीय नीतिसार की शिक्षक की संकल्पना से प्रभावित होकर शिक्षक अपने शैक्षिक कार्य के वास्तविक उद्देश्य को जान कर एक आदर्श शिक्षक बनने की शपथ ले सकते हैं जो ज्ञान दान को एक पवित्रा कार्य बना कर शिक्षक के गिरते स्तर को ऊँचा उठा सकते हैं और शिक्षक अपनी पुरानी प्रतिष्ठा को प्राप्त कर सकें।

संदर्भ[सम्पादन]

बेस्ट, जॉन डब्ल्यू (1969) : रिसर्च इन एजूकेशन, प्रेन्टिस हॉल ऑफ इण्डिया, नई दिल्ली.चतुर्वेदी, शारदा (2004) ने ‘जिद्दू कृष्णमूर्ति के शैक्षिक चिन्तन में, बौद्ध धर्म के तत्व एक दर्शन’, शोध प्रबंध, शिक्षा, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, विश्वविद्यालय, आगरा.

चारलू एम.के. (1971) : भगवद्गीता का शैक्षिक दर्शन, शोध प्रबंध, शिक्षा, एस.पी. वि.वि., आणद.चिरवालिकर, वाई. के. (1988) ने ‘संस्कृत और गैर संस्कृत साहित्य में वर्णित शिक्षा दर्शन के साथ प्रयोजनवाद, आदर्शवाद, टैगोर के आदर्शवाद, प्रकृतिवाद से तुलना’, शोध प्रबंध, शिक्षा, नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर.

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