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कुदरती कथाभूमि की उर्वरता का सवाल

विकिपुस्तक से

कुदरती कथाभूमि की उर्वरता का सवाल

in a seminar

रामनाथ शिवेंद्र

मौजूदा समय में कथासाहित्य अपनी जीवंतता तथा प्रभावोत्पादकता के कारण साहित्य की सभी जनप्रिय विधाओं में विशेष दर्जे का अधिकारी बन चुका है। इस लिए अनिवार्य हो जाता है कि देशज कथाभूमि को आयातीत चिंतनों व विचारणों से बंजर बनाने की कुटिल चालों की रोकथाम किया जाये तथा कथा के सभी आयामों को देशी भूमि पर समत्वम् वाले बीज से हरा भरा किया जाये। वैसे तो समकालीन कथा के पाठक भी अन्य साहित्यिक विधाओं के पाठकों की तुलना में अपने सयानेपन पर ज्यादा मुग्ध दीख रहे हैं। यही हालत कथासाहित्य के कृतिकारों का भी है। समता, सहकार, सहयोग, भाईचारा और सामजिक हितों को बचाने के लिए अहिंसक प्रतिरोध बुनियादी रूप से कथासाहित्य के लिए प्रस्तावित थे, मानवीय समीपताओं को स्थापित करना कराना भी प्रस्तावित था, पर समकालीन कथासाहित्य का जो विकास क्रम है क्या वह अपने विषय, भाषा व प्रस्तुतीकरण के द्वारा मानवीय समीपताओं तक पहुंच सका है या सामाजिक बदलावों के लिए जो अहिंसक जनप्रतिरोध अभिष्ट थे उसे हासिल कर पाने में इसकी कोशिशें उल्लेखनीय हैं। मुझे लगता है कि आज के बाजारवादी तथा उपयोगितावादी समय ने हमारी समझ और चेतना दोनों को इतना कुन्द कर दिया है कि हम उन रास्तों पर नहीं चल पा रहे हैं जो सामाजिक तथा राजनीतिक बदलावों के लिए प्रस्तावित थे। साहित्य समाज का दर्पण है, हम जानते व मानते हैं इसी दर्पण को तोड़ने में क्या हम सभी की अचेतन भागीदारी नहीं है? सोचना यही है। आइए समकालीन कथासाहित्य के रूप और प्रवृत्तियों को जनमूलक और कुदरती जमीन से उपजने वाली आदिम कथाओं से तुलना करने का प्रयास करें और यह भी पता लगाने का प्रयास करें कि समकालीन कथायें मानवीय समीपताओं के व्यवस्थापन के लिए कल्पित श्रमसंबधों में समत्वम् स्थापित कराने के लिए किस तरह से प्रयासरत हैं। जाहिर है सारी दुनिया श्रमसंबधों के कुदरती व्यवहारों से ही चालित होती रही है। मानवीय सभ्यताओं ने श्रम संबधों के द्वारा उपजने वाले परस्पर संवाद के लिए ही भाषाओं के विविध रूपों को सृजित किया है, हमें जानना चाहिए कि कथायें भी मानव समाज में श्रम संबधों की अभिव्यक्ति होती हैं और मन के बहुत गहरे में जा कर संवाद स्थापित करते हुए अपने लिए कथाभाषा सिरजती हैं। यहीं कथाभाषा कथा विषय का चयन करते हुए कुदरतीभाषा से तालमेल बिठाते हुए अपने विषय के साथ पाठकों से अंतःक्रियायें करती हुई आगे का रास्ता तय करती हैं। यह अलग बात है कि पाठक उस कथावस्तु को किस तरह से पाठवोध में तब्दील करता है। देखना है कि समकालीन कथाभाषा ने खुद को कितना पेट के करीब रखा हुआ है और कितना कंठ के। जाहिर है पेट की भाषा कुदरती होती है, और कंठ की भाषा बनावटी और सजावटी। पेट की भाषा ‘भूख’ से सनी होती है और कंठ की भाषा सत्ता व्यवस्थापन’ के रंगों में रंगी होती है। आज के बाजारवादी व उपयोगितावादी समय में हमारा यह जो कथासमय है, कथा की भाषा है, कथा की शक्ति है, इसमें छलछलाता हुआ सेक्स है, क्या ये सब कुदरती जमीन पर उगने वाली कथा की पगडंडियों पर चल रहे हैं, इनमें प्रकृति की एकाग्रता व समत्वम् का कुछ है, समकालीन कथाओं के पात्रों के चित्त और चेतना में प्रकृति के साथ एकाकार होने की क्षमता है? इन सवालों पर सोचते हुए विचारण करना होगा कि यह जो मानव सभ्यता का विकास क्रम है क्या उसे मानव और प्रकृति की एकाकारिता कबूल नहीं। आज की सभ्यता में अवकाश ही नहीं कि मानव अपने चित्त और चेतना को व्यक्तिगत से अलग कर समूहगत बना सके। ऐसा सोचना ही किसी कपोल कल्पना में गोते लगाना है और हम गोते लगा रहे हैं। हम पैर से ले कर सिर तक ‘निजता’ के दलदल में डूबे हुए हैं। क्या हमारी मानव सभ्यता उस दौर में भी ऐसी ही थी जब हम श्रमसंबधों की अन्तःक्रियाओं से उपजी संवाद की भाषा रचने का प्रयास कर रहे थे, एक दूसरे को समझने के लिए संवाद करने के प्रयासों में थे, इशारों व संकेतों से अलग। कथाएं, कथावस्तु और रूप के अनुसार जिस पाठवोध का रचाव करती हैं उससे परिवार की संरचना का पता चलता है, रिश्तों की सूचना मिलती है, रिश्तों को बनाये जाने के कथानक का ज्ञान होता है। आधुनिक कथायें तो तरह तरह का पारिवारिक माहौल बनाते हुए दीखती हैं, ये कथायें ही हैं जिसने हमें बताया कि अब कथायें संयुक्त परिवार से होते हुए एकल परिवार की दुर्गम यात्रा पर हैं। कई कई कथाओं ने परिवार के टूटन को आधार बना कर खूब नाम भी कमाया है। कथाओं की दुनिया से परिवार की छोटी से छोटी बात भी नहीं छूट पायी है, चाहे वह संदर्भ पिता का हो, मां का हो, चाचा, चाची, भाई दोस्त किसी का भी हो, सभी रिश्तों पर किसिम किसिम की कथायें हैं, प्रेमसंबधों को ले कर तो कथाओं का एक अलग संसार ही रच बस गया है। प्रेम को प्रेम की तरह, देह से अलग, वाले संबधों की कथायें कथा संसार में कम जगह पा पायी हैं, प्रेम को तन से जोड़ कर मन को कहीं कोने में पटक देने की प्रवृित्तयों समकालीन कथाओं में हर तरफ देखी जा सकती हैं। वे कथायें चर्चित और प्रशसित भी हैं फिर भी लगता है कि कथाओं का काम पूरा नहीं हो पाया है, उन कथाओं से कथाओं का काम पूरा हो भी नहीं सकता। कथाओं का काम है, निजता को समूहगत बनाना, व्यक्त से अव्यक्त तक पहुंचना, चित्त और चेतना को संतुलित करना, पराई पीर को अपनी पीर मानना, पर क्या ऐसा हो पाया? मानवीय संवेदनशीलता को किसी कथा में ढालना बहुत ही अच्छी बात है पर कथा को व्यवहार से अलग केवल किताबों में दर्ज करा देना इसे तो अच्छा नहीं कहा जा सकता। कृति और कृतिकार दोनों में प्रकृति के ‘समत्वम्’ का कुछ तो शामिल होना ही चाहिए। दोनों को एक में गुंथा दिखना भी चाहिए, चाहे कृति पढ़ो चाहे कृतिकार को। हवाई जहाज से धरती की सतह नापना यह कुदरती कथा का काम नहीं। इस संदर्भ में कुछ उन कथाओं पर हमें विचार करना होगा जिन्हें साहित्यिक सरोकारों से विशेष धर्म द्वारा समादृत होने के कारण अलग कर दिया गया है, उन कथाओं को छुआछूत की बिमारी की तरह माना जाता है। पर कथासाहित्य की कुदरती परंपराओं पर वे कथायें जैसा प्रभाव छोड़ती हैं वैसी प्रभावोन्वति समकालीन कथाओं में देखना खुद का माथा फोड़ना होगा। हम जानते हैं कि हमारे समाज में राम और कृष्ण की कथाओं की तुलना में कोई कथा जनप्रिय नहीं है। आइए उन कथाओं को समकालीनता के संदर्भ में देखें.. कृष्ण की बात करें तो.. उन कथाओं में कृष्ण कथापात्र भर हैं, वे रहने वाले द्वारिका के हैं पर जाने जाते हैं मथुरा से, वे रूक्मणी के पति हैं पर रूक्मणी कृष्ण के नाम से उतना नहीं जाने जाते हैं जितना कि राधा कृष्ण के नाम से, वे एक ऐसे कथापात्र हैं जो देवकी नंदन से यषोदा नंदन बन जाते हैं, तो ये जो कृष्ण हैं किसी समय के कथापात्र हैं, जिनके दो दो रूप हैं, दो दो जन्म स्थान हैं, दो दो मॉ हैं इसी तरह एक कथा पात्र और उसके दो दो रूप। दोनों रूपों में कही भेद नहीं, पूरी तरह एक में एकाकार यानि प्रकृति से इतना एकाकार कि वे जहां रहते हैं, जिसके साथ रहते हैं उसी के हो जाते हैं। इतना समत्वम्, तो यह है कथा के जनमूलक या कुदरती होने की स्थिति। कृष्ण का यह जो समत्वम् वाला रूप है उससे समकालीन कथाकार सार्थक निष्कर्ष निकाल सकते हैं पर चाहें तब। कृष्ण का सारथी वाला रूप अगर गंभीरता से देखा जाये तो श्रमसंबधों को सम्मान देने वाला रूप है, ध्यान रहे कृष्ण भी नरेश हैं, अर्जुन और दुर्योधन से कम नहीं, वे सारथी हैं महाभारत के युद्ध में, सारथी यानि केवल रथ खींचने वाला एक श्रमिक, कृष्ण रूपी श्रमिक पूरी व्यवस्था खींचने और चलाने वाला बना हुआ है। पर आज क्या ऐसी कथायें रची जा सकती हैं। क्या हमें सारथी बन कर समाज का रथ खींचने काम किसी समकालीन कथा में किया? कृष्ण के सारथी वाले चरित्र से अलग उनका एक रूप प्रेम वाला भी है, उनका प्यार है रूक्मणी से, वे प्रेम करते हैं राधा से, वे यषोदा के दुलरूआ हैं और देवकी के कलेजे का टुकड़ा हैं, द्रोपदी भी उनके प्रेम की परिणति हैं, उसे वे सुभद्रा से कम नहीं मानते, तो ये हैं कृष्ण, बहुआयामी, सभी के, सभी उन्हें अपना मानते हैं, अपना ही नहीं सभी उनमें अपनापन देखते हैं। कृष्ण का प्यार प्रायोजित नहीं, स्वस्फूर्त है। कृष्ण इतना खुले हुए हैं कि उनको खोलना नहीं पड़ता, वे प्रकृति की तरह प्रकृतिमय हैं, पूरी तरह से खुले हुए, उनके खुलने के लिए खुलने लायक परिस्थितियां निर्मित नहीं करनी पड़तीं। महाभारत का कथानक ऐतिहासिक हो न हो, उसमें रचा गया कृष्ण का चरित्र तो निश्चितरूप से ऐतिहासिक और अभूतपूर्व है। वे महाभारत युद्ध के भागीदार नहीं हैं, तत्कालीन सत्ता संघर्ष का उनके लिए कोई व्यक्तिगत प्रयोजन नहीं, प्रयोजन है, मानव सभ्यता का, पथभ्रष्ट होती सत्ता के बदल का, वे तटस्थता का अपराध नहीं कर सकते थे फिर भी तटस्थ रहते हुए युद्ध का साक्षी बनते हैं। वे अर्जुन से जिन परिस्थितियों मंत संवाद करते हैं हमें उस तरफ लौटना होगा, परिस्थिति युद्ध की है और अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ हैं, युद्ध लड़ना चाहिए या नहीं, इसे वे तय नहीं कर पा रहे हैं, कृष्ण जो युद्ध के प्रति तटस्थ हैं वे संवाद में वहां सक्रिय हैं, अर्जुन को रास्ता दिखाते हैं, रास्ता भी ऐसा जो किसी रहस्यलोक की तरफ नहीं ले जाता है, वह रास्ता है वैज्ञानिकता का यानि पूरी सृष्टि नश्वर है फिर किस बात की चिंता? मानवीय समीपताओं की सुरक्षा के लिए युद्ध किया जाना समय की जरूरत है। महाभारत का युद्ध युद्धकालीन परंपरा का प्रतीक है, युद्धों को ही तब सत्ता बदल का उपयोगी तरीका माना जाता था। उस समय युद्ध के अलावा सत्ताबदल का कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था। एक तरह से युद्ध का समर्थन कृष्ण के व्यक्तित्व पर सवाल की तरह है पर उस समय कृष्ण कर भी क्या सकते थे, जो कर सकते थे वही किया कृष्ण ने, यानि तात्कालिकता का कर्म, तात्कालिकता का कर्म वर्तमान के द्वारा स्वस्फूर्त ढंग से चालित होता है, योजनावद्धता के लिए वहां अवसर कहां? समकालीन कथाओं की दुनिया भूख और भोजन, तन और मन, चित्त और चेतना, कृति और प्रकृति, व्यक्ति और अभिव्यक्ति, सŸाा और समाज, परंपरा और कानून, व्यवस्था व अव्यवस्था, न्याय और सामाजिक न्याय, अधिकार और मानवाधिकार आदि रंगीन शब्दों के अर्थों को खोलने में आतुरता तो दिखाती है पर क्या उन आतुरताओं के पीछे वर्चस्वी वर्गों की ऐसी दुनिया काम नहीं कर रही होती है जो न केवल शब्दों को विखंडित करती है वरन् उसकी भाषा को भी बाजार के चौराहों पर बिकने के लिए खड़ा कर देती है। जाहिर है भूख और भोजन के बीच ही सभ्यतायें पसरी होती हैं, उसी से सभ्यता के विकास का क्रम आगे बढ़ता है। अगर हम आदिम समाजों की तरफ देखें जिनमें कभी वर्ग भेद नहीं था तो साफ पता चलता है कि उस समय जो भीतरी और बाहरी प्रकृति से तालमेल, संयोजन, व रिश्ता रखने वाले लोग थे, वे ही सभ्यता के विकास क्रम में पिछड़ गये थे, विकास की पगलाई रेस में पिछड़ जाने के कारण वे दमित और शोषित हो जाने के लिए अभिशप्त थे सो उन्हें विकसित लोगों की सेवा करनी पड़ती थी। उन्हें वर्चस्वी वर्ग सेवा के काम में लगा लिया करता था वह भी बमुश्किल तमाम और प्राकृतिक मान्यताओं व नियमों से अलग एक अलग किस्म का वर्ग समाज बन जाता है। और यहीं से विकसित समाज आदिम समाजों की पूरी संस्कृति ही लीलने लग जाता है। उनकी कथाओं, गीतों, संगीतों आदि को असभ्यों की संस्कृति साबित कर खुद से अलग करने लगता है। तथा खुद को सभ्यता का कोतवाल मानने लगता है। विकास के इस क्रम ने श्रमसंबधों को सेवक और स्वामी के दो अलग अलग खानों में बांट दिया। यहीं से प्रारंभ हुआ कुदरती समाज का विघटन, यानि शोषित, दमित, प्रताड़ित और नियोजित समाज और शासक, मालिक, शोषक का अप्राकृतिक स्वरूप। वर्चस्वी वर्ग के लोग ताकत के बल पर सेवा में लगे लोगों को समाज से अलग एक खाने में फेंक देते हैं, वे प्रकृति के करीब जीवन जीने वाले लोगों को उनसे प्रकृति के सारे उपहारों को छीन कर श्रमिक आदि बना देते हैं। यह एक विस्मयकारी कथा है यह सब मानव सभ्यता के विकास क्रम में ही हुआ है, जो कि पूरी तरह से अप्राकृतिक है। तो यह है मानव सभ्यता के विकास क्रम का अतीत। हम चाहे तो अतीत से कुछ अनिवार्य सबक ले सकते हैं और वर्तमान सभ्यता के मूल्यांकन में उस सबक का उपयोग कर सकते हैं। मानव सभ्यता के दौर में यह सब किया गया सामाजिक प्रबंधन और व्यवस्थापन के नाम पर, पर क्या यह जो व्यवस्थापन किया गया मानवीय समीपता के संदर्भ में उसके परिणाम सकारात्मक निकले, हमें पता है कि आदिम समाजों में आज के सभ्य समाज वालों को जो अव्यवस्था दीखती है वह उस समय की व्यवस्था थी, आत्म चेतना वाली समूहगत व्यक्तिगत कत्तई नहीं। व्यवस्था भी अव्यवस्था हो सकती है, जबकि अव्यवस्था हर हाल में अव्यवस्था नहीं होती। प्रकृति से एकाकारिता के कारण आदिम समूहों के लोग प्रकृति से अलग नहीं हो सकते थे जबकि सभ्यता के नाम पर उनकी प्रकृति से खिलवाड़ किया जा रहा था। ऐसे में जीवन जीने के लिए वे प्रकृति में ही जीवन जीने के संवेगों व ऊर्जा की तलाश करते हैं ऐसा करने में वे खुद को जीवित बनाये रखने के लिए कल्पित देवताओं की तलाश, पेड़ों, झाड़ियों, पहाड़ों आदि में करने लगते हैं, जीवन तो जीवन होता है, वे वन में थे और वन ही उनका जीवन था। वन में ही वे अपने देवी देवता भी सिरज लेते हैं, झाड़, फूंक ओझइती आदि करने लगते हैं। तो यह है वन्य समाज का प्रकृतिमूलक उदय और दूसरी तरफ एक ऐसे समाज का गठन जो पूरी तरह बनावटी, सजावटी और कृत्रिम तथा प्रकृति विरोधी होते हुए भी खुद को सभ्य प्रमाणित करवाने वाला और वैज्ञानिकता से ओतप्रोत बताने वाला। क्षमा चाहूंगा कृष्ण की कथा का संदर्भ लेने के लिए खासतौर से उन लोगों से जो कृष्ण को धर्म से जोड़ते हैं, पर कृष्ण धार्मिक यानि पारलौकिक कम लौकिक अधिक हैं। और कुदरती कथापरंपरा के नायक हैं। कृष्ण की कथा से अलग एक जनकथा के माध्यम से मैं अपनी बात रखने का प्रयास कर रहा हूं। बात बहुत सरल है पर वह कुदरती जमीन पर किस तरह से उपजती हैं सोचना यही है, मुझे नहीं पता कि इस जनकथा को किसने कहा, कब कहा पर मैं इस कथा को कुदरती जमीन से उपजी हुई कथा मानता हूं। कथा बहुत ही सामान्य है.. इसे कथा होने पर भी सवाल दागा जा सकता है। फिर भी आइए कथा के साथ दो कदम चलें.. ‘किसी जंगल में एक सियार रहता था। वह कुआंरा था, उसकी उम्र के दूसरे नर सियारों की शादियां हो चुकी थी, उसकी शादी के लिए प्रस्ताव नहीं आते थे। उसके मॉ बाप परेशान थे। वह भी परेशान था। एक दिन वह जंगल में घूम रहा था कि उसे रास्ते में पड़ा हुआ अखबार दिखाई दिया। उसमें एक फोटो छपी थी जो उसकी तरह दीख रही थी फिर क्या था, खुशी के मारे वह उछल पड़ा। अखबार में छपी अपनी जैसी फोटो देख कर उसे लगा कि अब उसका काम हो जाएगा। उसी वक्त एक दूसरे रास्ते से एक सियारिन भी आ गयी। सियार ने उसे रोका.. ‘कहां जा रही हो, थोड़ा रुको, देखो अखबार में मेरी फोटो छपी है।’ सियारिन ने अखबार देखा.. उसने अखबार कभी देखा नहीं था, सो उसने पूछा.. ‘यह किस पेड़ का पत्ता है?’ उसे क्या पता कि अखबार क्या होता है? ‘पागल कहीं की, यह पत्ता नहीं है, अखबार है। पर तूं का जाने अखबार के बारे में मूरख कहीं की। उसने उसे अखबार के बारे में बताया कि इसमें खबरे छपती हैं और वे सच होती हैं। जंगल के उस पार जो आदमियों की शक्ल में जानवर रहते हैं उनके लिए अखबार छपता है, इसमें देश दुनिया की खबरें छपती हैं, सरकार के बारे में छपता है, राजा के बारे में छपता है’ ‘तो का हुआ, अखबार है तो है, छपा करे उसमें राजा रानी के बारे में, हमैं ओसे का लेना देना, हमें अखबार काहे दिखा रहे हो?’ ‘मतलब है, सो दिखा रहा हूं, मुझे जंगल ही नहीं जंगल के बाहर रहने बसने वाले आदमियों का इस गजट के द्वारा राजा बना दिया गया है, अब मेरा हुकुम जंगल और गांवों दोनों जगहों पर चलेगा।’ सियारिन अखबार देखने लगी, उसे भी जान पड़ा कि सियार सच बोल रहा है, फोटो तो इसी की लगती है। सियारिन ने सियार को गंभीरता से देखा। उसके मन में सियार के प्रति आकर्षण हुआ जो प्रेम का एक रूप था। सियार ने सियारिन को बाहों में भर लिया। बात आगे बढ़ी, सियार ने सियारिन के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा, उसे सियारिन ने सहर्ष स्वीकार लिया फिर दोनों की शादी हो गयी। समय बीतने लगा। एक दिन दोनों का मन हुआ जंगल से बाहर निकल कर घूमने का। दोनों जंगल से बाहर निकल गये। जब दोनों गांवों की तरफ गये तब देखा कि एक खेत में ईख लहलहा रही है। सियार का मन ईख देख कर ललच गया। दोनों खेत में घुस कर ईख तोड़ कर चूसने लगे। तभी खेत के मालिक ने उन्हें देख लिया फिर क्या था मालिक ने उन्हें हंका लिया। दोनों बिना देर किए जंगल की तरफ भागे, खेत का मालिक उन्हें हंकाता हुआ उनके पीछे पीछे दोड़ रहा था। कुछ दूर भागने के बाद सियार ने पीछे देखा, मालिक लौट चुका था। उसने सियारिन से कहा.. ‘अब सुस्ता लेते हैं, लगता है गांव वाले वापस हो चुके हैं’, दोनों थक भी गये थे..सियारिन चालाक थी.. ‘तुम भागे क्यों, तुम तो जंगल और गांवों के राजा हो, भला राजा अपनी परजा से डर कर भागता है?’ ‘चुप रहो! तूं का जानो राज काज’‘काहे हम नाहीं जानते हैं का राज काज। तूं तो चोर की तरह भाग रहे थे। जब तूं राजा हो, भागे काहे? कहा जाता है कि राजा तो परजा का प्यारा होता है, फिर परजा से काहे का डर’‘अरे तूं का जानेगी औरत जात, चूल्हा चौका करने वाली, तूं का जानेगी गांव वालों के बारे में, वह मेरी मूरख परजा है, उजड्ड, अशिक्षित और असभ्य और जंगल की परजा तो बुद्धिमान और आज्ञाकारी है। राजा तो हम हैं ही, तूं नहीं जानती कुछ भी, राजनीति कहती है कि समझदार राजा को मूरख परजा से बच कर रहना चाहिए, मूरख परजा गुस्से में किसी को नहीं पहचानती, चाहे वह राजा ही क्यों न हो। मारने पीटने पर उतर जाती है इसी लिए तो हमने गांव की मूरख परजा को अपने जंगल में आने से रोक दिया है। हमें पता है कि गांव वाले जंगल में आ कर हमारी सभ्यता खतम कर देंगे और जंगल में अराजकता फैला देंगे। यहां की एक एक ईच जमीन पर अपना मालिकाना बना लेंगे, तुझे तो पता है कि जंगल हम सभी का है, यहां रहने बसने वालों के जंगल पर बराबर बराबर अधिकार हैं। जंगल की हमारी लोकतांत्रिक सभ्यता के बारे में कम पढ़े लिखे, असभ्य, गंवार गांव वाले का जानें।’सियारिन मुस्कराने लगी, उसे अपने पति पर प्यार आ गया फिर तो वह उससे लिपट गयी। उसे लगा कि उसका पति झूठ नहीं बोल रहा।’ तो यह है एक सामान्य सी पर उल्लेखनीय कुदरती कथा। ध्यान देने की बात है, अखबार, राजा, मूरख परजा, व्यवस्था, राज काज ये शब्द इस कथा में आते हैं हमें विचार करना है कि क्या इन शब्दों के अर्थोंं को खोलने में यह जो कुदरती कथा है, बिना बनावट वाली, समर्थ नहीं है। इसे समझने के लिए हमें आयातीत विचारणों की जरूरत है, क्या इसकी तुलना में हम किसी समकालीन कथा को उद्धृत कर सकते हैं, जो राजा, और परजा के बीच पसरे अर्थों के एक एक रेशे की सहज व्याख्या कर सकती हो। तो यह है कुदरती कथाभाषा का एक रूप जिसे हम संवाद मानते हैं। इस कथा में संवाद साफ साफ है, पर्दे में ढका छुपा नहीं। इस कथा में अखबार ही नहीं मूरख परजा और आज्ञाकारी परजा, सभ्य और असभ्य, राज काज का भी रूप खुलता है, राजा तो खुलता ही है। इस तरह यह जो राजा है या राजा बनाये जाने की प्रवृत्तयां हैं वह भी खुल जाती हैं। क्या आपको नहीं लगता कि ऐसी कथाओं में पाठ वस्तु और पाठ वोध में पूरी तरह समत्वम् का अर्थवोध होता है। हमें गुनना होगा कि कहीं हमारा चिंतन और विवेक सियारिन वाला तो नहीं? और हम सियार जैसे स्वघोषित राजाओं और राजप्रबंधन के मकड़जाल में तो नहीं? साफ है कि हमारे चिंतन और विचारण की जमीन कुदरती रही है, सभै भूमि गोपाल वाली, रुपया हाथ का मैल है, हमारे कुदरती चिंतन में चित्त और चेतना दोनों अलग अलग नहीं ‘समत्वम्’ वाले भाव में हुआ करते हैं। वैसे भी जहां चित्त कुदरती हो चेतना कुदरती हो ही जाती है फिर तो व्यक्ति और समष्टि में, कृति और प्रकृति में, व्यक्ति और अभिव्यक्ति में फर्क नहीं रहता। ये सारे बुनियादी तत्व एकमेक होते हैं, एक दूसरे में यौगिक की तरह यह जो मानव और मानव में फर्क आगया है वह तो मौजूदा समय के राजनीतिक और सामाजिक संबधों में श्रमसंबधों की अवमानना के कारण। हमें पता है कि हमारी कथाभूमि कभी बाजारभूमि नहीं रही ह,ै इसी लिए कभी भी हम बाजार का विश्वास जीतने का प्रयास नहीं करते थे और हमें करना भी नहीं चाहिए। जबकि आज के समय में हम बाजार का विश्वास जीतने का ही प्रयास कर रहे हैं। वैसे सच है कि आज हम बाजार में हैं फिर भी हमें प्रयास करना होगा लुकाठी ले कर बाजार में खड़े होने की, पर हाथ में लुकाठी लेना तो हमें प्राच्यवादी बना देगा। और प्राच्यवादी बनना आधुनिक सभ्यता में शर्मनाक बिमारी की तरह है। हम आगे देखें कि पीछे देखें इसमें फसे हुए हैं इस देखने के बारे में लियोनार्दो की प्रसिद्ध पंक्ति है ‘हमें जो दिखायी देता है, उस पर यकीन नहीं करना चाहिए; अपितु जो दिखायी देता है उसे समझना चाहिए’ दिक्कत यही है हमारे दिल, दिमाग में सदैव बाजार के करतब नाचते रहते हैं और हम वफादार उपभोक्ता की तरह बाजार में खड़े होने तथा कोई पैकेट बनने की चाह में उलझे हुए बाजार का विश्वास जीतने की प्रतिस्पर्धा की तैयारियों में लग जाते हैं। तो जैसा कि लियोनार्दो ने कहा है कि हमें जो आज का राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक बाजार दिखायी देता है उस पर यकीन नहीं कर लेना चाहिए उसे समझना चाहिए, तो यह जो समझ का मामला है दरअसल वह है क्या? कथा की जमीनी दुनिया में कथाकारों के लिए आवश्यक हो जाता है कुदरती आवश्यकताओं की झील में उतरना, वहां जो कुदरती रत्न जैसे समता, भाई चारा, सहभागिता जैसे यथार्थ दफन किए जा चुके हैं, उनकी तलाश करना उनके सहारे अपनी कथाभाषा सृजित करना उसी अनुरूप की कथावस्तु के द्वारा दुनिया से संवाद करना ही सार्थक प्रयास होगा। जरूरी कथा सृजन के लिए अतीत को पुनः आविष्कृत करना तथा उसे वर्तमान से संयुक्त कर भविष्योन्मुख बनाना भी तो एक जरूरी कार्यभार है। हमें यह मान कर चलना होगा कि समकालीन सत्ता व्यवस्था और बाजार का प्रबंधतंत्र दोनों एक दूसरे में एकाकार हैं, दोनों में परिचालन संबधी समरूपता होती है, दोनों का अपना तंत्र होता है इसी लिए वे एक दूसरे के सहयोगी भी होते हैं, एक दूसरे के हितों के रखवाले भी होते है। ऐसे जटिल समय में कथा कार के लिए आसान नहीं है कुदरती जमीन पर पांव रखने भर की जमीन भी तलाश लेना सो वह विवश है उसी जमीन पर पांव रखने के लिए जिसे सत्ता या बाजार उसे उपलब्ध कराता है यानि बतौर कथाकार हमारे सामने संकट बहुत हैं फिर भी हमें उन संकटों से तथा उनके प्रायोजित घेरों से बाहर निकलना होगा। हमें कथा की उस भूमि से खुद को हर हाल में अलग करना होगा जिसे बाजार और सत्ता पुरस्कार, सम्मान व पद जैसे पट्टे पर उपलब्ध कराती है। बाजार का हमारे लिए सुभाषित है कि ‘लिखो ऐसा लिखो जिसके खरीददार हों, जो हाथों हाथों बिके।’ हमें अकर्मण्यता और मूढ़ता के आरोपों से निकलना होगा कि हम वही लिख सकते हैं जो हमसे लिखवाया जाता है, हम वही समझ सकते हैं जो हमसे समझवाया जाता है, तो क्या हम बाजारवादी तंत्र में उलझे हुए प्रकाशकों के चौखटों पर माथा नवाने की ही योग्यता वाले लोग हैं और मूढ़ नहीं हैं। यह सवाल हमें खुद से पूछना होगा और उस जाल से बाहर निकलना होगा जिसे सत्ता और बाजार तंत्र ने अपने बफादार आलोचकों, समीक्षकों या चिंतकों के गठजोड़ से बनाया हुआ है। जाहिर है चुनौतियां बहुत हैं फिर भी हताशा या माथा फोड़ लेने से काम नहीं चलने वाला। काम तो तब चलेगा जब हम कुदरती कथा को अपने जीवन की कथा बना लेंगे और उन चीजों से दूर रहने का प्रयास करेंगे जो हमसे हमारा चित्त और चेतना दोनों छीन लेने के लिए किसिम किसिम के तंत्र विकसित कर रहे हैं। निश्चित रूप से हमें कुदरती कथाभूमि को बंजर बनने से रोकने के लिए भारतीय परिवेश के कथाबीजों को कथाखेती के लिए आविष्कृत करना होगा। जाहिर है ऐसा करने के लिए हमें सामाजिक संरचना के ताने, बाने को गंभीरता से जांचना परखना होगा। दर असल आज का समय प्रकृतिमयता से बहुत दूर कृत्रिमता की तरफ भागने वाला है। ऐसे समय में बाजार या सत्ताप्रबंधन से जुड़ी ताकतें समाज की उभरती या उभर सकने वाली प्र्रतिरोधी चेतना से लैश ताकतों का विलीनीकरण सत्ताप्रबंधन में किसी न किसी प्रकार से कर लिया करती हैं फिर जो ग्रामीण चेतना या प्रकृति की चेतना के पोषक होते हैं वे भी सत्ताप्रबंधन के मुलायम कालीनों पर आसन जमाने की लालच में पड़ जाया करते है ऐसी स्थिति में हमें सावधान रहना होगा कि सामाजिक चेतना की समानधर्मा ताकतों का विलीनीकरण सत्ताप्रबंधन की बाजारू संस्कृति में न होने पाये जिनकी पात्रता हमारे कथासाहित्य तथा कथाभाषा दोनों के लिए अनिवार्य है।