कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/गदाधर भट्ट का जीवन परिचय

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गदाधर भट्ट चैतन्य महाप्रभु के शिष्य थे। यह गौड़ीय संप्रदाय के प्रमुख भक्त कवियों में गिने जाते हैं। ऐसा प्रसिद्द है कि ये महाप्रभु चैतन्य को भागवत की कथा सुनाया करते थे। इस घटना उल्लेख आचार्य रामचंद्र शुक्ल (हिंदी साहित्य का इतिहास :पृष्ठ १ ८ २ ),आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (हिंदी साहित्य :पृष्ठ २०० )और वियोगीहरि (ब्रजमाधुरीसर :पृष्ठ ७५ )` इन तीन विद्वान लेखकों ने किया है। इसी आधार पर इनका समय महाप्रभु चैतन्य के समय (वि ० सं ० १५४२ से वि ० सं ० १५९० ) के आसपास अनुमानित किया जा सकता है। चैतन्य महाप्रभु और षट्गोस्वामियों के संपर्क के कारण आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इनका कविता कल वि ० सं ० १५ ८० से १६०० के कुछ बाद तक अनुमानित किया है भट्ट जी दक्षिणात्य ब्राह्मण थे। इंक जन्म स्थान आज तक अज्ञात है। ये संस्कृत के दिग्गज विद्वान थे इसी कारण इनके ब्रजभाषा के पदों में संस्कृत शब्दों की प्रचुरता है। आप का ब्रजभाषा पर पूर्ण अधिकार था। वृन्दावन आने के पूर्व ही आप ब्रजभाषा में पदों की रचना किया करते थे। ऐसा प्रचलित है कि ये जीवगोस्वामी की प्रेरणा से वृन्दावन आये और महाप्रभु चैतन्य का शिष्यत्व ग्रहण किया। साधुओं से गदाधर भट्ट के द्वारा रचित निम्न 'पूर्वानुराग 'के पद को सुनकर जीवगोस्वामी मुग्ध हो गए :

सखी हौं स्याम रंग रंगी।
देखि बिकाय गई वह मूरति ,सूरत माहिं पगी।।
संग हुतो अपनी सपनो सो ,सोइ रही रस खोई।
जागेहु आगे दृष्टि परे सखि , नेकु न न्यारो होई।।
एक जु मेरी अंखियन में निसि द्यौस रह्यौ करि भौन।
गाइ चरावन जात सुन्यो सखि ,सोधौं कन्हैया कौन।।
कासौं कहौं कौन पतियावै , कौन करे बकवाद।
कैसे कहि जात गदाधर , गूंगे को गुरु स्वाद।।

इनके जीवन और स्वभाव के सम्बन्ध में नाभादास जी के एक छप्पय तथा उस पर की गई प्रियादास की टीका से कुछ प्रकाश पड़ता है। नाभादास का छप्पय :

सज्जन सुह्रद , सुशील , बचन आरज प्रतिपालय।
निर्मत्सर,निहकाम , कृपा,करुणा को आलय।।
अनन्य भजन दृढ़ करनि धरयो बपु भक्तन काजै।
परम धरम को सेतु , विदित वृन्दावन गाजै।।
भागौत सुधा बरषे बदन काहू को नाहिन दुखद।
गुन निकर 'गदाधर भट्ट 'अति सबहिन कों लागै सुखद।।