कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/गदाधर भट्ट की माधुर्य भक्ति

Wikibooks से
Jump to navigation Jump to search


भट्ट जी के उपास्य नित्य वृन्दावन में वास करने वाले राधा-कृष्ण है। उनका रूप , स्वभाव ,शील ,माधुर्य आदि इस प्रकार का है कि चिन्तन लिए मन लुब्ध हो जाता है। उनके अनुसार कृष्ण व्रजराज कुल- तिलक ,राधारमण ,गोपीजनों को आनन्द देने वाले ,दुष्ट दानवों का दमन करने वाले ,भक्तों की सदा रक्षा करने वाले ,लावण्य -मूर्ति तथा ब्रह्म ,रूद्र आदि देवताओं द्वारा वन्दित हैं।:

जय महाराज ब्रजराज कुल तिलक ,
गोविन्द गोपीजनानन्द राधारमन।
बल दलन गर्व पर्वत विदारन।
ब्रज भक्त रच्छा दच्छ गिरिराज धरधीर।

कृष्ण -प्रेयसी राधा सकल गुणों की साधिका ,तरुणी-मणि और नित्य नवीन किशोरी है। वे कृष्ण के रूप के लिए लालायित और कृष्ण-मुख-चन्द्र की चकोरी हैं। कृष्ण स्वयं उनकी रूप-माधुरी का पान करते हैं। गौरवर्णीय राधा का मन श्याम रंग में रंगा हुआ है और ६४ कलाओं में प्रवीण होते हुए भी भोली हैं।

जयति श्री राधिके सकल सुख साधिके,
तरुनि मनि नित्य नवतन किशोरी।
कृष्ण तनु लीन मन रूप की चटकी,
कृष्ण मुख हिम किरण की चकोरी।।
कृष्ण दृग भृंग विश्राम हित पद्मिनी,
कृष्ण दृग मृगज बन्धन सुडोरी।
कृष्ण अनुराग मकरंद की मधुकरी,
कृष्ण गुनगान रससिन्धु बोरी।।
एक अद्भुत अलौकिक रीति मैं लखी,
मनसि स्यामल रंग अंग गोरी।
और आश्चर्य कहूँ मैं न देख्यो सुन्यो,
चतुर चौसठिकला तडवी भोरी।।