कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/माधुरीदास का जीवन परिचय

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माधुरीदास गौड़ीय सम्प्रदाय के अंतर्गत ब्रजभाषा के अच्छे कवि हैं। अभी तक हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखकों से इनका कोई परिचय नहीं है। इनकी वाणी के प्रकाशक बाबा कृष्णदास ने इनके विषय में कुछ लिखा है। माधुरीदास ने केलि-माधुरी का रचना काल अपने इस दोहे में दिया है :

सम्वत सोलह सो असी सात अधिक हियधार।
केलि माधुरी छवि लिखी श्रावण बदि बुधवार।। 
(माधुरी वाणी :केलि माधुरी :दोहा १२९ )

ये रूपगोस्वामी के शिष्य थे। इस बात की पुष्टि माधुरीदास की वाणी के निम्न दोहे से होती है:

रूप मंजरी प्रेम सों कहत बचन सुखरास।
श्री वंशीवट माधुरी होहु सनातन दास।। 
(माधुरी वाणी :वंशीवट माधुरी :दोहा ३० ८ )

यहाँ 'रूप मंजरी 'शब्द श्री रूपगोस्वामी के लिए स्वीकर किया गया है। निम्न दोहे से भी ये रूपगोस्वामी के शिष्य होने की पुष्टि होती है ~`

विपिन सिंधु रस माधुरी कृपा करी निज रूप।
मुक्ता मधुर विलास के निज कर दिए अनूप।। 
(माधुरी वाणी :केलि माधुरी :दोहा १२६ )

बाबा कृष्णदास के अनुसार माधुरीदास ब्रज में माधुरी कुंड पर रहा करते थे। यह स्थान मथुरा-गोबर्धन मार्ग पर अड़ींग नामक ग्राम से ढाई कोस ( ८ किलोमीटर ) दक्षिण दिशा में है। अपने इस मत की पुष्टि के लिए कृष्णदास जी ने श्रीनारायण भट्ट के 'ब्रजभक्ति विलास'का उल्लेख किया है।