कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/माधुरीदास की माधुर्य भक्ति

Wikibooks से
Jump to navigation Jump to search


माधुरीदास ने अपने उपास्य का परिचय निम्न दोहे में दिया है:

हो निकुंज नागरि कुँवरि ,नवनेही घनश्याम।
नैंनन में निस दिन रहो ,अहो नैन अभिराम।।
(माधुरी वाणी :उत्कंठा माधुरी :दोहा ३४ )

कृष्ण वर्ण से साँवले परन्तु सुन्दर हैं। उनका मोहन रूप सबको मोहित करने में समर्थ है। इस प्रकार मनहरण करके भी वे सबको सुखी करने वाले हैं। वे गुणों में रतिनिधि, रसनिधि,रूपनिधि और प्रेम तथा उल्लास की निधि हैं। वृन्दाविपिनेश्वरी राधा नवल किशोरी ,गौरवर्णा,भोली,मोहिनी,माधुर्य पूर्ण ,मृगनयनी आमोददा ,आनंद राशि आदि विभिन्न गुणों से संयुक्त हैं। सर्वगुण सम्पन्न होने के साथ-साथ रसरूपा हैं। आधा नाम लेने से भी साधक के सब सुख सिद्ध हो जाते हैं:

गुणनि अगाधा राधिका, श्री राधा रस धाम।
सब सुख साधा पाइये , आधा जाको नाम।।

राधा-कृष्ण के सम्बन्ध में इनके भी वही विचार हैं जो गौड़ीय संप्रदाय के अन्य ब्रजभाषा कवियों के हैं। अतः माधुरीदास ने अपने उपास्य-युगल को दूल्हा-दुल्हिन के रूप में चित्रित किया है:

माधुरी लता में अति मधुर विलासन की
मधुकर आनि लपटानी सब सखियाँ।
दुलहिन दूलहू के फूल विलास कछु
वास ले ले जीवति हैं जैसे मधुमखियाँ।।

उपास्य-युगल की मधुर -लीलाओं का ध्यान तथा भावना मधुरदास की उपासना है। अतः उन्होंने राधा -कृष्ण की प्रेम -लीलाओं की माधुरी को ही अपनी रचना में गया है.। इस विहार का आधार प्रेम है। इसीलिये राधा -कृष्ण के विलास का ध्यान कर भक्त को अत्यधिक आनन्द प्राप्त होता है:

परी सुरत जिय आय ,रोम रोम भई सरसता।
देखहु सुधा सुभाय ,मोहन को मोहन कियो।।
(मा ० वाणी :केलि वाणी :दोहा ८६ )

इस प्रेम की गति अगम है और इसका स्वरुप कठिन से कठिन है। इस प्रेम का अनुभव कभी मिलन, वियोग और कभी संयोग-वियोग मिश्रित रूप में होता है। किन्तु इसे वही जान सकता है जिसे इसका कभी अनुभव हुआ हो:

प्रेम अटपटी बात कछु ,कहत बने नहीं बैन।
कै जाने मन की दशा , कै नेही के नैन।।
(मा० वाणी :वंशीवट :दोहा २४६)