कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/रूपरसिक का जीवन परिचय

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रूपरसिक की निम्बार्क सम्प्रदाय के प्रमुख भक्त कवियों में गणना की जाती है। केवल निम्बार्क सम्प्रदाय में नहीं ,अन्य सम्प्रदाय के रसिकों में भी इन्हें बहुत आदर प्राप्त है। इन्होंने अपने हरिव्यास यशामृत में श्री हरिव्यासदेव को अपना गुरु स्वीकार किया है~~

श्री हरिव्यास भजो मन भाई।
असरन सरन करन सुख दुख हर महा प्रेम घन आनन्ददाई।।
अतिदयाल जनपाल गुणागुण सकल लोक आचारज राई।
वेदन को अति ही दुल्लभ सो महावाणी आप बनाई।।
दंपति मिलन सनातन मारग भजन रीति जा प्रभु दरसाई।
रूपरसिक रसिकन की जीवन महिमा अमित पार न पाई।।

इसी आधार पर इनका समय १७ वीं शताब्दी अनुमानित किया जा सकता है। किन्तु अपने लीलविंशति ग्रन्थ का रचनाकाल इन्होंने इस प्रकार दिया है;

पंदरा सै रु सत्यासिया मासोत्तम आसोज।
यह प्रबन्ध पूरन भयो शुक्ला सुभ दिन द्योज।।

इस दोहे के आधार पर निम्बार्क सम्प्रदाय के विद्वान रूपरसिक का समय सोलहवीं शताब्दी ठहराते हैं।