कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/रूपरसिक की माधुर्य भक्ति

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राधा-कृष्ण की प्रेम -लीलाओं का वर्णन करते समय रूपरसिक जी ने अपने उपास्य ,उपासना तथा उपासक भाव के प्रति जो विचार प्रकट किये हैं उनका सारांश इस प्रकार है :

  • रूपरसिक के उपास्य राधा-माधव सर्व समर्थ हैं।
  • राधा-माधव की राजधानी वृन्दावन है जहां ये भक्तों को अपनी वभिन्न लीलाओं से सुख प्रदान करते हुए सदा निवास करते हैं।
  • राधा-माधव की सेवा भक्त को अनायास ही आनन्द की प्राप्त हो जाती है।
हमारे राधा माधो धेय।
कहु बात की कमी न राखें जो चाहें सो देय।।
रजधानी वृन्दावन जैसी निगमागम की ज्ञेय।
अनायास ही रूपरसिक जन पावत सब सुख सेय।।

राधा-कृष्ण के विहार का दर्शन कर उसी के ध्यान में सदा लीन रहना ही इनकी उपासना एवं भजन-रीति है। इसी से सहज-प्रेम की प्राप्ति सम्भव है:

पिय लिय लगाय हिय सों प्रवीनि।
मन भायो सुख ले छाँड़ि दीनि।।
यह दम्पति को मधुरितु विलास।
गावै जो पावै प्रेमरास।।
महा मधुर मधुर ते अति अनूप।
रसपान करे होय रसिक रूप।।

अपनी इसी भजन-रीति के अनुरूप इन्होंने राधा-कृष्ण की सभी विहार लीलाओं ~~ रति ,झूलन,रास-नृत्य आदि का सुन्दर वर्णन किया है:

आजु सखी झुलत हिंडोरे देखे।
कबहुँक प्यारी कबहुँक प्यारो दोऊ प्रीति बिसेषें।
कोमल कर को परस पाय के मदत मदन वस कर लीन्हें।

धरे अंक पीवत अधरामृत सहज सुरत सुख दीन्हें। मंद-मंद सों चलत हिंडोरा प्रेम बिवस भये सुख दीन्हें।।