कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/श्रीभट्ट की माधुर्य भक्ति

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श्रीभट्ट जी के उपास्य वृन्दाविपिन विलासी राधा और कृष्ण हैं। ये सदा प्रेम में मत्त हो विविध कुंजों में अपनी लीलाओं का प्रसार करते हैं। भट्ट जी की यह जोड़ी सनातन ,एकरस -विहरण -परायण ,अविचल ,नित्य -किशोर-वयस और सुषमा का आगार है। प्रस्तुत उदाहरण में :

राधा माधव अद्भुत जोरी ।
सदा सनातन इक रस विहरत अविचल नवल किशोर किशोरी।
नख सिख सब सुषमा रतनागर,भरत रसिक वर हृदय सरोरी।
जै श्रीभट्ट कटक कर कुंडल गंडवलय मिली लसत किशोरी।।

राधा -कृष्ण का पारस्परिक प्रेम सम है। वहाँ विषमता के लिए कोई स्थान नहीं है। दोनों ही अन्य के सुख का ध्यान रखते हैं ~ क्योंकि वे दूसरे की प्रसन्नता को ही अपनी प्रसन्नता .समझते हैं। इस प्रकार स्वार्थ के अभाव में उनका प्रेम शुद्ध अथच दिव्य है। राधा और कृष्ण वास्तव में एकरूप हैं। वे पल भर के लिए भी दूसरे से अलग नहीं होते। ऐसी ही छवि पर रसिक भक्त अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देता है। निम्न पद में श्री भट्ट ने उपास्य युगल की एकरूपता को उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया है:

प्यारी तन स्याम स्याम तन प्यारो।
प्रतिबिंबित अरस परस दोऊ पलक देखियत नहिं न्यारो।।
ज्यों दर्पन में नैन नैन में नैन सहित दर्पन दिखवारो।
जै श्रीभट्ट जोरि की अति छवि ऊपर तन मन धन न्यौछावर डारौं।।

राधा और कृष्ण सदा विहार में लीन रहते हैं। किन्तु इनका यह नित्य विहार कन्दर्प की क्रीड़ा नहीं है। विहार में क्रीड़ा का मूल प्रेरक तत्व प्रेम है न कि काम। इसी कारण नित्य-विहार के ध्यान मात्र से भक्त को मधुर रस की अनुभूति हो जाती है। अतः भट्ट जी सदा राधा-कृष्ण के इस विहार के दर्शन करना चाहते हैं और यही उनकी उपासना है। वे कहते हैं :

सेऊँ श्री वृन्दाविपिन विलास।
जहाँ युगल मिलि मंगल मूरति करत निरन्तर वास।।
प्रेम प्रवाह रसिक जन प्यारै कबहुँ न छाँड़त पास।
खा कहौं भाग की श्री भट्ट राधा -कृष्ण रस-चास।।

युगल किशोर की वन-विहार ,जल-विहार ,भोजन,हिंडोला,मान,सुरत आदि सभी लीलाएं समान रूप से आनन्द मूलक हैं। अतः भट्ट जी ने सभी का सरस् ढंग से वर्णन किया है। यमुना किनारे हिंडोला झूलते हुए राधा-कृष्ण का यह वर्णन बहुत सुन्दर है। इसमें झूलन के साथ तदनुकूल प्रकृति का भी उद्दीपन के रूप में वर्णन किया गया है। :

हिंडोरे झूलत पिय प्यारी।
श्री रंगदेवी सुदेवी विशाखा झोटा डेट ललिता री।।
श्री यमुना वंशीवट के तट सुभग भूमि हरियारी।
तैसेइ दादुर मोर करत धुनि सुनी मन हरत महारी।।
घन गर्जन दामिनी तें डरपि पिय हिय लपटि सुकुमारी।
जै श्री भट्ट निरखि दंपति छवि डेट अपनपौ वारी।।