कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/सूरदास मदनमोहन का जीवन परिचय

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सूरदास मदनमोहन अकबर शासन काल मे संडीला,जिला हरदोई उत्तर प्रदेश में अमीन् थे। इसी आधार पर इनका समय सोलहवीं शताब्दी अनुमानित किया जा सकता है। ये जाति के ब्राह्मण थे। इन्होंने किसी गौड़ीय विद्वान से दीक्षा ली। सूरदास मदनमोहन का वास्तविक नाम सूरध्वज था। किन्तु कविता में इन्होंने अपने इस नाम का कभी प्रयोग नहीं किया। मदनमोहन के भक्त होने के कारण इन्होने सूरदास नाम के साथ मदनमोहन को भी अपने पदों में स्थान दिया। जिस प्रकार ब्रज भाषा के प्रमुख कवि सूर ( बल्लभ सम्प्रदायी ) ने अपने पदों में सूर और श्याम को एक रूप देने की चेष्टा की उसी प्रकार इन्होंने भी सूरदास और मदनमोहन में ऐक्य स्थापित करने का प्रयत्न किया है। दोनों कवियों की छाप में सूरदास शब्द समान रूप से मिलता है किन्तु एक श्याम की बाँह पकड़ कर चला है तो दूसरा मदनमोहन का आश्रय लेकर और यही दोनों के पदों को पहचानने की मात्र विधि है। उन पदों में जहाँ केवल 'सूरदास ' छपा है ~~ पदों के रचयिता का निश्चय कर सकना कठिन है। इस कारण सूरदास नाम के सभी पद महाकवि सूरदास के नाम पर संकलित कर दिए गए है। इसलिए सूरदास मदनमोहन के पदों की उपलब्धि कठिनाई का कारण हो रही है। आचार्य राम चंद्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में सूरदास मदनमोहन के नाम से जो पद दिया है वही पद नन्द दुलारे बाजपेयी द्वारा सम्पादित सूरसागर में भी मिल जाता है। नवलकिशोर नवल नगरिया।

अपनी भुजा स्याम भुज ऊपर स्याम भुजा अपने उर धरिया।।
करत विनोद तरनि तनया तट,स्यामा स्याम उमगि रसभरिया।
यों लपटाई रहे उर अंतर् मरकतमणि कंचन ज्यों जरिया।।
उपमा को घन दामिनी नाहीं कंदरप कोटि वारने करिया।
श्री सूरदास मदनमोहन बलिजोरी नन्दनन्दन वृषभानु दुलरिया।।

भक्तमाल में नाभादास जी ने सूरदास मदनमोहन के सम्बन्ध में जो छप्पय लिखा है उससे ज्ञात होता है की ये गान- विद्या और काव्य रचना में बहुत निपुण थे। इनके उपास्य राधा-कृष्ण थे। युगल किशोर की रहस्यमयी लीलाओं में पूर्ण प्रवेश के कारण इन्हें सुहृद सहचरि का अवतार मन गया है। भक्तमाल के छप्पय की टीका करते हुए प्रियादास जी ने सूरदास के जीवन की उस घटना का भी उल्लेख किया है जिसके कारण ये संडीला की अमीनी छोड़कर वृन्दावन चले गए थे।