कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/सूरदास मदनमोहन की माधुर्य भक्ति

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इनके उपास्य नवल किशोर राधा-कृष्ण हैं। यह अनुपम जोड़ी कुंजों में रस-लीला के द्वारा सखी और सखाओं को आनन्दित करती है। राधा और कृष्ण दोनों अनुपम सुन्दर हैं। जहाँ कृष्ण श्याम वर्ण हैं ,वहाँ राधा गौर वर्ण हैं ,किन्तु काँटी में दोनों समान हैं। सिद्धान्तः कृष्ण ही राधा और राधा ही कृष्ण हैं। ये उसी प्रकार एक हैं जिस प्रकार धूप और छाँह ,घन और दामिनी तथा दृष्टि और नयन। फिर भी लीला के लिए उनहोंने दो विग्रह धारण किये हुए हैं~

माई री राधा वल्लभ वल्लभ राधा।
वे उनमे उनमे वे वसत।।
ग़म छाँह घन दामिनी कसौटीलीक ज्यों कसत।
दृष्टि नैन स्वास वैन नैन सैन दोऊ लसत।

सूरदास मदनमोहन सनमुख ठाढ़े ही हसत। सूरदास मदन मोहन के कृष्ण मायाधिपति हैं। उनकी माया समस्त जगत को अपने वश में करने वाली है,किन्तु मायाधिपति होने पर भी कृष्ण स्वयं प्रेम के वशीभूत हैं। इसी कारण जिस प्रकार इनकी माया समस्त जगत को नचाती है उसी प्रकार गोपयुवतियाँ इन्हें अपने प्रेम के बल पर नचाती हैं। राधा सर्वांग सुंदरी हैं ~~ उनके रूप लावण्य की समता कमला , शची और स्वयं कामदेव की पत्नी रति भी नहीं कर सकतीं। रूप ही नहीं गुण और प्रेम की दृष्टि से भी राधा अनुपम हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण उनके प्रेम का आस्वादन करने के लिए ब्रज में प्रकट हुए हैं। सामाजिक सम्बन्ध की दृष्टि से सूरदास मदनमोहन ने राधा को कृष्ण का स्वकीया माना है। राधा-विवाह की शंका निवारण करने के लिए इन्होंने भी सूरसागर के रचयिता के समान राधा-कृष्ण का विवाह रचाया है,जिसमें गोपियाँ आहूत अभ्यागत हैं तथा इनके विवाह में मंगलाचार गाती हैं। दोनों को वर-वधू के वेश में देख कर कवि की मानसिक साध पूरी हो जाती है। यथा ~~

गोपी सबै न्यौते आई ,मुरली बरन्योति बुलाई।
सखियनि मिलि मंगल गाये ,बहु फुलनि मंडप छाये।।
छाये जो फूलनि कुंज मंडप पुलिन में वेदी रची।
बैठे जु स्यामा स्यामवर त्रयीलोक की शोभा सची।।
सूरदासहिं भयो आनन्द पूजी मन की साधा।
मदनमोहन लाल दूलहु दुलहिनि श्री राधा।।

स्वकीया के अतिरिक्त कुछ परकीयाभाव परक पद भी इनकी वाणी में मिल जाते हैं। किन्तु इन पदों का सम्बन्ध विशेष रूप से राधा के साथ न होकर सामान्य गोपयुवतियों के साथ है। इस प्रकार लोक लाज,कुलकानि छोड़कर कृष्ण के पास जाने का अवसर यमुना-तीर पर बजती हुई मुरली की ध्वनि को सुनकर उत्पन्न होता है। उस चर अचर सभी को स्तम्भित कर देने वाली ध्वनि को सुनकर यदि माता-पिता और पुत्र-पति आदि का विस्मरण हो जाता है तो कोई आश्चर्य की कोई बात नहीं।

चलो री मुरली सुनिए कान्ह बजाई जमुना तीर।
तजि लोक लाज कुल की कानि गुरुजन की भीर।।
जमुना जल थकित भयो वच्छा न पीयें छीर।
सुर विमान थकित भये थकित कोकिल कीर।।
देह की सुधि बिसरि गई बिसरयो तन को चीर।

मात तात बिसर गये बिसरे बालक वीर।। मुरली धुनि मधुर बाजै कैसे के घरों धीर। श्री सूरदास मदनमोहन जानत हौं यह पीर।। राधा-कृष्ण की संयोग पक्ष की लीलायें परस्पर हास -परिहास अथवा छेद-छाड़ से आरम्भ होतीहै। इसी पारम्परिक है-परिहास का परिणाम रूप ठगौरी में दिखाई देता है। तदनन्तर गुप्त मिलन के लिए जिस तिस प्रकार से अवसर ढूंढ लिया जाता है। स्वयं श्रीकृष्ण भी गुप्त कुञ्ज-स्थलों पर अपनी प्रेयसी की प्रतीक्षा करते देखे जाते हैं।

वृन्दावन बैठे मग जोवत बनवारी।
सीतल मंद सुगंध पवन बहै बंसीवट जमुना तट निपट निकट चारी।।
कुंजन की ललित कुसुमन की सेज्या रूचि बैठे नटनागर नवललन बिहारी।
श्री सूरदास मदनमोहन तेरो मग जोवत चलहु वेगि तूही प्राण प्यारी।।