कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/हरिव्यासदेव का जीवन परिचय

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हरिव्यासदेव निम्बार्क सम्प्रदाय के अत्यधिक प्रसिद्ध कवि हैं। इनके समय के विषय में साम्प्रदायिक विद्वानों में दो मत हैं। प्रथम मत वालों के अनुसार हरिव्यासदेव जी समय वि० सं ० १४५० से १५२५ तक है।(युगल शतक :सं ० ब्रजबलल्भ शरण :निम्बार्क समय समीक्षा :पृष्ठ ८ ) दूसरे मत वाले इनका समय कुछ और पीछे ले जाते हैं। उनके विचार में वि ० सं ० १३२० ही हरिव्यासदेव का ठीक समय है। ये दोनों ही मान्यतायें साम्प्रदायिक ग्रंथों अथवा अनुश्रुतियों पर आधारित हैं। हरिव्यासदेव का जन्म गौड़ ब्राह्मण कुल में हुआ था। आप श्री भट्ट के अन्तरंग शिष्यों में से थे। ऐसा प्रसिद्ध् है कि पर्याप्त काल तक तपस्या करने के बाद आप दीक्षा के अधिकारी बन सके थे। श्री नाभादास जी की भक्तमाल में हरिव्यासदेव जी के सम्बन्ध में निम्न छप्पय मिलता है:

खेचर नर की शिष्य निपट अचरज यह आवै।
विदित बात संसार संतमुख कीरति गावै।।
वैरागिन के वृन्द रहत संग स्याम सनेही।
ज्यों जोगेश्वर मध्य मनो शोभित वैदेही।।
श्री भट्ट चरन रज परसि के सकल सृष्टि जाकी नई।
श्री हरिव्यास तेज हरि भजन बल देवी को दीक्षा दई।।