कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/हरिव्यासदेव की माधुर्य भक्ति

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हरिव्यासदेव के उपास्य राधा-कृष्ण प्रेम-रंग में रंगे हैं। दोनों वास्तव में एक प्राण हैं ~ किन्तु उन्होंने दो विग्रह धारण किये हुए हैं। वे सदा संयोगावस्था में रहते हैं क्योंकि दूसरे का क्षणिक विछोह भी उन्हें सह्य नहीं है। अल्हादनी शक्ति-स्वरूपा राधा का स्थान श्रीकृष्ण की अपेक्षा विशिष्ट है।

मनमोहन वस कारिनी नखसिख रूप रसाल।
सो स्वामिनि नित गाइए रसिकनि राधा बाल।।

प्रिया-प्रियतम के परस्पर प्रेम का स्वरुप भी विलक्षण है। इस प्रेम के वशीभूत वे नित्य-संयोग में नित्य-वियोग की अनुभूति करते है।

सदा अनमिले मिले तऊ लागे चहनि चहानि।
हौं बलि जाऊँ अहु कहा अरी अटपटी बानि।।

उनकी स्थिति यह है कि परस्पर छाती से छाती मिली है किन्तु फिर भी वे एक दूसरे में समा जाने के लिए व्याकुल हैं। पर राधा- कृष्ण का यह प्रेम सर्वथा विकार-शून्य है। इसी कारण वह मंगलकारी ,आनन्द प्रदान करने वाला और सुधा की वर्षा करने वाला है।

सदा यह राज करो बलि जाऊँ दंपति को सुख सहज सनेह।
सुमंगलदा मनमोदप्रदा रसदायक लायक सुधा को सो मेह।।

दोनों के इस प्रेम की चरम अभिव्यक्ति सूरत में होती है। इसीलिये महावाणी में में विहार-लीन नवल-किशोर के ध्यान का निर्देश किया गया है ~

सब निशि बीती खेल में तउ उर अधिक उमंग।

ऐसे नवलकिशोरवर हियरे बसौ अभंग।। युगलकिशोर की सभी लीलाएँ ~ विहार ,झूलन,मान,रास आदि भक्त का मंगल करने वाली हैं। अतः इस सलोनी जोड़ी के प्रेम रस में अपने को रमा देना ही रसिक भक्तों की मात्र कामना है अर्थात वः चाहता है कि वह सदा उपास्य-युगल की मधुर- लीलाओं का दर्शन करता रहे।

अरी मेरे नैननि को आहार।
कल न परे पल एक बिना मोहिं अवलोके सुखसार।।
सकल मनोरथ सफल होत तब करत हिये संचार।
श्रीहरिप्रिया प्रान-जीवन-धन को यह सूरत विहार।।