कौन लिखेगा पुरखों पर कहानियां
कौन लिखेगा पुरखों पर कहानियां
रामनाथ शिवेंद्र

आज के जटिल समय में पुरखों को कहानियों में जगह नहीं मिल रही, मिलनी चाहिए कि नही विमर्श का विषय है। पुरखे यानि वरिष्ठ नागरिक ये न केवल अपने बनाये घर, मकान से बेदखल किये जा रहे हैं वरन् कहानियों, लेखों, संस्मरणों आदि से भी बेदखल किये जा रहे हैं। पुरखों पर कहानियॉ लिखने का प्रचलन नहीं के बराबर है। जबकि पुरखों के मुद्दे पर चर्चा करना, उन्हें कथाओं में लाना, एक तरह से मानव सभ्यताओं द्वारा अपनाये गये सŸाा कौतुकों के विमर्श का ही मामला है। पुरखे किसी टापू से प्रकट हुए अनजाने व्यक्ति नहीं हैं, किसी दूसरी सभ्यता का यात्री नहीं, बल्कि हमारे अपने पारिवार के मुखिया ही हैं। ये वही व्यक्ति हैं जिनकी गोदी में खेलते कूदते, चूमते, चाटते हम समझदार हुए हैं। ये वही मुखिया हैं जिनका बहुत ही कूट चालाकी से वरिष्ठ नागरिक में रूपांतरण किया जा चुका है या किया जा रहा है। हमें बहुत ही गंभीरता से परिवार के मुखिया यानि हमारे पुरखों का यह जो वरिष्ठ नागरिक के रूप में रूपांतरण है उसे समझना, व बूझना होगा। ऐसा अचानक नहीं हुआ है, इस रूपांतरण का सिलसिला बहुत पहले से ही आदिवासी से वनवासी, दलितों से अनुसूचित जाति आदि से प्रारंभ हो चुका है जिसके अपने विशेष अर्थ हैं। शब्दों के रूपांतरण पर बात करें तो साफ पता चलता है कि मामला हत्या का वध में रूपांतरण जैसा है। हत्या एक अपराध है जो सही तथा मान्य है पर वध को राजनीतिक जरूरत बताया जा रहा है जबकि हत्या और वध दोनों में ताकत से जीवन छीन लेने का ही काम किया जाता है। रावण का वध होता है, हत्या नहीं, कंश का वध होता है हत्या नहीं, यानि कि एक ऐसी हत्या जो समय (राजनीति) की जरूरत है वध है, वह हत्या नहीं है। तो यह जो परिवार के मुखिया का मामला है जिसे वरिष्ठ नागरिक में रूपांतरित किया जा रहा है उसे समझने के लिए हमें मानव सभ्यता के द्वारा स्थापित कराये गये परिवार की अवधारणाओं को समझना होगा। इसे समझने के लिए मुखिया से वरिष्ठ नागरिक के रूपांतरण की यात्रा पर निकल कर हमें देखना होगा कि यह जो वरिष्ठ नागरिक है, सभ्यता के किस पायदान पर है। मुखिया से वरिष्ठ नागरिक के पदस्थापन में उसे क्या, क्या हासिल होने वाला है तथा उससे क्या, क्या छिन जाने वाला है? साथ ही साथ यह भी समझना होगा कि क्या उसे कहानियों में वर्णित क्यों नहीं किया जा रहा? मानव सभ्यता लगातार कुदरतीतौर पर समय के साथ संघर्ष करती व उसे छलांगते हुए नये नये किस्म की अवधारणाओं व विचारों को सृजित करती रही है। अधुनातन बनने के क्रम में उसे अक्सर प्रचलित मान्यताओं, परंपराओं व रीति, रिवाजों से दो चार होने के लिए विवश होना पड़ा है। मानव सभ्यता जड़ परंपराओं के पोषण के बजाय संस्कृति के विभिन्न आयामों को अपनाते व तोड़ते हुए सामाजिक रिश्तों के गठन का कार्यभार संभालती रही है। अगर हम बीते समय के अनुमानों ( जिस पर ऐतिहासिकता का लेप चढ़ाया जा चुका है) को विश्लेषित करना चाहें तो साफ, साफ दिखेगा कि गुफा व जंगलों के बसावों वाला आदमी आज कहीं नहीं दिख रहा है, न उसकी संस्कृति दिख रही है और न ही उसका आचरण दिख रहा है। मानव तो तब भी मानव था, उसकी जरूरतें थीं, उसका अपना समाज था। जरूरतों को पूरित करने के लिए हमारे पुरखों ने तत्कालीन समय से मुठभेड़ करते हुए जिन जिन प्रारंभिक खोजों, आग, जल, कुदाल, गुफा, खाद्यान्न आदि को खोजा था वे आज भी उदाहरण हैं। आज हमारे पास अपने पुरखों के समय के साथ लगातार कठिन मुठभेड़ों तथा टकराहटों की क्षमताओं को देख व जान सकने के लिए न कोई साधन हैं और नही औजार हैं, हां आधे अधूरे अनुमान हैं जिसके आधार पर हम यह जान सकते हैं कि हमारे पुरखों ने कैसे आग, व खाद्यान्न आदि को खोजा होगा। अगर हम उस समय में उतरना चाहें तो कई तरह के सवाल खुद खड़े हो जाते हैं जैसे यही कि क्या आज जो मानव संबधों में रिश्तों की सबल बुुनावट है वह उस समय भी थी या वह दुनिया पशुवत रिश्तों की तरह थी पूरी तरह से उन्मुक्त, वर्जनाओं से परे। हमें पुराने समय में उतरने के पहले यह जान लेना आवश्यक होगा कि हम जो आज मानव संबधों के पतन के बारे में चिन्तित हैं, हमें कहीं न कहीं लगता है कि हम लगातार पतित होते जा रहे हैं। हमारे समाज के पवित्र और शुचितापूर्ण रिश्तों में गिरावट आती जा रही है। हम अब मानव समीपता से कोशों दूर हो चुके हैं। हमारे लिए सहभागिता और सहकार बेमतलब के शब्द हैं। रिश्तों के बनावट की बात करें तो हमारे समाज में उसकी शुरुआत परिवार से शुरू होती है। ज्योंही हम परिवार की अवधारणाओं पर मंथन करते हैं त्योंही हमारा मन रिश्तों की शुचिता से पवित्र हो जाता है। मॉ दिखने लगती है, पिता दिखने लगते हैं, भाई दिखने लगते हैं, बहन राखी बांधने लगती है और सामने पत्नी का किकुड़िया चेहरा प्रकट हो जाता है, बच्चे किलकारियां भरने लगते हैं। उस समय दृश्य की अद्भुत दुनिया में हमें चले जाना होता है और ऐसा अचानक या आकस्मिक नहीं होता है। इसके लिए निश्चितरूप से हमारे पुरखों ने जी जान लगा दिया होगा फिर रिश्तों की पवित्रताओं को कायम करा सके होंगे। कुदरती तौर पर देखा जाये तो पशु और मानव में कई तरह के फर्क होते हुए भी कुछ मामलों में फर्क नहीं दिखता, खासतौर से नर और मादा वाले संबधों में। मानव सभ्यता के विकास क्रम में संभव है मानव, पशुओं की तरह ही रहा हो, उनमें रिश्तों की वर्जनांए न रही हों क्योंकि कुदरत तो केवल नर और मादा को ही सिरजती है, तो बहुत हद तक संभव है कि मानव भी सेक्स संबधों के मामलों में केवल नर और मादा ही रहा हो। नर और मादा वाले अव्यवस्थित कुदरती संबधों को व्यवस्थित करने के क्रम में हमारे पुरखे काफी जद्दो जेहद करते हुए परिवार और कबीले की अवधारणा तक पहुंचे होंगे फिर परिवार अस्तित्व में आये होंगे। फिर नर और मादा के रहने के तौर तरीकों में वर्जनायें आई होंगी, निषेध आये होंगे, यह सोचना कि परिवर तो यूं ही हमारे जीवन में रच, बस गये होंगे गलत है। आज हम जिस खुलेपन की बातें कर रहे है उसमें कहीं न कहीं परिवार के अस्तित्व का इनकार भी है, संबधों में चल रहे वर्जनाओं का इनकार है। आज की सभ्यता अपनी तरह से स्वीकार और अस्वीकार को सिरज रही है, रिश्तों की वर्जनाओं को नकार रही है। हम जानते व मानते हैं कि परिवार की अवधारणा में रिश्तों की वर्जनाओं का पवित्र गुंथन होता है, वर्जनायें टूटी नहीं कि परिवार की पवित्रता खतम। मानव सभ्यता अपने अस्तित्व काल से ही कहीं न कहीं लिंगभेद का शिकार रही है। यह जो लिंगभेद वाला मामला है, बहुत ही गंभीर मामला है जो सीधे , सत्ता व ताकत से जुड़ा होता है जिसके कारण अलग तरह की हमारी सामाजिक तस्वीर बनती है हालांकि कोशिशें लगातार की जा रही हैं कि मानव सभ्यता की तस्वीर कुरूप न होने पाये पर वास्तव में है कुरूप ही। मानव संबधों में रिश्तों का आधार परिवार है, जिसे हम आज टूटता और खंडित होता देख रहे हैं। हमारी सभ्यता ने जिस संयुक्त परिवार को सामाजिक संबधों का आधार बनाया था, वह आज के समय में बुरी तरह टूट रहा है, हम लगातार संयुक्त परिवार से एकल परिवार की संरचना को अपनाने लगे हैं जिसका मतलब होता है पति पत्नी और बेटे वाला परिवार, ऐसे परिवार में चाचा, चाची, भाई भाभी, मॉ, बाप आदि को शामिल नहीं किया जाता, उन्हें परिवार के एक अलग और विभत्स खाने में छोड़ दिया जाता है। यहीं से आरंभ होता है, एक नये किस्म का संकट, इस संकट के सबसे अधिक प्रताड़ित मॉ, बाप आदि होते हैं, जिन्हें परिवार का मुखिया कहा जाता था। ऐसा तब होता है जब वे उमर के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके होते हैं। निरीह और असहाय हो चुके रहते हैं। संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक की यात्रा अचानक नहीं है इसे पूंजीमूल्यवोधों ने रचा है जो निजता को बढ़ावा देती है सामाजिकता को नहीं। हमारी विधिक सभ्यता ने कानूनी रूप से ऐसे जनों के लिए एक शब्द उपहारित किया हुआ है जिसे ‘वरिष्ठ नागरिक’ कहा जाता है। दर असल समझना यह है कि यह जो वरिष्ठ नागरिक है जिसे काननू का भी समर्थन मिला हुआ है, वह आज के समय में क्या चीज है? वरिष्ठ नागरिक की बात करें तो यह जो शब्द ‘वरिष्ठ’ है बहुत ही चित्ताकर्षक है, मन को छूने वाला, सम्मान का प्रतीक पर क्या ऐसा है? कत्तई नहीं। पहले के समय में यही वरिष्ठ परिवार का मुखिया हुआ करता था, मुखिया यानि ‘मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक’ वाला, मुखिया माने परिवार का सत्ता प्रमुख। पर समय के साथ मुखिया तथा परिवार दोनों की अवधारणायें विखंडित हुई जिन्हें विखंडित होना ही था। आज का हमारा समय वैसे भी सत्ता तथा सत्ताओं के विखंडन वाला है। समाज हो, देश हो, चाहे किसी भी तरह की सामाजिक संरचना हो हर जगह सत्ता के अलग अलग केन्द्र उत्पादित होते जा रहे हैं, कुल मिला कर सत्ता की केन्द्रीयता आज संकट की स्थिति में है। इस संकट की प्रारंभिक पाठशाला हमारी पारिवारिक संरचना है जाहिर है इसे देश स्तर तक भी जाना है। सत्ता की केन्द्रीयता का विघटन आज के समय के लिए एक तरह से जरूरी होता जा रहा है। केन्द्रीय सत्ता के विघटन को हम अपने देश की राजनीतिक सत्ता प्रबधन में देख सकते हैं। ऐसा होना अनायास नहीं है। यह जो संयुक्त परिवार से एकल परिवार की यात्रा है, इसी में छिपे हुए हैं सत्ता के विघटन के कीटाड़ु जिसे आज के समय का वायरस कहा जाना चाहिए। यहां यह बहस बेमानी है कि क्या सत्ता केन्द्रों के विघटन का मामला जनहित के विपरीत है? समाज के विपरीत है? सवाल जनहित तथा समाजहित का नहीं है, सवाल है महिमामंडित किए जाने वाले वरिष्ठ नागरिक का, इस वरिष्ठ नागरिक का क्या होने वाला है? पारिवारिक स्तर पर, समाज के स्तर पर, देश के स्तर पर। मेरा मानना है कि यह जो आज के समय का वरिष्ठ नागरिक है, उसे एक ऐसा निरीह व्यक्ति बना दिया जा रहा है जिससे कत्तई प्रमाणित नहीं होता कि उसका भी अपना कोई परिवार है या था। नागरिकता वैसे भी पारिवारिकता के विपरीत होती है, उसमें वह सुगंध नहीं जो भाई, गोती में होती है। आज की दुनिया भाई, गोती से बाहर निकल चुकी है, वह पार्टनर व मेम्बर तक जा पहुंची है, थोड़ा आगे बढ़ कर नागरिकता तक। नागरिकता से पारिवारिकता का लगाव या स्नेह का दूर दूर तक कोई नाता नहीं। यह तो महज एक विधिक प्रपंच है। इससे परिवार को वोध नहीं होता, नागरिक तो महज नागरिक होता है, मत देने वाला एक व्यक्ति, कानूनों को अपनी पीठ पर चिपका कर चलने वाला एक निरीह और शारीरिक रूप से कमजोर। परिवार के मुखिया का वरिष्ठ नागरिक में रूपांतरण उसकी पारिवारिकता छीन कर उसकी पूरी मर्यादा को लील लेता है। अब तो राजनीतिक खेलों की माहिर कुछ आत्ममुग्ध सरकारें साफ साफ बोल रही हैं कि जो साठ के पार हैं, वे बेकार हैं। साठ साल के बाद रिटायर होने वाले राज्य कर्मचारियों की तरह। गोया यह जो साठ साल वाला मामला है, व्यक्ति की उपयोगिता के समापन की खुले आम विधिक घोषणा है। एक आदमी की उपयोगिता को साठ साल की उमर के आधार पर तोलने वाला समाज आखिर यह जो वरिष्ठ नागरिक है उसे क्यों और किस लिए सम्मान देगा? उसका सम्मान तो उसके साठ साल समाप्त होने के साथ चला गया। वह तो साठ साल के बाद विलुप्त हुआ एक आदमी भर है, जो जीवित है। उसका जीवित रहना और जीते रहना एक विडंबना है। वरिष्ठता एक प्रकार से सत्ता से वनवास का भी मामला है, वनवास कम से कम हम भारतीयों को तो भली भांति पता है, यह जो वनगमन का संदर्भ है वह हमें अरण्यक सभ्यता तक ले जाता है जो पूरी तरह से नागर सभ्यता से अलग तरह का संदर्भ देता है। आज तो पता ही नहीं चल रहा है यह जो वरिष्ठ नागरिक है वह किस सभ्यता का सदस्य है, अरण्यक या नागर। इन दोनों सभ्यताओं में वरिष्ठ नागरिक सत्ता व आकांक्षा विहीन महज एक व्यक्ति होता है, चाहे तो जिए या मर जाये। वैसे भी वरिष्ठ नागरिक बढ़ती उम्र के अन्तर्विरोधों व विसंगतियों के कारण पारिवारिक सत्ता प्रबंधन को संभाल सकने में उतना समर्थ नहीं हो सकता जितना कि परिवार के दूसरे अल्पायु वाले होते हैं। यहां मामला राम की खड़ाऊ वाला नहीं है। वह त्रेता का काल था राम की खड़ाऊं को सिहासन पर सुशोभित करा दिया गया था मान कर कि राम नहीं हैं तो क्या हुआ उनका खड़ाऊं तो है ही। आज तो सभी को सत्ता चाहिए, प्रदेश देश की नहीं तो कम से कम परिवार व गांव की तो मिले। हमें पता है कि परिवार भी सŸाा का केन्द्र ही होता है, कुछ अपवादों को छोड़ कर इस परिवार सत्ता पर नर ही काबिज हैं। यहां खुले आम लिंगभेद के कारकों को देखा जा सकता है। भारतीय समाज में वरिष्ठ नागरिकों के प्रति छीजते जा रहे शुचिता पूर्ण रिश्तों के लिए सत्ता विघटन एक महत्व पूर्ण कारक है क्योंकि सत्ता अधिग्रहण में रिश्ते नहीं चला करते, सत्ता महज सत्ता होती है, वह मॉ बाप, भाई बहन आदि नहीं देखा करती, सत्ता के लिए तो हर व्यक्ति (नागरिक) महज एक शासित होता है चाहे वह बाप हो मॉ हो या कोई भी। सत्ता पर बैठा आदमी शासक में तब्दील हो कर हुकूमत के दांव पेंचों को खेलने लगता है। वरिष्ठ व्यक्ति अपने घर में ही, जिसने उसे खुद बनाया और गढ़ा होता है अनजाना हो जाता है, वह अपने ही लोगों के बीच जिनसे उसका रक्तसंबध होता है सत्ता का प्रतिपक्ष बन जाता है, उससे आर्थिक ही नहीं सामाजिकप्रबंधन के सारे अधिकार बिना देर किए छीन लिए जाते हैं फिर तो उसका अपना घर भी अपना नहीं रह जाता, उसका अपना बेटा, बेटा नहीं रह जाता, वे सारे के सारे सत्ता के नियामक बन जाते हैं, उनके बनाए कानून घर में लागू किए जाने लगते हैं और वरिष्ठ नागरिक किसी आराध्य की प्रार्थना में खुद को डुबो लेने के लिए विवश हो जाता है। तो यह है वरिष्ठ नागरिक निरीहता की पीठ पर सवार, सत्ता का विकलांग जो अपने द्वारा सृजित परिवार को केवल देख व सुन सकता है, पर कुछ बोल नहीं सकता। इतना ही नहीं वह अपने उत्तराधिकारियों के सत्ता कौतुकों पर न रो सकता है और नही गुनगुना सकता है। जीवन के आखिरी पड़ाव पर जब सारा कुछ उससे छीना जा चुका होता है उसे समझ में आने लगता है कि ‘सब धन धूरि समान’ गलत नहीं कहा गया है जिसे एकत्र करने के लिए उसने क्या क्या नहीं किया। ऐसा उसके साथ क्यों किया जा रहा है, इसका उत्तर वह खुद से भी नहीं पूछ सकता, इसका उत्तर तो उसके उत्तराधिकारियों के पास है, भला उत्तराधिकारी इसका उत्तर क्यों देंगे। ऐसे पुरखों की वेदनाओं, विडंबनाओं को कहानियों में ढालना कथाकारों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं। हमें आशा करनी चाहिए कि कथाकार पुरखों के बारे में गुनेंगे।