क्लस्टर विकास – सूक्ष्म और लघु उद्यमों की सतत वृद्धि का उपकरण

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लेखक - संजीव चावला

व्यापार गतिविधियों के किसी एक विशेष क्षेत्र में समान चुनौतियों, समान मार्गावरोधों, समान अवसरों और समान विकासात्मक एजेंडों के साथ ज्ञान और अन्य आर्थिक कड़ियों के ज़रिए अन्य हितधारकों समेत, एक दूसरे से संबद्ध सूक्ष्म और लघु उद्यमों का संकुलन क्लस्टर है। देश में सूक्ष्म और लघु उद्यमों की उत्पादकता, प्रतिस्पर्धा तथा साथ ही क्षमता निर्माण और सामूहिक संगठन को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख रणनीति के तौर पर सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के मंत्रालय ने क्लस्टर विकास योजना को अपनाया है। समय के साथ-साथ क्लस्टर विकास पहल का विकास हुआ है और अब ‘‘सूक्ष्म और लघु उद्यम- क्लस्टर विकास कार्यक्रम’’ (एमएसई-सीडीपी) योजना के तहत इसे लागू किया जा रहा है।

एमएसई क्षेत्र को भारत में विकास के साधन के रूप में स्वीकार किया गया है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार 2010 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद [क्रय शक्ति समता (पीपीपी) के आधार पर] 3,862.009 बिलियन ( वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय) डॉलर है। भारतीय एमएसई क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद में आठ प्रतिशत, विनिर्मित उत्पादों में 85 प्रतिशत और निर्यात में 40 प्रतिशत का योगदान देता है। अपने 26 मिलियन उद्यमों के ज़रिए एमएसई लगभग 60 मिलियन लोगों को रोज़गार मुहैया कराता है इसलिए सकल घरेलू उत्पाद के आठ प्रतिशत योगदान के ज़रिए एमएसई क्षेत्र का योगदान 308.96 बिलियन डॉलर है। इस क्षेत्र के व्यापक योगदान और समस्त औद्योगिक विकास दर के मुकाबले इसकी उच्च वृद्धि दर को देखते हुए निजी क्षेत्रों के साथ गठजोड़ कर विशेषीकृत ज्ञान और नवीनता आधारित संस्थानों की स्थापना समेत नीति निर्माण, परामर्श और सेवा विस्तार के ज़रिए इस क्षेत्र के प्रयासों को बढ़ावा देना चाहिए।

क्लस्टर विकास कार्यक्रम का उद्देश्य क्लस्टर कहे जाने वाली औपचारिक संस्था के तले लाभार्थियों के समूह के नेतृत्व में सूक्ष्म और लघु उद्यमों को एकजुट करना और क्लस्टर की सभी इकाइयों के लाभ के लिए प्रशिक्षण, दिशा-निर्देश, व्यापार विकास, सलाह, हिमायत, समान सुविधा केन्द्र (समान प्रारूप केन्द्र, प्रयोग सुविधांए, प्रशिक्षण केन्द्र, महत्वपूर्ण ऑपरेशनों के लिए प्रसंस्करण केन्द्र, आर एंड डी केन्द्र, कच्चे माल के समान बैंक, अपगामी उपचार संयंत्र, वगैरह) के विभिन्न कार्यक्रमों को शुरु करना है। स्थानीय औद्योगिक परिवेश और वृहत स्तर के काम के तरीकों पर क्लस्टर से संबंधित नीति, समर्थन और विकासात्मक गतिविधियों का काफी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है।

सूक्ष्म और लघु उद्यम अकसर इस स्थिति में नहीं होते कि अपनी गतिविधियों के लिए मंहगे उपकरणों को स्थापित कर सकें, बड़े ऑर्डर ले सके और अपने सीमित पूंजी आधार और सीमित कार्यक्षेत्र अनुभव के कारण अधिक पूंजी का निवेश भी नहीं कर सकते। हालांकि, वर्तमान भौगोलिक परिवेश में क्लस्टर विकास कार्यक्रम के जरिए सूक्ष्म और लघु उद्यम प्रतिस्पर्धा के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। भारत में एमएसई क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में क्लस्टर विकास के दृष्टिकोण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और यह एक सफल उपकरण साबित हुआ है। संसाधनों और आर्थिक मापकों की तैनाती के अतिरिक्त क्लस्टर विकास का दृष्टिकोण उद्योग में नेटवर्किंग, सहयोग और एकजुटता को बढ़ाता है, जिससे उद्यम लंबी दौड़ में प्रतिस्पर्धा हासिल कर सकें। देश और विश्व के बड़े पैमाने के क्षेत्रों के लिए क्लस्टर विकास दृष्टिकोण सूक्ष्म और लघु उद्यमों का प्रत्युत्तर है।

क्लस्टर विकास दृष्टिकोण को व्यापार रणनीति का हिस्सा होना चाहिए। यह समय की मांग है और सूक्ष्म और लघु उद्यमों की ज़रुरतों के हिसाब से प्रासंगिक है। बड़ी इकाइयों को प्रतिस्पर्धात्मक दरों पर उच्च गुणवत्ता के उत्पाद मुहैया कराने के जरिए एमएसई क्षेत्र का उन्नयन बड़े पैमानों के क्षेत्रों को भी लाभ पहुंचाता है। क्लस्टर विकास दृष्टिकोण एमएसई मंत्रालय के द्वारा राष्ट्रीय विनिर्माण प्रतियोगात्मक कार्यक्रम (एनएमसीपी) के तहत हाल में शुरु की गई अधिकांश योजनाओं जैसे प्रारूप क्लिनिक योजना, विनिर्माण योजना, बौद्धिक संपत्ति अधिकार योजना का अभिन्न अंग है। इन योजनाओं ने क्लस्टर विकास दृष्टिकोण के लाभ को उनके प्रारूप से लेकर उनके लागू होने तक अपनाया है। क्लस्टर विकास दृष्टिकोण ने नीति निर्माताओं, सुविधादायकों, प्रदाताओं और व्यापार विकास सेवा प्रदाताओं को उद्योगों के साथ बातचीत करने और लागत प्रभावी तथा प्रभावदायक रुप में उत्पाद संप्रेषित करने का एक बेहतरीन मंच प्रदान किया है।

एमएसई-सीडीपी के तहत निदान अध्ययन रिपोर्ट के लिए अधिकतम 2.50 लाख रूपए की अनुदान राशि की सहायता प्रदान की जाती है, प्रशिक्षण, प्रदर्शन, तकनीकी उन्नयन, ब्रांड की हिस्सेदारी, व्यापार विकास वगैरह के लिए प्रति क्लस्टर अधिकतम 25 लाख रूपए की परियोजना लागत का 75 प्रतिशत [पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों के लिए 90 प्रतिशत, 50 प्रतिशत से अधिक क्लस्टर (अ) सूक्ष्म/ग्राम (ब) महिलाओं के स्वामित्व वाले (स) अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति इकाइयां], विस्तृत परियोजना रिपोर्ट के लिए पांच लाख रूपए तक, समान सुविधा केन्द्र के लिए अधिकतम 15 करोड़ रुपए की परियोजना लागत का 70 प्रतिशत [पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों के लिए 90 प्रतिशत, 50 प्रतिशत से अधिक क्लस्टर (अ) सूक्ष्म/ग्राम (ब) महिलाओं के स्वामित्व वाले (स) अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति इकाइयां], बुनियादी विकास के लिए ज़मीन की लागत के अतिरिक्त दस करोड़ रुपए की परियोजना लागत का 60 प्रतिशत [पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों के लिए 80 प्रतिशत, 50 प्रतिशत से अधिक क्लस्टर (अ) सूक्ष्म/ग्राम (ब) महिलाओं के स्वामित्व वाले (स) अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति इकाइयां]

क्लस्टर विकास पहल के दो प्रमुख स्तंभ विश्वास और भरोसे का निर्माण है। शुरू में क्लस्टर विकास कर्ताओं द्वारा विचारों और व्यापार के अवसरों को दूसरों के द्वारा हड़प लिए जाने की शंकाओं का निवारण, विश्वास और भरोसे के निर्माण जैसे कदमों से हुआ जो कि क्लस्टर विकास का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। औद्योगिक क्लस्टरों में ज्ञान आधारित आर्थिक व्यवस्था के वर्तमान परिवेश में संघों के निर्माण, स्वयं सहायता समूह और सक्रिय जुड़ाव से मुद्दे पर आधारित रणनीतिक कदम लाभ दिलाने में मददगार हो सकता है।

क्लस्टर विकास का नजरिया और दर्शन उद्योग को प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में पहुंचा सकता है। बड़े पैमाने के उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक व्यापारिक रणनीति से निपटने के लिए सूक्ष्म और लघु उद्यमों के पास यह एकमात्र हथियार है। क्लस्टर विकास के तरीके के महत्व और प्रासंगिकता को देखते हुए बहुत से विभागों और मंत्रालयों ने क्लस्टर विकास कार्यक्रम के विविध प्रारुपों की शुरुआत की है। हालांकि अधिकतर कार्यक्रम किसी निश्चित क्षेत्र पर आधारित हैं, एमएसई-सीडीपी योजना देशभर के सभी एमएसई क्षेत्र को संबोधित करती है। फिर भी प्रयासों की सहक्रियता और स्पष्ट प्रभाव प्राप्त करने के लिए विविध मंत्रालयों/विभागों, निजी क्षेत्र की एजेंसियों, अंतर्राष्ट्रीय/बहुपक्षीय एजेंसियों की विविध पहलों/योजनाओं को समकालिक/परस्परानुबंधित करने की ज़रुरत है। प्रयासों को समर्थित करने और इससे गुणात्मक मूर्त परिणाम प्राप्त करने के लिए विविध योजनाओं को सराहा जा सकता है।

यह बेहद जरुरी है कि सूक्ष्म और लघु उद्यम तथा उनसे जुड़े संगठन एकजुटता के दर्शन को समझें और क्लस्टर विकास के दृष्टिकोण के ज़रिए प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए अपनी शंकाओं का निवारण करें। संगठनात्मक नज़रिए की बदौलत ही छोटे पैमाने की इकाइयों के लिए कच्चे माल की बड़ी खरीद, विशाल ऑर्डर को स्वीकार करने, अधिशेष सेवाओं को साझा करने और समान सुविधा केन्द्र में हिस्सा लेने में, सौदा करने की शक्ति संभव है।

क्लस्टरिंग प्रयासों में सफलता बढ़ाने के लिए राज्य सरकारों और इनसे जुड़ी समितियों की अग्रसक्रिय भागीदारी की काफी ज़रुरत है। प्रदर्शन केन्द्रों/समान सुविधा केन्द्रों को स्थापित करने के लिए ज़मीन का प्रबंध एक प्रमुख मुद्दा है जिसे राज्य सरकार के द्वारा सुलझाने की ज़रुरत है। इस प्रकार की साझेदारियां क्लस्टर विकास नज़रिए की विजेता होनी चाहिए और क्लस्टर दृष्टिकोण के परीक्षित लाभों को प्राप्त करने में सूक्ष्म और लघु उद्यमों को सुविधा दिलाने वाली। उद्यम विकास और निरन्तरता की क्षेत्रीय/स्थानीय गत्यात्मकता के अनुसार नवीनता आधारित ज्ञान में हस्तक्षेप करने के कई अवसर और मौके हैं।

क्लस्टर विकास प्रणाली को शुरु करने के बाद से, सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों के मंत्रालय ने एमएसई-सी़डीपी योजना के तहत देश के 28 राज्यों और एक संघ शासित प्रदेश (दिल्ली) में, 470 से भी अधिक क्लस्टरों में क्लस्टर विकास पहल (निदान अध्य्यनों, नर्म हस्तक्षेपों, और समान सुविधा केन्द्रों) का बीड़ा उठाया है। विभिन्न औद्योगिक भूसंपत्तियों/ औद्योगिक क्षेत्रों में बुनियादी विकास के लिए 124 (मौजूदा औद्योगिक भूसंपत्तियों में उन्नयन के लिए शामिल 29 सहित) प्रस्तावों को लिया गया है। इन परियोजनाओं में लघु और अति लघु इकाइयों को 10972 प्लॉटों का आवंटन किया गया है। 37555 रोज़़गार उत्पति को प्राप्त कर लिया गया है। सुनिश्चित उदाहरणों के द्वारा क्लस्टर विकास की उपलब्धियों को समझाया जा सकता है। तमिलनाडु में पिछले वर्ष एमएसई-सीडीपी के तहत छह (विरुद्धुनगर, सत्तूर, कोविलपट्टी, कलुगुमलाई, श्रीविल्लीपुट्टुर, गुडिअत्थम) हस्तनिर्मित माचिस की तीलियों के क्लस्टर। दो हज़ार से भी अधिक हस्तनिर्मित माचिस की विनिर्माण इकाईयों में प्रत्येक विकसित केन्द्र में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरीकों से लगभग 2.5 लाख लोगों के रोज़गार के साथ यह कारीगरी की तरह के क्लस्टर हैं। कारीगरी वाले यह क्लस्टर मशीनीकृत खिलाड़ियों से प्राप्त होने वाली प्रतिस्पर्धा को नहीं झेल पा रहे थे। तमिलनाडु सरकार के सक्रिय सहयोग और योगदान से एक तरह के सोच वाले उद्यमों के समूह द्वारा छह संघों का गठन हुआ, जिसमें प्रत्येक समूह में 25 से 30 सदस्य थे।

सामुदायिक आंदोलन के तहत उनके कार्यकलापों को मापने के लिए माचिस के क्लस्टर ने एक सहक्रियात्मकता की स्थापना की है। माचिस के क्लस्टर के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं- आंतरिक इलाकों में रोज़गार अवसरों के निर्माण की शुरुआत, युनाइटेड मैच के नाम से छह संघों नें समान ब्रांड का निर्माण किया, समान वेबसाइट की शुरुआत, 25 प्रतिशत के लागत लाभ के साथ तमिलनाडु सरकार के सहयोग से कच्चे माल के समान बैंक का निर्माण, पिछडों का एकीकरण, सल्फर मुक्त माचिस, प्रसंस्करण के समान तरीके और एकरुप गुणवत्ता के विनिर्माण के लिए आर एंड डी। पीतल और जर्मन सिल्वर के बर्तनों के एक अन्य क्लस्टर विकास की पहल में परेब, पटना में छोटे-मोटे परिवर्तन और समान सुविधा केन्द्र की स्थापना से विलक्षण परिणाम सामने आए हैं। 2004-05 में 23.50 करोड़ रुपए से 2008-09 में 69 करोड़ रुपए तक क्लस्टर के कारोबार में लगभग तीन गुणा वृद्धि हुई है। रद्दी टुकड़ों को गलाने के लिए ऊर्जा की लागत में भी कमी आई है। फेरबदल के बाद क्लस्टर में रोज़गार में 4000 से 5000 की वृद्धि हुई है।

एमएसई-सीडीपी के दिशानिर्देशों को फरवरी 2010 में धन मुहैया कराने में वृद्धि और प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिहाज से संशोधित किया गया था। राज्य सरकार सहित विभिन्न हितधारकों के बीच बढ़ती जागरुकता की वजह से निकट भविष्य में यह योजना एक बड़ी छलांग लगाने को तैयार है। अगले वित्त वर्ष में निदान के अध्य्यन सहित मामूली फेरबदल के लिए 60 क्लस्टरों का उत्तरदायित्व उठाया जाएगा। जारी परियोजनाओं को निरंतर सहयोग देने के अतिरिक्त बुनियादी विकास की 12 नवीन और समान सुविधा केन्द्र की 8 नवीन परियोजनाओं को भी शामिल किया जाएगा।