चिकित्सा विज्ञान में हिंदी की पढ़ाई कराने का प्रयास

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चिकित्सा विज्ञान में हिन्दी की पढ़ाई कराने का प्रयास
प्रो.मोहनलाल छीपा
नवम्बर्, २०१५

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार 1989.2000 के बीच एम्स से स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण किये चिकित्सकों में से 54 प्रतिशत भारत से बाहर है तथा जिनमें 85 प्रतिशत अमेरिका में बताये जाते हैं। अन्य चिकित्सा विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों से भी काफी संख्या में चिकित्सक भारत से शिक्षा ग्रहण कर अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, आस्टेंलिया, न्यूजीलैंड जा रहे हैं तथा भारत की ग्रामीण जनता उनकी सेवाओं से उपेक्षित हैं।

भाषा केवल संवाद की ही नहीं अपितु संस्कृति एवं संस्कारों की भी संवाहिका है। भारत एक बहुभाषी देश हैं। सभी भारतीय भाषाएं समान रूप से हमारी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता की अभिव्यक्ति करती है। यद्यपि बहुभाषी होना एक गुण है किन्तु मातृभाषा में शिक्षण वैज्ञानिक दृष्टि से व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है। मातृभाषा में शिक्षित विद्यार्थी दूसरी भाषाओं को भी सहज रूप से गहण कर सकता है। किसी देश में शिक्षण किसी विदेशी भाषा में करने पर जहाँ व्यक्ति अपने परिवेश, परम्परा, संस्कृति व भारतीय जीवन मूल्यों से कटता है, वहीं पूर्वजों से प्राप्त होने वाले ज्ञान, शास्त्र, साहित्य आदि से अनभिज्ञ रहकर अपनी पहचान खो देता है।

महामना मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, श्री माँ, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे मूर्धन्य चिंतकों से लेकर चंद्रशेखर वेंकट रमन, प्रफुल्लचंद्र राय, जगदीशचंद्र बसु जैसे वैज्ञानिकों, कई प्रमुख शिक्षाविदों तथा मनोवैज्ञानिकों ने मातृभाषा में शिक्षण को ही नैसर्गिक एवं वैज्ञानिक बताया है। समय-समय पर गठित शिक्षा आयोगों यथा राधाकृष्णन आयोग, कोठारी आयोग आदि ने भी मातृभाषा में ही शिक्षा देने की अनुशंसा की है। मातृभाषा के महत्व को समझते हुए संयुक्त राष्टं संघ ने भी समस्त विश्व में 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया है।

[ इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय ने अब तक 225 के लगभग पाठ्यक्रमों का हिन्दी में निर्माण कर लिया है। विज्ञान, कला, समाज विज्ञान, वाणिज्य, प्रबंधन, एवं विधि में प्रशिक्षण, पत्रोपाधि, स्नातक प्रतिष्ठा, स्नातकोत्तर, विद्यानिधि एवं विद्यावारिधि की पढ़ाई हिन्दी माध्यम से प्रारंभ हो चुकी है। 2012.13 में 60 विद्यार्थियों से प्रारंभ हुए इस विश्वविद्यालय में 800 के लगभग विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। परन्तु देश में आमधारणा यह है कि जब तक चिकित्सा और अभियांत्रिकी के क्षेत्र में अध्ययन, अध्यापन और शोध हिन्दी माध्यम से प्रारंभ नहीं हो जाता तब तक हिन्दी विश्वविद्यालय का कोई विशेष योगदान नहीं माना जायेगा।]

परन्तु स्वतंत्रता के 68 वर्षो के बाद और संविधान में हिन्दी राजभाषा घोषित होने के बावजूद भी हम चिकित्सा विषयों की शिक्षा हिन्दी में प्रारंभ नहीं कर सके। भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद-एम.सी.आई. ( 1934 ), भारतीय उपचर्या परिषद-आई. एन.सी. ( 1947 ) तथा भारतीय भेषज परिषद-पी.सी.आई. ( 1948 ) जिन पर एलौपेथी चिकित्सा शिक्षा का दायित्व है तथा जो द्वि-भाषी कार्य के लिए अधिकृत है, अभी तक हिन्दी भाषा में चिकित्सा शिक्षा का कार्य प्रारंभ नहीं कर पाये।

देश में अंग्रेजी माध्यम की चिकित्सा शिक्षा के संबंध में कई शोध भी हुए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार 1989 - 2000 के बीच एम्स से स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण किये चिकित्सकों में से 54 प्रतिशत भारत से बाहर है तथा जिनमें 85 प्रतिशत अमेरिका में बताये जाते हैं। अन्य चिकित्सा विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों से भी काफी संख्या में चिकित्सक भारत से शिक्षा ग्रहण कर अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, आस्टेंलिया, न्यूजीलैंड जा रहे हैं तथा भारत की ग्रामीण जनता उनकी सेवाओं से उपेक्षित हैं।

इसके अतिरिक्त अंग्रेजी माध्यम की चिकित्सा शिक्षा ग्रामीण परिवेश के विद्यार्थियों पर इतना तनाव उत्पन्न करती है कि वे आत्महत्या तक करने को मजबूर होते हैं, जब कि स्कूल स्तर पर वे सर्वोच्च स्थान पर होते हैं।

इन्ही तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना मध्यप्रदेश अधिनियम क्रमांक 34 के अंतर्गत दिनांक 19 दिसम्बर 2011 को की गई। इस विश्वविद्यालय का मुख्य उद्देश्य हिन्दी भाषा को अध्यापन, प्रशिक्षण एवं ज्ञान की वृद्धि और प्रसार के लिए तथा विज्ञान साहित्य कला और अन्य विधाओं में उच्च स्तरीय गवेषणा के लिए शिक्षण का माध्यम बनाना है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय ने अब तक 225 के लगभग पाठ्यक्रमों का हिन्दी में निर्माण कर लिया है। विज्ञान, कला, समाज विज्ञान, वाणिज्य, प्रबंधन, एवं विधि में प्रशिक्षण, पत्रोपाधि, स्नातक प्रतिष्ठा, स्नातकोत्तर, विद्यानिधि एवं विद्यावारिधि की पढ़ाई हिन्दी माध्यम से प्रारंभ हो चुकी है। 2012.13 में 60 विद्यार्थियों से प्रारंभ हुए इस विश्वविद्यालय में 800 के लगभग विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। परन्तु देश में आमधारणा यह है कि जब तक चिकित्सा और अभियांत्रिकी के क्षेत्र में अध्ययन, अध्यापन और शोध हिन्दी माध्यम से प्रारंभ नहीं हो जाता तब तक हिन्दी विश्वविद्यालय का कोई विशेष योगदान नहीं माना जायेगा। अतः चिकित्सा और अभियांत्रिकी में भी चिकित्सा पाठ्यक्रमों को प्राथमिकता देते हुए विश्वविद्यालय द्वारा निम्न कार्य किये गयेः-

विषय सूची

चिकित्सा क्षेत्र की नियामक संस्थाओं से पत्राचार[सम्पादन]

चिकित्सा क्षेत्र में प्रमुख नियामक संस्थायें भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद, भारतीय नर्सिंग परिषद तथा भारतीय भेषज परिषद प्रमुख हैं। इन परिषदों को विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को बताते हुए हिन्दी माध्यम से चिकित्सा एवं नर्सिंग के पाठ्यक्रम हिन्दी माध्यम से प्रारंभ करने के संबंध में स्वीकृति देने के लिए आग्रह किया गया था, परन्तु पत्रों के जबाव में भारतीय नर्सिंग परिषद ने 27 अक्टूबर 2013 को सूचित किया कि ‘‘भारतीय उपचर्या परिषद का विश्वविद्यालय स्तर का कोई भी पाठ्यक्रम हिंदी माध्यम के अन्तर्गत नहीं आता है’’। इसी तरह भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद ने विश्वविद्यालय के पत्र के जबाव में दिनांक 17.04.2013 को लिखा,

Medical Council of India is dealing with basic medical qualification ie. MBBS/MD/MS and super speciality courses and has not prescribed these courses in Hindi medium.

इस पत्र के उत्तर में विश्वविद्यालय ने पुनः भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद को पत्र लिखे ‘कि यदि हम इन पाठ्यक्रमों को हिंदी में उपलब्ध करा दें तो हमें हिंदी माध्यम से चिकित्सा शिक्षा के पाठ्यक्रम प्रारंभ करने की स्वीकृति प्रदान कर दोगे? इसके बाद कई स्मरण पत्र देने तथा व्यक्तिगत रूप से संबंधित अधिकारियों से मिलने के बाद दिनांक 25.03.2015 के पत्र के जबाव में परिषद की शैक्षणिक समिति के निर्णय से अवगत कराया,

The Academic Committee observed that the Medical Council of India has time and again reiterated that in larger interest, the medium of instruction for the medical education under the ambit of Medical Council of India should be English in view of the availability of the abundant reading material in English and the mobility of the students and the teachers within the country and outside. The same is also desired in the context of the internationalization of medical education in global interests.

उक्त जबाव से यह निष्कर्ष निकलता है कि भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद जिसको पूरे देश की आवश्यकताओं के अनुसार चिकित्सा शिक्षा को आगे बढ़ाना है, वर्तमान स्थिति में अंग्रेजी माध्यम से विपुल साहित्य की उपलब्धता तथा चिकित्सा शिक्षा के अन्तरराष्ट्रीयकरण का तर्क के आधार पर हिंदी माध्यम से चिकित्सा शिक्षा प्रारंभ करने के आग्रह को टालना है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से पत्राचार[सम्पादन]

भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद से चिकित्सा शिक्षा को हिंदी में प्रारंभ करने की दृष्टि से सकारात्मक उत्तर प्राप्त नहीं होने के बाद स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार से भी दिनांक 21.06.2014, 21.12.2014 एवं 09.02.2015 को पत्र लिखा गया, परन्तु अभी तक मंत्रालय से किसी प्रकार का जबाव प्राप्त नहीं हुआ। इससे यह लगता है कि हिंदी माध्यम से चिकित्सा शिक्षा को प्रारंभ करने में मंत्रालय एवं भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद दोनों की कोई रूचि नहीं है।

[हिंदी माध्यम से चिकित्सा शिक्षा प्रारंभ करने की प्रमुख चुनौती है। हिंदी भाषा में साहित्य की अनुपलब्धता तथा पाठ्यक्रमों का अंग्रेजी भाषा में होना प्रमुख है। विश्वविद्यालय ने इस कठिनाई को दूर करने के लिए पाठ्यक्रमों का निर्माण प्रारंभ करवाया। विश्वविद्यालय ने सर्वप्रथम स्नातक चिकित्सा (एम.बी.बी. एस.) को प्राथमिकता दी और हिंदी माध्यम से निम्न पाठ्यक्रमों को पूर्ण करवा लिया है। प्रथम एम.बी.बी. एस. के प्रथम सेमेस्टर से लेकर अन्तिम सेमेस्टर तक लगभग 18 प्रश्न-पत्र छात्रों को पढ़ने पड़ते हैं।]

संगोष्ठी तथा एम.डी. के शोध ग्रंथ हिंदी में लिखने वालों का सम्मान[सम्पादन]

विश्वविद्यालय ने नियामक संस्थाओं तथा केन्द्र सरकार से पत्राचार करने के बाद यह उचित समझा कि चिकित्सकों के बीच जनजागरण किया जाना चाहिए और इस दृष्टि से 14 सितम्बर 2012 को ‘‘चिकित्सा विज्ञान का शिक्षण, प्रशिक्षण एवं शोध का माध्यम हिंदी’’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी में पीपुल्स विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो . जी . एस . दीक्षित सहित कई चिकित्सा शिक्षक उपस्थित हुए। इस संगोष्ठी में ऐसे तीन शिक्षकों की जानकारी कर उनका सम्मान किया गया, जिन्होंने देश में प्रथम बार हिंदी माध्यम से अपना स्नातकोत्तर (एम.डी.) का शोध ग्रंथ हिंदी में लिखा था। इनमें डॉं मुनीश्वर गुप्ता ने 1986 - 87 में आगरा के सरोजनी नायडू मेडिकल कालेज से एम.बी.बी.एस. एवं एम.डी. (रेडियोलोजी) में ‘‘सिर एवं गले की कैंसर की सिकाई में अवटु ग्रंथी पर प्रभाव’’ विषयक शोध ग्रंथ हिंदी में प्रस्तुत किया।

डॉ. सूर्यकांत त्रिपाठी ने ‘क्षय रोग की अल्पावधि रसायन चिकित्सा में सह-औषधियों की भूमिका’ विषयक शोध ग्रंथ एम.डी. उपाधि हेतु किंग जार्ज मेडिकल कालेज लखनऊ से लखनऊ विश्वविद्यालय को 1991 में हिन्दी में प्रस्तुत किया। परन्तु इस शोध ग्रंथ को विभागाध्यक्ष तथा प्राचार्य ने मूल्यांकन के लिए जमा करने से मना कर दिया। डॉ . त्रिपाठी ने इसके विरूद्वसंघर्ष किया तथा प्राचार्य द्वारा कुलपति, कुलाधिपति के आदेशों की अवहेलना करने पर उत्तर प्रदेश के दोनों सदनों को शोध ग्रंथ जमा कर मूल्यांकन करने हेतु कठोर प्रस्ताव पास करना पड़ा। उपर्युक्त दोनो शोधार्थियों से प्रेरणा लेते हुए डॉ. मनोहर भंडारी ने 1992 में शरीर क्रिया विज्ञान विभाग, महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय इंदौर से एम.डी. की उपाधि हेतु ‘पुलिस प्रशिक्षण विद्यालय, इंदौर के प्रशिक्षुओं में हीमोग्लोविन, रूधिरकोशिकामापी, सीरम लौह, कुल लौह बन्धन क्षमता एवं फुप्फुस क्रिया परीक्षणः एक अध्ययन’ विषयक शोध ग्रंथ मध्यप्रदेश में पहली बार देवी अल्यि विश्वविद्यालय, इन्दौर को 1992 में प्रस्तुत किया।

हिंदी में चिकित्सा पाठ्यक्रमों का निर्माण[सम्पादन]

विश्वविद्यालय की हिन्दी माध्यम से चिकित्सा शिक्षा प्रारंभ करने की प्रमुख चुनौती है। हिन्दी भाषा में साहित्य की अनुपलब्धता तथा पाठ्यक्रमों का अंग्रेजी भाषा में होना प्रमुख है। विश्वविद्यालय ने इस कठिनाई को दूर करने के लिए पाठ्यक्रमों का निर्माण प्रारंभ करवाया। विश्वविद्यालय ने सर्वप्रथम स्नातक चिकित्सा (एम.बी.बी.एस.) को प्राथमिकता दी और हिन्दी माध्यम से निम्न पाठ्यक्रमों को पूर्ण करवा लिया है। प्रथम एम . बी . बी . एस . के प्रथम सेमेस्टर से लेकर अन्तिम सेमेस्टर तक लगभग 18 प्रश्न-पत्र छात्रों को पढ़ने पड़ते हैं। अतः विश्वविद्यालय ने शरीर रचना विज्ञान, जीवरसायनशास्त्र, शरीरक्रियाविज्ञान, न्याय संबंधी चिकित्साशास्त्र तथा जीवविष विज्ञान, सूक्ष्मजीवविज्ञान, विकृति विज्ञान, भेषजगुण विज्ञान, निश्चेतना विज्ञान, सामुदायिक चिकित्साशास्त्र, चर्मरोग तथा रतिजरोग विज्ञान, काय चिकित्सा, प्रसूति एवं स्त्रीरोग विज्ञान, नेत्र विज्ञान, अस्थि विज्ञान, नाक-कान-गला चिकित्सा विज्ञान, शिशुरोग विज्ञान, मनोरोग विज्ञान एवं शल्यचिकित्सा। इसके अतिरिक्त अस्पताल प्रबंधन, प्रयोगशाला तकनीक, चिकित्सा प्रयोगशाला तकनीशियन, डायलिसिस तकनीशियन, एक्सरे रेडियोग्राफर तकनीशियन तथा आपरेशन थियेटर तकनीशियन जैसे पत्रोपाधि पाठ्यक्रमों की रचना हो गयी है।

चिकित्सा एवं अभियांत्रिकी शिक्षा हिंदी माध्यम से पाठ्य पुस्तक लेखनविषयक संगोष्ठी[सम्पादन]

[1969-70 में हिन्दी की पुस्तकें प्रकाशित करने के लिए हिन्दी ग्रंथ अकादमियों की स्थापना की गयी। परन्तु विश्वविद्यालयों तथा सरकार द्वारा हिन्दी माध्यम से परीक्षा देने की स्वीकृति न देने के कारण लेखकों की पुस्तकों की मांग नहीं बढ पाई। फिर भी कई शिक्षक है जिन्होंने हिन्दी माध्यम से चिकित्सा लेखन करने की अपनी आदत नहीं छोड़ी। विश्वविद्यालय ने आज देश के विभिन्न प्रकाशकों से 300 के लगभग पुस्तकों का संकलन किया है, जो सभी हिन्दी माध्यम से प्रकाशित हैं।]

07 एवं 08 मार्च 2015 को दो दिवसीय चिकित्सा, अभियांत्रिकी शिक्षा हेतु हिन्दी माध्यम से पुस्तक लेखन के संबंध में कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें प्रदेश के माननीय उच्च शिक्षा मंत्री श्री उमाशंकर गुप्ता, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग के अध्यक्ष डॉ. केशरीलाल वर्मा तथा हिन्दी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष डॉ.एस.बी. गोस्वामी के अतिरिक्त मध्यप्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर के कुलपति प्रो. डी.पी. लोकवानी, मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्था के निदेशक डॉ. अप्पू कुट्टन एवं कई शिक्षक, विद्वान उपस्थित थे। दो दिन की इस कार्यशाला में चिकित्सा, अभियांत्रिकी क्षेत्र में पाठ्य पुस्तकों का मूल्यांकन, लेखन तथा अनुवाद प्रक्रिया पर विचार-विमर्श हुआ तथा कई शिक्षकों ने हिन्दी में चिकित्सा से संबंधित पुस्तकें लिखने का आश्वासन दिया तथा कुछ ने कार्य भी प्रारंभ कर दिया है।

रोगों एवं मनोविकारों के समाधान के लिए मात्रभाषा हिन्दी का प्रयोग अप्रैल 2015 को विश्वविद्यालय में डॉ ण् अलोक पौराणिक का व्याख्यान का आयोजन किया गया जिसमें उन्होंने भाषा और मानव मस्तिष्क का अन्तर बताते हुए मात्रभाषा में शिक्षा को सर्वाधिक अनुकूल बताया। डॉ पौराणिक ने वाचाघात (अफेजिया-बोली का लकवा) की चिकित्सा के लिए हिन्दी को श्रेष्ठ बताया। इस दिशा में उन्होंने काफी शोध कार्य किया है।

हिंदी माध्यम से प्रकाशित चिकित्सा से संबंधित पुस्तकों का संकलन[सम्पादन]

हिन्दी माध्यम से चिकित्सा शिक्षा के समक्ष प्रमुख चुनौती हिन्दी भाषा में साहित्य की अनुपलब्धता ही है। परन्तु यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि चिकित्सा महाविद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम होने के बावजूद भी भारत में चिकित्सा क्षेत्र में हिन्दी माध्यम से पुस्तक लेखन के लिए प्रयास 1962.63 में किये गये। 1969.70 में हिन्दी की पुस्तकें प्रकाशित करने के लिए हिन्दी ग्रंथ अकादमियों की स्थापना की गयी। परन्तु विश्वविद्यालयों तथा सरकार द्वारा हिन्दी माध्यम से परीक्षा देने की स्वीकृति न देने के कारण लेखकों की पुस्तकों की मांग नहीं बढ पाई। फिर भी कई शिक्षक है जिन्होंने हिन्दी माध्यम से चिकित्सा लेखन करने की अपनी आदत नहीं छोड़ी। विश्वविद्यालय ने आज देश के विभिन्न प्रकाशकों से 300 के लगभग पुस्तकों का संकलन किया है, जो सभी हिन्दी माध्यम से प्रकाशित हैं। प्रारंभ में देश में हिन्दी ग्रंथ अकादमी की स्थापना के साथ-साथ चिकित्सा के क्षेत्र में भी लेखन प्रारंभ हुआ। अब तक विभिन्न हिन्दी ग्रंथ अकादमियों तथा निजी प्रकाशकों से निम्न पुस्तकों का संकलन किया है :

मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी संकलित पुस्तकों की संख्या 04 ,

बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी 16 ,

राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी 14 ,

हरियाणा हिन्दी ग्रंथ अकादमी 06 ,

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान 07 ,

छत्तीशगढ़ हिन्दी ग्रंथ अकादमी 01 ,

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास 22 ,

विश्व स्वास्थ्य संगठन 07 ,

वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग 08 ,

सुमित प्रकाशन, मेरठ 45 ,

राजकमल प्रकाशन, दिल्ली 14 ,

चौखंभा प्रकाशन, वाराणसी 118 ,

जे.पी. ब्रदर्स, दिल्ली 26

कुल 297

हिंदी माध्यम से चिकित्सा शिक्षा के प्रसार में प्रवासी भारतीयों से सम्पर्क[सम्पादन]

हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना की सूचना मिलते ही अमेरिका निवासी डॉं. कलोल गुहा ने हिन्दी माध्यम में चिकित्सा शिक्षा में रूचि प्रदर्शित की तथा वह विश्वविद्यालय में आये तथा छात्रों के समक्ष व्याख्यान दिया तथा उन्होंने हिन्दी माध्यम से उत्तीर्ण छात्रों को सरकारी नौकरी में प्राथमिकता, 25 प्रतिशत अधिक वेतन, हिन्दी माध्यम से स्थापित करने वाले महाविद्यालयों के संस्थापकों को कर रियायत देने की आवश्यकता बतायी जिससे प्रवासी भारतीय निवेश हेतु आकर्षित हो सके।

लोक स्वास्थ्य एवं वैकल्पिक चिकित्सा केन्द्र की स्थापना[सम्पादन]

विश्वविद्यालय ने अध्ययन एवं शोध के 10 विशेष केन्द्र खोलने का निर्णय लिया है जिसमें एक लोक स्वास्थ्य एवं वैकल्पिक चिकित्सा केन्द्र भी है। यह केन्द्र लोक स्वास्थ्य जागरूकता पाठ्यक्रमों का निर्माण करेगा जिसमें प्रत्येक विद्यार्थी को प्रमुख रोगों, औषधियों व रोकथाम की जानकारी दी जायेगी। यह केन्द्र लोक स्वास्थ्य परंपराओं के तार्किक आधार हेतु अध्ययन, अनुसंधान तथा समन्वय का कार्य करेगा। यह लोक उपचारकों को मुख्य धारा से जोड़नें हेतु उनको प्रशिक्षण भी देगा।

गर्भ संस्कार तपोवन केन्द्र की स्थापना[सम्पादन]

विश्वविद्यालय के कुछ सामाजिक दायित्व भी है। इन सामाजिक सरोकारों के अन्तर्गत चिकित्सा शिक्षा के शिशु विभाग से जुड़ा हुआ भारतीय संस्कार के प्रशिक्षण हेतु ‘‘गर्भ संस्कार तपोवन केन्द्र’’ की स्थापना 02 अक्टूबर 2014 को की गयी है जहॉं गर्भवती महिलाओं को निःशुल्क गर्भ में पल रहे भ्रूण को किस प्रकार संस्कारित किया जा सकता है, उस संबंध में प्रशिक्षण दिया जाता है। यह गतिविधि देश में काफी चर्चा का विषय बनी। विश्वविद्यालय ने गुजरात के ‘बाल विश्वविद्यालय, गांधीनगर’ से समझौता किया है, जिसमें केन्द्र के संचालन के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। अभी तक इस केन्द्र में 9 माह का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम तथा 6 माह का प्रशिक्षक पाठ्यक्रम बनाया गया है। केन्द्र में 30 से अधिक पंजीकरण हुआ है। गर्भ संस्कार से पूर्व नव-दम्पति प्रशिक्षण शिविर का भी आयोजन होता है।

हिंदी माध्यम से चिकित्सा शिक्षा[सम्पादन]

  • चिकित्सा क्षेत्र की नियामक संस्थाओं द्वारा सभी चिकित्सा परीक्षाओं में हिन्दी माध्यम से लिखने की छूट। केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों को अपने अपने क्षेत्र में पीएमटी की तरह परीक्षा में उत्तर द्वि-भाषा में देने की छूट देनी चाहिए। अंग्रेजी शासन काल से अंग्रेजी माध्यम से चिकित्सा देने की परम्परा चल रही है जिसको अब तक निभाया जा रहा है। अतः शासन द्वारा एम.सी.आई. को द्वि-भाषा में परीक्षा करवाने के निर्देश देने चाहिए। जब विद्यार्थियों को हिन्दी माध्यम से परीक्षा देने की छूट होगी तो प्रारंभ में पुस्तकों के उपलब्ध न होने के बावजूद भी विद्यार्थी अनुवाद कर परीक्षा में पूछे गये प्रश्न-पत्र उत्तर हिन्दी भाषा में दे सकेगें। हिन्दी भाषा में परीक्षा देने की छूट होने के बाद पुस्तक की मांग बढ़ जाएगी तथा लेखक भी हिन्दी में लेखन के लिए प्रेरित होंगे।
  • चिकित्सा शिक्षण द्वि-भाषी माध्यम से : भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद से संपर्क करने पर विश्वविद्यालय ने यह जानने का प्रयत्न किया कि क्या विश्वविद्यालयों या चिकित्सा महाविद्यालयों द्वारा चिकित्सा शिक्षा अंग्रेजी भाषा में देने का प्रावधान है। परन्तु यह आश्चर्य की बात है कि अंग्रेजी की अनिवार्यता नहीं होने के बावजूद भी व्यवहार में केवल अंग्रेजी में ही अध्यापन एवं परीक्षा देने की व्यवस्था बनाई गई है। अतः शिक्षण का माध्यम द्वि-भाषी होना चाहिए।
  • हिन्दी ग्रंथ अकादमियों को चिकित्सा शिक्षा की पाठ्य पुस्तकें हिन्दी में प्रकाशित करने के लिए लक्ष्य एवं अनुदान : देश की सभी हिन्दी ग्रंथ अकादमियों, हिन्दी संस्थानों तथा हिन्दी प्रकोष्ठों को जो केन्द्र एवं राज्य सरकार से अनुदान प्राप्त करते हैं, के लिए प्रतिवर्ष हिन्दी की पुस्तकों का प्रकाशन अनिवार्य किया जाना चाहिए। प्रत्येक अकादमी प्रतिवर्ष कम से कम 5 पुस्तकों का प्रकाशन करें।
  • चिकित्सा शब्दकोषों का निर्माण : वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग ने यद्यपि अभी तक 5 चिकित्सा शब्दकोषों का हिन्दी में निर्माण किया है परन्तु आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में प्रगति के कारण यह शब्दकोष अपर्याप्त हैं अतः आयोग को विभिन्न विषयों तथा रोगो के अनुसार शब्दकोष का निर्माण एक समय-सीमा में करना चाहिए।
  • विदेशी भाषा में श्रेष्ठ चिकित्सा पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद : आज सभी चिकित्सा विश्वविद्यालय एवं नियामक संस्थायें अंग्रेजी भाषा में विपुल चिकित्सा साहित्य उपलब्ध होने के कारण हिन्दी में चिकित्सा शिक्षा को आगे बढ़ाने की वकालत नहीं करती। अतः यह आवश्यक है कि भारत सरकार का राष्ट्रीय अनुवाद मिशन मैसूर, केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय को विभिन्न विदेशी भाषाओं में उपलब्ध चिकित्सा साहित्य का हिन्दी में अनुवाद प्राथमिकता से करवाया जाना चाहिए।
  • चिकित्सा विषयों की पाण्डुलिपियां तैयार करने हेतु चिकित्सा विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों को दायित्व देने पर विचार : हिन्दी भाषी प्रांतों में कई सरकारी एवं निजी चिकित्सा विश्वविद्यालय है। इनके साथ 115 के लगभग चिकित्सा महाविद्यालय भी सम्बद्ध हैं परन्तु अभी तक किसी भी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय ने एक भी चिकित्सा संबंधी पुस्तक हिन्दी भाषा में लिखने का प्रयास नहीं किया। अतः यह आवश्यक है कि प्रत्येक विश्वविद्यालय स्नातक एवं स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की प्रतिवर्ष 5 - 5 पुस्तकें हिन्दी में प्रकाशित करवायें। इस लेखन कार्य के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय या संबंधित राज्य सरकार विश्वविद्यालयों को आर्थिक अनुदान प्रदान करें।
  • चिकित्सा शिक्षा में पदोन्नति को लेखन से जोड़ना : एम.सी. आई. तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को चिकित्सा शिक्षा को हिन्दी माध्यम से आगे बढ़ाने की दृष्टि से यह प्रावधान करना चाहिए की वह प्रत्येक चिकित्सा शिक्षक पदोन्नति के लिए 3 वर्ष में कम से कम किसी चिकित्सा उपाधि पाठ्यक्रम के लिए चिकित्सा शिक्षा की एक पुस्तक हिन्दी में अवश्य लिखे।
  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्तर पर लंबित पाण्डे समिति की अनुशंसाओं पर विचार : भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने प्रो. मुकुल चंद पाण्डे की अध्यक्षता में ‘चिकित्सा और पराचिकित्सा शिक्षा हिंदी माध्यम समिति’’ का 22 नवम्बर 1988 को गठन किया था जिसने 1990 में अपना प्रतिवेदन भी भारत सरकार को प्रस्तुत किया था। परन्तु आज तक उक्त समिति द्वारा की गई अनुसंशाओं पर कोई कार्यवाही नहीं की गई।
  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत केन्द्रीय हिन्दी चिकित्सा प्रकोष्ठ का गठन किया जाना : भारत सरकार द्वारा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्तर पर चिकित्सा संबंधी केन्दीय प्रकोष्ठ का गठन किया जाना चाहिए जो केवल हिन्दी माध्यम से चिकित्सा शिक्षा के संवर्धन के लिए कार्य करेगा।
  • पारिश्रमिक दरों में संशोधन : हिन्दी ग्रंथ अकादमियों तथा हिन्दी निदेशालयों को मौलिक लेखन तथा अनुवाद कार्य के लिए पारिश्रमिक दरों में संशोधन किया जाना चाहिए।
  • चिकित्सा शिक्षकों एवं लेखकों को हिन्दी में प्रशिक्षण : यद्यपि हिन्दी भाषी प्रदेशों में कक्षाओं में 30 - 40 प्रतिशत अध्ययन हिन्दी में होता है परन्तु परीक्षा में लेखन द्विभाषी न होने के कारण हिन्दी भाषी छात्रों को कष्ट होता है। अतः यह आवश्यक है कि चिकित्सा शिक्षकों को हिन्दी भाषा के संबंध में प्रशिक्षण दिया जाए। उन्हें हिन्दी भाषा में लिखने का भी प्रशिक्षण दिया जाए।
  • पुरस्कार एवं सम्मान : चिकित्सा क्षेत्र में लेखन एवं शोध हिन्दी में करने वालों का नगद पुरस्कार एवं छात्रवृत्तियॉं प्रदान की जाए। माध्यम परिवर्तन को गति देने के लिए हिन्दी प्रदेशों के विश्वविद्यालय/महाविद्यालय में संगोष्ठियों का आयोजन किया जाए।
  • स्नातक चिकित्सा के वैकल्पिक पाठ्यक्रम की आवश्यकता पर विचार : एम.बी.बी.एस. का वर्तमान पाठ्यक्रम जो साढे पांच वर्ष का है उसे छात्र भाषा व अन्य रूकावटों के कारण 8 से 15 वर्षो तक उत्तीर्ण करते देखे हैं। ऐसे विद्यार्थी व उनके अभिभावक बहुत तनावों में जीवन व्यतीत करते हैं जिससे अवसाद ग्रस्त मनः स्थिति के कारण आत्म हत्याओं के समाचार भी समाचार पत्रों में आते हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद ने 1934 में अपनी स्थापना के बाद 1956 में कुछ मौलिक बदलाव किये थे। उसके बाद आज तक देश की स्वास्थ्य समस्याओं व देश की आवश्यकताओं के अनुसार कोई सार्थक परिवर्तन नहीं किये गये। इसी कारण कुपोषण एवं क्षय रोग देश में चुनौती है। कम से कम 5 वर्षो में पाठ्यक्रमों में देश की आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तन होना चाहिए। विश्वविद्यालय ने इस पर विचार करने के लिए एक अध्ययन समूह का गठन किया है।
  • चिकित्सा लेखकीय संवर्ग (कैडर) का समानान्तर निर्माण : चिकित्सा शिक्षा में लेखन हेतु शिक्षकों की भांति लेखकों के पदों का सृजन करना चाहिए। लेखकों व शिक्षकों की सेवा शर्ते समान होनी चाहिए। इस नीति के दूरगामी परिणाम होंगे। शिक्षकों की भांति कॉडर बनने से स्त्रोत लेखन व अनुवाद दोनों में वृद्धि होगी।
  • अति विशिष्ट क्षेत्रों के विशेषज्ञों के बाहर जाने पर यहां के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति प्राप्त करना : एम.सी.आई. की अकादमी परिषद ने चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता तथा वैश्वीकरण के लिए हिन्दी माध्यम का विरोध किया है। जबकि आज वैश्वीकरण के नाम पर भारतीय संसाधनों के आधार पर प्रशिक्षित चिकित्सक प्रायः विदेशों में चले जाते हैं जिनके ज्ञान का लाभ भारतीय जनता को नहीं हो पाता। यह देखा गया है कि हिन्दी या अन्य भारतीय भाषा से प्रशिक्षित चिकित्सक की प्रवृत्ति भारत में रहकर सेवा देनी की होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार 1989 - 2000 के बीच अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से उत्तीर्ण 54 प्रतिशत छात्र विदेशों में चले गये जिनमें 85ण्4 प्रतिशत अमेरिका में हैं। अतः ऐसे चिकित्सकों से भारत में अध्ययनरत छात्रों के लिए छात्रवृत्ति प्राप्त की जानी चाहिए जिससे उन पर किये गये व्यय की कुछ सीमा तक क्षतिपूर्ति की जा सके।
  • एम.सी.आई. व अन्य नियामक संस्थाओं द्वारा सेवानिवृत्त डॉक्टरों व अन्य विषय विशेषज्ञों के लिए लेखन योजना : सभी नियामक संस्थाओं द्वारा हजारो सेवानिवृत्त डॉक्टरों व विषय विशेषज्ञों के लिए लेखन योजना बनाकर उन्हें चिकित्सा शिक्षा के हित में लेखन के कार्य में लगाना चाहिए। कौंसिल इस कार्य हेतु एक समिति का गठन कर सकती है। अनुभवी शिक्षकों से पुस्तकें लिखवाने से गुणवत्ता में वृद्धि हो सकेगी। हमें ध्यान रखना चाहिए कि बोला हुआ शब्द समय के साथ भूला हुआ शब्द बन जाता है, परन्तु लिखा हुआ शब्द लकीर पर होता है जो लंबे समय तक जीता है तथा एक परम्परा बनाता है।
  • राष्ट्रीय उच्च चिकित्सा व तकनीकी शिक्षा लेखन मिशन की स्थापना : यह संस्थान देश की हिन्दी ग्रंथ अकादमियों द्वारा हिन्दी माध्यम से प्रकाशित चिकित्सा व तकनीकी विषयों की पुस्तकों की गुणवत्ता की जांच करे, उनके लिए संसाधनों की आपूर्ति करे तथा देश-विदेश में उनके प्रकाशनों की मांग व पूर्ति का समायोजन करें।
  • अनुवाद प्रौद्योगिकी के माध्यम से हिन्दी चिकित्सा शिक्षण को बढावा : आजकल शिक्षा के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी का निरंतर समावेश हो रहा है। चिकित्सा शिक्षण अंग्रेजी माध्यम से ही होता है। परन्तु अब ऐसे साफ्टवेयर विकसित हो गये हैं जो अंग्रेजी के भाषण को हिन्दी में परिवर्तित कर देते हैं। ऐसा ही एक साफ्टवेयर सी-डैक, पूना ने बनाया है जिसका नाम ‘वाचान्तर’ है।इस प्रकार भारत सरकार, राज्य सरकारों तथा नियामक संस्थाओं द्वारा उपर्युक्त सुझावों पर ध्यान दिया जाता है तो हिन्दी माध्यम से चिकित्सा शिक्षा कुछ ही वर्षो में अपने पावों पर खड़ी हो सकेगी तथा हिन्दी में शोध प्रारंभ होने पर अंग्रेजी शिक्षा से प्रतियोगिता कर सकेगी।