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दसम ग्रन्थ/अकाल उसतति

विकिपुस्तक से
ਅਕਾਲ ਉਸਤਤਿ ॥

अकाल उसतति ॥

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

स्री भगउती जी सहाइ ॥

उतार खासे दसखत का ॥

पातिसाही १० ॥

अकाल पुरख की रछा हमनै ॥

सरब लोह की रछिआ हमनै ॥

सरब काल जी दी रछिआ हमनै ॥

सरब लोह जी दी सदा रछिआ हमनै ॥

आगे लिखारी के दसखत ॥

त्वप्रसादि ॥ चउपई ॥

प्रणवो आदि एकंकारा ॥

जल थल महीअल कीओ पसारा ॥

आदि पुरखु अबगति अबिनासी ॥

लोक चत्रदसि जोत प्रकासी ॥१॥

हसति कीट के बीच समाना ॥

राव रंक जिह इकसर जाना ॥

अद्वै अलख पुरख अबिगामी ॥

सभ घट घट के अंतरजामी ॥२॥

अलख रूप, अछै अनभेखा ॥

राग रंग, जिह रूप न रेखा ॥

बरन चिहन सभहूं ते निआरा ॥

आदि पुरख अद्वै अबिकारा ॥३॥

बरन चिहन जिह जाति न पाता ॥

सत्र मित्र जिह तात न माता ॥

सभ ते दूरि, सभन ते नेरा ॥

जलि थलि महीअलि, जाहि बसेरा ॥४॥

अनहद रूप, अनाहद बानी ॥

चरन सरनि जिह बसत भवानी ॥

ब्रहमा बिसनु, अंतु नही पाइओ ॥

नेति नेति, मुखचार बताइओ ॥५॥

कोटि इंद्र, उपइंद्र बनाए ॥

ब्रहम रुद्र, उपाइ खपाए ॥

लोक चत्रदस, खेल रचाइओ ॥

बहुरि, आप ही बीच मिलाइओ ॥६॥

दानव देव फनिंद अपारा ॥

गंध्रब जछ, रचे सुभ चारा ॥

भूत भविख भवान कहानी ॥

घट घट के पट पट की जानी ॥७॥

तात मात जिह जाति न पाता ॥

एक रंग काहूं नहि राता ॥

सरब जोति के बीच समाना ॥

सभहूं सरब ठौरि पहिचाना ॥८॥

काल रहित, अनकाल सरूपा ॥

अलख पुरखु अविगति अवधूता ॥

जाति पाति जिह चिहन न बरना ॥

अबिगति देव, अछै अनभरमा ॥९॥

सभ को काल, सभन को करता ॥

रोग सोग, दोखन को हरता ॥

एक चित, जिह इक छिन धिआइओ ॥

काल फासि के बीच न आइओ ॥१०॥

ਤ੍ਵਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਕਬਿਤ ॥

त्वप्रसादि ॥ कबित ॥ कतहूं सुचेत हुइ कै चेतना को चारु कीओ; कतहूं अचिंत हुइ कै सोवत अचेत हो ॥

कतहूं भिखारी हुइ कै मांगत फिरत भीख; कहूं महा दानि हुइ कै मांगिओ धन देत हो ॥

कहूं महा राजन को दीजत अनंत दान; कहूं महा राजन ते छीन छित लेत हो ॥

कहूं बेदि रीति, कहूं ता सिउ बिपरीति; कहूं त्रिगुन अतीत, कहूं सरगुन समेत हो ॥१॥११॥

कहूं जछ गंध्रब, उरग कहूं बिदिआधर; कहूं भए किंनर, पिसाच कहूं प्रेत हो ॥

कहूं होइ कै हिंदूआ, गाइत्री को गुपत जपिओ; कहूं होइ के तुरका, पुकारे बांग देत हो ॥

कहूं कोक काबि हुइ कै, पुरान को पड़त मति; कतहूं कुरान को निदान जान लेत हो ॥

कहूं बेद रीत, कहूं ता सिउ बिपरीत; कहूं त्रिगुन अतीत, कहूं सरगुन समेत हो ॥२॥१२॥

कहूं देवतान के दिवान मै बिराजमान; कहूं दानवान को गुमान मति देत हो ॥

कहूं इंद्र राजा को मिलत इंद्र पदवी सी; कहूं इंद्र पदवी छपाइ छीन लेत हो ॥

कतहूं बिचार अबिचार को बिचारत हो; कहूं निज नारि परनारि के निकेत हो ॥

कहूं बेद रीति, कहूं तां सिउ बिपरीत; कहूं त्रिगुन अतीत, कहूं सरगुन समेत हो ॥३॥१३॥

कहूं ससत्र धारी, कहूं बिदिआ के बिचारी; कहूं मारुत अहारी, कहूं नार के निकेत हो ॥

कहूं देवबानी, कहूं सारदा भवानी; कहूं मंगला म्रिड़ानी, कहूं सिआम कहूं सेत हो ॥

कहूं धरम धामी, कहूं सरब ठउर गामी; कहूं जती, कहूं कामी, कहूं देत, कहूं लेत हो ॥

कहूं बेद रीति, कहूं ता सिउ बिपरीत; कहूं त्रिगुन अतीत, कहूं सरगुन समेत हो ॥४॥१४॥

कहूं जटाधारी, कहूं कंठी धरे ब्रहमचारी; कहूं जोग साधी, कहूं साधना करत हो ॥

कहूं कान फारे, कहूं डंडी हुइ पधारे; कहूं फूकि फूकि पावन कौ, प्रिथी पै धरत हो ॥

कतहूं सिपाही हुइ कै, साधत सिलाहन कौ; कहूं छत्री हुइ कै, अरि मारत मरत हो ॥

कहूं भूमि भार कौ उतारत हो महाराज; कहूं भव भूतन की भावना भरत हो ॥५॥१५॥

कहूं गीत नाद के निदान कौ बतावत हो; कहूं न्रितकारी चित्रकारी के निधान हो ॥

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कतहूं पयूख हुइ कै, पीवत पिवावत हो; कतहूं मयूख ऊख, कहूं मदि पानि हो ॥

कहूं महा सूर हुइ कै, मारत मवासन कौ; कहूं महादेव, देवतान के समान हो ॥

कहूं महादीन, कहूं द्रब के अधीन; कहूं बिदिआ मै प्रबीन, कहूं भूमि, कहूं भानु हो ॥६॥१६॥

कहूं अकलंक, कहूं मारुत मयंक; कहूं पूरन प्रजंक, कहूं सुधता की सार हो ॥

कहूं देव धरम, कहूं साधना के हरम; कहूं कुतसति कुकरम, कहूं धरम के प्रकार हो ॥

कहूं पउनहारी, कहूं बिदिआ के बीचारी; कहूं जोगी जती ब्रहमचारी, नर कहूं नारि हो ॥

कहूं छत्रधारी, कहूं छाला धरे छैल भारी; कहूं छकवारी, कहूं छल के प्रकार हो ॥७॥१७॥

कहूं गीत के गवया, कहूं बेनु के बजया; कहूं न्रित के नचया, कहूं नर को अकार हो ॥

कहूं बेद बानी, कहूं कोक की कहानी; कहूं राजा, कहूं रानी, कहूं नारि के प्रकार हो ॥

कहूं बेन के बजया, कहूं धेन के चरया; कहूं लाखन लवया, कहूं सुंदर कुमार हो ॥

सुधता की सान हो, कि संतन के प्रान हो; कि दाता महा दानि हो, कि न्रिदोखी निरंकार हो ॥८॥१८॥

निरजुर निरूप हो, कि सुंदर सरूप हो; कि भूपन के भूप हो, कि दाता महा दान हो ॥

प्रान के बचया, दूध पूत के दिवया; रोग सोग के मिटया, किधौ मानी महा मान हो ॥

बिदिआ के बिचार हो, कि अद्वै अवतार हो; कि सिधता की सूरति हो, कि सुधता की सान हो ॥

जोबन के जाल हो, कि काल हूं के काल हो; कि सत्रन के सूल हो, कि मित्रन के प्रान हो ॥९॥१९॥

कहूं ब्रहमबाद, कहूं बिदिआ को बिखाद; कहूं नाद के निनाद, कहूं पूरन भगत हो ॥

कहूं बेद रीति, कहूं बिदिआ की प्रतीति; कहूं नीति अउ अनीति, कहूं ज्वाला सी जगत हो ॥

पूरन प्रताप कहूं, इकाती को जाप कहूं; ताप को अताप, कहूं जोग ते डिगत हो ॥

कहूं बर देत, कहूं छल सो छिनाइ लेत; सरब कालि सरब ठौरि, एक से लगत हो ॥१०॥२०॥

ਤ੍ਵਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਸ੍ਵੈਯੇ ॥

त्वप्रसादि ॥ स्वैये ॥ स्रावग सुध समूह सिधान के; देखि फिरिओ घरि जोगि जती के ॥

सूर सुरारदन, सुध सुधादिक; संत समूह अनेक मती के ॥

सारे ही देस को देखि रहियो; मत कोऊ न देखीअत प्रान पती के ॥

स्री भगवान की भाइ क्रिपा हूं ते; एक रती बिनु, एक रती के ॥१॥२१॥

माते मतंग, जरे जर संगि; अनूप उतंग सुरंग सवारे ॥

कोटि तुरंग, कुरंग से कूदत; पउन के गउन को जात निवारे ॥

भारी भुजान के भूप भली बिधि; निआवत सीस, न जात बिचारे ॥

एते भए, तो कहा भए भूपति? अंत को, नागे ही पाइ पधारे ॥२॥२२॥

जीत फिरे सभ देस दिसान को; बाजत ढोल, म्रिदंग, नगारे ॥

गुंजत गूड़ गजान के सुंदर; हिंसत ही हय राज हजारे ॥

भूत भविख भवान के भूपति; कउन गनै? नही जात बिचारे ॥

स्रीपति स्री भगवान भजे बिनु; अंत को, अंत के धाम सिधारे ॥३॥२३॥

तीरथ न्हान, दइआ, दम, दान; सु संजम, नेम, अनेक बिसेखे ॥

बेद पुरान, कतेब कुरान; जिमीन जमान सबान के पेखे ॥

पउन अहार, जती जत धारि; सबै सु बिचार हजारक देखे ॥

स्री भगवान भजे बिनु भूपति; एक रती बिनु, एक न लेखै ॥४॥२४॥

सुध सिपाह, दुरंत दुबाह, सु साजि सनाह, दुरजान दलैंगे ॥

भारी गुमान भरे मन मै; करि परबत पंख, हलै न हलैंगे ॥

तोरि अरीन, मरोरि मवासन; माते मतंगन मान मलैंगे ॥

स्रीपति स्री भगवान क्रिपा बिनु; तिआगि जहानु, निदान चलैंगे ॥५॥२५॥

बीर अपार, बडे बरिआर; अबिचारहि, सार की धार भछया ॥

तोरत देस, मलिंद मवासन; माते गजान के मान, मलया ॥

गाड़े गड़ान के तोड़नहार; सु बातन ही, चक चार लवया ॥

साहिबु स्री सभ को सिरनाइक; जाचक अनेक, सु एक दिवया ॥६॥२६॥

दानव, देव, फनिंद, निसाचर; भूत, भविख, भवान जपैंगे ॥

जीव जिते जल मै, थल मै; पल ही पल मै, सभ थाप थपैंगे ॥

पुंन प्रतापन बाढि जैत धुनि; पापन कै, बहु पुंज खपैंगे ॥

साध समूह प्रसंन फिरै जगि; सत्र सभै अविलोकि चपैंगे ॥७॥२७॥

मानव, इंद्र, गजिंद्र, नराधिप; जौन त्रिलोक को राजु करैंगे ॥

कोटि इसनान गजादिक दानि; अनेक सुअ्मबर साजि, बरैंगे ॥

ब्रहम, महेसुर, बिसनु, सचीपति; अंति फसे, जम फासि परैंगे ॥

जे नर, स्रीपति के प्रस हैं पग; ते नर, फेरि न देह धरैंगे ॥८॥२८॥

कहा भयो? दोऊ लोचन मूंद कै; बैठि रहिओ, बक ध्यान लगाइओ ॥

न्हात फिरिओ लीए सात समुंद्रन; लोक गइओ, परलोक गवाइओ ॥

बासु कीओ बिखिआन सो बैठ के; ऐसे ही ऐस सु बैस बिताइओ ॥

साचु कहौ, सुन लेहु सभै; जिन प्रेम कीओ, तिन ही प्रभु पाइओ ॥९॥२९॥

काहूं लै पाहन पूज धरिओ सिरि; काहूं लै लिंगु गरे लटकाइओ ॥

काहूं लखिओ हरि अवाची दिसा महि; काहूं, पछाह को सीस निवाइओ ॥

कोऊ, बुतान कौ पूजत है पसु; कोऊ, म्रितान कौ पूजन धाइओ ॥

कूर क्रिआ उरझिओ सभ ही जगु; स्री भगवान कौ भेदु न पाइओ ॥१०॥३०॥

त्वप्रसादि ॥ तोमर छंद ॥

हरि, जनम मरन बिहीन ॥

दस चार चार, प्रबीन ॥

अकलंक रूप अपार ॥

अनछिज तेज उदार ॥१॥३१॥

अनभिज रूप दुरंत ॥

सभ जगत भगत महंत ॥

जस तिलक भू भ्रित भानु ॥

दस चार चार निधान ॥२॥३२॥

अकलंक रूप अपार ॥

सभ लोक सोक बिदार ॥

कल काल करम बिहीन ॥

सभ करम धरम प्रबीन ॥३॥३३॥

अनखंड अतुल प्रताप ॥

सभ थापिओ जिह थाप ॥

अनखेद भेद अछेद ॥

मुखचार गावत बेद ॥४॥३४॥

जिह नेति निगम कहंत ॥

मुखचार बकत बिअंत ॥

अनभिज अतुल प्रताप ॥

अनखंड अमित अथाप ॥५॥३५॥

जिह कीन जगत पसार ॥

रचिओ बिचारि बिचारि ॥

अनंत रूप अखंड ॥

अतुल प्रताप प्रचंड ॥६॥३६॥

जिह अंड ते ब्रहमंड ॥

कीने सु चौदह खंड ॥

सभ कीन जगत पसार ॥

अबियकत रूप उदार ॥७॥३७॥

जिह कोटि इंद्र न्रिपार ॥

कई ब्रहम बिसन बिचार ॥

कई राम क्रिसन रसूल ॥

बिन भगति को न कबूल ॥८॥३८॥

कई सिंध बिंध नगिंद्र ॥

कई मछ कछ फनिंद्र ॥

कई देवि आदि कुमारि ॥

कई क्रिसन बिसन अवतार ॥९॥३९॥

कई इंद्र बार बुहार ॥

कई बेद अउ मुखचार ॥

कई रुद्र छुद्र सरूप ॥

कई राम क्रिसन अनूप ॥१०॥४०॥

कई कोक काबि भणंत ॥

कई बेद भेद कहंत ॥

कई सासत्र सिम्रिति बखान ॥

कहूं कथत ही सु पुरान ॥११॥४१॥

कई अगनहोत्र करंत ॥

कई उरध ताप दुरंत ॥

कई उरध बाहु संनिआस ॥

कहूं जोग भेस उदास ॥१२॥४२॥

कहूं निवली करम करंत ॥

कहूं पउन अहार दुरंत ॥

कहूं तीरथ दान अपार ॥

कहूं जग करम उदार ॥१३॥४३॥

कहूं अगनहोत्र अनूप ॥

कहूं निआइ राज बिभूत ॥

कहूं सासत्र सिम्रित रीति ॥

कहूं बेद सिउ बिप्रीति ॥१४॥४४॥

कई देसि देसि फिरंत ॥

कई एक ठौर इसथंत ॥

कहूं करत जल महि जाप ॥

कहूं सहत तन पर ताप ॥१५॥४५॥

कहूं बास बनहि करंत ॥

कहूं ताप तनहि सहंत ॥

कहूं ग्रिहसत धरम अपार ॥

कहूं राज नीति उदार ॥१६॥४६॥

कहूं रोग रहत अभरम ॥

कहूं करम करत अकरम ॥

कहूं सेख ब्रहम सरूप ॥

कहूं नीति राज अनूप ॥१७॥४७॥

कहूं रोग सोग बिहीन ॥

कहूं एक भगति अधीन ॥

कहूं रंक राजकुमार ॥

कहूं बेद बिआस अवतार ॥१८॥४८॥

कई ब्रहम बेद रटंत ॥

कई सेख नाम उचरंत ॥

बैरागि कहूं सनिआस ॥

कहूं फिरति रूप उदासि ॥१९॥४९॥

सभ करम फोकट जान ॥

सभ धरम निहफल मान ॥

बिनु एक नाम अधार ॥

सभ करम भरम बिचार ॥२०॥५०॥

त्वप्रसादि ॥ लघु नराज छंद ॥

जले हरी ॥

थले हरी ॥

उरे हरी ॥

बने हरी ॥१॥५१॥

गिरे हरी ॥

गुफे हरी ॥

छिते हरी ॥

नभे हरी ॥२॥५२॥

ईहा हरी ॥

ऊहा हरी ॥

जिमी हरी ॥

जमा हरी ॥३॥५३॥

अलेख हरी ॥

अभेख हरी ॥

अदोख हरी ॥

अद्वैख हरी ॥४॥५४॥

अकाल हरी ॥

अपाल हरी ॥

अछेद हरी ॥

अभेद हरी ॥५॥५५॥

अजंत्र हरी ॥

अमंत्र हरी ॥

सुतेज हरी ॥

अतंत्र हरी ॥६॥५६॥

अजाति हरी ॥

अपाति हरी ॥

अमित हरी ॥

अमात हरी ॥७॥५७॥

अरोग हरी ॥

असोग हरी ॥

अभरम हरी ॥

अकरम हरी ॥८॥५८॥

अजै हरी ॥

अभै हरी ॥

अभेद हरी ॥

अछेद हरी ॥९॥५९॥

अखंड हरी ॥

अभंड हरी ॥

अडंड हरी ॥

प्रचंड हरी ॥१०॥६०॥

अतेव हरी ॥

अभेव हरी ॥

अजेव हरी ॥

अछेव हरी ॥११॥६१॥

भजो हरी ॥

थपो हरी ॥

तपो हरी ॥

जपो हरी ॥१२॥६२॥

जलस तुही ॥

थलस तुही ॥

नदिस तुही ॥

नदस तुही ॥१३॥६३॥

ब्रिछस तुही ॥

पतस तुही ॥

छितस तुही ॥

उरधस तुही ॥१४॥६४॥

भजस तुअं ॥

भजस तुअं ॥

रटस तुअं ॥

ठटस तुअं ॥१५॥६५॥

जिमी तुही ॥

जमा तुही ॥

मकी तुही ॥

मका तुही ॥१६॥६६॥

अभू तुही ॥

अभै तुही ॥

अछू तुही ॥

अछै तुही ॥१७॥६७॥

जतस तुही ॥

ब्रतस तुही ॥

गतस तुही ॥

मतस तुही ॥१८॥६८॥

तुही तुही ॥

तुही तुही ॥

तुही तुही ॥

तुही तुही ॥१९॥६९॥

तुही तुही ॥

तुही तुही ॥

तुही तुही ॥

तुही तुही ॥२०॥७०॥

त्वप्रसादि ॥ कबितु ॥

खूक मलहारी, गज गदाहा बिभूत धारी; गिदूआ मसान बास करिओई करत है ॥

घुघू मटबासी, लगे डोलत उदासी म्रिग; तरवर सदीव मोन साधे ई मरत है ॥

बिंद के सधया, ताहि हीज की बडया देत; बंदरा सदीव, पाइ नागे ई फिरत है ॥

अंगना अधीन, काम क्रोध मै प्रबीन; एक गिआन के बिहीन, छीन कैसे कै तरत है ॥१॥७१॥

भूत बनचारी, छित छउना सभै दुधाधारी; पउन के अहारी, सु भुजंग जानीअतु है ॥

त्रिण के भछया, धन लोभ के तजया; ते तो गऊअन के जया, ब्रिखभया मानीअतु है ॥

नभ के उडया, ताहि पंछी की बडया देत; बगुला, बिड़ाल, ब्रिक धिआनी ठानीअतु है ॥

जेतो बडे गिआनी, तिनो जानी पै बखानी नाहि; ऐसे न प्रपंच, मनि भूलि आनीअतु है ॥२॥७२॥

भूमि के बसया, ताहि भूचरी कै जया कहै; नभ के उडया, सो चिरया कै बखानीऐ ॥

फल के भछया, ताहि बांदरी के जया कहै; आदिस फिरया, तेतो भूत के पछानीऐ ॥

जल के तरया कौ, गंगेरी सी कहत जग; आग के भछया, सो चकोर सम मानीऐ ॥

सूरज सिवया, ताहि कउल की बडया देत; चंद्रमा सिवया कौ, कवी कै पहिचानीऐ ॥३॥७३॥

नाराइण कछ मछ तेंदूआ कहत सभ; कउलनाभि कउल जिह ताल मै रहतु है ॥

गोपीनाथ गूजर गोपाल सबै धेनचारी; रिखीकेस नाम कै महंत लहीअत है ॥

माधव भवर, औ अटेरू कौ कनया नाम; कंस के बधया, जमदूत कहीअतु है ॥

मूड़ रूड़ि पीटत, न गूड़ता कौ भेद पावै; पूजत न ताहि, जा के राखे रहीअतु है ॥४॥७४॥

बिस्वपाल, जगत काल, दीन दिआल, बैरी साल; सदा प्रतिपाल, जम जाल ते रहतु है ॥

जोगी जटाधारी, सती साचे बड़े ब्रहमचारी; धिआन काज भूख पिआस, देह पै सहत है ॥

निउली करम जल होम, पावक पवन होम; अधो मुख, एक पाइ ठाढे निबहत है ॥

मानव, फनिंद, देव, दानव न पावै भेद; बेद औ कतेब, नेति नेति कै कहत है ॥५॥७५॥

नाचत फिरत मोर, बादर करत घोर; दामिनी अनेक भाउ, करिओ ई करत है ॥

चंद्रमा ते सीतल न, सूरज के तपत तेज; इंद्र सौ न राजा, भव भूमि कौ भरत है ॥

सिव से तपसी, आदि ब्रहमा से न बेदचारी; सनत कुमार सी, तपसिआ न अनत है ॥

गिआन के बिहीन, काल फास के अधीन सदा; जुगन की चउकरी, फिराए ई फिरत है ॥६॥७६॥

एक सिव भए, एक गए, एक फेर भए; रामचंद्र क्रिसन के अवतार भी अनेक है ॥

ब्रहमा अरु बिसनु केते, बेद औ पुरान केते; सिम्रित समूहन के, हुइ हुइ बितए है ॥

मोनदी मदार केते, असुनी कुमार केते; अंसा अवतार केते, काल बसि भए है ॥

पीर औ पिकाबर केते, गने न परत एते; भूमि ही ते हुइ कै, फेरि भूमि ही मिलए है ॥७॥७७॥

जोगी जती ब्रहमचारी, बडे बडे छत्रधारी; छत्र ही की छाइआ, कई कोस लौ चलत है ॥

बडे बडे राजन के, दाबति फिरति देस; बडे बडे राजन के, द्रप को दलतु है ॥

मान से महीप, अउ दिलीप कैसे छत्रधारी; बडो अभिमान, भुज दंड को करत है ॥

दारा से दलीसर, दुरजोधन से मानधारी; भोगि भोगि भूमि, अंति भूमि मै मिलत है ॥८॥७८॥

सिजदे करे अनेक, तोपची कपट भेस; पोसती अनेकदा निवावत है सीस कौ ॥

कहा भइओ मल, जौ पै काढत अनेक डंड; सो तौ न डंडौत असटांग अथितीस कौ ॥

कहा भइओ रोगी, जो पै डार्यो रह्यो उरधु मुखि; मन ते न मूंड, निहुरायो आदि ईस कौ ॥

कामना अधीन, सदा दामना प्रबीन; एक भावना बिहीन, कैसे पावै जगदीस कौ? ॥९॥७९॥

सीस पटकत, जा के कान मै खजूरा धसै; मूंड छटकत, मित्र पुत्र हूं के सोक सौ ॥

आक को चरया, फल फूल को भछया; सदा बन को भ्रमया, अउर दूसरो न बोक सौ ॥

कहा भयो भेड, जउ घसत सीस ब्रिछन सौ; माटी को भछया, बोल पूछ लीजै जोक सौ ॥

कामना अधीन, काम क्रोध मै प्रबीन; एक भावना बिहीन, कैसे भेटै परलोक सौ? ॥१०॥८०॥

नाचिओ ई करत मोर, दादर करत सोर; सदा घनघोर, घन करिओ ई करत है ॥

एक पाइ ठाढे सदा, बन मै रहत ब्रिछ; फूकि फूकि पाव, भूमि स्रावग धरत है ॥

पाहन अनेक जुग, एक ठउर बासु करै; काग अउर चील, देसि देसि बिचरत है ॥

गिआन के बिहीन, महा दान मै न हूजै लीन; भावना बिहीन, दीन कैसे कै तरत है? ॥११॥८१॥

जैसे एक स्वांगी, कहूं जोगीआ बैरागी बनै; कहूं सनिआस भेस बन कै दिखावई ॥

कहूं पउनहारी, कहूं बैठे लाइ तारी; कहूं लोभ की खुमारी सौ, अनेक गुन गावई ॥

कहूं ब्रहमचारी, कहूं हाथ पै लगावे बारी; कहूं डंडधारी हुइ कै, लोगन भ्रमावई ॥

कामना अधीन परिओ, नाचत है नाचन सो; गिआन के बिहीन, कैसे ब्रहम लोक पावई? ॥१२॥८२॥

पंच बार गीदर पुकारे, परे सीत काल; कुंचर अउ गदहा अनेकदा प्रकार ही ॥

कहा भयो? जो पै कलवत्र लीओ कासी बीच; चीरि चीरि चोरटा, कुठारन सो मारही ॥

कहा भइओ? फासी डारि बूडिओ जड़ गंगधारि; डारि डारि फासि, ठग मारि मारि डारही ॥

डूबे नरक धारि मूड़, गिआन के बिना बिचार; भावना बिहीन, कैसे गिआन को बिचारही? ॥१३॥८३॥

ताप के सहे ते, जो पै पाईऐ अताप नाथ; तापना अनेक तन घाइल सहत है ॥

जाप के कीए ते, जो पै पायत अजाप देव; पूदना सदीव तुही तुही उचरत है ॥

नभ के उडे ते, जो पै नाराइण पाईयत; अनल अकास पंछी, डोलबो करत है ॥

आग मै जरे ते गति, रांड की परत करि; पताल के बासी, किउ भुजंग न तरत है? ॥१४॥८४॥

कोऊ भइओ मुंडीआ, संनिआसी कोऊ जोगी भइओ; कोऊ ब्रहमचारी, कोऊ जती अनुमानबो ॥

हिंदू तुरक कोऊ, राफिजी इमाम साफी; मानस की जाति, सबै एकै पहचानबो ॥

करता करीम सोई, राजिक रहीम ओई; दूसरो न भेद कोई, भूलि भ्रम मानबो ॥

एक ही की सेव, सभ ही को गुरदेव एक; एक ही सरूप, सबै एकै जोति जानबो ॥१५॥८५॥

देहुरा मसीत सोई, पूजा औ निवाज ओई; मानस सबै एक पै, अनेक को भ्रमाउ है ॥

देवता, अदेव, जछ, गंध्रब, तुरक, हिंदू; निआरे निआरे देसन के भेस को प्रभाउ है ॥

एकै नैन, एकै कान, एकै देह, एकै बान; खाक बाद आतिस, औ आब को रलाउ है ॥

अलह अभेख सोई, पुरान अउ कुरान ओई; एक ही सरूप सबै, एक ही बनाउ है ॥१६॥८६॥

जैसे एक आग ते, कनूका कोटि आगि उठै; निआरे निआरे हुइ कै, फेरि आग मै मिलाहिंगे ॥

जैसे एक धूरि ते, अनेक धूरि पूरत है; धूरि के कनूका, फेर धूरि ही समाहिंगे ॥

जैसे एक नद ते, तरंग कोटि उपजत है; पानि के तरंग सबै, पानि ही कहाहिंगे ॥

तैसे बिस्व रूप ते, अभूत भूत प्रगट होइ; ताही ते उपजि, सबै ताही मै समाहिंगे ॥१७॥८७॥

केते कछ मछ, केते उन कउ करत भछ; केते अछ बछ, हुइ सपछ उड जाहिंगे ॥

केते नभ बीच, अछ पछ कउ करैंगे भछ; केतक प्रतछ हुइ, पचाइ खाइ जाहिंगे ॥

जल कहा, थल कहा, गगन के गउन कहा; काल के बनाए, सबै काल ही चबाहिंगे ॥

तेज जिउ अतेज मै, अतेज जैसे तेज लीन; ताही ते उपजि, सबै ताही मै समाहिंगे ॥१८॥८८॥

कूकत फिरत केते, रोवत मरत केते; जल मै डुबत केते, आग मै जरत है ॥

केते गंगबासी, केते मदीना मका निवासी; केतक उदासी के, भ्रमाए ई फिरत है ॥

करवत सहत केते, भूमि मै गडत केते; सूआ पै चड़त केते, दुख कउ भरत है ॥

गैन मै उडत केते, जल मै रहत केते; गिआन के बिहीन, जकि जारे ई मरत है ॥१९॥८९॥

सोधि हारे देवता, बिरोध हारे दानो बडे; बोधि हारे बोधक, प्रबोधि हारे जापसी ॥

घसि हारे चंदन, लगाइ हारे चोआ चार; पूज हारे पाहन, चढाइ हारे लापसी ॥

गाहि हारे गोरन, मनाइ हारे मड़ी मट; लीप हारे भीतन, लगाइ हारे छापसी ॥

गाइ हारे गंध्रब, बजाए हारे किंनर सभ; पचि हारे पंडित, तपंति हारे तापसी ॥२०॥९०॥

त्वप्रसादि ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥

न रागं न रंगं, न रूपं न रेखं ॥

न मोहं न क्रोहं, न द्रोहं न द्वैखं ॥

न करमं न भरमं, न जनमं न जातं ॥

न मित्रं न सत्रं, न पित्र न मातं ॥१॥९१॥

न नेहं न गेहं, न कामं न धामं ॥

न पुत्रं न मित्रं, न सत्रं न भामं ॥

अलेखं अभेखं, अजोनी सरूपं ॥

सदा सिधिदा, बुधिदा ब्रिधि रूपं ॥२॥९२॥

नही जान जाई, कछू रूप रेखं ॥

कहा बास ता को, फिरै कउन भेखं ॥

कहा नाम ता को, कहा कै कहावै ॥

कहा कै बखानो, कहै मो न आवै ॥३॥९३॥

न रोगं न सोगं, न मोहं न मातं ॥

न करमं न भरमं, न जनमं न जातं ॥

अद्वैखं अभेखं, अजोनी सरूपे ॥

नमो एक रूपे, नमो एक रूपे ॥४॥९४॥

परेअं परा, परम प्रगिआ प्रकासी ॥

अछेदं अछै, आदि अद्वै अबिनासी ॥

न जातं न पातं, न रूपं न रंगे ॥

नमो आदि अभंगे, नमो आदि अभंगे ॥५॥९५॥

किते क्रिसन से कीट, कोटै उपाए ॥

उसारे गड़े, फेरि मेटे बनाए ॥

अगाधे अभै, आदि अद्वै अबिनासी ॥

परेअं परा, परम पूरन प्रकासी ॥६॥९६॥

न आधं न बिआधं, अगाधं सरूपे ॥

अखंडित प्रताप, आदि अछै बिभूते ॥

न जनमं न मरनं, न बरनं न बिआधे ॥

अखंडे प्रचंडे, अदंडे असाधे ॥७॥९७॥

न नेहं न गेहं, सनेहं न साथे ॥

उदंडे अमंडे, प्रचंडे प्रमाथे ॥

न जाते न पाते, न सत्रे न मित्रे ॥

सु भूते भविखे, भवाने अचित्रे ॥८॥९८॥

न रायं न रंकं, न रूपं न रेखं ॥

न लोभं न छोभं, अभूतं अभेखं ॥

न सत्रं न मित्रं, न नेहं न गेहं ॥

सदैवं सदा, सरब सरबत्र सनेहं ॥९॥९९॥

न कामं न क्रोधं, न लोभं न मोहं ॥

अजोनी अछै, आदि अद्वै अजोहं ॥

न जनमं न मरनं, न बरनं न बिआधं ॥

न रोगं न सोगं, अभै निरबिखाधं ॥१०॥१००॥

अछेदं अभेदं, अकरमं अकालं ॥

अखंडं अभंडं, प्रचंडं अपालं ॥

न तातं न मातं, न जातं न कायं ॥

न नेहं न गेहं, न भरमं न भायं ॥११॥१०१॥

न रूपं न भूपं, न कायं न करमं ॥

न त्रासं न प्रासं, न भेदं न भरमं ॥

सदैवं सदा, सिधि ब्रिधं सरूपे ॥

नमो एक रूपे, नमो एक रूपे ॥१२॥१०२॥

न्रिउकतं प्रभा, आदि अनुकतं प्रतापे ॥

अजुगतं अछै, आदि अविकतं अथापे ॥

बिभुगतं अछै, आदि अछै सरूपे ॥

नमो एक रूपे, नमो एक रूपे ॥१३॥१०३॥

न नेहं न गेहं, न सोकं न साकं ॥

परेअं पवित्रं, पुनीतं अताकं ॥

न जातं न पातं, न मित्रं न मंत्रे ॥

नमो एक तंत्रे, नमो एक तंत्रे ॥१४॥१०४॥

न धरमं न भरमं, न सरमं न साके ॥

न बरमं न चरमं, न करमं न बाके ॥

न सत्रं न मित्रं, न पुत्रं सरूपे ॥

नमो आदि रूपे, नमो आदि रूपे ॥१५॥१०५॥

कहूं कंज के मंज, के भरमि भूले ॥

कहूं रंक के राज, के धरम अलूले ॥

कहूं देस के भेस, के धरम धामे ॥

कहूं राज के साज, के बाज तामे ॥१६॥१०६॥

कहूं अछ्र के पछ्र, के सिध साधे ॥

कहूं सिध के बुधि, के ब्रिध लाधे ॥

कहूं अंग के रंग, के संगि देखे ॥

कहूं जंग के रंग, के रंग पेखे ॥१७॥१०७॥

कहूं धरम के करम, के हरम जाने ॥

कहूं धरम के करम, के भरम माने ॥

कहूं चारु चेसटा, कहूं चित्र रूपं ॥

कहूं परम प्रग्या, कहूं सरब भूपं ॥१८॥१०८॥

कहूं नेह ग्रेहं, कहूं देह दोखं ॥

कहूं अउखदी, रोग के सोक सोखं ॥

कहूं देव बिद्या, कहूं दैत बानी ॥

कहूं जछ गंध्रब, किंनर कहानी ॥१९॥१०९॥

कहूं राजसी, सातकी तामसी हो ॥

कहूं जोग बिद्या, धरे तापसी हो ॥

कहूं रोग हरता, कहूं जोग जुगतं ॥

कहूं भूमि की भुगत मै, भरम भुगतं ॥२०॥११०॥

कहूं देव कंनिआ, कहूं दानवी हो ॥

कहूं जछ बिदिआ, धरे मानवी हो ॥

कहूं राजसी हो, कहूं राज कंनिआ ॥

कहूं स्रिसिट की प्रिसट की, रिसट पंनिआ ॥२१॥१११॥

कहूं बेद बिद्या, कहूं बिओम बानी ॥

कहूं कोक की, काबि कथै कहानी ॥

कहूं अद्र सारं, कहूं भद्र रूपं ॥

कहूं मद्र बानी, कहूं छुद्र सरूपं ॥२२॥११२॥

कहूं बेद बिदिआ, कहूं काबि रूपं ॥

कहूं चेसटा चार, चित्रं सरूपं ॥

कहूं, परम पुरान को पार पावै ॥

कहूं, बैठि कुरान के गीत गावै ॥२३॥११३॥

कहूं सुध सेखं, कहूं ब्रहम धरमं ॥

कहूं ब्रिध अवसथा, कहूं बाल करमं ॥

कहूं जुआ सरूपं, जरा रहत देहं ॥

कहूं नेह देहं, कहूं तिआग ग्रेहं ॥२४॥११४॥

कहूं जोग भोगं, कहूं रोग रागं ॥

कहूं रोग हरता, कहूं भोग तिआगं ॥

कहूं राज साजं, कहूं राज रीतं ॥

कहूं पूरण प्रगिआ, कहूं परम प्रीतं ॥२५॥११५॥

कहूं, आरबी तोरकी पारसी हो ॥

कहूं, पहलवी पसतवी संसक्रिती हो ॥

कहूं देस भाखिआ, कहूं देव बानी ॥

कहूं राज बिदिआ, कहूं राजधानी ॥२६॥११६॥

कहूं मंत्र बिदिआ, कहूं तंत्र सारं ॥

कहूं जंत्र रीतं, कहूं ससत्र धारं ॥

कहूं होम पूजा, कहूं देव अरचा ॥

कहूं पिंगुला, चारणी गीत चरचा ॥२७॥११७॥

कहूं बीन बिदिआ कहूं गान गीतं ॥

कहूं मलेछ भाखिआ, कहूं बेद रीतं ॥

कहूं न्रित बिदिआ, कहूं नाग बानी ॥

कहूं गारड़ू, गूड़ कथे कहानी ॥२८॥११८॥

कहूं, अछरा पछरा मछरा हो ॥

कहूं बीर बिदिआ, अभूतं प्रभा हो ॥

कहूं छैल छाला, धरे छत्रधारी ॥

कहूं राज साजं, धिराजाधिकारी ॥२९॥११९॥

ਅਥ ਗਿਆਨ ਪ੍ਰਬੋਧ ॥

अथ गिआन प्रबोध ॥ नमो नाथ पूरे, सदा सिध दाता ॥

अछेदी अछै, आदि अद्वै बिधाता ॥

न त्रसतं न ग्रसतं, समसतं सरूपे ॥

नमसतं नमसतं, तुअसतं अभूते ॥३०॥१२०॥

त्वप्रसादि ॥ पाधड़ी छंद ॥

अब्यकत तेज, अनभउ प्रकास ॥

अछै सरूप, अद्वै अनास ॥

अनतुट तेज, अनखुट भंडार ॥

दाता दुरंत, सरबं प्रकार ॥१॥१२१॥

अनभूत तेज, अनछिज गात ॥

करता सदीव, हरता सनात ॥

आसन अडोल, अनभूत करम ॥

दाता दइआल, अनभूत धरम ॥२॥१२२॥

जिह सत्र मित्र, नही जनम जाति ॥

जिह पुत्र भ्रात, नही मित्र मात ॥

जिह करम भरम, नही धरम धिआन ॥

जिह नेह गेह, नही बिओतबान ॥३॥१२३॥

जिह जाति पाति, नही सत्र मित्र ॥

जिह नेह गेह, नही चिहन चित्र ॥

जिह रंग रूप, नही राग रेख ॥

जिह जनम जाति, नही भरम भेख ॥४॥१२४॥

जिह करम भरम, नही जाति पाति ॥

नही नेह गेह, नही पित्र मात ॥

जिह नाम थाम, नही बरग बिआध ॥

जिह रोग सोग, नही सत्र साध ॥५॥१२५॥

जिह त्रास वास, नही देह नास ॥

जिह आदि अंत, नही रूप रासि ॥

जिह रोग सोग, नही जोग जुगति ॥

जिह त्रास आस, नही भूमि भुगत ॥६॥१२६॥

जिह काल बिआल, कटिओ न अंग ॥

अछै सरूप, अखै अभंग ॥

जिह नेति नेति, उचरंत बेद ॥

जिह अलख रूप, कथत कतेब ॥७॥१२७॥

जिह अलख रूप, आसन अडोल ॥

जिह अमित तेज, अछै अतोल ॥

जिह धिआन काज, मुनि जन अनंत ॥

कई कलप, जोग साधत दुरंत ॥८॥१२८॥

तन सीत घाम, बरखा सहंत ॥

कई कलप, एक आसन बितंत ॥

कई जतन, जोग बिदिआ बिचारि ॥

साधंत तदपि, पावत न पार ॥९॥१२९॥

कई उरध बाह, देसन भ्रमंत ॥

कई उरध मध, पावक झुलंत ॥

कई सिम्रित सासत्र, उचरंत बेद ॥

कई कोक काबि, कथंत कतेब ॥१०॥१३०॥

कई अगनिहोत्र, कई पउन अहार ॥

कई करत कोट, म्रित को अहार ॥

कई करत साक, पै पत्र भछ ॥

नही तदपि देव, होवत प्रतछ ॥११॥१३१॥

कई गीत गान, गंध्रब रीति ॥

कई बेद सासत्र, बिदिआ प्रतीति ॥

कहूं बेद रीति, जग आदि करम ॥

कहूं अगनिहोत्र, कहूं तीरथ धरम ॥१२॥१३२॥

कई देसि देसि, भाखा रटंत ॥

कई देसि देसि, बिदिआ पड़ंत ॥

कई करत, भांति भातन बिचार ॥

नही नैकु तासु, पायत न पार ॥१३॥१३३॥

कई तीरथ तीरथ, भरमत सु भरम ॥

कई अगनिहोत्र, कई देव करम ॥

कई करत, बीर बिदिआ बिचार ॥

नही तदपि तासु, पायत न पार ॥१४॥१३४॥

कहूं राजरीति, कहूं जोग धरम ॥

कई सिम्रित सासत्र, उचरत सुकरम ॥

निउली आदि करम, कहूं हसति दान ॥

कहूं अस्वमेध, मख को बखान ॥१५॥१३५॥

कहूं करत, ब्रहम बिदिआ बिचार ॥

कहूं जोग रीति, कहूं बिरधि चारि ॥

कहूं करत, जछ गंधरब गान ॥

कहूं धूप दीप, कहूं अरघ दान ॥१६॥१३६॥

कहूं पित्र करम, कहूं बेद रीति ॥

कहूं न्रित नाच, कहूं गान गीत ॥

कहूं करत सासत्र सिम्रिति उचार ॥

कई भजत, एक पग निराधार ॥१७॥१३७॥

कई नेह देह, कई गेह वास ॥

कई भ्रमत देस देसन उदास ॥

कई जल निवास, कई अगनि ताप ॥

कई जपत, उरध लटकंत जाप ॥१८॥१३८॥

कई जपत जोग, कलपं प्रजंत ॥

नही तदपि तास, पायत न अंत ॥

कई करत, कोट बिदिआ बिचार ॥

नही तदपि, दिसटि देखे मुरारि ॥१९॥१३९॥

बिनु भगति सकति, नही परत पान ॥

बहु करत होम, अरु जग दान ॥

बिनु एक नामु, इक चित लीन ॥

फोकटो सरब, धरमा बिहीन ॥२०॥१४०॥

त्वप्रसादि ॥ तोटक छंद ॥

जै ज्मपहि जुगण जूह जुअं ॥

भै क्मपहि मेरु पयाल भुअं ॥

तप तापस सरब जलेरु थलं ॥

धंनि उचरत इंद्र कुमेर बलं ॥१॥१४१॥

अनखेद सरूप अभेद अभिअं ॥

अनखंड अभूत अछेद अछिअं ॥

अनकाल अपाल दिआल असुअं ॥

जिह ठटीअं मेर अकास भुअं ॥२॥१४२॥

अनखंड अमंड प्रचंड नरं ॥

जिह रचीअं देव अदेव बरं ॥

सभ कीनी दीन जमीनु जमां ॥

जिह रचीअं सरब मकीनु मकां ॥३॥१४३॥

जिह राग न रूप न रेख रुखं ॥

जिह ताप न साप न सोक सुखं ॥

न रोग न सोग न भोग भुयं ॥

जिह खेद न भेद न छेद छयं ॥४॥१४४॥

जिह जाति न पाति न मात पितं ॥

जिह रचीअं छत्री छत्र छितं ॥

जिह राग न रेख न रोग भणं ॥

जिह द्वैख न दाग न दोख गणं ॥५॥१४५॥

जिह अंडह ते ब्रहमंड रचिओ ॥

दसचार करी नव खंड सचिओ ॥

रज तामस तेज अतेज कीओ ॥

अनभउ पद आप प्रचंड लीओ ॥६॥१४६॥

स्रिअ सिंधरु बिंध नगिंध नगं ॥

स्रिअ जछ गंध्रब फणिंद भुजं ॥

रचि देव अदेव अभेव नगं ॥

नरपाल न्रिपाल कराल त्रिगं ॥७॥१४७॥

कई कीट पतंग भुजंग नरं ॥

रचि अंडज सेतज उतभुजं ॥

कीए देव अदेव सराध पितं ॥

अनखंड प्रताप प्रचंड गतं ॥८॥१४८॥

प्रभ जाति न पाति न जोति जुतं ॥

जिह तात न मात न भ्रात सुतं ॥

जिह रोग न सोग न भोग भुअं ॥

जिह ज्मपहि किंनर जछ जुअं ॥९॥१४९॥

नर, नारि, नपुंसक जाहि कीए ॥

गण किंनर जछ भुजंग दीए ॥

गज बाज रथादिक पाति गनं ॥

भवि भूत भविख भवान तुअं ॥१०॥१५०॥

जिह अंडज सेतज जेर रजं ॥

रचि भूमि अकास पताल जलं ॥

रचि पावक पउन प्रचंड बली ॥

बनि जासु कीओ फल फूल कली ॥११॥१५१॥

भूअ मेरु अकास निवास छितं ॥

रचि रोज इकादस चंद ब्रितं ॥

दुति चंद दिनीसर दीप दई ॥

जिह पावक पउन प्रचंड मई ॥१२॥१५२॥

जिह खंड अखंड प्रचंड कीए ॥

जिह छत्रि उपाइ छिपाइ दीए ॥

जिह लोक चतुरदस चारु रचे ॥

नर गंध्रब देव अदेव सचे ॥१३॥१५३॥

अनधूत अभूत अछूत मतं ॥

अनगाधि अब्याधि अनादि गतं ॥

अनखेद अभेद अछेद नरं ॥

जिह चारु चतुरदस चक्र फिरं ॥१४॥१५४॥

जिह राग न रंग न रेख रुगं ॥

जिह सोग न भोग न जोग जुगं ॥

भूअ भंजन गंजन आदि सिरं ॥

जिह बंदत देव अदेव नरं ॥१५॥१५५॥

गण किंनर जछ भुजंग रचे ॥

मणि माणिक मोती लाल सचे ॥

अनभंज प्रभा अनगंज ब्रितं ॥

जिह पार न पावत पूर मतं ॥१६॥१५६॥

अनखंड सरूप अडंड प्रभा ॥

जै ज्मपत बेद पुरान सभा ॥

जिह बेद कतेब अनंत कहै ॥

जिह भूत अभूत न भेद लहै ॥१७॥१५७॥

जिह बेद पुरान कतेब जपै ॥

सुत सिंधु अधोमुख ताप तपै ॥

कई कलपन लौ तप ताप करै ॥

नही नैकु क्रिपानिधि पानि परै ॥१८॥१५८॥

जिह फोकट धरम सभै तज है ॥

इक चित क्रिपानिधि को भज है ॥

तेऊ या भव सागर को तर है ॥

भवि भूलि न देह पुनर धर है ॥१९॥१५९॥

इक नाम बिना नही कोटि ब्रिती ॥

इम बेद उचारत सारसुती ॥

जोऊ वा रस के चसके रस है ॥

तेऊ भूलि न काल फंधा फस है ॥२०॥१६०॥

त्वप्रसादि ॥ नराज छंद ॥

अगंज आदि देव है; अभंज भंज जानीऐ ॥

अभूत भूत है सदा; अगंज गंज मानीऐ ॥

अदेव देव है सदा; अभेव भेव नाथ है ॥

समसत सिधि ब्रिधिदा; सदीव सरब साथ है ॥१॥१६१॥

अनाथ नाथ नाथ है; अभंज भंज है सदा ॥

अगंज गंज गंज है; सदीव सिधि ब्रिधिदा ॥

अनूप रूप सरूप है; अछिज तेज मानीऐ ॥

सदीव सिधि सुधि दा; प्रताप पत्र जानीऐ ॥२॥१६२॥

न राग रंग रूप है; न रोग राग रेख है ॥

अदोख अदाग अदग है; अभूत अभ्रम अभेख है ॥

न तात मात जाति है; न पाति चिहन बरन है ॥

अदेख असेख अभेख है; सदीव बिसु भरन है ॥३॥१६३॥

बिस्व्मभर बिसुनाथ है; बिसेख बिस्व भरन है ॥

जिमी जमान के बिखै; सदीव करम भरम है ॥

अद्वैख है अभेख है; अलेख नाथ जानीऐ ॥

सदीव सरब ठउर मै; बिसेख आन मानीऐ ॥४॥१६४॥

न जंत्र मै न तंत्र मै; न मंत्र बसि आवई ॥

पुरान औ कुरान; नेति नेति कै बतावई ॥

न करम मै न धरम मै; न भरम मै बताईऐ ॥

अगंज आदि देव है; कहो सु कैसि पाईऐ? ॥५॥१६५॥

जिमी जमान के बिखै; समसत एक जोति है ॥

न घाट है न बाढ है; न घाट बाढ होत है ॥

न हान है न बान है; समान रूप जानीऐ ॥

मकीन अउ मकानि; अप्रमान तेज मानीऐ ॥६॥१६६॥

न देह है न गेह है; न जाति है न पाति है ॥

न मंत्रि है न मित्र है; न तात है न मात है ॥

न अंग है न रंग है; न संग है न साथ है ॥

न दोख है न दाग है; न द्वैख है न देह है ॥७॥१६७॥

न सिंघ है न स्यार है; न राउ है न रंक है ॥

न मान है न मौत है; न साक है न संक है ॥

न जछ है न गंध्रब है; न नरु है न नारि है ॥

न चोर है न साह है; न साह को कुमार है ॥८॥१६८॥

न नेह है न गेह है; न देह को बनाउ है ॥

न छल है न छिद्र है; न छल को मिलाउ है ॥

न तंत्र है न मंत्र है; न जंत्र को सरूप है ॥

न राग है न रंग है; न रेख है न रूप है ॥९॥१६९॥

न जंत्र है न मंत्र है; न तंत्र को बनाउ है ॥

न छल है न छिद्र है; न छाइआ को मिलाउ है ॥

न राग है न रंग है; न रूप है न रेख है ॥

न करम है न धरम है; अजनम है अभेख है ॥१०॥१७०॥

न तात है न मात है; अख्याल अखंड रूप है ॥

अछेद है अभेद है; न रंक है न भूप है ॥

परे है पवित्र है; पुनीत है पुरान है ॥

अगंज है अभंज है; करीम है कुरान है ॥११॥१७१॥

अकाल है अपाल है; खिआल है अखंड है ॥

न रोग है न सोग है; न भेद है न भंड है ॥

न अंग है न रंग है; न संग है न साथ है ॥

प्रिया है पवित्र है; पुनीत है प्रमाथ है ॥१२॥१७२॥

न सीत है न सोक है; न घ्राम है न घाम है ॥

न लोभ है न मोह है; न क्रोध है न काम है ॥

न देव है न दैत है; न नर को सरूप है ॥

न छल है न छिद्र है; न छिद्र की बिभूत है ॥१३॥१७३॥

न काम है न क्रोध है; न लोभ है न मोह है ॥

न द्वैख है न भेख है; न दुई है न द्रोह है ॥

न काल है न बाल है; सदीव दिआल रूप है ॥

अगंज है अभंज है; अभरम है अभूत है ॥१४॥१७४॥

अछेद छेद है सदा; अगंज गंज गंज है ॥

अभूत भेख है बली; अरूप राग रंग है ॥

न द्वैख है न भेख है; न काम क्रोध करम है ॥

न जाति है न पाति है; न चित्र चिहन बरन है ॥१५॥१७५॥

बिअंत है अनंत है; अनंत तेज जानीऐ ॥

अभूमि अभिज है सदा; अछिज तेज मानीऐ ॥

न आधि है न बिआधि है; अगाध रूप लेखीऐ ॥

अदोख है अदाग है; अछै प्रताप पेखीऐ ॥१६॥१७६॥

न करम है न भरम है; न धरम को प्रभाउ है ॥

न जंत्र है न तंत्र है; न मंत्र को रलाउ है ॥

न छल है न छिद्र है; न छिद्र के सरूप है ॥

अभंग है अनंग है; अगंज सी बिभूति है ॥१७॥१७७॥

न काम है न क्रोध है; न लोभ मोह कार है ॥

न आधि है न गाध है; न बिआध को बिचार है ॥

न रंग राग रूप है; न रूप रेख रार है ॥

न हाउ है न भाउ है; न दाउ को प्रकार है ॥१८॥१७८॥

गजाधपी नराधपी; करंत सेव है सदा ॥

सितसपती तपसपती; बनसपती जपस सदा ॥

अगसत आदि जे बड़े; तपसपती बिसेखीऐ ॥

बिअंत बिअंत बिअंत को; करंत पाठ पेखीऐ ॥१९॥१७९॥

अगाध आदि देव की; अनादि बात मानीऐ ॥

न जाति पाति मंत्रि मित्र; सत्र सनेह जानीऐ ॥

सदीव सरब लोक को; क्रिपाल खिआल मै रहै ॥

तुरंत द्रोह देह के; अनंत भांति सो दहै ॥२०॥१८०॥

त्वप्रसादि ॥ रूआमल छंद ॥

रूप राग न रेख रंग न; जनम मरन बिहीन ॥

आदि नाथ अगाध पुरख; सु धरम करम प्रबीन ॥

जंत्र मंत्र न तंत्र जा को; आदि पुरख अपार ॥

हसति कीट बिखै बसै; सब ठउर मै निरधार ॥१॥१८१॥

जाति पाति न तात जा को; मंत्र मात न मित्र ॥

सरब ठउर बिखै रमिओ; जिह चक्र चिहन न चित्र ॥

आदि देव उदार मूरति; अगाध नाथ अनंत ॥

आदि अंति न जानीऐ; अबिखाद देव दुरंत ॥२॥१८२॥

देव भेव न जानही; जिस मरम बेद कतेब ॥

सनक अउ सनकेसु नंदन; पावही न हसेब ॥

जछ किंनर मछ मानस; मुरग उरग अपार ॥

नेति नेति पुकारही; सिव सक्र औ मुखचार ॥३॥१८३॥

सरब सपत पतार के तरि; जापही जिह जाप ॥

आदि देव अगाधि तेज; अनादि मूरति अताप ॥

जंत्र मंत्र न आवई करि; तंत्र मंत्र न कीन ॥

सरब ठउर रहिओ बिराज; धिराज राज प्रबीन ॥४॥१८४॥

जछ गंध्रब देव दानो; न ब्रहम छत्रीअन माहि ॥

बैसनं के बिखै बिराजै; सूद्र भी वह नाहि ॥

गूड़ गउड न भील भीकर; ब्रहम सेख सरूप ॥

राति दिवस न मध उरध; न भूमि अकास अनूप ॥५॥१८५॥

जाति जनम न काल करम न; धरम करम बिहीन ॥

तीरथ जात्र न देव पूजा; गोर के न अधीन ॥

सरब सपत पतार के तरि; जानीऐ जिह जोति ॥

सेस नाम सहंसफनि नहि; नेत पूरन होत ॥६॥१८६॥

सोधि सोधि हटे सभै सुर; बिरोध दानव सरब ॥

गाइ गाइ हटे गंध्रब; गवाइ किंनर गरब ॥

पड़त पड़त थके महा कबि; गड़त गाड़ अनंत ॥

हार हार कहिओ सभू मिलि; नाम नाम दुरंत ॥७॥१८७॥

बेद भेद न पाइओ; लखिओ न सेब कतेब ॥

देव दानो मूड़ मानो; जछ न जानै जेब ॥

भूत भब भवान भूपति; आदि नाथ अनाथ ॥

अगनि बाइ जले थले महि; सरब ठउर निवास ॥८॥१८८॥

देह गेह न नेह सनेहि; अबेह नाक अजीत ॥

सरब गंजन सरब भंजन; सरब ते अनभीत ॥

सरब करता सरब हरता; सरब दयाल अद्वैख ॥

चक्र चिहन न बरन जा को; जाति पाति न भेख ॥९॥१८९॥

रूप रेख न रंग जा को; राग रूप न रंग ॥

सरब लाइक, सरब घाइक; सरब ते अनभंग ॥

सरब दाता, सरब गिआता; सरब को प्रतिपाल ॥

दीनबंधु दयाल सुआमी; आदि देव अपाल ॥१०॥१९०॥

दीनबंधु प्रबीन स्रीपति; सरब को करतार ॥

बरन चिहन न चक्र जा को; चक्र चिहन अकार ॥

जाति पाति न गोत्र गाथा; रूप रेख न बरन ॥

सरब दाता, सरब ग्याता; सरब भूअ को भरन ॥११॥१९१॥

दुसट गंजन, सत्र भंजन; परम पुरख प्रमाथ ॥

दुसट हरता, स्रिसट करता; जगत मै जिह गाथ ॥

भूत भब भविख भवान; प्रमान देव अगंज ॥

आदि अंत अनादि स्रीपति; परम पुरख अभंज ॥१२॥१९२॥

धरम के अन क्रम जेतक; कीन तउन पसार ॥

देव अदेव गंधरब किंनर; मछ कछ अपार ॥

भूमि अकास जले थले महि; मानीऐ जिह नामु ॥

दुसट हरता पुसट करता; स्रिसटि हरता काम ॥१३॥१९३॥

दुसट हरना स्रिसट करना; दयाल लाल गोबिंद ॥

मित्र पालक, सत्र घालक; दीन दयाल मुकंद ॥

अघउ डंडण, दुसट खंडण; काल हूं के काल ॥

दुसट हरणं, पुसट करणं; सरब के प्रतिपाल ॥१४॥१९४॥

सरब करता, सरब हरता; सरब के अनकाम ॥

सरब खंडण, सरब दंडण; सरब के निज भाम ॥

सरब भुगता, सरब जुगता; सरब करम प्रबीन ॥

सरब खंडण, सरब दंडण; सरब करम अधीन ॥१५॥१९५॥

सरब सिम्रितन, सरब सासत्रन; सरब बेद बिचार ॥

दुसट हरता, बिस्व भरता; आदि रूप अपार ॥

दुसट दंडण, पुसट खंडण; आदि देव अखंड ॥

भूमि अकास जले थले महि; जपत जाप अमंड ॥१६॥१९६॥

स्रिसटचार बिचार जेते; जानीऐ सबिचार ॥

आदि देव अपार स्रीपति; दुसट पुसट प्रहार ॥

अंन दाता, ग्यान गिआता; स्रब मान महिंद्र ॥

बेद बिआस करे कई दिन; कोटि इंद्र उपिंद्र ॥१७॥१९७॥

जनम जाता, करम ग्याता; धरम चारु बिचार ॥

बेद भेव न पावई; सिव रुद्र अउ मुखचार ॥

कोटि इंद्र उपइंद्र बिआस; सनक सनत कुमार ॥

गाइ गाइ थके सभे गुन; चक्रत भे मुखचार ॥१८॥१९८॥

आदि अंति न मध जा को; भूत भब भवान ॥

सति दुआपर त्रितीआ कलिजुग; चत्र काल प्रधान ॥

धिआइ धिआइ थके महा मुन; गाइ गंध्रब अपार ॥

हारि हारि थके सभै; नही पाईऐ तिह पार ॥१९॥१९९॥

नारद आदिक बेद बिआसक; मुनि महान अनंत ॥

धिआइ धिआइ थके सभै; करि कोटि कसट दुरंत ॥

गाइ गाइ थके गंध्रब; नाचि अपछ्र अपार ॥

सोधि सोधि थके महा सुर; पाइओ नहि पार ॥२०॥२००॥

त्वप्रसादि ॥ दोहरा ॥

एक समे स्री आतमा; उचरिओ मति सिउ बैन ॥

सभ प्रताप जगदीस को; कहहु सकल बिधि तैन ॥१॥२०१॥

को आतमा सरूप है? कहा स्रिसटि को बिचार? ॥

कउन धरम? को करम है? कहहु सकल बिसथार ॥२॥२०२॥

कहा जीतब? कहा मरन है? कवन सुरग? कहा नरक ॥

को सुघड़ा? को मूड़ता? कहा तरक अवतरक? ॥३॥२०३॥

को निंदा? जस है कवन? कवन पाप? कहा धरम ॥

कवन जोग? को भोग है? कवन करम अपकरम? ॥४॥२०४॥

कहहु, सुस्रम का सो कहहि? दम को कहा कहंत? ॥

को सूरा? दाता कवन? कहहु तंत को मंत ॥५॥२०५॥

कहा रंक? राजा कवन? हरख सोग है कवन? ॥

को रोगी? रागी कवन? कहहु ततु मुहि तवन ॥६॥२०६॥

कवन रिसट? को पुसट है? कहा स्रिसट को बिचार? ॥

कवन ध्रिसट? को भ्रिसट है? कहो सकल बिसथार ॥७॥२०७॥

कहा करम को करम है? कहा भरम को नास ॥

कहा चितन की चेसटा? कहा अचेत प्रकास? ॥८॥२०८॥

कहा नेम? संजम कहा? कहा गिआन अगिआन? ॥

को रोगी? सोगी कवन? कहा धरम की हानि? ॥९॥२०९॥

को सूरा? सुंदर कवन? कहा जोग को सार? ॥

को दाता? गिआनी कवन? कहो बिचार अबिचारि ॥१०॥२१०॥

त्वप्रसादि ॥ दीघर त्रिभंगी छंद ॥

दुरजन दल दंडण, असुर बिहंडण; दुसट निकंदण आदि ब्रिते ॥

चछरासुर मारण, पतित उधारण; नरक निवारण गूड़ गते ॥

अछै अखंडे, तेज प्रचंडे; खंड उदंडे, अलख मते ॥

जै जै होसी, महिखासुरि मरदन; रम कपरदन, छत्र छिते ॥१॥२११॥

आसुरी बिहंडण, दुसट निकंदण; पुसट उदंडण, रूप अते ॥

चंडासुर चंडण, मुंड बिहंडण; धूम्र बिधुंसण, महिख मते ॥

दानव प्रहारन, नरक निवारन; अधम उधारन, उरध अधे ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; रम कपरदन, आदि ब्रिते ॥२॥२१२॥

डावरू डवंकै, बबर बवंकै; भुजा फरंकै, तेज बरं ॥

लंकुड़ीआ फाधै, आयुध बाधै; सैन बिमरदन, काल असुरं ॥

असटायुध चमकै, भूखन दमकै; अति सित झमकै, फंक फंणं ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; रम कपरदन, दैत जिणं ॥३॥२१३॥

चंडासुर चंडण, मुंड बिमुंडण; खंड अखंडण खून खिते ॥

दामिनी दमंकण, धुजा फरंकण; फणी फुंकारण, जोध जिते ॥

सर धार बिबरखण, दुसट प्रकरखण; पुसट प्रहरखण, दुसट मथे ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; भूमि आकास, तल उरध अधे ॥४॥२१४॥

दामिनी प्रहासन, सुछबि निवासन; स्रिसटि प्रकासन, गूड़ गते ॥

रकतासुर आचन, जुध प्रमाचन; न्रिदै नराचन, धरम ब्रिते ॥

स्रोणंत अचिंती, अनल बिवंती; जोग जयंती, खड़ग धरे ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; पाप बिनासन, धरम करे ॥५॥२१५॥

अघ ओघ निवारन, दुसट प्रजारन; स्रिसटि उबारन, सुध मते ॥

फणीअर फुंकारन, बाघ बुकारण; ससत्र प्रहारण, साध मते ॥

सैहथी सनाहनि, असट प्रबाहन; बोल निबाहन, तेज अतुलं ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; भूमि, अकास, पताल, जलं ॥६॥२१६॥

चाचरि चमकारन, चिछुर हारन; धूम धुकारन, द्रप मथे ॥

दाड़वी प्रदंते, जोग जयंते; मनुज मथंते, गूड़ कथे ॥

करम प्रणासन, चंद प्रकासन; सूरज प्रतेजन, असटभुजे ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; भरम बिनासन, धरम धुजे ॥७॥२१७॥

घुंघरू घमंकण, ससत्र झमंकण; फणीअर फुंकारण, धरम धुजे ॥

असटाट प्रहासन, स्रिसटि निवासन; दुसट प्रणासन, चक्र गते ॥

केसरी प्रवाहे, सुध सनाहे; अगम अथाहे, एक ब्रिते ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; आदि कुमारि, अगाध ब्रिते ॥८॥२१८॥

सुर नर मुनि बंदन, दुसट निकंदन; भ्रिसट बिनासन, म्रित मथे ॥

कावरू कुमारे, अधम उधारे; नरक निवारे, आदि कथे ॥

किंकणी प्रसोहणि, सुर नर मोहणि; सिंघारोहणि, बितल तले ॥

जै जै होसी, सभ ठउरि निवासन; बाइ, पताल, अकास, अनले ॥९॥२१९॥

संकटी निवारण, अधम उधारण; तेज प्रकरखण, तुंद तबे ॥

दुख दोख दहंती, जुआल जयंती; आदि अनादि अगाध अछे ॥

सुधता समरपण, तरक बितरकण; तपत प्रतापण, जपत जिवै ॥

जै जै होसी, ससत्र प्रकरखण; आदि अनील अगाधि अभै ॥१०॥२२०॥

चंचला चखंगी, अलक भुजंगी; तुंद तुरंगण, तिछ सरे ॥

करकसा कुठारे, नरक निवारे; अधम उधारे, तूर भजे ॥

दामिनी दमंके, केहरि लंके; आदि अतंके, क्रूर कथे ॥

जै जै होसी, रकतासुर खंडण; सु्मभ चक्रतन, निसु्मभ मथे ॥११॥२२१॥

बारिज बिलोचन, ब्रितन बिमोचन; सोच बिसोचन, कउच कसे ॥

दामिनी प्रहासे, सुक सर नासे; सुब्रित सुबासे, दुसट ग्रसे ॥

चंचला प्रिअंगी, बेद प्रसंगी; तेज तुरंगी, खंड असुरं ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; आदि अनादि, अगाधि उरधं ॥१२॥२२२॥

घंटका बिराजै, रुणझुण बाजै; भ्रम भै भाजै, सुनत सुरं ॥

कोकिल सुनि लाजै, किलबिख भाजै; सुख उपराजै, मधि उरं ॥

दुरजन दल दझै, मन तन रिझै; सभै न भजै, रोहरणं ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; चंड चक्रतन, आदि गुरं ॥१३॥२२३॥

चाचरी प्रजोधन, दुसट बिरोधन; रोस अरोधन, क्रूर ब्रिते ॥

धूम्राछ बिधुंसन, प्रलै प्रजुंसन; जगि बिधुंसन, सुध मते ॥

जालपा जयंती, सत्र मथंती; दुसट प्रदाहन, गाड़ मते ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; आदि जुगादि, अगाधि गते ॥१४॥२२४॥

खत्रिआणि खतंगी, अभै अभंगी; आदि अनंगी, अगाधि गते ॥

ब्रिड़लाछ बिहंडण, चछर दंडण; तेज प्रचंडण, आदि ब्रिते ॥

सुर नर प्रतिपारण, पतित उधारण; दुसट निवारण, दोख हरे ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; बिस बिधुंसन, स्रिसटि करे ॥१५॥२२५॥

दामिनी प्रकासे, उनत नासे; जोति प्रकासे, अतुल बले ॥

दानवी प्रकरखण, सर वर वरखण; दुसट प्रधरखण, बितल तले ॥

असटायुध बाहण, बोल निबाहण; संत पनाहण, गूड़ गते ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; आदि अनादि, अगाधि ब्रिते ॥१६॥२२६॥

दुख दोख प्रभछण, सेवक रछण; संत प्रतछण, सुध सरे ॥

सारंग सनाहे, दुसट प्रदाहे; अरि दल गाहे, दोख हरे ॥

गंजन गुमाने, अतुल प्रवाने; संति जमाने, आदि अंते ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; साध प्रदछन, दुसट हंते ॥१७॥२२७॥

कारण करीली, गरब गहीली; जोति जितीली, तुंद मते ॥

असटाइध चमकण, ससत्र झमकण; दामिनि दमकण, आदि ब्रिते ॥

डुकडुकी डमंकै, बाघ बबंकै; भुजा फरंकै, सुध गते ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; आदि जुगादि, अनादि मते ॥१८॥२२८॥

चछरासुर मारण, नरक निवारण; पतित उधारण, एक भटे ॥

पापान बिहंडन, दुसट प्रचंडण; खंड अखंडण, काल कटे ॥

चंद्रानन चारै, नरक निवारै; पतित उधारै, मुंड मथे ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; धूम्र बिधुंसन, आदि कथे ॥१९॥२२९॥

रकतासुर मरदन, चंड चक्रदन; दानव अरदन, बिड़ाल बधे ॥

सर धार बिबरखण, दुरजन धरखण; अतुल अमरखण, धरम धुजे ॥

धूम्राछ बिधुंसन, स्रोणत चुंसन; सु्मभ निपात, निसु्मभ मथे ॥

जै जै होसी, महिखासुर मरदन; आदि अनील, अगाधि कथे ॥२०॥२३०॥

त्वप्रसादि ॥ पाधड़ी छंद ॥

तुम कहो देव ! सरबं बिचार ॥

जिम कीओ आपि करते पसार ॥

जदपि अभूत अनभै अनंत ॥

तउ कहों जथामति, त्रैण तंत ॥१॥२३१॥

करता करीम कादिर क्रिपाल ॥

अद्वै अभूत अनभै दिआल ॥

दाता दुरंत दुख दोख रहत ॥

जिह, नेति नेति सभ बेद कहत ॥२॥२३२॥

कई ऊच नीच कीनो बनाउ ॥

सभ वार पार जा को प्रभाउ ॥

सभ जीव जंत जानंत जाहि ॥

मन मूड़ ! किउ न सेवंत ताहि? ॥३॥२३३॥

कई मूड़, पत्र पूजा करंत ॥

कई सिध साधु, सूरज सिवंत ॥

कई पलटि, सूरज सिजदा कराइ ॥

प्रभ एक रूप, द्वै कै लखाइ? ॥४॥२३४॥

अनछिज तेज अनभै प्रकास ॥

दाता दुरंत अद्वै अनास ॥

सभ रोग सोग ते रहत रूप ॥

अनभै अकाल अछै सरूप ॥५॥२३५॥

करुणा निधान कामिल क्रिपाल ॥

दूख दोख हरत दाता दिआल ॥

अंजन बिहीन अनभंज नाथ ॥

जल थल प्रभाउ सरबत्र साथ ॥६॥२३६॥

जिह जाति पाति नही भेद भरम ॥

जिह रंग रूप नही एक धरम ॥

जिह सत्रु मित्र दोऊ एक सार ॥

अछै सरूप अबिचल अपार ॥७॥२३७॥

जानी न जाइ जिह रूप रेख ॥

कहि बासु तासु? कहि कउनु भेख? ॥

कहि नाम तासु है? कवन जाति? ॥

जिह सत्रु मित्र नही पुत्र भ्रात ॥८॥२३८॥

करुणा निधान कारण सरूप ॥

जिह चक्र चिहन नही रंग रूप ॥

जिह खेद भेद नही करम काल ॥

सभ जीव जंत की करत पाल ॥९॥२३९॥

उरधं बिरहत सिध सरूप ॥

बुधं अपाल जुधं अनूप ॥

जिह रूप रेख नही रंग राग ॥

अनछिज तेज अनभिज अदाग ॥१०॥२४०॥

जल थल महीप बन तन दुरंत ॥

जिह नेति नेति निसि दिन उचरंत ॥

पाइओ न जाइ जिह पैरि पार ॥

दीनान दोख दहिता उदार ॥११॥२४१॥

कई कोटि इंद्र जिह पानिहार ॥

कई कोटि रुद्र जुगीआ दुआर ॥

कई बेद बिआस ब्रहमा अनंत ॥

जिह नेति नेति निसि दिन उचरंत ॥१२॥२४२॥

त्वप्रसादि ॥ स्वैये ॥

दीनिन की प्रतिपाल करै नित; संत उबारि, गनीमन गारै ॥

पछ पसू नग नाग नराधिप; सरब समै, सभ को प्रतिपारै ॥

पोखत है जल मै थल मै; पल मै, कलि के नही करम बिचारै ॥

दीन दइआल दइआनिधि; दोखन देखत है, परु देत न हारै ॥१॥२४३॥

दाहत है दुख दोखन कौ; दल दुजन के पल मै दल डारै ॥

खंड अखंड प्रचंड प्रहारन; पूरन प्रेम की प्रीति स्मभारै ॥

पारु न पाइ सकै पदमापति; बेद कतेब अभेद उचारै ॥

रोज ही राज बिलोकत राजिक; रोखि रूहान की रोजी न टारै ॥२॥२४४॥

कीट पतंग कुरंग भुजंगम; भूत भविख भवान बनाए ॥

देव अदेव खपे अहमेव; न भेव लखिओ, भ्रम सिउ भरमाए ॥

बेद पुरान कतेब कुरान; हसेब थके कर हाथि न आए ॥

पूरन प्रेम प्रभाउ बिना; पति सिउ, किन स्री पदमापति पाए? ॥३॥२४५॥

आदि अनंत अगाधि अद्वैख; सु भूत भविख भवान अभै है ॥

अंति बिहीन अनातम आप; अदाग अदोख अछिद्र अछै है ॥

लोगन के करता हरता; जल मै, थल मै, भरता प्रभ वै है ॥

दीन दइआल दइआ कर स्रीपति; सुंदर स्री पदमापति ए है ॥४॥२४६॥

काम न क्रोध न लोभ न मोह न; रोग न सोग न भोग न भै है ॥

देह बिहीन, सनेह सभो तन; नेह बिरकत अगेह अछै है ॥

जान को देत, अजान को देत; जमीन को देत, जमान को दै है ॥

काहे को डोलत है? तुमरी सुधि; सुंदर स्री पदमापति लै है ॥५॥२४७॥

रोगन ते अरु सोगन ते; जल जोगन ते, बहु भांति बचावै ॥

सत्र अनेक चलावत घाव; तऊ तनि एकु न लागन पावै ॥

राखत है, अपनो करु दै करि; पाप सबूह, न भेटन पावै ॥

और की बात कहा कह तो सौ? सु पेट ही के पट बीच बचावै ॥६॥२४८॥

जछ भुजंग सु दानव देव; अभेव तुमै सभ ही करि धिआवै ॥

भूमि अकास पताल रसातल; जछ भुजंग सभै सिर निआवै ॥

पाइ सकै नही पार प्रभा हूं को; नेति ही नेतह बेद बतावै ॥

खोज थकै सभ ही खुजीआसुर; हार परे, हरि हाथि न आवै ॥७॥२४९॥

नारद से, चतुरानन से; रुमनारिख से, सभहूं मिलि गाइओ ॥

बेद कतेब न भेद लखिओ; सभ हारि परे, हरि हाथि न आइओ ॥

पाइ सकै नही, पार उमापति; सिध सनाथ सनंतन धिआइओ ॥

धिआन धरो, तिह को मन मै; जिह को अमितोज सभै जगि छाइओ ॥८॥२५०॥

बेद पुरान कतेब कुरान; अभेद न्रिपान सभै पचिहारे ॥

भेद न पाइ सकिओ अनभेद को; खेदत है, अनछेद पुकारे ॥

राग न रूप न रेख न रंग न; साक न सोग न संग तिहारे ॥

आदि अनादि अगाधि अभेख; अद्वैख जपिओ, तिन ही कुल तारे ॥९॥२५१॥

तीरथ कोट कीए इसनान; दीए बहु दान, महा ब्रत धारे ॥

देस फिरिओ, कर भेस तपोधन; केस धरे न मिले, हरि पिआरे ॥

आसन कोटि करे असटांग; धरे बहु निआस, करे मुख कारे ॥

दीन दइआल अकाल भजे बिनु; अंत को, अंत के धाम सिधारे ॥१०॥२५२॥

त्वप्रसादि ॥ कबितु ॥

अत्र के चलया, छित्र छत्र के धरया; छत्रधारीओ के छलया, महा सत्रन के साल हैं ॥

दान के दिवया, महा मान के बढया; अवसान के दिवया, हैं कटया जम जाल हैं ॥

जुध के जितया, अउ बिरुध के मिटया; महा बुधि के दिवया, महा मान हूं के मान हैं ॥

गिआन हूं के गिआता, महा बुधिता के दाता देव; काल हूं के काल, महा काल हूं के काल हैं ॥१॥२५३॥

पूरबी न पार पावै, हिंगुला हिमाले धिआवै; गोरि गरदेजी, गुन गावै तेरे नाम हैं ॥

जोगी जोग साधै, पउन साधना कितेक बाधै; आरब के आरबी, अराधै तेरे नाम हैं ॥

फरां के फिरंगी मानै, कंधारी कुरैसी जानै; पछम के पछमी, पछानै निज काम हैं ॥

मरहटा मघेले, तेरी मन सो तपसिआ करै; द्रिड़वै तिलंगी, पहचाने धरम धाम हैं ॥२॥२५४॥

बंग के बंगाली, फिरहंग के फिरंगा वाली; दिली के दिलवाली, तेरी आगिआ मै चलत हैं ॥

रोह के रुहेले, माघ देस के मघेले बीर; बंगसी बुंदेले, पाप पुंज को मलत हैं ॥

गोखा गुन गावै, चीन मचीन के सीस न्यावै; तिबती धिआइ, दोख देह के दलत हैं ॥

जिनै तोहि धिआइओ, तिनै पूरन प्रताप पाइओ; सरब धन धाम फल फूल सो फलत हैं ॥३॥२५५॥

देव देवतान कौ, सुरेस दानवान कौ; महेस गंग धान कौ, अभेस कहीअतु हैं ॥

रंग मै रंगीन, राग रूप मै प्रबीन; और काहूं पै न दीन, साध अधीन कहीअतु हैं ॥

पाईऐ न पारु, तेज पुंज मै अपार; सरब बिदिआ के उदार हैं, अपार कहीअतु हैं ॥

हाथी की पुकार, पल पाछे पहुंचत ताहि; चीटी की चिंघार, पहिले ही सुनीअतु हैं ॥४॥२५६॥

केते इंद्र दुआर, केते ब्रहमा मुखचार; केते क्रिसन अवतार, केते राम कहीअतु हैं ॥

केते ससि रासी, केते सूरज प्रकासी; केते मुंडीआ उदासी, जोग दुआर दहीअतु हैं ॥

केते महादीन, केते बिआस से प्रबीन; केते कुमेर कुलीन, केते जछ कहीअतु हैं ॥

करते है बिचार, पै न पूरन को पावै पार; ताही ते, अपार निराधार लहीअतु हैं ॥५॥२५७॥

पूरन अवतार, निराधार है न पारावार; पाईऐ न पार, पै अपार कै बखानीऐ ॥

अद्वै अबिनासी, परम पूरन प्रकासी; महा रूप हूं के रासी, है अनासी कै कै मानीऐ ॥

जंत्र हूं न जाति जा की, बाप हूं न माइ ता की; पूरन प्रभा की, सु छटा कै अनुमानीऐ ॥

तेज हूं को तंत्र है, कि राजसी को जंत्र है; मोहनी को मंत्र है, निजंत्र कै कै जानीऐ ॥६॥२५८॥

तेज हूं को तरु है, कि राजसी को सरु है; सुधता को घरु है, कि सिधता की सारु है ॥

कामना की खान है, कि साधना की सान है; बिरकतता की बान है, कि बुधि को उदार है ॥

सुंदर सरूप है, कि भूपन को भूप है; कि रूप हूं को रूप है, कुमति को प्रहारु है ॥

दीनन को दाता है, गनीमन को गारक है; साधन को रछक है, गुनन को पहारु है ॥७॥२५९॥

सिधि को सरूप है, कि बुधि को बिभूति है; कि क्रुध को अभूत है, कि अछै अबिनासी है ॥

काम को कुनिंदा है, कि खूबी को दिहंदा है; गनीमन गिरिंदा है, कि तेज को प्रकासी है ॥

काल हूं के काल है, कि सत्रन के साल है; कि मित्रन को पोखत है, कि ब्रिधता के बासी है ॥

जोग हूं को जंत्र है, कि तेज हूं को तंत्र है; कि मोहनी को मंत्र है, कि पूरन प्रकासी है ॥८॥२६०॥

रूप को निवास है, कि बुधि को प्रकास है; कि सिधता को बास है, कि बुधि हूं के घरु है ॥

देवन को देव है, निरंजन अभेव है; अदेवन को देव है, कि सुधता को सरु है ॥

जान को बचया है, इमान को दिवया है; जमजाल को कटया है, कि कामना को कर है ॥

तेज को प्रचंड है, अखंडण को खंड है; महीपन को मंड है, कि इसत्री है न नरु है ॥९॥२६१॥

बिस्व को भरन है, कि अपदा को हरन है; कि सुख को करन है, कि तेज को प्रकास है ॥

पाईऐ न पार, पारावार हूं को पार जा को; कीजत बिचार, सु बिचार को निवास है ॥

हिंगुला हिमालै गावै, हबसी हलबी धिआवै; पूरबी न पार पावै, आसा ते अनास है ॥

देवन को देव, महादेव हूं के देव है; निरंजन अभेव, नाथ अद्वै अबिनासि है ॥१०॥२६२॥

अंजन बिहीन है, निरंजन प्रबीन है; कि सेवक अधीन है, कटया जम जाल के ॥

देवन के देव, महादेव हूं के देव नाथ; भूमि के भुजया है, मुहीया महा बाल के ॥

राजन के राजा, महा साज हूं के साजा; महा जोग हूं के जोग है, धरया द्रुम छाल के ॥

कामना के कर है, कुबुधिता को हर है; कि सिधता के साथी है, कि काल है कुचाल के ॥११॥२६३॥

छीर कैसी छीरावधि, छाछ कैसी छत्रानेर; छपाकर कैसी छबि, कालइंद्र के कूल कै ॥

हंसनी सी सीहा रूम, हीरा सी हुसैनाबाद; गंगा कैसी धार, चली सात सिंध रूल कै ॥

पारा सी पलाऊगढ, रूपा कैसी रामपुर; सोरा सी सुरंगाबाद, नीके रही झूल कै ॥

च्मपा सी चंदेरी कोट, चांदनी सी चांदागड़ि; कीरति तिहारी, रही मालती सी फूल कै ॥१२॥२६४॥

फटक सी, कैलास कमाऊगड़ कासीपुर; सीसा सी सुरंगाबादि नीकै सोहीअतु है ॥

हिमा सी हिमालै, हर हार सी हलबानेर; हंस कैसी हाजीपुर, देखे मोहीअतु है ॥

चंदन सी च्मपावती, चंद्रमा सी चंद्रागिर; चांदनी सी चांदगड़, जउन जोहीअतु है ॥

गंगा सम गंग धारि, बकानि सी बिलंदाबादि; कीरति तिहारी की उजीआरी सोहीअतु है ॥१३॥२६५॥

फरासी फिरंगी, फरासीस के दुरंगी; मकरान के म्रिदंगी, तेरे गीत गाईअतु है ॥

भखरी कंधारी, गोरि गखरी गरदेजाचारी; पउन के अहारी, तेरे नामु धिआईअतु है ॥

पूरब पलाऊ, कामरूप अउ कमाऊ; सरब ठउर मै बिराजै, जहा जहा जाईअतु है ॥

पूरन प्रतापी, जंत्र मंत्र ते अतापी नाथ; कीरति तिहारी को, न पार पाईअतु है ॥१४॥२६६॥

त्वप्रसादि ॥ पाधड़ी छंद ॥

अद्वै अनास आसन अडोल ॥

अद्वै अनंत उपमा अतोल ॥

अछै सरूप अब्यकत नाथ ॥

आजानु बाहु सरबा प्रमाथ ॥१॥२६७॥

जह तह महीप बन तिन प्रफुल ॥

सोभा बसंत जह तह प्रजुल ॥

बन तन दुरंत खग म्रिग महान ॥

जह तह प्रफुल सुंदर सुजान ॥२॥२६८॥

फुलतं प्रफुल लहिलहत मउर ॥

सिरि ढुलहि जानु मन मथह चउर ॥

कुदरति कमाल राजिक रहीम ॥

करुणा निधान कामिल करीम ॥३॥२६९॥

जह तह बिलोकि तह तह प्रसोह ॥

आजानु बाहु अमितोज मोह ॥

रोसं बिरहत करुणा निधान ॥

जह तह प्रफुल सुंदर सुजान ॥४॥२७०॥

बन तिन महीप जल थल महान ॥

जह तह प्रसोह करुणा निधान ॥

जगमगत तेज पूरन प्रताप ॥

अ्मबर जमीन जिह जपत जाप ॥५॥२७१॥

सातो अकास सातो पतार ॥

बिथरिओ अद्रिसट जिह करम जार ॥६॥२७२॥