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दसम ग्रन्थ/गिआन परबोध

विकिपुस्तक से
ਗਿਆਨ ਪ੍ਰਬੋਧ ॥

गिआन प्रबोध ॥

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

स्री भगउती जी सहाइ ॥

अथ गिआन प्रबोध ग्रंथ लिख्यते ॥

पातिसाही १० ॥

भुजंग प्रयात छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

नमो नाथ पूरे सदा सिध करमं ॥

अछेदी अभेदी सदा एक धरमं ॥

कलंकं बिना निहकलंकी सरूपे ॥

अछेदं अभेदं अखेदं अनूपे ॥१॥

नमो लोक लोकेस्वरं लोक नाथे ॥

सदैवं सदा सरब साथं अनाथे ॥

नोम एक रूपं अनेकं सरूपे ॥

सदा सरब साहं सदा सरब भूपे ॥२॥

अछेदं अभेदं अनामं अठामं ॥

सदा सरबदा सिधदा बुधि धामं ॥

अजंत्रं अमंत्रं अकंत्रं अभरमं ॥

अखेदं अभेदं अछेदं अकरमं ॥३॥

अगाधे अबाधे अगंतं अनंतं ॥

अलेखं अभेखं अभूतं अगंतं ॥

न रंगं न रूपं न जातं न पातं ॥

न सत्रो न मित्रो न पुत्रो न मातं ॥४॥

अभूतं अभंगं अभिखं भवानं ॥

परेयं पुनीतं पवित्रं प्रधानं ॥

अगंजे अभंजे अकामं अकरमं ॥

अनंते बिअंते अभूमे अभरमं ॥५॥

नही जान जाई कछू रूप रेखं ॥

कहा बासु ता को फिरै कउन भेखं ॥

कहा नाम ता को कहा कै कहावै ॥

कहा मै बखानो? कहै मै न आवै ॥६॥

अजोनी अजै परम रूपी प्रधानै ॥

अछेदी अभेदी अरूपी महानै ॥

असाधे अगाधे अगंजुल गनीमे ॥

अरंजुल अराधे रहाकुल रहीमे ॥७॥

सदा सरबदा सिधदा बुधि दाता ॥

नमो लोक लोकेस्वरं लोक ग्याता ॥

अछेदी अभै आदि रूपं अनंतं ॥

अछेदी अछै आदि अद्वै दुरंतं ॥८॥

नराज छंद ॥

अनंत आदि देव है ॥

बिअंत भरम भेव है ॥

अगाधि बिआधि नास है ॥

सदैव सरब पास है ॥१॥९॥

बचित्र चित्र चांप है ॥

अखंड दुसट खाप है ॥

अभेद आदि काल है ॥

सदैव सरब पाल है ॥२॥१०॥

अखंड चंड रूप है ॥

प्रचंड सरब स्रूप है ॥

काल हूं के काल है ॥

सदैव रछपाल है ॥३॥११॥

क्रिपाल दिआल रूप है ॥

सदैव सरब भूप है ॥

अनंत सरब आस है ॥

परेव परम पास है ॥४॥१२॥

अद्रिसट अंत्र धिआन है ॥

सदैव सरब मान है ॥

क्रिपाल काल हीन है ॥

सदैव साध अधीन है ॥५॥१३॥

भजस तुयं ॥

भजस तुयं ॥ रहाउ ॥

अगाधि बिआधि नासनं ॥

परेयं परम उपासनं ॥

त्रिकाल लोक मान है ॥

सदैव पुरख परधान है ॥६॥१४॥

तथस तुयं ॥

तथस तुयं ॥ रहाउ ॥

क्रिपाल दिआल करम है ॥

अगंज भंज भरम है ॥

त्रिकाल लोक पाल है ॥

सदैव सरब दिआल है ॥७॥१५॥

जपस तुयं ॥

जपस तुयं ॥ रहाउ ॥

महान मोन मान है ॥

परेव परम प्रधान है ॥

पुरान प्रेत नासनं ॥

सदैव सरब पासनं ॥८॥१६॥

प्रचंड अखंड मंडली ॥

उदंड राज सु थली ॥

जगंत जोति जुआलका ॥

जलंत दीप मालका ॥९॥१७॥

क्रिपाल दिआल लोचनं ॥

मंचक बाण मोचनं ॥

सिरं करीट धारीयं ॥

दिनेस क्रित हारीयं ॥१०॥१८॥

बिसाल लाल लोचनं ॥

मनोज मान मोचनं ॥

सुभंत सीस सु प्रभा ॥

चक्रत चारु चंद्रका ॥११॥१९॥

जगंत जोत जुआलका ॥

छकंत राज सु प्रभा ॥

जगंत जोति जैतसी ॥

बदंत क्रित ईसुरी ॥१२॥२०॥

त्रिभंगी छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

अनकाद सरूपं, अमित बिभूतं; अचल सरूपं बिसु करणं ॥

जग जोति प्रकासं, आदि अनासं ! अमित अगासं सरब भरणं ! ॥

अनगंज अकालं, बिसु प्रतिपालं ! दीन दिआलं सुभ करणं ! ॥

आनंद सरूपं, अनहद रूपं ! अमित बिभूतं ! तव सरणं ॥१॥२१॥

बिस्व्मभर भरणं, जगत प्रकरणं ! अधरण धरणं सिसट करं ! ॥

आनंद सरूपी, अनहद रूपी ! अमित बिभूती तेज बरं ! ॥

अनखंड प्रतापं, सभ जग थापं ! अलख अतापं बिसु करं ! ॥

अद्वै अबिनासी, तेज प्रकासी ! सरब उदासी ! एक हरं ॥२॥२२॥

अनखंड अमंडं, तेज प्रचंडं ! जोति उदंडं अमित मतं ॥

अनभै अनगाधं, अलख अबाधं ! बिसु प्रसाधं अमित गतं ! ॥

आनंद सरूपी, अनहद रूपी ! अचल बिभूती भव तरणं ! ॥

अनगाधि अबाधं, जगत प्रसाधं ! सरब अराधं ! तव सरणं ॥३॥२३॥

अकलंक अबाधं, बिसु प्रसाधं ! जगत अराधं भव नासं ! ॥

बिस्व्मभर भरणं, किलविख हरणं ! पतत उधरणं सभ साथं ! ॥

अनाथन नाथे, अक्रित अगाथे ! अमित अनाथे दुख हरणं ! ॥

अगंज अबिनासी, जोति प्रकासी ! जगत प्रणासी ! तुय सरणं ॥४॥२४॥

कलस ॥

अमित तेज, जग जोति प्रकासी ॥

आदि अछेद, अभै अबिनासी ॥

परम तत, परमारथ प्रकासी ॥

आदि सरूप, अखंड उदासी ॥५॥२५॥

त्रिभंगी छंद ॥

अखंड उदासी, परम प्रकासी; आदि अनासी बिस्व करं ॥

जगतावल करता, जगत प्रहरता; सभ जग भरता सिध भरं ॥

अछै अबिनासी, तेज प्रकासी; रूप सु रासी सरब छितं ॥

आनंद सरूपी, अनहद रूपी; अलख बिभूती अमित गतं ॥६॥२६॥

कलस ॥

आदि अभै अनगाधि सरूपं ॥

राग रंगि जिह रेख न रूपं ॥

रंक भयो रावत कहूं भूपं ॥

कहूं समुंद्र सरता कहूं कूपं ॥७॥२७॥

त्रिभंगी छंद ॥

सरता कहूं कूपं, समुद सरूपं; अलख बिभूतं अमित गतं ॥

अद्वै अबिनासी, परम प्रकासी; तेज सुरासी अक्रित क्रितं ॥

जिह रूप न रेखं, अलख अभेखं; अमित अद्वैखं सरब मई ॥

सभ किलविख हरणं, पतित उधरणं; असरणि सरणं एक दई ॥८॥२८॥

कलस ॥

आजानु बाहु सारंग कर धरणं ॥

अमित जोति जग जोत प्रकरणं ॥

खड़ग पाण खल दल बल हरणं ॥

महाबाहु बिस्व्मभर भरणं ॥९॥२९॥

त्रिभंगी छंद ॥

खल दल बल हरणं, दुसट बिदरणं; असरण सरणं अमित गतं ॥

चंचल चख चारण, मछ बिडारण; पाप प्रहारण अमित मतं ॥

आजान सु बाहं, साहन साहं; महिमा माहं सरब मई ॥

जल थल बन रहिता, बन त्रिनि कहिता; खल दलि दहिता सु नरि सही ॥१०॥३०॥

कलस ॥

अति बलिसट, दल दुसट निकंदन ॥

अमित प्रताप, सगल जग बंदन ॥

सोहत, चारु चित्र कर चंदन ॥

पाप प्रहारण, दुसट दल दंडन ॥११॥३१॥

छपै छंद ॥

बेद भेद नही लखै; ब्रहम ब्रहमा नही बुझै ॥

बिआस परासुर सुक सनादि; सिव अंतु न सुझै ॥

सनति कुआर सनकादि सरब; जउ समा न पावहि ॥

लख लखमी लख बिसन किसन; कई नेत बतावहि ॥

अस्मभ रूप अनभै प्रभा; अति बलिसट जलि थलि करण ॥

अचुत अनंत अद्वै अमित ! नाथ निरंजन ! तव सरण ॥१॥३२॥

अचुत अभै अभेद अमित; आखंड अतुल बल ॥

अटल अनंत अनादि अखै; अखंड प्रबल दल ॥

अमित अमित अनतोल अभू; अनभेद अभंजन ॥

अनबिकार आतम सरूप; सुर नर मुन रंजन ॥

अबिकार रूप अनभै सदा; मुन जन गन बंदत चरन ॥

भव भरन करन, दुख दोख हरन; अति प्रताप भ्रम भै हरन ॥२॥३३॥

छपै छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

मुख मंडल पर लसत जोति; उदोत अमित गति ॥

जटत जोत जगमगत लजत; लख कोटि निखति पति ॥

चक्रवरती चक्रवै चक्रत; चउचक्र करि धरि ॥

पदम नाथ पदमाछ नवल ! नाराइण नरिहरि ! ॥

कालख बिहंडण, किलविख हरण ! सुर नर मुन बंदत चरण ! ॥

खंडण अखंड मंडण अभै ! नमो, नाथ भउ भै हरण ! ॥३॥३४॥

छपै छंद ॥

नमो नाथ न्रिदाइक; नमो निम रूप निरंजन ॥

अगंजाण अगंजण अभंज; अनभेद अभंजन ॥

अछै अखै अबिकार अभै; अनभिज अभेदन ॥

अखैदान खेदन अखिज; अनछिद्र अछेदन ॥

आजान बाहु; सारंगधर ! खड़गपाण दुरजन दलण ! ॥

नर वर नरेस नाइक न्रिपणि ! नमो, नवल जल थल रवणि ! ॥४॥३५॥

दीन दयाल, दुख हरण ! दुरमत हंता दुख खंडण ! ॥

महा मोन मन हरन मदन ! मूरत महि मंडन ! ॥

अमित तेज अबिकार अखै ! आभंज अमित बल ! ॥

निरभंज निरभउ निरवैर ! निरजुर न्रिप जल थल ! ॥

अछै सरूप अछू अछित ! अछै अछान अछर ! ॥

अद्वै सरूप अद्विय अमर ! अभिबंदत सुर नर असुर ॥५॥३६॥

कुल कलंक करि हीन; क्रिपा सागर करुणा कर ॥

करण कारण समरथ; क्रिपा की सूरत क्रित धर ॥

काल करम कर हीन; क्रिआ जिह कोइ न बुझै ॥

कहा कहै? कहि करै? कहा कालन कै सुझै? ॥

कंजलक नैन क्मबू ग्रीवहि ! कटि केहर कुंजर गवन ! ॥

कदली कुरंक करपूर गत ! बिन अकाल, दुजो कवन? ॥६॥३७॥

अलख रूप अलेख अबै; अनभूत अभंजन ॥

आदि पुरख अबिकार अजै; अनगाध अगंजन ॥

निरबिकार निरजुर सरूप; निर द्वैख निरंजन ॥

अभंजान भंजन अनभेद; अनभूत अभंजन ॥

साहान साह सुंदर सुमत; बड सरूप बडवै बखत ॥

कोटकि प्रताप भूअ भान जिम; तपत तेज इसथित तखत ॥७॥३८॥

छपै छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

चक्रत चार चक्रवै चक्रत; चउकुंट चवगन ॥

कोट सूर सम तेज तेज नही; दून चवगन ॥

कोट चंद चक परै; तुल नही तेज बिचारत ॥

बिआस परासर ब्रहम; भेद नहि बेद उचारत ॥

साहान साह साहिब सुघरि; अति प्रताप सुंदर सबल ॥

राजान राज साहिब सबल; अमित तेज अछै अछल ॥८॥३९॥

कबितु ॥ त्वप्रसादि ॥

गहिओ जो न जाइ, सो अगाह कै कै गाईअतु; छेदिओ जो न जाइ, सो अछेद कै पछानीऐ ॥

गंजिओ जो न जाइ, सो अगंज कै कै जानीअतु; भंजिओ जो न जाइ, सो अभंज कै कै मानीऐ ॥

साधिओ जो न जाइ, सो असाधि कै कै साध कर; छलिओ जो न जाइ, सो अछल कै प्रमानीऐ ॥

मंत्र मै न आवै, सो अमंत्र कै कै मानु मन; जंत्र मै न आवै, सो अजंत्र कै कै जानीऐ ॥१॥४०॥

जात मै न आवै, सो अजात कै कै जान जीअ; पात मै न आवै, सो अपात कै बुलाईऐ ॥

भेद मै न आवै, सो अभेद कै कै भाखीअतु; छेद्यो जो न जाइ, सो अछेद कै सुनाईऐ ॥

खंडिओ जो न जाइ, सो अखंड जू को खिआलु कीजै; खिआल मै न आवै, गमु ता को सदा खाईऐ ॥

जंत्र मै न आवै, अजंत्र कै कै जापीअतु; धिआन मै न आवै, ता को धिआनु कीजै धिआईऐ ॥२॥४१॥

छत्रधारी छत्रीपति छैल रूप छितनाथ; छौणी कर छाइआ बर छत्रीपत गाईऐ ॥

बिस्व नाथ बिस्व्मभर बेदनाथ बालाकर; बाजीगरि बानधारी बंध न बताईऐ ॥

निउली करम दूधाधारी, बिदिआधर ब्रहमचारी; धिआन को लगावै, नैक धिआन हूं न पाईऐ ॥

राजन के राजा, महाराजन के महाराज; ऐसो राज छोडि, अउर दूजा कउन धिआईऐ? ॥३॥४२॥

जुध के जितईआ, रंग भूम के भवईआ; भार भूम के मिटईआ, नाथ तीन लोक गाईऐ ॥

काहू के तनईआ है न मईआ जा के भईआ कोऊ; छउनी हू के छईआ छोड, का सिउ प्रीत लाईऐ? ॥

साधना सधईआ, धूल धानी के धुजईआ; धोम धार के धरईआ, धिआन ता को सदा लाईऐ ॥

आउ के बढईआ, एक नाम के जपईआ; अउर काम के करईआ छोड, अउर कउन धिआईऐ? ॥४॥४३॥

काम को कुनिंदा, खैर खूबी को दिहंदा; गज गाजी को गजिंदा, सो कुनिंदा कै बताईऐ ॥

चाम के चलिंदा, घाउ घाम ते बचिंदा; छत्र छैनी के छलिंदा, सो दिहंदा कै मनाईऐ ॥

जर के दिहंदा, जान मान को जनिंदा; जोत जेब को गजिंदा, जान मान जान गाईऐ ॥

दोख के दलिंदा, दीन दानस दिहंदा; दोख दुरजन दलिंदा धिआइ, दूजो कउन धिआईऐ? ॥५॥४४॥

सालिस सहिंदा, सिधताई को सधिंदा; अंग अंग मै अविंदा, एकु एको नाथ जानीऐ ॥

कालख कटिंदा, खुरासान को खुनिंदा; ग्रब गाफल गिलिंदा, गोल गंजख बखानीऐ ॥

गालब गरंदा, जीत तेज के दिहंदा; चित्र चांप के चलिंदा छोड, अउर कउन आनीऐ? ॥

सतता दिहंदा, सतताई को सुखिंदा; करम काम को कुनिंदा छोड, दूजा कउन मानीऐ? ॥६॥४५॥

जोत को जगिंदा, जंगे जाफरी दिहंदा; मित्र मारी के मलिंदा, पै कुनिंदा कै बखानीऐ ॥

पालक पुनिंदा, परम पारसी प्रगिंदा; रंग राग के सुनिंदा, पै अनंदा तेज मानीऐ ॥

जाप के जपिंदा, खैर खूबी के दहिंदा; खून माफ को कुनिंदा, है अभिज रूप ठानीऐ ॥

आरजा दहिंदा, रंग राग को बिढंदा; दुसट द्रोह के दलिंदा छोड, दूजो कौन मानीऐ? ॥७॥४६॥

आतमा प्रधान जाह, सिधता सरूप ताह; बुधता बिभूत जाह, सिधता सुभाउ है ॥

राग भी न रंग ताहि, रूप भी न रेख जाहि; अंग भी सुरंग ताह, रंग के सुभाउ है ॥

चित्र सो बचित्र है, परमता पवित्र है; सु मित्र हूं के मित्र है, बिभूत को उपाउ है ॥

देवन के देव है, कि साहन के साह है; कि राजन को राजु है, कि रावन को राउ है ॥८॥४७॥

बहिर तवील छंद ॥ पसचमी ॥ त्वप्रसादि ॥

कि अगंजस ॥

कि अभंजस ॥

कि अरूपस ॥

कि अरंजस ॥१॥४८॥

कि अछेदस ॥

कि अभेदस ॥

कि अनामस ॥

कि अकामस ॥२॥४९॥

कि अभेखस ॥

कि अलेखस ॥

कि अनादस ॥

कि अगाधस ॥३॥५०॥

कि अरूपस ॥

कि अभूतस ॥

कि अदागस ॥

कि अरागस ॥४॥५१॥

कि अभेदस ॥

कि अछेदस ॥

कि अछादस ॥

कि अगाधस ॥५॥५२॥

कि अगंजस ॥

कि अभंजस ॥

कि अभेदस ॥

कि अछेदस ॥६॥५३॥

कि असेअस ॥

कि अधेअस ॥

कि अगंजस ॥

कि इकंजस ॥७॥५४॥

कि उकारस ॥

कि निकारस ॥

कि अखंजस ॥

कि अभंजस ॥८॥५५॥

कि अघातस ॥

कि अकिआतस ॥

कि अचलस ॥

कि अछलस ॥९॥५६॥

कि अजातस ॥

कि अझातस ॥

कि अछलस ॥

कि अटलस ॥१०॥५७॥

अटाटसच ॥

अडाटसच ॥

अडंगसच ॥

अणंगसच ॥११॥५८॥

अतानसच ॥

अथानसच ॥

अदंगसच ॥

अनंगसच ॥१२॥५९॥

अपारसच ॥

अठारसच ॥

अबेअसतु ॥

अभेअसत ॥१३॥६०॥

अमानसच ॥

अहानसच ॥

अड़ंगसच ॥

अत्रंगसच ॥१४॥६१॥

अरामसच ॥

अलामसच ॥

अजोधसच ॥

अवोजसच ॥१५॥६२॥

असेअसतु ॥

अभेअसतु ॥

आअंगसतु ॥

इअंगसतु ॥१६॥६३॥

उकारसतु ॥

अकारसतु ॥

अखंडसतु ॥

अडंगसतु ॥१७॥६४॥

कि अतापहि ॥

कि अथापहि ॥

कि अंदगहि ॥

कि अनंगहि ॥१८॥६५॥

कि अतापहि ॥

कि अथापहि ॥

कि अनीलहि ॥

कि सुनीलहि ॥१९॥६६॥

अरध नराज छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

सजस तुयं ॥

धजस तुयं ॥

अलस तुयं ॥

इकस तुयं ॥१॥६७॥

जलस तुयं ॥

थलस तुयं ॥

पुरस तुयं ॥

बनस तुयं ॥२॥६८॥

गुरस तुयं ॥

गुफस तुयं ॥

निरस तुयं ॥

निदस तुयं ॥३॥६९॥

रवस तुयं ॥

ससस तुयं ॥

रजस तुयं ॥

तमस तुयं ॥४॥७०॥

धनस तुयं ॥

मनस तुयं ॥

ब्रिछस तुयं ॥

बनस तुयं ॥५॥७१॥

मतस तुयं ॥

गतस तुयं ॥

ब्रतस तुयं ॥

चितस तुयं ॥६॥७२॥

पितस तुयं ॥

सुतस तुयं ॥

मतस तुयं ॥

गतस तुयं ॥७॥७३॥

नरस तुयं ॥

त्रियस तुयं ॥

पितस तुयं ॥

ब्रिदस तुयं ॥८॥७४॥

हरस तुयं ॥

करस तुयं ॥

छलस तुयं ॥

बलस तुयं ॥९॥७५॥

उडस तुयं ॥

पुडस तुयं ॥

गडस तुयं ॥

दधस तुयं ॥१०॥७६॥

रवस तुयं ॥

छपस तुयं ॥

गरबस तुयं ॥

दिरबस तुयं ॥११॥७७॥

जैअस तुयं ॥

खैअस तुयं ॥

पैअस तुयं ॥

त्रैअस तुयं ॥१२॥७८॥

निराज छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

चकंत चार चंद्रका ॥

सुभंत राज सु प्रभा ॥

दवंत दुसट मंडली ॥

सुभंत राज सु थली ॥१॥७९॥

चलंत चंड मंडका ॥

अखंड खंड दुपला ॥

खिवंत बिजु ज्वालका ॥

अनंत गदि बिदसा ॥२॥८०॥

लसंत भाव उजलं ॥

दलंत दुख दु दलं ॥

पवंग पात सोहीयं ॥

समुंद्र बाज लोहीयं ॥३॥८१॥

निनंद गेद ब्रिदयं ॥

अखेद नाद दुधरं ॥

अठट बट बटकं ॥

अघट अनट सुखलं ॥४॥८२॥

अखुट तुट द्रिबकं ॥

अजुट छुट सुछकं ॥

अघुट तुट आसनं ॥

अलेख अभेख अनासनं ॥५॥८३॥

सुभंत दंत पदुकं ॥

जलंत साम सु घटं ॥

सुभंत छुद्र घंटका ॥

जलंत भार कछटा ॥६॥८४॥

सिरीसु सीस सुभीयं ॥

घटाक बान उभीयं ॥

सुभंत सीस सिधरं ॥

जलंत सिधरी नरं ॥७॥८५॥

चलंत दंत पतकं ॥

भजंत देखि दुदलं ॥

तजंत ससत्र असत्रकं ॥

चलंत चक्र चउदिसं ॥८॥८६॥

अगम तेज सोभीयं ॥

रिखीस ईस लोभीयं ॥

अनेक बार धिआवही ॥

न तत्र पार पावही ॥९॥८७॥

अधो सु धूम धूमही ॥

अघूर नेत्र घूमही ॥

सु पंच अगन साधीयं ॥

न ताम पार लाधीयं ॥१०॥८८॥

निवल आदि करमणं ॥

अनंत दान धरमणं ॥

अनंत तीरथ बासनं ॥

न एक नाम के समं ॥११॥८९॥

अनंत जग्य करमणं ॥

गजादि आदि धरमणं ॥

अनेक देस भरमणं ॥

न एक नाम के समं ॥१२॥९०॥

इकंत कुंट बासनं ॥

भ्रमंत कोटकं बनं ॥

उचाटनाद करमणं ॥

अनेक उदास भरमणं ॥१३॥९१॥

अनेक भेख आसनं ॥

करोर कोटकं ब्रतं ॥

दिसा दिसा भ्रमेसनं ॥

अनेक भेख पेखनं ॥१४॥९२॥

करोर कोट दानकं ॥

अनेक जग्य क्रतबियं ॥

सन्यास आदि धरमणं ॥

उदास नाम करमणं ॥१५॥९३॥

अनेक पाठ पाठनं ॥

अनंत ठाट ठाटनं ॥

न एक नाम के समं ॥

समसत स्रिसट के भ्रमं ॥१६॥९४॥

जगादि आदि धरमणं ॥

बैराग आदि करमणं ॥

दयादि आदि कामणं ॥

अनाद संजमं ब्रिदं ॥१७॥९५॥

अनेक देस भरमणं ॥

करोर दान संजमं ॥

अनेक गीत गिआननं ॥

अनंत गिआन धिआननं ॥१८॥९६॥

अनंत गिआन सुतमं ॥

अनेक क्रित सु ब्रितं ॥

बिआस नारद आदकं ॥

सु ब्रहमु मरम नहि लहं ॥१९॥९७॥

करोर जंत्र मंत्रणं ॥

अनंत तंत्रणं बणं ॥

बसेख ब्यास नासनं ॥

अनंत न्यास प्रासनं ॥२०॥९८॥

जपंत देव दैतनं ॥

थपंत जछ गंध्रबं ॥

बदंत बिदणोधरं ॥

गणंत सेस उरगणं ॥२१॥९९॥

जपंत पारवारयं ॥

समुंद्र सपत धारयं ॥

जणंत चार चक्रणं ॥

ध्रमंत चक्र बक्रणं ॥२२॥१००॥

जपंत पंनगं नकं ॥

बरं नरं बनसपतं ॥

अकास उरबीअं जलं ॥

जपंत जीव जल थलं ॥२३॥१०१॥

सो कोट चक्र बकत्रणं ॥

बदंत बेद चत्रकं ॥

अस्मभ अस्मभ मानीऐ ॥

करोर बिसन ठानीऐ ॥२४॥१०२॥

अनंत सुरसुती सती ॥

बदंत क्रित ईसुरी ॥

अनंत अनंत भाखीऐ ॥

अनंत अंत लाखीऐ ॥२५॥१०३॥

ब्रिध नराज छंद ॥

अनादि अगाधि बिआधि आदि; अनादि को मनाईऐ ॥

अगंज अभंज अरंज अगंज; गंज कउ धिआईऐ ॥

अलेख अभेख अद्वैख अरेख; असेख को पछानीऐ ॥

न भूल जंत्र तंत्र मंत्र; भरम भेख ठानीऐ ॥१॥१०४॥

क्रिपाल लाल अकाल अपाल; दइआल को उचारीऐ ॥

अधरम करम धरम भरम; करम मै बिचारीऐ ॥

अनंत दान धिआन गिआन; धिआनवान पेखीऐ ॥

अधरम करम के बिना; सु धरम करम लेखीऐ ॥२॥१०५॥

ब्रतादि दान संजमादि; तीरथ देव करमणं ॥

है आदि कुंजमेद; राजसू बिना न भरमणं ॥

निवल आदि करम भेख; अनेक भेख मानीऐ ॥

अदेख भेख के बिना; सु करम भरम जानीऐ ॥३॥१०६॥

अजात पात अमात तात; अजात सिध है सदा ॥

असत्र मित्र पुत्र पउत्र; जत्र तत्र सरबदा ॥

अखंड मंड चंड उदंड; अखंड खंड भाखीऐ ॥

न रूप रंग रेख अलेख; भेख मै न राखीऐ ॥४॥१०७॥

अनंत तीरथ आदि; आसनादि नारद आसनं ॥

बैराग अउ संनिआस; अउ अनादि जोग प्रासनं ॥

अनादि तीरथ संजमादि; बरत नेम पेखीऐ ॥

अनादि अगाधि के बिना; समसत भरम लेखीऐ ॥५॥१०८॥

रसावल छंद ॥

दइआदि आदि धरमं ॥

संनिआस आदि करमं ॥

गजादि आदि दानं ॥

हयादि आदि थानं ॥१॥१०९॥

सुवरन आदि दानं ॥

समुंद्र आदि इसनानं ॥

बिसुवादि आदि भरमं ॥

बिरकतादि आदि करमं ॥२॥११०॥

निवल आदि करणं ॥

सु नील आदि बरणं ॥

अनील आदि धिआनं ॥

जपत तत प्रधानं ॥३॥१११॥

अमितकादि भगतं ॥

अविकतादि ब्रकतं ॥

प्रछसतुवा प्रजापं ॥

प्रभगता अथापं ॥४॥११२॥

सु भगतादि करणं ॥

अजगतुआ प्रहरणं ॥

बिरकतुआ प्रकासं ॥

अविगतुआ प्रणासं ॥५॥११३॥

समसतुआ प्रधानं ॥

धुजसतुआ धरानं ॥

अविकतुआ अभंगं ॥

इकसतुआ अनंगं ॥६॥११४॥

उअसतुआ अकारं ॥

क्रिपसतुआ क्रिपारं ॥

खितसतुआ अखंडं ॥

गतसतुआ अगंडं ॥७॥११५॥

घरसतुआ घरानं ॥

ङ्रिअसतुआ ङ्रिहालं ॥

चितसतुआ अतापं ॥

छितसतुआ अछापं ॥८॥११६॥

जितसतुआ अजापं ॥

झिकसतुआ अझापं ॥

इकसतुआ अनेकं ॥

टुटसतुआ अटेटं ॥९॥११७॥

ठटसतुआ अठाटं ॥

डटसतुआ अडाटं ॥

ढटसतुआ अढापं ॥

णकसतुआ अणापं ॥१०॥११८॥

तपसतुआ अतापं ॥

थपसतुआ अथापं ॥

दलसतुआदि दोखं ॥

नहिसतुआ अनोखं ॥११॥११९॥

अपकतुआ अपानं ॥

फलकतुआ फलानं ॥

बदकतुआ बिसेखं ॥

भजसतुआ अभेखं ॥१२॥१२०॥

मतसतुआ फलानं ॥

हरिकतुआ हिरदानं ॥

अड़कतुआ अड़ंगं ॥

त्रिकसतुआ त्रिभंगं ॥१३॥१२१॥

रंगसतुआ अरंगं ॥

लवसतुआ अलंगं ॥

यकसतुआ यकापं ॥

इकसतुआ इकापं ॥१४॥१२२॥

वदिसतुआ वरदानं ॥

यकसतुआ इकानं ॥

लवसतुआ अलेखं ॥

ररिसतुआ अरेखं ॥१५॥१२३॥

त्रिअसतुआ त्रिभंगे ॥

हरिसतुआ हरंगे ॥

महिसतुआ महेसं ॥

भजसतुआ अभेसं ॥१६॥१२४॥

बरसतुआ बरानं ॥

पलसतुआ फलानं ॥

नरसतुआ नरेसं ॥

दलसतुसा दलेसं ॥१७॥१२५॥

पाधड़ी छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

दिन अजब एक आतमा राम ॥

अनभउ सरूप अनहद अकाम ॥

अनछिज तेज आजान बाहु ॥

राजान राज साहान साहु ॥१॥१२६॥

उचरिओ आतमा परमातमा संग ॥

उतभुज सरूप अबिगत अभंग ॥

इह कउन आहि आतमा सरूप? ॥

जिह अमित तेजि अतिभुति बिभूति ॥२॥१२७॥

परातमा बाच ॥

यहि ब्रहम आहि आतमा राम ॥

जिह अमित तेजि अबिगत अकाम ॥

जिह भेद भरम नही करम काल ॥

जिह सत्र मित्र सरबा दिआल ॥३॥१२८॥

डोबियो न डुबै सोखियो न जाइ ॥

कटियो न कटै न बारियो बराइ ॥

छिजै न नैक सत ससत्र पात ॥

जिह सत्र मित्र नही जात पात ॥४॥१२९॥

सत्र सहंस सति सति प्रघाइ ॥

छिजै न नैक खंडिओ न जाइ ॥

नही जरै नैक पावक मंझार ॥

बोरै न सिंध सोखै न ब्यार ॥५॥१३०॥

इक कर्यो प्रसन आतमा देव ॥

अनभंग रूप अनिभउ अभेव ! ॥

यहि चतुर वरग संसार दान ॥

किहु चतुर वरग? किजै वखिआन ॥६॥१३१॥

इक राजु धरम, इक दान धरम ॥

इक भोग धरम, इक मोछ करम ॥

इक चतुर वरग सभ जग भणंत ॥

से आतमाह परातमा पुछंत ॥७॥१३२॥

इक राज धरम इक धरम दान ॥

इक भोग धरम इक मोछवान ॥

तुम कहो चत्र चत्रै बिचार ॥

जे त्रिकाल भए जुग अपार ॥८॥१३३॥

बरनंन करो तुम प्रिथम दान ॥

जिम दान धरम किंने न्रिपान ॥

सतिजुग करम सुर दान दंत ॥

भूमादि दान कीने अकंथ ॥९॥१३४॥

त्रै जुग महीप बरने न जात ॥

गाथा अनंत उपमा अगात ॥

जो कीए जगत मै जग धरम ॥

बरने न जाहि ते अमित करम ॥१०॥१३५॥

कलजुग ते आदि जो भए महीप ॥

इहि भरथ खंडि महि ज्मबू दीप ॥

त्व बल प्रताप बरणौ सु त्रैण ॥

राजा युधिसट्र भू भरथ एण ॥११॥१३६॥

खंडे अखंड जिह चतुर खंड ॥

कैरौ कुरखेत्र मारे प्रचंड ॥

जिह चतुर कुंड जितियो दुबार ॥

अरजन भीमादि भ्राता जुझार ॥१२॥१३७॥

अरजन पठियो उतर दिसान ॥

भीमहि कराइ पूरब पयान ॥

सहिदेव पठियो दछण सुदेस ॥

नुकलहि पठाइ पछम प्रवेस ॥१३॥१३८॥

मंडे महीप खंडियो खत्राण ॥

जिते अजीत मंडे महान ॥

खंडियो सु उत्र खुरासान देस ॥

दछन पूरब जीते नरेस ॥१४॥१३९॥

खग खंड खंड जीते महीप ॥

बजियो निसान इह ज्मबूदीप ॥

इक ठउर कीए सब देस राउ ॥

मख राजसूअ को कीओ चाउ ॥१५॥१४०॥

सब देस देस पठे सु पत्र ॥

जित जित गुनाढ कीए इकत्र ॥

मख राजसूअ को कीयो अर्मभ ॥

न्रिप बहुत बुलाइ जिते अस्मभ ॥१६॥१४१॥

रूआल छंद ॥

कोटि कोटि बुलाइ रितज; कोटि ब्रहम बुलाइ ॥

कोटि कोटि बनाइ बिंजन; भोगीअहि बहु भाइ ॥

जत्र तत्र समग्रका कहूं; लाग है न्रिपराइ ॥

राजसूइ करहि लगे सभ; धरम को चित चाइ ॥१॥१४२॥

एक एक सुवरन को; दिज एक दीजै भार ॥

एक सउ गज एक सउ रथि; दुइ सहंस्र तुखार ॥

सहंस चतुर सुवरन सिंगी; महिख दान अपार ॥

एक एकहि दीजीऐ; सुन, राज राज अउतार ! ॥२॥१४३॥

सुवरन दान सु दान रुकम दान; सु तांब्र दान अनंत ॥

अंन दान अनंत दीजत; देख दीन दुरंत ॥

बसत्र दान पट्मब्र दान; सु ससत्र दान दिजंत ॥

भूप भिछक हुइ गए सब; देस देस दुरंत ॥३॥१४४॥

चत्र कोस बनाहि कुंडक; सहस्र लाइ परनार ॥

सहंस्र होम करै लगै; दिज बेद बिआस अउतार ॥

हसत सुंड प्रमान घ्रित की; परत धार अपार ॥

होत भसम अनेक बिंजन; लपट झपट कराल ॥४॥१४५॥

म्रितका सभ तीरथ की; सभ तीरथ को लै बार ॥

कासटका सभ देस की; सभ देस की जिउनार ॥

भांत भातन के महा रस; होमीऐ तिह माहि ॥

देख चक्रत रहै दिज्मबर; रीझ ही नर नाह ॥५॥१४६॥

भात भात अनेक बिजंन; होमीऐ तिह आन ॥

चतुर बेद पड़ै चत्र सभ; बिप ब्यास समान ॥

भात भात अनेक भूपत; देत दान अनंत ॥

भूम भूर उठी जयत धुन; जत्र तत्र दुरंत ॥६॥१४७॥

जीत जीत मवास आसन; अरब खरब छिनाइ ॥

आनि आनि दीए दिजानन; जग मै कुर राइ ॥

भात भात अनेक धूप; सु धूपीऐ तिह आन ॥

भात भात उठी जय धुनि; जत्र तत्र दिसान ॥७॥१४८॥

जरासंधह मार कै पुनि; कैरवा हथि पाइ ॥

राजसूइ कीओ बडो मखि; किसन के मति भाइ ॥

राजसूइ सु कै किते दिन; जीत सत्रु अनंत ॥

बाजमेध अर्मभ कीनो; बेद ब्यास मतंत ॥८॥१४९॥

प्रिथम जग समापतिह ॥

स्री बरण बधह ॥

चंद्र बरणे सुकरनि सियाम; सुवरन पूछ समान ॥

रतन तुंग उतंग बाजत; उच स्रवाह समान ॥

निरत करत चलै धरा परि; काम रूप प्रभाइ ॥

देखि देखि छकै सभै न्रिप; रीझि इउ न्रिपराइ ॥९॥१५०॥

बीण बेण म्रिदंग बाजत; बासुरी सुरनाइ ॥

मुरज तूर मुचंग मंदल; चंग बंग सनाइ ॥

ढोल ढोलक खंजका डफ; झांझ कोट बजंत ॥

जंग घुंघरू टलका; उपजंत राग अनंत ॥१०॥१५१॥

अमित सबद बजंत्र भेरि; हरंत बाज अपार ॥

जात जउन दिसान के पछ; लाग ही सिरदार ॥

जउन बाध तुरंग जूझत; जीतीऐ करि जुध ॥

आन जौन मिलै बचै नहि; मारीऐ करि क्रुध ॥११॥१५२॥

हैय फेर चार दिसान मै; सभ जीत कै छितपाल ॥

बाजमेध करियो सपूरन; अमित जग रिसाल ॥

भात भात अनेक दान; सु दीजीअहि दिजराज ॥

भात भात पट्मबरादिक; बाजियो गजराज ॥१२॥१५३॥

अनेक दान दीए दिजानन; अमित दरब अपार ॥

हीर चीर पट्मबरादि; सुवरन के बहु भार ॥

दुसट पुसट त्रसे सबै; थरहरिओ सुनि गिरराइ ॥

काटि काटि न दै द्विजै; न्रिप बाट बाट लुटाइ ॥१३॥१५४॥

फेर कै सभ देस मै हय; मारिओ मख जाइ ॥

काटि कै तिह को तबै; पल कै करै चतु भाइ ॥

एक बिप्रन एक छत्रन; एक इसत्रिन दीन ॥

चत्र अंस बचियो जु ता ते; होम मै वहि कीन ॥१४॥१५५॥

पंच सै बरख प्रमान; सु राज कै इह दीप ॥

अंत जाइ गिरे रसातल; पंड पुत्र महीप ॥

भूम भरत भए परीछत; परम रूप महान ॥

अमित रूप उदार दान; अछिज तेज निधान ॥१५॥१५६॥

स्री गिआन प्रबोध पोथी दुतीआ जग समापतं ॥

अथ राजा प्रीछत को राज कथनं ॥

रुआल छंद ॥

एक दिवस परीछतहि; मिलि कीयो मंत्र महान ॥

गजामेध सु जग को; किउ कीजीऐ सवधान ॥

बोलि बोलि सु मित्र मंत्रन; मंत्र कीओ बिचार ॥

सेत दंत मंगाइ कै बहु; जुगत सौ अबिचार ॥१॥१५७॥

जग मंडल को रचियो तहि; कोट असट प्रमान ॥

असट सहंस्र बुलाइ रितुजु; असट लछ दिजान ॥

भात भात बनाइ कै तहा; असट सहंस्र प्रनार ॥

हसत सुंड प्रमान ता महि; होमीऐ घ्रित धार ॥२॥१५८॥

देस देस बुलाइ कै; बहु भात भात न्रिपाल ॥

भांत भातन के दीए; बहु दान मान रसाल ॥

हीर चीर पट्मबरादिक; बाज अउ गजराज ॥

साज साज सबै दीए; बहु राज कौ न्रिपराज ॥३॥१५९॥

ऐसि भांति कीओ तहा; बहु बरख लउ तिह राज ॥

करन देव प्रमान लउ; अर जीत कै बहु साज ॥

एक दिवस चड़िओ न्रिप बर; सैल काज अखेट ॥

देख म्रिग भइओ तहा; मुनराज सिउ भई भेट ॥४॥१६०॥

पैड याहि गयो नही म्रिग? रे रखीसर ! बोल ॥

उत्र भूपहि न दीओ मुनि; आखि भी इक खोल ॥

म्रितक सरप निहार कै; जिह अग्र ताह उठाइ ॥

तउन के गर डार कै; न्रिप जात भयो न्रिपराइ ॥५॥१६१॥

आख उघार लखै कहा मुन; सरप देख डरान ॥

क्रोध करत भयो तहा दिज; रकत नेत्र चुचान ॥

जउन मो गरि डारि गिओ; तिह काटि है अहिराइ ॥

सपत दिवसन मै मरै; यहि सति स्राप सदाइ ॥६॥१६२॥

स्राप को सुनि कै डरियो न्रिप; मंद्र एक उसार ॥

मधि गंग रचियो धउलहरि; छुइ सकै न बिआर ॥

सरप की तह गमता को? काटि है तिह जाइ ॥

काल पाइ कट्यो तबै तहि; आन कै अहिराइ ॥७॥१६३॥

साठ बरख प्रमान लउ; दुइ मास यौ दिन चार ॥

जोति जोति बिखै रली; न्रिप राज की करतार ॥

भूम भरथ भए तबै; जनमेज राज महान ॥

सूरबीर हठी तपी; दस चार चार निधान ॥८॥१६४॥

इति राजा प्रीछत समापतं भए राजा जनमेजा राज पावत भए ॥

रूआल छंद ॥

राज को ग्रिह पाइ कै; जनमेज राज महान ॥

सूरबीर हठी तपी; दस चार चार निधान ॥

पितर के बध कोप ते; सब बिप्र लीन बुलाइ ॥

सरप मेध करियो लगे मख; धरम के चित चाइ ॥१॥१६५॥

एक कोस प्रमान लउ; मख कुंड कीन बनाइ ॥

मंत्र सकत करनै लगे तहि; होम बिप्र बनाइ ॥

आन आन गिरै लगे तहि; सरप कोट अपार ॥

जत्र तत्र उठी जैत धुन; भूम भूर उदार ॥२॥१६६॥

हसत एक दू हसत तीन; चउ हसत पंच प्रमान ॥

बीस हाथ इकीस हाथ; पचीस हाथ समान ॥

तीस हाथ बतीस हाथ; छतीस हाथ गिराहि ॥

आन आन गिरै तहा; सभ भसम भूत होइ जाइ ॥३॥१६७॥

एक सौ हसत प्रमान; दो सौ हसत प्रमान ॥

तीन सौ हसत प्रमान; चत्र सै सु समान ॥

पाच सै खट सै लगे; तहि बीच आन गिरंत ॥

सहंस हसत प्रमान लउ सभ; होम होत अनंत ॥४॥१६८॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

रचियो सरप मेधं बडो जग राजं ॥

करै बिप होमै सरै सरब काजं ॥

दहे सरब सरपं अनंतं प्रकारं ॥

भुजै भोग अनंतं जुगै राज दुआरं ॥१॥१६९॥

किते असट हसतं सतं प्राइ नारं ॥

किते दुआदिसे हसत लौ परम भारं ॥

किते द्वै सहंस्र किते जोजनेकं ॥

गिरे होम कुंडं अपारं अचेतं ॥२॥१७०॥

किते जोजने दुइ किते तीन जोजन ॥

किते चार जोजन दहे भूम भोगन ॥

किते मुसट अंगुसट ग्रिसटं प्रमानं ॥

किते डेढु गिसटे अंगुसटं अरधानं ॥३॥१७१॥

किते चार जोजन लउ चार कोसं ॥

छुऐ घ्रित जैसे करै अगन होमं ॥

फणं फटकै फेणका फंतकारं ॥

छुटै लपट ज्वाला बसै बिखधारं ॥४॥१७२॥

किते सपत जोजन लौ कोस असटं ॥

किते असट जोजन महा परम पुसटं ॥

भयो घोर बधं जरे कोट नागं ॥

भज्यो तछकं भछकं जेम कागं ॥५॥१७३॥

कुलं कोट होमै बिखै वहिण कुंडं ॥

बचे बाध डारे घने कुंड झुंडं ॥

भज्यो नाग राजं तक्यो इंद्र लोकं ॥

जर्यो बैद मंत्रं भर्यो सक्र सोकं ॥६॥१७४॥

बध्यो मंत्र जंत्रं गिर्यो भूम मधं ॥

अड़िओ आसतीकं महा बिप्र सिधं ॥

भिड़्यो भेड़ भूपं झिण्यो झेड़ झाड़ं ॥

महा क्रोध उठ्यो तणी तोड़ ताड़ं ॥७॥१७५॥

तज्यो स्रप मेधं भज्यो एक नाथं ॥

क्रिपा मंत्र सूझै सबै स्रिसट साजं ॥

सुनहु राज सरदूल बिद्या निधानं ॥

तपै तेज सावंत जुआला समानं ॥८॥१७६॥

मही माह रूपं तपै तेज भानं ॥

दसं चार चउदाह बिदिआ निधानं ॥

सुनहु राज सासत्रग सारंग पानं ! ॥

तजहु सरप मेधं दिजै मोहि दानं ॥९॥१७७॥

तजहु जो न सरपं जरो अगन आपं ॥

करो दगध तो कौ दिवौ ऐस स्रापं ॥

हण्यो पेट मधं छुरी जमदाड़ं ॥

लगे पाप तो को सुनहु राज गाड़ं ॥१०॥१७८॥

सुने बिप बोलं उठियो आप राजं ॥

तजियो सरप मेधं पिता बैर काजं ॥

बुल्यो ब्यास पासं करियो मंत्र चारं ॥

महा बेद बिआकरण बिदिआ बिचारं ॥११॥१७९॥

सुनी पुत्रका दुइ ग्रिहं कासि राजं ॥

महा सुंदरी रूप सोभा समाजं ॥

जिणिउ जाइ ता को हणो दुसट पुसटं ॥

करियो धिआन ताने लदे भार उसटं ॥१२॥१८०॥

चली सैन सूकर पराची दिसानं ॥

चड़े बीर धीरं हठे ससत्र पानं ॥

दुरियो जाइ दुरग सु बाराणसीसं ॥

घेरियो जाइ फउजं भजिओ एक ईसं ॥१३॥१८१॥

मचियो जुध सुधं बहे ससत्र घातं ॥

गिरे अधु वधं सनधं बिपातं ॥

गिरे हीर चीरं सु बीरं रजाणं ॥

कटै अधु अधं छुटे रुद्र ध्यानं ॥१४॥१८२॥

गिरे खेत्र खत्राण खत्री खत्राणं ॥

बजी भेर भुंकार द्रुकिआ निसाणं ॥

करे पैजवारं प्रचारै सु बीरं ॥

फिरे रुंड मुंडं तणं तछ तीरं ॥१५॥१८३॥

बिभे दंत वरमं प्रछेदै तनानं ॥

करे मरदनं अरदनं मरदमानं ॥

कटे चरम बरमं छुटे चउर चारं ॥

गिरे बीर धीरं छुटे ससत्र धारं ॥१६॥१८४॥

जिण्यो कासकीसं हण्यो सरब सैनं ॥

बरी पुत्रका ताह क्मप्यो त्रिनैनं ॥

भइओ मेल गेलं मिले राज राजं ॥

भई मित्र चारं सरे सरब काजं ॥१७॥१८५॥

मिली राज दाजं सु दासी अनूपं ॥

महा बिद्यवंती अपारं सरूपं ॥

मिले हीर चीरं किते सिआउ करनं ॥

मिले मत दंती किते सेत बरनं ॥१८॥१८६॥

करियो ब्याह राजा भइओ सु प्रसंनं ॥

भली भात पोखे दिजं सरब अंनं ॥

करे भांति भातं महा गज दानं ॥

भए दोइ पुत्रं महा रूप मानं ॥१९॥१८७॥

लखी रूपवंती महाराज दासी ॥

मनो चीर कै चार चंद्रा निकासी ॥

लहै चंचला चार बिदिआ लता सी ॥

किधौ कंजकी माझ सोभा प्रकासी ॥२०॥१८८॥

किधौ फूल माला लखै चंद्रमा सी ॥

किधौ पदमनी मै बनी मालती सी ॥

किधौ पुहप धंनिआ फुली राइबेलं ॥

तजै अंग ते बासु च्मपा फुलेलं ॥२१॥१८९॥

किधौ देव कंनिआ प्रिथी लोक डोलै ॥

किधौ जछनी किन्रनी सिउ कलोलै ॥

किधौ रुद्र बीजं फिरै मधि बालं ॥

किधौ पत्र पानं नचै कउल नालं ॥२२॥१९०॥

किधौ रागमाला रची रंग रूपं ॥

किधौ इसत्रि राजा रची भूप भूपं ॥

किधौ नाग कंनिआ किधौ बासवी है ॥

किधौ संखनी चित्रनी पदमनी है ॥२३॥१९१॥

लसै चित्र रूपं बचित्रं अपारं ॥

महा रूपवंती महा जोबनारं ॥

महा गिआनवंती सु बिगिआन करमं ॥

पड़े कंठि बिदिआ सु बिदिआदि धरमं ॥२४॥१९२॥

लखी राज कंनिआन ते रूपवंती ॥

लसै जोत ज्वाला अपारं अनंती ॥

लख्यो ताहि जनमेजए आप राजं ॥

करे परम भोगं दीए सरब साजं ॥२५॥१९३॥

बढिओ नेहु ता सो तजी राज कंनिआ ॥

हुती सिसट की दिसट महि पुसट धंनिआ ॥

भइओ एक पुत्रं महा ससत्र धारी ॥

दसं चार चउदाह बिदिआ बिचारी ॥२६॥१९४॥

धरिओ असमेधं प्रिथम पुत्र नामं ॥

भइओ असमेधान दूजो प्रधानं ॥

अजै सिंघ राख्यो रजी पुत्र सूरं ॥

महा जंग जोधा महा जस पूरं ॥२७॥१९५॥

भइओ तन दुरुसतं बलिसटं महानं ॥

महाजंग जोधा सु ससत्रं प्रधानं ॥

हणै दुसट पुसटं महा ससत्र धारं ॥

बडे सत्र जीते जिवे रावणारं ॥२८॥१९६॥

चड़िओ एक दिवसं अखेटं नरेसं ॥

लखे म्रिग धायो गयो अउर देसं ॥

स्रमिओ परम बाटं तकियो एक तालं ॥

तहा दउर कै पीन पानं उतालं ॥२९॥१९७॥

करिओ राज सैनं कढिओ बार बाजं ॥

तकी बाजनी रूप राजं समाजं ॥

लग्यो आन ता को रह्यो ताहि गरभं ॥

भइओ सियाम करणं सु बाजी अदरबं ॥३०॥१९८॥

करियो बाज मेधं बडो जग राजा ॥

जिणे सरब भूपं सरे सरब काजा ॥

गड्यो जग थ्मभं करियो होम कुंडं ॥

भली भात पोखे बली बिप्र झुंडं ॥३१॥१९९॥

दए कोट दानं पके परम पाकं ॥

कलू मधि कीनो बडो धरम साकं ॥

लगी देखने आप जिउ राज बाला ॥

महा रूपवंती महा जुआल आला ॥३२॥२००॥

उड्यो पउन के बेग सियो अग्र पत्रं ॥

हसे देख नगनं त्रीयं बिप्र छत्रं ॥

भइओ कोप राजा गहे बिप्र सरबं ॥

दहे खीर खंडं बडे परम गरबं ॥३३॥२०१॥

प्रिथम बाधि कै सरब मूंडे मुंडाए ॥

पुनर एडूआ सीस ता के टिकाए ॥

पुनर तपत कै खीर के मधि डारिओ ॥

इमं सरब बिप्रान कउ जारि मारिओ ॥३४॥२०२॥

किते बाधि कै बिप्र बाचे दिवारं ॥

किते बाध फासी दीए बिप्र भारं ॥

किते बारि बोरे किते अगनि जारे ॥

किते अधि चीरे किते बाध फारे ॥३५॥२०३॥

लगियो दोख भूपं बढियो कुसट देही ॥

सभे बिप्र बोले करियो राज नेही ॥

कहो कउन सो बैठि कीजै बिचारं ॥

दहै देह दोखं मिटै पाप भारं ॥३६॥२०४॥

बोले राज दुआरं सबै बिप्र आए ॥

बडे बिआस ते आदि लै के बुलाए ॥

देखै लाग सासत्रं बोले बिप्र सरबं ॥

करियो बिप्रमेधं बढिओ भूप गरबं ॥३७॥२०५॥

सुनहु राज सरदूल बिदिआ निधानं ! ॥

करियो बिप्र मेधं सु जगं प्रमानं ॥

भइओ अकसमंत्रं कहिओ नाहि कउनै ॥

करी जउन होती भई बात तउनै ॥३८॥२०६॥

सुनहु बिआस ते परब असटं दसानं ॥

दहै देह ते कुसट सरबं न्रिपानं ॥

बोलै बिप्र बिआसं सुनै लाग परबं ॥

परियो भूप पाइन तजे सरब गरबं ॥३९॥२०७॥

सुनहु राज सरदूल बिदिआ निधानं ! ॥

हूओ भरथ के बंस मै रघुरानं ॥

भइओ तउन के बंस मै राम राजा ॥

दीजै छत्र दानं निधानं बिराजा ॥४०॥२०८॥

भइओ तउन की जद मै जदु राजं ॥

दसं चार चौदह सु बिदिआ समाजं ॥

भइओ तउन के बंस मै संतनेअं ॥

भए ताहि के कउरओ पाडवेअं ॥४१॥२०९॥

भए तउन के बंस मै ध्रितरासटरं ॥

महा जुध जोधा प्रबोधा महा सुत्रं ॥

भए तउन के कउरवं क्रूर करमं ॥

कीओ छत्रणं जैन कुल छैण करमं ॥४२॥२१०॥

कीओ भीखमे अग्र सैना समाजं ॥

भइओ क्रुध जुधं समुह पंडु राजं ॥

तहा गरजियो अरजनं परम बीरं ॥

धनुर बेद गिआता तजे परम तीरं ॥४३॥२११॥

तजी बीर बाना वरी बीर खेतं ॥

हणिओ भीखमं सभै सैना समेतं ॥

दई बाण सिजा गरे भीखमैणं ॥

जयं पत्र पाइओ सुखं पाडवेणं ॥४४॥२१२॥

भए द्रोण सैनापती सैनपालं ॥

भइओ घोर जुधं तहा तउन कालं ॥

हणिओ ध्रिसट दोनं तजे द्रोण प्राणं ॥

करिओ जुध ते देवलोकं पिआणं ॥४५॥२१३॥

भए करण सैनापती छत्रपालं ॥

मच्यो जुध क्रुधं महा बिकरालं ॥

हणिओ ताहि पंथं सदं सीसु कपिओ ॥

गिरिओ तउण युधिसटरं राजु थपिओ ॥४६॥२१४॥

भए सैणपालं बली सूल सल्यं ॥

भली भांति कुटिओ बली पंच दल्यं ॥

पुनर हसत युधिसटरं सकत बेधं ॥

गिरियो जुध भूपं बली भूप बेधं ॥४७॥२१५॥

चौपई ॥

सल राजा जउनै दिन जूझा ॥

कउरउ हार तवन ते सूझा ॥

जूझत सल भइओ असतामा ॥

कूटिओ कोट कटकु इक जामा ॥१॥२१६॥

ध्रिसट दोनु मारिओ अतिरथी ॥

पाडव सैन भले करि मथी ॥

पाडव के पाचो सुत मारे ॥

दुआपुर मै बड कीन अखारे ॥२॥२१७॥

कउरउ राज कीओ तब जुधा ॥

भीम संगि हुइ कै अति क्रुधा ॥

जुध करत कबहू नही हारा ॥

काल बली तिह आन संघारा ॥३॥२१८॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

तहा भीम कुरराज सिउ जुध मचिओ ॥

छुटी ब्रहम तारी महा रुद्र नचिओ ॥

उठै सबद निरघात आघात बीरं ॥

भए रुंड मुंडं तणं तछ तीरं ॥१॥२१९॥

गिरे बीर एकं अनेकं प्रकारं ॥

गिरे अध अधं छुधं ससत्र धारं ॥

कटे कउरवं दुर सिंदूर खेतं ॥

नचे गिध आवध सावंत खेतं ॥२॥२२०॥

बली मंडलाकार जूझै बिराजै ॥

हसै गरज ठोकै भुजा हर दु गाजै ॥

दिखावे बली मंडलाकार थानै ॥

उभारै भुजा अउ फटाकै गजानै ॥३॥२२१॥

सुभे सवरन के पत्र बाधे गजा मै ॥

भई अगनि सोभा लखी कै धुजा मै ॥

भिड़ा मै भ्रमै मंडलाकार बाहै ॥

अपो आप सै नेकि घाइं सराहै ॥४॥२२२॥

तहा भीम भारी भुजा ससत्र बाहै ॥

भली भांति कै कै भले सैन गाहै ॥

उतै कउरपालं धरै छत्र धरमं ॥

करै चित पावित्र बाचित्र करमं ॥५॥२२३॥

सभै बाजुवंदं छकै भूपनाणं ॥

लसै मुतका चार दुमलिअं हाणं ॥

दोऊ मीर धीरं दोऊ परम ओजं ॥

दोऊ मानधाता महीपं कि भोजं ॥६॥२२४॥

दोऊ बीर बाना बधै अध अधं ॥

दोऊ ससत्र धारी महा जुध क्रुधं ॥

दोऊ क्रूर करमं दोऊ जान बाहं ॥

दोऊ हदि हिंदून साहान साहं ॥७॥२२५॥

दोऊ ससत्र धारं दोऊ परम दानं ॥

दोऊ ढाल ढीचाल हिंदू हिंदानं ॥

दोऊ ससत्र वरती दोऊ छत्र धारी ॥

दोऊ परम जोधा महा जुधकारी ॥८॥२२६॥

दोऊ खंड खंडी दोऊ मंड मंडं ॥

दोऊ जोध जैतवारु जोधा प्रचंडं ॥

दोऊ बीर बानी दोऊ बाह साहं ॥

दोऊ सूर सैनं दोऊ सूर माहं ॥९॥२२७॥

दोऊ चक्रवरती दोऊ ससत्र बेता ॥

दोऊ जंग जोधी दोऊ जंग जेता ॥

दोऊ चित्र जोती दोऊ चित्र चापं ॥

दोऊ चित्र वरमा दोऊ दुसट तापं ॥१०॥२२८॥

दोऊ खंड खंडी दोऊ मंड मंडं ॥

दोऊ चित्र जोती सु जोधा प्रचंडं ॥

दोऊ मत बारुंन बिक्रम समानं ॥

दोऊ ससत्र बेता दोऊ ससत्र पानं ॥११॥२२९॥

दोऊ परम जोधे दोऊ क्रुधवानं ॥

दोऊ ससत्र बेता दोऊ रूप खानं ॥

दोऊ छत्रपालं दोऊ छत्र धरमं ॥

दोऊ जुध जोधा दोऊ क्रूर करमं ॥१२॥२३०॥

दोऊ मंडलाकार जूझे बिराजै ॥

हथै हर दु ठोकै भुजा पाइ गाजै ॥

दोऊ खत्रहाणं दोऊ खत्र खंडं ॥

दोऊ खग पाणं दोऊ छेत्र मंडं ॥१३॥२३१॥

दोऊ चित्रजोती दोऊ चार बिचारं ॥

दोऊ मंडलाकार खंडा अबारं ॥

दोऊ खग खूनी दोऊ खत्रहाणं ॥

दोऊ खत्रखेता दोऊ छत्रपाणं ॥१४॥२३२॥

दोऊ बीर बिब आसत धारे निहारे ॥

रहे ब्योम मै भूप गउनै हकारे ॥

हका हक लागी धनं धंन ज्मप्यो ॥

चक्यो जछ राजं प्रिथी लोक क्मप्यो ॥१५॥२३३॥

हनिओ राज दुरजोधनं जुध भूमं ॥

भजे सभै जोधा चली धाम धूमं ॥

करियो राज निहकंटकं कउरपालं ॥

पुनर जाइ कै मझि सिझै हिवालं ॥१६॥२३४॥

तहा एक गंध्रब सिउ जुध मच्यो ॥

तहा भूरपालं धूरा रंगु रच्यो ॥

तहा सत्रु के भीम हसती चलाए ॥

फिरे मधि गैणं अजउ लउ न आए ॥१७॥२३५॥

सुनै बैन कउ भूप इउ ऐठ नाकं ॥

करियो हास मंदै बुल्यो एम बाकं ॥

रहियो नाक मै कुसट छत्री सवानं ॥

भई तउन ही रोग ते भूप हानं ॥१८॥२३६॥

चौपई ॥

इम चउरासी बरख प्रमानं ॥

सपत माह चउबीस दिनानं ॥

राज कीओ जनमेजा राजा ॥

काल नीसानु बहुरि सिरि गाजा ॥१९॥२३७॥

इति जनमेजा समापत भइआ ॥

चौपई ॥

असुमेध अरु असमेदहारा ॥

महा सूर सतवान अपारा ॥

महा बीर बरिआर धनुख धर ॥

गावत कीरत देस सभ घर घर ॥१॥२३८॥

महा बीर अरु महा धनुख धर ॥

कापत तीन लोक जा के डर ॥

बड महीप अरु अखंड प्रतापा ॥

अमित तेज जापत जग जापा ॥२॥२३९॥

अजै सिंघ उत सूर महाना ॥

बड महीप दस चार निधाना ॥

अनबिकार अनतोल अतुल बल ॥

अर अनेक जीते जिन दलमल ॥३॥२४०॥

जिन जीते संग्राम अनेका ॥

ससत्र असत्र धरि छाडन एका ॥

महा सूर गुनवान महाना ॥

मानत लोक सगल जिह आना ॥४॥२४१॥

मरन काल जनमेजे राजा ॥

मंत्र कीओ मंत्रीन समाजा ॥

राज तिलक भूपत अभखेखा ॥

निरखत भए न्रिपत की रेखा ॥५॥२४२॥

इन महि राज कवन कउ दीजै ॥

कउन न्रिपत सुत कउ न्रिपु कीजै ॥

रजीआ पूत न राज की जोगा ॥

याहि के जोग न राज के भोगा ॥६॥२४३॥

अस्वमेद कहु दीनो राजा ॥

जै पति भाख्यो सकल समाजा ॥

जनमेजा की सुगति कराई ॥

अस्वमेद कै वजी वधाई ॥७॥२४४॥

दूसर भाइ हुतो जो एका ॥

रतन दीए तिह दरब अनेका ॥

मंत्री कै अपना ठहराइओ ॥

दूसर ठउर तिसहि बैठाइओ ॥८॥२४५॥

तीसर जो रजीआ सुत रहा ॥

सैनपाल ता को पुन कहा ॥

बखसी करि ताकौ ठहराइओ ॥

सब दल को तिह कामु चलाइओ ॥९॥२४६॥

राजु पाइ सभहू सुख पाइओ ॥

भूपत कउ नाचब सुख आइओ ॥

तेरह सै चौसठ मरदंगा ॥

बाजत है कई कोट उपंगा ॥१०॥२४७॥

दूसर भाइ भए मद अंधा ॥

देखत नाचत लाइ सुगंधा ॥

राज साज दुहहूं ते भूला ॥

वाही कै जाइ छत्र सिर झूला ॥११॥२४८॥

करत करत बहु दिन अस राजा ॥

उन दुहूं भूलिओ राज समाजा ॥

मद करि अंध भए दोऊ भ्राता ॥

राज करन की बिसरी बाता ॥१२॥२४९॥

दोहरा ॥

जिह चाहे, ता को हने; जो बाछै सो लेइ ॥

जिह राखै, सोई रहै; जिह जानै तिह देइ ॥१३॥२५०॥

चौपई ॥

ऐसी भात कीनो इह जब ही ॥

प्रजा लोक सभ बस भए तब ही ॥

अउ बसि होइ गए नेब खवासा ॥

जो राखत थे न्रिप की आसा ॥१॥२५१॥

एक दिवस तिहूं भ्रात सुजाना ॥

मंडस चौपर खेल खिलाना ॥

दाउ समै कछु रिसक बिचारिओ ॥

अजै सुनत इह भात उचारिओ ॥२॥२५२॥

दोहरा ॥

कहा करै, दा कह परै; कह यह बाधै सूत ॥

कहा सत्रु या ते मरै; जो रजीआ का पूत ॥३॥२५३॥

चौपई ॥

यहै आज हम खेल बिचारी ॥

सो भाखत है प्रगट पुकारी ॥

एकहि रतन राज धनु लीना ॥

दुतीऐ अस्व उसट गज लीना ॥१॥२५४॥

कुअरै बाट सैन सभ लीआ ॥

तीनहु बाट तीन कर कीआ ॥

पासा ढार धरै कस दावा ॥

कहा खेल धौ करै करावा ॥२॥२५५॥

चउपर खेल परी तिह माहा ॥

देखत ऊच नीच नर नाहा ॥

ज्वाला रूप सुपरधा बाढी ॥

भूपन फिरत संघारत काढी ॥३॥२५६॥

तिन कै बीच परी अस खेला ॥

कटन सु हित भइउ मिटन दुहेला ॥

प्रिथमै रतन द्रिब बहु लायो ॥

बसत्र बाज गज बहुत हरायो ॥४॥२५७॥

दुहूंअन बीच सुपरधा बाढा ॥

दुह दिस उठे सुभट अस काढा ॥

चमकहि कहूं असन की धारा ॥

बिछ गई लोथ अनेक अपारा ॥५॥२५८॥

जुगन दैत फिरहि हरिखाने ॥

गीध सिवा बोलहि अभिमाने ॥

भूत प्रेत नाचहि अरु गावहि ॥

कहूं कहूं सबद बैताल सुनावहि ॥६॥२५९॥

चमकत कहूं खगन की धारा ॥

बिथ गए रुंड भसुंड अपारा ॥

चिंसत कहूं गिरे गज माते ॥

सोवत कहूं सुभट रण ताते ॥७॥२६०॥

हिंसत कहूं गिरे है घाए ॥

सोवत क्रूर सलोक पठाए ॥

कटि गए कहूं कउच अरु चरमा ॥

कटि गए गज बाजन के बरमा ॥८॥२६१॥

जुगन देत कहूं किलकारी ॥

नाचत भूत बजावत तारी ॥

बावन बीर फिरै चहूं ओरा ॥

बाजत मारू राग सिदउरा ॥९॥२६२॥

रण अस काल जलध जिम गाजा ॥

भूत पिसाच भीर भै भाजा ॥

रण मारू इह दिस ते बाज्यो ॥

काइरु हुतो सो भी नहि भाज्यो ॥१०॥२६३॥

रहि गई सूरन खग की टेका ॥

कटि गए सुंड भसुंड अनेका ॥

नाचत जोगन कहूं बितारा ॥

धावत भूत प्रेत बिकरारा ॥११॥२६४॥

धावत अध कमध अनेका ॥

मंडि रहे रावत गडि टेका ॥

अनहद राग अनाहद बाजा ॥

काइरु हुता वहै नही भाजा ॥१२॥२६५॥

मंदर तूर करूर करोरा ॥

गाज सरावत राग संदोरा ॥

झमकसि दामन जिम करवारा ॥

बरसत बानन मेघ अपारा ॥१३॥२६६॥

घूमहि घाइल लोह चुचाते ॥

खेल बसंत मनो मद माते ॥

गिर गए कहूं जिरह अरु जुआना ॥

गरजन गिध पुकारत सुआना ॥१४॥२६७॥

उन दल दुहूं भाइन को भाजा ॥

ठांढ न सकियो रंकु अरु राजा ॥

तकिओ ओडछा देसु बिचछन ॥

राजा न्रिपति तिलक सुभ लछन ॥१५॥२६८॥

मद करि मत भए जे राजा ॥

तिन के गए ऐस ही काजा ॥

छीन छान छित छत्र फिरायो ॥

महाराज आपही कहायो ॥१६॥२६९॥

आगे चले अस्वमेध हारा ॥

धवहि पाछे फउज अपारा ॥

गे जहि न्रिपत तिलक महाराजा ॥

राज पाट वाहू कउ छाजा ॥१७॥२७०॥

तहा इक आहि सनउढी ब्रहमन ॥

पंडत बडे महा बड गुन जन ॥

भूपहि को गुर सभहु की पूजा ॥

तिह बिनु अवरु न मानहि दूजा ॥१८॥२७१॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

कहूं ब्रहम बानी करहि बेद चरचा ॥

कहूं बिप्र बैठे करहि ब्रहम अरचा ॥

तहा बिप्र सनौढ ते एक लछन ॥

करै बकल बसत्रं फिरै बाइ भछन ॥१॥२७२॥

कहूं बेद सियामं सुरं साथ गावै ॥

कहूं जुजर बेदं पड़े मान पावै ॥

कहूं रिगं बाचै महा अरथ बेदं ॥

कहूं ब्रहम सिछा कहूं बिसन भेदं ॥२॥२७३॥

कहूं असट द्वै अवतार कथै कथाणं ॥

दसं चार चउदाह बिदिआ निधानं ॥

तहा पंडतं बिप्र परमं प्रबीनं ॥

रहे एक आसं निरासं बिहीनं ॥३॥२७४॥

कहूं कोकसारं पड़ै नीत धरमं ॥

कहूं न्याइ सासत्र पड़ै छत्र करमं ॥

कहूं ब्रहम बिदिआ पड़ै ब्योम बानी ॥

कहूं प्रेम सिउ पाठि पठिऐ पिड़ानी ॥४॥२७५॥

कहूं प्राक्रितं नाग भाखा उचारहि ॥

कहूं सहसक्रित ब्योम बानी बिचारहि ॥

कहूं सासत्र संगीत मै गीत गावै ॥

कहूं जछ गंध्रब बिदिआ बतावै ॥५॥२७६॥

कहूं निआइ मीमासका तरक सासत्रं ॥

कहूं अगनि बाणी पड़ै ब्रहम असत्रं ॥

कहूं बेद पातंजलै सेख कानं ॥

पड़ै चक्र चवदाह बिदिआ निधानं ॥६॥२७७॥

कहूं भाख बाचै कहूं कोमदीअं ॥

कहूं सिधका चंद्रका सारसुतीयं ॥

कहूं ब्याकरण बैसिकालाप कथे ॥

कहूं प्राक्रिआ कासका सरब मथे ॥७॥२७८॥

कहूं बैठ मानोरमा ग्रंथ बाचै ॥

कहूं गाइ संगीत मै गीत नाचे ॥

कहूं ससत्र की सरब बिदिआ बिचारै ॥

कहूं असत्र बिदिआ बाचै सोक टारै ॥८॥२७९॥

कहू गदा को जुध कै कै दिखावै ॥

कहूं खड़ग बिदिआ जुझै मान पावै ॥

कहूं बाक बिदिआहि छोरं प्रबानं ॥

कहूं जलतुरं बाक बिदिआ बखानं ॥९॥२८०॥

कहूं बैठ के गारड़ी ग्रंथ बाचै ॥

कहूं साभवी रास भाखा सु राचै ॥

कहूं जामनी तोरकी बीर बिदिआ ॥

कहूं पारसी कौच बिदिआ अभिदिआ ॥१०॥२८१॥

कहूं ससत्र की घाउ बिदिआ बतैगो ॥

कहूं असत्र को पातका पै चलैगो ॥

कहूं चरम की चार बिदिआ बतावै ॥

कहूं ब्रहम बिदिआ करै दरब पावै ॥११॥२८२॥

कहूं न्रित बिदिआ कहूं नाद भेदं ॥

कहूं परम पौरान कथै कतेबं ॥

सभै अछर बिदिआ सभै देस बानी ॥

सभै देस पूजा समसतो प्रधानी ॥१२॥२८३॥

कहं सिंघनी दूध बछे चुंघावै ॥

कहूं सिंघ लै संग गऊआ चरावै ॥

फिरै सरप न्रिक्रुध तौनि सथलानं ॥

कहूं सासत्री सत्र कथै कथानं ॥१३॥२८४॥

तथा सत्र मित्रं तथा मित्र सत्रं ॥

जथा एक छत्री तथा परम छत्रं ॥

तहा गयो अजै सिंघ सूरा सुक्रुधं ॥

हनियो असमेधं करिओ परम जुधं ॥१४॥२८५॥

रजीआ पुत्र दिखियो डरे दोइ भ्रातं ॥

गही सरण बिप्रं बुलियो एव बातं ॥

गुवा हेम सरबं मिले प्रान दानं ॥

सरनं सरनं सरनं गुरानं ॥१५॥२८६॥

चौपई ॥

तब भूपत तह दूत पठाए ॥

त्रिपत सकल दिज कीए रिझाए ॥

असमेध अरु असुमेद हारा ॥

भाज परे घर ताक तिहारा ॥१॥२८७॥

कै दिज बाध देहु दुऐ मोहू ॥

नातर धरो दुजनवा तोहू ॥

करिओ न पूजा देउ न दाना ॥

तो को दुख देवो दिज नाना ॥२॥२८८॥

कहा म्रितक दुइ कंठ लगाए ॥

देहु हमै तुम कहा लजाए? ॥

जउ दुऐ ए तुम देहु न मोहू ॥

तउ हम सिख न होइ है तोहू ॥३॥२८९॥

तब दिज प्रात कीओ इसनाना ॥

देव पित्र तोखे बिध नाना ॥

चंदन कुंकम खोर लगाए ॥

चल कर राज सभा मै आए ॥४॥२९०॥

दिजो बाच ॥

हमरी वै न परै दुऐ डीठा ॥

हमरी आइ परै नही पीठा ॥

झूठ कहियो जिन तोहि सुनाई ॥

महाराज ! राजन के राई ॥१॥२९१॥

महाराज राजन के राजा ! ॥

नाइक अखल धरण सिर ताजा ॥

हम बैठे तुम देहु असीसा ॥

तुम राजा राजन के ईसा ॥२॥२९२॥

राजा बाच ॥

भला चहो आपन जो सबही ॥

वै दुइ बाध देहु मुहि अबही ॥

सबही करो अगन का भूजा ॥

तुमरी करउ पिता जिउ पूजा ॥३॥२९३॥

जो न परै वै भाज तिहारे ॥

कहे लगो तुम आज हमारे ॥

हम तुम को ब्रिंजनाद बनावै ॥

हम तुम वै तीनो मिल खावै ॥४॥२९४॥

दिज सुन बात चले सभ धामा ॥

पूछे भ्रात सुपूत पितामा ॥

बाध देहु, तउ छूटे धरमा ॥

भोज भुजे, तउ छूटे करमा ॥५॥२९५॥

यहि रजीआ का पुत महाबल ॥

जिन जीते छत्री गन दलमल ॥

छत्रापन आपन बल लीना ॥

इन को काढि धरन ते दीना ॥६॥२९६॥

तोटक छंद ॥

इम बात जबै न्रिप ते सुनियं ॥

ग्रह बैठ सबै दिज मंत्र कीयं ॥

अज सैन अजै भट दास सुतं ॥

अत दुहकर कुतसित क्रूर मतं ॥७॥२९७॥

मिल खाइ तउ खोवै जनम जगं ॥

नहि खात तु जात है काल मगं ॥

मिल मित्र ! सु कीजै कउन मतं? ॥

जिह भात रहे जग आज पतं ॥८॥२९८॥

सुन राजन राज ! महान मतं ! ॥

अनभीत अजीत समसत छितं ॥

अनगाह अथाह अनंत दलं ॥

अनभंग अगंज महा प्रबलं ॥९॥२९९॥

इह ठउर न छत्री एक नरं ॥

सुन साचु महा न्रिपराज बरं ॥

कहिकै दिज सउ उठि जात भए ॥

वेह आनि जसूस बताइ दए ॥१०॥३००॥

तहा सिंघ अजै मनि रोस बढी ॥

करि कोप चमूं चतुरंग चढी ॥

तह जाइ परी जह खत्र बरं ॥

बहु कूदि परे दिज साम घरं ॥११॥३०१॥

दिज मंडल बैठि बिचारु कीयो ॥

सब ही दिज मंडल गोद लीयो ॥

कहु कउन सु बैठि बिचार करै ॥

न्रिप साथ रहै नही एऊ मरै ॥१२॥३०२॥

इह भांति कही तिह ताहि सभै ॥

तुम तोर जनेवन देहु अबै ॥

जोऊ मानि कहियो सोई लेत भए ॥

तेऊ बैस हुइ बाणज करत भए ॥१३॥३०३॥

जिह तोर जनेऊ न कीन हठं ॥

तिन सिउ उन भोजु कीओ इकठं ॥

फिर जाइ जसूसहि ऐस कहिओ ॥

इन मै उन मै इक भेदु रहिओ ॥१४॥३०४॥

पुनि बोलि उठियो न्रिप सरब दिजं ॥

नहि छत्रतु देहु सुताहि तुअं ॥

मरिगे सुनि बात मनो सब ही ॥

उठि कै ग्रिहि जात भए तब ही ॥१५॥३०५॥

सभ बैठि बिचारन मंत्र लगे ॥

सभ सोक के सागर बीच डुबे ॥

वहि बाध बहिठ अति तेऊ हठं ॥

हम ए दोऊ भ्रात चलै इकठं ॥१६॥३०६॥

हठ कीन दिजै तिन लीन सुता ॥

अति रूप महा छबि परम प्रभा ॥

त्रियो पेट सनौढ ते पूत भए ॥

वहि जाति सनौढ कहात भए ॥१७॥३०७॥

सुत अउरन के उह ठां जु अहै ॥

उत छत्रीअ जाति अनेक भए ॥

न्रिप के संगि जो मिलि जातु भए ॥

नर सो रजपूत कहात भए ॥१८॥३०८॥

तिन जीत बिजै कहु राउ चड़्यो ॥

अति तेजु प्रचंड प्रतापु बढ्यो ॥

जोऊ आनि मिले अरु साक दए ॥

नर ते रजपूत कहात भए ॥१९॥३०९॥

जिन साक दए नहि रारि बढी ॥

तिन की इन लै जड़ मूल कढी ॥

दल ते बल ते धन टूटि गए ॥

वहि लागत बानज करम भए ॥२०॥३१०॥

जोऊ आनि मिले नहि जोरि लरे ॥

वहि बाध महागनि होम करे ॥

अनगंध जरे महा कुंड अनलं ॥

भइओ छत्रीअ मेधु महा प्रबलं ॥२१॥३११॥

इति अजै सिंघ का राज स्मपूरन भइआ ॥

जगराज ॥ तोमर छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

बिआसी बरख परमान ॥

दिन दोइ मास असटान ॥

बहु राजु भाग कमाइ ॥

पुनि न्रिप को न्रिपराइ ॥१॥३१२॥

सुन राज राज महान ॥

दस चारि चारि निधान ॥

दस दोइ दुआदस मंत ॥

धरनी धरान महंति ॥२॥३१३॥

पुनि भयो उदोत न्रिपाल ॥

रस रति रूप रसाल ॥

अति भान तेज प्रचंड ॥

अनखंड तेज प्रचंड ॥३॥३१४॥

तिनि बोलि बिप्र महान ॥

पसु मेध जग रचान ॥

दिज प्राग जोत बुलाइ ॥

अपि कामरूप कहाइ ॥४॥३१५॥

दिज कामरूप अनेक ॥

न्रिप बोलि लीन बिसेख ॥

सभ जीअ जग अपार ॥

मख होम कीन अबिचार ॥५॥३१६॥

पसु एक पै दस बार ॥

पड़ि बेद मंत्र अबिचार ॥

अबि मधि होम कराइ ॥

धनु भूप ते बहु पाइ ॥६॥३१७॥

पसु मेघ जग कराइ ॥

बहु भात राजु सुहाइ ॥

बरख असीह असट प्रमान ॥

दुइ मास राजु कमान ॥७॥३१८॥

पुन कठन काल करवाल ॥

जग जारीआ जिह जुवाल ॥

वहि खंडीआ अनखंड ॥

अनखंड राज प्रचंड ॥८॥३१९॥

इति पंचमो राज समापतम सतु सुभम सतु ॥

तोमर छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

पुन भए मुनी छित राइ ॥

इह लोक केहरि राइ ॥

अरि जीति जीति अखंड ॥

महि कीन राजु प्रचंड ॥१॥३२०॥

अरि घाइ घाइ अनेक ॥

रिपु छाडीयो नहीं एक ॥

अनखंड राजु कमाइ ॥

छित छीन छत्र फिराइ ॥२॥३२१॥

अनखंड रूप अपार ॥

अनमंड राज जुझार ॥

अबिकार रूप प्रचंड ॥

अनखंड राज अमंड ॥३॥३२२॥

बहु जीति जीति न्रिपाल ॥

बहु छाडि कै सर जाल ॥

अरि मारि मारि अनंत ॥

छित कीन राज दुरंत ॥४॥३२३॥

बहु राज भाग कमाइ ॥

इम बोलीओ न्रिपराइ ॥

इक कीजीऐ मखसाल ॥

दिज बोलि लेहु उताल ॥५॥३२४॥

दिज बोलि लीन अनेक ॥

ग्रिह छाडीओ नही एक ॥

मिलि मंत्र कीन बिचार ॥

मति मित्र मंत्र उचार ॥६॥३२५॥

तब बोलिओ न्रिप राइ ॥

करि जग को चित चाइ ॥

किव कीजीऐ मखसाल ॥

कहु मंत्र मित्र ! उताल ॥७॥३२६॥

तब मंत्र मित्रन कीन ॥

न्रिप संग यउ कहि दीन ॥

सुनि राज राज उदार ॥

दस चारि चारि अपार ॥८॥३२७॥

सतिजुग मै सुनि राइ ! ॥

मख कीन चंड बनाइ ॥

अरि मार कै महिखेस ॥

बहु तोख कीन पसेस ॥९॥३२८॥

महिखेस कउ रण घाइ ॥

सिरि इंद्र छत्र फिराइ ॥

करि तोख जोगनि सरब ॥

करि दूर दानव गरब ॥१०॥३२९॥

महिखेस कउ रणि जीति ॥

दिज देव कीन अभीत ॥

त्रिदसेस लीन बुलाइ ॥

छित छीन छत्र फिराइ ॥११॥३३०॥

मुखचार लीन बुलाइ ॥

चित चउप सिउ जग माइ ॥

करि जग को आर्मभ ॥

अनखंड तेज प्रचंड ॥१२॥३३१॥

तब बोलीयो मुख चार ॥

सुनि चंडि चंड जुहार ! ॥

जिम होइ आइस मोहि ॥

तिम भाखऊ मत तोहि ॥१३॥३३२॥

जग जीअ जंत अपार ॥

निज लीन देव हकार ॥

अरि काटि कै पल खंड ॥

पड़ि बेद मंत्र उदंड ॥१४॥३३३॥

रूआल छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

बोलि बिपन मंत्र मित्रन; जग कीन अपार ॥

इंद्र अउर उपिंद्र लै कै; बोलि कै मुख चार ॥

कउन भातन कीजीऐ अब; जग को आर्मभ ॥

आज मोहि उचारीऐ; सुनि मित्र मंत्र ! अस्मभ ॥१॥३३४॥

मास के पल काटि कै; पड़ि बेद मंत्र अपार ॥

अगनि भीतर होमीऐ; सुनि राज राज ! अबिचार ॥

छेदि चिछुर बिड़ारासुर; धूलि करणि खपाइ ॥

मार दानव कउ करिओ मख; दैत मेध बनाइ ॥२॥३३५॥

तैस ही मख कीजीऐ; सुनि राज राज ! प्रचंड ॥

जीति दानव देस के; बलवान पुरख अखंड ॥

तैस ही मख मार कै; सिरि इंद्र छत्र फिराइ ॥

जैस सुर सुखु पाइओ; तिव संत होहु सहाइ ॥३॥३३६॥


गिआन प्रबोध स्मपूरन ॥