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दसम ग्रन्थ/चंडी की वार

विकिपुस्तक से


ਵਾਰ ਦੁਰਗਾ ਕੀ ॥

वार दुरगा की ॥

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

स्री भगउती जी सहाइ ॥

अथ वार दुरगा की लिख्यते ॥

पातिसाही १० ॥

पउड़ी ॥

प्रथमि भगउती सिमर कै; गुरू नानक लई धिआइ ॥

अंगद गुर ते अमरदास; रामदासै होई सहाइ ॥

अरजुन हरिगोबिंद नो; सिमरो स्री हरिराइ ॥

स्री हरिक्रिसनि धिआईऐ; जिसु डिठे सभु दुखु जाइ ॥

तेग बहादुर सिमरीऐ; घरि नौ निध आवै धाइ ॥

सभ थाई होइ सहाइ ॥१॥

खंडा प्रथमि मनाइकै; जिन सभ सैसार उपाइआ ॥

ब्रहमा बिसनु महेस साजि; कुदरति दा खेलु बणाइआ ॥

सिंधु परबत मेदनी; बिनु थमा गगन रहाइआ ॥

सिरजे दानो देवते; तिन अंदरि बादु रचाइआ ॥

तै ही दुरगा साजि कै; दैता दा नास कराइआ ॥

तैथो ही बलु राम लै; नाल बाणा रावणु घाइआ ॥

तैथो ही बलु क्रिसन लै; कंस केसी पकड़ि गिराइआ ॥

बडे बडे मुनि देवते; कई जुग तिनी तन ताइआ ॥

किनै तेरा अंत न पाइआ ॥२॥

साधू सतिजुग बीतिआ; अधसीली त्रेता आइआ ॥

नची कलि सरोसरी; कलि नारद डउरू वाइआ ॥

अभिमान उतारन दिउतिआ; महिखासुर सु्मभ उपाइआ ॥

जीत लए तिनि देवते; तिहु लोकी राजु कमाइआ ॥

वडा बीर अखाइ कै; सिर उपरि छत्र फिराइआ ॥

दिता इंद्र निकाल के; तिनि गिर कैलासु तकाइआ ॥

डर कै हथों दानवी; दिल अंदरि त्रास वधाइआ ॥

पास दुरगा दे इंद्रु आइआ ॥३॥

इक दिहाड़ै आई, न्हावण दुरग साह ॥

इंद्र ब्रिथा सुणाई, आपणे हाल दी ॥

छीनि लई ठकुराई, साते दानवी ॥

लोकी तिही फिराई, दोही आपणी ॥

बैठे वाइ वधाई, ते अमरावती ॥

दिते देव भजाई, सभना राकसा ॥

किनै न जितिआ जाई, महिखै दैत नूं ॥

तेरी साम तकाई, देवी दुरगसाह ! ॥४॥

दुरगा बैण सुणंदी, हसी हड़ हड़ाइ ॥

ओही सीहु बुलाइआ, राकस भखणा ॥

चिंता करहु न काई, देवा नूं आखिआ ॥

रोह होई महामाई, राकसि मारणे ॥५॥

दोहरा ॥

राकस आए रोहले; खेति भिड़न के चाइ ॥

लसकनि तेगा बरछीआ; सूरज नदरि न पाइ ॥६॥

पउड़ी ॥

दुहा कंधारा मुंह जुड़े; ढोल संख नगारे बजे ॥

राकस आए रोहले; तरवारी बखतर सजे ॥

जुटे सउहे जुध नो; इक जाति न जाणनि भजे ॥

खेत अंदर जोधे गजे ॥७॥

जंग मुसाफा बजिआ; रणि घुरे नगारे चावले ॥

झूलनि नेजे बैरका; नीसाण लसनि लसावले ॥

ढोल नगारे पउणदे; ऊघन जाणु जटावले ॥

दुरगा दानो रणि डहे; खेत वजनि नाद भीहावले ॥

बीर प्रोते ब्रछीए; जणु डाल चमुटे आवले ॥

इक वढे तेगी तड़फीअन; मद पीते लोटनि बावले ॥

इक चुणि चुणि झाड़हु कढीअन; रेत विचो सोइना डावले ॥

गदा त्रिसूला बरछीआ; तीर वगनि खरे उतावले ॥

जणु डसे भुयंगम सावले; मरि जावनि बीर रोहावले ॥८॥

वेखण चंडि प्रचंड नो; रणि घुरे नगारे ॥

धाए राकस रोहले; चउगिरदे भारे ॥

हथी तेगा पकड़ि कै; रणि भिड़े करारे ॥

कदे न नठै जुध ते; जोधे जुझारे ॥

दिल विच रोह बढाइ कै; मारु मारु पुकारे ॥

मारे चंडि प्रचंड नै; बीर खेति उतारे ॥

मारे जापनि बिजुली; सिर भारि मुनारे ॥९॥

चोट पई दमामे, दला मुकाबला ॥

देवी दसति नचाई, सीहणि सार दी ॥

पेटि मलंदे लाई, महिखे दैत नो ॥

गुरदे आंदा खाई, नाल रुकड़े ॥

जेही दिल विच आई, कही सुणाइ कै ॥

चोटी जाणु दिखाई, तारे धूमकेति ॥१०॥

चोटा पवनि नगारे, अणीआ जुटीआ ॥

धूहि लईआ तरवारी, देवा दानवा ॥

वाहनि वारो वारी, सूरे संघरे ॥

वगै रतु झुलारी, जिउ गेरू बाबुत्रा ॥

वेखनि बैठि अटारी, नारी राकसा ॥

पाई धूम सवारी, दुरगा दानवी ॥११॥

लख नगारे वजनि, आम्हो साहमणे ॥

राकस रणहुं न भजनि, रोहे रोहले ॥

सीहा वागूं गजण, सभे सूरमे ॥

तणि तणि कैबर छडनि, दुरगा साम्हणे ॥१२॥

घुरे नगारे डोहरे; रणि संगलीआले ॥

धूड़ि लपेटे धूहरे; सरदार जटाले ॥

उखलीआ नासा जिना; मूंहि जापन आले ॥

धाए देवी साम्हणे; बीर मुछलीआले ॥

सुरपति जेहे लड़ि हटे; बीर टले न टाले ॥

गजे दुरगा घेरि कै; जणु घणीअरु काले ॥१३॥

चोट पई खरचामी, दला मुकाबला ॥

घेरि लई वरिआमी, दुरगा आइ कै ॥

राखस बडै अलामी, भज न जाणदे ॥

अंति होए सुरगामी, मारे देवता ॥१४॥

अगणत घुरे नगारे, दला भिड़ंदिआ ॥

पाए महखल भारे, देवा दानवा ॥

वाहनि फट करारे, राकस रोहले ॥

जापनि तेगी आरे, मिआनो धूहीआ ॥

जोधे वडे मुनारे, जापन खेत विच ॥

देवी आप सवारे, पबां जवेहणे ॥

कदे न आखनि हारे, धावनि साम्हणे ॥

दुरगा सभे संघारे, राखस खड़ग लै ॥१५॥

उमल लथे जोधे, मारू वजिआ ॥

बदल जिउ महिखासुर, रण विच गजिआ ॥

इंद्र जेहा जोधा, मैथो भजिआ ॥

कउण विचारी दुरगा, जिनि रण सजिआ ॥१६॥

वजे ढोल नगारे, दला मुकाबला ॥

तीर फिरै रैबारे, आम्हो साम्हणे ॥

अगणत बीर संघारे, लगदी कैबरी ॥

डिगे जाण मुनारे, मारै बिजु दै ॥

खुल्ही वाली दैत अहाड़े, सभे सूरमे ॥

सुते जाणु जटारे, भंगा खाइ कै ॥१७॥

दुहा कंधारा मुंह जुड़े; नाल धउसा भारी ॥

कड़कि उठिआ फउज ते; वडा हंकारी ॥

लै कै चलिआ सूरमे; नालि वडे हजारी ॥

मिआनो खंडा धूहिआ; महिखासुर भारी ॥

उमल लथे सूरमे; मार मची करारी ॥

चले जापनि रत दे; सलले जटधारी ॥१८॥

सट पई जमधाणी; दला मुकाबला ॥

धूहि लई किरपाणी; दुरगा मिआन ते ॥

चंडी राकस खाणी; वाही दैत नूं ॥

कोपर चूरि चवाणी; लथी करग लै ॥

पाखर तुरा पलाणी; रड़की धरति जाइ ॥

लैदी अघा सिधाणी; सिंगा धउल दिआ ॥

कूरम सिर लहलाणी; दुसमन मार कै ॥

वढे गंन तिखाणी; मूए खेत विच ॥

रण विच घती घाणी; लोहू मिझ दी ॥

चारे जुग कहाणी; चलगि तेग दी ॥

विधण खेति विहाणी; महिखे दैत नूं ॥१९॥

इती महिखासुर दैत मारे दुरगा आइआ ॥

चउदह लोका राणी सिंघु नचाइआ ॥

मारे वीर जटाणी; दल विचि अगले ॥

मंगण नाही पाणी; दली हंकारि कै ॥

जणु करी समाइ पठाणी; सुणि कै रागु नूं ॥

रतु दे हड़्हवाणी; चले बीर खेत ॥

पीता फुल अयाणी; घूमणि सूरमे ॥२०॥

होई लोप भवानी; देवा नूं राजु दे ॥

ईसर दी बरदानी; होई जितु दिन ॥

सु्मभ निसु्मभ गुमानी; जनमे सूरमे ॥

इंद्र दी राजधानी; तकी जितणी ॥२१॥

इंद्र पुरी ते धावणा; वड जोधी मता पकाइआ ॥

संज पटेला पाखरा; भेड़ संदा साजु बणाइआ ॥

जुमे कटक अछूहणी; असमान गरदै छाइआ ॥

रोहि सु्मभ निसु्मभ सिधाइआ ॥२२॥

सु्मभ निसु्मभ अलाइआ; वड जोधी संघर वाए ॥

रोह दिखाली दितीआ; वरिआमी तुरे नचाए ॥

घुरे दमामे दोहरे; जम बाहण जिउ अरड़ाए ॥

देउ दानो लुझण आए ॥२३॥

दानो देउ अनागी, संघरु रचिआ ॥

फुल खिड़े जणु बागी, बाणै जोधिआ ॥

भूता इला कागी, गोसत भखिआ ॥

हुमड़ धुमड़ जागी, घती सूरिआ ॥२४॥

सट पई नगारे, दला मुकाबला ॥

दिते देउ भजाई, मिल कै राकसी ॥

लोकी तिही फिराही, दोही आपणी ॥

दुरगा दी साम तकाई, देवा डरदिआ ॥

आदी चंडि चड़ाई; उते राकसा ॥२५॥

आई फेरि भवानी, खबरी पाईआ ॥

दैत वडे अभिमानी, होए एकठे ॥

लोचन धूम गुमानी, राइ बुलाइआ ॥

वडा जग विच दानो, आप कहाइआ ॥

चोट पई खरचामी, दुरगा लिआवणी ॥२६॥

कड़कि उठी रणि चंडी, फउजा देखि कै ॥

धूहि मिआनो खंडा, धाई साम्हणे ॥

सभे बीर संघारे, धूमर नैण दे ॥

जणु लै कटे आरे, दरखत बाढीआ ॥२७॥

चोबी धउस वजाई, दला मुकाबला ॥

रोहि भवानी आई, उतै राखसा ॥

खबे दसत नचाई, सीहण सार दी ॥

बहुतिआ दे तनि लाई, कीती रंगुली ॥

भाईआ मारनि भाई, दुरगा जाणि कै ॥

रोहै होइ चलाई, राकसि राइ नो ॥

जमपुरि दीआ पठाई, लोचन धूम नो ॥

जापे दिती साई, मारण सु्मभ दी ॥२८॥

भंने दैत पुकारे, राजे सु्मभ थै ॥

लोचन धूम संघारे, सणे सिपाहीआ ॥

चुणि चुणि जोधे मारे, अंदर खेत दै ॥

जापनि अ्मबरि तारे, डिगनि सूरमे ॥

गिरे परबत भारे, मारे ब्रिजु दे ॥

दैता दे दल हारे, दहसत खाइ कै ॥

बचे सु मारे मारे, रहदे राइ थै ॥२९॥

रोहै होइ बुलाए, राकस सु्मभ नै ॥

बैठे मता पकाए, देवी लिआवणी ॥

चंड अरु मुंड पठाए, बहुता कटक दै ॥

जापे छपर छाए, बणीआ केजमा ॥

जेते राइ बुलाइ, चले जुध नो ॥

जणु जमि पकड़ि चलाए, सभे मारणे ॥३०॥

ढोल नगारे वाए, दला मुकाबला ॥

रोहि रुहेले आए, उते राकसा ॥

सभनी तुरे नचाए, बरछे पकड़ि के ॥

बहुते मारि गिराए, अंदरि खेत दै ॥

तीरी छहबर लाए, बुठी देवता ॥३१॥

भेरी संख बजाए, संघर रचिआ ॥

तणि तणि तीर चलाए, दुरगा धनुख लै ॥

जिन्ही दसत उठाए, रहे न जीवदे ॥

चंड अरु मुंड खपाए, दोनो देवता ॥३२॥

सु्मभ निसु्मभ रिसाए, मारे दैत सुणि ॥

जोधे सभै बुलाए, आपणी मजलसै ॥

जिन्ही दैव भजाए, इंद्र जेवहे ॥

तेई मारि गिराए, पल विच देवते ॥

दसती दसत वजाए, उन्हा चित करि ॥

फिर स्रणवत बीज चलाए, बीड़े राइ दे ॥

संज पटैला पाए, चिलकत टोपीआ ॥

लुझण नूं अरड़ाए, राकस रोहले ॥

किनै न कदे हटाए, जुध मचाइकै ॥

मिलि तेई दानो आए, हुण संघर वेखणा ॥३३॥

दैती डंड उभारी नेड़े, आइ कै ॥

सिंघ करी असवारी, दुरगा सोर सुणि ॥

खबे दसत उभारी, गदा फिराइ कै ॥

सैना सभ संघारी, स्रणवत बीज दी ॥

जणु मद खाइ मदारी, घूमन सूरमे ॥

अगणत पाउ पसारी, रुले अहाड़ विचि ॥

जणु करि खेलि खिलारी, सुते फाग नो ॥३४॥

स्रणवत बीज हकारे, रहिंदे सूरमे ॥

जोधे वडे मुनारे, दिसण खेत विच ॥

सभनी दसत उभारे, तेगा धूहि कै ॥

मारो मारु पुकारे, आए साम्हणे ॥

संजा ते ठणकारे, तेगी उभरे ॥

घाट घड़नि ठठिआरे, जाणि बणाइ के ॥३५॥

सट पई जमधाणी, दला मुकाबला ॥

घुमरु बरगसताणी, रण विच घतिओ ॥

सणे तुरा पलाणी, डिगण सूरमे ॥

उठि उठि मंगनि पाणी, घाइल घूमदे ॥

एवड मारु विहाणी, उतै राकसा ॥

बिजलि जिउ झरलाणी, उठी देवता ॥३६॥

चोबी धउस उभारी, दला मुकाबला ॥

सभो सैना मारी, पल विच दानवी ॥

दुरगा दानो मारे, रोह बढाइ कै ॥

सिर विच तेग वगाई, स्रोणवत बीज दै ॥३७॥

अगणत दानो भारे, होए लोहूआ ॥

जोधे जेड मुनारे, अंदरि खेत दे ॥

दुरगा नो ललकारे, आए साम्हणे ॥

दुरगा सभे संघारे, राकस आवदे ॥

रतू दे परनाले, तिन ते भुइं पए ॥

उठे कारणिआरे, राकस हड़हड़ाइ ॥३८॥

धगा संगलीआली, संघर वाइआ ॥

बरछी बु्मबलिआली, सूरे संघरे ॥

भेड़ पइआ बीराली, दुरगा दानवी ॥

मार मची मुहराली, अंदरि खेत दे ॥

जणु नट लथे छाली, ढोल वजाइ कै ॥

लोहू फाथी जाली, लोथी जमधड़ी ॥

घण विचि जिउ चंचाली, तेगा हसीआं ॥

घुमरिआर सिआली, बणीआ केजमा ॥३९॥

धगा सूल बजाईआ, दला मुकाबला ॥

धूहि मिआने लईआ, जुआनी सूरमी ॥

स्रोणवतबीजि वधाईआ, अगणत सूरता ॥

दुरगा सउहै आईआ, रोहि बढाइ कै ॥

सभनी आन वगाईआ, तेगा धूह कै ॥

दुरगा सभ बचाईआ, ढाल स्मभाल कै ॥

देवी आप चलाईआ, तकि तकि दानवी ॥

लोहू नाल डुबाईआ, तेगा नंगीआ ॥

सारसुती जणु न्हाईआ, मिल कै देवीआ ॥

सभे मारि गिराईआ, अंदरि खेत दे ॥

तिदूं फेरि सवाईआ, होईआ सूरता ॥४०॥

सूरी संघरु रचिआ; ढोल संख नगारे वाइ कै ॥

चंडि चितारी कालिका; मनि बाहला रोह बढाइ कै ॥

निकली मथा फोड़ि कै; जणु फतहि नीसान बजाइ कै ॥

जागि सु जुमी जुध नो; जरवाणा जणु मरड़ाइ कै ॥

रणु विचि घेरा घतिआ; जणु सींह तुरिआ गणणाइ कै ॥

आप विसूला होइआ; तिहुं लोका तै खुणसाइ कै ॥

रोह सिधाइआ चक्र पाणि; करि नंदग खड़ग उठाइ कै ॥

राकस बैठे रोहले; तीर तेगी छहबर लाइ कै ॥

बहुत पछाड़े राकसा; दल दैता अंदर जाइ कै ॥

बहु केसी पकड़ि पछाड़िअनि; तिन अंदर धुम रचाइकै ॥

वडे वडे चुणि सूरमे; गहि कोटी दए चलाइ कै ॥

रणि काली गुसा खाइ कै ॥४१॥

दुहा कंधारा मुह जुड़े, अणीआ चोईआ ॥

धूहि क्रिपाना त्रिखीआ, नालि लोहू धोईआं ॥

हूरा स्रोणतबीज नो, घति घेर खलोईआ ॥

लाड़ा वेखणि लाड़ीआ, चउगिरदै होईआं ॥४२॥

चौबी धउसी पाईआ, दला भिड़ंदिआ ॥

दसती धूहि नचाईआ, तेगा तिखीआं ॥

सूरिआ दे तनि लाईआ, गोसत गिधीआं ॥

विधण राती आईआं, मरदा घोड़िआं ॥

जोगणीआ मिलि धाईआं, लोहू भखणा ॥

सभे मारि हटाईआ, फउजा दानवा ॥

भजदी कथा सुणाईआं, राजे सु्मभ नो ॥

भुई न पउणै पाईआं, बूंदा रकत दीआ ॥

काली खेत खपाईआं, सभै सूरता ॥

बहुती सिरी विहाईआ, घड़ीआ काल दीआ ॥

जाणु न जाए माईआ, जूझे सूरमे ॥४३॥

सु्मभ सुणी करहाली, स्रोणत बीज दी ॥

रण विचि किनै न झाली, दुरगा आवदी ॥

बहुते बीर जटली, उठे आखि कै ॥

चोटां पान तबाली, जासन जुध नो ॥

थर थर पिरथी हाली, दला चड़ंदिआं ॥

नाउ जिवै है हाली, सह दरिआउ विचि ॥

धूड़ि उताहा घाली, खुरी तरंगमां ॥

जाण पुकारू चाली, धरती इंद्र थै ॥४४॥

आहरु मिलिआ आहरीआ, सैन सूरिआ साजी ॥

चले सउहै दुरगसाह, जणु काबे हाजी ॥

तीरी तेगी जमधड़ी, रणि वंडी भाजी ॥

इक घुमनि घाइल सूरमे, जणु मकतबि काजी ॥

इक बीर परोते बरछीऐ, जिउ झुकि पउन नवाजी ॥

इक देवी सउहै खुणस कै, खुणसाइन ताजी ॥

इक धावनि जापनि साम्हणे, जिउ भुखिआए पाजी ॥

कदे न रजे जुध ते, रजि होए राजी ॥४५॥

बजे संगलीआले, संघरि डोहरे ॥

खेत डहे जटाले, हाठा जोड़ि कै ॥

नेजे ब्मबलिआले, दिसिनि ओरड़ै ॥

चले जाण जटाले, न्हावण गंग नूं ॥४६॥

दुरगा अते दानवी, सूल होईआं कंगां ॥

वाछड़ घती सूरिआं, विच खेत खतंगां ॥

धूहि क्रिपाणां तिखीआं, बढि लाहनि अंगां ॥

पहिला दला मिलंदिआं, भेड़ु पाइआ निहंगां ॥४७॥

ओरड़ि फउजा आईआं, बीर चड़े कंधारी ॥

सड़कि मिआनहुं कढीआ, तिखीआ तरवारी ॥

कड़कि उट्ठे रण मचिआ, वडे हंकारी ॥

सिर धड़ बाहा गनले, फुल जेहे बाड़ी ॥

जणु करि कटे बाढीआं, रुख चंदनि आरी ॥४८॥

दुहां कंधारा मुहि जुड़े; रणि सट पई खरवार कउ ॥

तक तक कै बर दुरगसाह; तकि मारै भले जुझार कउ ॥

पैदल मारे हाथीआ; संगि रथ गिरे असवार कउ ॥

सोहनि संजा बागड़ा; जणु लगे फुल अनार कउ ॥

गुसे आई कालिका; हथ सजे लै तरवार कउ ॥

एदूं पारो ओत पार; हरिनाकसि कई हज़ार कउ ॥

जिणि इको रही, कंधार कउ ॥

सद रहमति, तेरे वार कउ ॥४९॥

दुहा कंधारा मुहि जुड़े; सट पई जमधाण कउ ॥

तदि खिंग निसु्मभ नचाइआ; डालि उपर बरगुसताण कउ ॥

फड़ी बिलंद मंगाइओसु; फरमाइस करि मुलतान कउ ॥

गुसे आई साम्हणे; रण अंदर घतण घाण कउ ॥

अगे तेग वगाई दुरगसाह; बढि सु्मभन बही पलाण कउ ॥

रड़की जाइ कै धरत कउ; बढि पाखर बढि किकाण कउ ॥

बीर पलाणो डिगिआ; करि सिजदा सु्मभ सुजाण कउ ॥

साबास ! सलोणे खान कउ ॥

सद साबास ! तेरे ताण कउ ॥

तारीफा ! पान चबाण कउ ॥

सद रहमत, कैफा खाण कउ ॥

सद रहमत, तुरे नचाण कउ ॥५०॥

दुरगा अते दानवी, गहि संघर कथे ॥

ओरड़ उठे सूरमे, आइ डाहै मथे ॥

कटि तु्मफंगी कैबरी, दल साहिब निकथे ॥

वेखणि जंग फरेसते, असमानहुं लथे ॥५१॥

दोहां कंधारा मुह जुड़े, दल घुरे नगारे ॥

ओरड़ि आए सूरमे, सिरदार रणिआरे ॥

लै लै तेगा बरछीआ, हथिआर उभारे ॥

टोप पटेला पाखरा, गलि संज सवारे ॥

लै के बरछी दुरगसाह, बहु दानव मारे ॥

चड़े रथी गज घोड़िई, मारि भुइ ते डारे ॥

जणु हलवाई सीख नाल, बिंन्ह वड़े उतारे ॥५२॥

दुहा कंधारा मुहि जुड़े, नाल धउसा भारी ॥

लई भगउती दुरगसाहि, वर जागणि भारी ॥

लाई राजे सु्मभ नो, रत पीऐ पिआरी ॥

सु्मभ पालाणो डिगिआ, उपमा वीचारी ॥

डुबि रतु नालहु निकली, बरछी दोधारी ॥

जाणु रजादी उतरी, पैन्हि सूही सार्ही ॥५३॥

दुरगा अते दानवी, भेड़ पइआ सबाहीं ॥

ससत्र पजूते दुरगसाह, गहि सभनी बाहीं ॥

सु्मभ निसु्मभ संघारिआ, वथ जे है साहीं ॥

फउजा राकस आरीआं, वेख रोवनि धाहीं ॥

मुहि कड़ूचे घाहु दे, छडि घोड़े राहीं ॥

भजदे होइ मारीअन, मुड़ि झाकनि नाहीं ॥५४॥

सु्मभ निसु्मभ पठाइआ, जम दे धाम नो ॥

इंद्र सदि बुलाइआ, राज अभिखेख नो ॥

सिर पर छत्र फिराइआ, राजे इंद्र दे ॥

चउदी लोकी छाइआ, जसु जगमात दा ॥

दुरगा पाठ बणाइआ, सभे पउड़ीआ ॥

फेरि न जूनी आइआ, जिनि इह गाइआ ॥५५॥

इति स्री दुरगा की वार समापतं सतु सुभम सतु ॥