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दसम ग्रन्थ/चंडी चरित्र उक्ति बिलास

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ਚੰਡੀ ਚਰਿਤ੍ਰ (ਉਕਤਿ ਬਿਲਾਸ) ॥

चंडी चरित्र (उकति बिलास) ॥

ੴ वाहिगुरू जी की फतहि ॥

स्री भगउती जी सहाइ ॥

अथ चंडी चरित्र उकति बिलास लिख्यते ॥

पातिसाही १० ॥

स्वैया ॥

आदि अपार अलेख अनंत; अकाल अभेख अलख अनासा ॥

कै सिव सकत दए स्रुति चार; रजो तम सत तिहूं पुर बासा ॥

दिउस निसा ससि सूर के दीपक; स्रिसटि रची पंच तत प्रकासा ॥

बैर बढाइ लराइ सुरासुर; आपहि देखत बैठ तमासा ॥१॥

दोहरा ॥

क्रिपा सिंधु ! तुमरी क्रिपा; जो कछ मो परि होए ॥

रचो चंडिका की कथा; बाणी सुभ सभ होइ ॥२॥

जोति जगमगे जगत मै; चंड चमुंड प्रचंड ॥

भुज दंडन दंडनि असुर; मंडन भुइ नव खंड ॥३॥

स्वैया ॥

तारन लोक उधारन भूमहि; दैत संघारन चंडि तुही है ॥

कारन ईस कला कमला हरि; अद्रसुता जह देखो उही है ॥

तामसता ममता नमता; कविता कवि के मन मधि गुही है ॥

कीनो है कंचन लोह जगत्र मै; पारस मूरति जाहि छुही है ॥४॥

दोहरा ॥

प्रमुद करन सभ भै हरन; नामु चंडिका जासु ॥

रचो चरित्र बचित्र तुअ; करो सबुधि प्रकास ॥५॥

पुनहा ॥

आइस अब जो होइ; ग्रंथ तउ मै रचौ ॥

रतन प्रमुद कर बचन; चीनि ता मै गचौ ॥

भाखा सुभ सभ करहो; धरिहो क्रित मै ॥

अदभुति कथा अपार; समझ करि चित मै ॥६॥

स्वैया ॥

त्रास कुट्मब के हुइ कै उदास; अवास को तिआगि बसिओ बनि राई ॥

नाम सुरथ मुनीसर बेख; समेत समादि समाधि लगाई ॥

चंड अखंड खंडे कर कोप; भई सुर रछन को समुहाई ॥

बूझहु जाइ तिनै, तुम साध ! अगाधि कथा किह भाति? सुनाई ॥७॥

तोटक छंद ॥

मुनीसुरोवाच ॥

हरि सोइ रहै सजि सैन तहा ॥

जल जाल कराल बिसाल जहा ॥

भयो नाभि सरोज ते बिसु करता ॥

स्रुत मैल ते, दैत रचे जुगता ॥८॥

मधु कैटभ नाम धरे तिन के ॥

अति दीरघ देह भए जिन के ॥

तिन देखि, लुकेस डरिओ हीअ मै ॥

जग मात को धिआनु धरियो जीअ मै ॥९॥

दोहरा ॥

छुटी चंडि, जागै ब्रहम; करिओ जुध को साजु ॥

दैत सभै घटि जाहि जिउ; बढै देवतन राज ॥१०॥

स्वैया ॥

जुध करिओ तिन सो भगवंति; न मार सकै, अति दैत बली है ॥

साल भए तिन पंच हजार; दुहूं लरते नहि बाह टली है ॥

दैतन रीझ कहिओ, बर मांग; कहिओ हरि, सीसन देहु भली है ॥

धारि उरू परि चक्र सो काट कै; जोत लै आपनै अंगि मली है ॥११॥

सोरठा ॥

देवन थापिओ राज; मधु कैटभ को मार कै ॥

दीनो सकल समाज; बैकुंठगामी हरि भए ॥१२॥

इति स्री मारकंडे पुराने चंडी चरित्र उकति बिलास मधु कैटभ बधहि प्रथम धयाइ समापतम सतु सुभम सतु ॥१॥

पुनहा ॥

बहुरि भइओ महखासुर; तिन तो किआ कीआ? ॥

भुजा जोरि करि जुधु; जीत सभ जगु लीआ ॥

सूर समूह संघारे; रणहि पचार कै ॥

टूकि टूकि करि डारे; आयुध धार कै ॥१३॥

स्वैया ॥

जुध करियो महिखासुर दानव; मारि सभै, सुर सैन गिराइओ ॥

कै कै दु टूक, दए अरि खेति; महा बरबंड, महा रन पाइओ ॥

स्रउणत रंग सनिओ निसरिओ जसु; इआ छबि को मन मै इहि आइओ ॥

मारि कै छत्रनि कुंड कै छेत्र मै; मानहु पैठि कै राम जू नाइओ ॥१४॥

लै महखासुर असत्र सु ससत्र; सबै कलवत्र जिउ चीर कै डारै ॥

लुथ पै लुथ रही गुथि जुथि; गिरे गिर से रथ, सेंधव भारे ॥

गूद सने सित लोहू मै लाल; कराल परे रन मै गज कारे ॥

जिउ दरजी जम म्रित के सीत मै; बागे अनेक कता करि डारे ॥१५॥

लै सुर संग सबै सुरपाल; सु कोप के सत्रु की सैन पै धाए ॥

दै मुख ढार, लीए करवार; हकार पचार प्रहार लगाए ॥

स्रउन मै दैत सुरंग भए; कबि ने मन भाउ इहै छबि पाए ॥

राम मनो रन जीत कै भालक; दै सिरपाउ सबै पहराए ॥१६॥

घाइल घूमत है रन मै; इक लोटत है धरनी बिललाते ॥

दउरत बीच कबंध फिरै; जिह देखत, काइर है डर पाते ॥

इयो महिखासुर जुधु कीयो; तब ज्मबुक गिरझ भए रंग राते ॥

स्रौन प्रवाह मै पाइ पसार कै; सोए है सूर मनो मद माते ॥१७॥

जुधु कीओ महखासुर दानव; देखत भानु चले नही पंथा ॥

स्रौन समूह चलिओ लखि कै; चतुरानन भूलि गए सभ ग्रंथा ॥

मास निहार कै ग्रिझ रड़ै; चटसार पड़ै जिमु बारक संथा ॥

सारसुती तटि लै भट लोथ; स्रिंगाल कि सिध बनाव कंथा ॥१८॥

दोहरा ॥

अगनत मारे गनै को? भजै जु सुर, करि त्रास ॥

धारि धिआन मन सिवा को; तकी पुरी कैलास ॥१९॥

देवन को धनु धाम सभ; दैतन लीओ छिनाइ ॥

दए काढि सुर धाम ते; बसे सिव पुरी जाइ ॥२०॥

कितकि दिवस बीते तहा; न्हावन निकसी देवि ॥

बिधि पूरब सभ देवतन; करी देवि की सेव ॥२१॥

रेखता ॥

करी है हकीकति मालूम खुद देवी सेती; लीआ महखासुर हमारा छीन धाम है ॥

कीजै सोई बात मात ! तुम कउ सुहात; सभ सेवकि कदीम तकि आए तेरी साम है ॥

दीजै बाजि देस हमै, मेटीऐ कलेस लेस; कीजीए अभेस उनै, बडो यह काम है ॥

कूकर को मारत न कोऊ नाम लै के ताहि; मारत है ता को, लै के खावंद को नाम है ॥२२॥

दोहरा ॥

सुनत बचन ए चंडिका; मन मै उठी रिसाइ ॥

सभ दैतन को छै करउ; बसउ सिवपुरी जाइ ॥२३॥

दैतन के बध को जबै; चंडी कीओ प्रकास ॥

सिंघ संख अउ असत्र सभ; ससत्र आइगे पासि ॥२४॥

दैत संघारन के नमित; काल जनमु इह लीन ॥

सिंघ चंडि बाहन भइओ; सत्रन कउ दुखु दीन ॥२५॥

स्वैया ॥

दारुन दीरघु दिगज से बलि; सिंघहि के बल सिंघ धरे है ॥

रोम मनो सर कालहि के जन; पाहन पीत पै ब्रिछ हरे है ॥

मेर के मधि मनो जमना लरि; केतकी पुंज पै भ्रिंग ढरे है ॥

मानो महा प्रिथ लै के कमान सु; भूधर भूम ते निआरे करे है ॥२६॥

दोहरा ॥

घंटा गदा त्रिसूल असि; संख सरासन बान ॥

चक्र बक्र कर मै लीए; जनु ग्रीखम रितु भानु ॥२७॥

चंड कोप करि चंडिक; ा ए आयुध करि लीन ॥

निकटि बिकटि पुर दैत के; घंटा की धुनि कीन ॥२८॥

सुनि घंटा केहरि सबदि; असुरन असि रन लीन ॥

चड़े कोप कै जूथ हुइ; जतन जुध को कीन ॥२९॥

पैतालीस पदम असुर; सज्यो कटक चतुरंगि ॥

कछु बाए, कछु दाहनै; कछु भट न्रिप के संगि ॥३०॥

भए इकठे दल पदम; दस पंद्रह अरु बीस ॥

पंद्रह कीने दाहने; दस बाए, संगि बीस ॥३१॥

स्वैया ॥

दउर सबै इक बार ही दैत सु; आए है चंड के सामुहे कारे ॥

लै करि बान कमानन तानि; घने अरु कोप सो सिंघ प्रहारे ॥

चंड स्मभारि तबै करवार; हकार कै सत्र समूह निवारे ॥

खांडव जारन को अगनी; तिह पारथ नै जनु मेघ बिडारे ॥३२॥

दोहरा ॥

दैत कोप इक सामुहे; गइओ तुरंगम डारि ॥

सनमुख देवी के भइओ; सलभ दीप अनुहार ॥३३॥

स्वैया ॥

बीर बली सिरदार दैईत सु; क्रोध कै मियान ते खगु निकारिओ ॥

एक दइओ तनि चंड प्रचंड कै; दूसर केहरि के सिर झारिओ ॥

चंड स्मभारि तबै बलु धारि; लइओ गहि नारि, धरा पर मारिओ ॥

जिउ धुबीआ सरता तटि जाइ के; लै पट को पट साथ पछारिओ ॥३४॥

दोहरा ॥

देवी मारिओ दैत इउ; लरिओ जु सनमुख आइ ॥

पुनि सत्रनि की सैन मै; धसी सु संख बजाइ ॥३५॥

स्वैया ॥

लै करि चंडि कुवंड प्रचंड; महा बरबंड तबै इह कीनो ॥

एक ही बार निहारि हकारि; सुधारि बिदार सभै दल दीनो ॥

दैत घने रन माहि हने; लखि स्रोन सने कवि इउ मनु चीनो ॥

जिउ खगराज बडो अहिराज; समाज के, काटि कता करि लीनो ॥३६॥

दोहरा ॥

देवी मारे दैत बहु; प्रबल निबल से कीन ॥

ससत्र धारि करि करन मै; चमूं चाल करि दीन ॥३७॥

भजी चमूं महखासुरी; तकी सरनि निज ईस ॥

धाइ जाइ तिन इउ कहिओ; हनिओ पदम भट बीस ॥३८॥

सुनि महखासुर मूड़ मति; मन मै उठिओ रिसाइ ॥

आगिआ दीनी सैन को; घेरो देवी जाइ ॥३९॥

स्वैया ॥

बात सुनी प्रभ की सभ सैनहि; सूर मिले इकु मंत्र करिओ है ॥

जाइ परे चहूं ओर ते धाइ कै; ठाट इहै मन मधि करिओ है ॥

मार ही मार पुकार परे; असि लै करि मै, दलु इउ बिहरिओ है ॥

घेरि लई चहूं ओर ते चंडि; सु चंद मनो परवेख परिओ है ॥४०॥

देखि चमूं महखासुर की; करि चंड कुवंड प्रचंड धरिओ है ॥

दछन बाम चलाइ घने; सर कोप भयानक जुधु करिओ है ॥

भंजन भे अरि के तन ते; छुट स्रउन समूह धरानि परिओ है ॥

आठवो सिंधु पचायो हुतो मनो; या रन मै बिधि ने उगरिओ है ॥४१॥

दोहरा ॥

कोप भई अरि दल बिखै; चंडी चक्र स्मभारि ॥

एक मारि कै द्वै कीए; द्वै ते कीने चार ॥४२॥

स्वैया ॥

इह भांति को जुधु करिओ सुनि कै; कवलास मै धिआन छुटिओ हरि का ॥

पुनि चंड स्मभार उभार गदा; धुनि संख बजाइ करिओ खरका ॥

सिर सत्रनि के पर चक्र परिओ छुटि; ऐसे बहिओ करि के बर का ॥

जनु खेल को सरता तटि जाइ; चलावत है छिछली लरका ॥४३॥

दोहरा ॥

देख चमूं महिखासुरी; देवी बलहि स्मभारि ॥

कछु सिंघहि कछु चक्र सो; डारे सभै संघारि ॥४४॥

इक भाजै न्रिप पै गए; कहिओ हती सभ सैन ॥

इउ सुनि कै कोपिओ असुर; चड़ि आइओ रन ऐन ॥४५॥

स्वैया ॥

जूझ परी सभ सैन लखी जब; तौ महखासुर खग स्मभारिओ ॥

चंडि प्रचंड के सामुहि जाइ; भइआनक भालक जिउ भभकारिओ ॥

मुगदरु लै अपने करि चंडि सु; कै बरि ता तन ऊपरि डारिओ ॥

जिउ हनूमान उखारि पहार को; रावन के उर भीतर मारिओ ॥४६॥

फेर सरासन को गहि कै करि; बीर हने तिन पानि न मंगे ॥

घाइल घूम परे रन माहि; कराहत है गिर से गज लंगे ॥

सूरन के तन कउचन साथि; परे धरि भाउ उठे तह चंगे ॥

जानो दवा बन माझ लगे; तह कीटन भछ कौ दउरे भुजंगे ॥४७॥

कोप भरी रनि चंडि प्रचंड; सु प्रेर के सिंघ धसी रन मै ॥

करवार लै लाल कीए अरि खेति; लगी बड़वानल जिउ बन मै ॥

तब घेरि लई चहूं ओर ते दैतन; इउ उपमा उपजी मन मै ॥

मनु ते तनु तेजु चलिओ जग मात को; दामनि जान चले घन मै ॥४८॥

फूट गई धुजनी सगरी; असि चंड प्रचंड जबै करि लीनो ॥

दैत मरै नहि बेख करै; बहुतउ बरबंड महाबल कीनो ॥

चक्र चलाइ दइओ करि ते; सिर सत्र को मार जुदा कर दीनो ॥

स्रउनत धार चली नभ को; जनु सूर को राम जलाजल दीनो ॥४९॥

सब सूर संघार दए तिह खेति; महा बरबंड पराक्रम कै ॥

तह स्रउनत सिंधु भइओ धरनी परि; पुंज गिरे असि कै धम कै ॥

जग मात प्रताप हने सुर ताप सु; दानव सैन गई जम कै ॥

बहुरो अरि सिंधुर के दल पैठ कै; दामिनि जिउ दुरगा दमकै ॥५०॥

दोहरा ॥

जब महखासुर मारिओ; सब दैतन को राज ॥

तब काइर भाजे सबै; छाडिओ सकल समाज ॥५१॥

कबितु ॥

महाबीर कहरी दुपहरी को भानु मानो; देवन के काज देवी डारिओ दैत मारि कै ॥

अउर दलु भाजिओ, जैसे पउन हूं ते भाजे मेघ; इंद्र दीनो राज, बलु आपनो सो धारि कै ॥

देस देस के नरेस डारै है सुरेस पाइ; कीनो अभखेक सुर मंडल बिचारि कै ॥

ईहा भई गुपति, प्रगटि जाइ तहा भई; जहा बैठे हरि, हरिअ्मबरि को डारि कै ॥५२॥

इति स्री मारकंडे पुराने स्री चंडी चरित्र उकति बिलास महखासुर बधहि नाम दुतीआ धिआइ समापतम सतु सुभम सतु ॥२॥

दोहरा ॥

लोप चंडका होइ गई; सुरपति कौ दे राज ॥

दानव मारि अभेख करि; कीने संतन काज ॥५३॥

स्वैया ॥

याते प्रसंन भए है महा मुन; देवन के तप मै सुख पावै ॥

जग्य करै, इक बेद ररै; भव ताप हरै, मिलि धिआनहि लावै ॥

झालर ताल म्रिदंग उपंग; रबाब लीए, सुर साज मिलावै ॥

किंनर गंध्रब गान करै गनि; जछ अपछर निरत दिखावै ॥५४॥

संखन की धुन घंटनि की करि; फूलन की बरखा बरखावै ॥

आरती कोटि करै सुर सुंदरि; पेख पुरंदर के बलि जावै ॥

दानत दछन दै कै प्रदछन; भाल मै कुंकम अछत लावै ॥

होत कुलाहल देवपुरी; मिल देवन के कुलि मंगल गावै ॥५५॥

दोहरा ॥

ऐसे चंड प्रताप ते; देवन बढिओ प्रताप ॥

तीन लोक जै जै करै; ररै नामु सति जाप ॥५६॥

इसी भांति सो देवतन; राज कीयो सुख मानि ॥

बहुर सु्मभ नैसु्मभ दुइ; दैत बडे बलिवान ॥५७॥

इंद्र लोक के राज हित; चड़ि धाए न्रिप सु्मभ ॥

सैना चतुरंगनि रची; पाइक रथ है कु्मभ ॥५८॥

स्वैया ॥

बाजत डंक पुरी धुन कानि सु; संकि पुरंदर मूंदत पउरै ॥

सूर मै नाहि रही दुति देखि के; जुध को दैत भए इक ठउरै ॥

कांप समुंद्र उठे सिगरे बहु; भार भई धरनी गति अउरै ॥

मेरु हलिओ दहलिओ सुर लोक; जबै दल सु्मभ निसु्मभ के दउरै ॥५९॥

दोहरा ॥

देव सभै मिलि के तबै; गए सक्र पहि धाइ ॥

कहिओ दैत आए प्रबल; कीजै कहा उपाइ ॥६०॥

सुनि कोपिओ सुरपाल तब; कीनो जुध उपाइ ॥

सेख देव गन जे हुते; ते सभ लीए बुलाइ ॥६१॥

स्वैया ॥

भूमि को भार उतारन को; जगदीस बिचार कै जुधु ठटा ॥

गरजै मदमत करी बदरा; बग पंति लसै जन दंत गटा ॥

पहरै तनत्रान फिरै तह बीर; लीए बरछी करि बिजु छटा ॥

दल दैतन को अरि देवन पै; उमडिओ मानो घोर घमंड घटा ॥६२॥

दोहरा ॥

सगल दैत इकठे भए; करियो जुध को साज ॥

अमरपुरी महि जाइ कै; घेरि लीओ सुर राज ॥६३॥

स्वैया ॥

खोलि कै दुआरा किवार सभै; निकसी असुरारि की सैन चली ॥

रन मै तब आनि इकत्र भए लखि; सत्रु की पत्रि जिउ सैन हली ॥

द्रुम दीरघ जिउ गज बाज हले रथ; पाइक जिउ फल फूल कली ॥

दल सु्मभ को मेघ बिडारन को; निकसिउ मघवा मानो पउन बली ॥६४॥

इह कोप पुरंदर देव चड़े; उत जुध को सु्मभ चड़े रन मै ॥

कर बान कमान क्रिपान गदा; पहिरे तन त्रान तबै तन मै ॥

तब मार मची दुहूं ओरन ते; न रहिओ भ्रम सूरन के मन मै ॥

बहु ज्मबुक ग्रिझ चलै सुनि कै; अति मोद बढिओ सिव के गन मै ॥६५॥

राज पुरंदर कोप कीओ इति; जुध को दैत जुरे उत, कैसे? ॥

सिआम घटा घुमरी घनघोर कै; घेरि लीओ हरि को रवि तैसे ॥

सक्र कमान के बान लगे सर; फोक लसै अरि के उरि ऐसे ॥

मानो पहार करार मै चोंच; पसारि रहे, सिसु सारक जैसे ॥६६॥

बान लगे लख सु्मभ दईत; धसे रन लै करवारन को ॥

रंगभूमि मै सत्रु गिराइ दए; बहु स्रउन बहिओ असुरान को ॥

प्रगटे गन ज्मबुक ग्रिझ पिसाच सु; यौ रन भांति पुकारन को ॥

सु मनो भट सारसुती तटि नात है; पूरब पाप उतारन को ॥६७॥

जुध निसु्मभ भइआन रचिओ अस; आगे न दानव काहू करिओ है ॥

लोथन ऊपरि लोथ परी तह; गीध स्रिंगालनि मासु चरिओ है ॥

गूद बहै सिर केसन ते सित; पुंज प्रवाह धरानि परिओ है ॥

मानहु जटाधर की जट ते; जनु रोस कै गंग को नीर ढरिओ है ॥६८॥

बार सिवार भए तिह ठउर सु; फेन जिउ छत्र फिरे तरता ॥

कर अंगुलका सफरी तलफै; भुज काटि भुजंग करे करता ॥

हय नक्र धुजा द्रुम स्रउणत नीर मै; चक्र जिउ चक्र फिरै गरता ॥

तब सु्मभ निसु्मभ दुहूं मिलि दानव; मार करी रन मै सरता ॥६९॥

दोहरा ॥

सुर हारै, जीतै असुर; लीनो सकल समाज ॥

दीनो इंद्र भजाइ कै; महा प्रबल दल साजि ॥७०॥

स्वैया ॥

छीन भंडार लइओ है कुबेर ते; सेस हूं ते मनि माल छुडाई ॥

जीत लुकेस दिनेस निसेस; गनेस जलेस दीओ है भजाई ॥

लोक कीए तिन तीनहु आपने; दैत पठे तह दै ठकुराई ॥

जाइ बसे सुर धाम तेऊ; तिन सु्मभ निसु्मभ की फेरी दुहाई ॥७१॥

दोहरा ॥

खेत जीत दैतन लीओ; गए देवते भाज ॥

इहै बिचारिओ मन बिखै; लेहु सिवा ते राज ॥७२॥

स्वैया ॥

देव सुरेस दिनेस निसेस; महेस पुरी महि जाइ बसे है ॥

भेस बुरे तहा जाइ दुरे; सिर केस जुरे रन ते जु त्रसे है ॥

हाल बिहाल महा बिकराल; स्मभाल नही जनु काल ग्रसे है ॥

बार ही बार पुकार करी; अति आरतवंत दरीनि धसे है ॥७३॥

कान सुनी धुनि देवन की; सभ दानव मारन को प्रन कीनो ॥

हुइ कै प्रतछ महा बर चंडि सु; क्रुध ह्वै जुध बिखै मन दीनो ॥

भाल को फोर कै, काली भई; लखि ता छबि को कबि को मन भीनो ॥

दैत समूहि बिनासन को; जम राज ते म्रित मनो भव लीनो ॥७४॥

पान क्रिपान धरे बलवान; सु कोप कै बिजुल जिउ गरजी है ॥

मेरु समेत हले गरूए गिर; सेस के सीस धरा लरजी है ॥

ब्रहम धनेस दिनेस डरिओ; सुन कै हरि की छतीआ तरजी है ॥

चंड प्रचंड अखंड लीए करि; कालिका काल ही जिउ अरजी है ॥७५॥

दोहरा ॥

निरख चंडका तास को; तबै बचन इह कीन ॥

हे पुत्री तूं कालिका ! होहु जु मुझ मै लीन ॥७६॥

सुनत बचन यह चंडि को; ता महि गई समाइ ॥

जिउ गंगा की धार मै; जमुना पैठी धाइ ॥७७॥

स्वैया ॥

बैठ तबै गिरिजा अरु देवन; बुधि इहै मन मधि बिचारी ॥

जुध कीए बिनु फेर फिरै नहि; भूमि सभै अपनी अवधारी ॥

इंद्र कहिओ अब ढील बने नहि; मात ! सुनो यह बात हमारी ॥

दैतन के बध काज चली; रणि चंड प्रचंड भुजंगनि कारी ॥७८॥

कंचन से तन खंजन से द्रिग; कंजन की सुखमा सकुची है ॥

लै करतार सुधा कर मै; मध मूरति सी अंग अंग रची है ॥

आनन की सर को ससि नाहिन; अउर कछू उपमा न बची है ॥

स्रिंग सुमेर के चंडि बिराजत; मानो सिंघासन बैठी सची है ॥७९॥

दोहरा ॥

ऐसे स्रिंग सुमेर के; सोभत चंडि प्रचंड ॥

चंद्रहास करि बर धरे; जन जम लीने दंड ॥८०॥

किसी काज को दैत इक; आइओ है तिह ठाइ ॥

निरख रूप बरु चंडि को; गिरिओ मूरछा खाहि ॥८१॥

उठि स्मभारि कर जोर कै; कही चंड सो बात ॥

न्रिपति सु्मभ को भात हौ; कह्यो बचन सुकचात ॥८२॥

तीन लोक जिनि बसि कीए; अति बल भुजा अखंड ॥

ऐसो भूपति सु्मभ है; ताहि बरे बरि चंड ! ॥८३॥

सुनि राकस की बात को; देवी उत्तर दीन ॥

जुध करै बिनु नहि बरो; सुनहु दैत मतहीन ! ॥८४॥

इह सुनि दानव चपल गति; गइओ सु्मभ के पास ॥

परि पाइन कर जोर कै; करी एक अरदास ॥८५॥

अउर रतन न्रिप ! धाम तुअ; त्रीआ रतन ते हीन ॥

बधू एक बन मै बसै; तिह तुम बरो प्रबीन ! ॥८६॥

सोरठा ॥

सुनी मनोहरि बात; न्रिप बूझिओ पुनि ताहि को ॥

मो सो कहियै भ्रात ! बरनन ताहि सरीर को ॥८७॥

स्वैया ॥

हरि सो मुख है, हरिती दुख है; अलिकै हर हार प्रभा हरिनी है ॥

लोचन है हरि से सरसे; हरि से भरुटे, हरि सी बरुनी है ॥

केहरि सो करिहा चलबो हरि; पै हरि की हरिनी तरनी है ॥

है कर मै हरि पै हरि सो; हरि रूप कीए हर की धरनी है ॥८८॥

कबितु ॥

मीन मुरझाने, कंज खंजन खिसाने अलि; फिरत दिवाने बनि डोलै जित तित ही ॥

कीर अउ कपोत बि्मब कोकिला कलापी बनि; लूटे फूटे फिरै, मनि चैन हूं न कित ही ॥

दारिम दरक गइओ, पेखि दसननि पाति; रूप ही की क्रांति, जगि फैल रही सित ही ॥

ऐसी गुन सागर, उजागर सु नागरि है; लीनो मन मेरो, हरि नैन कोरि चित ही ॥८९॥

दोहरा ॥

बात दैत की सु्मभ सुनि; बोलिओ कछु मुसकात ॥

चतुर दूत कोऊ भेजीए; लखि आवै तिह घात ॥९०॥

बहुरि कही उन दैत अब; कीजै एक बिचार ॥

जो लाइक भट सैन मै; भेजहु दै अधिकार ॥९१॥

स्वैया ॥

बैठो हुतो न्रिप मधि सभा; उठि कै करि जोरि कहिओ मम जाऊ ॥

बातन ते रिझवाइ मिलाइ हो; नातुरि केसन ते गहि लिआऊ ॥

क्रुध्र करे तब जुधु करे; रणि स्रउणत की सरतान बहाऊ ॥

लोचन धूम कहै बल आपनो; स्वासन साथ पहार उडाऊ ॥९२॥

दोहरा ॥

उठे बीर को देख कै; सु्मभ कही, तुम जाहु ॥

रीझै आवै आनीओ; खीझे जुध कराहु ॥९३॥

तहा धूम्र लोचन चले; चतुरंगन दलु साजि ॥

गिर घेरिओ घन घटा; जिउ गरज गरज गजराज ॥९४॥

धूम्र नैन गिर राज तटि; ऊचे कही पुकारि ॥

कै बरु सु्मभ न्रिपाल को; कै लर चंडि स्मभारि ॥९५॥

रिपु के बचन सुंनत ही; सिंघ भई असवार ॥

गिर ते उतरी बेग दै; करि आयुध सभ धारि ॥९६॥

स्वैया ॥

कोप कै चंड प्रचंड चड़ी; इत क्रुधु कै धूम्र चड़ै उत सैनी ॥

बान क्रिपानन मार मची तब; देवी लई बरछी करि पैनी ॥

दउर दई अरि के मुखि मै; कटि ओठ दए जिमु लोह कौ छैनी ॥

दात गंगा जमुना तन सिआम सो; लोहू बहिओ तिन माहि त्रिबैनी ॥९७॥

घाउ लगै रिस कै द्रिग धूम्र सु; कै बलि आपनो खगु स्मभारिओ ॥

बीस पचीसकु वार करे तिन; केहरि को पगु नैकु न हारिओ ॥

धाइ गदा गहि फोरि कै फउज को; घाउ सिवा सिरि दैत के मारिओ ॥

स्रिंग धराधर ऊपर को जनु; कोप पुरंद्र नै बज्र प्रहारिओ ॥९८॥

लोचन धूम उठै किलकार; लए संग दैतन के कुरमा ॥

गहि पानि क्रिपान अचानक तानि; लगाई है केहरि के उर मा ॥

हरि चंडि लइओ बरि कै कर ते; अरु मूंड कटिओ असुरं पुर मा ॥

मानो आंधी बहे धरनी पर; छूटी खजूर ते टूट परिओ खुरमा ॥९९॥

दोहरा ॥

धूम्र नैन जब मारिओ; देवी इह परकार ॥

असुर सैन बिनु चैन हुइ; कीनो हाहाकार ॥१००॥

इति स्री मारकंडे पुराणे चंडी चरित्र उकति बिलास धूम्र नैन बधहि नाम त्रितीआ धिआइ समापतम सतु सुभम सतु ॥३॥

स्वैया ॥

सोरु सुनिओ जब दैतन को; तब चंडि प्रचंड तची अखीआं ॥

हर धिआन छुटिओ मुनि को; सुनि कै धुनि टूटि खगेस गई पखीआं ॥

द्रिग जुआल बढी बड़वानल जिउ; कवि ने उपमा तिह की लखीआं ॥

सभु छार भइओ दलु दानव को; जिमु घूमि हलाहल की मखीआं ॥१०१॥

दोहरा ॥

अउर सकल सैना जरी; बचिओ सु एकै प्रेतु ॥

चंडि बचाइओ जानि कै; अउरन मारन हेतु ॥१०२॥

भाजि निसाचर मंद मति; कही सु्मभ पहि जाइ ॥

धूम्र नैन सैना सहित; डारिओ चंडि खपाइ ॥१०३॥

सकल कटे भट कटक के; पाइक रथ है कु्मभ ॥

यौ सुनि बचन अचरज ह्वै; कोप कीओ न्रिप सु्मभ ॥१०४॥

चंड मुंड द्वै दैत तब; लीने सु्मभि हकारि ॥

चलि आए न्रिप सभा महि; करि लीने असि ढार ॥१०५॥

अभबंदन दोनो कीओ; बैठाए न्रिप तीरि ॥

पान दए मुख ते कहिओ; तुम दोनो मम बीर ॥१०६॥

निज कट को फैंटा दइओ; अरु जमधर करवार ॥

लिआवहु चंडी बाध कै; नातर डारो मार ॥१०७॥

स्वैया ॥

कोप चड़े रनि चंड अउ मुंड सु; लै चतुरंगन सैन भली ॥

तब सेस के सीस धरा लरजी; जनु मधि तरंगनि नाव हली ॥

खुर बाजन धूर उडी नभि को; कवि के मन ते उपमा न टली ॥

भव भार अपार निवारन को; धरनी मनो ब्रहम के लोक चली ॥१०८॥

दोहरा ॥

चंड मुंड दैतन दुहूं; सबन प्रबल दलु लीन ॥

निकटि जाइ गिर घेरि कै; महा कुलाहल कीन ॥१०९॥

स्वैया ॥

जब कान सुनी धुनि दैतन की; तब कोपु कीओ गिरजा मन मै ॥

चड़ि सिंघ सु संख बजाइ चली; सभि आयुध धार तबै तन मै ॥

गिर ते उतरी दल बैरन कै; पर यौ उपमा उपजी मन मै ॥

नभ ते बहरी लखि छूट परी; जनु कूक कुलंगन के गन मै ॥११०॥

चंड कुवंड ते बान छुटे; इक ते दस सउ ते सहंस तह बाढे ॥

लछकु हुइ करि जाइ लगे तन; दैतन माझ रहे गडि गाढे ॥

को कवि ताहि सराह करै; अतिसै उपमा जु भई बिनु काढे ॥

फागुनि पउन के गउन भए जनु; पातु बिहीन रहे तरु ठाढे ॥१११॥

मुंड लई करवार हकार कै; केहरि के अंग अंग प्रहारे ॥

फिर दई तन दउर के गउरि को; घाइल कै निकसी अंग धारे ॥

स्रउन भरी थहरै करि दैत के; को उपमा कवि अउर बिचारे ॥

पान गुमान सो खाइ अघाइ; मनो जमु आपुनी जीभ निहारे ॥११२॥

घाउ कै दैत चलिओ जब ही; तब देवी निखंग ते बान सु काढे ॥

कान प्रमान लउ खैच कमान; चलावत एक अनेक हुइ बाढे ॥

मुंड लै ढाल दई मुख ओटि; धसे तिह मधि रहे गडि गाढे ॥

मानहु कूरम पीठ पै नीठ; भए सहस फनि के फन ठाढे ॥११३॥

सिंघहि प्रेर कै आगै भई; करि मै असि लै बर चंड स्मभारिओ ॥

मारि के धूरि कीए चकचूर; गिरे अरि पूर महा रन पारिओ ॥

फेरि के घेरि लइओ रन माहि सु; मुंड को मुंड जुदा करि मारिओ ॥

ऐसे परिओ धरि ऊपर जाइ; जिउ बेलहि ते कदूआ कटि डारिओ ॥११४॥

सिंघ चड़ी मुख संख बजावत; जिउ घन मै तड़ता दुति मंडी ॥

चक्र चलाइ गिराइ दइओ; अरि भाजत दैत बडे बरबंडी ॥

भूत पिसाचनि मास अहार; करै किलकार खिलार के झंडी ॥

मुंड को मुंड उतार दइओ; अब चंड को हाथ लगावत चंडी ॥११५॥

मुंड महा रन मधि हनिओ; फिर कै बर चंडि तबै इह कीनो ॥

मारि बिदार दई सभ सैण; सु चंडिका चंड सो आहव कीनो ॥

लै बरछी कर मै अरि को सिर; कै बरु मारि जुदा करि दीनो ॥

लै के महेस त्रिसूल गनेस को; रुंड कीओ जनु मुंड बिहीनो ॥११६॥

इति स्री बचित्र नाटके स्री चंडी चरित्रे चंड मुंड बधहि चत्रथ धयाइ समापतम सतु सुभम सतु ॥४॥

सोरठा ॥

घाइल घूमत कोटि; जाइ पुकारे सु्मभ पै ॥

मारे देवी घोटि; सुभट कटक के बिकट अति ॥११७॥

दोहरा ॥

राज गात के बाति इह; कही जु ताही ठउर ॥

मरिहो जीअति न छाडि हो; कहिओ सति, नहि अउर ॥११८॥

तुंड सु्मभ के चंडिका; चढि बोली इह भाइ ॥

मानो आपनी म्रित को; लीनो असुर बुलाइ ॥११९॥

सु्मभ निसु्मभ सु दुहूं मिल; बैठि मंत्र तब कीन ॥

सैना सकल बुलाइ कै; सुभट बीर चुन लीन ॥१२०॥

रकतबीज को भेजीए; मंत्रन कही बिचार ॥

पाथर जिउ गिरि डार के; चंडहि हनै हकारि ॥१२१॥

सोरठा ॥

भेजो कोऊ दूत ग्रह; ते लिआवै ताहि को ॥

जीतिओ जिनि पुरहूत; भुजबलि जा के अमित है ॥१२२॥

दोहरा ॥

स्रोणत बिंद पै दैत इकु; गइओ, करी अरदासि ॥

राज बुलावत सभा मै; बेग चलो तिह पासि ॥१२३॥

रकत बीज न्रिप सु्मभ को; कीनो आनि प्रनाम ॥

असुर सभा मधि भाउ करि; कहिओ, करहु मम काम ॥१२४॥

स्वैया ॥

स्रउणत बिंद को सु्मभ निसु्मभ; बुलाइ बैठाइ कै आदरु कीनो ॥

दै सिरताज बडे गजराज; सु बाज दए रिझवाइ कै, लीनो ॥

पान लै दैत कही इह, चंड को; रुंड करो अब मुंड बिहीनो ॥

ऐसे कहिओ तिन मधि सभा; न्रिप रीझ कै मेघ अड्मबर दीनो ॥१२५॥

स्रोणत बिंद को सु्मभ निसु्मभ; कहिओ तुम जाहु महा दलु लै कै ॥

छार करो गरूए गिर राजहि; चंडि पचारि हनो बलु कै कै ॥

कानन मै न्रिप की सुनी बात; रिसात चलिओ चड़ि उपर गै कै ॥

मानो प्रतछ होइ अंतिक दंति को; लै कै चलिओ रनि हेत जु छै कै ॥१२६॥

बीज रकत्र सु ब्मब बजाइ कै; आगै कीए गज बाज रथईआ ॥

एक ते एक महा बलि दानव; मेर को पाइन साथ मथईआ ॥

देखि तिने सुभ अंग सु दीरघ; कउच सजे कटि बाधि भथईआ ॥

लीने कमानन बान क्रिपान; समान कै साथ लए जो सथईआ ॥१२७॥

दोहरा ॥

रकत बीज दल साज कै; उतरे तटि गिरि राज ॥

स्रवणि कुलाहल सुनि सिवा; करिओ जुध को साज ॥१२८॥

सोरठा ॥

हुइ सिंघहि असवार; गाज गाज कै चंडिका ॥

चली प्रबल असि धारि; रकति बीज के बध नमित ॥१२९॥

स्वैया ॥

आवत देख के चंडि प्रचंड को; स्रोणतबिंद महा हरखिओ है ॥

आगे ह्वै सत्रु धसै रन मधि सु; क्रुध के जुधहि को सरखिओ है ॥

लै उमडिओ दलु बादलु सो; कवि नै जसु इआ छबि को परखिओ है ॥

तीर चलै इम बीरन के; बहु मेघ मनो बलु कै बरखिओ है ॥१३०॥

बीरन के कर ते छुटि तीर; सरीरन चीर के पारि पराने ॥

तोर सरासन फोर कै कउचन; मीनन के रिपु जिउ थहराने ॥

घाउ लगे तन चंडि अनेक सु; स्रउण चलिओ बहि कै सरताने ॥

मानहु फारि पहार हूं को; सुत तछक के निकसे कर बाने ॥१३१॥

बीरन के कर ते छुटि तीर; सु चंडिका सिंघन जिउ भभकारी ॥

लै करि बान कमान क्रिपान; गदा गहि चक्र छुरी अउ कटारी ॥

काट कै दामन छेद कै भेद कै; सिंधुर की करी भिंन अ्मबारी ॥

मानहु आग लगाइ हनू; गड़ लंक अवास की डारी अटारी ॥१३२॥

तोर कै मोर कै दैतन के; मुख घोर के चंडि महा असि लीनो ॥

जोर कै कोर कै ठोर कै बीर; सु राछस को हति कै तिह दीनो ॥

खोर कै तोर कै बोर कै दानव; लै तिन के करे हाड चबीनो ॥

स्रउण को पान करिओ जिउ दवा हरि; सागर को जल जिउ रिखि पीनो ॥१३३॥

चंडि प्रचंड कुवंड करं गहि; जुध करिओ न गने भट आने ॥

मारि दई सभ दैत चमूं; तिह स्रउणत ज्मबुक ग्रिझ अघाने ॥

भाल भइआनक देखि भवानी को; दानव इउ रन छाडि पराने ॥

पउन के गउन के तेज प्रताप ते; पीपर के जिउ पात उडाने ॥१३४॥

आहव मै खिझ कै बर चंड; करं धर कै हरि पै अरि मारे ॥

एकन तीरन चक्र गदा हति; एकन के तन केहरि फारे ॥

है दल गै दल पैदल घाइ कै; मार रथी बिरथी कर डारे ॥

सिंधुर ऐसे परे तिह ठउर; जिउ भूम मै झूमि गिरे गिर भारे ॥१३५॥

दोहरा ॥

रकत बीज की चमूं सभ; भागी करि तिह त्रास ॥

कहिओ दैत पुनि घेर कै; करो चंडि को नास ॥१३६॥

स्वैया ॥

कानन मै सुनि कै इह बात; सु बीर फिरे कर मै असि लै लै ॥

चंडि प्रचंड सो जुधु करिओ; बलि कै अत ही मन क्रुधत ह्वै कै ॥

घाउ लगै तिन के तन मै; इम स्रउण गिरिओ धरनी परु चुऐ कै ॥

आग लगे जिमु कानन मै; तन तिउ रही बानन की धुनि ह्वै कै ॥१३७॥

आइस पाइ कै दानव को; दल चंडि के सामुहे आइ अरिओ है ॥

ढार अउ सांग क्रिपाननि लै कर; मै, बर बीरन जुध करिओ है ॥

फेर फिरे नहि आहव ते; मन महि तिह धीरज गाढो धरिओ है ॥

रोक लई चहूं ओर ते चंडि; सु भान मनो परबेख परिओ है ॥१३८॥

कोप कै चंडि प्रचंड कुवंड; महा बल कै बलवंड स्मभारिओ ॥

दामिनि जिउ घन से दल पैठि कै; कै, पुरजे पुरजे दलु मारिओ ॥

बाननि साथ बिदार दए अरि; ता छबि को कवि भाउ बिचारिओ ॥

सूरज की किरने सरमासहि; रेन अनेक तहा करि डारिओ ॥१३९॥

चंडि चमूं बहु दैतन की हति; फेरि प्रचंड कुवंड स्मभारिओ ॥

बानन सो दल फोर दइओ; बल कै बर सिंघ महा भभकारिओ ॥

मार दए सिरदार बडे; धरि स्रउण बहाइ बडो रन पारिओ ॥

एक के सीस दइओ धनु यौ; जनु कोप कै गाज ने मंडप मारिओ ॥१४०॥

दोहरा ॥

चंडि चमूं सभ दैत की; ऐसे दई संघारि ॥

पउन पूत जिउ लंक को; डारिओ बाग उखारि ॥१४१॥

स्वैया ॥

गाज कै चंडि महाबलि मेघ सी; बूंदन जिउ अरि पै सर डारे ॥

दामिनि सो खग लै करि मै; बहु बीर अधं धर कै धरि मारे ॥

घाइल घूम परे तिह इउ; उपमा मन मै कवि यौ अनुसारे ॥

स्रउन प्रवाह मनो सरता; तिह मधि धसी करि लोथ करारे ॥१४२॥

ऐसे परे धरनी पर बीर; सु कै कै दुखंड जु चंडिहि डारे ॥

लोथन उपर लोथ गिरी; बहि स्रउण चलिओ जनु कोट पनारे ॥

लै करि बियाल सो बियाल बजावत; सो उपमा कवि यौ मनि धारे ॥

मानो महा प्रलए बहे पउन; सो आपसि मै भिर है गिरि भारे ॥१४३॥

लै कर मै असि दारुन काम; करे रन मै अरि सो अरिणी है ॥

सूर हने बलि कै बलुवान सु; स्रउन चलिओ बहि बैतरनी है ॥

बाह कटी अध बीच ते सुंड सी; सो उपमा कवि ने बरनी है ॥

आपसि मै लर कै सु मनो; गिरि ते गिरी सरप की दुइ घरनी है ॥१४४॥

दोहरा ॥

सकल प्रबल दल दैत को; चंडी दइओ भजाइ ॥

पाप ताप हरि जाप ते; जैसे जात पराइ ॥१४५॥

स्वैया ॥

भानु ते जिउ तम, पउन ते जिउ घनु; मोर ते जिउ फनि तिउ सुकचाने ॥

सूर ते कातुरु, कूर ते चातुरु; सिंघ ते सातुर एणि डराने ॥

सूम ते जिउ जसु, बिओग ते जिउ रसु; पूत कपूत ते जिउ बंसु हाने ॥

धरम जिउ क्रुध ते, भरम सुबुध ते; चंड के जुध ते दैत पराने ॥१४६॥

फेर फिरै सभ जुध के कारन; लै करवान क्रुध हुइ धाए ॥

एक लै बान कमानन तान कै; तूरन तेज तुरंग तुराए ॥

धूरि उडी खुर पूरन ते; पथ ऊरध हुइ रवि मंडल छाए ॥

मानहु फेर रचे बिधि लोक; धरा खट आठ अकास बनाए ॥१४७॥

चंड प्रचंड कुवंड लै बाननि; दैतन के तन तूलि जिउ तू्मबे ॥

मार गइंद दए, करवार लै; दानव मान गइओ उड पू्मबे ॥

बीरन के सिर की सित पाग; चली बहि स्रोनत ऊपर खू्मबे ॥

मानहु सारसुती के प्रवाह मै; सूरन के जस कै उठे बू्मबे ॥१४८॥

देतन साथ गदा गहि हाथि सु; क्रुध ह्वै जुधु निसंग करिओ है ॥

पानि क्रिपान लए बलवान सु; मार तबै दल छार करिओ है ॥

पाग समेत गिरिओ सिर एक को; भाउ इहे कबि ता को धरिओ है ॥

पूरनि पुंन पए नभ ते सु; मनो भुअ टूट नछत्र परिओ है ॥१४९॥

बारिद बारन जिउ निरवारि; महा बल धारि तबे इह कीआ ॥

पानि लै बान कमान को तानि; संघार सनेह ते स्रउनत पीआ ॥

एक गए कुमलाइ पराइ कै; एकन को धरकिओ तनि हीआ ॥

चंड के बान किधो कर भानहि; देखि कै दैत गई दुति दीआ ॥१५०॥

लै कर मै असि कोप भई अति; धार महा बल को रन पारिओ ॥

दउर कै ठउर हते बहु दानव; एक गइंद्र बडो रनि मारिओ ॥

कउतकि ता छबि को रन पेखि; तबै कबि इउ मन मधि बिचारिओ ॥

सागर बांधन के समए; नल मानो पहार उखार के डारिओ ॥१५१॥

दोहरा ॥

मार जबै सैना लई; तबै दैत इह कीन ॥

ससत्र धार करि चंडि के; बधिबे को मन दीन ॥१५२॥

स्वैया ॥

बाहनि सिंघ भइआनक रूप; लखिओ सभ दैत महा डर पाइओ ॥

संख लीए करि चक्र अउ बक्र; सरासन पत्र बचित्र बनाइओ ॥

धाइ भुजा बल आपन ह्वै; हम सो तिन यौ अति जुधु मचाइओ ॥

क्रोध कै स्रउणत बिंद कहै; रनि इआही ते चंडिका नाम कहाइओ ॥१५३॥

मारि लइओ दलि अउर भजिओ; तब कोप के आपन ही सु भिरिओ है ॥

चंडि प्रचंडि सो जुधु करिओ; असि हाथि छुटिओ मन नाहि गिरिओ है ॥

लै के कुवंड करं बल धार कै; स्रोन समूह मै ऐसे तरिओ है ॥

देव अदेव समुंद्र मथिओ; मानो मेर को मधि धरिओ सु फिरिओ है ॥१५४॥

क्रुध कै जुध के दैत बली; नद स्रोन को तैर के पार पधारिओ ॥

लै करवार अउ ढार स्मभार कै; सिंघ को दउर कै जाइ हकारिओ ॥

आवत पेख कै चंडि कुवंड ते; बान लगिओ तन मूरछ पारिओ ॥

राम के भ्रातन जिउ हनूमान को; सैल समेत धरा पर डारिओ ॥१५५॥

फेर उठिओ करि लै करवार को; चंड प्रचंड सिउ जुध करिओ है ॥

घाइल कै तन केहर ते; बहि स्रउन समूह धरानि परिओ है ॥

सो उपमा कबि ने बरनी; मन की हरनी तिह नाउ धरिओ है ॥

गेरू नगं पर कै बरखा; धरनी परि मानहु रंग ढरिओ है ॥१५६॥

स्रोणत बिंदु सो चंडि प्रचंड सु; जुध करिओ रन मध रुहेली ॥

पै दल मै दल मीज दइओ; तिल ते जिमु तेल निकारत तेली ॥

स्रोउण परिओ धरनी पर च्वै; रंगरेज की रेनी जिउ फूट कै फैली ॥

घाउ लसै तन दैत के यौ; जनु दीपक मधि फनूस की थैली ॥१५७॥

स्रउणत बिंद को स्रउण परिओ धरि; स्रउनत बिंद अनेक भए है ॥

चंडि प्रचंड कुवंडि स्मभारि के; बानन साथि संघार दए है ॥

स्रउन समूह समाइ गए; बहुरो सु भए, हति फेरि लए है ॥

बारिद धार परै धरनी; मानो बि्मबर ह्वै मिट कै जु गए है ॥१५८॥

जेतक स्रउन की बूंद गिरै रनि; तेतक स्रउनत बिंद ह्वै आई ॥

मार ही मार पुकारि हकार कै; चंडि प्रचंडि के सामुहि धाई ॥

पेखि कै कौतुक ता छिन मै; कवि ने मन मै उपमा ठहराई ॥

मानहु सीस महल के बीच; सु मूरति एक अनेक की झाई ॥१५९॥

स्रउनत बिंद अनेक उठे रनि; क्रुध कै जुध को फेर जुटै है ॥

चंडि प्रचंडि कमान ते बान; सु भानु की अंस समान छुटै है ॥

मारि बिदार दए सु भए फिरि; लै मुंगरा जिमु धान कुटै है ॥

चंड दए सिर खंड जुदे करि; बिलन ते जन बिल तुटै है ॥१६०॥

स्रउनत बिंद अनेक भए; असि लै करि चंडि सु ऐसे उठे है ॥

बूंदन ते उठि कै बहु दानव; बानन बारिद जानु वुठे है ॥

फेरि कुवंडि प्रचंडि स्मभार कै; बान प्रहार संघार सुटे है ॥

ऐसे उठे फिरि स्रउन ते दैत; सु मानहु सीत ते रोम उठे है ॥१६१॥

स्रउनत बिंद भए इकठे; बर चंडि प्रचंड के घेरि लइओ है ॥

चंडि अउ सिंघ दुहूं मिल कै; सब दैतन को दल मार दइओ है ॥

फेरि उठे धुनि के करि कै; सुनि कै मुनि को छुटि धिआनु गइओ है ॥

भूल गए सुर के असवान; गुमान न स्रउनत बिंद गइओ है ॥१६२॥

दोहरा ॥

रकतबीज सो चंडिका; इउ कीनो बर जुधु ॥

अगनत भए दानव तबै; कछु न बसाइओ क्रुध ॥१६३॥

स्वैया ॥

पेखि दसो दिस ते बहु दानव; चंडि प्रचंड तची अखीआ ॥

तब लै के क्रिपान जु काट दए अरि; फूल गुलाब की जिउ पखीआ ॥

स्रउन की छीट परी तन चंडि के; सो उपमा कवि ने लखीआ ॥

जनु कंचन मंदिर मै जरीआ; जरि लाल मनी जु बना रखीआ ॥१६४॥

क्रुध कै जुध करिओ बहु चंडि ने; एतो करिओ मधु सो अबिनासी ॥

दैतन के बध कारन को; निज भाल ते जुआल की लाट निकासी ॥

काली प्रतछ भई तिह ते; रनि फैल रही भय भीरु प्रभा सी ॥

मानहु स्रिंग सुमेर को फोरि कै; धार परी धरि पै जमुना सी ॥१६५॥

मेरु हलिओ दहलिओ सुरलोकु; दसो दिस भूधर भाजत भारी ॥

चालि परिओ तिह चउदहि लोक मै; ब्रहम भइओ मन मै भ्रम भारी ॥

धिआन रहिओ न जटी सु फटी; धरि यौ बलि कै रन मै किलकारी ॥

दैतन के बधि कारन को; करि काल सी काली क्रिपान स्मभारी ॥१६६॥

दोहरा ॥

चंडी काली दुहूं मिलि; कीनो इहै बिचार ॥

हउ हनि हो तू स्रउन पी; अरि दलि डारहि मारि ॥१६७॥

स्वैया ॥

काली अउ केहरि संगि लै चंडि सु; घेरे सबै बन जैसे दवा पै ॥

चंडि के बानन तेज प्रभाव ते; दैत जरै जैसे ईट अवा पै ॥

कालिका स्रउन पीओ तिन को; कवि ने मन मै लीयो भाउ भवा पै ॥

मानहु सिंधु के नीर सबै मिलि; धाइ कै जाइ परो है तवा पै ॥१६८॥

चंडि हने अरु कालिका कोप कै; स्रउनत बिंदन सो इह कीनो ॥

खग स्मभार हकार तबै; किलकार बिदार सभै दलु दीनो ॥

आमिख स्रोन अचिओ बहु कालिका; ता छबि मै कवि इउ मनि चीनो ॥

मानो छुधातरु हुइ कै मनुछ सु; सालन लासहि सो बहु पीनो ॥१६९॥

जुध रकत्र बीज करियो; धरनी पर सो सुर देखत सारे ॥

जेतक स्रौन की बूंद गिरै; उठि तेतक रूप अनेकहि धारे ॥

जुगनि आनि फिरी चहूं ओर ते; सीस जटा करि खपर भारे ॥

स्रोनत बूंद परै अचवै सभ; खग लै चंड प्रचंड संघारे ॥१७०॥

काली अउ चंडि कुवंड स्मभार कै; दैत सो जुध निसंग सजिओ है ॥

मार महा, रन मध भई; पहरेक लउ सार सो सार बजिओ है ॥

स्रउनत बिंद गिरिओ धरनी पर; इउ असि सो अरि सीस भजिओ है ॥

मानो अतीत करियो चित के; धनवंत सभै निज माल तजिओ है ॥१७१॥

सोरठा ॥

चंडी दइओ बिदार; स्रउन पान काली करिओ ॥

छिन मै डारिओ मार; स्रउनत बिंद दानव महा ॥१७२॥

इति स्री मारकंडे पुराने स्री चंडी चरित्र उकति बिलास रकत बीज बधहि नाम पंचमो धिआइ समापतम सतु सुभम सतु ॥५॥

स्वैया ॥

तुछ बचे भज कै रन तिआग कै; सु्मभ निसु्मभ पै जाइ पुकारे ॥

स्रउनत बीज हनिओ दुह ने मिलि; अउर महा भट मार बिदारे ॥

इउ सुनि कै उनि के मुख ते; तब बोलि उठिओ करि खग स्मभारे ॥

इउ हनि हो बर चंडि प्रचंडि; अजा बन मै जिम सिंघ पछारे ॥१७३॥

दोहरा ॥

सकल कटक के भटन को; दइओ जुध को साज ॥

ससत्र पहर कै इउ कहिओ; हनिहो चंडहि आज ॥१७४॥

स्वैया ॥

कोप कै सु्मभ निसु्मभ चढे; धुनि दुंदभि की दसहूं दिस धाई ॥

पाइक अग्र भए मधि बाज; रथी रथ साज कै पाति बनाई ॥

माते मतंग के पुंजन ऊपरि; सुंदर तुंग धुजा फहराई ॥

सक्र सो जुध के हेत मनो; धरि छाडि सपछ उडे गिरराई ॥१७५॥

दोहरा ॥

सु्मभ निसु्मभ बनाइ दलु; घेरि लइओ गिरराज ॥

कवच अंग कसि कोप करि; उठे सिंघ जिउ गाज ॥१७६॥

स्वैया ॥

सु्मभ निसु्मभ सु बीर बली; मनि कोप भरे रन भूमहि आए ॥

देखन मै सुभ अंग उतंग; तुरा करि तेज धरा पर धाए ॥

धूर उडी तब ता छिन मै; तिह के कनका पग सो लपटाए ॥

ठउर अडीठ के जै करबे कहि; तेजि मनो मन सीखन आए ॥१७७॥

दोहरा ॥

चंडि कालिका स्रवन मै; तनिक भनक सुनि लीन ॥

उतरि स्रिंग गिर राज ते; महा कुलाहलि कीन ॥१७८॥

स्वैया ॥

आवत देखि कै चंड प्रचंडि को; कोप करिओ मन मै अति दानो ॥

नास करो इह को छिन मै; करि बान स्मभार बडो धनु तानो ॥

काली के बक्र बिलोकन ते; सु उठिओ मन मै भ्रम जिउ जम जानो ॥

बान समूह चलाइ दए; किलकार उठिओ जु प्रलै घन मानो ॥१७९॥

बैरन के घन से दल पैठि; लइओ करि मै धनु साइकु ऐसे ॥

सिआम पहार से दैत हने; तम जैसे हरे रवि की किरनै से ॥

भाज गई धुजनी डरि कै; कबि कोऊ कहै तिह की छबि कैसे ॥

भीम को स्रउन भरिओ मुख देखि कै; छाडि चले रन कउरउ जैसे ॥१८०॥

कबितु ॥

आगिआ पाइ सु्मभ की, सु महाबीर धीर जोधे; आए चंडि उपर, सु क्रोध कै बनी ठनी ॥

चंडिका लै बान अउ कमान काली किरपान; छिन मधि कै कै बल, सु्मभ की हनी अनी ॥

डरत जि खेत, महा प्रेत कीने बानन सो; बिचल बिथर ऐसे भाजगी अनी किनी ॥

जैसे बारूथल मै सबूह बहे पउन हूं के; धूर उडि चले, हुइ के कोटिक कनी कनी ॥१८१॥

स्वैया ॥

खग लै काली अउ चंडी कुवंडि; बिलोक कै दानव इउ दबटे है ॥

केतक चाब गई मुखि कालिका; केतिन के सिर चंडि कटे है ॥

स्रउनत सिंधु भइओ धर मै; रन छाड गए इक दैत फटे है ॥

सु्मभ पै जाइ कही तिन इउ; बहु बीर महा तिह ठउर लटे है ॥१८२॥

दोहरा ॥

देखि भइआनक जुध को; कीनो बिसनु बिचार ॥

सकति सहाइत के नमित; भेजी रनहि मंझार ॥१८३॥

स्वैया ॥

आइस पाइ सभै सकती; चलि कै तहा चंडि प्रचंड पै आई ॥

देवी कहिओ तिन को कर आदरु; आई भले जनु बोलि पठाई ॥

ता छबि की उपमा अति ही; कवि ने अपने मन मै लखि पाई ॥

मानहु सावन मास नदी; चलि कै जल रासि मै आनि समाई ॥१८४॥

देखि महा दल देवन को; बर बीर सु सामुहे जुध को धाए ॥

बाननि साथि हने बलु कै; रन मै बहु आवत बीर गिराए ॥

दाड़न साथि चबाइ गई कलि; अउर गहै चहूं ओरि बगाए ॥

रावन सो रिस कै रन मै; पति भालक जिउ गिरराज चलाए ॥१८५॥

फेर लै पानि क्रिपान स्मभार कै; दैतन सो बहु जुध करिओ है ॥

मार बिदार संघार दए बहु; भूमि परे भट स्रउन झरिओ है ॥

गूद बहिओ अरि सीसन ते; कवि ने तिह को इह भाउ धरिओ है ॥

मानो पहार के स्रिंगहु ते; धरनी पर आनि तुसार परिओ है ॥१८६॥

दोहरा ॥

भाग गई धुजनी सभै; रहिओ न कछू उपाउ ॥

सु्मभ, निसु्मभहि सो कहिओ; दल लै तुम हूं जाउ ॥१८७॥

स्वैया ॥

मान कै सु्मभ को बोल निसु्मभु; चलिओ दल साजि महा बलि ऐसे ॥

भारथ जिउ रन मै रिसि पारथि; क्रुध कै जुध करिओ करनै से ॥

चंडि के बान लगे बहु दैत कउ; फोरि कै पार भए तन कैसे ॥

सावन मास क्रिसान के खेति; उगे मनो धान के अंकुर जैसे ॥१८८॥

बानन साथ गिराइ दए; बहुरो असि लै करि इउ रन कीनो ॥

मारि बिदारि दई धुजनी सभ; दानव को बलु हुइ गइओ छीनो ॥

स्रउन समूहि परिओ तिह ठउर; तहा कवि ने जसु इउ मन चीनो ॥

सात हूं सागर को रचि कै; बिधि आठवो सिंधु करिओ है नवीनो ॥१८९॥

लै कर मै असि चंडि प्रचंड सु; क्रुध भई रन मध लरी है ॥

फोर दई चतुरंग चमूं; बलु कै बहु, कालिका मारि धरी है ॥

रूप दिखाइ भइआनक इउ; असुर्मपति भ्रात की क्रांति हरी है ॥

स्रउन सो लाल भई धरनी सु; मनो अंग सूही की सारी करी है ॥१९०॥

दैत स्मभारि सभै अपनो बलि; चंडि सो जुध को फेरि अरे है ॥

आयुध धारि लरै रन इउ; जनु दीपक मधि पतंग परे है ॥

चंड प्रचंड कुवंड स्मभारि; सभै रन मधि दु टूक करे है ॥

मानो महा बन मै बर ब्रिछन; काटि कै बाढी जुदे कै धरे है ॥१९१॥

मार लइओ दलु अउर भजिओ; मन मै तब कोप निसु्मभ करिओ है ॥

चंडि के सामुहे आनि अरिओ; अति जुधु करिओ पगु नाहि टरिओ है ॥

चंडि के बान लगिओ मुख दैत के; स्रउन समूह धरानि परिओ है ॥

मानहु राहु ग्रसिओ नभि भानु सु; स्रउनत को अति बउन करिओ है ॥१९२॥

सांग स्मभारि करं बलु धार कै; चंडि दई रिपु भाल मै ऐसे ॥

जोर कै फोर गई सिर त्रान को; पार भई पट फारि अनैसे ॥

स्रउन की धार चली पथ ऊरध; सो उपमा सु भई कहु कैसे? ॥

मानो महेस के तीसरे नैन; की जोत उदोत भई खुल तैसे ॥१९३॥

दैत निकास कै सांग वहै; बलि कै तब चंडि प्रचंड के दीनी ॥

जाइ लगी तिह के मुख मै; बहि स्रउन परिओ अति ही छबि कीनी ॥

इउ उपमा उपजी मन मै; कबि ने इह भांति सोई कहि दीनी ॥

मानहु सिंगल दीप की नारि; गरे मै त्मबोर की पीक नवीनी ॥१९४॥

जुधु निसु्मभ करिओ अति ही; जसु इआ छबि को कबि को बरनै ॥

नहि भीखम द्रोणि क्रिपा अरु द्रोणज; भीम न अरजन अउ करनै ॥

बहु दानव के तन स्रउन की धार; छुटी, सु लगे सर के फरनै ॥

जनु राति कै दूरि बिभास दसो दिस; फैलि चली रवि की किरनै ॥१९५॥

चंडि लै चक्र धसी रन मै; रिसि क्रुध कीओ बहु दानव मारे ॥

फेरि गदा गहि कै लहि कै; चहि कै रिपु सैन हती ललकारे ॥

लै कर खग अदग महा; सिर दैतन के बहु भू पर झारे ॥

राम के जुध समे हनूमानि; जुआन मनो गरूए गिर डारे ॥१९६॥

दानव एक बडो बलवान; क्रिपान लै पानि हकार कै धाइओ ॥

काढु कै खग सु चंडिका मिआन ते; ता तन बीच भले बरि लाइओ ॥

टूट परिओ सिर वा धरि ते; जसु इआ छबि को कवि के मनि आइओ ॥

ऊच धराधर ऊपर ते; गिरिओ काक कराल भुजंगम खाइओ ॥१९७॥

बीर निसु्मभ को दैत बली इक; प्रेरि तुरंग गइओ रनि सामुहि ॥

देखत धीरज नाहि रहै; अबि को समरथ है? बिक्रम जा महि ॥

चंडि लै पानि क्रिपान हने अरि; फेरि दई सिर दानव ता महि ॥

मुंडहि तुंडहि रुंडहि चीरि; पलान किकान धसी बसुधा महि ॥१९८॥

इउ जब दैत हतिओ बर चंडि सु; अउर चलिओ रन मधि पचारे ॥

केहरि के समुहाइ रिसाइ कै; धाइ कै घाइ दु तीनक झारे ॥

चंडि लई करवार स्मभार; हकार कै सीस दई बलु धारे ॥

जाइ परिओ सिर दूर पराइ; जिउ टूटत अ्मबु बयार के मारे ॥१९९॥

जानि निदान को जुधु बनिओ; रनि दैत सबूह सबै उठि धाए ॥

सार सो सार की मार मची तब; काइर छाड कै खेत पराए ॥

चंडि के खग गदा लगि दानव; रंचक रंचक हुइ तन आए ॥

मूंगर लाइ हलाइ मनो; तरु काछी ने पेड ते तूत गिराए ॥२००॥

पेखि चमूं बहु दैतन की; पुनि चंडिका आपने ससत्र स्मभारे ॥

बीरन के तन चीरि पचीर से; दैत हकार पछारि संघारे ॥

घाउ लगे तिन को रन भूमि मै; टूट परे धर ते सिर निआरे ॥

जुध समै सुत भान मनो; ससि के सभ टूक जुदे कर डारे ॥२०१॥

चंडि प्रचंड तबै बल धारि; स्मभारि लई करवार करी करि ॥

कोप दईअ निसु्मभ के सीसि; बही इह भात, रही तरवा तरि ॥

कउन सराहि करै कहि? ता छिन; सो बिब होइ, परै धरनी पर ॥

मानहु सार की तार लै हाथि; चलाई है साबुन को सबुनीगर ॥२०२॥

इति स्री मारकंडे पुराने चंडी चरित्र उकति बिलास निसु्मभ बधहि खसटमो धिआइ समापतम ॥६॥

दोहरा ॥

जब निसु्मभ रनि मारिओ; देवी इह परकार ॥

भाजि दैत इक सु्मभ पै; गइओ तुरंगम डारि ॥२०३॥

आनि सु्मभ पै तिन कही; सकल जुध की बात ॥

तब भाजे दानव सभै; मारि लइओ तुअ भ्रात ॥२०४॥

स्वैया ॥

सु्मभ, निसु्मभ हनिओ सुनि कै; बर बीरन के चिति छोभ समाइओ ॥

साजि चड़िओ गज बाज समाज कै; दानव पुंज लीए रन आइओ ॥

भूमि भइआनक लोथ परी लखि; स्रउन समूह महा बिसमाइओ ॥

मानहु सारसुती उमडी; जलु सागर के मिलिबे कहु धाइओ ॥२०५॥

चंड प्रचंडि सु केहरि कालिका; अउ सकती मिलि जुध करिओ है ॥

दानव सैन हती इनहूं सभ; इउ कहि कै, मनि कोप भरिओ है ॥

बंधु कबंध परिओ अवलोक कै; सोक कै पाइ न आगै धरिओ है ॥

धाइ सकिओ न, भइओ भइ भीतह; चीतह मानहु लंगु परिओ है ॥२०६॥

फेरि कहिओ दल को जब सु्मभ; सु मानि चले तब दैत घने ॥

गजराज सु बाजन के असवार; रथी रथु पाइक, कउन गनै? ॥

तहा घेर लई चहूं ओर ते चंडि; महा, तन के तन दीह बनै ॥

मनो, भानु को छाइ लइओ उमडै; घन घोर घमंड घटानि सनै ॥२०७॥

दोहरा ॥

चहूं ओरि घेरो परिओ; तबै चंड इह कीन ॥

काली सो हसि तिन कही; नैन सैन करि दीन ॥२०८॥

कबितु ॥

केते मारि डारे, अउ केतक चबाइ डारे; केतक बगाइ डारे, काली कोप तब ही ॥

बाज गज भारे, ते तो नखन सो फारि डारे; ऐसे रन भैकर, न भइओ आगै कब ही ॥

भागे बहु बीर, काहूं सुध न रही सरीर; हाल चाल परी, मरे आपस मै दब ही ॥

पेखि सुर राइ, मनि हरख बढाइ; सुर पुंजन बुलाइ, करै जैजैकार सब ही ॥२०९॥

क्रोधमान भइओ, कहिओ राजा सभ दैतन को; ऐसो जुधु कीनो काली, डारियो बीर मार कै ॥

बल को स्मभारि करि, लीनी करवार ढार; पैठो रन मधि, मारु मारु इउ उचार कै ॥

साथ भए सु्मभ के सु महा बीर धीर जोधे; लीने हथिआर आप आपने स्मभार कै ॥

ऐसे चले दानो, रवि मंडल छपानो मानो; सलभ उडानो पुंज पंखन सु धार कै ॥२१०॥

स्वैया ॥

दानव सैन लखै बलवान सु; बाहनि चंडि प्रचंड भ्रमानो ॥

चक्र अलात की, बात बघूरन; छत्र नही सम अउ खरसानो ॥

तारिन माहि सु ऐसो फिरिओ; जन भउर नही सरताहि बखानो ॥

अउर नही उपमा उपजै; सु दुहूं रुख केहरि के मुख मानो ॥२११॥

जुधु महा असुरंगनि साथि; भइओ तब चंडि प्रचंडहि भारी ॥

सैन अपार हकारि सुधारि; बिदारि संघारि दई रनि कारी ॥

खेत भइओ तहा चार सउ कोस लउ; सो उपमा कवि देखि बिचारी ॥

पूरन एक घरी न परी; जि गिरे धरि पै थर जिउ पतझारी ॥२१२॥

मारि चमूं चतुरंग लई; तब लीनो है सु्मभ चमुंड को आगा ॥

चाल परिओ अवनी सिगरी; हर जू हरि आसन ते उठि भागा ॥

सूख गइओ त्रस कै हरि हारि सु; संकति अंक महा भइओ जागा ॥

लाग रहिओ लपटाइ गरे; मधि मानहु मुंड की माल को तागा ॥२१३॥

चंडि के सामुहि आइ कै सु्मभ; कहिओ मुखि सो, इह मै सभ जानी ॥

काली समेत सभै सकती मिलि; दीनो खपाइ सभै दलु बानी ॥

चंडि कहिओ मुख ते उन को; तेऊ, ता छिन गउर के मधि समानी ॥

जिउ सरता के प्रवाह के बीच; मिले बरखा बहु बूंदन पानी ॥२१४॥

कै बलि चंडि महा रन मधि सु; लै जमदाड़ की ता परि लाई ॥

बैठ गई अरि के उर मै; तिह स्रउनत जुगनि पूरि अघाई ॥

दीरघ जुध बिलोक कै बुधि; कवीस्वर के मन मै इह आई ॥

लोथ पै लोथ गई पर इउ सु; मनो सुर लोग की सीढी बनाई ॥२१५॥

सु्मभ चमूं संग चंडिका क्रुध कै; जुध अनेकनि वारि मचिओ है ॥

ज्मबुक जुगनि ग्रिझ मजूर; रकत्र की कीच मै ईस नचिओ है ॥

लुथ पै लुथ सु भीतै भई सित; गूद अउ मेद लै ताहि गचिओ है ॥

भउन रंगीन बनाइ मनो; करिमाविसु चित्र बचित्र रचिओ है ॥२१६॥

स्वैया ॥

दुंद सु जुध भइओ रन मै; उत सु्मभ इतै बर चंडि स्मभारी ॥

घाइ अनेक भए दुहूं कै तनि; पउरख गयो सभ दैत को हारी ॥

हीन भई बल ते भुज कांपत; सो उपमा कवि ऐसि बिचारी ॥

मानहु गारड़ू के बल ते; लई पंच मुखी जुग सापनि कारी ॥२१७॥

कोप भई बर चंडि महा; बहु जुधु करिओ रन मै बल धारी ॥

लै कै क्रिपान महा बलवान; पचार कै सु्मभ के ऊपर झारी ॥

सार सो सार की सार बजी; झनकार उठी तिह ते चिनगारी ॥

मानहु भादव मास की रैनि; लसै पटबीजन की चमकारी ॥२१८॥

घाइन ते बहु स्रउन परिओ; बल छीन भइओ न्रिप सु्मभ को कैसे ॥

जोति घटी मुख की तन की; मनो पूरन ते परिवा ससि जैसे ॥

चंडि लइओ करि सु्मभ उठाइ; कहिओ कवि ने मुखि ते जसु ऐसे ॥

रछक गोधन के हित कान्ह; उठाइ लइओ गिरि गोधनु जैसे ॥२१९॥

दोहरा ॥

कर ते गिरि, धरनी परिओ; धरि ते गइओ अकासि ॥

सु्मभ संघारन के नमित; गई चंडि तिह पास ॥२२०॥

स्वैया ॥

बीच तबै नभ मंडल चंडिका; जुध करिओ जिम आगे न होऊ ॥

सूरज चंदु निछत्र सचीपति; अउर सभै सुर पेखत सोऊ ॥

खैच कै मूंड दई करवार की; एक को मारि कीए तब दोऊ ॥

सु्मभ दु टूक ह्वै भूमि परिओ; तन जिउ कलवत्र सो चीरत कोऊ ॥२२१॥

दोहरा ॥

सु्मभ मार कै चंडिका; उठी सु संख बजाइ ॥

तब धुनि घंटा की करी; महा मोद मनि पाइ ॥२२२॥

दैत राज छिन मै हनिओ; देवी इह परकार ॥

असट करन महि ससत्र गहि; सैना दई संघार ॥२२३॥

स्वैया ॥

चंडि के कोप न ओप रही; रन मै असि धारि भई समुहाई ॥

मारि बिदारि संघारि दए; तब भूप बिना, करै कउन लराई? ॥

कांप उठे अरि त्रास हीए धरि; छाडि दई सभ पउरखताई ॥

दैत चलै तजि खेत इउ, जैसे; बडे गुन लोभ ते जात पराही ॥२२४॥

इति स्री मारकंडे पुराणे चंडी चरित्रे सु्मभ बधहि नाम सपतमो धिआय स्मपूरनं ॥७॥

स्वैया ॥

भाजि गइओ मघवा जिन के डर; ब्रहम ते आदि सभै भै भीते ॥

तेई वै दैत पराइ गए; रनि हार निहार भए बलु रीते ॥

ज्मबुक ग्रिझ निरास भए; बन बास गए जुग जामन बीते ॥

संत सहाइ सदा जग माइ; सु सु्मभ निसु्मभ बडे अरि जीते ॥२२५॥

देव सभै मिलि कै इक ठउर; सु अछत कुंकम चंदन लीनो ॥

तछन लछन दै कै प्रदछन; टीका सु चंडि के भाल मै दीनो ॥

ता छबि को उपज्यो तह भाव; इहै, कवि ने मन मै लखि लीनो ॥

मानहु चंद कै मंडल मै; सुभ मंगल आनि प्रवेसहि कीनो ॥२२६॥

कबितु ॥

मिलि के सु देवन, बडाई करी कालिका की; एहो, जग मात ! तै तो कटिओ बडो पापु है ॥

दैतन के मार, राज दीनो तै सुरेस हूं को; बडो जसु लीने जगि, तेरो ई प्रतापु है ॥

देत है असीस, दिज राज रिखि बारि बारि; तहा ही पड़िओ है, ब्रहम कउच हूं को जाप है ॥

ऐसे जसु पूर रहिओ, चंडिका को तीन लोकि; जैसे धार सागर मै, गंगा जी को आपु है ॥२२७॥

स्वैया ॥

देहि असीस सभै सुर नारि; सुधारि कै आरती दीप जगाइओ ॥

फूल सुगंध सुअछत दछन; जछन जीत को गीत सु गाइओ ॥

धूप जगाइ कै, संख बजाइ कै; सीस निवाइ कै, बैन सुनाइओ ॥

हे जग माइ ! सदा सुख दाइ; तै सु्मभ को घाइ, बडो जसु पाइओ ॥२२८॥

सक्रहि साजि समाज दै चंड सु; मोद महा मन माहि रई है ॥

सूर ससी नभि थाप कै तेजु दे; आप तहा ते सु लोप भई है ॥

बीच अकास प्रकास बढिओ; तिह की उपमा मन ते न गई है ॥

धूरि कै पूर मलीन हुतो रवि; मानहु चंडिका ओप दई है ॥२२९॥

कबितु ॥

प्रथम मधु कैट मद मथन महिखासुरै; मान, मरदन करन तरुनि बर बंडका ॥

धूम्र द्रिग धरनधरि धूरि धानी करन; चंड अरु मुंड के, मुंड खंड खंडका ॥

रकत बीरज हरन, रकत भछन करन; दरन अनसु्मभ रनि, रार रिस मंडका ॥

स्मभ बलु धार, संघार करवार करि; सकल खलु असुर दलु जैत जै चंडिका ॥२३०॥

स्वैया ॥

देह सिवा, बरु मोहि इहै; सुभ करमन ते कबहूं न टरो ॥

न डरो अरि सो, जब जाइ लरो; निसचै करि अपुनी जीत करो ॥

अरु सिख हौ आपने ही मन को; इह लालच हउ, गुन तउ उचरो ॥

जब आव की अउध निदान बनै; अति ही रन मै तब जूझ मरो ॥२३१॥

चंडि चरित्र कवितन मै; बरनिओ सभ ही रस रुद्रमई है ॥

एक ते एक रसाल भइओ; नख ते सिख लउ उपमा सु नई है ॥

कउतक हेतु करी कवि ने; सतिसय की कथा इह पूरी भई है ॥

जाहि नमित पड़ै सुनि है नर; सो निसचै करि ताहि दई है ॥२३२॥

दोहरा ॥

ग्रंथ सति सइआ को करिओ; जा सम अवरु न कोइ ॥

जिह नमित कवि ने कहिओ; सु देह चंडिका ! सोइ ॥२३३॥

इति स्री मारकंडे पुराने स्री चंडी चरित्रे उकति बिलास देव सुरेस सहित जैकार सबद करा असटमो धिआइ समापतम सतु सुभम सतु ॥८॥