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दसम ग्रन्थ/चंडी चरित्र भाग दूसरा

विकिपुस्तक से


ੴ ਸ੍ਰੀ ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ ਕੀ ਫਤਹ ॥ ੴ स्री वाहिगुरू जी की फतह ॥

स्री भगउती जी सहाइ ॥

ਅਥ ਚੰਡੀ ਚਰਿਤ੍ਰ ਲਿਖ੍ਯਤੇ ॥ अथ चंडी चरित्र लिख्यते ॥ नराज छंद ॥

महिख दईत सूरयं ॥

बढियो सो लोह पूरयं ॥

सु देव राज जीतयं ॥

त्रिलोक राज कीतयं ॥१॥

भजे सु देवता तबै ॥

इकत्र होइ कै सबै ॥

महेसुराचलं बसे ॥

बिसेख चित मो त्रसे ॥२॥


जुगेस भेस धार कै ॥

भजे हथियार डार कै ॥

पुकार आरतं चलै ॥

बिसूर सूरमा भले ॥३॥

बरख किते तहा रहे ॥

सु दुख देह मो सहे ॥

जगत्र माति धिआइयं ॥

सु जैत पत्र पाइयं ॥४॥

प्रसंन देवता भए ॥

चरंन पूजबे धए ॥

सनमुखान ठढीयं ॥

प्रणाम पाठ पढीयं ॥५॥

रसावल छंद ॥

तबै देव धाए ॥

सभो सीस निआए ॥

सुमन धार बरखे ॥

सबै साध हरखे ॥६॥

करी देबि अरचा ॥

ब्रहम बेद चरचा ॥

जबै पाइ लागे ॥

तबै सोग भागे ॥७॥

बिनंती सुनाई ॥

भवानी रिझाई ॥

सबै ससत्र धारी ॥

करी सिंघ सुआरी ॥८॥

करे घंट नादं ॥

धुनं निरबिखादं ॥

सुनो दईत राजं ॥

सजियो जुध साजं ॥९॥

चड़ियो राछसेसं ॥

रचे चार अनेसं ॥

बली चामरेवं ॥

हठी चिछुरेवं ॥१०॥

बिड़ालछ बीरं ॥

चड़े बीर धीरं ॥

बड़े इखु धारी ॥

घटा जान कारी ॥११॥

दोहरा ॥

बाणि जिते राछसनि मिलि; छाडत भए अपार ॥

फूलमाल हुऐ मात उरि; सोभे सभे सुधार ॥१२॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

जिते दानवौ बान पानी चलाए ॥

तिते देवता आपि काटे बचाए ॥

किते ढाल ढाहे किते पास पेले ॥

भरे बसत्र लोहू जनो फाग खेलै ॥१३॥

द्रुगा हूं कीयं खेत धुंके नगारे ॥

करं पटिसं परिघ पासी स्मभारे ॥

तहा गोफनै गुरज गोले स्मभारै ॥

हठी मार ही मार कै कै पुकारै ॥१४॥

तबे असट हाथं हथियारं स्मभारे ॥

सिरं दानवेंद्रान के ताकि झारे ॥

बबकियो बली सिंघ जुधं मझारं ॥

करे खंड खंडं सु जोधा अपारं ॥१५॥

तोटक छंद ॥

तब दानव रोस भरे सब ही ॥

जग मात के बाण लगै जब ही ॥

बिबिधायुध लै सु बली हरखे ॥

घन बूंदन जियो बिसखं बरखे ॥१६॥

जनु घोर कै सिआम घटा घुमडी ॥

असुरेस अनीकनि त्यो उमिडी ॥

जग मात, बिरूथनि मो धसि कै ॥

धनु साइक हाथ गहियो हसि कै ॥१७॥

रण कुंजर पुंज गिराइ दीए ॥

इक खंड अखंड दुखंड कीए ॥

सिर एकनि चोट निफोट बही ॥

तरवार हुऐ तरवार रही ॥१८॥

तन झझर हुऐ रण भूमि गिरे ॥

इक भाज चले फिर कै न फिरे ॥

इकि हाथ हथिआर लै आनि बहे ॥

लरि कै मरि कै गिरि खेति रहे ॥१९॥

नराज छंद ॥

तहा सु दैत राजयं ॥

सजे सो सरब साजयं ॥

तुरंग आप बाहीयं ॥

बधं सु मात चाहीयं ॥२०॥

तबै द्रुगा बकारि कै ॥

कमाण बाण धारि कै ॥

सु घाव चामरं कीयो ॥

उतार हसति ते दीयो ॥२१॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

तबै बीर कोपं बिड़ालाछ नामं ॥

सजे ससत्र देहं चलो जुध धामं ॥

सिरं सिंघ के आनि घायं प्रहारं ॥

बली सिंघ सो हाथ सो मारि डारं ॥२२॥

बिड़ालाछ मारे सु पिंगाछ धाए ॥

द्रुगा सामुहे बोल बांके सुनाए ॥

करी अभ्रि ज्यो गरज कै बाण बरखं ॥

महा सूर बीरं भरे जुध हरखं ॥२३॥

तबै देवीअं पाणि बाणं स्मभारं ॥

हनियो दुसट के घाइ सीसं मझारं ॥

गिरियो झूमि भूमं गए प्राण छुटं ॥

मनो मेर को सातवौ स्रिंग टुटं ॥२४॥

गिरै बीर पिंगाछ देबी संघारे ॥

चले अउरु बीरं हथिआरं उघारे ॥

तबै रोसि देबियं सरोघं चलाए ॥

बिना प्रान के जुध मधं गिराए ॥२५॥

चौपई ॥

जे जे सत्रु सामुहे आए ॥

सबै देवता मारि गिराए ॥

सैना सकल जबै हनि डारी ॥

आसुरेस कोपा अहंकारी ॥२६॥

आप जुध तब कीआ भवानी ॥

चुनि चुनि हनै पखरीआ बानी ॥

क्रोध जुआल मसतक ते बिगसी ॥

ता ते आप कालिका निकसी ॥२७॥

मधुभार छंद ॥

मुखि बमत जुआल ॥

निकसी कपालि ॥

मारे गजेस ॥

छुटे हैएस ॥२८॥

छुटंत बाण ॥

झमकत क्रिपाण ॥

सांगं प्रहार ॥

खेलत धमार ॥२९॥

बाहै निसंग ॥

उट्ठे झड़ंग ॥

तुपक तड़ाक ॥

उठत कड़ाक ॥३०॥

बरकंत माइ ॥

भभकंत घाइ ॥

जुझे जुआण ॥

नचे किकाण ॥३१॥

रूआमल छंद ॥

धाईयो असुरेंद्र तहि; निज कोप ओप बढाइ ॥

संग लै चतुरंग सैना; सुध ससत्र नचाइ ॥

देबि ससत्र लगै गिरै रणि; रुझि जुझि जुआण ॥

पीलराज फिरे कहूं रण; सुछ छुछ किकाण ॥३२॥

चीर चामर पुंज कुंजर; बाज राज अनेक ॥

ससत्र असत्र सुभे कहूं; सरदार सुआर अनेक ॥

तेगु तीर तुफंग तबर; कुहुक बान अनंत ॥

बेधि बेधि गिरै बरछिन; सूर सोभावंत ॥३३॥

ग्रिध ब्रिध उडे तहा; फिकरंत सुआन स्रिंगाल ॥

मत दंति सपछ पबै; कंक बंक रसाल ॥

छुद्र मीन छुरुध्रका; अरु चरम कछप अनंत ॥

नक्र बक्र सु बरम सोभित; स्रोण नीर दुरंत ॥३४॥

नव सूर नवका से रथी; अतिरथी जानु जहाज ॥

लादि लादि मनो चले; धन धीर बीर सलाज ॥

मोलु बीच फिरै चुकात; दलाल खेत खतंग ॥

गाहि गाहि फिरे फवजनि; झारि दिरब निखंग ॥३५॥

अंग भंग गिरे कहूं; बहुरंग रंगित बसत्र ॥

चरम बरम सुभं कहूं; रणं ससत्र रु असत्र ॥

मुंड तुंड धुजा पताका; टूक टाक अरेक ॥

जूझ जूझ परे सबै अरि; बाचियो नही एक ॥३६॥

कोप कै महिखेस दानो; धाईयो तिह काल ॥

असत्र ससत्र स्मभार सूरो; रूप कै बिकराल ॥

काल पाणि क्रिपाण लै तिह; मारियो ततकाल ॥

जोति जोति बिखै मिली; तज ब्रहमरंध्रि उताल ॥३७॥

दोहरा ॥

महिखासुर कह मार करि; प्रफुलत भी जग माइ ॥

ता दिन ते महिखे बलै; देत जगत सुख पाइ ॥३८॥

इति स्री बचित्र नाटके चंडी चरित्रे महिखासुर बधह प्रथम धिआइ स्मपूरनम सतु सुभम सतु ॥१॥

अथ धूमनैन जुध कथन ॥

कुलक छंद ॥

देव सु तब गाजीय ॥

अनहद बाजीय ॥

भई बधाई ॥

सभ सुखदाई ॥१॥३९॥

दुंदभ बाजे ॥

सभ सुर गाजे ॥

करत बडाई ॥

सुमन ब्रखाई ॥२॥४०॥

कीनी बहु अरचा ॥

जस धुनि चरचा ॥

पाइन लागे ॥

सभ दुख भागे ॥३॥४१॥

गाए जै करखा ॥

पुहपनि बरखा ॥

सीस निवाए ॥

सभ सुख पाए ॥४॥४२॥

दोहरा ॥

लोप चंडिका जू भई; दै देवन को राजु ॥

बहुर सु्मभ नैसु्मभ दुऐ; दैत बड़े सिरताज ॥५॥४३॥

चौपई ॥

सु्मभ निसु्मभ चड़े लै कै दल ॥

अरि अनेक जीते जिन जलि थलि ॥

देव राज को राज छिनावा ॥

सेसि मुकट मनि भेट पठावा ॥६॥४४॥

छीन लयो अलकेस भंडारा ॥

देस देस के जीति न्रिपारा ॥

जहा तहा कर दैत पठाए ॥

देस बिदेस जीते फिर आए ॥७॥४५॥

दोहरा ॥

देव सबै त्रासति भए; मन मो कीयो बिचार ॥

सरन भवानी की सबै; भाजि परे निरधार ॥८॥४६॥

नराज छंद ॥

सु त्रास देव भाजीअं ॥

बसेख लाज लाजीअं ॥

बिसिख कारमं कसे ॥

सु देवि लोक मो बसे ॥९॥४७॥

तबै प्रकोप देबि हुऐ ॥

चली सु ससत्र असत्र लै ॥

सु मुद पानि पान कै ॥

गजी क्रिपान पानि लै ॥१०॥४८॥

रसावल छंद ॥

सुनी देव बानी ॥

चड़ी सिंघ रानी ॥

सुभं ससत्र धारे ॥

सभे पाप टारे ॥११॥४९॥

करो नद नादं ॥

महा मद मादं ॥

भयो संख सोरं ॥

सुणियो चार ओरं ॥१२॥५०॥

उते दैत धाए ॥

बडी सैन लिआए ॥

मुखं रकत नैणं ॥

बके बंक बैणं ॥१३॥५१॥

चवं चार ढूके ॥

मुखं मारु कूके ॥

लए बाण पाणं ॥

सु काती क्रिपाणं ॥१४॥५२॥

मंडे मध जंगं ॥

प्रहारं खतंगं ॥

करउती कटारं ॥

उठी ससत्र झारं ॥१५॥५३॥

महा बीर ढाए ॥

सरोघं चलाए ॥

करै बारि बैरी ॥

फिरे ज्यो गंगैरी ॥१६॥५४॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

उधित सटायं उतै सिंघ धायो ॥

इते संख लै हाथि देवी बजायो ॥

पुरी चउदहूंयं रहियो नाद पूरं ॥

चमकियो मुखं जुध के मधि नूरं ॥१७॥५५॥

तबै धूम्र नैणं मचियो ससत्र धारी ॥

लए संग जोधा बडे बीर भारी ॥

लयो बेड़ि पबं कीयो नाद उचं ॥

सुणे गरभणीआनि के गरभ मुचं ॥१८॥५६॥

सुणियो नाद स्रवणं कीयो देवि कोपं ॥

सजे चरम बरमं धरे सीसि टोपं ॥

भई सिंघ सुआरं कीयो नाद उचं ॥

सुने दीह दानवान के मान मुचं ॥१९॥५७॥

महा कोपि देवी धसी सैन मधं ॥

करे बीर बंके तहा अधु अधं ॥

जिसै धाइ कै सूल सैथी प्रहारियो ॥

तिने फेरि पाणं न बाणं स्मभारियो ॥२०॥५८॥

रसावल छंद ॥

जिसै बाण मार्यो ॥

तिसै मारि डार्यो ॥

जितै सिंघ धायो ॥

तितै सैन घायो ॥२१॥५९॥

जितै घाइ डाले ॥

तितै घारि घाले ॥

समुहि सत्रु आयो ॥

सु जाने न पायो ॥२२॥६०॥

जिते जुझ रुझे ॥

तिते अंत जुझे ॥

जिनै ससत्र घाले ॥

तिते मार डाले ॥२३॥६१॥

तबै मात काली ॥

तपी तेज जुवाली ॥

जिसै घाव डारियो ॥

सु सुरगं सिधारियो ॥२४॥६२॥

घरी अध मधं ॥

हनियो सैन सुधं ॥

हनियो धूम्र नैणं ॥

सुनियो देव गैणं ॥२५॥६३॥

दोहरा ॥

भजी बिरूथनि दानवी; गई भूप के पास ॥

धूम्रनैण काली हनियो; भजीयो सैन निरास ॥२६॥६४॥

इति स्री बचित्र नाटके चंडी चरित्र धूम्रनैन बधत दुतीआ धिआइ स्मपूरनम सतु सुभम सतु ॥२॥


ਅਥ ਚੰਡ ਮੁੰਡ ਜੁਧ ਕਥਨੰ ॥ अथ चंड मुंड जुध कथनं ॥ दोहरा ॥

इह बिध दैत संघार कर; धवला चली अवास ॥

जो यह कथा पड़ै सुनै; रिधि सिधि ग्रिहि तास ॥१॥६५॥

चौपई ॥

धूम्रनैण जब सुणे संघारे ॥

चंड मुंड तब भूपि हकारे ॥

बहु बिधि कर पठए सनमाना ॥

है गै पति दीए रथ नाना ॥२॥६६॥

प्रिथम निरखि देबीअहि जे आए ॥

ते धवला गिरि ओरि पठाए ॥

तिन की तनिक भनक सुनि पाई ॥

निसिरी ससत्र असत्र लै माई ॥३॥६७॥

रूआल छंद ॥

साजि साजि चले तहा; रणि राछसेंद्र अनेक ॥

अरध मुंडित मुंडितेक; जटा धरे सु अरेक ॥

कोपि ओपं दै सबै; करि ससत्र असत्र नचाइ ॥

धाइ धाइ करै प्रहारन; तिछ तेग क्मपाइ ॥४॥६८॥

ससत्र असत्र लगे जिते; सब फूल माल हुऐ गए ॥

कोप ओप बिलोकि अतिभुत; दानवं बिसमै भए ॥

दउर दउर अनेक आयुध; फेरि फेरि प्रहारही ॥

जूझि जूझि गिरै अरेक; सु मार मार पुकारही ॥५॥६९॥

रेलि रेलि चले हएंद्रन; पेलि पेलि गजेंद्र ॥

झेलि झेलि अनंत आयुध; हेलि हेलि रिपेंद्र ॥

गाहि गाहि फिरे फवजन; बाहि बाहि खतंग ॥

अंग भंग गिरे कहूं रणि; रंग सूर उतंग ॥६॥७०॥

झारि झारि फिरे सरोतम; डारि झारि क्रिपान ॥

सैल से रणि पुंज कुंजर; सूर सीस बखान ॥

बक्र नक्र भुजा सु सोभित; चक्र से रथ चक्र ॥

केस पासि सिबाल सोहत; असथ चूर सरक्र ॥७॥७१॥

सजि सजि चले हथिआरन; गजि गजि गजेंद्र ॥

बजि बजि सबज बाजन; भजि भजि हएंद्र ॥

मार मार पुकार कै; हथीआर हाथि स्मभार ॥

धाइ धाइ परे निसाच; बाइ संख अपार ॥८॥७२॥

संख गोयमं गजीयं; अरु सजीयं रिपुराज ॥

भाजि भाजि चले किते; तजि लाज बीर निलाज ॥

भीम भेरी भुंकीअं; अरु धुंकीअं सु निसाण ॥

गाहि गाहि फिरे फवजन; बाहि बाहि गदाण ॥९॥७३॥

बीर कंगने बंधही; अरु अछरै सिर तेलु ॥

बीर बीनि बरे बरंगन; डारि डारि फुलेल ॥

घालि घालि बिवान लेगी; फेरि फेरि सु बीर ॥

कूदि कूदि परे तहा ते; झागि झागि सु तीर ॥१०॥७४॥

हाकि हाकि लरे तहा रणि; रीझि रीझि भटेंद्र ॥

जीति जीति लयो जिनै; कई बार इंद्र उपेंद्र ॥

काटि काटि दए कपाली; बाटि बाटि दिसान ॥

डाटि डाटि करि दलं; सुर पगु पब पिसान ॥११॥७५॥

धाइ धाइ संघारीअं; रिपु राज बाज अनंत ॥

स्रोण की सरता उठी; रण मधि रूप दुरंत ॥

बाण अउर कमाण सैहथी; सूल तिछु कुठार ॥

चंड मुंड हणे दोऊ; करि कोप कालि क्रवार ॥१२॥७६॥

दोहरा ॥

चंड मुंड मारे दोऊ; काली कोपि क्रवारि ॥

अउर जिती सैना हुती; छिन मो दई संघार ॥१३॥७७॥

इति स्री बचित्र नाटके चंडी चरित्रे चंड मुंड बधह त्रितयो धिआइ स्मपूरनम सतु सुभम सत ॥३॥

ਅਥ ਰਕਤ ਬੀਰਜ ਜੁਧ ਕਥਨੰ ॥

अथ रकत बीरज जुध कथनं ॥ सोरठा ॥

सुनी भूप इम गाथ; चंड मुंड काली हने ॥

बैठ भ्रात सो भ्रात; मंत्र करत इह बिधि भए ॥१॥७८॥

चौपई ॥

रकतबीज तप भूपि बुलायो ॥

अमित दरबु दे तहा पठायो ॥

बहु बिधि दई बिरूथन संगा ॥

है गै रथ पैदल चतुरंगा ॥२॥७९॥

रकतबीज दै चलियो नगारा ॥

देव लोग लउ सुनी पुकारा ॥

क्मपी भूमि गगन थहराना ॥

देवन जुति दिवराज डराना ॥३॥८०॥

धवला गिरि के जब तट आइ ॥

दुंदभि ढोल म्रिदंग बजाए ॥

जब ही सुना कुलाहल काना ॥

उतरी ससत्र असत्र लै नाना ॥४॥८१॥

छहबर लाइ बरखीयं बाणं ॥

बाज राज अरु गिरे किकाणं ॥

ढहि ढहि परे सुभट सिरदारा ॥

जनु कर कटै बिरछ संग आरा ॥५॥८२॥

जे जे सत्र सामुहे भए ॥

बहुर जीअत ग्रिह के नही गए ॥

जिह पर परत भई तरवारा ॥

इकि इकि ते भए दो दो चारा ॥६॥८३॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

झिमी तेज तेगं सुरोसं प्रहारं ॥

खिमी दामिनी जाण भादो मझारं ॥

उदे नद नादं कड़के कमाणं ॥

मचियो लोह क्रोहं अभूतं भयाणं ॥७॥८४॥

बजे भेरि भेरी जुझारे झणंके ॥

परी कुट कुटं लगे धीर धके ॥

चवी चावडीयं नफीरं रणंकं ॥

मनो बिचरं बाघ बंके बबकं ॥८॥८५॥

उते कोपीयं स्रोणबिंदं सु बीरं ॥

प्रहारे भली भांति सो आनि तीरं ॥

उते दउर देवी करियो खग पातं ॥

गरियो मूरछा हुऐ भयो जानु घातं ॥९॥८६॥

छुटी मूरछनायं महाबीर गजियो ॥

घरी चार लउ सार सो सार बजियो ॥

लगे बाण स्रोणं गिरियो भूमि जुधे ॥

उठे बीर तेते कीए नाद क्रुधं ॥१०॥८७॥

उठे बीर जेते तिते काल कूटे ॥

परे चरम बरमं कहूं गात टूटे ॥

जिती भूमि मधं परी स्रोण धारं ॥

जगे सूर तेते कीए मार मारं ॥११॥८८॥

परी कुट कुटं रुले तछ मुछं ॥

कहूं मुंड तुंडं कहूं मासु मुछं ॥

भयो चार सै कोस लउ बीर खेतं ॥

बिदारे परे बीर ब्रिंद्रं बिचेतं ॥१२॥८९॥

रसावल छंद ॥

चहूं ओर ढूके ॥

मुखं मारु कूके ॥

झंडा गड गाढे ॥

मचे रोस बाढे ॥१३॥९०॥

भरे बीर हरखं ॥

करी बाण बरखं ॥

चवं चार ढुके ॥

पछे आहु रुके ॥१४॥९१॥

परी ससत्र झारं ॥

चली स्रोण धारं ॥

उठे बीर मानी ॥

धरे बान हानी ॥१५॥९२॥

महा रोसि गजे ॥

तुरी नाद बजे ॥

भए रोस भारी ॥

मचे छत्रधारी ॥१६॥९३॥

हकं हाक बजी ॥

फिरै सैण भजी ॥

परियो लोह क्रोहं ॥

छके सूर सोहं ॥१७॥९४॥

गिरे अंग भंगं ॥

दवं जानु दंगं ॥

कड़ंकार छुटे ॥

झणंकार उठे ॥१८॥९५॥

कटा कट बाहे ॥

उभै जीत चाहै ॥

महा मद माते ॥

तपे तेज ताते ॥१९॥९६॥

रसं रुद्र राचे ॥

उभै जुध माचे ॥

करै बाण अरचा ॥

धनुर बेद चरचा ॥२०॥९७॥

मचे बीर बीरं ॥

उठी झार तीरं ॥

गलो गड फोरै ॥

नही नैन मोरै ॥२१॥९८॥

समुह ससत्र बरखे ॥

महिखुआसु करखे ॥

करै तीर मारं ॥

बहै लोह धारं ॥२२॥९९॥

नदी स्रोण पूरं ॥

फिरी गैण हूरं ॥

गजै गैणि काली ॥

हसी खपराली ॥२३॥१००॥

कहूं बाज मारे ॥

कहूं सूर भारे ॥

कहूं चरम टूटै ॥

फिरे गज फूटै ॥२४॥१०१॥

कहूं बरम बेधे ॥

कहूं चरम छेदे ॥

कहूं पील परमं ॥

कटे बाज बरमं ॥२५॥१०२॥

बली बैर रुझे ॥

समुहि सार जुझे ॥

लखे बीर खेतं ॥

नचे भूत प्रेतं ॥२६॥१०३॥

नचे मासहारी ॥

हसे ब्योमचारी ॥

किलक कार कंकं ॥

मचे बीर बंकं ॥२७॥१०४॥

छुभे छत्रधारी ॥

महिखुआस चारी ॥

उठे छिछ इछं ॥

चले तीर तिछं ॥२८॥१०५॥

गणं गांध्रबेयं ॥

चरं चारणेसं ॥

हसे सिध सिधं ॥

मचे बीर क्रुधं ॥२९॥१०६॥

डका डक डाकै ॥

हका हक हाकै ॥

भका भुंक भेरी ॥

डमक डाक डेरी ॥३०॥१०७॥

महा बीर गाजे ॥

नवं नाद बाजे ॥

धरा गोम गजे ॥

द्रुगा दैत बजे ॥३१॥१०८॥

बिजै छंद

जेतक बाण चले अरि ओर ते; फूल की माल हुऐ कंठि बिराजे ॥

दानव पुंगव पेखि अच्मभव; छोडि भजे रण एक न गाजे ॥

कुंजर पुंज गिरे तिह ठउर; भरे सभ स्रोणत पै गन ताजे ॥

जानुक नीरध मधि छपे भ्रमि; भूधर के भय ते नग भाजे ॥३२॥१०९॥

मनोहर छंद

स्री जगमात कमान लै हाथि; प्रमाथनि संख प्रज्यो जब जुधं ॥

गातह सैण संघारत सूर; बबकति सिंघ भ्रम्यो रणि क्रुधं ॥

कउचहि भेदि अभेदित अंग; सुरंग उतंग सो सोभित सुधं ॥

मानो बिसाल बड़वानल जुआल; समुद्र के मधि बिराजत उधं ॥३३॥११०॥

पूर रही भवि भूर धनुर धुनि; धूर उडी नभ मंडल छायो ॥

नूर भरे मुख मारि गिरे रणि; हूरन हेरि हीयो हुलसायो ॥

पूरण रोस भरे अरि तूरण; पूरि परे रण भूमि सुहायो ॥

चूर भए अरि रूरे गिरे भट; चूरण जानुक बैद बनायो ॥३४॥१११॥

संगीत भुजंग प्रयात छंद

कागड़दं काती कटारी कड़ाकं ॥

तागड़दं तीरं तुपकं तड़ाकं ॥

झागड़दं नागड़दं बागड़दं बाजे ॥

गागड़दं गाजी महा गज गाजे ॥३५॥११२॥

सागड़दं सूरं कागड़दं कोपं ॥

पागड़दं परमं रणं पाव रोपं ॥

सागड़दं ससत्रं झागड़दं झारै ॥

बागड़दं बीरं डागड़दं डकारे ॥३६॥११३॥

चागड़दं चउपे बागड़दं बीरं ॥

मागड़दं मारे तनं तिछ तीरं ॥

गागड़दं गजे सु बजे गहीरै ॥

कागड़ं कवीयान कथै कथीरै ॥३७॥११४॥

दागड़दं दानो भागड़दं भाजे ॥

गागड़दं गाजी जागड़दं गाजे ॥

छागड़दं छउही छुरे प्रेछड़ाके ॥

तागड़दं तीरं तुपकं तड़ाके ॥३८॥११५॥

गागड़दं गोमाय गजे गहीरं ॥

सागड़दं संखं नागड़दं नफीरं ॥

बागड़दं बाजे बजे बीर खेतं ॥

नागड़दं नाचे सु भूतं परेतं ॥३९॥११६॥

तागड़दं तीरं बागड़दं बाणं ॥

कागड़दं काती कटारी क्रिपाणं ॥

नागड़दं नादं बागड़दं बाजे ॥

सागड़दं सूरं रागड़दं राजे ॥४०॥११७॥

सागड़दं संखं नागड़दं नफीरं ॥

गागड़दं गोमाय गजे गहीरं ॥

नागड़दं नगारे बागड़दं बाजे ॥

जागड़दं जोधा गागड़दं गाजे ॥४१॥११८॥

नराज छंद ॥

जितेकु रूप धारीयं ॥

तितेकु देबि मारीयं ॥

जितेके रूप धारही ॥

तितिओ द्रुगा संघारही ॥४२॥११९॥

जितेकु ससत्र वा झरे ॥

प्रवाह स्रोन के परे ॥

जितीकि बिंदका गिरै ॥

सु पान कालिका करै ॥४३॥१२०॥

रसावल छंद ॥

हूओ स्रोण हीनं ॥

भयो अंग छीनं ॥

गिरियो अंति झूमं ॥

मनो मेघ भूमं ॥४४॥१२१॥

सबे देव हरखे ॥

सुमन धार बरखे ॥

रकत बिंद मारे ॥

सबै संत उबारे ॥४५॥१२२॥

इति स्री बचित्र नाटके चंडी चरित्रे रकत बीरज बधह चतुरथ धिआय स्मपूरनम सतु सुभम सतु ॥४॥


ਅਥ ਨਿਸੁੰਭ ਜੁਧ ਕਥਨੰ ॥ अथ निसु्मभ जुध कथनं ॥ दोहरा ॥

सु्मभ निसु्मभ सुणियो जबै; रकतबीरज को नास ॥

आप चड़त भै जोरि दल; सजे परसु अरु पासि ॥१॥१२३॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

चड़े सु्मभ नैसु्मभ सूरा अपारं ॥

उठे नद नादं सु धउसा धुकारं ॥

भई असट सै कोस लउ छत्र छायं ॥

भजे चंद सूरं डरियो देव रायं ॥२॥१२४॥

भका भुंक भेरी ढका ढुंक ढोलं ॥

फटी नख सिंघं मुखं डढ कोलं ॥

डमा डमि डउरू डका डुंक डंकं ॥

रड़े ग्रिध ब्रिधं किलकार कंकं ॥३॥१२५॥

खुरं खेह उठी रहियो गैन पूरं ॥

दले सिंधु बिधं भए पब चूरं ॥

सुणो सोर काली गहै ससत्र पाणं ॥

किलकार जेमी हने जंग जुआणं ॥४॥१२६॥

रसावल छंद ॥

गजे बीर गाजी ॥

तुरे तुंद ताजी ॥

महिखुआस करखे ॥

सरं धार बरखे ॥५॥१२७॥

इते सिंघ गजियो ॥

महा संख बजियो ॥

रहियो नाद पूरं ॥

छुही गैणि धूरं ॥६॥१२८॥

सबै ससत्र साजे ॥

घणं जेम गाजे ॥

चले तेज तै कै ॥

अनंत ससत्र लै कै ॥७॥१२९॥

चहूं ओर ढूके ॥

मुखं मार कूके ॥

अनंत ससत्र बजे ॥

महा बीर गजे ॥८॥१३०॥

मुखं नैण रकतं ॥

धरे पाणि सकतं ॥

कीए क्रोध उठे ॥

सरं ब्रिसटि बुठे ॥९॥१३१॥

किते दुसट कूटे ॥

अनंतासत्र छूटे ॥

करी बाण बरखं ॥

भरी देबि हरखं ॥१०॥१३२॥

बेली बिंद्रम छंद ॥

कह कह सु कूकत कंकीयं ॥

बहि बहत बीर सु बंकीयं ॥

लह लहत बाणि क्रिपाणयं ॥

गह गहत प्रेत मसाणयं ॥११॥१३३॥

डह डहत डवर डमंकयं ॥

लह लहत तेग त्रमंकयं ॥

ध्रम ध्रमत सांग धमंकयं ॥

बबकंत बीर सु बंकयं ॥१२॥१३४॥

छुटकंत बाण कमाणयं ॥

हररंत खेत खत्राणयं ॥

डहकंत डामर डंकणी ॥

कह कहक कूकत जुगणी ॥१३॥१३५॥

उफटंत स्रोणत छिछयं ॥

बरखंत साइक तिछयं ॥

बबकंत बीर अनेकयं ॥

फिकरंत सिआर बसेखयं ॥१४॥१३६॥

हरखंत स्रोणति रंगणी ॥

बिहरंत देबि अभंगणी ॥

बबकंत केहर डोलही ॥

रणि अभंग कलोलही ॥१५॥१३७॥

ढम ढमत ढोल ढमकयं ॥

धम धमत सांग धमकयं ॥

बह बहत क्रुध क्रिपाणयं ॥

जुझैत जोध जुआणयं ॥१६॥१३८॥

दोहरा ॥

भजी चमूं सब दानवी; सु्मभ निरख निज नैण ॥

निकट बिकट भट जे हुते; तिन प्रति बुलियो बैण ॥१७॥१३९॥

नराज छंद ॥

निसु्मभ सु्मभ कोप कै ॥

पठियो सु पाव रोप कै ॥

कहियो कि सीघ्र जाईयो ॥

द्रुगाहि बाध ल्याईयो ॥१८॥१४०॥

चड़्यो सु सैण सजि कै ॥

सकोप सूर गजि कै ॥

उठै बजंत्र बाजि कै ॥

चलियो सुरेसु भाजि कै ॥१९॥१४१॥

अनंत सूर संगि लै ॥

चलियो सु दुंदभीन दै ॥

हकारि सूरमा भरे ॥

बिलोकि देवता डरे ॥२०॥१४२॥

मधुभार छंद ॥

क्मपियो सुरेस ॥

बुलियो महेस ॥

किनो बिचार ॥

पुछे जुझार ॥२१॥१४३॥

कीजै सु मित्र ॥

कउने चरित्र ॥

जाते सु माइ ॥

जीतै बनाइ ॥२२॥१४४॥

सकतै निकार ॥

भेजो अपार ॥

सत्रन जाइ ॥

हनि है रिसाइ ॥२३॥१४५॥

सोई काम कीन ॥

देवन प्रबीन ॥

सकतै निकारि ॥

भेजी अपार ॥२४॥१४६॥

ब्रिध नराज छंद ॥

चली सकति सीघ्र स्री; क्रिपाणि पाणि धार कै ॥

उठे सु ग्रिध ब्रिध डउर; डाकणी डकार कै ॥

हसे सु रंग कंक बंकयं; कबंध अंध उठही ॥

बिसेख देवता रु बीर; बाण धार बुठही ॥२५॥१४७॥

रसावल छंद ॥

सबै सकति ऐ कै ॥

चली सीस निऐ कै ॥

महा असत्र धारे ॥

महा बीर मारे ॥२६॥१४८॥

मुखं रकत नैणं ॥

बकै बंक बैणं ॥

धरे असत्र पाणं ॥

कटारी क्रिपाणं ॥२७॥१४९॥

उतै दैत गाजे ॥

तुरी नाद बाजे ॥

धारे चार चरमं ॥

स्रजे क्रूर बरमं ॥२८॥१५०॥

चहूं ओर गरजे ॥

सबै देव लरजे ॥

छुटे तिछ तीरं ॥

कटे चउर चीरं ॥२९॥१५१॥

रुसं रुद्र रते ॥

महा तेज तते ॥

करी बाण बरखं ॥

भरी देबि हरखं ॥३०॥१५२॥

इते देबि मारै ॥

उतै सिंघु फारै ॥

गणं गूड़ गरजै ॥

सबै दैत लरजे ॥३१॥१५३॥

भई बाण बरखा ॥

गए जीति करखा ॥

सबै दुसट मारे ॥

मईया संत उबारे ॥३२॥१५४॥

निसु्मभं संघारियो ॥

दलं दैत मारियो ॥

सबै दुसट भाजे ॥

इतै सिंघ गाजे ॥३३॥१५५॥

भई पुहप बरखा ॥

गाए जीत करखा ॥

जयं संत ज्मपे ॥

त्रसे दैत क्मपे ॥३४॥१५६॥

इति स्री बचित्र नाटके चंडी चरित्रे निसु्मभ बधह पंचमो धिआइ स्मपूरनम सतु सुभम सतु ॥५॥


ਅਥ ਸੁੰਭ ਜੁਧ ਕਥਨੰ ॥ अथ सु्मभ जुध कथनं ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥

लघुं भ्रात जुझियो, सुनियो सु्मभ रायं ॥

सजै ससत्र असत्रं, चड़ियो चउप चायं ॥

भयो नाद उचं, रहियो पूर गैणं ॥

त्रसं देवता दैत, क्मपियो त्रिनैणं ॥१॥१५७॥

डरियो चार बकत्रं, टरियो देव राजं ॥

डिगे पब सरबं, स्रजे सुभ साजं ॥

परे हूह दै कै, भरे लोह क्रोहं ॥

मनो मेर को, सातवो स्रिंग सोहं ॥२॥१५८॥

सजियो सैन सुभं कीयो नाद उचं ॥

सुणै गरभणीआन के गरभ मुचं ॥

परियो लोह क्रोहं उठी ससत्र झारं ॥

चवी चावडी डाकणीयं डकारं ॥३॥१५९॥

बहे ससत्र असत्रं, कटे चरम बरमं ॥

भले कै निबाहियो, भटं सुआमि धरमं ॥

उठी कूह जूहं, गिरे चउर चीरं ॥

रुले तछ मुछं, परी गछ तीरं ॥४॥१६०॥

गिरे अंकुसं, बारुणं बीर खेतं ॥

नचे कंध हीणं, कबंधं अचेतं ॥

उडै ग्रिध ब्रिधं, रड़ै कंक बंकं ॥

भका भुंक भेरी, डाह डूह डंकं ॥५॥१६१॥

टका टुक टोपं, ढका ढुक ढालं ॥

तछा मुछ तेगं, बके बिकरालं ॥

हला चाल बीरं, धमा धमि सांगं ॥

परी हाल हूलं, सुणियो लोग नागं ॥६॥१६२॥

डकी डागणी, जोगणीयं बितालं ॥

नचे कंध हीणं, कबंधं कपालं ॥

हसे देव सरबं, रिस्यो दानवेसं ॥

किधो अगनि जुआलं, भयो आप भेसं ॥७॥१६३॥

दोहरा ॥

सु्मभासुर जेतिकु असुर; पठए कोपु बढाइ ॥

ते देबी सोखत करे; बूंद तवा की निआइ ॥८॥१६४॥

नराज छंद ॥

सु बीर सैण सजि कै ॥

चड़ियो सु कोप गजि कै ॥

चलियो सु ससत्र धार कै ॥

पुकार मारु मार कै ॥९॥१६५॥

संगीत मधुभार छंद ॥

कागड़दं कड़ाक ॥

तागड़दं तड़ाक ॥

सागड़दं सु बीर ॥

गागड़दं गहीर ॥१०॥१६६॥

नागड़दं निसाण ॥

जागड़दं जुआण ॥

नागड़दी निहंग ॥

पागड़दी पलंग ॥११॥१६७॥

तागड़दी तमकि ॥

लागड़दी लहकि ॥

कागड़दं क्रिपाण ॥

बाहै जुआण ॥१२॥१६८॥

खागड़दी खतंग ॥

नागड़दी निहंग ॥

छागड़दी छुटंत ॥

आगड़दी उडंत ॥१३॥१६९॥

पागड़दी पवंग ॥

सागड़दी सुभंग ॥

जागड़दी जुआण ॥

झागड़दी जुझाणि ॥१४॥१७०॥

झागड़दी झड़ंग ॥

कागड़दी कड़ंग ॥

तागड़दी तड़ाक ॥

चागड़दी चटाक ॥१५॥१७१॥

घागड़दी घबाक ॥

भागड़दी भभाक ॥

कागड़दं कपालि ॥

नची बिक्राल ॥१६॥१७२॥

नराज छंद ॥

अनंत दुसट मारीयं ॥

बिअंत सोक टारीयं ॥

कमंध अंध उठीयं ॥

बिसेख बाण बुठीयं ॥१७॥१७३॥

कड़का करमुकं उधं ॥

सड़ाक सैहथी जुधं ॥

बिअंत बाणि बरखयं ॥

बिसेख बीर परखयं ॥१८॥१७४॥

संगीत नराज छंद ॥

कड़ा कड़ी क्रिपाणयं ॥

जटा जुटी जुआणयं ॥

सुबीर जागड़दं जगे ॥

लड़ाक लागड़दं पगे ॥१९॥१७५॥

रसावल छंद ॥

झमी तेग झटं ॥

छुरी छिप्र छुटं ॥

गुरं गुरज गटं ॥

पलंगं पिसटं ॥२०॥१७६॥

किते स्रोण चटं ॥

किते सीस फुटं ॥

कहूं हूह छुटं ॥

कहूं बीर उठं ॥२१॥१७७॥

कहूं धूरि लुटं ॥

किते मार रटं ॥

भणै जस भटं ॥

किते पेट फटं ॥२२॥१७८॥

भजे छत्रि थटं ॥

किते खून खटं ॥

किते दुसट दटं ॥

फिरे ज्यो हरटं ॥२३॥१७९॥

सजे सूर सारे ॥

महिखुआस धारे ॥

लए खगआरे ॥

महा रोह वारे ॥२४॥१८०॥

सही रूप कारे ॥

मनो सिंधु खारे ॥

कई बार गारे ॥

सु मारं उचारे ॥२५॥१८१॥

भवानी पछारे ॥

जवा जेमि जारे ॥

बडेई लुझारे ॥

हुते जे हीए वारे ॥२६॥१८२॥

इकं बार टारे ॥

ठमं ठोकि ठारे ॥

बली मार डारे ॥

ढमके ढढारे ॥२७॥१८३॥

बहे बाणणिआरे ॥

कितै तीर तारे ॥

लखे हाथ बारे ॥

दिवाने दिदारे ॥२८॥१८४॥

हणे भूमि पारे ॥

किते सिंघ फारे ॥

किते आपु बारे ॥

जिते दैत भारे ॥२९॥१८५॥

तिते अंत हारे ॥

बडेई अड़िआरे ॥

खरेई बरिआरे ॥

करूरं करारे ॥३०॥१८६॥

लपके ललाहे ॥

अरीले अरिआरे ॥

हणे काल कारे ॥

भजे रोह वारे ॥३१॥१८७॥

दोहरा ॥

इह बिधि दुसट प्रजार कै; ससत्र असत्र करि लीन ॥

बाण बूंद प्रिथमै बरख; सिंघ नाद पुनि कीन ॥३२॥१८८॥

रसावल छंद ॥

सुणियो सु्मभ रायं ॥

चड़ियो चउप चायं ॥

सजे ससत्र पाणं ॥

चड़े जंगि जुआणं ॥३३॥१८९॥

लगै ढोल ढंके ॥

कमाणं कड़ंके ॥

भए नद नादं ॥

धुणं निरबिखादं ॥३४॥१९०॥

चमकी क्रिपाणं ॥

हठे तेज माणं ॥

महाबीर हुंके ॥

सु नीसाण द्रुंके ॥३५॥१९१॥

चहूं ओर गरजे ॥

सबे देव लरजे ॥

सरं धार बरखे ॥

मईया पाण परखे ॥३६॥१९२॥

चौपई ॥

जे लए ससत्र सामुहे धए ॥

तिते निधन कहुं प्रापति भए ॥

झमकत भई असन की धारा ॥

भभके रुंड मुंड बिकरारा ॥३७॥१९३॥

दोहरा ॥

है गै रथ पैदल कटे; बचियो न जीवत कोइ ॥

तब आपे निकसियो न्रिपति; सु्मभ करै, सो होइ ॥३८॥१९४॥

चौपई ॥

सिव दूती इति द्रुगा बुलाई ॥

कान लागि नीकै समुझाई ॥

सिव को भेज दीजीऐ तहा ॥

दैत राज इसथित है जहा ॥३९॥१९५॥

सिव दूती जब इम सुन पावा ॥

सिवहिं दूत करि उतै पठावा ॥

सिव दूती ता ते भयो नामा ॥

जानत सकल पुरख अरु बामा ॥४०॥१९६॥

सिव कही, दैत राज ! सुनि बाता ॥

इह बिधि कहियो तुमहु जगमाता ॥

देवन के दै कै ठकुराई ॥

कै मांडहु हम संग लराई ॥४१॥१९७॥

दैत राज इह बात न मानी ॥

आप चले जूझन अभिमानी ॥

गरजत कालि काल ज्यो जहा ॥

प्रापति भयो असुर पति तहा ॥४२॥१९८॥

चमकी तहा असन की धारा ॥

नाचे भूत प्रेत बैतारा ॥

फरके अंध कबंध अचेता ॥

भिभरे भईरव भीम अनेका ॥४३॥१९९॥

तुरही ढोल नगारे बाजे ॥

भांति भांति जोधा रणि गाजै ॥

ढडि डफ डमरु डुगडुगी घनी ॥

नाइ नफीरी जात न गनी ॥४४॥२००॥

मधुभार छंद ॥

हुंके किकाण ॥

धुंके निसाण ॥

सजे सु बीर ॥

गजे गहीर ॥४५॥२०१॥

झुके निझक ॥

बजे उबक ॥

सजे सुबाह ॥

अछै उछाह ॥४६॥२०२॥

कटे किकाण ॥

फुटै चवाण ॥

सूलं सड़ाक ॥

उठे कड़ाक ॥४७॥२०३॥

गजे जुआण ॥

बजे निसाणि ॥

सजे रजेंद्र ॥

गजे गजेंद्र ॥४८॥२०४॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

फिरे बाजीयं ताजीयं इत उतं ॥

गजे बारणं दारुणं राज पुत्रं ॥

बजे संख भेरी उठै संख नादं ॥

रणंकै नफीरी धुण निरबिखादं ॥४९॥२०५॥

कड़के क्रिपाणं सड़कार सेलं ॥

उठी कूह जूहं भई रेल पेलं ॥

रुले तछ मुछं गिरे चउर चीरं ॥

कहूं हथ मथं कहूं बरम बीरं ॥५०॥२०६॥

रसावल छंद ॥

बली बैर रुझे ॥

समूह सार जुझे ॥

स्मभारे हथीयारं ॥

बकै मारु मारं ॥५१॥२०७॥

सबै ससत्र सजे ॥

महाबीर गजे ॥

सरं ओघ छुटे ॥

कड़कारु उठे ॥५२॥२०८॥

बजै बाद्रितेअं ॥

हसै गाध्रबेअं ॥

झंडा गड जुटे ॥

सरं संज फुटे ॥५३॥२०९॥

चहूं ओर उठे ॥

सरं ब्रिसट बुठे ॥

करोधी करालं ॥

बकै बिकरालं ॥५४॥२१०॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

किते कुठीअं बुठीअं ब्रिसट बाणं ॥

रणं डुलीयं बाज खाली पलाणं ॥

जुझे जोधियं बीर देवं अदेवं ॥

सभे ससत्र साजा मनो सांतनेवं ॥५५॥२११॥

गजे गजीयं सरब सजे पवंगं ॥

जुधं जुटीयं जोध छुटे खतंगं ॥

तड़के तबलं झड़ंके क्रिपाणं ॥

सड़कार सेलं रणंके निसाणं ॥५६॥२१२॥

ढमा ढम ढोलं ढला ढुक ढालं ॥

गहा जूह गजे हयं हलचालं ॥

सटा सट सैलं खहा खूनि खगं ॥

तुटे चरम बरमं उठे नाल अगं ॥५७॥२१३॥

उठे अगि नालं खहे खोल खगं ॥

निसा मावसी जाणु, मासाण जगं ॥

डकी डाकणी डामरू, डउर डकं ॥

नचे बीर बैताल, भूतं भभकं ॥५८॥२१४॥

बेली बिद्रम छंद ॥

सरब ससत्रु आवत भे जिते ॥

सभ काटि दीन द्रुगा तिते ॥

अरि अउर जेतिकु डारीअं ॥

तेउ काटि भूमि उतारीअं ॥५९॥२१५॥

सर आप काली छंडीअं ॥

सरबासत्र सत्र बिहंडीअं ॥

ससत्र हीन जबै निहारियो ॥

जै सबद देवन उचारियो ॥६०॥२१६॥

नभि मधि बाजन बाजही ॥

अविलोकि देवा गाजही ॥

लखि देव बारं बारही ॥

जै सबद सरब पुकारही ॥६१॥२१७॥

रणि कोपि काल करालीयं ॥

खट अंग पाणि उछालीयं ॥

सिरि सु्मभ हथ दुछंडीयं ॥

इक चोटि दुसट बिहंडीयं ॥६२॥२१८॥

दोहरा ॥

जिम सु्मभासुर को हना; अधिक कोप कै कालि ॥

त्यो साधन के सत्रु सभ; चाबत जाह कराल ॥६३॥२१९॥

इति स्री बचित्र नाटके चंडी चरित्रे सु्मभ बधह खसटमो धिआय स्मपूरनम सतु सुभम सतु ॥६॥


ਅਥ ਜੈਕਾਰ ਸਬਦ ਕਥਨੰ ॥ अथ जैकार सबद कथनं ॥ बेली बिद्रम छंद ॥

जै सबद देव पुकार ही ॥

सब फूलि फूलन डार ही ॥

घनसार कुंकम लिआइ कै ॥

टीका दीय हरखाइ कै ॥१॥२२०॥

चौपई ॥

उसतति सब हूं करी अपारा ॥

ब्रहम कवच को जाप उचारा ॥

संत स्मबूह प्रफुलत भए ॥

दुसट अरिसट नास हुऐ गए ॥२॥२२१॥

साधन को सुख बढे अनेका ॥

दानव दुसट न बाचा एका ॥

संत सहाइ सदा जग माई ॥

जह तह साधन होइ सहाई ॥३॥२२२॥

देवी जू की उसतति ॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

नमो जोग ज्वालं धरीयं जुआलं ॥

नमो सु्मभ हंती नमो करूर कालं ॥

नमो स्रोण बीरजारदनी धूम्र हंती ॥

नमो कालिका रूप जुआला जयंती ॥४॥२२३॥

नमो अ्मबिका ज्मभहा जोति रूपा ॥

नमो चंड मुंडारदनी भूपि भूपा ॥

नमो चामरं चीरणी चित्र रूपं ॥

नमो परम प्रगिया बिराजै अनूपं ॥५॥२२४॥

नमो परम रूपा नमो क्रूर करमा ॥

नमो राजसा सातका परम बरमा ॥

नमो महिख दईत को अंत करणी ॥

नमो तोखणी सोखणी सरब इरणी ॥६॥२२५॥

बिड़ालाछ हंती करूराछ घाया ॥

दिजगि दयारदनीअं नमो जोग माया ॥

नमो भईरवी भारगवीअं भवानी ॥

नमो जोग ज्वालं धरी सरब मानी ॥७॥२२६॥

अधी उरधवी आप रूपा अपारी ॥

रमा रसटरी काम रूपा कुमारी ॥

भवी भावनी भईरवी भीम रूपा ॥

नमो हिंगुला पिंगुलायं अनूपा ॥८॥२२७॥

नमो जुधनी क्रुधनी क्रूर करमा ॥

महा बुधिनी सिधिनी सुध करमा ॥

परी पदमिनी पारबती परम रूपा ॥

सिवी बासवी ब्राहमी रिध कूपा ॥९॥२२८॥

मिड़ा मारजनी सूरतवी मोह करता ॥

परा पसटणी पारबती दुसट हरता ॥

नमो हिंगुला पिंगुला तोतलायं ॥

नमो कारतिक्यानी सिवा सीतलायं ॥१०॥२२९॥

भवी भारगवीयं नमो ससत्र पाणं ॥

नमो असत्र धरता नमो तेज माणं ॥

जया अजया चरमणी चावडायं ॥

क्रिपा कालिकायं नयं निति निआयं ॥११॥२३०॥

नमो चापणी चरमणी खड़ग पाणं ॥

गदा पाणिणी चक्रणी चित्र माणं ॥

नमो सूलणी सहथी पाणि माता ॥

नमो गिआन बिगिआन की गिआन गिआता ॥१२॥२३१॥

नमो पोखणी सोखणीअं म्रिड़ाली ॥

नमो दुसट दोखारदनी रूप काली ॥

नमो जोग जुआला नमो कारतिक्यानी ॥

नमो अ्मबिका तोतला स्री भवानी ॥१३॥२३२॥

नमो दोख दाही नमो दुख्य हरता ॥

नमो ससत्रणी असत्रणी करम करता ॥

नमो रिसटणी पुसटणी परम जुआला ॥

नमो तारुणीअं नमो ब्रिध बाला ॥१४॥२३३॥

नमो सिंघ बाही नमोदाड़ गाड़ं ॥

नमो खग दगं झमा झम बाड़ं ॥

नमो रूड़ि गूड़ं नमो सरब बिआपी ॥

नमो नित नाराइणी दुसट खापी ॥१५॥२३४॥

नमो रिधि रूपं नमो सिध करणी ॥

नमो पोखणी सोखणी सरब भरणी ॥

नमो आरजनी मारजनी काल रात्री ॥

नमो जोग ज्वालं धरी सरब दात्री ॥१६॥२३५॥

नमो परम परमेस्वरी धरम करणी ॥

नई नित नाराइणी दुसट दरणी ॥

छला आछला ईसुरी जोग जुआली ॥

नमो बरमणी चरमणी क्रूर काली ॥१७॥२३६॥

नमो रेचका पूरका प्रात संधिआ ॥

जिनै मोह कै चउदहूं लोग बंधिआ ॥

नमो अंजनी गंजनी सरब असत्रा ॥

नमो धारणी बारणी सरब ससत्रा ॥१८॥२३७॥

नमो अंजनी गंजनी दुसट गरबा ॥

नमो तोखणी पोखणी संत सरबा ॥

नमो सकतणी सूलणी खड़ग पाणी ॥

नमो तारणी कारणीअं क्रिपाणी ॥१९॥२३८॥

नमो रूप काली कपाली अनंदी ॥

नमो चंद्रणी भानुवीअं गुबिंदी ॥

नमो छैल रूपा नमो दुसट दरणी ॥

नमो कारणी तारणी स्रिसट भरणी ॥२०॥२३९॥

नमो हरखणी बरखणी ससत्र धारा ॥

नमो तारणी कारणीयं अपारा ॥

नमो जोगणी भोगणी प्रम प्रगिया ॥

नमो देव दईतयाइणी देवि दुरगिया ॥२१॥२४०॥

नमो घोरि रूपा नमो चारु नैणा ॥

नमो सूलणी सैथणी बक्र बैणा ॥

नमो ब्रिध बुधं करी जोग जुआला ॥

नमो चंड मुंडी म्रिड़ा क्रूर काला ॥२२॥२४१॥

नमो दुसट पुसटारदनी छेम करणी ॥

नमो दाड़ गाड़ा धरी दुख्य हरणी ॥

नमो सासत्र बेता नमो ससत्र गामी ॥

नमो जछ बिदिआ धरी पूरण कामी ॥२३॥२४२॥

रिपं तापणी जापणी सरब लोगा ॥

थपे खापणी थापणी सरब सोगा ॥

नमो लंकुड़ेसी नमो सकति पाणी ॥

नमो कालिका खड़ग पाणी क्रिपाणी ॥२४॥२४३॥

नमो लंकुड़ैसा नमो नाग्र कोटी ॥

नमो काम रूपा कमिछिआ करोटी ॥

नमो काल रात्री कपरदी कलिआणी ॥

महा रिधणी सिध दाती क्रिपाणी ॥२५॥२४४॥

नमो चतुर बाही नमो असट बाहा ॥

नमो पोखणी सरब आलम पनाहा ॥

नमो अ्मबिका ज्मभहा कारतक्यानी ॥

म्रिड़ाली कपरदी नमो स्री भवानी ॥२६॥२४५॥

नमो देव अरद्यारदनी दुसट हंती ॥

सिता असिता राज क्रांती अनंती ॥

जुआला जयंती अलासी अनंदी ॥

नमो पारब्रहमी हरी सी मुकंदी ॥२७॥२४६॥

जयंती नमो मंगला कालकायं ॥

कपाली नमो भद्रकाली सिवायं ॥

दुगायं छिमायं नमो धात्रीएयं ॥

सुआहा सुधायं नमो सीतलेयं ॥२८॥२४७॥

नमो चरबणी सरब धरमं धुजायं ॥

नमो हिंगुला पिंगुला अ्मबिकायं ॥

नमो दीरघ दाड़ा नमो सिआम बरणी ॥

नमो अंजनी गंजनी दैत दरणी ॥२९॥२४८॥

नमो अरध चंद्राइणी चंद्रचूड़ं ॥

नमो इंद्र ऊरधा नमो दाड़ गूड़ं ॥

ससं सेखरी चंद्रभाला भवानी ॥

भवी भैहरी भूतराटी क्रिपानी ॥३०॥२४९॥

कली कारणी करम करता कमछ्या ॥

परी पदमिनी पूरणी सरब इछ्या ॥

जया जोगणी जग करता जयंती ॥

सुभा सुआमणी स्रिसटजा सत्रूहंती ॥३१॥२५०॥

पवित्री पुनीता पुराणी परेयं ॥

प्रभी पूरणी पारब्रहमी अजैयं ॥

अरूपं अनूपं अनामं अठामं ॥

अभीअं अजीतं महा धरम धामं ॥३२॥२५१॥

अछेदं अभेदं अकरमं सु धरमं ॥

नमो बाण पाणी धरे चरम बरमं ॥

अजेयं अभेयं निरंकार नित्यं ॥

निरूपं निरबाणं नमित्यं अक्रित्यं ॥३३॥२५२॥

गुरी गउरजा कामगामी गुपाली ॥

बली बीरणी बावना जग्या जुआली ॥

नमो सत्रु चरबाइणी गरब हरणी ॥

नमो तोखणी सोखणी सरब भरणी ॥३४॥२५३॥

पिलंगी पवंगी नमो चरचितंगी ॥

नमो भावनी भूत हंता भड़िंगी ॥

नमो भीमि सरूपा नमो लोक माता ॥

भवी भावनी भविख्यात बिधाता ॥३५॥२५४॥

प्रभी पूरणी परम रूपं पवित्री ॥

परी पोखणी पारब्रहमी गइत्री ॥

जटी जुआल परचंड मुंडी चमुंडी ॥

बरंदाइणी दुसट खंडी अखंडी ॥३६॥२५५॥

सबै संत उबारी बरं ब्यूह दाता ॥

नमो तारणी कारणी लोक माता ॥

नमसत्यं नमसत्यं नमसत्यं भवानी ॥

सदा राख लै मुहि क्रिपा कै क्रिपानी ॥३७॥२५६॥

इति स्री बचित्र नाटके चंडी चरित्रे देवी जू की उसतत बरननं नाम सपतमो धिआय स्मपूरनम सतु सुभम सतु ॥७॥


ਅਥ ਚੰਡੀ ਚਰਿਤ੍ਰ ਉਸਤਤ ਬਰਨਨੰ ॥ अथ चंडी चरित्र उसतत बरननं ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥

भरै जोगणी पत्र चउसठ चारं ॥

चली ठाम ठामं डकारं डकारं ॥

भरे नेह गेहं गए कंक बंकं ॥

रुले सूरबीरं अहाड़ं न्रिसंकं ॥१॥२५७॥

चले नारदउ हाथि बीना सुहाए ॥

बने बारदी डंक डउरू बजाए ॥

गिरे बाजि गाजी गजी बीर खेतं ॥

रुले तछ मुछं नचे भूत प्रेतं ॥२॥२५८॥

नचे बीर बैताल अधं कमधं ॥

बधे बध गोपा गुलित्राण बधं ॥

भए साधु स्मबूह भीतं अभीते ॥

नमो लोक माता भले सत्रु जीते ॥३॥२५९॥

पड़े मूड़ या को धनं धाम बाढे ॥

सुनै सूम सोफी लरै जुध गाढै ॥

जगै रैणि जोगी जपै जाप या को ॥

धरै परम जोगं लहै सिधता को ॥४॥२६०॥

पड़ै याहि बिद्यारथी बिद्या हेतं ॥

लहै सरब सासत्रान को मद चेतं ॥

जपै जोग संन्यास बैराग कोई ॥

तिसै सरब पुंन्यान को पुंनि होई ॥५॥२६१॥

दोहरा ॥

जे जे तुमरे धिआन को; नित उठि धिऐहै संत ॥

अंत लहैगे मुकति फलु; पावहिगे भगवंत ॥६॥२६२॥

इति स्री बचित्र नाटके चंडी चरित्रे चंडी चरित्र उसतति बरननं नाम असटमो धिआय स्मपूरनम सतु सुभम सतु ॥८॥