सामग्री पर जाएँ

दसम ग्रन्थ/चौबीस अवतार

विकिपुस्तक से
चौबीस अवतार ॥

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

स्री भगउती जी सहाइ ॥

अथ चउबीस अउतार कथनं ॥

पातिसाही १० ॥

त्वप्रसादि ॥ चौपई ॥

अब चउबीस उचरौ अवतारा ॥

जिह बिधि तिन का लखा अखारा ॥

सुनीअहु संत ! सबै चित लाई ॥

बरनत स्याम जथामति भाई ॥१॥

जब जब होति अरिसटि अपारा ॥

तब तब देह धरत अवतारा ॥

काल सबन को पेखि तमासा ॥

अंतहकाल करत है नासा ॥२॥

काल सभन का करत पसारा ॥

अंत कालि सोई खापनिहारा ॥

आपन रूप अनंतन धरही ॥

आपहि मधि लीन पुनि करही ॥३॥

इन महि स्रिसटि सु दस अवतारा ॥

जिन महि रमिआ रामु हमारा ॥

अनत चतुरदस गनि अवतारु ॥

कहो जु तिन तिन कीए अखारु ॥४॥

काल आपनो नाम छपाई ॥

अवरन के सिरि दे बुरिआई ॥

आपन रहत निरालम जग ते ॥

जान लए जा नामै तब ते ॥५॥

आप रचे आपे कल घाए ॥

अवरन के दे मूंडि हताए ॥

आप निरालम रहा न पाया ॥

ता ते नाम बिअंत कहाया ॥६॥

जो चउबीस अवतार कहाए ॥

तिन भी तुम प्रभ ! तनिक न पाए ॥

सभ ही जग भरमे भवरायं ॥

ता ते नाम बिअंत कहायं ॥७॥

सभ ही छलत, न आप छलाया ॥

ता ते, छलीआ आप कहाया ॥

संतन दुखी निरखि अकुलावै ॥

दीन बंधु ता ते कहलावै ॥८॥

अंति करत सभ जग को काला ॥

नामु काल ता ते जग डाला ॥

समै संत पर होत सहाई ॥

ता ते संख्या संत सुनाई ॥९॥

निरखि दीन पर होत दिआरा ॥

दीन बंधु हम तबै बिचारा ॥

संतन पर करुणा रसु ढरई ॥

करुणानिधि जग तबै उचरई ॥१०॥

संकट हरत साधवन सदा ॥

संकट हरन नामु भयो तदा ॥

दुख दाहत संतन के आयो ॥

दुखदाहन प्रभ तदिन कहायो ॥११॥

रहा अनंत अंत नही पायो ॥

या ते नामु बिअंत कहायो ॥

जग मो रूप सभन कै धरता ॥

या ते नामु बखनीयत करता ॥१२॥

किनहूं कहूं न ताहि लखायो ॥

इह करि नाम अलख कहायो ॥

जोनि जगत मै कबहूं न आया ॥

या ते सभो अजोन बताया ॥१३॥

ब्रहमादिक सब ही पचि हारे ॥

बिसन महेसवर कउन बिचारे? ॥

चंद सूर जिनि करे बिचारा ॥

ता ते जनीयत है करतारा ॥१४॥

सदा अभेख अभेखी रहई ॥

ता ते जगत अभेखी कहई ॥

अलख रूप किनहूं नहि जाना ॥

तिह कर जात अलेख बखाना ॥१५॥

रूप अनूप सरूप अपारा ॥

भेख अभेख सभन ते निआरा ॥

दाइक सभो अजाची सभ ते ॥

जान लयो करता हम तब ते ॥१६॥

लगन सगन ते रहत निरालम ॥

है यह कथा जगत मै मालम ॥

जंत्र मंत्र तंत्र न रिझाया ॥

भेख करत किनहूं नहि पाया ॥१७॥

जग आपन आपन उरझाना ॥

पारब्रहम काहूं न पछाना ॥

इक मड़ीअन कबरन वे जाही ॥

दुहूंअन मै परमेसर नाही ॥१८॥

ए दोऊ मोह बाद मो पचे ॥

तिन ते नाथ निराले बचे ॥

जा ते छूटि गयो भ्रम उर का ॥

तिह आगै हिंदू किआ तुरका ॥१९॥

इक तसबी इक माला धरही ॥

एक कुरान पुरान उचरही ॥

करत बिरुध गए मरि मूड़ा ॥

प्रभ को रंगु न लागा गूड़ा ॥२०॥

जो जो रंग एक के राचे ॥

ते ते लोक लाज तजि नाचे ॥

आदि पुरख जिनि एकु पछाना ॥

दुतीआ भाव न मन महि आना ॥२१॥

जो जो भाव दुतिय महि राचे ॥

ते ते मीत मिलन ते बाचे ॥

एक पुरख जिनि नैकु पछाना ॥

तिन ही परम तत कह जाना ॥२२॥

जोगी संनिआसी है जेते ॥

मुंडीआ मुसलमान गन केते ॥

भेख धरे लूटत संसारा ॥

छपत साधु जिह नामु आधारा ॥२३॥

पेट हेतु नर डि्मभु दिखाही ॥

डि्मभ करे बिनु पईयत नाही ॥

जिन नर एक पुरख कह धिआयो ॥

तिन करि डि्मभ न किसी दिखायो ॥२४॥

डि्मभ करे बिनु हाथि न आवै ॥

कोऊ न काहूं सीस निवावै ॥

जो इहु पेट न काहूं होता ॥

राव रंक काहूं को कहता ॥२५॥

जिन प्रभु एक वहै ठहरायो ॥

तिन कर डि्मभ न किसू दिखायो ॥

सीस दीयो उन सिरर न दीना ॥

रंच समान देह करि चीना ॥२६॥

कान छेद जोगी कहवायो ॥

अति प्रपंच कर बनहि सिधायो ॥

एक नामु को ततु न लयो ॥

बन को भयो न ग्रिह को भयो ॥२७॥

कहा लगै, कबि कथै बिचारा ॥

रसना एक न पइयत पारा ॥

जिहबा कोटि कोटि कोऊ धरै ॥

गुण समुंद्र त्व पार न परै ॥२८॥

प्रथम काल सभ जग को ताता ॥

ता ते भयो तेज बिख्याता ॥

सोई भवानी नामु कहाई ॥

जिनि सिगरी यह स्रिसटि उपाई ॥२९॥

प्रिथमे ओअंकार तिनि कहा ॥

सो धुनि पूर जगत मो रहा ॥

ता ते जगत भयो बिसथारा ॥

पुरखु प्रक्रिति जब दुहू बिचारा ॥३०॥

जगत भयो ता ते सभ जनीयत ॥

चार खानि करि प्रगट बखनीयत ॥

सकति इती नही बरन सुनाऊ ॥

भिंन भिंन करि नाम बताउ ॥३१॥

बली अबली दोऊ उपजाए ॥

ऊच नीच करि भिंन दिखाए ॥

बपु धरि काल बली बलवाना ॥

आपहि रूप धरत भयो नाना ॥३२॥

भिंन भिंन जिमु देह धराए ॥

तिमु तिमु कर अवतार कहाए ॥

परम रूप जो एक कहायो ॥

अंति सभो तिह मधि मिलायो ॥३३॥

जितिक जगति कै जीव बखानो ॥

एक जोति सभ ही महि जानो ॥

काल रूप भगवान भनैबो ॥

ता महि लीन जगति सभ ह्वैबो ॥३४॥

जो किछु दिसटि अगोचर आवत ॥

ता कहु मन माया ठहरावत ॥

एकहि आप सभन मो बिआपा ॥

सभ कोई भिंन भिंन कर थापा ॥३५॥

सभ ही महि रम रहियो अलेखा ॥

मागत भिंन भिंन ते लेखा ॥

जिन नर एक वहै ठहरायो ॥

तिन ही परम ततु कहु पायो ॥३६॥

एकह रूप अनूप सरूपा ॥

रंक भयो राव कहूं भूपा ॥

भिंन भिंन सभहन उरझायो ॥

सभ ते जुदो, न किनहुं पायो ॥३७॥

भिंन भिंन सभहूं उपजायो ॥

भिंन भिंन करि तिनो खपायो ॥

आप किसू को दोस न लीना ॥

अउरन सिर बुरिआई दीना ॥३८॥


ਅਥ ਪ੍ਰਥਮ ਮਛ ਅਵਤਾਰ ਕਥਨੰ ॥ अथ प्रथम मछ अवतार कथनं ॥ चौपई ॥

संखासुर दानव पुनि भयो ॥

बहु बिधि कै जग को दुख दयो ॥

मछ अवतार आपि पुनि धरा ॥

आपन जापु आप मो करा ॥३९॥

प्रिथमै तुछ मीन बपु धरा ॥

पैठि समुंद्र झकझोरन करा ॥

पुनि पुनि करत भयो बिसथारा ॥

संखासुरि तब कोप बिचारा ॥४०॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

तबै कोप गरजियो बली संख बीरं ॥

धरे ससत्र असत्रं सजे लोह चीरं ॥

चतुर बेद पातं कीयो सिंधु मधं ॥

त्रस्यो असट नैणं करियो जापु सुधं ॥४१॥

तबै स्मभरे दीन हेतं दिआलं ॥

धरे लोह क्रोहं क्रिपा कै क्रिपालं ॥

महा असत्र पातं करे ससत्र घातं ॥

टरे देव सरबं गिरे लोक सातं ॥४२॥

भए अत्र घातं गिरे चउर चीरं ॥

रुले तछ मुछं उठे तिछ तीरं ॥

गिरे सुंड मुंडं रणं भीम रूपं ॥

मनो खेल पउढे हठी फागु जूपं ॥४३॥

बहे खगयं खेत खिंगं सु धीरं ॥

सुभै ससत्र संजान सो सूरबीरं ॥

गिरे गउरि गाजी खुले हथ बथं ॥

नचियो रुद्र रुद्रं नचे मछ मथं ॥४४॥

रसावल छंद ॥

महा बीर गजे ॥

सुभं ससत्र सजे ॥

बधे गज गाहं ॥

सु हूरं उछाहं ॥४५॥

ढला ढुक ढालं ॥

झमी तेग कालं ॥

कटा काट बाहै ॥

उभै जीत चाहै ॥४६॥

मुखं मुछ बंकी ॥

तमं तेग अतंकी ॥

फिरै गउर गाजी ॥

नचै तुंद ताजी ॥४७॥

भुजंग छंद ॥

भरियो रोस संखासुरं देख सैणं ॥

तपे बीर बकत्रं कीए रकत नैणं ॥

भुजा ठोक भूपं करियो नाद उचं ॥

सुणे गरभणीआन के गरभ मुचं ॥४८॥

लगे ठाम ठामं दमामं दमंके ॥

खुले खेत मो खग खूनी खिमंके ॥

भए क्रूर भांतं कमाणं कड़के ॥

नचे बीर बैताल भूतं भुड़के ॥४९॥

गिरियो आयुधं सायुधं बीर खेतं ॥

नचे कंधहीणं कमधं अचेतं ॥

खुले खग खूनी खिआलं खतंगं ॥

भजे कातरं सूर बजे निहंगं ॥५०॥

कटे चरम बरमं गिरियो सत्र ससत्रं ॥

भकै भै भरे भूत भूमं न्रिसत्रं ॥

रणं रंग रते सभी रंग भूमं ॥

गिरे जुध मधं बली झूमि झूमं ॥५१॥

भयो दुंद जुधं रणं संख मछं ॥

मनो दो गिरं जुध जुटे सपछं ॥

कटे मास टुकं भखे गिधि ब्रिधं ॥

हसै जोगणी चउसठा सूर सुधं ॥५२॥

कीयो उधार बेदं हते संखबीरं ॥

तज्यो मछ रूपं सज्यो सुंद्र चीर ॥

सबै देव थापे कीयो दुसट नासं ॥

टरे सरब दानो भरे जीव त्रासं ॥५३॥

त्रिभंगी छंद ॥

संखासुर मारे, बेद उधारे; सत्र संघारे जसु लीनो ॥

देवे सु बुलायो, राज बिठायो; छत्र फिरायो सुख दीनो ॥

कोटं बजे बाजे, अमरेसुर गाजे; सुभ घरि साजे सोक हरे ॥

दै कोटक दछना, क्रोर प्रदछना; आनि सु मछ के पाइ परे ॥५४॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे मछ प्रथम अवतार संखासुर बधह समापतम सतु सुभम सतु ॥१॥