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दसम ग्रन्थ/बचित्र नाटक

विकिपुस्तक से
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

ਅਥ ਬਚਿਤ੍ਰ ਨਾਟਕ ਗ੍ਰੰਥ ਲਿਖ੍ਯਤੇ ॥ अथ बचित्र नाटक ग्रंथ लिख्यते ॥

ਸ੍ਰੀ ਮੁਖਵਾਕ ਪਾਤਸਾਹੀ ੧੦ ॥ स्री मुखवाक पातसाही १० ॥

त्वप्रसादि ॥ दोहरा ॥

नमसकार स्री खड़ग को; करौ सु हितु चितु लाइ ॥

पूरन करौ गिरंथ इहु; तुम मुहि करहु सहाइ ॥१॥

स्री काल जी की उसतति ॥

त्रिभंगी छंद ॥

खग खंड बिहंडं, खलदल खंडं; अति रण मंडं बरबंडं ॥

भुज दंड अखंडं, तेज प्रचंडं; जोति अमंडं भानु प्रभं ॥

सुख संता करणं, दुरमति दरणं; किलबिख हरणं असि सरणं ॥

जै जै जग कारण, स्रिसटि उबारण; मम प्रतिपारण जै तेगं ॥२॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

सदा एक जोत्यं अजूनी सरूपं ॥

महादेव देवं महा भूप भूपं ॥

निरंकार नित्यं निरूपं न्रिबाणं ॥

कलं कारणेयं नमो खड़गपाणं ॥३॥

निरंकार न्रिबिकार नित्यं निरालं ॥

न ब्रिधं बिसेखं न तरुनं न बालं ॥

न रंकं न रायं न रूपं न रेखं ॥

न रंगं न रागं अपारं अभेखं ॥४॥

न रूपं न रेखं न रंगं न रागं ॥

न नामं न ठामं महा जोति जागं ॥

न द्वैखं न भेखं निरंकार नित्यं ॥

महा जोग जोगं सु परमं पवित्यं ॥५॥

अजेयं अभेयं अनामं अठामं ॥

महा जोग जोगं महा काम कामं ॥

अलेखं अभेखं अनीलं अनादं ॥

परेयं पवित्रं सदा न्रिबिखादं ॥६॥

सुआदं अनादं अनीलं अनंतं ॥

अद्वैखं अभेखं महेसं महंतं ॥

न रोखं न सोखं न द्रोहं न मोहं ॥

न कामं न क्रोधं अजोनी अजोहं ॥७॥

परेयं पवित्रं पुनीतं पुराणं ॥

अजेयं अभेयं भविख्यं भवाणं ॥

न रोगं न सोगं सु नित्यं नवीनं ॥

अजायं सहायं परमं प्रबीनं ॥८॥

सु भूतं भविख्यं भवानं भवेयं ॥

नमो न्रिबकारं नमो न्रिजुरेयं ॥

नमो देव देवं नमो राज राजं ॥

निराल्मब नित्यं सु राजाधिराजं ॥९॥

अलेखं अभेखं अभूतं अद्वैखं ॥

न रागं न रंगं न रूपं न रेखं ॥

महा देव देवं महा जोग जोगं ॥

महा काम कामं महा भोग भोगं ॥१०॥

कहूं राजसं तामसं सातकेयं ॥

कहूं नारि को रूप धारे नरेयं ॥

कहूं देवीयं देवतं दईत रूपं ॥

कहूं रूपं अनेक धारे अनूपं ॥११॥

कहूं फूल ह्वै कै भले राज फूले ॥

कहूं भवर ह्वै कै भली भांति भूले ॥

कहूं पवन ह्वै कै बहे बेगि ऐसे ॥

कहे मो न आवे कथौ ताहि कैसे? ॥१२॥

कहूं नाद ह्वै कै भली भांति बाजे ॥

कहूं पारधी ह्वै धरे बान राजे ॥

कहूं म्रिग ह्वै कै भली भांति मोहे ॥

कहूं कामकी जिउ धरे रूप सोहे ॥१३॥

नही जानि जाई कछू रूप रेखं ॥

कहा बास ता को? फिरै कउन भेखं? ॥

कहा नाम ता को? कहा कै कहावै? ॥

कहा मै बखानो? कहे मो न आवै ॥१४॥

न ता को कोई तात मातं न भायं ॥

न पुत्रं न पौत्रं न दाया न दायं ॥

न नेहं न गेहं न सैनं न साथं ॥

महा राज राजं महा नाथ नाथं ॥१५॥

परमं पुरानं पवित्रं परेयं ॥

अनादं अनीलं अस्मभं अजेयं ॥

अभेदं अछेदं पवित्रं प्रमाथं ॥

महा दीन दीनं महा नाथ नाथं ॥१६॥

अदागं अदगं अलेखं अभेखं ॥

अनंतं अनीलं अरूपं अद्वैखं ॥

महा तेज तेजं महा ज्वाल ज्वालं ॥

महा मंत्र मंत्रं महा काल कालं ॥१७॥

करं बाम चापियं क्रिपाणं करालं ॥

महा तेज तेजं बिराजै बिसालं ॥

महा दाड़ दाड़ं सु सोहं अपारं ॥

जिनै चरबीयं जीव जग्यं हजारं ॥१८॥

डमा डंड डउरू सितासेत छत्रं ॥

हाहा हूह हासं झमा झम अत्रं ॥

महा घोर सबदं बजे संख ऐसं ॥

प्रलै काल के काल की ज्वाल जैसं ॥१९॥

रसावल छंद ॥

घणं घंट बाजं ॥

धुणं मेघ लाजं ॥

भयो सद एवं ॥

हड़ियो नीर धेवं ॥२०॥

घुरं घुंघरेयं ॥

धुणं नेवरेयं ॥

महा नाद नादं ॥

सुरं निर बिखादं ॥२१॥

सिरं माल राजं ॥

लखे रुद्र लाजं ॥

सुभे चार चित्रं ॥

परमं पवित्रं ॥२२॥

महा गरज गरजं ॥

सुणे दूत लरजं ॥

स्रवं स्रोण सोहं ॥

महा मान मोहं ॥२३॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

स्रिजे सेतजं जेरजं उतभुजेवं ॥

रचे अंडजं खंड ब्रहमंड एवं ॥

दिसा बिदिसायं जिमी आसमाणं ॥

चतुर बेद कथ्यं कुराणं पुराणं ॥२४॥

रचे रैण दिवसं थपे सूर चंद्रं ॥

ठटे दईव दानो रचे बीर बिंद्रं ॥

करी लोह कलमं लिख्यो लेख माथं ॥

सबै जेर कीने बली काल हाथं ॥२५॥

कई मेटि डारे उसारे बनाए ॥

उपारे गड़े फेरि मेटे उपाए ॥

क्रिआ काल जू की किनू न पछानी ॥

घनियो पै बिहै है घनियो पै बिहानी ॥२६॥

किते क्रिसन से कीट कोटै बनाए ॥

किते राम से मेटि डारे उपाए ॥

महादीन केते प्रिथी माझि हूए ॥

समै आपनी आपनी अंति मूए ॥२७॥

जिते अउलीआ अ्मबीआ होइ बीते ॥

तित्यो काल जीता, न ते काल जीते ॥

जिते राम से क्रिसन हुइ बिसनु आए ॥

तित्यो काल खापिओ, न ते काल घाए ॥२८॥

जिते इंद्र से चंद्र से होत आए ॥

तित्यो काल खापा, न ते कालि घाए ॥

जिते अउलीआ अ्मबीआ गउस ह्वै हैं ॥

सभै काल के अंत दाड़ा तलै है ॥२९॥

जिते मानधातादि राजा सुहाए ॥

सभै बाधि कै काल जेलै चलाए ॥

जिनै नाम ता को उचारो उबारे ॥

बिना साम ता की लखे कोटि मारे ॥३०॥

त्वप्रसादि ॥ रसावल छंद ॥

चमकहि क्रिपाणं ॥

अभूतं भयाणं ॥

धुणं नेवराणं ॥

घुरं घुंघ्रयाणं ॥३१॥

चतुर बाह चारं ॥

निजूटं सुधारं ॥

गदा पास सोहं ॥

जमं मान मोहं ॥३२॥

सुभं जीभ जुआलं ॥

सु दाड़ा करालं ॥

बजी ब्मब संखं ॥

उठे नादं बंखं ॥३३॥

सुभं रूप सिआमं ॥

महा सोभ धामं ॥

छबे चारु चिंत्रं ॥

परेअं पवित्रं ॥३४॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

सिरं सेत छत्रं सु सुभ्रं बिराजं ॥

लखे छैल छाइआ करे तेज लाजं ॥

बिसाल लाल नैनं महाराज सोहं ॥

ढिगं अंसुमालं हसं कोटि क्रोहं ॥३५॥

कहूं रूप धारे महाराज सोहं ॥

कहूं देव कंनिआनि के मान मोहं ॥

कहूं बीर ह्वै के धरे बान पानं ॥

कहूं भूप ह्वै कै बजाए निसानं ॥३६॥

रसावल छंद ॥

धनुर बान धारे ॥

छके छैल भारे ॥

लए खग ऐसे ॥

महाबीर जैसे ॥३७॥

जुरे जंग जोरं ॥

करे जुध घोरं ॥

क्रिपानिधि दिआलं ॥

सदायं क्रिपालं ॥३८॥

सदा एक रूपं ॥

सभै लोक भूपं ॥

अजेअं अजायं ॥

सरनियं सहायं ॥३९॥

तपै खग पानं ॥

महा लोक दानं ॥

भविखिअं भवेअं ॥

नमो निरजुरेअं ॥४०॥

मधो मान मुंडं ॥

सुभं रुंड झुंडं ॥

सिरं सेत छत्रं ॥

लसं हाथ अत्रं ॥४१॥

सुणे नाद भारी ॥

त्रसै छत्रधारी ॥

दिसा बसत्र राजं ॥

सुणे दोख भाजं ॥४२॥

सुणे गद सदं ॥

अनंतं बेहदं ॥

घटा जाणु सिआमं ॥

दुतं अभिरामं ॥४३॥

चतुर बाह चारं ॥

करीटं सुधारं ॥

गदा संख चक्रं ॥

दिपै क्रूर बक्रं ॥४४॥

नराज छंद ॥

अनूप रूप राजिअं ॥

निहार काम लाजियं ॥

अलोक लोक सोभिअं ॥

बिलोक लोक लोभिअं ॥४५॥

चमकि चंद्र सीसियं ॥

रहियो लजाइ ईसयं ॥

सु सोभ नाग भूखंणं ॥

अनेक दुसट दूखणं ॥४६॥

क्रिपाण पाण धारीयं ॥

करोर पाप टारीयं ॥

गदा ग्रिसट पाणियं ॥

कमाण बाण ताणियं ॥४७॥

सबद संख बजियं ॥

घणंकि घुमर गजियं ॥

सरनि नाथ तोरीयं ॥

उबार लाज मोरीयं ॥४८॥

अनेक रूप सोहीयं ॥

बिसेख देव मोहीयं ॥

अदेव देव देवलं ॥

क्रिपा निधान केवलं ॥४९॥

सु आदि अंति एकियं ॥

धरे सरूप अनेकियं ॥

क्रिपाण पाण राजई ॥

बिलोक पाप भाजई ॥५०॥

अलंक्रित सु देहयं ॥

तनो मनो कि मोहियं ॥

कमाण बाण धारही ॥

अनेक सत्र टारही ॥५१॥

घमकि घुंघरं सुरं ॥

नवं ननाद नूपरं ॥

प्रजुआल बिजुलं जुलं ॥

पवित्र परम निरमलं ॥५२॥

त्वप्रसादि ॥ तोटक छंद ॥

नव नेवर नाद सुरं न्रिमलं ॥

मुख बिजुल जुआल घणं प्रजुलं ॥

मदरा कर मत महा भभकं ॥

बन मै मनो बाघ बचा बबकं ॥५३॥

भव भूत भविख भवान भवं ॥

कल कारण उबारण एक तुवं ॥

सभ ठौर निरंतर नित नयं ॥

म्रिद मंगल रूप तुयं सुभयं ॥५४॥

द्रिड़ दाड़ कराल द्वै सेत उधं ॥

जिह भाजत दुसट बिलोक जुधं ॥

मद मत क्रिपाण कराल धरं ॥

जय सद सुरासुरयं उचरं ॥५५॥

नव किंकण नेवर नाद हूंअं ॥

चल चाल सभा चल क्मप भूअं ॥

घण घुंघर घंटण घोर सुरं ॥

चर चार चराचरयं हुहरं ॥५६॥

चल चौदहूं चक्रन चक्र फिरं ॥

बढवं घटवं हरीअं सुभरं ॥

जग जीव जिते जलयं थलयं ॥

अस को जु तवाइसिअं मलयं ॥५७॥

घट भादव मास की जाण सुभं ॥

तन सावरे रावरेअं हुलसं ॥

रद पंगति दामिनीअं दमंकं ॥

घट घुंघर घंट सुरं घमकं ॥५८॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

घटा सावणं जाण स्यामं सुहायं ॥

मणी नील नगियं लख सीस निआयं ॥

महा सुंदर स्यामं महा अभिरामं ॥

महा रूप रूपं महा काम कामं ॥५९॥

फिरै चक्र चउदह पुरीयं मधिआणं ॥

इसो कौन बीयं फिरै आइसाणं ॥

कहो कुंट कौने बिखै भाज बाचे ॥

सभं सीस के संग स्री काल नाचै ॥६०॥

करे कोट कोऊ धरै कोटि ओटं ॥

बचैगो न किउहूं करै काल चोटं ॥

लिख जंत्र केते पड़ं मंत्र कोटं ॥

बिना सरनि ता की नही और ओटं ॥६१॥

लिखं जंत्र थाके पड़ं मंत्र हारै ॥

करे काल के अंत लै के बिचारे ॥

कितिओ तंत्र साधे जु जनम बिताइओ ॥

भए फोकटं काज एकै न आइओ ॥६२॥

किते नास मूंदे भए ब्रहमचारी ॥

किते कंठ कंठी जटा सीस धारी ॥

किते चीर कानं जुगीसं कहायं ॥

सभे फोकटं धरम कामं न आयं ॥६३॥

मधु कीटभं राछसेसं बलीअं ॥

समे आपनी काल तेऊ दलीअं ॥

भए सु्मभ नैसु्मभ स्रोणंतबीजं ॥

तेऊ काल कीने पुरेजे पुरेजं ॥६४॥

बली प्रिथीअं मानधाता महीपं ॥

जिनै रथ चक्रं कीए सात दीपं ॥

भुजं भीम भरथं जगं जीत डंडियं ॥

तिनै अंत के अंत कौ काल खंडियं ॥६५॥

जिनै दीप दीपं दुहाई फिराई ॥

भुजा दंड दै छोणि छत्रं छिनाई ॥

करे जग कोटं जसं अनिक लीते ॥

वहै बीर बंके बली काल जीते ॥६६॥

कई कोट लीने जिनै दुरग ढाहे ॥

किते सूरबीरान के सैन गाहे ॥

कई जंग कीने सु साके पवारे ॥

वहै दीन देखै गिरे काल मारे ॥६७॥

जिनै पातिसाही करी कोटि जुगियं ॥

रसं आनरसं भली भांति भुगियं ॥

वहै अंत को, पाव नागे पधारे ॥

गिरे दीन देखे हठी काल मारे ॥६८॥

जिनै खंडीअं, दंड धारं अपारं ॥

करे चंद्रमा सूर चेरे दुआरं ॥

जिनै इंद्र से जीत के छोडि डारे ॥

वहै दीन देखे गिरे काल मारे ॥६९॥

रसावल छंद ॥

जिते राम हुए ॥

सभै अंति मूए ॥

जिते क्रिसन ह्वै है ॥

सभै अंति जै है ॥७०॥

जिते देव होसी ॥

सभै अंत जासी ॥

जिते बोध ह्वै है ॥

सभै अंति छै है ॥७१॥

जिते देव रायं ॥

सभै अंत जायं ॥

जिते दईत एसं ॥

तित्यो काल लेसं ॥७२॥

नरसिंघावतारं ॥

वहे काल मारं ॥

बडो डंडधारी ॥

हणिओ काल भारी ॥७३॥

दिजं बावनेयं ॥

हणियो काल तेयं ॥

महा मछ मुंडं ॥

फधिओ काल झुंडं ॥७४॥

जिते होइ बीते ॥

तिते काल जीते ॥

जिते सरनि जै है ॥

तितिओ राखि लै है ॥७५॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

बिना सरनि ताकी न अउरै उपायं ॥

कहा देव दईतं कहा रंक रायं ॥

कहा पातिसाहं कहा उमरायं ॥

बिना सरनि ता की न कोटै उपायं ॥७६॥

जिते जीव जंतं, सु दुनीअं उपायं ॥

सभै अंतिकालं बली कालि घायं ॥

बिना सरनि ता की नही और ओटं ॥

लिखे जंत्र केते पड़े मंत्र कोटं ॥७७॥

नराज छंद ॥

जितेकि राज रंकयं ॥

हने सु काल बंकयं ॥

जितेकि लोक पालयं ॥

निदान काल दालयं ॥७८॥

क्रिपाल पाणि जे जपै ॥

अनंत थाट ते थापै ॥

जितेकि काल धिआइ है ॥

जगति जीत जाइ है ॥७९॥

बचित्र चार चित्रयं ॥

परमयं पवित्रयं ॥

अलोक रूप राजियं ॥

सुणे सु पाप भाजियं ॥८०॥

बिसाल लाल लोचनं ॥

बिअंत पाप मोचनं ॥

चमक चंद्र चारयं ॥

अघी अनेक तारयं ॥८१॥

रसावल छंद ॥

जिते लोक पालं ॥

तिते जेर कालं ॥

जिते सूर चंद्रं ॥

कहा इंद्र बिंद्रं ॥८२॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

फिरै चौदहूं लोकयं काल चक्रं ॥

सभै नाथ नाथे भ्रमं भउह बकं ॥

कहा राम क्रिसनं कहा चंद सूरं ॥

सभै हाथ बाधे खरे काल हजूरं ॥८३॥

स्वैया ॥

काल ही पाइ भयो भगवान सु; जागत या जग, जा की कला है ॥

काल ही पाइ भयो ब्रहमा सिव; काल ही पाइ भयो जुगीआ है ॥

काल ही पाइ सुरासुर गंध्रब; जछ भुजंग दिसा बिदिसा है ॥

अउर सुकाल सभै बसि काल के; एक ही काल अकाल सदा है ॥८४॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

नमो देव देवं नमो खड़ग धारं ॥

सदा एक रूप सदा निरबिकारं ॥

नमो राजसं सातकं तामसेअं ॥

नमो निरबिकारं नमो निरजुरेअं ॥८५॥

रसावल छंद ॥

नमो बाण पाणं ॥

नमो निरभयाणं ॥

नमो देव देवं ॥

भवाणं भवेअं ॥८६॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

नमो खग खंडं क्रिपाण कटारं ॥

सदा एक रूपं सदा निरबिकारं ॥

नमो बाण पाणं नमो दंड धारियं ॥

जिनै चौदहूं लोक जोतं बिथारियं ॥८७॥

नमसकारयं मोर तीरं तुफंगं ॥

नमो खग अदगं अभैअं अभंगं ॥

गदायं ग्रिसटं नमो सैहथीअं ॥

जिनै तुलीयं बीर बीयो न बीअं ॥८८॥

रसावल छंद ॥

नमो चक्र पाणं ॥

अभूतं भयाणं ॥

नमो उग्रदाड़ं ॥

महा ग्रिसट गाड़ं ॥८९॥

नमो तीर तोपं ॥

जिनै सत्र घोपं ॥

नमो धोप पटं ॥

जिने दुसट दटं ॥९०॥

जिते ससत्र नामं ॥

नमसकार तामं ॥

जिते असत्र भैयं ॥

नमसकार तेयं ॥९१॥

स्वैया ॥

मेरु करो त्रिण ते मुहि जाहि; गरीब निवाज, न दूसर तो सो ॥

भूल छिमो हमरी प्रभ ! आपन; भूलनहार कहूं कोऊ मो सो? ॥

सेव करी तुमरी, तिन के; सभ ही ग्रिह देखीअत, द्रब भरो सो ॥

या कल मै सभ काल क्रिपान के; भारी भुजान को भारी भरोसो ॥९२॥

सु्मभ निसु्मभ से कोट निसाचर; जाहि छिनेक बिखै, हनि डारे ॥

धूमर लोचन चंड अउ मुंड से; माहिख से, पल बीच निवारे ॥

चामर से रणि चिछर से; रकतिछण से, झट दै झझकारे ॥

ऐसो सु साहिबु पाइ कहा; परवाह रही? इह दास तिहारे ॥९३॥

मुंडहु से मधु कीटभ से; मुर से अघ से जिनि कोटि दले है ॥

ओटि करी कबहूं न जिनै; रणि चोट परी पग द्वै न टले है ॥

सिंधु बिखै जे न बूडे निसाचर; पावक बाण बहे न जले है ॥

ते असि तोरि बिलोकि अलोक; सु लाज को छाड कै भाजि चले है ॥९४॥

रावण से महिरावण से; घटकानहु से, पल बीच पछारे ॥

बारद नाद अक्मपन से; जग जंग जुरै जिन सिउ, जम हारे ॥

कु्मभ अकु्मभ से जीत सभै जगि; सातहूं सिंध हथिआर पखारे ॥

जे जे हुते अकटे बिकटे; सु कटे करि काल क्रिपान के मारे ॥९५॥

जो कहूं काल ते भाज के बाचीअत; तो किह कुंट कहो भजि जईयै? ॥

आगे हूं काल धरे असि गाजत; छाजत है जिह ते नसि अईयै ॥

ऐसे न कै गयो कोई सु दाव रे; जाहि उपाव सो घाव बचईऐ ॥

जा ते न छुटीऐ मुड़ ! कहूं; हसि ता की न किउ सरणागति जईयै? ॥९६॥

क्रिसन अउ बिसनु जपे तुहि कोटिक; राम रहीम भली बिधि धिआयो ॥

ब्रहम जपिओ अरु स्मभु थपिओ; तहि ते तुहि को किनहूं न बचायो ॥

कोटि करी तपसा दिन कोटिक; काहू न कौडी को काम कढायो ॥

काम का मंत्र कसीरे के काम न; काल को घाउ किनहूं न बचायो ॥९७॥

काहे को कूर करे तपसा; इन की? कोऊ कौडी के काम न ऐहै ॥

तोहि बचाइ सकै कहु कैसे कै? आपन घाव बचाइ न ऐहै ॥

कोप कराल की पावक कुंड मै; आपि टंगिओ तिम तोहि टंगै है ॥

चेत रे ! चेत अजो जीअ मै; जड़ ! काल क्रिपा बिनु काम न ऐहै ॥९८॥

ताहि पछानत है न महा पसु ! जा को प्रतापु तिहूं पुर माही ॥

पूजत है परमेसर कै; जिह कै परसै परलोक पराही ॥

पाप करो परमारथ कै; जिह पापन ते अति पाप लजाई ॥

पाइ परो परमेसर के जड़ ! पाहन मै परमेसर नाही ॥९९॥

मोन भजे नही मान तजे; नही भेख सजे, नही मूंड मुंडाए ॥

कंठि न कंठी कठोर धरै; नही सीस जटान के जूट सुहाए ॥

साचु कहो, सुनि लै चितु दै; बिनु दीन दिआल की साम सिधाए ॥

प्रीति करे प्रभु पायत है; किरपाल न भीजत लांड कटाए ॥१००॥

कागद दीप सभै करि कै; अर सात समुंद्रन की मसु कैहो ॥

काटि बनासपती सिगरी; लिखबे हूं के लेखन काजि बनैहो ॥

सारसुती बकता करि कै; जुग कोटि गनेस कै हाथि लिखैहो ॥

काल क्रिपान बिना बिनती; न तऊ तुम को प्रभ ! नैकु रिझैहो ॥१०१॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे स्री काल जी की उसतति प्रिथम धिआइ स्मपूरनं सतु सुभम सतु ॥१॥१०१॥

कवि बंस वरणन ॥

चौपई ॥

तुमरी महिमा अपर अपारा ॥

जा का लहिओ न किनहूं पारा ॥

देव देव राजन के राजा ॥

दीन दिआल गरीब निवाजा ॥१॥

दोहरा ॥

मूक ऊचरै सासत्र खटि; पिंग गिरन चड़ि जाइ ॥

अंध लखै, बधरो सुनै, जो काल क्रिपा कराइ ॥२॥

चौपई ॥

कहा बुधि प्रभ ! तुछ हमारी ॥

बरनि सकै, महिमा जु तिहारी ॥

हम न सकत करि, सिफत तुमारी ॥

आप लेहु तुम, कथा सुधारी ॥३॥

कहा लगै? इहु कीट बखानै ॥

महिमा तोरि तुही प्रभ ! जानै ॥

पिता जनम, जिम पूत न पावै ॥

कहा तवन का भेद बतावै? ॥४॥

तुमरी प्रभा, तुमै बनि आई ॥

अउरन ते, नही जात बताई ॥

तुमरी क्रिआ तुम ही प्रभ ! जानो ॥

ऊच नीच, कस सकत बखानो? ॥५॥

सेस नाग, सिर सहस बनाई ॥

द्वै सहंस रसनाह सुहाई ॥

रटत अब लगे, नाम अपारा ॥

तुमरो, तऊ न पावत पारा ॥६॥

तुमरी क्रिआ, कहा कोऊ कहै? ॥

समझत बात, उरझि मति रहै ॥

सूछम रूप, न बरना जाई ॥

बिरधु सरूपहि कहो बनाई ॥७॥

तुमरी प्रेम भगति, जब गहिहो ॥

छोरि कथा सभ ही तब कहि हो ॥

अब मै कहो सु अपनी कथा ॥

सोढी बंस उपजिआ जथा ॥८॥

दोहरा ॥

प्रथम कथा संछेप ते; कहो सु हित चितु लाइ ॥

बहुरि बडो बिसथार कै; कहिहौ सभै सुनाइ ॥९॥

चौपई ॥

प्रिथम, काल जब करा पसारा ॥

ओअंकार ते स्रिसटि उपारा ॥

कालसैन, प्रथमै भइओ भूपा ॥

अधिक अतुल बलि रूप अनूपा ॥१०॥

कालकेतु, दूसर भूअ भइओ ॥

क्रूरबरस, तीसर जगि ठयो ॥

कालधुज, चतुरथ न्रिप सोहै ॥

जिह ते भयो जगत सभ को है ॥११॥

सहसराछ जा को सुभ सोहै ॥

सहस पाद जा के तनि मोहै ॥

सेख नाग पर सोइबो करै ॥

जग तिह सेखसाइ उचरै ॥१२॥

एक स्रवण ते मैल निकारा ॥

ता ते, मधु कीटभ तन धारा ॥

दुतीआ कान ते मैल निकारी ॥

ता ते भई स्रिसटि इह सारी ॥१३॥

तिन को काल बहुरि बध करा ॥

तिन को मेद समुंद मो परा ॥

चिकन तास जल पर तिर रही ॥

मेधा नाम तबहि ते कही ॥१४॥

साध करम जे पुरख कमावै ॥

नाम देवता जगत कहावै ॥

कुक्रित करम जे जग मै करही ॥

नाम असुर तिन को सभ धर ही ॥१५॥

बहु बिसथार कह लगै बखानीअत? ॥

ग्रंथ बढन ते, अति डरु मानीअत ॥

तिन ते होत बहुत न्रिप आए ॥

दछ प्रजापति जिन उपजाए ॥१६॥

दस सहंस, तिहि ग्रिह भई कंनिआ ॥

जिह समान, कह लगै न अंनिआ ॥

काल क्रिआ ऐसी तह भई ॥

ते सभ बिआह नरेसन दई ॥१७॥

दोहरा ॥

बनता कद्र दिति अदिति; ए रिख बरी बनाइ ॥

नाग नागरिपु देव सभ; दईत लए उपजाइ ॥१८॥

चौपई ॥

ता ते सूरज रूप को धरा ॥

जा ते बंस प्रचुर रवि करा ॥

जौ तिन के कहि नाम सुनाऊ ॥

कथा बढन ते अधिक डराऊ ॥१९॥

तिन के बंस बिखै रघु भयो ॥

रघु बंसहि जिह जगहि चलयो ॥

ता ते पुत्र होत भयो अजु बरु ॥

महारथी अरु महा धनुरधर ॥२०॥

जब तिन भेस जोग को लयो ॥

राज पाट दसरथ को दयो ॥

होत भयो वहि महा धुनुरधर ॥

तीन त्रिआन बरा जिह रुचि कर ॥२१॥

प्रिथम जयो तिह रामु कुमारा ॥

भरथ लछमन सत्र बिदारा ॥

बहुत काल तिन राज कमायो ॥

काल पाइ सुर पुरहि सिधायो ॥२२॥

सीअ सुत बहुरि भए दुइ राजा ॥

राज पाट उन ही कउ छाजा ॥

मद्र देस एस्वरजा बरी जब ॥

भांति भांति के जग कीए तब ॥२३॥

तही तिनै बाधे दुइ पुरवा ॥

एक कसूर दुतीय लहुरवा ॥

अधक पुरी ते दोऊ बिराजी ॥

निरखि लंक अमरावति लाजी ॥२४॥

बहुत काल तिन राजु कमायो ॥

जाल काल ते अंति फसायो ॥

तिन के पुत्र पौत्र जे वए ॥

राज करत इह जग को भए ॥२५॥

कहा लगे ते बरन सुनाऊं? ॥

तिन के नाम न संखिआ पाऊं ॥

होत चहूं जुग मै जे आए ॥

तिन के नाम न जात गनाए ॥२६॥

जे अब तव किरपा बल पाऊं ॥

नाम जथामति भाखि सुनाऊं ॥

कालकेत अरु कालराइ भनि ॥

जिन के भए पुत्र घरि अनगन ॥२७॥

कालकेत भयो बली अपारा ॥

कालराइ जिनि नगर निकारा ॥

भाजि सनौढ देसि ते गए ॥

तही भूपजा बिआहत भए ॥२८॥

तिह ते पुत्र भयो जो धामा ॥

सोढी राइ धरा तिहि नामा ॥

बंस सनौढ तदिन ते थीआ ॥

परम पवित्र पुरख जू कीआ ॥२९॥

ता ते पुत्र पौत्र हुइ आइ ॥

ते सोढी सभ जगति कहाए ॥

जग मै अधिक सु भए प्रसिधा ॥

दिन दिन तिन के धन की ब्रिधा ॥३०॥

राज करत भए बिबिध प्रकारा ॥

देस देस के जीत न्रिपारा ॥

जहा तहा तिह धरम चलायो ॥

अत्र पत्र कह सीसि ढुरायो ॥३१॥

राजसूअ बहु बारन कीए ॥

जीति जीति देसेस्वर लीए ॥

बाज मेध बहु बारन करे ॥

सकल कलूख निज कुल के हरे ॥३२॥

बहुत बंस मै बढो बिखाधा ॥

मेट न सका कोऊ तिह साधा ॥

बिचरे बीर बनैतु अखंडल ॥

गहि गहि चले भिरन रन मंडल ॥३३॥

धन अरु भूमि पुरातन बैरा ॥

जिन का मूआ करति जग घेरा ॥

मोह बाद अहंकार पसारा ॥

काम क्रोध जीता जग सारा ॥३४॥

दोहरा ॥

धनि धनि, धन को भाखीऐ; जा का जगतु गुलामु ॥

सभ निरखत या को फिरै; सभ चल करत सलाम ॥३५॥

चौपई ॥

काल न कोऊ करन सुमारा ॥

बैर बाद अहंकार पसारा ॥

लोभ मूल इह जग को हूआ ॥

जा सो चाहत सभै को मूआ ॥३६॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे सुभ बंस बरननं दुतीया धिआइ स्मपूरनम सतु सुभम सतु ॥२॥१३७॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

रचा बैर बादं बिधाते अपारं ॥

जिसै साधि साकिओ न कोऊ सुधारं ॥

बली काम रायं महा लोभ मोहं ॥

गयो कउन बीरं? सु या ते अलोहं ॥१॥

तहा बीर बंके बकै आप मधं ॥

उठे ससत्र लै लै, मचा जुध सुधं ॥

कहूं खपरी खोल खंडे अपारं ॥

नचै बीर बैताल डउरू डकारं ॥२॥

कहूं ईस सीसं पुऐ रुंड मालं ॥

कहूं डाक डउरू कहूंकं बितालं ॥

चवी चावडीअं किलंकार कंकं ॥

गुथी लुथ जुथे बहै बीर बंकं ॥३॥

परी कुट कुटं रुले तछ मुछं ॥

रहे हाथ डारे उभै उरध मुछं ॥

कहूं खोपरी खोल खिंगं खतंगं ॥

कहूं खत्रीअं खग खेतं निखंगं ॥४॥

चवी चांवडी डाकनी डाक मारै ॥

कहूं भैरवी भूत भैरो बकारै ॥

कहूं बीर बैताल बंके बिहारं ॥

कहूं भूत प्रेतं हसै मासहारं ॥५॥

रसावल छंद ॥

महा बीर गजे ॥

सुण मेघ लजे ॥

झंडा गड गाढे ॥

मंडे रोस बाढे ॥६॥

क्रिपाणं कटारं ॥

भिरे रोस धारं ॥

महाबीर बंकं ॥

भिरे भूमि हंकं ॥७॥

मचे सूर ससत्रं ॥

उठी झार असत्रं ॥

क्रिपाणं कटारं ॥

परी लोह मारं ॥८॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

हलबी जुनबी सरोही दुधारी ॥

बही कोप काती क्रिपाणं कटारी ॥

कहूं सैहथीअं कहूं सुध सेलं ॥

कहूं सेल सांगं भई रेल पेलं ॥९॥

नराज छंद ॥

सरोख सुर साजिअं ॥

बिसारि संक बाजिअं ॥

निसंक ससत्र मारहीं ॥

उतारि अंग डारहीं ॥१०॥

कछू न कान राखहीं ॥

सु मारि मारि भाखहीं ॥

सु हाक हाठ रेलियं ॥

अनंत ससत्र झेलियं ॥११॥

हजार हूरि अ्मबरं ॥

बिरुध कै सुअ्मबरं ॥

करूर भांत डोलही ॥

सु मारु मार बोलही ॥१२॥

कहूकि अंग कटीअं ॥

कहूं सरोह पटीअं ॥

कहूं सु मास मुछीअं ॥

गिरे सु तछ मुछीअं ॥१३॥

ढमक ढोल ढालियं ॥

हरोल हाल चालियं ॥

झटाक झट बाहीअं ॥

सु बीर सैन गाहीअं ॥१४॥

निवं निसाण बाजिअं ॥

सु बीर धीर गाजिअं ॥

क्रिपान बाण बाहही ॥

अजात अंग लाहही ॥१५॥

बिरुध क्रुध राजियं ॥

न चार पैर भाजियं ॥

स्मभारि ससत्र गाज ही ॥

सु नाद मेघ लाज ही ॥१६॥

हलंक हाक मारही ॥

सरक ससत्र झारही ॥

भिरे बिसारि सोकियं ॥

सिधार देव लोकियं ॥१७॥

रिसे बिरुध बीरियं ॥

सु मारि झारि तीरियं ॥

सबद संख बजियं ॥

सु बीर धीर सजियं ॥१८॥

रसावल छंद ॥

तुरी संख बाजे ॥

महाबीर साजे ॥

नचे तुंद ताजी ॥

मचे सूर गाजी ॥१९॥

झिमी तेज तेगं ॥

मनो बिज बेगं ॥

उठै नद नादं ॥

धुन न्रिबिखादं ॥२०॥

तुटे खग खोलं ॥

मुखं मार बोलं ॥

धका धीक धकं ॥

गिरे हक बकं ॥२१॥

दलं दीह गाहं ॥

अधो अंग लाहं ॥

प्रयोघं प्रहारं ॥

बकै मार मारं ॥२२॥

नदी रकत पूरं ॥

फिरी गैणि हूरं ॥

गजे गैणि काली ॥

हसी खपराली ॥२३॥

महा सूर सोहं ॥

मंडे लोह क्रोहं ॥

महा गरब गजियं ॥

धुणं मेघ लजियं ॥२४॥

छके लोह छकं ॥

मुखं मार बकं ॥

मुखं मुछ बंकं ॥

भिरे छाड संकं ॥२५॥

हकं हाक बाजी ॥

घिरी सैण साजी ॥

चिरे चार ढूके ॥

मुखं मार कूके ॥२६॥

रुके सूर संगं ॥

मनो सिंधु गंगं ॥

ढहे ढाल ढकं ॥

क्रिपाण कड़कं ॥२७॥

हकं हाक बाजी ॥

नचे तुंद ताजी ॥

रसं रुद्र पागे ॥

भिरे रोस जागे ॥२८॥

गिरे सुध सेलं ॥

भई रेल पेलं ॥

पलंहार नचे ॥

रणं बीर मचे ॥२९॥

हसे मासहारी ॥

नचे भूत भारी ॥

महा ढीठ ढूके ॥

मुखं मार कूके ॥३०॥

गजै गैण देवी ॥

महा अंस भेवी ॥

भले पूत नाचं ॥

रसं रुद्र राचं ॥३१॥

भिरै बैर रुझै ॥

महा जोध जुझै ॥

झंडा गड गाढे ॥

बजे बैर बाढे ॥३२॥

गजं गाह बाधे ॥

धनुर बान साधे ॥

बहे आप मधं ॥

गिरे अध अधं ॥३३॥

गजं बाज जुझै ॥

बली बैर रुझै ॥

न्रिभै ससत्र बाहै ॥

उभै जीत चाहै ॥३४॥

गजे आनि गाजी ॥

नचे तुंद ताजी ॥

हकं हाक बजी ॥

फिरै सैन भजी ॥३५॥

मदं मत माते ॥

रसं रुद्र राते ॥

गजं जूह साजे ॥

भिरे रोस बाजे ॥३६॥

झमी तेज तेगं ॥

घणं बिज बेगं ॥

बहै बार बैरी ॥

जलं जिउ गंगैरी ॥३७॥

अपो आप बाहं ॥

उभै जीत चाहं ॥

रसं रुद्र राते ॥

महा मत माते ॥३८॥

भुजंग छंद ॥

मचे बीर बीरं अभूतं भयाणं ॥

बजी भेरि भंकार धुके निसानं ॥

नवं नद नीसाण गजे गहीरं ॥

फिरै रुंड मुंडं तनं तछ तीरं ॥३९॥

बहे खग खेतं खिआलं खतंगं ॥

रुले तछ मुछं महा जोध जंगं ॥

बंधै बीर बाना बडे ऐठिवारे ॥

घुमै लोह घुटं मनो मतवारे ॥४०॥

उठी कूह जूहं समरि सार बजियं ॥

किधो अंत के काल को मेघ गजियं ॥

भई तीर भीरं कमाणं कड़कियं ॥

बजे लोह क्रोहं महा जंगि मचियं ॥४१॥

बिरचे महा जुध जोधा जुआणं ॥

खुले खग खत्री अभूतं भयाणं ॥

बली जुझ रुझै रसं रुद्र रते ॥

मिले हथ बखं महा तेज तते ॥४२॥

झमी तेज तेगं सु रोसं प्रहारं ॥

रुले रुंड मुंडं उठी ससत्र झारं ॥

बबकंत बीरं भभकंत घायं ॥

मनो जुध इंद्रं जुटिओ ब्रितरायं ॥४३॥

महा जुध मचियं महा सूर गाजे ॥

आपो आप मै ससत्र सों ससत्र बाजे ॥

उठे झार सांगं मचे लोह क्रोहं ॥

मनो खेल बासंत माहंत सोहं ॥४४॥

रसावल छंद ॥

जिते बैर रुझं ॥

तिते अंति जुझं ॥

जिते खेति भाजे ॥

तिते अंति लाजे ॥४५॥

तुटे देह बरमं ॥

छुटी हाथ चरमं ॥

कहूं खेति खोलं ॥

गिरे सूर टोलं ॥४६॥

कहूं मुछ मुखं ॥

कहूं ससत्र सखं ॥

कहूं खोल खगं ॥

कहूं परम पगं ॥४७॥

गहे मुछ बंकी ॥

मंडे आन हंकी ॥

ढका ढुक ढालं ॥

उठे हाल चालं ॥४८॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

खुले खग खूनी महाबीर खेतं ॥

नचे बीर बैतालयं भूत प्रेतं ॥

बजे डंग डउरू उठे नाद संखं ॥

मनो मल जुटे महा हथ बखं ॥४९॥

छपै छंद ॥

जिनि सूरन संग्राम; सबल समुहि ह्वै मंडिओ ॥

तिन सुभटन ते एक; काल कोऊ जीअत न छडिओ ॥

सब खत्री खग खंडि खेति ते; भू मंडप अहुटे ॥

सार धारि धरि धूम मुकति; बंधन ते छुटे ॥

ह्वै टूक टूक जुझे सबै; पाव न पाछे डारीयं ॥

जै कार अपार सुधार हूंअ; बासव लोक सिधारीयं ॥५०॥

चौपई ॥

इह बिधि मचा घोर संग्रामा ॥

सिधए सूर सूर के धामा ॥

कहा लगै वह कथो लराई ॥

आपन प्रभा न बरनी जाई ॥५१॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

लवी सरब जीते, कुसी सरब हारे ॥

बचे जे बली, प्रान लै के सिधारे ॥

चतुर बेद पठियं, कीयो कासि बासं ॥

घने बरख कीने, तहा ही निवासं ॥५२॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे लवी कुसी जुध बरननं त्रितीआ; धिआउ समापतम सतु सुभम सतु ॥३॥१८९॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

जिनै बेद पठियो, सु बेदी कहाए ॥

तिनै धरम कै, करम नीके चलाए ॥

पठे कागदं, मद्र राजा सुधारं ॥

आपो आप मो, बैर भावं बिसारं ॥१॥

न्रिपं मुकलियं दूत, सो कासि आयं ॥

सबै बेदियं भेद भाखे सुनायं ॥

सबै बेद पाठी, चले मद्र देसं ॥

प्रनाम कीयो, आन कै कै नरेसं ॥२॥

धुनं बेद की, भूप ता ते कराई ॥

सबै पास बैठे, सभा बीच भाई ॥

पड़े साम बेद, जुजर बेद कथं ॥

रिगं बेद पठियं, करे भाव हथं ॥३॥

रसावल छंद ॥

अथर्व बेद पठियं ॥

सुनै पाप नठियं ॥

रहा रीझ राजा ॥

दीआ सरब साजा ॥४॥

लयो बन बासं ॥

महा पाप नासं ॥

रिखं भेस कीयं ॥

तिसै राज दीयं ॥५॥

रहे होरि लोगं ॥

तजे सरब सोगं ॥

धनं धाम तिआगे ॥

प्रभं प्रेम पागे ॥६॥

अड़िल ॥

बेदी भयो प्रसंन, राज कह पाइ कै ॥

देत भयो बरदान, हीऐ हुलसाइ कै ॥

जब नानक कल मै, हम आनि कहाइ है ॥

हो जगत पूज करि तोहि, परम पदु पाइ है ॥७॥

दोहरा ॥

लवी राज दे बनि गये; बेदीअन कीनो राज ॥

भांति भांति तनि भोगीयं; भूअ का सकल समाज ॥८॥

चौपई ॥

त्रितीय बेद सुनबे तुम कीआ ॥

चतुर बेद सुनि भूअ को दीआ ॥

तीन जनम हमहूं जब धरि है ॥

चौथे जनम गुरू तुहि करि है ॥९॥

उत राजा काननहि सिधायो ॥

इत इन राज करत सुख पायो ॥

कहा लगे करि कथा सुनाऊ ॥

ग्रंथ बढन ते अधिक डराऊ ॥१०॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे बेद पाठ भेट राज चतुरथ धिआइ समापतम सतु सुभम सतु ॥४॥१९९॥

नराज छंद ॥

बहुरि बिखाध बाधियं ॥

किनी न ताहि साधियं ॥

करम काल यो भई ॥

सु भूमि बंस ते गई ॥१॥

दोहरा ॥

बिप्र करत भए सूद्र ब्रिति; छत्री बैसन करम ॥

बैस करत भए छत्रि ब्रिति; सूद्र, सु दिज को धरम ॥२॥

चौपई ॥

बीस गाव तिन के रहि गए ॥

जिन मो करत क्रिसानी भए ॥

बहुत काल इह भांति बितायो ॥

जनम समै नानक को आयो ॥३॥

दोहरा ॥

तिन बेदीयन के कुल बिखे; प्रगटे नानक राइ ॥

सभ सिखन को सुख दए; जह तह भए सहाइ ॥४॥

चौपई ॥

तिन इह कल मो धरम चलायो ॥

सभ साधन को राहु बतायो ॥

जो, ता के मारग महि आए ॥

ते, कबहूं नहि पाप संताए ॥५॥

जे जे, पंथ तवन के परे ॥

पाप ताप तिन के प्रभ हरे ॥

दूख भूख कबहूं न संताए ॥

जाल काल के बीच न आए ॥६॥

नानक, अंगद को बपु धरा ॥

धरम प्रचुरि, इह जग मो करा ॥

अमर दास, पुनि नाम कहायो ॥

जनु, दीपक ते दीप जगायो ॥७॥

जब, बरदानि समै वहु आवा ॥

रामदास, तब गुरू कहावा ॥

तिह बरदानि पुरातनि दीआ ॥

अमरदासि, सुरपुरि मग लीआ ॥८॥

स्री नानक, अंगदि करि माना ॥

अमर दास, अंगद पहिचाना ॥

अमर दास, रामदास कहायो ॥

साधन लखा, मूड़ नहि पायो ॥९॥

भिंन भिंन, सभहूं करि जाना ॥

एक रूप, किनहूं पहिचाना ॥

जिन जाना, तिन ही सिधि पाई ॥

बिनु समझे, सिधि हाथि न आई ॥१०॥

रामदास, हरि सो मिलि गए ॥

गुरता देत अरजुनहि भए ॥

जब अरजुन प्रभ लोकि सिधाए ॥

हरिगोबिंद, तिह ठां ठहराए ॥११॥

हरिगोबिंद, प्रभ लोकि सिधारे ॥

हरी राइ, तिह ठां बैठारे ॥

हरी क्रिसनि, तिन के सुत वए ॥

तिन ते, तेग बहादुर भए ॥१२॥

तिलक जंञू राखा प्रभ ता का ॥

कीनो बडो कलू महि साका ॥

साधन हेति, इती जिनि करी ॥

सीसु दीया, परु सी न उचरी ॥१३॥

धरम हेत साका जिनि कीआ ॥

सीसु दीआ; परु सिररु न दीआ ॥

नाटक चेटक कीए कुकाजा ॥

प्रभ लोगन कह आवत लाजा ॥१४॥

दोहरा ॥

ठीकर फोरि दिलीस सिरि; प्रभ पुरि कीया पयान ॥

तेग बहादुर सी क्रिआ; करी न किनहूं आनि ॥१५॥

तेग बहादुर के चलत; भयो जगत को सोक ॥

है है है सभ जग भयो; जै जै जै सुर लोकि ॥१६॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे पातसाही बरननं नाम पंचमो धिआउ समापतम सत सुभम सतु ॥५॥२१५॥

चौपई ॥

अब, मै अपनी कथा बखानो ॥

तप साधत, जिह बिधि मुहि आनो ॥

हेम कुंट परबत है जहां ॥

सपत स्रिंग सोभित है तहां ॥१॥

सपतस्रिंग तिह नामु कहावा ॥

पंडु राज जह जोगु कमावा ॥

तह, हम अधिक तपसिआ साधी ॥

महाकाल कालका अराधी ॥२॥

इह बिधि करत तपसिआ भयो ॥

द्वै ते, एक रूप ह्वै गयो ॥

तात मात मुर, अलख अराधा ॥

बहु बिधि, जोग साधना साधा ॥३॥

तिन जो करी अलख की सेवा ॥

ता ते भए प्रसंनि गुरदेवा ॥

तिन प्रभ, जब आइसु मुहि दीआ ॥

तब, हम जनम कलू महि लीआ ॥४॥

चित न भयो हमरो आवन कहि ॥

चुभी रही स्रुति, प्रभु चरनन महि ॥

जिउ तिउ प्रभ हम को समझायो ॥

इम कहि कै, इह लोकि पठायो ॥५॥

अकाल पुरख बाच इस कीट प्रति ॥

चौपई ॥

जब पहिले हम स्रिसटि बनाई ॥

दईत रचे दुसट दुख दाई ॥

ते भुज बल बवरे ह्वै गए ॥

पूजत परम पुरख रहि गए ॥६॥

ते हम तमकि, तनिक मो खापे ॥

तिन की ठउर देवता थापे ॥

ते भी बलि पूजा उरझाए ॥

आपन ही परमेसुर कहाए ॥७॥

महादेव अचुत कहवायो ॥

बिसन आप ही को ठहरायो ॥

ब्रहमा आप पारब्रहम बखाना ॥

प्रभ को प्रभू न किनहूं जाना ॥८॥

तब साखी प्रभ असट बनाए ॥

साख नमित देबे ठहिराए ॥

ते कहै करो हमारी पूजा ॥

हम बिनु अवरु न ठाकुरु दूजा ॥९॥

परम तत को जिन न पछाना ॥

तिन करि ईसुर तिन कहु माना ॥

केते सूर चंद कहु मानै ॥

अगनहोत्र कई पवन प्रमानै ॥१०॥

किनहूं प्रभु पाहिन पहिचाना ॥

न्हात किते जल करत बिधाना ॥

केतिक करम करत डरपाना ॥

धरम राज को धरम पछाना ॥११॥

जे प्रभ, साख नमित ठहराए ॥

ते हिआं आइ, प्रभू कहवाए ॥

ता की बात बिसर जाती भी ॥

अपनी अपनी परत सोभ भी ॥१२॥

जब प्रभ को, न तिनै पहिचाना ॥

तब हरि इन मनुछन ठहराना ॥

ते भी बसि ममता हुइ गए ॥

परमेसुर पाहन ठहरए ॥१३॥

तब हरि सिध साध ठहिराए ॥

तिन भी परम पुरखु नहि पाए ॥

जे कोई होति भयो जगि सिआना ॥

तिन तिन अपनो पंथु चलाना ॥१४॥

परम पुरख किनहूं नह पायो ॥

बैर बाद हंकार बढायो ॥

पेड पात आपन ते जलै ॥

प्रभ कै पंथ, न कोऊ चलै ॥१५॥

जिनि जिनि, तनिकि सिध को पायो ॥

तिनि तिनि, अपना राहु चलायो ॥

परमेसुर, न किनहूं पहिचाना ॥

मम उचारि ते भयो दिवाना ॥१६॥

परम तत किनहूं न पछाना ॥

आप आप भीतरि उरझाना ॥

तब जे जे रिखि राज बनाए ॥

तिन आपन पुनि सिम्रित चलाए ॥१७॥

जे सिम्रतन के भए अनुरागी ॥

तिन तिन क्रिआ ब्रहम की तिआगी ॥

जिन मनु हर चरनन ठहरायो ॥

सो सिम्रितन के राह न आयो ॥१८॥

ब्रहमा चार ही बेद बनाए ॥

सरब लोक तिह करम चलाए ॥

जिन की लिव हरि चरनन लागी ॥

ते बेदन ते भए तिआगी ॥१९॥

जिन मति बेद कतेबन तिआगी ॥

पारब्रहम के भे अनुरागी ॥

तिन के गूड़ मति जे चलही ॥

भांति अनेक दूख सो दलही ॥२०॥

जे जे सहित जातन संदेहि ॥

प्रभ के संगि न छोडत नेह ॥

ते ते परम पुरी कहि जाही ॥

तिन हरि सिउ अंतरु किछु नाही ॥२१॥

जे जे जीय, जातन ते डरे ॥

परम पुरख तजि, तिन मगि परे ॥

ते ते, नरक कुंड मो परही ॥

बार बार, जग मो बपु धरही ॥२२॥

तब हरि बहुरि दत उपजाइओ ॥

तिन भी अपना पंथु चलाइओ ॥

कर मो नख, सिर जटा सवारी ॥

प्रभ की क्रिआ कछु न बिचारी ॥२३॥

पुनि हरि गोरख को उपराजा ॥

सिख करे तिन हू बड राजा ॥

स्रवन फारि मुद्रा दुऐ डारी ॥

हरि की प्रति रीति न बिचारी ॥२४॥

पुनि हरि रामानंद को करा ॥

भेस बैरागी को जिनि धरा ॥

कंठी कंठि काठ की डारी ॥

प्रभ की क्रिआ न कछू बिचारी ॥२५॥

जे प्रभ परम पुरख उपजाए ॥

तिन तिन अपने राह चलाए ॥

महादीन तबि प्रभ उपराजा ॥

अरब देस को कीनो राजा ॥२६॥

तिन भी एकु पंथु उपराजा ॥

लिंग बिना कीने सभ राजा ॥

सभ ते अपना नामु जपायो ॥

सतिनामु काहूं न द्रिड़ायो ॥२७॥

सभ अपनी अपनी उरझाना ॥

पारब्रहम काहूं न पछाना ॥

तप साधत, हरि मोहि बुलायो ॥

इम कहि कै, इह लोक पठायो ॥२८॥

अकाल पुरख बाच ॥

चौपई ॥

मै अपना सुत तोहि निवाजा ॥

पंथु प्रचुर करबे कह साजा ॥

जाहि तहा तै धरमु चलाइ ॥

कबुधि करन ते लोक हटाइ ॥२९॥

कबिबाच दोहरा ॥

ठांढ भयो मै जोरि कर; बचन कहा सिर नयाइ ॥

पंथ चलै तब जगत मै; जब तुम करहु सहाइ ॥३०॥

चौपई ॥

इह कारनि प्रभ मोहि पठायो ॥

तब मै जगति जनमु धरि आयो ॥

जिम तिन कही इनै तिम कहिहौ ॥

अउर किसु ते बैर न गहिहौ ॥३१॥

जो हम को परमेसुर उचरि है ॥

ते सभ नरकि कुंड महि परि है ॥

मो को दासु तवन का जानो ॥

या मै भेदु न रंच पछानो ॥३२॥

मै हो परम पुरख को दासा ॥

देखनि आयो जगत तमासा ॥

जो प्रभ जगति कहा सो कहि हो ॥

म्रित लोग ते मोनि न रहि हो ॥३३॥

नराज छंद ॥

कहियो प्रभू, सु भाखिहौ ॥

किसू न कान राखिहौ ॥

किसू न भेख भीजहौ ॥

अलेख बीज बीजहौ ॥३४॥

पखाण पूजि हौ नही ॥

न भेख भीज हौ कही ॥

अनंत नामु गाइहौ ॥

परम पुरख पाइहौ ॥३५॥

जटा न सीस धारिहौ ॥

न मुंद्रका सु धारिहौ ॥

न कानि काहूं की धरो ॥

कहियो प्रभू, सु मै करो ॥३६॥

भजो सु एकु नामयं ॥

जु काम सरब ठामयं ॥

न जाप आन को जपो ॥

न अउर थापना थपो ॥३७॥

बिअंति नामु धिआइहौ ॥

परम जोति पाइहौ ॥

न धिआन आन को धरो ॥

न नामु आनि उचरो ॥३८॥

तविक नाम रतियं ॥

न आन मान मतियं

परम धिआन धारीयं ॥

अनंत पाप टारीयं ॥३९॥

तुमेव रूप राचियं ॥

न आन दान माचियं ॥

तवकि नामु उचारीयं ॥

अनंत दूख टारीयं ॥४०॥

चौपई ॥

जिनि जिनि नामु तिहारो धिआइआ ॥

दूख पाप तिन निकटि न आइआ ॥

जे जे, अउर धिआन को धरही ॥

बहिसि बहिसि बादन ते मरही ॥४१॥

हम इह काज जगत मो आए ॥

धरम हेत गुरदेवि पठाए ॥

जहा तहा तुम धरम बिथारो ॥

दुसट दोखयनि पकरि पछारो ॥४२॥

याही काज धरा हम जनमं ॥

समझ लेहु साधू सभ मनमं ॥

धरम चलावन संत उबारन ॥

दुसट सभन को मूल उपारिन ॥४३॥

जे जे भए पहिल अवतारा ॥

आपु आपु तिन जापु उचारा ॥

प्रभ दोखी कोई न बिदारा ॥

धरम करन को राहु न डारा ॥४४॥

जे जे गउस अ्मबीआ भए ॥

मै मै करत जगत ते गए ॥

महापुरख काहूं न पछाना ॥

करम धरम को कछू न जाना ॥४५॥

अवरन की आसा किछु नाही ॥

एकै आस धरो मन माही ॥

आन आस, उपजत किछु नाही ॥

वा की आस, धरो मन माही ॥४६॥

दोहरा ॥

कोई पड़ति कुरान को; कोई पड़त पुरान ॥

काल न सकत बचाइकै; फोकट धरम निदान ॥४७॥

चौपई ॥

कई कोटि मिलि पड़त कुराना ॥

बाचत किते पुरान अजाना ॥

अंति कालि कोई काम न आवा ॥

दाव काल काहूं न बचावा ॥४८॥

किउ न जपो ता को तुम? भाई ! ॥

अंति कालि, जो होइ सहाई ॥

फोकट धरम लखो कर भरमा ॥

इन ते, सरत न कोई करमा ॥४९॥

इह कारनि, प्रभ हमै बनायो ॥

भेदु भाखि, इह लोक पठायो ॥

जो तिन कहा, सु सभन उचरो ॥

डि्मभ वि्मभ, कछु नैक न करो ॥५०॥

रसावल छंद ॥

न जटा मुंडि धारौ ॥

न मुंद्रका सवारौ ॥

जपो तास नामं ॥

सरै सरब कामं ॥५१॥

न नैनं मिचाउ ॥

न डि्मभं दिखाउ ॥

न कुकरमं कमाउ ॥

न भेखी कहाउ ॥५२॥

चौपई ॥

जे जे भेख सु तन मै धारै ॥

ते प्रभ जन, कछु कै न बिचारै ॥

समझ लेहु सभ जन मन माही ॥

डि्मभन मै परमेसुर नाही ॥५३॥

जे जे करम करि, डि्मभ दिखाही ॥

तिन, परलोकन मो गति नाही ॥

जीवत चलत जगत के काजा ॥

स्वांग देखि करि, पूजत राजा ॥५४॥

सुआंगन मै परमेसुर नाही ॥

खोजि फिरै, सभ ही को काही ॥

अपनो मनु, कर मो जिह आना ॥

पारब्रहम को, तिनी पछाना ॥५५॥

दोहरा ॥

भेख दिखाए जगत को; लोगन को बसि कीन ॥

अंति कालि काती कटियो; बासु नरक मो लीन ॥५६॥

चौपई ॥

जे जे, जग को डि्मभ दिखावै ॥

लोगन मूंडि, अधिक सुख पावै ॥

नासा मूंद करै परणामं ॥

फोकट धरम न कउडी कामं ॥५७॥

फोकट धरम जिते जग करही ॥

नरकि कुंड भीतर ते परही ॥

हाथ हलाए, सुरगि न जाहू ॥

जो मनु जीत सका नहि काहू ॥५८॥

कबिबाच दोहरा ॥

जो निज प्रभ मो सो कहा; सो कहिहो जग माहि ॥

जो तिह प्रभ को धिआइ है; अंति सुरग को जाहि ॥५९॥

दोहरा ॥

हरि हरि जन दुई एक है; बिब बिचार कछु नाहि ॥

जल ते उपजि तरंग जिउ; जल ही बिखै समाहि ॥६०॥

चौपई ॥

जे जे बादि करत हंकारा ॥

तिन ते भिंन रहत करतारा ॥

बेद कतेब बिखै हरि नाही ॥

जान लेहु हरि जन ! मन माही ॥६१॥

आंख मूंदि, कोऊ डि्मभ दिखावै ॥

आंधर की पदवी कह पावै ॥

आंखि मीच, मगु सूझि न जाई ॥

ताहि अनंत मिलै किम भाई ॥६२॥

बहु बिसथार, कह लउ कोई कहै? ॥

समझत बाति, थकति हुऐ रहै ॥

रसना धरै कई जो कोटा ॥

तदपि गनत तिह परत सु तोटा ॥६३॥

दोहरा ॥

जब आइसु प्रभ को भयो; जनमु धरा जग आइ ॥

अब मै कथा संछेप ते; सबहूं कहत सुनाइ ॥६४॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे मम आगिआ काल जग प्रवेस करनं; नाम खसटमो धयाइ समापतम सतु सुभम सतु ॥६॥२७९॥


ਅਥ ਕਬਿ ਜਨਮ ਕਥਨੰ ॥ अथ कबि जनम कथनं ॥ चौपई ॥

मुर पित, पूरबि कियसि पयाना ॥

भांति भांति के तीरथि न्हाना ॥

जब ही जाति त्रिबेणी भए ॥

पुंन दान दिन करत बितए ॥१॥

तही प्रकास हमारा भयो ॥

पटना सहर बिखै भव लयो ॥

मद्र देस हम को ले आए ॥

भांति भांति दाईअन दुलराए ॥२॥

कीनी अनिक भांति तन रछा ॥

दीनी भांति भांति की सिछा ॥

जब हम धरम करम मो आइ ॥

देव लोकि तब पिता सिधाए ॥३॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे कबि जनम बरननं नाम सपतमो धिआइ समातपम सतु सुभम सतु ॥७॥२८२॥


ਅਥ ਰਾਜ ਸਾਜ ਕਥਨੰ ॥ अथ राज साज कथनं ॥ चौपई ॥

राज साज हम पर जब आयो ॥

जथा सकति तब धरमु चलायो ॥

भांति भांति बनि खेलि सिकारा ॥

मारे रीछ रोझ झंखारा ॥१॥

देस चाल हम ते पुनि भई ॥

सहर पावटा की सुधि लई ॥

कालिंद्री तटि करे बिलासा ॥

अनिक भांति के पेखि तमासा ॥२॥

तह के सिंघ घने चुनि मारे ॥

रोझ रीछ बहु भांति बिदारे ॥

फते साह, कोपा तबि राजा ॥

लोह परा हम सो, बिनु काजा ॥३॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

तहा साह स्रीसाह संग्राम कोपे ॥

पंचो बीर बंके प्रिथी पाइ रोपे ॥

हठी जीतमलं सु गाजी गुलाबं ॥

रणं देखीऐ, रंग रूपं सहाबं ॥४॥

हठियो माहरीचंदयं गंगरामं ॥

जिने कितीयं जितीयं फौज तामं ॥

कुपे लाल चंदं कीए लाल रूपं ॥

जिनै गंजीयं गरब सिंघ अनूपं ॥५॥

कुपियो माहरू, काहरू रूप धारे ॥

जिनै खान खावीनीयं खेत मारे ॥

कुपिओ देवतेसं दयाराम जुधं ॥

कीयं द्रोण की जिउ, महा जुध सुधं ॥६॥

क्रिपाल कोपीयं कुतको स्मभारी ॥

हठी खान हयात के सीस झारी ॥

उठी छिछि इछं कढा मेझ जोरं ॥

मनो माखनं मटकी कान्ह फोरं ॥७॥

तहा नंद चंदं कीयो कोप भारो ॥

लगाई बरछी क्रिपाणं स्मभारो ॥

तुटी तेग त्रिखी कढे जमदढं ॥

हठी राखीयं लज बंसं सनढं ॥८॥

तहा मातलेयं क्रिपालं क्रुधं ॥

छकियो छोभ छत्री करियो जुध सुधं ॥

सहे देह आपं महाबीर बाणं ॥

करियो खान बानीन खाली पलाणं ॥९॥

हठियो साहिबं चंद खेतं खत्रिआणं ॥

हने खान खूनी खुरासान भानं ॥

तहा बीर बंके भली भांति मारे ॥

बचे प्रान लै के सिपाही सिधारे ॥१०॥

तहा साह संग्राम कीने अखारे ॥

घने खेत मो खान खूनी लतारे ॥

न्रिपं गोपलायं, खरो खेत गाजै ॥

म्रिगा झुंड मधियं, मनो सिंघ राजे ॥११॥

तहा एक बीरं, हरी चंद कोप्यो ॥

भली भांति सो, खेत मो पाव रोप्यो ॥

महा क्रोध के तीर तीखे प्रहारे ॥

लगै जौनि के, ताहि पारै पधारे ॥१२॥

रसावल छंद ॥

हरी चंद क्रुधं ॥

हने सूर सुधं ॥

भले बाण बाहे ॥

बडे सैन गाहे ॥१३॥

रसं रुद्र राचे ॥

महा लोह माचे ॥

हने ससत्र धारी ॥

लिटे भूप भारी ॥१४॥

तबै जीत मलं ॥

हरी चंद भलं ॥

ह्रिदै ऐंच मारियो ॥

सु खेतं उतारियो ॥१५॥

लगे बीर बाणं ॥

रिसियो तेजि माणं ॥

समूह बाज डारे ॥

सुवरगं सिधारे ॥१६॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

खुलै खान खूनी खुरासान खगं ॥

परी ससत्र धारं उठी झाल अगं ॥

भई तीर भीरं कमाणं कड़के ॥

गिरे बाज ताजी लगे धीर धके ॥१७॥

बजी भेर भुंकार धुके नगारे ॥

दुहूं ओर ते बीर बंके बकारे ॥

करे बाहु आघात ससत्रं प्रहारं ॥

डकी डाकणी चावडी चीतकारं ॥१८॥

दोहरा ॥

कहा लगे बरनन करौ; मचियो जुधु अपार ॥

जे लुझे जुझे सबै; भजे सूर हजार ॥१९॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

भजियो साह पाहाड़ ताजी त्रिपायं ॥

चलियो बीरीया तीरीया न चलायं ॥

जसो डढवालं मधुकर सु साहं ॥

भजे संगि लै कै सु सारी सिपाहं ॥२०॥

चक्रत चौपियो चंद गाजी चंदेलं ॥

हठी हरी चंदं गहे हाथ सेलं ॥

करियो सुआम धरम महा रोस रुझियं ॥

गिरियो टूक टूक ह्वै इसो सूर जुझियं ॥२१॥

तहा खान नैजाबतै आन कै कै ॥

हनिओ साह संग्राम को ससत्र लै कै ॥

कितै खान बानीन हूं असत्र झारे ॥

सही साह संग्राम सुरगं सिधारे ॥२२॥

दोहरा ॥

मारि निजाबत खान को; संगो जुझै जुझार ॥

हा हा इह लोकै भइओ; सुरग लोक जैकार ॥२३॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

लखै साह संग्राम जुझे जुझारं ॥

तवं कीट बाणं कमाणं स्मभारं ॥

हनियो एक खानं खिआलं खतंगं ॥

डसियो सत्र को जानु स्यामं भुजंगं ॥२४॥

गिरियो भूमि सो बाण दूजो स्मभारियो ॥

मुखं भीखनं खान के तानि मारियो ॥

भजियो खान खूनी रहियो खेति ताजी ॥

तजे प्राण तीजे लगै बाण बाजी ॥२५॥

छुटी मूरछना हरी चंदं स्मभारो ॥

गहे बाण कामाण भे ऐच मारे ॥

लगे अंगि जा के रहे न स्मभारं ॥

तनं तिआग ते देव लोकं पधारं ॥२६॥

दुयं बाण खैचे इकं बारि मारे ॥

बली बीर बाजीन ताजी बिदारे ॥

जिसै बान लागै रहे न स्मभारं ॥

तनं बेधि कै ताहि पारं सिधारं ॥२७॥

सबै स्वामि धरमं सु बीरं स्मभारे ॥

डकी डाकणी भूत प्रेतं बकारे ॥

हसै बीर बैताल औ सुध सिधं ॥

चवी चावंडीयं उडी गिध ब्रिधं ॥२८॥

हरीचंद कोपे कमाणं स्मभारं ॥

प्रथम बाजीयं ताण बाणं प्रहारं ॥

दुतीय ताक कै तीर मो को चलायो ॥

रखिओ दईव मै कानि छ्वै कै सिधायं ॥२९॥

त्रितीय बाण मारियो सु पेटी मझारं ॥

बिधिअं चिलकतं दुआल पारं पधारं ॥

चुभी चिंच चरमं कछू घाइ न आयं ॥

कलं केवलं जान दासं बचायं ॥३०॥

रसावल छंद ॥

जबै बाण लाग्यो ॥

तबै रोस जाग्यो ॥

करं लै कमाणं ॥

हनं बाण ताणं ॥३१॥

सबै बीर धाए ॥

सरोघं चलाए ॥

तबै ताकि बाणं ॥

हन्यो एक जुआणं ॥३२॥

हरी चंद मारे ॥

सु जोधा लतारे ॥

सु कारोड़ रायं ॥

वहै काल घायं ॥३३॥

रणं तिआगि भागे ॥

सबै त्रास पागे ॥

भई जीत मेरी ॥

क्रिपा काल केरी ॥३४॥

रणं जीति आए ॥

जयं गीत गाए ॥

धनंधार बरखे ॥

सबै सूर हरखे ॥३५॥

दोहरा ॥

जुध जीत आए जबै; टिकै न तिन पुर पाव ॥

काहलूर मै बाधियो; आनि अनंदपुर गाव ॥३६॥

जे जे नर तह न भिरे; दीने नगर निकार ॥

जे तिह ठउर भले भिरे; तिनै करी प्रतिपार ॥३७॥

चौपई ॥

बहत दिवस इह भांति बिताए ॥

संत उबारि दुसट सभ घाए ॥

टांग टांग करि हने निदाना ॥

कूकर जिमि तिन तजे प्राना ॥३८॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे राज साज कथनं भंगाणी जुध बरननं; नाम असटमो धिआइ समापतं सतु सुभम सतु ॥८॥३२०॥


ਅਥ ਨਉਦਨ ਕਾ ਜੁਧ ਬਰਨਨੰ ॥ अथ नउदन का जुध बरननं ॥ चौपई ॥

बहुत काल इह भांति बितायो ॥

मीआ खान जमू कह आयो ॥

अलिफ खान नादौण पठावा ॥

भीमचंद तन बैर बढावा ॥१॥

जुध काज न्रिप हमै बुलायो ॥

आपि तवन की ओर सिधायो ॥

तिन कठगड़ नवरस पर बाधो ॥

तीर तुफंग नरेसन साधो ॥२॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

तहा राज सिंघ बली भीम चंदं ॥

चड़िओ राम सिंघ महा तेजवंदं ॥

सुखंदेव गाजी जसरोट राजं ॥

चड़े क्रुध कीने करे सरब काजं ॥३॥

प्रिथीचंद चढिओ डढे डढवारं ॥

चले सिध हुऐ कार राजं सुधारं ॥

करी ढूक ढोअं किरपाल चंदं ॥

हटाए सबे मारि कै बीर ब्रिंदं ॥४॥

दुतीय ढोअ ढूके वहै मारि उतारी ॥

खरे दांत पीसे छुभै छत्रधारी ॥

उतै वै खरे बीर ब्मबै बजावै ॥

तरे भूप ठाढे बडो सोकु पावै ॥५॥

तबै भीमचंदं कीयो कोप आपं ॥

हनूमान कै मंत्र को मुखि जापं ॥

सबै बीर बोलै हमै भी बुलायं ॥

तबै ढोअ कै कै सु नीकै सिधायं ॥६॥

सबै कोप कै कै महा बीर ढूकै ॥

चलै बारिबै बार को जिउ भभूकै ॥

तहा बिझुड़िआलं हठियो बीर दिआलं ॥

उठियो सैन लै संगि सारी क्रिपालं ॥७॥

मधुभार छंद ॥

कुपिओ क्रिपाल ॥

नचे मराल ॥

बजे बजंत ॥

करूरं अनंत ॥८॥

जुझंत जुआण ॥

बाहै क्रिपाण ॥

जीअ धारि क्रोध ॥

छडे सरोघ ॥९॥

लुझै निदाण ॥

तजंत प्राण ॥

गिर परत भूमि ॥

जणु मेघ झूमि ॥१०॥

रसावल छंद ॥

क्रिपाल कोपियं ॥

हठी पाव रोपियं ॥

सरोघं चलाए ॥

बडे बीर घाए ॥११॥

हणै छत्रधारी ॥

लिटे भूप भारी ॥

महा नाद बाजे ॥

भले सूर गाजे ॥१२॥

क्रिपालं क्रुधं ॥

कीयो जुध सुधं ॥

महाबीर गजे ॥

महा सार बजे ॥१३॥

करो जुध चंडं ॥

सुणियो नाव खंडं ॥

चलियो ससत्र बाही ॥

रजौती निबाही ॥१४॥

दोहरा ॥

कोप भरे राजा सबै; कीनो जुध उपाइ ॥

सैन कटोचन की तबै; घेर लई अर राइ ॥१५॥

भुजंग छंद ॥

चले नांगलू पांगलू वेदड़ोलं ॥

जसवारे गुलेरे चले बांध टोलं ॥

तहा एक बाजियो महाबीर दिआलं ॥

रखी लाज जौनै सबै बिझड़वालं ॥१६॥

तवं कीट तौ लौ तुफंगं स्मभारो ॥

ह्रिदै एक रावंत के तकि मारो ॥

गिरियो झूमि भूमै करियो जुध सुधं ॥

तऊ मारु बोल्यो महा मानि क्रुधं ॥१७॥

तजियो तुपकं बान पानं स्मभारे ॥

चतुर बानयं लै सु सबियं प्रहारे ॥

त्रियो बाण लै बाम पाणं चलाए ॥

लगै या लगै ना कछू जानि पाए ॥१८॥

सु तउ लउ दईव जुध कीनो उझारं ॥

तिनै खेद कै बारि के बीच डारं ॥

परी मार बुंगं छुटी बाण गोली ॥

मनो सूर बैठे भली खेल होली ॥१९॥

गिरे बीर भूमं सरं सांग पेलं ॥

रंगे स्रोण बसत्रं मनो फाग खेलं ॥

लीयो जीति बैरी कीआ आनि डेरं ॥

तेऊ जाइ पारं रहे बारि केरं ॥२०॥

भई रात्रि गुबार के अरध जामं ॥

तबै छोरिगे बार देवै दमामं ॥

सबै रात्रि बीती उद्यो दिउस राणं ॥

चले बीर चालाक खगं खिलाणं ॥२१॥

भज्यो अलिफ खानं न खाना स्मभारियो ॥

भजे और बीरं न धीरं बिचारियो ॥

नदी पै दिनं असट कीने मुकामं ॥

भली भात देखै सबै राज धामं ॥२२॥

चौपई ॥

इत हम होइ बिदा घरि आए ॥

सुलह नमित वै उतहि सिधाए ॥

संधि इनै उन कै संगि कई ॥

हेत कथा पूरन इत भई ॥२३॥

दोहरा ॥

आलसून कह मारि कै; इह दिसि कीयो पयान ॥

भांति अनेकन के करे; पुरि अनंद सुख आनि ॥२४॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे नदौन जुध बरननं नाम नौमो धिआइ; समापतम सतु सुभम सतु ॥९॥३४४॥

चौपई ॥

बहुत बरख इह भांति बिताए ॥

चुनि चुनि चोर सबै गहि घाए ॥

केतकि भाजि सहिर ते गए ॥

भूखि मरत फिरि आवत भए ॥१॥

तब लौ खान दिलावर आए ॥

पूत आपन हम ओरि पठाए ॥

द्वैक घरी बीती निसि जबै ॥

चड़त करी खानन मिलि तबै ॥२॥

जब दल पार नदी के आयो ॥

आनि आलमै हमै जगायो ॥

सोरु परा सभ ही नर जागे ॥

गहि गहि ससत्र बीर रिस पागे ॥३॥

छूटन लगी तुफंगै तबही ॥

गहि गहि ससत्र रिसाने सबही ॥

क्रूर भांति तिन करी पुकारा ॥

सोरु सुना सरता कै पारा ॥४॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

बजी भैर भुंकार धुंकै नगारे ॥

महा बीर बानैत बंके बकारे ॥

भए बाहु आघात नचे मरालं ॥

क्रिपा सिंधु काली गरजी करालं ॥५॥

नदीयं लख्यो कालरात्र समानं ॥

करे सूरमा सीति पिंगं प्रमानं ॥

इते बीर गजे भए नाद भारे ॥

भजे खान खूनी बिना ससत्र झारे ॥६॥

नराज छंद ॥

निलज खान भजियो ॥

किनी न ससत्र सजियो ॥

सु तिआग खेत को चले ॥

सु बीर बीरहा भले ॥७॥

चले तुरे तुराइ कै ॥

सकै न ससत्र उठाइ कै ॥

न लै हथिआर गजही ॥

निहारि नारि लजही ॥८॥

दोहरा ॥

बरवा गाउ उजार कै; करे मुकाम भलान ॥

प्रभ बल हमै न छुइ सकै; भाजत भए निदान ॥९॥

तव बलि ईहा न पर सकै; बरवा हना रिसाइ ॥

सालिन रस जिम बानीय; रोरन खात बनाइ ॥१०॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे खानजादे को आगमन त्रासित उठ जैबो बरननं नाम दसमो धयाइ समापतम सतु सुभम सतु ॥१०॥३५४॥

हुसैनी जुध कथनं ॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

गयो खानजादा पिता पास भजं ॥

सकै ज्वाबु दै न हने सूर लजं ॥

तहा ठोकि बाहा हुसैनी गरजियं ॥

सूर लै कै सिला साज सजियं ॥१॥

करियो जोरि सैनं हुसैनी पयानं ॥

प्रथम कूटि कै लूट लीने अवानं ॥

पुनरि डढवालं कीयो जीति जेरं ॥

करे बंदि कै राज पुत्रान चेरं ॥२॥

पुनरि दून को लूट लीनो सुधारं ॥

कोई सामुहे ह्वै सकियो न गवारं ॥

लीयो छीन अंनं दलं बाटि दीयं ॥

महा मूड़ियं कुतसतं काज कीयं ॥३॥

दोहरा ॥

कितक दिवस बीतत भए; करत उसै उतपात ॥

गुआलेरीयन की परत भी; आनि मिलन की बात ॥४॥

जौ दिन दुइक न वे मिलत; तब आवत अरिराइ ॥

कालि तिनू कै घर बिखै; डारी कलह बनाइ ॥५॥

चौपई ॥

गुआलेरीया मिलन कहु आए ॥

राम सिंघ भी संगि सिधाए ॥

चतुरथ आनि मिलत भए जामं ॥

फूटि गई लखि नजरि गुलामं ॥६॥

दोहरा ॥

जैसे रवि के तेज ते; रेत अधिक तपताइ ॥

रवि बल छुद्र न जानई; आपन ही गरबाइ ॥७॥

चौपई ॥

तैसे ही फूल गुलाम जाति भयो ॥

तिनै न द्रिसट तरे आनत भयो ॥

कहलूरीया कटौच संगि लहि ॥

जाना आन न मो सरि महि महि ॥८॥

तिन जो धन आनो थो साथा ॥

ते दे रहे हुसैनी हाथा ॥

देत लेत आपन कुरराने ॥

ते धंनि लै निजि धाम सिधाने ॥९॥

चेरो तबै तेज तन तयो ॥

भला बुरा कछु लखत न भयो ॥

छंदबंद नह नैकु बिचारा ॥

जात भयो दे तबहि नगारा ॥१०॥

दाव घाव तिन नैकु न करा ॥

सिंघहि घेरि ससा कहु डरा ॥

पंद्रह पहरि गिरद तिह कीयो ॥

खान पानि तिन जान न दीयो ॥११॥

खान पान बिनु सूर रिसाए ॥

साम करन हित दूत पठाए ॥

दास निरखि संग सैन पठानी ॥

फूलि गयो तिन की नही मानी ॥१२॥

दस सहंस्र अब ही कै दैहू ॥

नातर मीच मूंड पर लैहू ॥

सिंघ संगतीया तहा पठाए ॥

गोपालै सु धरम दे ल्याए ॥१३॥

तिन के संगि न उन की बनी ॥

तब क्रिपाल चित मो इह गनी ॥

ऐसि घाति फिरि हाथ न ऐ है ॥

सबहूं फेरि समो छलि जै है ॥१४॥

गोपाले सु अबै गहि लीजै ॥

कैद कीजीऐ कै बध कीजै ॥

तनिक भनक जब तिन सुनि पाई ॥

निज दल जात भयो भट राई ॥१५॥

मधुभार छंद ॥

जब गयो गुपाल ॥

कुपियो क्रिपाल ॥

हिमत हुसैन ॥

जुमै लुझैन ॥१६॥

करि कै गुमान ॥

जुमै जुआन ॥

बजे तबल ॥

दुंदभ दबल ॥१७॥

बजे निसाण ॥

नचे किकाण ॥

बाहै तड़ाक ॥

उठै कड़ाक ॥१८॥

बजे निसंग ॥

गजे निहंग ॥

छुटै क्रिपान ॥

लिटै जुआन ॥१९॥

तुपक तड़ाक ॥

कैबर कड़ाक ॥

सैहथी सड़ाक ॥

छोही छड़ाक ॥२०॥

गजे सुबीर ॥

बजे गहीर ॥

बिचरे निहंग ॥

जैसे पलंग ॥२१॥

हुके किकाण ॥

धुके निसाण ॥

बाहै तड़ाक ॥

झलै झड़ाक ॥२२॥

जुझे निहंग ॥

लिटै मलंग ॥

खुल्हे किसार ॥

जनु जटा धार ॥२३॥

सजे रजिंद्र ॥

गजे गजिंद्र ॥

उतरे खान ॥

लै लै कमान ॥२४॥

त्रिभंगी छंद ॥

कुपियो क्रिपालं सजि मरालं; बाह बिसाल धरि ढालं ॥

धाए सभ सूरं रूप करूरं; मचकत नूरं मुखि लालं ॥

लै लै सु क्रिपानं बाण कमाणं; सजे जुआनं तन ततं ॥

रणि रंग कलोलं मार ही बोलै; जनु गज डोलं बनि मतं ॥२५॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

तबै कोपीयं कांगड़ेसं कटोचं ॥

मुखं रकत नैनं तजे सरब सोचं ॥

उतै उठीयं खान खेतं खतंगं ॥

मनो बिहचरे मास हेतं पलंगं ॥२६॥

बजी भेर भुंकार तीरं तड़के ॥

मिले हथि बंथं क्रिपाणं कड़के ॥

बजे जंग नीसाण कथे कथीरं ॥

फिरै रुंड मुडं तनं तछ तीरं ॥२७॥

उठै टोप टूकं गुरजै प्रहारे ॥

रुले लुथ जुथं गिरे बीर मारे ॥

परै कतीयं घात निरघात बीरं ॥

फिरै रुड मुंडं तनं तन तीरं ॥२८॥

बही बाहु आघात निरघात बाणं ॥

उठे नद नादं कड़के क्रिपाणं ॥

छके छोभ छत्र तजै बाण राजी ॥

बहे जाहि खाली फिरै छूछ ताजी ॥२९॥

जुटे आप मै बीर बीरं जुझारे ॥

मनो गज जुटै दंतारे दंतारे ॥

किधो सिंघ सो सारदूलं अरुझे ॥

तिसी भांति किरपाल गोपाल जुझे ॥३०॥

हरी सिंघ धायो तहा एक बीरं ॥

सहे देह आपं भली भांति तीरं ॥

महा कोप कै बीर ब्रिंदं संघारे ॥

बडो जुध कै देव लोकं पधारे ॥३१॥

हठियो हिमतं किमतं लै क्रिपानं ॥

लए गुरज चलं सु जलाल खानं ॥

हठे सूरमा मत जोधा जुझारं ॥

परी कुट कुटं उठी ससत्र झारं ॥३२॥

रसावल छंद ॥

जसंवाल धाए ॥

तुरंगं नचाए ॥

लयो घेरि हुसैनी ॥

हन्यो सांग पैनी ॥३३॥

तिनू बाण बाहे ॥

बडे सैन गाहे ॥

जिसै अंगि लाग्यो ॥

तिसे प्राण त्याग्यो ॥३४॥

जबै घाव लाग्यो ॥

तबै कोप जाग्यो ॥

स्मभारी कमाणं ॥

हणे बीर बाणं ॥३५॥

चहूं ओर ढूके ॥

मुखं मार कूके ॥

न्रिभै ससत्र बाहै ॥

दोऊ जीत चाहै ॥३६॥

रिसे खानजादे ॥

महा मद मादे ॥

महा बाण बरखे ॥

सभे सूर हरखे ॥३७॥

करै बाण अरचा ॥

धनुर बेद चरचा ॥

सु सांगं सम्हालं ॥

करै तउन ठामं ॥३८॥

बली बीर रुझे ॥

समुह ससत्र जुझे ॥

लगै धीर धकै ॥

क्रिपाणं झनकै ॥३९॥

कड़कै कमाणं ॥

झणकै क्रिपाणं ॥

कड़कार छुटै ॥

झणंकार उठै ॥४०॥

हठी ससत्र झारे ॥

न संका बिचारे ॥

करे तीर मारं ॥

फिरै लोह धारं ॥४१॥

नदी स्रोण पूरं ॥

फिरै गैणि हूरं ॥

उभे खेत पालं ॥

बके बिकरालं ॥४२॥

पाधड़ी छंद ॥

तह हड़ हड़ाइ हसे मसाण ॥

लिटे गजिंद्र छुटे किकराण ॥

जुटे सु बीर तह कड़क जंग ॥

छुटी क्रिपाण बुठे खतंग ॥४३॥

डाकन डहकि चावड चिकार ॥

काकं कहकि बजै दुधार ॥

खोलं खड़कि तुपकि तड़ाकि ॥

सैथं सड़क धकं धहाकि ॥४४॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

तहा आप कीनो हुसैनी उतारं ॥

सभु हाथि बाणं कमाणं स्मभारं ॥

रुपे खान खूनी करै लाग जुधं ॥

मुखं रकत नैणं भरे सूर क्रुधं ॥४५॥

जगियो जंग जालम सु जोधं जुझारं ॥

बहे बाण बांके बरछी दुधारं ॥

मिले बीर बीरं महा धीर बंके ॥

धका धकि सैथं क्रिपाणं झनंके ॥४६॥

भए ढोल ढंकार नदं नफीरं ॥

उठे बाहु आघात गजै सुबीरं ॥

नवं नद नीसान बजे अपारं ॥

रुले तछ मुछं उठी ससत्र झारं ॥४७॥

टका टुक टोपं ढका ढुक ढालं ॥

महा बीर बानैत बकै बिक्रालं ॥

नचे बीर बैतालयं भूत प्रेतं ॥

नची डाकिणी जोगनी उरध हेतं ॥४८॥

छुटी जोगतारी महा रुद्र जागे ॥

डगियो धिआन ब्रहमं सभै सिध भागे ॥

हसे किंनरं जछ बिदिआधरेयं ॥

नची अछरा पछरा चारणेयं ॥४९॥

परियो घोर जुधं सु सैना परानी ॥

तहा खां हुसैनी मंडिओ बीर बानी ॥

उतै बीर धाए सु बीरं जस्वारं ॥

सबै बिउत डारे बगा से अस्वारं ॥५०॥

तहा खां हुसैनी रहियो एक ठाढं ॥

मनो जुध ख्मभं रणभूम गाडं ॥

जिसै कोप कै कै हठी बाणि मारियो ॥

तिसै छेद कै पैल पारे पधारियो ॥५१॥

सहे बाण सूरं सभै आण ढूकै ॥

चहूं ओर तै मार ही मार कूकै ॥

भली भांति सो असत्र अउ ससत्र झारे ॥

गिरे भिसत को खां हुसैनी सिधारे ॥५२॥

दोहरा ॥

जबै हुसैनी जुझियो; भयो सूर मन रोसु ॥

भाजि चले अवरै सबै; उठियो कटोचन जोस ॥५३॥

चौपई ॥

कोपि कटोचि सबै मिलि धाए ॥

हिमति किमति सहित रिसाए ॥

हरी सिंघ तब कीया उठाना ॥

चुनि चुनि हने पखरीया जुआना ॥५४॥

नराज छंद ॥

तबै कटोच कोपीयं ॥

स्मभार पाव रोपीयं ॥

सरक ससत्र झार ही ॥

सु मारि मारि उचार ही ॥५५॥

चंदेल चौपीयं तबै ॥

रिसात धात भे सबै ॥

जिते गए सु मारीयं ॥

बचे तिते सिधारीयं ॥५६॥

दोहरा ॥

सात सवारन कै सहित; जूझे संगत राइ ॥

दरसो सुनि जुझै तिनै; बहुरि जुझत भयो आइ ॥५७॥

हिमत हूं उतरियो तहा; बीर खेत मझार ॥

केतन के तनि घाइ सहि; केतनि के तनि झारि ॥५८॥

बाज तहा जूझत भयो; हिमत गयो पराइ ॥

लोथ क्रिपालहि की नमित; कोपि परे अरि राइ ॥५९॥

रसावल छंद ॥

बली बैर रुझै ॥

समुहि सार जुझै ॥

क्रिपा राम गाजी ॥

लरियो सैन भाजी ॥६०॥

महा सैन गाहै ॥

न्रिभै ससत्र बाहै ॥

घनियो काल कै कै ॥

चलै जस लै कै ॥६१॥

बजे संख नादं ॥

सुरं निरबिखादं ॥

बजे डौर डढं ॥

हठे ससत्र कढं ॥६२॥

परी भीर भारी ॥

जुझै छत्र धारी ॥

मुखं मुछ बंकं ॥

मंडे बीर हंकं ॥६३॥

मुखं मारि बोलै ॥

रणं भूमि डोलै ॥

हथियारं स्मभारै ॥

उभै बाज डारै ॥६४॥

दोहरा ॥

रण जुझत किरपाल कै; नाचत भयो गुपाल ॥

सैन सबै सिरदार दै; भाजत भई बिहाल ॥६५॥

खान हुसैन क्रिपाल के; हिमत रणि जूझंत ॥

भाजि चले जोधा सबै; जिम दे मुकट महंत ॥६६॥

चौपई ॥

इह बिधि सत्र सबै चुनि मारे ॥

गिरे आपने सूर स्मभारे ॥

तह घाइल हिमंत कह लहा ॥

राम सिंघ गोपाल सिउ कहा ॥६७॥

जिनि हिमत अस कलह बढायो ॥

घाइल आजु हाथ वह आयो ॥

जब गुपाल ऐसे सुनि पावा ॥

मारि दीयो जीअत न उठावा ॥६८॥

जीत भई रन भयो उजारा ॥

सिम्रित करि सभ घरो सिधारा ॥

राखि लीयो हम को जगराई ॥

लोह घटा अन ते बरसाई ॥६९॥

इति स्री बचित्र नाटक गंथे हुसैन बधह क्रिपाल हिमत संगतीआ बध बरननं नाम गिआरमो धिआइ समापतम सतु सुभम सतु ॥११॥अफजू॥४२३॥

चौपई ॥

जुध भयो इह भांति अपारा ॥

तुरकन को मारियो सिरदारा ॥

रिस तन खान दिलावर तए ॥

इतै सऊर पठावत भए ॥१॥

उतै पठिओ उनि सिंघ जुझारा ॥

तिह भलान ते खेदि निकारा ॥

इत गज सिंघ पमा दल जोरा ॥

धाइ परे तिन उपर भोरा ॥२॥

उतै जुझार सिंघ भयो आडा ॥

जिम रन ख्मभ भूमि रनि गाडा ॥

गाडा चलै न हाडा चलि है ॥

सामुहि सेल समर मो झलि है ॥३॥

बाटि चड़ै दल दोऊ जुझारा ॥

उते चंदेल इते जसवारा ॥

मंडियो बीर खेत मो जुधा ॥

उपजियो समर सूरमन क्रुधा ॥४॥

कोप भरे दोऊ दिस भट भारे ॥

इतै चंदेल उतै जसवारे ॥

ढोल नगारे बजे अपारा ॥

भीम रूप भैरो भभकारा ॥५॥

रसावल छंद ॥

धुणं ढोल बजे ॥

महा सूर गजे ॥

करे ससत्र घावं ॥

चड़े चित चावं ॥६॥

न्रिभै बाज डारै ॥

परघै प्रहारे ॥

करे तेग घायं ॥

चड़े चित चायं ॥७॥

बकै मार मारं ॥

न संका बिचारं ॥

रुलै तछ मुछं ॥

करै सुरग इछं ॥८॥

दोहरा ॥

नैक न रन ते मुरि चले; करै निडर ह्वै घाइ ॥

गिरि गिरि परै पवंग ते; बरे बरंगन जाइ ॥९॥

चौपई ॥

इह बिधि होत भयो संग्रामा ॥

जूझे चंद नराइन नामा ॥

तब जुझार एकल ही धयो ॥

बीरन घेरि दसो दिसि लयो ॥१०॥

दोहरा ॥

धस्यो कटक मै झटक दै; कछू न संक बिचार ॥

गाहत भयो सुभटन बडि; बाहति भयो हथिआर ॥११॥

चौपई ॥

इह बिधि, घने घरन को गारा ॥

भांति भांति के करे हथियारा ॥

चुनि चुनि बीर पखरीआ मारे ॥

अंति, देवपुरि आप पधारे ॥१२॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे जुझार सिंघ जुध बरननं नाम द्वादसमो धिआइ समापतम सतु सुभम सतु ॥१२॥४३५॥


ਸਹਜਾਦੇ ਕੋ ਆਗਮਨ ਮਦ੍ਰ ਦੇਸ ॥ सहजादे को आगमन मद्र देस ॥ चौपई ॥

इह बिधि सो बध भयो जुझारा ॥

आन बसे तब धामि लुझारा ॥

तब अउरंग मन माहि रिसावा ॥

मद्र देस को पूत पठावा ॥१॥

तिह आवत सभ लोक डराने ॥

बडे बडे गिरि हेरि लुकाने ॥

हम हूं लोगन अधिक डरायो ॥

काल करम को मरम न पायो ॥२॥

कितक लोक तजि संगि सिधारे ॥

जाइ बसे गिरिवर जह भारे ॥

चित मूजीयन को अधिक डराना ॥

तिनै, उबार न अपना जाना ॥३॥

तब अउरंग जीअ माझ रिसाए ॥

एक अहदीआ ईहा पठाए ॥

हम ते भाजि बिमुख जे गए ॥

तिन के धाम गिरावत भए ॥४॥

जे आपने गुर ते मुख फिर है ॥

ईहा ऊहा तिन के ग्रिहि गिरि है ॥

इहा उपहास, न सुरपुरि बासा ॥

सभ बातन ते रहे निरासा ॥५॥

दूख भूख तिन को रहै लागी ॥

संत सेव ते जो है तिआगी ॥

जगत बिखै, कोई काम न सरही ॥

अंतहि, कुंड नरक की परही ॥६॥

तिन को सदा जगति उपहासा ॥

अंतहि कुंड नरक की बासा ॥

गुर पग ते जे बेमुख सिधारे ॥

ईहा ऊहा तिन के मुख कारे ॥७॥

पुत्र पउत्र तिन के नही फरै ॥

दुख दै मात पिता को मरै ॥

गुर दोखी, सग की म्रितु पावै ॥

नरक कुंड डारे पछुतावै ॥८॥

बाबे के बाबर के दोऊ ॥

आप करै परमेसर सोऊ ॥

दीनसाह इन को पहिचानो ॥

दुनीपति उन को अनुमानो ॥९॥

जो बाबे को दाम न दै है ॥

तिन ते गहि, बाबर के लै है ॥

दै दै तिन को बडी सजाइ ॥

पुनि लै है ग्रहि लूट बनाइ ॥१०॥

जब ह्वै है बेमुख बिना धन ॥

तबि चड़ि है सिखन कह मागन ॥

जे जे सिख तिनै धन दै है ॥

लूटि मलेछ तिनू कौ लै है ॥११॥

जब हुइ है तिन दरब बिनासा ॥

तब धरि है निजि गुर की आसा ॥

जब ते गुर दरसन को ऐ है ॥

तब तिन को गुर मुखि न लगै है ॥१२॥

बिदा बिना जै है तब धामं ॥

सरि है कोई न तिन को कामं ॥

गुर दरि ढोई न प्रभु पुरि वासा ॥

दुहूं ठउर ते रहे निरासा ॥१३॥

जे जे गुर चरनन रत ह्वै है ॥

तिन को कसटि न देखन पै है ॥

रिधि सिधि तिन के ग्रिह माही ॥

पाप ताप छ्वै सकै न छाही ॥१४॥

तिह मलेछ छ्वै है नही छाहा ॥

असट सिध ह्वै है घरि माहा ॥

हास करत जो उदम उठै है ॥

नवो निधि तिन के घरि ऐ है ॥१५॥

मिरजा बेग हुतो तिह नामं ॥

जिनि ढाहे बेमुखन के धामं ॥

सभ सनमुख गुर आप बचाए ॥

तिन के बार न बांकन पाए ॥१६॥

उत अउरंग जीय अधिक रिसायो ॥

चार अहदीयन अउर पठायो ॥

जे बेमुख ता ते बचि आए ॥

तिन के ग्रिह पुनि इनै गिराए ॥१७॥

जे तजि भजे हुते गुर आना ॥

तिन पुनि गुरू अहदीअहि जाना ॥

मूत्र डार तिन सीस मुंडाए ॥

पाहुरि जानि ग्रिहहि लै आए ॥१८॥

जे जे भाजि हुते बिनु आइसु ॥

कहो, अहदीअहि किनै बताइसु? ॥

मूंड मूंडि करि सहरि फिराए ॥

कार भेट जनु लैन सिधाए ॥१९॥

पाछै लागि लरिकवा चले ॥

जानुक सिख सखा है भले ॥

छिके तोबरा बदन चड़ाए ॥

जनु ग्रिहि खान मलीदा आए ॥२०॥

मसतकि सुभे पनहीयन घाइ ॥

जनु करि टीका दए बलाइ ॥

सीस ईंट के घाइ करेही ॥

जनु तिनु भेट पुरातन देही ॥२१॥

दोहरा ॥

कबहूं रण जूझ्यो नही; कछु दै जसु नही लीन ॥

गाव बसति जान्यो नही; जम सो किन कहि दीन ॥२२॥

चौपई ॥

इह बिधि तिनो भयो उपहासा ॥

सभ संतन मिलि लखिओ तमासा ॥

संतन कसट न देखन पायो ॥

आप हाथ दै नाथि बचायो ॥२३॥

चारणी दोहिरा ॥

जिस नो साजन राखसी; दुसमन कवन बिचार ॥

छ्वै न सकै तिह छाहि कौ; निहफल जाइ गवार ॥२४॥

जे साधू सरनी परे; तिन के कवण बिचार ॥

दंति जीभ जिम राखि है; दुसट अरिसट संघारि ॥२५॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे साहजादे व अहदी आगमन बरननं नाम त्रोदसमो धिआइ समापतम सतु सुभम सतु ॥१३॥४६०॥


चौपई ॥

सरब काल सभ साध उबारे ॥

दुखु दै कै दोखी सभ मारे ॥

अदभुति गति भगतन दिखराई ॥

सभ संकट ते लए बचाई ॥१॥

सभ संकट ते संत बचाए ॥

सभ संकट कंटक जिम घाए ॥

दास जान मुरि करी सहाइ ॥

आप हाथु दै लयो बचाइ ॥२॥

अब जो जो मै लखे तमासा ॥

सो सो करो तुमै अरदासा ॥

जो प्रभ ! क्रिपा कटाछि दिखै है ॥

सो तव दास उचारत जै है ॥३॥

जिह जिह बिध मै लखे तमासा ॥

चहत तिन को कीयो प्रकासा ॥

जो जो जनम पूरबले हेरे ॥

कहिहो सु प्रभु पराक्रम तेरे ॥४॥

सरब काल है पिता अपारा ॥

देबि कालिका मात हमारा ॥

मनूआ गुर मुरि मनसा माई ॥

जिनि मो को सुभ क्रिआ पड़ाई ॥५॥

जब मनसा मन मया बिचारी ॥

गुरु मनूआ कह कह्यो सुधारी ॥

जे जे चरित पुरातन लहे ॥

ते ते अब चहीअत है कहे ॥६॥

सरब काल करुणा तब भरे ॥

सेवक जानि दया रस ढरे ॥

जो जो जनमु पूरबलो भयो ॥

सो सो सभ सिमरण करि दयो ॥७॥

मो को इती हुती कह सुधं ॥

जस प्रभ दई क्रिपा करि बुधं ॥

सरब काल तब भए दइआला ॥

लोह रछ हम को सब काला ॥८॥

सरब काल रछा सभ काल ॥

लोह रछ सरबदा बिसाल ॥

ढीठ भयो तव क्रिपा लखाई ॥

ऐंडो फिरे सभन भयो राई ॥९॥

जिह जिह बिधि जनमन सुधि आई ॥

तिम तिम कहे गिरंथ बनाई ॥

प्रथमे सतिजुग जिह बिधि लहा ॥

प्रथमे देबि चरित्र को कहा ॥१०॥

पहिले चंडी चरित्र बनायो ॥

नख सिख ते क्रम भाख सुनायो ॥

छोर कथा तब प्रथम सुनाई ॥

अब चाहत फिर करौ बडाई ॥११॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे सरब काल की बेनती बरननं नाम चौदसमो धिआइ समापतम सतु सुभम सतु ॥१४॥४७१॥