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दसम ग्रन्थ/ब्रह्मा अवतार

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ਬ੍ਰਹਮਾ ਅਵਤਾਰ ॥ ब्रहमा अवतार ॥ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥


ਅਥ ਬ੍ਰਹਮਾ ਅਵਤਾਰ ਕਥਨੰ ॥ अथ ब्रहमा अवतार कथनं ॥ पातिसाही १० ॥

तोमर छंद ॥

सतिजुगि फिरि उपराजि ॥

सब नउतनै करि साज ॥

सब देस अउर बिदेस ॥

उठि धरम लागि नरेस ॥१॥

कलि काल कोपि कराल ॥

जगु जारिआ तिह ज्वाल ॥

बिनु तासु और न कोई ॥

सब जाप जापो सोइ ॥२॥

जे जाप है, कलि नामु ॥

तिसु, पूरन हुइ है काम ॥

तिसु, दूख भूख न पिआस ॥

निति हरखु, कहूं न उदास ॥३॥

बिनु एक, दूसर नाहि ॥

सभ रंग रूपन माहि ॥

जिन जापिआ, तिहि जापु ॥

तिन के सहाई आप ॥४॥

जे तासु नाम जपंत ॥

कबहूं न भाजि चलंत ॥

नहि त्रासु ता को सत्र ॥

दिसि जीति है गहि अत्र ॥५॥

तिह भरे धन सो धाम ॥

सभ होहि पूरन काम ॥

जे एक नामु जपंत ॥

नाहि काल फासि फसंत ॥६॥

जे जीव जंत अनेक ॥

तिन मो रह्यो रमि एक ॥

बिनु एक दूसर नाहि ॥

जगि जानि लै जीअ माहि ॥७॥

भव गड़न भंजन हार ॥

है एक ही करतार ॥

बिनु एक अउरु न कोइ ॥

सब रूप रंगी सोइ ॥८॥

कई इंद्र पानपहार ॥

कई ब्रहम बेद उचार ॥

कई बैठि दुआरि महेस ॥

कई सेसनाग असेस ॥९॥

कई सूर चंद सरूप ॥

कई इंद्र की सम भूप ॥

कई इंद्र उपिंद्र मुनिंद्र ॥

कई मछ कछ फनिंद्र ॥१०॥

कई कोटि क्रिसन अवतार ॥

कई राम बार बुहार ॥

कई मछ कछ अनेक ॥

अविलोक दुआरि बिसेख ॥११॥

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कई सुक्र ब्रसपति देखि ॥

कई दत गोरख भेख ॥

कई राम क्रिसन रसूल ॥

बिनु नाम को न कबूल ॥१२॥

बिनु एकु आस्रै नाम ॥

नही और कौनै काम ॥

जे मानि है गुरदेव ॥

ते जानि है अनभेव ॥१३॥

बिनु तासु और न जानु ॥

चित आन भाव न आनु ॥

इक मानि जै करतार ॥

जितु होइ अंति उधारु ॥१४॥

बिनु तास यौ न उधारु ॥

जीअ देखि यार बिचारि ॥

जो जापि है कोई और ॥

तब छूटि है वह ठौर ॥१५॥

जिह राग रंग न रूप ॥

सो मानीऐ सम रूप ॥

बिनु एक ता कर नाम ॥

नहि जान दूसर धाम ॥१६॥

जो लोक अलोक बनाइ ॥

फिर लेत आपि मिलाइ ॥

जो चहै देह उधारु ॥

सो भजन एकंकार ॥१७॥

जिनि राचियो ब्रहमंड ॥

सब लोक औ नव खंड ॥

तिह किउ न जाप जपंत? ॥

किम जान कूपि परंत? ॥१८॥

जड़ ! जाप ता कर जाप ॥

जिनि लोक चउदहं थाप ॥

तिसु जापीऐ नित नाम ॥

सभ होहि पूरन काम ॥१९॥

गनि चउबिसै अवतार ॥

बहु कै कहे बिसथार ॥

अब गनो उप अवतार ॥

जिमि धरे रूप मुरार ॥२०॥

जे धरे ब्रहमा रूप ॥

ते कहों काबि अनूप ॥

जे धरे रुद्र अवतार ॥

अब कहों ताहि बिचार ॥२१॥

कलि तासु आगिआ दीन ॥

तब बेद ब्रहमा कीन ॥

तब तासु बाढ्यो गरब ॥

सरि आपु जान न सरब ॥२२॥

सरि मोह कबि नहि कोइ ॥

इक आप होइ त होइ ॥

कछु काल की भूअ बक्र ॥

छिति डारीआ जिम सक्र ॥२३॥

जब गिर्यो भू तरि आनि ॥

मुख चार बेद निधान ॥

उठि लागिआ फिर सेव ॥

जीअ जानि देवि अभेव ॥२४॥

दस लख बरख प्रमान ॥

कीअ देवि सेव महान ॥

किमि होइ मोहि उधार ॥

अस देहु देव बिचार ॥२५॥

देवो वाच ब्रहमा प्रति ॥

मन चित कै करि सेव ॥

तब रीझि है गुरदेव ॥

तब होइ नाथ सनाथ ॥

जगनाथ दीना नाथ ॥२६॥

सुनि बैन यौ मुखचार ॥

कीअ चउक चिति बिचार ॥

उठि लागिआ हरि सेव ॥

जिह भांति भाख्यो देव ॥२७॥

परि पाइ चंडि प्रचंड ॥

जिह मंड दुसट अखंड ॥

ज्वालाछ लोचन धूम ॥

हनि जासु डारे भूमि ॥२८॥

तिसु जापि हो जब जाप ॥

तब होइ पूरन स्राप ॥

उठि लाग काल जपंन ॥

हठि तिआग आव सरंन ॥२९॥

जे जात तासु सरंनि ॥

ते है धरा मै धनि ॥

तिन कउ न कउनै त्रास ॥

सब होत कारज रास ॥३०॥

दस लछ बरख प्रमान ॥

रह्यो ठांढ एक पगान ॥

चित लाइ कीनी सेव ॥

तब रीझि गे गुरदेव ॥३१॥

जब भेत देवी दीन ॥

तब सेव ब्रहमा कीन ॥

जब सेव की चित लाइ ॥

तब रीझि गे हरि राइ ॥३२॥

तब भयो सु ऐस उचार ॥

हउ आहि ग्रब प्रहार ॥

मम गरब कहूं न छोरि ॥

सभ कीन जेर मरोरि ॥३३॥

तै गरब कीन सु काहि? ॥

नहि मोह भावत ताहि ॥

अब कहो एक बिचार ॥

जिमि होइ तोहि उधार ॥३४॥

धरि सपत भूमि वतार ॥

तब होइ तोहि उधारि ॥

सोई मान ब्रहमा लीन ॥

धरि जनम जगति नवीन ॥३५॥

मुरि निंद उसतति तूलि ॥

इमि जानि जीय जिनि भूलि ॥

इक कहो और बिचार ॥

सुनि लेहु ब्रहम कुमार ! ॥३६॥

इक बिसनु मोहि धिआन ॥

बहु सेवि मोहि रिझान ॥

तिनि मागिआ बर ऐस ॥

मम दीन ता कहु तैस ॥३७॥

मम तास भेद न कोइ ॥

सब लोक जानत सोइ ॥

तिह जान है करतार ॥

सब लोक अलोक पहार ॥३८॥

जब जब धरे बपु सोइ ॥

जो जो पराक्रम होइ ॥

सो सो कथौ अबिचार ॥

सुनि लेहु ब्रहम कुमार ! ॥३९॥

नराज छंद ॥

सु धारि मानुखी बपुं; स्मभारि राम जागि है ॥

बिसारि ससत्र असत्रणं; जुझार सत्रु भागि है ॥

बिचार जौन जौन भयो; सुधारि सरब भाखीयो ॥

हजार कोऊ न कियो करो; बिचारि सबद राखीयो ॥४०॥

चितारि बैण वाकिसं; बिचारि बालमीक भयो ॥

जुझार रामचंद्र को; बिचार चारु उचर्यो ॥

सु सपत कांडणो कथ्यो; असकत लोकु हुइ रह्यो ॥

उतार चत्रआननो; सुधारि ऐस कै कह्यो ॥४१॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे ब्रहमा प्रति आगिआ समापतं ॥

नराज छंद ॥

सु धारि अवतार को; बिचार दूज भाखि है ॥

बिसेख चत्रान के; असेख स्वाद चाखि है ॥

अकरख देवि कालिका; अनिरख सबद उचरो ॥

सु बीन बीन कै बडे; प्राबीन अछ्र को धरो ॥१॥

बिचारि आदि ईस्वरी; अपार सबदु राखीऐ ॥

चितारि क्रिपा काल की; जु चाहीऐ, सु भाखीऐ ॥

न संक चिति आनीऐ; बनाइ आप लेहगे ॥

सु क्रित काबि क्रित की; कबीस और देहगे ॥२॥

समान गुंग के कवि; सु कैसे काबि भाख है? ॥

अकाल काल की क्रिपा; बनाइ ग्रंथ राखि है ॥

सु भाख्य कउमदी पड़े; गुनी असेख रीझ है ॥

बिचारि आपनी क्रितं; बिसेख चिति खीझि है ॥३॥

बचित्र काब्य की कथा; पवित्र आज भाखीऐ ॥

सु सिध ब्रिध दाइनी; सम्रिध बैन राखीऐ ॥

पवित्र निरमली महा; बचित्र काब्य कथीऐ ॥

पवित्र सबद ऊपजै; चरित्र कौ न किजीऐ ॥४॥

सु सेव काल देव की; अभेव जानि कीजीऐ ॥

प्रभात उठि तासु को; महात नाम लीजीऐ ॥

असंख दान देहिगो; दुरंत सत्रु घाइ है ॥

सु पान राखि आपनो; अजान को बचाइ है ॥५॥

न संत बार बाकि है; असंत जूझि है बली ॥

बिसेख सैन भाज है; सितंस रेण निरदली ॥

कि आनि आपु हाथ दै; बचाइ मोहि लेहिंगे ॥

दुरंत घाट अउघटे; कि देखनै न देहिंगे ॥६॥

इति अवतार बालमीक प्रिथम समापतं ॥१॥

दुतीया अवतार ब्रहमा कसप कथनं ॥

पाधड़ी छंद ॥

पुनि धरा ब्रहम कसप वतार ॥

स्रुति करे पाठ त्रीअ बरी चार ॥

मथनी स्रिसटि कीनी प्रगास ॥

उपजाइ देव दानव सु बास ॥७॥

जो भए रिखि ह्वै गे वतार ॥

तिन को बिचार किनो बिचार ॥

स्रुति करे बेद अरु धरे अरथ ॥

कर दए दूर भूअ के अनरथ ॥८॥

इह भांति कीन दूस्र वतार ॥

अब कहो तोहि तीस्र बिचार ॥

जिह भांति धर्यो बपु ब्रहम राइ ॥

सभ कह्यो ताहि नीके सुभाइ ॥९॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे दुतीय अवतारे ब्रहमा कसप समापतं ॥२॥

ਅਥ ਤ੍ਰਿਤੀਆ ਅਵਤਾਰ ਸੁਕ੍ਰ ਕਥਨੰ ॥

अथ त्रितीआ अवतार सुक्र कथनं ॥ पाधड़ी छंद ॥

पुनि धरा तीसर इह भांति रूप ॥

जगि भयो आन करि दैत भूप ॥

तब देब बंस प्रचुर्यो अपार ॥

कीने सु राज प्रिथमी सुधारि ॥१॥

बड पुत्र जानि किनी सहाइ ॥

तीसर अवतार भइओ सुक्र राइ ॥

निंदा ब्याज उसतती कीन ॥

लखि तासु देवता भए छीन ॥२॥

इति स्री बचित्र नाटक गंथे त्रितीआ अवतार ब्रहमा सुक्र समापतं ॥३॥


ਅਥ ਚਤੁਰਥ ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਚੇਸ ਕਥਨੰ ॥ अथ चतुरथ ब्रहमा बचेस कथनं ॥ पाधड़ी छंद ॥

मिलि दीन देवता लगे सेव ॥

बीते सौ बरख रीझे गुरदेव ॥

तब धरा रूप बाचेस आनि ॥

जीता सुरेस भई असुर हानि ॥३॥

इह भांति धरा चतुरथ वतार ॥

जीता सुरेस हारे दिवार ॥

उठि देव सेव लागे सु सरब ॥

धरि नीच नैन करि दूर गरब ॥४॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे चतुरथ अवतार ब्रहमा बचेस समापतं ॥४॥


ਅਥ ਪੰਚਮੋ ਅਵਤਾਰ ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਆਸ ਮਨੁ ਰਾਜਾ ਕੋ ਰਾਜ ਕਥਨੰ ॥ अथ पंचमो अवतार ब्रहमा बिआस मनु राजा को राज कथनं ॥ पाधड़ी छंद ॥

त्रेता बितीत जुग दुआपुरान ॥

बहु भांति देख खेले खिलान ॥

जब भयो आनि क्रिसनावतार ॥

तब भए ब्यास मुख आनि चार ॥५॥

जे जे चरित्र कीअ क्रिसन देव ॥

ते ते भने सु सारदा तेव ॥

अब कहो तउन संछेप ठानि ॥

जिह भांति कीन स्री अभिराम ॥६॥

जिह भांति कथि कीनो पसार ॥

तिह भांति काबि कथि है बिचार ॥

कहो जैस काब्य कहियो ब्यास ॥

तउने कथान कथो प्रभास ॥७॥

जे भए भूप भूअ मो महान ॥

तिन को सुजान कथत कहान ॥

कह लगे तासि किजै बिचारु? ॥

सुणि लेहु बैण संछेप यार ! ॥८॥

जे भए भूप ते कहे ब्यास ॥

होवत पुराण ते नाम भास ॥

मनु भयो राज महि को भूआर ॥

खड़गन सु पानि महिमा अपार ॥९॥

मानवी स्रिसटि किनी प्रकास ॥

दस चार लोक आभा अभास ॥

महिमा अपार बरने सु कउन? ॥

सुणि स्रवण क्रित हुइ रहै मउन ॥१०॥

दस चार चारि बिदिआ निधान ॥

अरि जीति जीति दिनो निसान ॥

मंडे महीप मावास खेति ॥

गजे मसाण नचे परेत ॥११॥

जिते सु देस एसुर मवास ॥

किने खराब खाने ख्वास ॥

भंडे अभंड मंडे महीप ॥

दिने निकार छिने सु दीप ॥१२॥

खंडे सु खेति खूनी खत्रीयाण ॥

मोरे अमोर जोधा दुराण ॥

चले अचल मंडे अमंड ॥

किने घमंड खंडे प्रचंड ॥१३॥

किने सु जेर खूनी खत्रेस ॥

मंडे महीप मावास देस ॥

इह भांति दीह दोही फिराइ ॥

मानी सु मानि मनु राज राइ ॥१४॥

इह भांति दीह करि देस राज ॥

बहु करे जगि अरु होम साज ॥

बहु भांति स्वरण करि कै सु दान ॥

गोदान आदि बिधवत सनान ॥१५॥

जो हुती जग अरु बेद रीति ॥

सो करी सरब न्रिप लाइ प्रीति ॥

भूआ दान दान रतनादि आदि ॥

तिन भांति भांति लिने सुवाद ॥१६॥

करि देस देस इमि नीति राज ॥

बहु भांति दान दे सरब साज ॥

हसतादि दत बाजादि मेध ॥

ते भांति भांति किने न्रिपेध ॥१७॥

बहु साज बाज दिने दिजान ॥

दस चारु चारु बिदिआ सुजान ॥

खट चार सासत्र सिम्रित रटंत ॥

कोकादि भेद बीना बजंत ॥१८॥

घनसार घोरि घसीअत गुलाब ॥

म्रिग मदित डारि चूवत सराब ॥

कसमीर घास घोरत सुबास ॥

उघटत सुगंध महकंत अवास ॥१९॥

संगीत पाधरी छंद ॥

तागड़दं ताल बाजत मुचंग ॥

बीना सु बैण बंसी म्रिदंग ॥

डफ ताल तुरी सहिनाइ राग ॥

बाजंत जान उपनत सुहाग ॥२०॥

कहूं ताल तूर बीना म्रिदंग ॥

डफ झाझ ढोल जलतर उपंग ॥

जह जह बिलोक तह तह सुबास ॥

उठत सुगंध महकंत अवास ॥२१॥

हरि बोल मना छंद ॥

मनु राज कर्यो ॥

दुख देस हर्यो ॥

बहु साज सजे ॥

सुनि देव लजे ॥२२॥

इति स्री बचित्र नाटके मनु राजा को राज समापतं ॥१॥५॥

ਅਥ ਪ੍ਰਿਥੁ ਰਾਜਾ ਕੋ ਰਾਜ ਕਥਨੰ ॥

अथ प्रिथु राजा को राज कथनं ॥ तोटक छंद ॥

कहं लाग गनो न्रिप जौन भए ॥

प्रभु जोतहि जोति मिलाइ लए ॥

पुनि स्री प्रिथराज प्रिथीस भयो ॥

जिनि बिपन दान दुरंत दयो ॥२३॥

दलु लै दिन एक सिकार चड़े ॥

बनि निरजन मो लखि बाघ बड़े ॥

तह नारि सुकुंतल तेज धरे ॥

ससि सूरज की लखि क्रांति हरे ॥२४॥

हरि बोल मना छंद ॥

तह जात भए ॥

म्रिग घात कए ॥

इक देखि कुटी ॥

जनु जोग जुटी ॥२५॥

तह जात भयो ॥

संग को न लयो ॥

लखि नारि खरी ॥

रस रीति भरी ॥२६॥

अति सोभत है ॥

लखि लोभत है ॥

न्रिप पेखि जबै ॥

चिति चउक तबै ॥२७॥

इह कउन जई? ॥

जनु रूप मई ॥

छबि देखि छक्यो ॥

चित चाइ चक्यो ॥२८॥

न्रिप बांह गही ॥

त्रीअ मोन रही ॥

रस रीति रच्यो ॥

दुहूं मैन मच्यो ॥२९॥

बहु भांति भजी ॥

निस लौ न तजी ॥

दोऊ रीझि रहे ॥

नही जात कहे ॥३०॥

रस रीति रच्यो ॥

कल केल मच्यो ॥

अमितासन दे ॥

सुख रासन से ॥३१॥

ललतासन लै ॥

बिबधासन कै ॥

ललना रु लला ॥

करि काम कला ॥३२॥

करि केल उठी ॥

मधि परन कुटी ॥

न्रिप जात भयो ॥

तिह गरभ रहियो ॥३३॥

दिन कै कु गए ॥

तिनि भूर जए ॥

तनि कउच धरे ॥

ससि सोभ हरे ॥३४॥

जनु ज्वाल दवा ॥

अस तेज भवा ॥

रिखि जौन पिखै ॥

चित चउक चकै ॥३५॥

सिसु स्यान भयो ॥

करि संग लयो ॥

चलि आव तहा ॥

तिह तात जहा ॥३६॥

न्रिप देखि जबै ॥

करि लाज तबै ॥

यह मो न सूअं ॥

त्रीअ ! कौन तूअं? ॥३७॥

त्रीयो बाच राजा प्रति ॥

हरि बोल मना छंद ॥

न्रिप ! नारि सुई ॥

तुम जौन भजी ॥

मधि परन कुटी ॥

तह केल ठटी ॥३८॥

तब बाच दीयो ॥

अब भूलि गयो ॥

तिस चित करो ॥

मुहि राज ! बरो ॥३९॥

तब काहि भजो? ॥

अब मोहि तजो ॥

इह पूत तुअं ॥

सुनु साच न्रिपं ! ॥४०॥

नहि स्राप तुझै ॥

भज कैब मुझै ॥

अब तो न तजो ॥

नहि लाज लजो ॥४१॥

न्रिप बाच त्रीया सो ॥

कोई चिन बताउ ॥

कितो बात दिखाउ ॥

हउ यौ न भजो ॥

नहि नारि! लजो ॥४२॥

इक मुद्रक लै ॥

न्रिप कै करि दै ॥

इह देखि भलै ॥

कस हेर तलै? ॥४३॥

न्रिप जानि गए ॥

पहिचानत भए ॥

तब तउन बरी ॥

बहु भांति भरी ॥४४॥

सिसु सात भए ॥

रस रूप रए ॥

अमितोज बली ॥

दल दीह दली ॥४५॥

हनि भूप बली ॥

जिणि भूमि थली ॥

रिखि बोलि रजी ॥

बिधि जग सजी ॥४६॥

सुभ करम करे ॥

अरि पुंज हरे ॥

अति सूर महा ॥

नहि और लहा ॥४७॥

अति जोति लसै ॥

ससि क्राति कसै ॥

दिस चार चकी ॥

सुर नारि छकी ॥४८॥

रूआल छंद ॥

गारि गारि अखरब गरबिन; मारि मारि नरेस ॥

जीति जीति अजीत राजन; छीनि देस बिदेस ॥

टारि टारि करोरि पबय; दीन उतर दिसान ॥

सपत सिंधु भए धरा पर; लीक चक्र रथान ॥४९॥

गाहि गाहि अगाह देसन; बाहि बाहि हथियार ॥

तोरि तोरि अतोर भूध्रिक; दीन उत्रहि टार ॥

देस और बिदेस जीति; बिसेख राज कमाइ ॥

अंत जोति सु जोति मो मिलि; जाति भी प्रिथ राइ ॥५०॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे ब्रहमा अवतारे बिआस राजा प्रिथु को राज समापतं ॥२॥५॥


ਅਥ ਰਾਜਾ ਭਰਥ ਰਾਜ ਕਥਨੰ ॥ अथ राजा भरथ राज कथनं ॥ रूआल छंद ॥

जानि अंत समो भयो; प्रिथु राज राज वतार ॥

बोलि सरब सम्रिधि स्मपति; मंत्रि मित्र कुमार ॥

सपत द्वीप सु सपत पुत्रनि; बाट दीन तुरंत ॥

सपत राज करै लगै; सुत सरब सोभावंत ॥५१॥

सपत छत्र फिरै लगै सिर; सपत राज कुमार ॥

सपत इंद्र परे धरा परि; सपत जान अवतार ॥

सरब सासत्र धरी सबै मिलि; बेद रीति बिचारि ॥

दान अंस निकार लीनी; अरथ स्वरथ सुधारि ॥५२॥

खंड खंड अखंड उरबी; बाटि लीनि कुमार ॥

सपत दीप भए पुनिर; नवखंड नाम बिचार ॥

जेसट पुत्र धरी धरा; तिह भरथ नाम बखान ॥

भरथ खंड बखान ही; दस चार चारु निधान ॥५३॥

कउन कउन कहै कथे कवि? नाम ठाम अनंत ॥

बाटि बाटि सबो लए; नवखंड द्वीप दुरंत ॥

ठाम ठाम भए नराधिप; ठाम नाम अनेक ॥

कउन कउन उचारीऐ; करि सूर सरब बिबेक ॥५४॥

सपत दीपन सपत भूप; भुगै लगे नवखंड ॥

भांति भांतिन सो फिरे; असि बाधि जोध प्रचंड ॥

दीह दीह अजीह देसनि; नाम आपि भनाइ ॥

आनि जानु दुती भए छिति; दूसरे हरि राइ ॥५५॥

आप आप समै सबै सिरि; अत्र पत्र फिराइ ॥

जीति जीति अजीत जोधन; रोह क्रोह कमाइ ॥

झूठ साच अनंत बोलि; कलोल केल अनेक ॥

अंति काल सबै भछे; जगि छाडीआ नहि एक ॥५६॥

आप अरथ अनरथ अपरथ; समरथ करत अनंत ॥

अंति होत ठटी कछू प्रभू; कोटि क्यों न करंत ॥

जान बूझ परंत कूप; लहंत मूड़ न भेव ॥

अंति काल तबै बचै; जब जान है गुरदेव ॥५७॥

अंति होत ठटी भली प्रभ; मूड़ लोग न जानि ॥

आप अरथ पछान ही; तजि दीह देव निधान ॥

धरम जानि करत पापन; यौ न जानत मूड़ ॥

सरब काल दइआल को; कहु प्रयोग गूड़ अगूड़ ॥५८॥

पाप पुंन पछान ही करि; पुंन की सम पाप ॥

परम जान पवित्र जापन; जपै लाग कुजाप ॥

सिध ठउर न मानही; बिनु सिध ठउर पूजंत ॥

हाथि दीपकु लै महा पसु; मधि कूप परंत ॥५९॥

सिध ठउर न मान ही; अनसिध पूजत ठउर ॥

कै कु दिवस चलाहिगे? जड़ भीत की सी दउर ॥

पंख हीन कहा उडाइब? नैन हीन निहार ॥

ससत्र हीन जुधा न पैठब; अरथ हीन बिचार ॥६०॥

दरब हीण बपार जैसक; अरथ बिनु इस लोक ॥

आंख हीण बिलोकबो; जगि कामकेल अकोक ॥

गिआन हीण सु पाठ गीता; बुधि हीण बिचार ॥

हिमत हीन जुधान जूझब; केल हीण कुमार ॥६१॥

कउन कउन गनाईऐ? जे भए भूमि महीप ॥

कउन कउन सु कथीऐ? जगि के सु द्वीप अद्वीप ॥

जासु कीन, गनै वहै; इमि और की नहि सकति ॥

यौ न ऐस पहचानीऐ; बिनु तासु की कीए भगति ॥६२॥

इति राजा भरथ राज समापतं ॥३॥५॥


ਅਥ ਰਾਜਾ ਸਗਰ ਰਾਜ ਕਥਨੰ ॥ अथ राजा सगर राज कथनं ॥ रूआल छंद ॥

स्रेसट स्रेसट भए जिते; इह भूमि आनि नरेस ॥

तउन तउन उचारहो; तुमरे प्रसादि असेस ॥

भरथ राज बितीत भे; भए राजा सगर राज ॥

रुद्र की तपसा करी; लीअ लछ सुत उपराजि ॥६३॥

चक्र बक्र धुजा गदा; भ्रित सरब राज कुमार ॥

लछ रूप धरे मनो; जगि आनि मैन सु धार ॥

बेख बेख बने नरेस्वर; जीति देस असेस ॥

दास भाव सबै धरे; मनि जत्र तत्र नरेस ॥६४॥

बाज मेध करै लगै; हयसालि ते हय चीनि ॥

बोलि बोलि अमोल रितुज; मंत्र मित्र प्रबीन ॥

संग दीन समूह सैन; ब्यूह ब्यूह बनाइ ॥

जत्र तत्र फिरै लगे; सिरि अत्र पत्र फिराइ ॥६५॥

जैतपत्र लह्यो जहा तह; सत्रु भे सभ चूर ॥

छोरि छोरि भजे नरेस्वर; छाडि ससत्र करूर ॥

डारि डारि सनाहि सूर; त्रीआन भेस सु धारि ॥

भाजि भाजि चले जहा तह; पुत्र मित्र बिसारि ॥६६॥

गाजि गाजि गजे गदाधरि; भाजि भाजि सु भीर ॥

साज बाज तजै भजै; बिस्मभार बीर सुधीर ॥

सूरबीर गजे जहा तह; असत्र ससत्र नचाइ ॥

जीति जीति लए सु देसन; जैतपत्र फिराइ ॥६७॥

जीति पूरब पछिमै; अरु लीन दछनि जाइ ॥

ताकि बाज चल्यो तहा जह; बैठि थे मुनि राइ ॥

ध्यान मधि हुते महा मुनि; साज बाज न देखि ॥

प्रिसटि पछ खरो भयो रिखि; जानि गोरख भेख ॥६८॥

चउक चित रहे सबै; जब देखि नैन न बाज ॥

खोजि खोजि थके सबै दिस; चारि चारि सलाज ॥

जानि पयार गयो तुरंगम; कीन चिति बिचार ॥

सगर खात खुदै लगे; रणधीर बीर अपार ॥६९॥

खोदि खोदि अखोदि प्रिथवी; क्रोध जोध अनंत ॥

भछि भछि गए सबै मुख; म्रितका दुति वंत ॥

सगर खात खुदै लगे; दिस खोद दछन सरब ॥

जीति पूरब को चले; अति ठान कै जीअ गरब ॥७०॥

खोद दछन की दिसा; पुनि खोद पूरब दिसान ॥

ताकि पछम को चले; दस चारि चारि निधान ॥

पैठि उतर दिसा जबै; खोदै लगे सभ ठउर ॥

अउर अउर ठटै पसू; कलि कालि ठाटी अउर ॥७१॥

खोदि कै बहु भांति प्रिथवी; पूजि अरध दिसान ॥

अंति भेद बिलोकीआ; मुनि बैठि संजुत ध्यान ॥

प्रिसट पाछ बिलोक बाज; समाज रूप अनूप ॥

लात भे मुनि मारिओ; अति गरब कै सुत भूप ॥७२॥

ध्यान छूट तबै मुनी; द्रिग ज्वाल माल कराल ॥

भांति भांतिन सो उठी; जनु सिंध अगनि बिसाल ॥

भसमि भूत भए सबे न्रिप; लछ पुत्र सु नैन ॥

बाज राज सु स्मपदा जुत; असत्र ससत्र सु सैन ॥७३॥

मधुभार छंद ॥

भए भसमि भूत ॥

न्रिप सरब पूत ॥

जुत सुभट सैन ॥

सुंदर सुबैन ॥७४॥

सोभा अपार ॥

सुंदर कुमार ॥

जब जरे सरब ॥

तब तजा गरब ॥७५॥

बाहू अजान ॥

सोभा महान ॥

दस चारि वंत ॥

सूरा दुरंत ॥७६॥

जारि भाजे बीर ॥

हुऐ चिति अधीर ॥

दिनो संदेस ॥

जह सागर देस ॥७७॥

लहि सागर बीर ॥

ह्वै चिति अधीर ॥

पुछे संदेस ॥

पूतन सुबेस ॥७८॥

करि जोरि सरब ॥

भट छोरि गरब ॥

उचरे बैन ॥

जल चुअत नैन ॥७९॥

भूअ फेरि बाज ॥

जिणि सरब राज ॥

सब संग लीन ॥

न्रिप बर प्रबीन ॥८०॥

हय गयो पयार ॥

तुअ सुत उदार ॥

भूअ खोद सरब ॥

अति बढा गरब ॥८१॥

तहं मुनि अपार ॥

गुनि गन उदार ॥

लखि मध ध्यान ॥

मुनि मनि महान ॥८२॥

तव पुत्र क्रोध ॥

लै संगि जोध ॥

लता प्रहार ॥

कीअ रिखि अपार ॥८३॥

तब छुटा ध्यान ॥

मुनि मनि महान ॥

निकसी सु ज्वाल ॥

दावा बिसाल ॥८४॥

तरं जरे पूत ॥

कहि ऐसे दूत ॥

सैना समेत ॥

बाचा न एक ॥८५॥

सुनि पुत्र नास ॥

भयो पुरि उदास ॥

जह तह सु लोग ॥

बैठे सु सोग ॥८६॥

सिव सिमर बैण ॥

जल थापि नैण ॥

करि धीरज चिति ॥

मुनि मनि पवित ॥८७॥

तिन म्रितक करम ॥

न्रिप करम धरम ॥

बहु बेद रीति ॥

किनी सु प्रीति ॥८८॥

न्रिप पुत्र सोग ॥

गये सुरग लोगि ॥

न्रिप भे सु जौन ॥

कथि सकै कौन? ॥८९॥

इति राजा सागर को राज समापतं ॥४॥५॥


ਅਥ ਜੁਜਾਤਿ ਰਾਜਾ ਕੋ ਰਾਜ ਕਥਨੰ

अथ जुजाति राजा को राज कथनं

मधुभार छंद ॥

पुनि भयो जुजाति ॥

सोभा अभाति ॥

दस चारवंत ॥

सोभा सुभंत ॥९०॥

सुंदर सु नैन ॥

जन रूप मैन ॥

सोभा अपार ॥

सोभत सुधार ॥९१॥

सुंदर सरूप ॥

सोभंत भूप ॥

दस चारवंत ॥

आभा अभंत ॥९२॥

गुन गन अपार ॥

सुंदर उदार ॥

दस चारिवंत ॥

सोभा सुभंत ॥९३॥

धन गुन प्रबीन ॥

प्रभ को अधीन ॥

सोभा अपार ॥

सुंदर कुमार ॥९४॥

सासत्रग सुध ॥

क्रोधी सु जुध ॥

न्रिप भयो बेन ॥

जन काम धेन ॥९५॥

खूनी सु खग ॥

जोधा अभग ॥

खत्री अखंड ॥

क्रोधी प्रचंड ॥९६॥

सत्रूनि काल ॥

काढी क्रवाल ॥

सम तेज भानु ॥

ज्वाला समान ॥९७॥

जब जुरत जंग ॥

नहि मुरत अंग ॥

अरि भजत नेक ॥

नहि टिकत एक ॥९८॥

थरहरत भानु ॥

क्मपत दिसान ॥

मंडत मवास ॥

भजत उदास ॥९९॥

थरहरत बीर ॥

भ्मभरत भीर ॥

ततजत देस ॥

न्रिपमनि नरेस ॥१००॥

चचकत चंद ॥

धधकत इंद ॥

फनिमन फटंत ॥

भूअधर भजंत ॥१०१॥

संजुता छंद ॥

जस ठौर ठौर सबो सुन्यो ॥

अरि ब्रिंद सीस सबो धुन्यो ॥

जग जग साज भले करे ॥

दुख पुंज दीनन के हरे ॥१०२॥

इति जुजाति राजा म्रित बसि होत भए ॥५॥५॥


ਅਥ ਬੇਨ ਰਾਜੇ ਕੋ ਰਾਜ ਕਥਨੰ ॥ अथ बेन राजे को राज कथनं ॥ संजुता छंद ॥

पुनि बेणु राज महेस भयो ॥

निजि डंड काहूं ते न लयो ॥

जीअ भांति भांति सुखी नरा ॥

अति गरब स्रब छुटिओ धरा ॥१०३॥

जीअ जंत सब दिखियत सुखी ॥

तरि द्रिसटि आवत न दुखी ॥

सब ठौर ठौर प्रिथी बसी ॥

जनु भूमि राज सिरी लसी ॥१०४॥

इह भांति राज कमाइ कै ॥

सुख देस सरब बसाइ कै ॥

बहु दोख दीनन के दहे ॥

सुनि थकत देव समसत भए ॥१०५॥

बहु राज साज कमाइ कै ॥

सिरि अत्रपत्र फिराइ कै ॥

पुनि जोति जोति बिखै मिली ॥

अरि छैनु बेनु महाबली ॥१०६॥

अबिकार भूप जिते भए ॥

करि राज अंत समै गए ॥

कबि कौन नाम तिनै गनै? ॥

संकेत करि इते भनै ॥१०७॥

इति बेनु राजा म्रित बस होत भए ॥६॥५॥


ਅਥ ਮਾਨਧਾਤਾ ਕੋ ਰਾਜੁ ਕਥਨੰ

अथ मानधाता को राजु कथनं

दोधक छंद ॥

जेतक भूप भए अवनी पर ॥

नाम सकै तिन के कवि को धरि? ॥

नाम जथामति भाखि सुनाऊ ॥

चित तऊ अपने डर पाऊ ॥१०८॥

बेनु गए जग ते न्रिपता करि ॥

मानधात भए बसुधा धरि ॥

बासव लोग गए जब ही वह ॥

उठि दयो अरधासन बासव तिह ॥१०९॥

रोस भर्यो तब मान महीधर ॥

हाकि गह्यो करि खग भयंकर ॥

मारन लाग जबै रिस इंद्रहि ॥

बाह गही ततकाल दिजिंद्रहि ॥११०॥

नास करो जिनि बासव को न्रिप! ॥

आसन अरध दयो तुह या ब्रत ॥

है लवनास्र महासुर भूधरि ॥

ताहि न मार सके तुम किउ कर ॥१११॥

जौ तुम ताहि संघार कै आवहु ॥

तौ तुम इंद्र सिंघासन पावहु ॥

ऐसे कै अरध सिंघासन बैठहु ॥

साचु कहो, पर नाकु न ऐठहु ॥११२॥

असतर छंद ॥

धायो असत्र लै के तहा ॥

मथुरा मंडल दानो था जहा ॥

महा गरबु कै कै महा मंद बुधी ॥

महा जोर कै कै दलं परम क्रुधी ॥११३॥

महा घोर कै कै घनं की घटा जियो ॥

सु धाइआ रणं बिजुली की छटा जियो ॥

सुने सरब दानो सु सामुहि सिधाइ ॥

महा क्रोध कै कै सु बाजी नचाए ॥११४॥

मेदक छंद ॥

अब एक कीए बिनु यौ न टरै ॥

दोऊ दांतन पीस हंकारि परै ॥

जब लौ न सुनो लव खेत मरा ॥

तब लउ न लखो रनि बाज टरा ॥११५॥

अब ही रणि एक की एक करै ॥

बिनु एक कीए रणि ते न टरै ॥

बहु साल सिला तल ब्रिछ छुटे ॥

दुहूं ओरि जबै रण बीर जुटे ॥११६॥

कुप कै लव पानि त्रिसूल लयो ॥

सिरि धातयमान दुखंड कियो ॥

बहु जूथप जूथन सैन भजी ॥

न उचाइ सकै सिरु ऐस लजी ॥११७॥

घन जैसे भजे घन घाइल हुऐ ॥

बरखा जिमि स्रोणत धार चुऐ ॥

सभ मान महीपति छेत्रहि दै ॥

सब ही दल भाजि चला जीअ लै ॥११८॥

इक घूमत घाइल सीस फुटे ॥

इक स्रोण चुचावत केस छुटे ॥

रणि मार कै मानि त्रिसूल लीए ॥

भट भातहि भांति भजाइ दीए ॥११९॥

इति मानधाता राज समापतं ॥७॥५॥


ਅਥ ਦਲੀਪ ਕੋ ਰਾਜ ਕਥਨੰ ॥ अथ दलीप को राज कथनं ॥ तोटक छंद ॥

रण मो मान महीप हए ॥

तब आनि दिलीप दिलीस भए ॥

बहु भांतिन दानव दीह दले ॥

सब ठौर सबै उठि धरम पले ॥१२०॥

चौपई ॥

जब न्रिप हना मानधाता बर ॥

सिव त्रिसूल करि धरि लवनासुर ॥

भयो दलीप जगत को राजा ॥

भांति भांति जिह राज बिराजा ॥१२१॥

महारथी अरु महा न्रिपारा ॥

कनक अवटि साचे जनु ढारा ॥

अति सुंदर जनु मदन सरूपा ॥

जानुक बने रूप को भूपा ॥१२२॥

बहु बिधि करे जग बिसथारा ॥

बिधवत होम दान मखसारा ॥

धरम धुजा जह तह बिराजी ॥

इंद्रावती निरखि दुति लाजी ॥१२३॥

पग पग जगि ख्मभ कहु गाडा ॥

घरि घरि अंन साल करि छाडा ॥

भूखा नांग जु आवत कोई ॥

ततछिन इछ पुरावत सोई ॥१२४॥

जो जिहं मुख मांगा तिह पावा ॥

बिमुख आस फिरि भिछक न आवा ॥

धामि धामि धुजा धरम बधाई ॥

धरमावती निरखि मुरछाई ॥१२५॥

मूरख कोऊ रहै नहि पावा ॥

बार बूढ सभ सोधि पढावा ॥

घरि घरि होत भई हरि सेवा ॥

जह तह मानि सबै गुर देवा ॥१२६॥

इह बिधि राज दिलीप बडो करि ॥

महारथी अरु महा धनुर धर ॥

कोक सासत्र सिम्रिति सुर गिआना ॥

जोतिवंत दस चारि निधाना ॥१२७॥

महा क्रमठी महा सुजानू ॥

महा जोति दस चारि निधानू ॥

अति सरूप अरु अमित प्रभासा ॥

महा मान अरु महा उदासा ॥१२८॥

बेद अंग खट सासत्र प्रबीना ॥

धनुरबेद प्रभ के रस लीना ॥

खड़गन ईस्वर पुनि अतुल बल ॥

अरि अनेक जीते जिनि दलि मलि ॥१२९॥

खंड अखंड जीति बड राजा ॥

आनि समान न आपु बिराजा ॥

अति बलिसट असि तेज प्रचंडा ॥

अरि अनेक जिनि साधि उदंडा ॥१३०॥

देस बिदेस अधिक जिह जीता ॥

जह तह चली राज की नीता ॥

भांति भांति सिरि छत्र बिराजा ॥

तजि हठ चरनि लगे बड राजा ॥१३१॥

जह तह होत धरम की रीता ॥

कहूं न पावति होनि अनीता ॥

दान निसान चहूं चक बाजा ॥

करन कुबेर बेणु बलि राजा ॥१३२॥

भांति भांति तन राज कमाई ॥

आ समुद्र लौ फिरी दुहाई ॥

जह तह करम पाप भयो दूरा ॥

धरम करम सभ करत हजूरा ॥१३३॥

जह तह पाप छपा सब देसा ॥

धरम करम उठि लागि नरेसा ॥

आ समुद्र लौ फिरी दुहाई ॥

इह बिधि करी दिलीप रजाई ॥१३४॥

इति दलीप राज समापतं ॥८॥५॥


ਅਥ ਰਘੁ ਰਾਜਾ ਕੋ ਰਾਜ ਕਥਨੰ ॥ अथ रघु राजा को राज कथनं ॥ चौपई ॥

बहुर जोति सो जोति मिलानी ॥

सब जग ऐस क्रिआ पहिचानी ॥

स्री रघुराज राजु जगि कीना ॥

अत्रपत्र सिरि ढारि नवीना ॥१३५॥

बहुतु भांति करि जगि प्रकारा ॥

देस देस महि धरम बिथारा ॥

पापी कोई निकटि न राखा ॥

झूठ बैन किहूं भूलि न भाखा ॥१३६॥

निसा तासु निस नाथ पछाना ॥

दिनकर ताहि दिवस अनुमाना ॥

बेदन ताहि ब्रहम करि लेखा ॥

देवन इंद्र रूप अविरेखा ॥१३७॥

बिपन सबन ब्रहसपति देख्यो ॥

दैतन गुरू सुक्र करि पेख्यो ॥

रोगन ताहि अउखधी माना ॥

जोगिन परम तत पहिचाना ॥१३८॥

बालन बाल रूप अविरेख्यो ॥

जोगन महा जोग करि देख्यो ॥

दातन महादानि करि मान्यो ॥

भोगन भोग रूप पहचान्यो ॥१३९॥

संनिआसन दत रूप करि जान्यो ॥

जोगन गुर गोरख करि मान्यो ॥

रामानंद बैरागिन जाना ॥

महादीन तुरकन पहचाना ॥१४०॥

देवन इंद्र रूप करि लेखा ॥

दैतन सु्मभ राजा करि पेखा ॥

जछन जछ राज करि माना ॥

किन्रन किन्रदेव पहचाना ॥१४१॥

कामिन काम रूप करि देख्यो ॥

रोगन रूप धनंतर पेख्यो ॥

राजन लख्यो राज अधिकारी ॥

जोगन लख्यो जोगीसर भारी ॥१४२॥

छत्रन बडो छत्रपति जाना ॥

अत्रिन महा ससत्रधर माना ॥

रजनी तासु चंद्र करि लेखा ॥

दिनीअर करि तिह दिन अविरेखा ॥१४३॥

संतन सांति रूप करि जान्यो ॥

पावक तेज रूप अनुमान्यो ॥

धरती तासु धराधर जाना ॥

हरणि एणराज पहिचाना ॥१४४॥

छत्रिन ता सबु छत्रिपति सूझा ॥

जोगिन महा जोग कर बूझा ॥

हिमधर ताहि हिमालय जाना ॥

दिनकर अंधकारि अनुमाना ॥१४५॥

जल सरूप जल तासु पछाना ॥

मेघन इंद्रदेव कर माना ॥

बेदन ब्रहम रूप कर देखा ॥

बिपन ब्यास जानि अविरेखा ॥१४६॥

लखमी ताहि बिसनु करि मान्यो ॥

बासव देव बासवी जान्यो ॥

संतन सांति रूप करि देखा ॥

सत्रन कलह सरूप बिसेखा ॥१४७॥

रोगन ताहि अउखधी सूझा ॥

भामिन भोग रूप करि बूझा ॥

मित्रन महा मित्र करि जाना ॥

जोगिन परम ततु पहचाना ॥१४८॥

मोरन महा मेघ करि मानिआ ॥

दिनकर चित चकवी जानिआ ॥

चंद सरूप चकोरन सूझा ॥

स्वांति बूंद सीपन करि बूझा ॥१४९॥

मास बसंत कोकिला जाना ॥

स्वांति बूंद चात्रक अनुमाना ॥

साधन सिधि रूप करि देखा ॥

राजन महाराज अविरेखा ॥१५०॥

दान सरूप भिछकन जाना ॥

काल सरूप सत्रु अनुमाना ॥

सासत्र सरूप सिम्रितन देखा ॥

सति सरूप साध अविरेखा ॥१५१॥

सील रूप साधविन चीना ॥

दिआल सरूप दइआ चिति कीना ॥

मोरन मेघ रूप पहिचाना ॥

चोरन ताहि भोर करि जाना ॥१५२॥

कामिन केल रूप करि सूझा ॥

साधन सिधि रूप तिह बूझा ॥

फणपतेस फणीअर करि जान्यो ॥

अम्रित रूप देवतन मान्यो ॥१५३॥

मणि समान फणीअर करि सूझा ॥

प्राणिन प्रान रूप करि बूझा ॥

रघु बंसीअन रघुराज प्रमान्यो ॥

केवल क्रिसन जादवन जान्यो ॥१५४॥

बिपति हरन बिपतहि करि जाना ॥

बलि महीप बावन पहचाना ॥

सिव सरूप सिव संतन पेखा ॥

ब्यास परासुर तुल बसेखा ॥१५५॥

बिप्रन बेद सरूप बखाना ॥

छत्रि जुध रूप करि जाना ॥

जउन जउन जिह भांति बिचारा ॥

तउनै काछि काछि अनुहारा ॥१५६॥

भांति भांति तिनि कीनो राजा ॥

देस देस के जीति समाजा ॥

भांति भांति के देस छिनाए ॥

पैग पैग पर जगि कराए ॥१५७॥

पग पग जगि ख्मभ कहु गाडा ॥

डग डग होम मंत्र करि छाडा ॥

ऐसी धरा न दिखीअत कोई ॥

जगि ख्मभ जिह ठउर न होई ॥१५८॥

गवाल्मभ बहु जग करे बर ॥

ब्रहमण बोलि बिसेख धरमधर ॥

बाजमेध बहु बारन कीने ॥

भांति भांति भूय के रस लीने ॥१५९॥

गजा मेध बहु करे जगि तिह ॥

अजा मेध ते सकै न गन किह ॥

गवाल्मभ करि बिधि प्रकारं ॥

पसु अनेक मारे तिह बारं ॥१६०॥

राजसूअ करि बिबिध प्रकारं ॥

दुतीआ इंद्र रघु राज अपारं ॥

भांति भांति के बिधवत दाना ॥

भांति भांति कर तीरथ नाना ॥१६१॥

सरब तीरथ परि पावर बांधा ॥

अंन छेत्र घरि घरि मै सांधा ॥

आसावंत कहूं कोई आवै ॥

ततछिन मुख मंगै सो पावै ॥१६२॥

भूख नांग कोई रहन न पावै ॥

भूपति हुऐ करि रंक सिधावै ॥

बहुर दान कह कर न पसारा ॥

एक बारि रघु राज निहारा ॥१६३॥

स्वरण दान दे बिबिध प्रकारा ॥

रुकम दान नही पायत पारा ॥

साजि साजि बहु दीने बाजा ॥

जन सभ करे रंक रघु राजा ॥१६४॥

हसत दान अर उसटन दाना ॥

गऊ दान बिधिवत इसनाना ॥

हीर चीर दे दान अपारा ॥

मोह सबै महि मंडल डारा ॥१६५॥

बाजी देत गजन के दाना ॥

भांति भांति दीनन सनमाना ॥

दूख भूख काहूं न संतावै ॥

जो मुख मांगै वह बरु पावै ॥१६६॥

दान सील को जान पहारा ॥

दइआ सिंध रघु राज भुआरा ॥

सुंदर महा धनुख धर आछा ॥

जनु अलिपनच काछ तन काछा ॥१६७॥

निति उठि करत देव की पूजा ॥

फूल गुलाब केवड़ा कूजा ॥

चरन कमल निति सीस लगावै ॥

पूजन नित चंडिका आवै ॥१६८॥

धरम रीति सब ठौर चलाई ॥

जत्र तत्र सुख बसी लुगाई ॥

भूख नांग कोई कहूं न देखा ॥

ऊच नीच सब धनी बिसेखा ॥१६९॥

जह तह धरम धुजा फहराई ॥

चोर जार नह देत दिखाई ॥

जह तह यार चोर चुनि मारा ॥

एक देसि कहूं रहै न पारा ॥१७०॥

साध ओरि कोई दिसटि न पेखा ॥

ऐस राज रघु राज बिसेखवा ॥

चारो दिसा चक्र फहरावै ॥

पापिन काटि मूंड फिरि आवै ॥१७१॥

गाइ सिंघ कहु दूध पिलावै ॥

सिंघ गऊ कह घासु चुगावै ॥

चोर करत धन की रखवारा ॥

त्रास मारि कोई हाथु न डारा ॥१७२॥

नारि पुरख सोवत इक सेजा ॥

हाथ पसार न साकत रेजा ॥

पावक घ्रित इक ठउर रखाए ॥

राज त्रास ते ढरै न पाए ॥१७३॥

चोर साध मग एक सिधारै ॥

त्रास त्रसत करु कोई न डारै ॥

गाइ सिंघ इक खेत फिराही ॥

हाथ चलाइ सकत कोई नाही ॥१७४॥

इह बिधि राजु कर्यो रघु राजा ॥

दान निसान चहूं दिस बाजा ॥

चारो दिसा बैठ रखवारे ॥

महाबीर अरु रूप उजिआरे ॥१७५॥

बीस सहंस्र बरख परमाना ॥

राजु करा दस चार निधाना ॥

भांति अनेक करे निति धरमा ॥

और न सकै ऐस कर करमा ॥१७६॥

पाधड़ी छंद ॥

इहु भांति राजु रघुराज कीन ॥

गज बाज साज दीनान दीन ॥

न्रिप जीति जीति लिने अपार ॥

करि खंड खंड खंडे गड़वार ॥१७७॥

इति रघु राज समापतहि ॥९॥५॥


ਅਥ ਅਜ ਰਾਜਾ ਕੋ ਰਾਜ ਕਥਨੰ ॥ अथ अज राजा को राज कथनं ॥ पाधड़ी छंद ॥

फुनि भए राज अजराज बीर ॥

जिनि भांति भांति जिते प्रबीर ॥

किने खराब खाने खवास ॥

जिते महीप तोरे मवास ॥१॥

जिते अजीत मुंडे अमुंड ॥

खंडे अखंड किने घमंड ॥

दस चारि चारि बिदिआ निधान ॥

अजराज राज राजा महान ॥२॥

सूरा सुबाह जोधा प्रचंड ॥

स्रुति सरब सासत्र बिदिआ उदंड ॥

मानी महान सुंदर सरूप ॥

अविलोकि जासु लाजंत भूप ॥३॥

राजान राज राजाधिराज ॥

ग्रिह भरे सरब स्मपति समाज ॥

अविलोक रूप रीझंत नारि ॥

स्रुति दान सील बिदिआ उदार ॥४॥

जौ कहो कथा बाढंत ग्रंथ ॥

सुणि लेहु मित्र! संछेप कंथ ॥

बैदरभ देसि राजा सुबाह ॥

च्मपावती सु ग्रिह नारि ताहि ॥५॥

तिह जई एक कंनिआ अपार ॥

तिह मतीइंद्र नामा उदार ॥

जब भई जोग बर के कुमारि ॥

तब कीन बैठि राजा बिचारि ॥६॥

लिने बुलाइ न्रिप सरब देस ॥

धाए सुबाह लै दल असेस ॥

मुख भई आनि सरस्वती आपु ॥

जिहि जपत लोग मिलि सरब जापु ॥७॥

तब देस देस के भूप आनि ॥

किनो प्रणाम राजा महानि ॥

तह बैठि राज सोभंत ऐसु ॥

जन देव मंडली सम न तैसु ॥८॥

बाजंत ढोल दुंदभि अपार ॥

बाजंत तूर झनकंत तार ॥

सोभा अपार बरनी न जाइ ॥

जनु बैठि इंद्र आभा बनाइ ॥९॥

इह भांति राज मंडली बैठि ॥

अविलोकि इंद्र जह नाक ऐठि ॥

आभा अपार बरने सु कउन? ॥

ह्वै रहे जछ गंध्रब मउन ॥१०॥

अरध पाधड़ी छंद ॥

सोभंत सूर ॥

लोभंत हूर ॥

अछ्री अपार ॥

रिझी सु धार ॥११॥

गावंत गीत ॥

मोहंत चीत ॥

मिलि दे असीस ॥

जुग चारि जीस ॥१२॥

बाजंत तार ॥

डारै धमार ॥

देवान नारि ॥

पेखत अपार ॥१३॥

कै बेद रीति ॥

गावंत गीत ॥

सोभा अनूप ॥

सोभंत भूप ॥१४॥

बाजंत तार ॥

रीझंत नारि ॥

गावंत गीत ॥

आनंद चीति ॥१५॥

उछाल छंद ॥

गावत नारी ॥

बाजत तारी ॥

देखत राजा ॥

देवत साजा ॥१६॥

गावत गीतं ॥

आनंद चीतं ॥

सोभत सोभा ॥

लोभत लोभा ॥१७॥

देखत नैणं ॥

भाखत बैणं ॥

सोहत छत्री ॥

लोभत अत्री ॥१८॥

गजत हाथी ॥

सजत साथी ॥

कूदत बाजी ॥

नाचत ताजी ॥१९॥

बाजत तालं ॥

नाचत बालं ॥

गावत गाथं ॥

आनंद साथं ॥२०॥

कोकिल बैणी ॥

सुंदर नैणी ॥

गावत गीतं ॥

चोरत चीतं ॥२१॥

अछ्रण भेसी ॥

सुंदर केसी ॥

सुंदर नैणी ॥

कोकिल बैणी ॥२२॥

अदभुत रूपा ॥

कामिण कूपा ॥

चारु प्रहासं ॥

उनति नासं ॥२३॥

लखि दुति राणी ॥

लजित इंद्राणी ॥

सोहत बाला ॥

रागण माला ॥२४॥

मोहणी छंद ॥

गउर सरूप महा छबि सोहत ॥

देखत सुर नर को मन मोहत ॥

रीझत ताकि बडे न्रिप ऐसे ॥

सोभहिं कउन सकै कहि तैसे? ॥२५॥

सुंदर रूप महा दुति बालीय ॥

पेखत रीझत बीर रसालीय ॥

नाचत भाव अनेक त्रीआ करि ॥

देखत सोभा रीझत सुर नर ॥२६॥

हिंसत हैवर चिंसत हाथी ॥

नाचत नागरि गावत गाथी ॥

रीझत सुर नर मोहत राजा ॥

देवत दान तुरंत समाजा ॥२७॥

गावत गीतन नाचत अपछरा ॥

रीझत राजा खीझत अछरा ॥

बाजत नारद बीन रसाली ॥

देखत देव प्रभासत ज्वाली ॥२८॥

आंजत अंजन साजत अंगा ॥

सोभत बसत्र सु अंग सुरंगा ॥

नाचत अछ्री रीझत राऊ ॥

चाहत बरबो करत उपाऊ ॥२९॥

ततथई नाचै सुर पुर बाला ॥

रुण झुण बाजै रंग अंग माला ॥

बनि बनि बैठे जह तह राजा ॥

दै दै डारै तन मन साजा ॥३०॥

जिह जिह देखा सो सो रीझा ॥

जिन नही देखा तिह मन खीझा ॥

करि करि भायं त्रीअ बर नाचै ॥

अतिभुति भायं अंग अंग राचै ॥३१॥

तिन अतिभुति गति तह जह ठानी ॥

जह तह सोहै मुनि मनि मानी ॥

तजि तजि जोगं भजि भजि आवै ॥

लखि अति आभा जीअ सुख पावै ॥३२॥

बनि बनि बैठे जह तह राजा ॥

जह तह सोभै सभ सुभ साजा ॥

जह तह देखै गुनि गन फूले ॥

मुनि मनि छबि लखि तन मन भूले ॥३३॥

तत बित घन मुखरस सब बाजै ॥

सुनि मन रागं गुनि गन लाजै ॥

जह तह गिर गे रिझि रिझि ऐसे ॥

जनु भट जूझे रण ब्रिण कैसे ॥३४॥

बनि बनि फूले जनु बर फूलं ॥

तनु बरु सोभे जनु धर मूलं ॥

जहं तहं झूले मद मत राजा ॥

जनु मुरि बोलै सुन घन गाजा ॥३५॥

पाधरी छंद ॥

जह तह बिलोकि सोभा अपार ॥

बनि बैठि सरब राजाधिकार ॥

इह भांति कहै नही परत बैन ॥

लखि नैन रूपि रीझंत नैन ॥३६॥

अविलोकि नाचि ऐसो सुरंग ॥

सर तानि न्रिपन मारत अनंग ॥

सोभा अपार बरणी न जाइ ॥

रीझे अविलोकि राना रु राइ ॥३७॥

आगम बसंत जनु भइओ आज ॥

इह भांति सरब देखै समाज ॥

राजाधिराज बनि बैठ ऐस ॥

तिन के समान नही इंद्र हैस ॥३८॥

इक मास लाग तह भइओ नाच ॥

बिन पीऐ कैफ कोऊ न बाच ॥

जह जह बिलोकि आभा अपार ॥

तह तह सु राज राजन कुमार ॥३९॥

लै संग तास सारस्वति आप ॥

जिह को जपंत सभ जगत जाप ॥

निरखो कुमार इह सिंध राज ॥

जा की समान नही इंद्र साज ॥४०॥

अविलोक सिंध राजा कुमार ॥

नही तास चित किनो सुमार ॥

तिह छाडि पाछ आगै चलीसु ॥

जनु सरब सोभ कहु लील लीसु ॥४१॥

पुनि कहै तास सारस्वती बैन ॥

इह पसचमेस अब देख नैनि ॥

अविलोकि रूप ता को अपार ॥

नही मधि चिति आनिओ कुमार ॥४२॥

मधुभार छंद ॥

देखो कुमार ॥

राजा जुझार ॥

सुभ वार देस ॥

सुंदर सुबेस ॥४३॥

देखिओ बिचार ॥

राजा अपार ॥

आना न चित ॥

परमं पवित ॥४४॥

तब आगि चाल ॥

सुंदर सु बाल ॥

मुसकिआत ऐस ॥

घनि बीज जैस ॥४५॥

न्रिप पेखि रीझ ॥

सुर नार खीझ ॥

बढि तास जान ॥

घट आप मान ॥४६॥

सुंदर सरूप ॥

सौंदरजु भूप ॥

सोभा अपार ॥

सोभै सु धार ॥४७॥

देखो नरेंद्र ॥

डाढे महेंद्र ॥

मुलतान राज ॥

राजान राज ॥४८॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

चली छोडि ता कौ त्रीआ राज ऐसे ॥

मनो पांडु पुत्रं सिरी राज जैसे ॥

खरी मधि राजिसथली ऐस सोहै ॥

मनो ज्वाल माला महा मोनि मोहै ॥४९॥

सुभे राजिसथली ठांढि ऐसे ॥

मनो चित्रकारी लिखी चित्र जैसे ॥

बधे स्वरण की किंकणी लाल मालं ॥

सिखा जान सोभे न्रिपं जगि ज्वालं ॥५०॥

कहे बैन सारस्वती पेखि बाला! ॥

लखो नैनि ठाढे सभै भूप आला ॥

रुचै चित जउनै सुई नाथ कीजै ॥

सुनो प्रान पिआरी! इहै मानि लीजै ॥५१॥

बडी बाहनी संगि जा के बिराजै ॥

घुरै संग भेरी महा नाद बाजै ॥

लखो रूप बेसं नरेसं महानं ॥

दिनं रैण जापै सहंस्र भुजानं ॥५२॥

धुजा मधि जा के बडो सिंघ राजै ॥

सुने नाद ता को महा पाप भाजै ॥

लखो पूरबीसं छितीसं महानं ॥

सुनो बैन बाला! सुरूपं सु भानं ॥५३॥

घुरै दुंदभी संख भेरी अपारं ॥

बजै दछनी सरब बाजंत्र सारं ॥

तुरी कानरे तूर तानं तरंगं ॥

मुचं झाझरं नाइ नादं म्रिदंगं ॥५४॥

बधे हीर चीरं सु बीरं सुबाहं ॥

बडो छत्रधारी सो सोभिओ सिपाहं ॥

नहे पिंग बाजी रथं जेणि जानो ॥

तिसै दछनेसं हीऐ बाल! मानो ॥५५॥

महा बाहनीसं नगीसं नरेसं ॥

कई कोटि पातं सुभै पत्र भेसं ॥

धुजा बध उधं गजं गूड़ बांको ॥

लखो उतरी राज कै नाम ता को ॥५६॥

फरी धोप पाइक सु आगे उमंगै ॥

जिणै कोटि बंकै मुरे नाहि अंगै ॥

हरे बाज राजं कपोतं प्रमानं ॥

नहे स्यंदनी इंद्र बाजी समाणं ॥५७॥

बडे स्रिंग जा के धरे सूर सोभै ॥

लखे दैत कंन्या जिनै चित लोभै ॥

कढे दंत पतं सिरं केस उचं ॥

लखे गरभणी आणि के गरभ मुचं ॥५८॥

लखो लंक एसं नरेसं सु बालं ॥

सबै संग जा कै सबै लोक पालं ॥

लुटिओ एक बेरं कुबेरं भंडारी ॥

जिणिओ इंद्र राजा बडो छत्रधारी ॥५९॥

कहे जउन बाली न ते चित आने ॥

जिते भूप भारी सु पाछे बखाने ॥

चहूं ओर राजा कहो नाम सो भी ॥

तजे भांति जैसी सबै राज ओ भी ॥६०॥

लखो दईत सैना बडी संगि ता के ॥

सुभै छत्र धारी बडे संग जा के ॥

धुजा गिध उधं लसै काक पूरं ॥

तिसै पिआल राजा बली ब्रिध नूरं ॥६१॥

रथं बेसटं हीर चीरं अपारं ॥

सुभै संग जा के सभे लोक पारं ॥

इहै इंद्र राजा दुरं दानवारं ॥

त्रीआ तास चीनो अदितिआ कुमारं ॥६२॥

नहे सपत बाजी रथं एक चक्रं ॥

महा नाग बधं तपै तेज बक्रं ॥

महा उग्र धंन्वा सु आजान बाहं ॥

सही चित चीनो तिसै दिउस नाहं ॥६३॥

चड़िओ एण राजं धरे बाण पाणं ॥

निसा राज ता को लखो तेज माणं ॥

करै रसमि माला उजाला परानं ॥

जपै रात्र दिउसं सहंस्री भुजानं ॥६४॥

चड़े महिखीसं सुमेरं जु दीसं ॥

महा क्रूर करमं जिणिओ बाह बीसं ॥

धुजा दंड जा की प्रचंडं बिराजै ॥

लखे जास गरबीन को गरब भाजै ॥६५॥

कहा लौ बखानो? बडे गरबधारी ॥

सबै घेरि ठाढे जुरी भीर भारी ॥

नचै पातरा चातुरा निरतकारी ॥

उठै झांझ सबदं सुनै लोग धारी ॥६६॥

बडो दिरब धारी बडी सैन लीने ॥

बडो दिरब को चित मै गरब कीने ॥

चितं तास चीनो सही दिरब पालं ॥

उठै जउन के रूप की ज्वाल मालं ॥६७॥

सभै भूप ठाढे जहा राज कंनिआ ॥

बिखै भू तलं रूप जा के न अंनिआ ॥

बडे छत्रधारी बडे गरब कीने ॥

तहा आनि ठाढे बडी सैन लीने ॥६८॥

नदी संग जा के सबै रूप धारे ॥

सबै सिंध संगं चड़े तेज वारे ॥

बडी काइ जा की महा रूप सोहै ॥

लखे देव कंनिआन के मान मोहै ॥६९॥

कहो नार! तो कौ इहै बरुन राजा ॥

जिसै पेखि राजान को मान भाजा ॥

कहा लौ बखानो? जिते भूप आए ॥

सबै बाल कौ लै भवानी बताए ॥७०॥

सवैया ॥

आनि जुरे न्रिप मंडल जेति; तेत सबै तिन तास दिखाए ॥

देख फिरी चहूं चक्रन को; न्रिप राज कुमारि ह्रिदै नही लिआए ॥

हारि परिओ सभ ही भट मंडल; भूपति हेरि दसा मुरझाए ॥

फूक भए मुख सूक गए; सब राज कुमारि फिरे घरि आए ॥७१॥

तउ लगि आन गए अजिराज; सु राजन राज बडो दल लीने ॥

अ्मबर अनूप धरे पसम्मबर; स्मबर के अरि की छबि छीने ॥

बेखन बेख चड़े संग ह्वै; न्रिप हान सबै सुख धाम नवीने ॥

आनि गए जरिक्मबर से; अ्मबर से न्रिप क्मबर कीने ॥७२॥

पाति ही पाति बनाइ बडो दल; ढोल म्रिदंग सुरंग बजाइ ॥

भूखन चारु दिपै सब अंग; बिलोकि अनंग प्रभा मुरछाए ॥

बाजत चंग म्रिदंग उपंग; सुरंग सु नाद सबै सुनि पाए ॥

रीझ रहे रिझवार सबै; लखि रूप अनूप सराहत आए ॥७३॥

जैस सरूप लखिओ अजि को; हम तैस सरूप न अउर बिचारे ॥

चंदि चपिओ लखि कै मुख की छबि; छेद परे उर मै रिस मारे ॥

तेज सरूप बिलोकि कै पावक; चिति चिरी ग्रिह अउरन जारे ॥

जैस प्रभा लखिओ अजि को हम; तैस सरूप न भूप निहारे ॥७४॥

सुंदर जुआन सरूप महान; प्रधान चहुं चक मै हम जानिओ ॥

भानु समान प्रभा न प्रमान; कि राव कि रान महान बखानिओ ॥

देव अदेव चके अपने चिति; चंद सरूप निसा पहिचानिओ ॥

दिउस कै भानु मुनिओ भगवान; पछान मनै घन मोरन मानिओ ॥७५॥

बोलि उठे पिक जान बसंत; चकोरन चंद सरूप बखानिओ ॥

सांति सुभाव लखिओ सभ साधन; जोधन क्रोध प्रतछ प्रमानिओ ॥

बालन बाल सुभाव लखिओ तिह; सत्रन काल सरूप पछानिओ ॥

देवल देव अदेवन कै सिव; राजन राजि बडो जीअ जानिओ ॥७६॥

साधन सिध सरूप लखिओ तिह; सत्रन सत्र समान बसेखिओ ॥

चोरन भोर, करोरन मोरन; तासु सही घन कै अविरेखिओ ॥

काम सरूप सभै पुर नारन; स्मभू समान सबू गन देखिओ ॥

सीप स्वांति की बूंद तिसै करि; राजन राज बडो तिह पेखिओ ॥७७॥

क्मबर जिउ जरिक्मबर की ढिग; तिउ अविन्मबर तीर सुहाए ॥

नाक लखे रिस मान सूआ मन; नैन दोऊ लखि एण लजाए ॥

पेखि गुलाब सराब पीऐ जनु; पेखत अंग अनंग रिसाए ॥

कंठ कपोत कटू पर केहर; रोस रसे ग्रिह भूलि न आए ॥७८॥

पेखि सरूप सिरात न लोचन; घूटत है जनु घूट अमी के ॥

गावत गीत बजावत ताल; बतावत है जनो आछर ही के ॥

भावत नारि सुहावत गार; दिवावत है भरि आनंद जी के ॥

तू सु कुमार! रची करतार; कहै अबिचार त्रीआ बर नीके ॥७९॥

देखत रूप सिरात न लोचन; पेखि छकी पीअ की छबि नारी ॥

गावत गीत बजावत ढोल; म्रिदंग मुचंगन की धुनि भारी ॥

आवत जात जिती पुर नागर; गागरि डारि लखै दुति भारी ॥

राज करो तब लौ जब लौ महि; जउ लग गंग बहै जमुना री ॥८०॥

जउन प्रभा अजि राज की राजत; सो कहि कै किह भांति गनाऊ? ॥

जउन प्रभा कबि देत सबै जौ पै; तास कहो जीअ बीच लजाऊ ॥

हउ चहूं ओर फिरिओ बसुधा; छबि अंगन कीन कहूं कोई पाऊ ॥

लेखन ऊख ह्वै जात लिखो; छबि आनन ते किमि भाखि सुनाऊ? ॥८१॥

नैनन बान चहूं दिस मारत; घाइल कै पुर बासन डारी ॥

सारस्वती न सकै कहि रूप; सिंगार कहै मति कउन बिचारी ॥

कोकिल कंठि हरिओ न्रिप नाइक; छीन कपोत की ग्रीव अनिआरी ॥

रीझ गिरे नर नारि धरा पर; घूमति है जनु घाइल भारी ॥८२॥

दोहरा ॥

निरखि रूप अजि राज को; रीझ रहे नर नारि ॥

इंद्र कि चंद्र कि सूर इहि; इह बिधि करत बिचार ॥८३॥

कबितु ॥

नागन के छउना हैं, कि कीने काहूं टउना हैं; कि काम के खिलउना हैं, बनाए हैं सुधार के ॥

इसत्रिन के प्रान हैं, कि सुंदरता की खान हैं; कि काम के कलान, बिधि कीने हैं बिचार के ॥

चातुरता के भेस हैं, कि रूप के नरेस हैं; कि सुंदर सु देस, एस कीने चंद्र सार के ॥

तेग हैं कि तीर हैं, कि बाना बांधे बीर हैं; सु ऐसे नेत्र अजि के बिलोकीऐ स्मभार के ॥८४॥

सवैया ॥

तीरन ते तरवारन से; म्रिग बारन से अविलोकहु जाई ॥

रीझ रही रिझवार लखे; दुति भाखि प्रभा, नही जात बताई ॥

संगि चली उठि बाल बिलोकन; मोर चकोर रहे उरझाई ॥

डीठि परै अजि राज जबै; चित देखत ही त्रीअ लीन चुराई ॥८५॥

तोमर छंद ॥

अविलोकीआ अजि राज ॥

अति रूप सरब समाज ॥

अति रीझ कै हस बाल ॥

गुहि फूल माल उताल ॥८६॥

गहि फूल की करि माल ॥

अति रूपवंत सु बाल ॥

तिसु डारीआ उरि आनि ॥

दस चारि चारि निधानि ॥८७॥

तिह देबि आगिआ कीन ॥

दस चारि चारि प्रबीन ॥

सुनि सुंदरी! इम बैन ॥

ससि क्रांत सुंदर नैन ॥८८॥

तव जोग है अजि राज ॥

सुन रूपवंत सलाज ॥

बरु आजु ता कह जाइ ॥

सुनि बैनि सुंदर काइ! ॥८९॥

गहि फूल माल प्रबीन ॥

उरि डार ता के दीन ॥

तब बाज तूर अनेक ॥

डफ बीण बेण बसेख ॥९०॥

डफ बाज ढोल म्रिदंग ॥

अति तूर तान तरंग ॥

नय बासुरी अरु बैन ॥

बहु सुंदरी सुभ नैन ॥९१॥

तिह बिआहि कै अजि राजि ॥

बहु भांति लै कर दाज ॥

ग्रिह आईआ सुख पाइ ॥

डफ बेण बीण बजाइ ॥९२॥

अजि राज राज महान ॥

दस चारि चारि निधान ॥

सुख सिंधु सील समुंद्र ॥

जिनि जीतिआ रण रुद्र ॥९३॥

इह भांति राज कमाइ ॥

सिरि अत्र पत्र फिराइ ॥

रण धीर राज बिसेख ॥

जग कीन जासु भिखेख ॥९४॥

जगजीत चारि दिसान ॥

अजि राज राज महान ॥

न्रिप दान सील पहार ॥

दस चारि चारि उदार ॥९५॥

दुतिवंति सुंदर नैन ॥

जिह पेखि खिझत मैन ॥

मुख देखि चंद्र सरूप ॥

चित सो चुरावत भूप ॥९६॥

इह भांति कै बड राज ॥

बहु जग धरम समाज ॥

जउ कहो सरब बिचार ॥

इक होत कथा पसार ॥९७॥

तिह ते सु थोरीऐ बात ॥

सुनि लेहु भाखो भ्रात! ॥

बहु जग धरम समाज ॥

इह भांति कै अजि राज ॥९८॥

जग आपनो अजि मान ॥

तरि आख आन न आन ॥

तब काल कोप क्रवाल ॥

अजि जारीआ मधि ज्वाल ॥९९॥

अजि जोति जोति मिलान ॥

तब सरब देखि डरान ॥

जिम नाव खेवट हीन ॥

जिम देह अरबल छीन ॥१००॥

जिम गांव राव बिहीन ॥

जिम उरबरा क्रिस छीन ॥

जिम दिरब हीण भंडार ॥

जिम साहि हीण बिपार ॥१०१॥

जिम अरथ हीण कबित ॥

बिनु प्रेम के जिम मित ॥

जिम राज हीण सु देस ॥

जिम सैण हीन नरेस ॥१०२॥

जिम गिआन हीण जुगेंद्र ॥

जिम भूम हीण महेंद्र ॥

जिम अरथ हीण बिचार ॥

जिम दरब हीण उदार ॥१०३॥

जिम अंकुस हीण गजेस ॥

जिम सैण हीण नरेस ॥

जिम ससत्र हीण लुझार ॥

जिम बुधि बाझ बिचार ॥१०४॥

जिम नारि हीण भतार ॥

जिम कंत हीण सु नार ॥

जिम बुधि हीण कबित ॥

जिम प्रेम हीण सु मित ॥१०५॥

जिम देस भूप बिहीन ॥

बिनु कंत नारि अधीन ॥

जिह भांति बिप्र अबिदि ॥

जिम अरथ हीण सबिदि ॥१०६॥

ते कहे सरब नरेस ॥

जे आ गए इह देसि ॥

करि असट दस्य पुरानि ॥

दिज बिआस बेद निधान ॥१०७॥

कीने अठारह परब ॥

जग रीझीआ सुनि सरब ॥

इह बिआस ब्रहम वतार ॥

भए पंचमो मुख चार ॥१०८॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे पंचमोवतार ब्रहमा बिआस राजा अज को राज समापतं ॥१०॥५॥


ਅਥ ਬ੍ਰਹਮਾਵਤਾਰ ਖਟ ਰਿਖਿ ਕਥਨੰ ॥ अथ ब्रहमावतार खट रिखि कथनं ॥ तोमर छंद ॥

जुग आगले इह बिआस ॥

जगि कीअ पुराण प्रकास ॥

तब बाढिआ तिह गरब ॥

सर आप जानि न सरब ॥१॥

तब कोपि काल क्रवाल ॥

जिह जाल ज्वाल बिसाल ॥

खट टूक ता कह कीन ॥

पुनि जान कै तिनि दीन ॥२॥

नही लीन प्रान निकार ॥

भए खसट रिखै अपार ॥

तिन सासत्रग बिचार ॥

खट सासत्र नाम सु डारि ॥३॥

खट सासत्र कीन प्रकास ॥

मुखचार बिआस सु भास ॥

धरि खसटमो अवतार ॥

खट सासत्र कीन सुधारि ॥४॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे खसटमो अवतार ब्रहमा खसट रिख समापतं ॥६॥

ਅਥ ਬ੍ਰਹਮਾਵਤਾਰ ਕਾਲਿਦਾਸ ਕਥਨੰ ॥

अथ ब्रहमावतार कालिदास कथनं ॥ तोमर छंद ॥

इह ब्रहम बेद निधान ॥

दस असट सासत्र प्रमान ॥

कलि जुगिय लाग निहारि ॥

भए कालिदास अबिचार ॥१॥

लखि रीझ बिक्रमजीत ॥

अति गरबवंत अजीत ॥

अति गिआन मान गुनैन ॥

सुभ क्रांति सुंदर नैन ॥२॥

रघु काबि कीन सुधारि ॥

करि कालिदास वतार ॥

कह लौ बखानो तउन? ॥

जो काबि कीनो जउन ॥३॥

धरि सपत ब्रहम वतार ॥

तब भइओ तासु उधार ॥

तब धरा ब्रहम सरूप ॥

मुखचार रूप अनूप ॥४॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे सपतमो अवतार ब्रहमा कालिदास समापतम ॥७॥