दसम ग्रन्थ/रूद्र अवतार
| ਰੁਦ੍ਰ ਅਵਤਾਰ ॥ रुद्र अवतार ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ स्री भगउती जी सहाइ ॥ अथ रुद्र अवतार कथनं ॥ तोमर छंद ॥ अब कहो तउन सुधारि ॥ जे धरे रुद्र अवतार ॥ अति जोग साधन कीन ॥ तब गरब के रसि भीन ॥१॥ सरि आप जान न अउर ॥ सब देस मो सब ठौर ॥ तब कोपि कै इम काल ॥ इम भाखि बैण उताल ॥२॥ जे गरब लोक करंत ॥ ते जान कूप परंत ॥ मुर नाम गरब प्रहार ॥ सुन लेहु रुद्र बिचार ॥३॥ कीअ गरब को मुख चार ॥ कछु चित मो अबिचारि ॥ जब धरे तिन तन सात ॥ तब बनी ता की बात ॥४॥ तिम जनमु धरु तै जाइ ॥ चित दे सुनो मुनि राइ ॥ नही ऐस होइ उधार ॥ सुन लेहु रुद्र बिचार ॥५॥ सुनि स्रवन ए सिव बैन ॥ हठ छाडि सुंदर नैन ॥ तिह जानि गरब प्रहार ॥ छिति लीन आनि वतार ॥६॥ पाधरी छंद ॥ जिम कथे सरब राजान राज ॥ तिम कहे रिखिन सब ही समाज ॥ जिह जिह प्रकार तिह करम कीन ॥ जिह भांति जेमि दिज बरन लीन ॥७॥ जे जे चरित्र किने प्रकास ॥ ते ते चरित्र भाखो सु बास ॥ रिखि पुत्र एस भए रुद्र देव ॥ मोनी महान मानी अभेव ॥८॥ पुनि भए अत्रि रिखि मुनि महान ॥ दस चार चार बिदिआ निधान ॥ लिने सु जोग तजि राज आनि ॥ सेविआ रुद्र स्मपति निधान ॥९॥ किनो सु योग बहु दिन प्रमान ॥ रीझिओ रुद्र ता पर निदान ॥ बरु मांग पुत्र! जो रुचै तोहि ॥ बरु दानु तउन मै देउ तोहि ॥१०॥ करि जोरि अत्रि तब भयो ठांढ ॥ उठि भाग आन अनुराग बाढ ॥ गद गद सु बैण भभकंत नैण ॥ रोमान हरख उचरे सु बैण ॥११॥ जो देत रुद्र! बरु रीझ मोहि ॥ ग्रिह होइ पुत्र सम तुलि तोहि ॥ कहि कै तथासतु भए अंत्र धिआन ॥ ग्रिह गयो अत्रि मुनि मनि महान ॥१२॥ ग्रिहि बरी आनि अनसूआ नारि ॥ जनु पठिओ ततु निज सिव निकारि ॥ ब्रहमा रु बिसन निज तेज काढि ॥ आए सु मधि अनिसूआ छाडि ॥१३॥ भई करत जोग बहु दिन प्रमान ॥ अनसूआ नाम गुन गन महान ॥ अति तेजवंत सोभा सुरंग ॥ जनु धरा रूप दूसर अनंग ॥१४॥ सोभा अपार सुंदर अनंत ॥ सऊहाग भाग बहु बिधि लसंत ॥ जिह निरखि रूप सोरहि लुभाइ ॥ आभा अपार बरनी न जाइ ॥१५॥ निस नाथ देखि आनन रिसान ॥ जलि जाइ नैन लहि रोस मान ॥ तम निरखि केस कीअ नीच डीठ ॥ छपि रहा जानु गिर हेम पीठ ॥१६॥ कंठहि कपोति लखि कोप कीन ॥ नासा निहारि बनि कीर लीन ॥ रोमावलि हेरि जमुना रिसान ॥ लजा मरंत सागर डुबान ॥१७॥ बाहू बिलोकि लाजै म्रिनाल ॥ खिसियान हंस अविलोकि चाल ॥ जंघा बिलोकि कदली लजान ॥ निस राट आप घटि रूप मान ॥१८॥ इह भांति तासु बरणो सिंगार ॥ को सकै कबि महिमा उचार? ॥ ऐसी सरूप अविलोक अत्रि ॥ जनु लीन रूप को छीन छत्र ॥१९॥ कीनी प्रतगि तिह समे नारि ॥ ब्याहै न भोग भोगै भतार ॥ मै बरौ तासु रुचि मानि चित ॥ जो सहै कसट ऐसे पवित ॥२०॥ रिखि मानि बैन तब बर्यो वाहि ॥ जनु लीन लूट सीगार ताहि ॥ लै गयो धामि करि नारि तउन ॥ पित दत देव मुनि अत्रि जउन ॥२१॥ |
| ਅਥ ਰੁਦ੍ਰ ਵਤਾਰ ਦਤ ਕਥਨੰ ॥
अथ रुद्र वतार दत कथनं ॥ तोमर छंद ॥ बहु बरख बीत किनो बिवाहि ॥ इक भयो आनि अउरै उछाहि ॥ तिह गए धामि ब्रहमादि आदि ॥ किनी सु सेव त्रीय बहु प्रसादि ॥२२॥ बहु धूप दीप अरु अरघ दान ॥ पादरघि आदि किने सुजान ॥ अविलोकि भगति तिह चतुर बाक ॥ इंद्रादि बिसनु बैठे पिनाक ॥२३॥ अविलोकि भगति भए रिख प्रसंन ॥ जो तिहू मधि लोकानि धनि ॥ किनो सु ऐस ब्रहमा उचार ॥ तै पुत्रवंत हूजो कुमारि! ॥२४॥ तोमर छंद ॥ कीअ ऐस ब्रहमा उचार ॥ तै पुत्र पावस बार! ॥ तबि नारि ए सुन बैन ॥ बहु आसु डारत नैन ॥२५॥ तब बाल बिकल सरीर ॥ जल स्रवत नैन अधीर ॥ रोमांचि गद गद बैन ॥ दिन ते भई जनु रैन ॥२६॥ रोमांचि बिकल सरीर ॥ तन कोप मान अधीर ॥ फरकंत उसटरु नैन ॥ बिनु बुध बोलत बैन ॥२७॥ मोहण छंद ॥ सुनि ऐस बैन ॥ म्रिगीएस नैन ॥ अति रूप धाम ॥ सुंदर सु बाम ॥२८॥ चल चाल चित ॥ परमं पवित ॥ अति कोप वंत ॥ मुनि त्रिअ बिअंत ॥२९॥ उपटंत केस ॥ मुनि त्रिअ सुदेस ॥ अति कोप अंगि ॥ सुंदर सुरंग ॥३०॥ तोरंत हार ॥ उपटंत बार ॥ डारंत धूरि ॥ रोखंत पूर ॥३१॥ तोमर छंद ॥ लखि कोप भी मुनि नारि ॥ उठि भाज ब्रहम उदार ॥ सिव संगि लै रिख सरब ॥ भयमान ह्वै तजि गरब ॥३२॥ तब कोप कै मुनि नारि ॥ सिर केस जटा उपारि ॥ करि सौ जबै कर मार ॥ तब लीन दत अवतार ॥३३॥ कर बाम मात्र समान ॥ करु दछनत्रि प्रमान ॥ कीआ पान भोग बिचार ॥ तब भए दत कुमार ॥३४॥ अनभूत उतम गात ॥ उचरंत सिम्रित सात ॥ मुखि बेद चार रड़ंत ॥ उपजो सु दत महंत ॥३५॥ सिव सिमरि पूरबल स्राप ॥ बपु दत को धरि आप ॥ उपजिओ निसूआ धामि ॥ अवतार प्रिथम सु ताम ॥३६॥ |
| पाधरी छंद ॥
उपजिओ सु दत मोनी महान ॥ दस चार चार बिदिआ निधान ॥ सासत्रगि सुध सुंदर सरूप ॥ अवधूत रूप गण सरब भूप ॥३७॥ संनिआस जोग किनो प्रकास ॥ पावन पवित सरबत्र दास ॥ जन धरिओ आनि बपु सरब जोग ॥ तजि राज साज अरु तिआग भोग ॥३८॥ आछिज रूप महिमा महान ॥ दस चारवंत सोभा निधान ॥ रवि अनिल तेज जल सो सुभाव ॥ उपजिआ जगत संन्यास राव ॥३९॥ संन्यास राज भए दत देव ॥ रुद्रावतार सुंदर अजेव ॥ पावक समान भये तेज जासु ॥ बसुधा समान धीरज सु तासु ॥४०॥ परमं पवित्र भए देव दत ॥ आछिज तेज अरु बिमल मति ॥ सोवरण देखि लाजंत अंग ॥ सोभंत सीस गंगा तरंग ॥४१॥ आजान बाहु अलिपत रूप ॥ आदग जोग सुंदर सरूप ॥ बिभूत अंग उजल सु बास ॥ संनिआस जोग किनो प्रकास ॥४२॥ अविलोकि अंग महिमा अपार ॥ संनिआस राज उपजा उदार ॥ अनभूत गात आभा अनंत ॥ मोनी महान सोभा लसंत ॥४३॥ आभा अपार महिमा अनंत ॥ संन्यास राज किनो बिअंत ॥ कांपिआ कपटु तिह उदे होत ॥ ततछिन अकपट किनो उदोत ॥४४॥ महिमा अछिज अनभूत गात ॥ आविलोकि पुत्र चकि रही मात ॥ देसन बिदेस चकि रही सरब ॥ सुनि सरब रिखिन तजि दीन गरब ॥४५॥ सरबत्र प्याल सरबत्र अकास ॥ चल चाल चितु सुंदर सु बास ॥ क्मपाइमान हरखंत रोम ॥ आनंदमान सभ भई भोम ॥४६॥ थरहरत भूमि आकास सरब ॥ जह तह रिखीन तजि दीन गरब ॥ बाजे बजंत्र अनेक गैन ॥ दस दिउस पाइ दिखी न रैण ॥४७॥ जह तह बजंत्र बाजे अनेक ॥ प्रगटिआ जाणु बपु धरि बिबेक ॥ सोभा अपार बरनी न जाइ ॥ उपजिआ आन संन्यास राइ ॥४८॥ जनमंत लागि उठ जोग करम ॥ हति कीओ पाप परचुरिओ धरम ॥ राजाधिराज बड लाग चरन ॥ संनिआस जोग उठि लाग करन ॥४९॥ |
| अतिभुति अनूप लखि दत राइ ॥
उठि लगे पाइ न्रिप सरब आइ ॥ अविलोकि दत महिमा महान ॥ दस चार चार बिदिआ निधान ॥५०॥ सोभंत सीस जत की जटान ॥ नख नेम के सु बढए महान ॥ बिभ्रम बिभूत उजल सो सोह ॥ दिज चरज तुलि म्रिग चरम अरोह ॥५१॥ मुख सित बिभूत लंगोट बंद ॥ संन्यास चरज तजि छंद बंद ॥ आसुनक सुंनि अनव्यकत अंग ॥ आछिज तेज महिमा सुरंग ॥५२॥ इक आस चित तजि सरब आस ॥ अनभूत गात निस दिन उदास ॥ मुनि चरज लीन तजि सरब काम ॥ आरकति नेत्र जनु धरम धाम ॥५३॥ अबिकार चित अणडोल अंग ॥ जुत धिआन नेत्र महिमा अभंग ॥ धरि एक आस अउदास चित ॥ संनियास देव परमं पवित ॥५४॥ अवधूत गात महिमा अपार ॥ स्रुति गिआन सिंधु बिदिआ उदार ॥ मुनि मनि प्रबीन गुनि गन महान ॥ जनु भयो परम गिआनी महान ॥५५॥ कबहूं न पाप जिह छुहा अंग ॥ गुनि गन स्मपंन सुंदर सुरंग ॥ लंगोटबंद अवधूत गात ॥ चकि रही चित अवलोकि मात ॥५६॥ संनियास देव अनभूत अंग ॥ लाजंत देखि जिह दुति अनंग ॥ मुनि दत देव संन्यास राज ॥ जिह सधे सरब संन्यास साज ॥५७॥ परमं पवित्र जा के सरीर ॥ कबहूं न काम किनो अधीर ॥ जट जोग जासु सोभंत सीस ॥ अस धरा रूप संनियास ईस ॥५८॥ आभा अपार कथि सकै कउन ॥ सुनि रहै जछ गंध्रब मउन ॥ चकि रहिओ ब्रहम आभा बिचारि ॥ लाजयो अनंग आभा निहारि ॥५९॥ अति गिआनवंत करमन प्रबीन ॥ अन आस गात हरि को अधीन ॥ छबि दिपत कोट सूरज प्रमान ॥ चक रहा चंद लखि आसमान ॥६०॥ उपजिया आप इक जोग रूप ॥ पुनि लगो जोग साधन अनूप ॥ ग्रिह प्रिथम छाडि उठि चला दत ॥ परमं पवित्र निरमली मति ॥६१॥ जब कीन जोग बहु दिन प्रमान ॥ तब काल देव रीझे निदान ॥ इमि भई बिओम बानी बनाइ ॥ तुम सुणहु बैन संन्यास राइ! ॥६२॥ |
| आकास बानी बाचि दत प्रति ॥
पाधड़ी छंद ॥ गुर हीण मुकति नही होत दत! ॥ तुहि कहो बात सुनि बिमल मत! ॥ गुर करहि प्रिथम तब होगि मुकति ॥ कहि दीन काल तिह जोग जुगत ॥६३॥ बहु भांति दत दंडवत कीन ॥ आसा बिरहति हरि को अधीन ॥ बहु भात जोग साधना साधि ॥ आदग जोग महिमा अगाध ॥६४॥ तब नमसकार करि दत देव ॥ उचरंत परम उसतति अभेव ॥ जोगीन जोग राजान राज ॥ अनभूत अंग जह तह बिराज ॥६५॥ जल थल बियाप जिह तेज एक ॥ गावंत जासु मुनि गन अनेक ॥ जिह नेति नेति भाखंत निगम ॥ ते आदि अंत मधह अगम ॥६६॥ जिह एक रूप किने अनेक ॥ पुहमी अकास किने बिबेक ॥ जल बा थलेस सब ठौर जान ॥ अनभै अजोनि अनि आस मान ॥६७॥ पावन प्रसिध परमं पुनीत ॥ आजान बाह अनभउ अजीत ॥ परमं प्रसिध पूरण पुराण ॥ राजान राज भोगी महाण ॥६८॥ अनछिज तेज अनभै प्रकास ॥ खड़गन सपंन परमं प्रभास ॥ आभा अनंत बरनी न जाइ ॥ फिर फिरे सरब मति को चलाइ ॥६९॥ सबहू बखान जिह नेति नेति ॥ अकलंक रूप आभा अमेत ॥ सरबं सम्रिध जिह पान लाग ॥ जिह नाम लेत सब पाप भाग ॥७०॥ गुन सील साधु ता के सुभाइ ॥ बिनु तास सरनि नही कोऊ उपाइ ॥ दीनन उधारणि जासु बान ॥ कोऊ कहै कैसेई लेत मान ॥७१॥ अकलंक रूप अनछिज तेज ॥ आसन अडोल सुभ सुभ्र सेज ॥ अनगन जासु गुन मधि सोभ ॥ लखि सत्र मित्र जिह रहत लोभ ॥७२॥ जिह सत्र मित्र सम एक जान ॥ उसतती निंद जिह एक मान ॥ आसन अडोल अनछिज रूप ॥ परमं पवित्र भूपाण भूप ॥७३॥ जिहबा सुधान खग उध सोहि ॥ अविलोक दईत अरु देव मोहि ॥ बिनु बैर रूप अनभव प्रकास ॥ अनछिज गात निसि दिन निरास ॥७४॥ दुति आदि अंति एकै समान ॥ खड़गंन सपंनि सब बिधि निधान ॥ सोभा सु बहुत तन जासु सोभ ॥ दुति देखि जछ गंध्रब लोभ ॥७५॥ |
| अनभंग अंग अनभव प्रकास ॥
पसरी जगति जिह जीव रासि ॥ किने सु जीव जलि थलि अनेक ॥ अंतहि समेय फुनि रूप एक ॥७६॥ जिह छूआ नैकु नही काल जालु ॥ छ्वै सका पाप नही कउन काल ॥ आछिज तेज अनभूत गात ॥ एकै सरूप निस दिन प्रभात ॥७७॥ इह भांति दत असतोत्र पाठ ॥ मुख पड़त अछ्र गयो पाप नाठ ॥ को सकै बरन? महिमा अपार ॥ संछेप कीन ता ते उचार ॥७८॥ जे करै पत्र कासिपी सरब ॥ लिखे गणेस करि कै सु गरब ॥ मसु सरब सिंध लेखक बनेसि ॥ नही तदिप अंति कहि सकै सेसु ॥७९॥ जउ करै बैठि ब्रहमा उचार ॥ नही तदिप तेज पायंत पार ॥ मुख सहंस नाम फण पति रड़ंत ॥ नही तदिप तासु पायंत अंतु ॥८०॥ निस दिन जपंत सनकं सनात ॥ नही तदिप तासु सोभा निरात ॥ मुख चार बेद किने उचार ॥ तजि गरब नेति नेतै बिचार ॥८१॥ सिव सहंस्र बरख लौ जोग कीन ॥ तजि नेह गेह बन बास लीन ॥ बहु कीन जोग तह बहु प्रकार ॥ नही तदिप तासु लहि सका पार ॥८२॥ जिह एक रूप अनकं प्रकास ॥ अबियकत तेज निस दिन उदास ॥ आसन अडोल महिमा अभंग ॥ अनभव प्रकास सोभा सुरंग ॥८३॥ जिह सत्रु मित्र एकै समान ॥ अबियकत तेज महिमा महान ॥ जिह आदि अंति एकै सरूप ॥ सुंदर सुरंग जग करि अरूप ॥८४॥ जिह राग रंग नही रूप रेख ॥ नही नाम ठाम अनभव अभेख ॥ आजान बाहि अनभव प्रकास ॥ आभा अनंत महिमा सु बास ॥८५॥ कई कलप जोग जिनि करत बीत ॥ नही तदिप तउन धरि गए चीत ॥ मुनि मन अनेक गुनि गन महान ॥ बहु कसट करत नही धरत धिआन ॥८६॥ जिह एक रूप किने अनेक ॥ अंतहि समेय फुनि भए एक ॥ कई कोटि जंत जीवन उपाइ ॥ फिरि अंत लेत आपहि मिलाइ ॥८७॥ जिह जगत जीव सब परे सरनि ॥ मुन मनि अनेक जिह जपत चरन ॥ कई कलप तिहं करत धिआन ॥ कहूं न देखि तिह बिदिमान ॥८८॥ |
| आभा अनंत महिमा अपार ॥
मुन मनि महान अत ही उदार ॥ आछिज तेज सूरति अपार ॥ नही सकत बुध करि कै बिचार ॥८९॥ जिह आदि अंति एकहि सरूप ॥ सोभा अभंग महिमा अनूप ॥ जिह कीन जोति उदोत सरब ॥ जिह हत्यो सरब गरबीन गरब ॥९०॥ जिह गरबवंत एकै न राख ॥ फिरि कहो बैण नही बैण भाख ॥ इक बार मारि मार्यो न सत्रु ॥ इक बार डारि डारिओ न अत्र ॥९१॥ सेवक थापि नही दूर कीन ॥ लखि भई भूल मुखि बिहस दीन ॥ जिह गही बाहिं किनो निबाह ॥ त्रीया एक ब्याहि, नही कीन ब्याह ॥९२॥ रीझंत कोटि नही कसट कीन ॥ सीझंत एक ही नाम लीन ॥ अनकपट रूप अनभउ प्रकास ॥ खड़गन सपंनि निस दिन निरास ॥९३॥ परमं पवित्र पूरण पुराण ॥ महिमा अभंग सोभा निधान ॥ पावन प्रसिध परमं पुनीत ॥ आजान बाहु अनभै अजीत ॥९४॥ कई कोटि इंद्र जिह पानिहार ॥ कई चंद सूर क्रिसनावतार ॥ कई बिसन रुद्र रामा रसूल ॥ बिनु भगति यौ न कोई कबूल ॥९५॥ कई दत सत गोरख देव ॥ मुनमनि मछिंद्र नही लखत भेव ॥ बहु भांति मंत्र मत कै प्रकास ॥ बिनु एक आस सभ ही निरास ॥९६॥ जिह नेति नेति भाखत निगम ॥ करतार सरब कारण अगम ॥ जिह लखत कोई नही कउन जाति ॥ जिह नाहि पिता भ्रित तात मात ॥९७॥ जानी न जात जिह रंग रूप ॥ साहान साहि भूपान भूप ॥ जिह बरण जाति नही क्रित अनंत ॥ आदो अपार निरबिख बिअंत ॥९८॥ बरणी न जाति जिह रंग रेख ॥ अतभुत अनंत अति बल अभेख ॥ अनखंड चित अबिकार रूप ॥ देवान देव महिमा अनूप ॥९९॥ उसतती निंद जिह इक समान ॥ आभा अखंड महिमा महान ॥ अबिकार चित अनुभव प्रकास ॥ घटि घटि बियाप निस दिन उदास ॥१००॥ इह भांति दत उसतति उचार ॥ डंडवत कीन अत्रिज उदार ॥ अरु भांति भांति उठि परत चरनि ॥ जानी न जाइ जिह जाति बरन ॥१०१॥ |
| जउ करै क्रित कई जुग उचार ॥
नही तदिप तासु लहि जात पार ॥ मम अलप बुधि तव गुन अनंत ॥ बरना न जात तुम अति बिअंत ॥१०२॥ तव गुण अति ऊच अ्मबर समान ॥ मम अलप बुधि बालक अजान ॥ किम सकौ बरन? तुमरे प्रभाव ॥ तव परा सरणि तजि सभ उपाव ॥१०३॥ जिह लखत चत्र नहि भेद बेद ॥ आभा अनंत महिमा अछेद ॥ गुन गनत चत्रमुख परा हार ॥ तब नेति नेति किनो उचार ॥१०४॥ थकि गिरिओ ब्रिध सिर लिखत कित ॥ चकि रहे बालिखिलादि चित ॥ गुन गनत चत्रमुख हार मानि ॥ हठि तजि बिअंति किनो बखान ॥१०५॥ तह जपत रुद्र जुग कोटि भीत ॥ बहि गई गंग सिर मुरि न चीत ॥ कई कलप बीत जिह धरति धिआन ॥ नही तदिप धिआन आए सुजान ॥१०६॥ जब कीन नालि ब्रहमा प्रवेस ॥ मुन मनि महान दिजबर दिजेस ॥ नही कमल नाल को लखा पार ॥ कहो तासु कैस पावै बिचार? ॥१०७॥ बरनी न जाति जिह छबि सुरंग ॥ आभा आपार महिमा अभंग ॥ जिह एक रूप किनो अनेक ॥ पग छोरि आन, तिह धरो टेक ॥१०८॥ रूआल छंद ॥ भांति भांति बिअंति देस; भवंत किरत उचार ॥ भांति भांति पगो लगा; तजि गरब अत्रि कुमार ॥ कोटि बरख करी जबै; हरि सेवि वा चितु लाइ ॥ अकसमात भई तबै; तिह बिओम बान बनाइ ॥१०९॥ ब्योम बानी बाच दत प्रति ॥ दत! सति कहो तुझै; गुर हीण मुकति न होइ ॥ राव रंक प्रजा वजा; इम भाखई सभ कोइ ॥ कोटि कसट न किउ करो; नही ऐस देहि उधार ॥ जाइ कै गुर कीजीऐ; सुनि सति अत्रि कुमार ॥११०॥ दत बाच ॥ रूआल छंद ॥ ऐस बाक भए जबै; तब दत सत सरूप ॥ सिंधु सील सुब्रित को; नद ग्यान को जनु कूप ॥ पान लाग डंडौति कै; इह भांति कीन उचार ॥ कउन सो? गुर कीजीऐ; कहि मोहि तत बिचार ॥१११॥ |
| ब्योम बानी बाच ॥
जउन चित बिखै रुचै; सोई कीजीऐ गुरदेव ॥ तिआग करि कै कपट कउ; चित लाइ कीजै सेव ॥ रीझ है गुरदेव तउ; तुम पाइ हो बरु दान ॥ यौ न होइ उधार पै; सुनि लेहु दत सुजान! ॥११२॥ प्रिथम मंत्र दयो जिनै; सोई जानि कै गुरदेव ॥ जोग कारण को चला; जीअ जानि कै अनभेव ॥ तात मात रहे मनै करि; मान बैन न एक ॥ घोर कानिन कौ चला; धरि जोगि न्यास अनेक ॥११३॥ घोर काननि मै करी; तपसा अनेक प्रकार ॥ भांति भांतिन के करे; इक चित मंत्र उचार ॥ कसट कै जब ही कीआ तप; घोर बरख प्रमान ॥ बुधि को बरु देत भे; तब आनि बुधि निधान ॥११४॥ बुधि कौ बरु जउ दयो; तिन आन बुध अनंत ॥ परम पुरख पवित्र कै गए; दत देव महंत ॥ अकसमात्र बढी तबै बुधि; जत्र तत्र दिसान ॥ धरम प्रचुर कीआ जही; तह परम पाप खिसान ॥११५॥ प्रिथम अकाल गुरू कीआ; जिह को कबै नही नास ॥ जत्र तत्र दिसा विसा; जिह ठउर सरब निवास ॥ अंड जेरज सेत उतभुज; कीन जास पसार ॥ ताहि जान गुरू कीयो मुनि; सति दत सु धार ॥११६॥ इति स्री दत महातमे प्रथम गुरू अकाल पुरख समापतं ॥१॥ रूआल छंद ॥ परम रूप पवित्र मुनि मन; जोग करम निधान ॥ दूसरे गुर कउ करा; मन ई मनै मुनि मानि ॥ नाथ तउ ही पछान जो; मन मानई जिह काल ॥ सिध तउ मन कामना; सुध होत है सुनि लाल! ॥११७॥ इति स्री दत महातमे दुतीआ गुरू मन बरननं धिआइ समापतं ॥२॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ जबै द्वै सु कीने गुरू दत देवं ॥ सदा एक चितं करै नित सेवं ॥ जटा जूट सीसं सु गंगा तरंगं ॥ कबै छ्वै सका अंग को न अनंगं ॥११८॥ महा उजली अंग बिभूत सोहै ॥ लखै मोन मानी महा मान मोहै ॥ जटा जूट गंगा तरंगं महानं ॥ महा बुधि उदार बिदिआ निधानं ॥११९॥ |
| भगउहे लसै बसत्र लंगोट बंदं ॥
तजे सरब आसा रटै एक छंदं ॥ महा मोन मानी महा मोन बाधे ॥ महा जोग करमं सभै न्यास साधे ॥१२०॥ दया सिंधु सरबं सुभं करम करता ॥ हरे सरब गरबं महा तेज धरता ॥ महा जोग की साधना सरब साधी ॥ महा मोन मानी महा सिध लाधी ॥१२१॥ उठै प्राति संधिआ करै नान जावै ॥ करै साधना जोग की जोग भावै ॥ त्रिकालग दरसी महा परम ततं ॥ सु संन्यासु देवं महा सुध मतं ॥१२२॥ पियासा छुधा आन कै जो संतावै ॥ रहे एक चितं न चितं चलावै ॥ करै जोग न्यासं निरासं उदासी ॥ धरे मेखला परम ततं प्रकासी ॥१२३॥ महा आतम दरसी महा तत बेता ॥ थिरं आसणेकं महा ऊरधरेता ॥ करै सति करमं कुकरमं प्रनासं ॥ रहै एक चितं मुनीसं उदासं ॥१२४॥ सुभं सासत्रगंता कुकरमं प्रणासी ॥ बसै काननेसं सुपात्रं उदासी ॥ तज्यो काम करोधं सबै लोभ मोहं ॥ महा जोग ज्वाला महा मोनि सोहं ॥१२५॥ करै न्यास एकं अनेकं प्रकारी ॥ महा ब्रहमचरजं सु धरमाधिकारी ॥ महा तत बेता सु संन्यास जोगं ॥ अनासं उदासी सु बासं अरोगं ॥१२६॥ अनास महा ऊरधरेता संन्यासी ॥ महा तत बेता अनासं उदासी ॥ सबै जोग साधै रहै एक चितं ॥ तजै अउर सरबं गह्यो एक हितं ॥१२७॥ तरे ताप धूमं करै पान उचं ॥ झुलै मधि अगनं तउ धिआन मुचं ॥ महा ब्रहमचरजं महा धरम धारी ॥ भए दत के रुद्र पूरण वतारी ॥१२८॥ हठी तापसी मोन मंत्र महानं ॥ परं पूरणं दत प्रग्या निधानं ॥ करै जोग न्यासं तजे राज भोगं ॥ चके सरब देवं जके सरब लोगं ॥१२९॥ जके जछ गंध्रब बिदिआ निधानं ॥ चके देवता चंद सूरं सुरानं ॥ छके जीव जंत्रं लखे परम रूपं ॥ तज्यो गरब सरबं लगे पान भूपं ॥१३०॥ जटी दंड मुंडी तपी ब्रहमचारी ॥ जती जंगमी जामनी जंत्र धारी ॥ परी पारबती परम देसी पछेले ॥ बली बालखी बंग रूमी रुहेले ॥१३१॥ |
| जटी जामनी जंत्र धारी छलारे ॥
अजी आमरी निवलका करम वारे ॥ अतेवागनहोत्री जूआ जग्य धारी ॥ अधं उरधरेते बरं ब्रहमचारी ॥१३२॥ जिते देस देसं हुते छत्रधारी ॥ सबै पान लगे तज्यो गरब भारी ॥ करै लाग सरबं सु संन्यास जोगं ॥ इही पंथ लागे सुभं सरब लोगं ॥१३३॥ सबे देस देसान ते लोग आए ॥ करं दत के आनि मूंडं मुंडाए ॥ धरे सीस पै परम जूटे जटानं ॥ करै लागि संन्यास जोग अप्रमानं ॥१३४॥ रूआल छंद ॥ देस देसन के सबै न्रिप; आनि कै तहि ठउर ॥ जानि पान परै सबै; गुरु दत स्री सरमउर ॥ तिआगि अउर नए मति; एक ही मति ठान ॥ आनि मूंड मुंडात भे; सभ राज पाट निधान ॥१३५॥ आनि आनि लगे सबै पग; जानि कै गुरदेव ॥ ससत्र सासत्र सबै भ्रितांबर; अनंत रूप अभेव ॥ अछिद गात अछिज रूप; अभिद जोग दुरंत ॥ अमित उजल अजित परम; उपजिओ सु दत महंत ॥१३६॥ पेखि रूप चके चराचर सरब ब्योम बिमान ॥ जत्र तत्र रहे नराधप; चित्र रूप समान ॥ अत्र छत्र न्रिपत को तजि; जोग लै संन्यास ॥ आनि आनि करै लगे ह्वै; जत्र तत्र उदास ॥१३७॥ इंद्र उपिंद्र चके सबै; चित चउकियो ससि भानु ॥ लै न दत छनाइ आज; न्रिपत मोर महान ॥ रीझ रीझ रहे जहा तहा; सरब ब्योम बिमान ॥ जान जान सबै परे; गुरदेव दत महान ॥१३८॥ जत्र तत्र दिसा विसा; न्रिप राज साज बिसार ॥ आनि आनि सबो गहे; पग दत देव उदार ॥ जानि जानि सु धरम को घर; मानि कै गुरदेव ॥ प्रीति मान सबै लगे; मन छाडि कै अहमेव ॥१३९॥ राज साज सबै तजे न्रिप; भेस कै संन्यास ॥ आनि जोग करै लगे ह्वै; जत्र तत्र उदास ॥ मंडि अंगि बिभूत उजल; सीस जूट जटान ॥ भांति भातन सौ सुभे; सभ राज पाट निधान ॥१४०॥ |
| जत्र तत्र बिसारि स्मपति; पुत्र मित्र कलत्र ॥
भेस लै संन्यास को; न्रिप छाडि कै जय पत्र ॥ बाज राज समाज सुंदर; छाड के गज राज ॥ आनि आनि बसे महा बनि; जत्र तत्र उदास ॥१४१॥ पाधड़ी छंद ॥ त्वप्रसादि ॥ इह भांति सरब छित के न्रिपाल ॥ संन्यास जोग लागे उताल ॥ इक करै लागि निवलि आदि करम ॥ इक धरत धिआन लै बसत्र चरम ॥१४२॥ इक धरत बसत्र बलकलन अंगि ॥ इक रहत कलप इसथित उतंग ॥ इक करत अलप दुगधा अहार ॥ इक रहत बरख बहु निराहार ॥१४३॥ इक रहत मोन मोनी महान ॥ इक करत न्यास तजि खान पान ॥ इक रहत एक पग निराधार ॥ इक बसत ग्राम कानन पहार ॥१४४॥ इक करत कसट कर धूम्र पान ॥ इक करत भांति भांतिन सनान ॥ इक रहत इक पग जुग प्रमान ॥ कई ऊरध बाह मुनि मन महान ॥१४५॥ इक रहत बैठि जलि मधि जाइ ॥ इक तपत आगि ऊरध जराइ ॥ इक करत न्यास बहु बिधि प्रकार ॥ इक रहत एक आसा अधार ॥१४६॥ केई कबहूं नीच नही करत डीठ ॥ केई तपत आगि पर जार पीठ ॥ केई बैठ करत ब्रत चरज दान ॥ केई धरत चित एकै निधान ॥१४७॥ केई करत जगि अरु होम दान ॥ केई भांति भांति बिधवति इसनान ॥ केई धरत जाइ लै पिसट पान ॥ केई देत करम की छाडि बान ॥१४८॥ केई करत बैठि परमं प्रकास ॥ केई भ्रमत पब बनि बनि उदास ॥ केई रहत एक आसन अडोल ॥ केई जपत बैठि मुख मंत्र अमोल ॥१४९॥ केई करत बैठि हरि हरि उचार ॥ केई करत पाठ मुनि मन उदार ॥ केई भगति भाव भगवत भजंत ॥ केई रिचा बेद सिम्रित रटंत ॥१५०॥ केई एक पान असथित अडोल ॥ केई जपत जाप मनि चित खोलि ॥ केई रहत एक मन निराहार ॥ इक भछत पउन मुनि मन उदार ॥१५१॥ |
| इक करत निआस आसा बिहीन ॥
इक रहत एक भगवत अधीन ॥ इक करत नैकु बन फल अहार ॥ इक रटत नाम सिआमा अपार ॥१५२॥ इक एक आस आसा बिरहत ॥ इक बहुत भांति दुख देह सहत ॥ इक कहत एक हरि को कथान ॥ इक मुकत पत्र पावत निदान ॥१५३॥ इक परे सरणि हरि के दुआर ॥ इक रहत तासु नामै अधार ॥ इक जपत नाम ता को दुरंत ॥ इक अंति मुकति पावत बिअंत ॥१५४॥ इक करत नामु निस दिन उचार ॥ इक अगनि होत्र ब्रहमा बिचार ॥ इक सासत्र सरब सिम्रिति रटंत ॥ इक साध रीति निस दिन चलंत ॥१५५॥ इक होम दान अरु बेद रीति ॥ इक रटत बैठि खट सासत्र मीत ॥ इक करत बेद चारो उचार ॥ इक गिआन गाथ महिमा अपार ॥१५६॥ इक भांति भांति मिसटान भोज ॥ बहु दीन बोलि भछ देत रोज ॥ केई करत बैठि बहु भांति पाठ ॥ कई अंनि तिआगि चाबंत काठ ॥१५७॥ पाधड़ी छंद ॥ केई भांति भांति सो धरत धिआन ॥ केई करत बैठि हरि क्रित कानि ॥ केई सुनत पाठ परमं पुनीत ॥ नही मुरत कलप बहुत जात बीत ॥१५८॥ केई बैठ करत जलि को अहार ॥ केई भ्रमत देस देसन पहार ॥ केई जपत मध कंदरी दीह ॥ केई ब्रहमचरज सरता मझीह ॥१५९॥ केई रहत बैठि मध नीर जाइ ॥ केई अगन जारि तापत बनाइ ॥ केई रहत सिधि मुख मोन ठान ॥ अनि आस चित इक आस मान ॥१६०॥ अनडोल गात अबिकार अंग ॥ महिमा महान आभा अभंग ॥ अनभै सरूप अनभव प्रकास ॥ अब्यकत तेज निस दिन उदास ॥१६१॥ इह भांति जोगि कीने अपार ॥ गुर बाझ यौ न होवै उधार ॥ तब परे दत के चरनि आनि ॥ कहि देहि जोग के गुर बिधान! ॥१६२॥ जल मधि जौन मुंडे अपार ॥ बन नाम तउन ह्वैगे कुमार ॥ गिरि मधि सिख किने अनेक ॥ गिरि भेस सहति समझो बिबेक ॥१६३॥ |
| भारथ भणंत जे भे दुरंत ॥
भारथी नाम ता के भणंत ॥ पुरि जास सिख कीने अपार ॥ पुरी नाम तउन जान बिचार ॥१६४॥ परबत बिखै सजे सिख कीन ॥ परबति सु नाम लै ताहि दीन ॥ इह भांति उचरि करि पंच नाम ॥ तब दत देव किंने बिस्राम ॥१६५॥ सागर मंझार जे सिख कीन ॥ सागरि सु नाम तिन के प्रबीन ॥ सारसुति तीर जे कीन चेल ॥ सारसुती नाम तिन नाम मेल ॥१६६॥ तीरथन बीच जे सिख कीन ॥ तीरथि सु नाम तिन को प्रबीन ॥ जिन चरन दत के गहे आनि ॥ ते भए सरब बिदिआ निधान ॥१६७॥ इमि करत सिख जह तह बिहारि ॥ आस्रमन बीच जो जो निहारि ॥ तह तही सिख जो कीन जाइ ॥ आस्रमि सु नाम को तिन सुहाइ ॥१६८॥ आरंन बीच जेअ भे दत ॥ संन्यास राज अति बिमल मति ॥ तह तह सु कीन जे सिख जाइ ॥ अरिंनि नाम तिन को रखाइ ॥१६९॥ इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे दत महातमे अनभउ प्रकासे दस नाम ध्याय स्मपूरण ॥ पाधड़ी छंद ॥ आजान बाहु अतिसै प्रभाव ॥ अबियकत तेज संन्यास राव ॥ जह जह बिहार मुनि करत दत ॥ अनभउ प्रकास अरु बिमल मत ॥१७०॥ जे हुते देस देसन न्रिपाल ॥ तजि गरब पान लागे सु ढाल ॥ तजि दीन अउर झूठे उपाइ ॥ द्रिड़ गहिओ एक संन्यास राइ ॥१७१॥ तजि सरब आस इक आस चित ॥ अबिकार चित परमं पवित ॥ जह करत देस देसन बिहार ॥ उठि चलत सरब राजा अपार ॥१७२॥ दोहरा ॥ गवन करत जिहं जिहं दिसा; मुनि मन दत अपार ॥ संगि चलत उठि सब प्रजा; तज घर बार पहार ॥१७३॥ चौपई ॥ जिह जिह देस मुनीसर गए ॥ ऊच नीच सब ही संगि भए ॥ एक जोग अरु रूप अपारा ॥ कउन न मोहै? कहो बिचारा ॥१७४॥ जह तह चला जोगु संन्यासा ॥ राज पाट तज भए उदासा ॥ ऐसी भूमि न देखीअत कोई ॥ जहा संन्यास जोग नही होई ॥१७५॥ इति मन नूं गुरू दूसर ठहराइआ समापतं ॥२॥ |
| ਅਥ ਤ੍ਰਿਤੀ ਗੁਰੂ ਮਕਰਕਾ ਕਥਨੰ ॥
अथ त्रिती गुरू मकरका कथनं ॥ चौपई ॥ चउबीस गुरू कीन जिहा भाता ॥ अब सुन लेहु कहो इह बाता ॥ एक मकरका दत निहारी ॥ ऐस ह्रिदे अनुमान बिचारी ॥१७६॥ आपन हीऐ ऐस अनुमाना ॥ तीसर गुरु याहि हम माना ॥ प्रेम सूत की डोरि बढावै ॥ तब ही नाथ निरंजन पावै ॥१७७॥ आपन आपु आप मो दरसै ॥ अंतरि गुरू आतमा परसै ॥ एक छाडि कै अनत न धावै ॥ तब ही परम ततु को पावै ॥१७८॥ एक सरूप एक करि देखै ॥ आन भाव को भाव ने पेखै ॥ एक आस तजि अनत न धावै ॥ तब ही नाथ निरंजन पावै ॥१७९॥ केवल अंग रंग तिह राचै ॥ एक छाडि रस नेक न माचै ॥ परम ततु को धिआन लगावै ॥ तब ही नाथ निरंजन पावै ॥१८०॥ तीसर गुरू मकरिका ठानी ॥ आगे चला दत अभिमानी ॥ ता कर भाव ह्रिदे महि लीना ॥ हरखवंत तब चला प्रबीना ॥१८१॥ इति त्रिती गुरू मकरका समापतं ॥३॥
ਅਥ ਬਕ ਚਤਰਥ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ बक चतरथ गुरू कथनं ॥ चौपई ॥ जबै दत गुरु अगै सिधारा ॥ मछ रासकर बैठि निहारा ॥ उजल अंग अति धिआन लगावै ॥ मोनी सरब बिलोकि लजावै ॥१८२॥ जैसक धिआन मछ के काजा ॥ लावत बक नावै निरलाजा ॥ भली भांति इह धिआन लगावै ॥ भाव तास को मुनि मन भावै ॥१८३॥ ऐसो धिआन नाथ हित लईऐ ॥ तब ही परम पुरख कहु पईऐ ॥ मछांतक लखि दत लुभाना ॥ चतरथ गुरू तास अनुमाना ॥१८४॥ इति मछांतक चतुरथ गुरू समापतं ॥४॥
ਅਥ ਬਿੜਾਲ ਪੰਚਮ ਗੁਰੂ ਨਾਮ ॥ अथ बिड़ाल पंचम गुरू नाम ॥ चौपई ॥ आगे चला दत मुनि राई ॥ सीस जटा कह जूट छकाई ॥ देखा एक बिड़ाल जु आगे ॥ धिआन लाइ मुनि निरखन लागै ॥१८५॥ मूस काज जस लावत धिआनू ॥ लाजत देखि महंत महानूं ॥ ऐस धिआन हरि हेत लगईऐ ॥ तब ही नाथ निरंजन पईऐ ॥१८६॥ |
| पंचम गुरू याहि हम जाना ॥
या कहु भाव हीऐ अनुमाना ॥ ऐसी भांति धिआन जो लावै ॥ सो निहचै साहिब को पावै ॥१८७॥ इति बिड़ाल पंचमो गुरू समापतं ॥५॥
ਅਥ ਧੁਨੀਆ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ धुनीआ गुरू कथनं ॥ चौपई ॥ आगे चला राज संन्यासा ॥ एक आस गहि ऐस अनासा ॥ तह इक रूम धुनखतो लहा ॥ ऐस भांति मन सौ मुनि कहा ॥१८८॥ भूप सैन इह जात न लही ॥ ग्रीवा नीच नीच ही रही ॥ सगल सैन वाही मग गई ॥ ता कौ नैकु खबर नही भई ॥१८९॥ रूई धुनखतो फिरि न निहारा ॥ नीच ही ग्रीवा रहा बिचारा ॥ दत बिलोकि हीए मुसकाना ॥ खसटम गुरू तिसी कहु जाना ॥१९०॥ रूम हेत इह जिम चितु लायो ॥ सैन गई परु सिर न उचायो ॥ तैसीए प्रभ सौ प्रीति लगईऐ ॥ तब ही पुरख पुरातन पईऐ ॥१९१॥ इति रूई धुनखता पेंजा खसटमो गुरू समापतं ॥६॥
ਅਥ ਮਾਛੀ ਸਪਤਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ माछी सपतमो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥ आगे चला राज संन्यासा ॥ महा बिमल मन भयो उदासा ॥ निरखा तहा एक मछहा ॥ लए जार करि जात न कहा ॥१९२॥ बिनछी एक हाथ मो धारे ॥ जरीआ अंध कंध पर डारे ॥ इसथित एक मछि की आसा ॥ जानुक वा के मध न सासा ॥१९३॥ एकसु ठांढ मछ की आसू ॥ राज पाट ते जान उदासू ॥ इह बिधि नेह नाथ सौ लईऐ ॥ तब ही पूरन पुरख कह पईऐ ॥१९४॥ इति माछी गुरू सपतमो समापतं ॥७॥
ਅਥ ਚੇਰੀ ਅਸਟਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ चेरी असटमो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥ हरखत अंग संग सैना सुनि ॥ आयो दछ प्रजापति के मुनि ॥ तहा एक चेरका निहारी ॥ चंदन घसत मनो मतवारी ॥१९५॥ |
| चंदन घसत नारि सुभ धरमा ॥
एक चित ह्वै आपन घर मा ॥ एक चित नही चित चलावै ॥ प्रितमा चित्र बिलोकि लजावै ॥१९६॥ दत लए संन्यासन संगा ॥ जात भयो तह भेटत अंगा ॥ सीस उचाइ न तास निहारा ॥ राव रंक को जात बिचारा ॥१९७॥ ता को दत बिलोकि प्रभावा ॥ असटम गुरू ताहि ठहरावा ॥ धंनि धंनि इह चेरका सभागी ॥ जा की प्रीति नाथ संगि लागी ॥१९८॥ ऐस प्रीति हरि हेत लगइयै ॥ तब ही नाथ निरंजन पइयै ॥ बिनु चिति दीन हाथि नही आवै ॥ चार बेद इमि भेद बतावै ॥१९९॥ इति चेरका असटमो गुरू समापतं ॥८॥
ਅਥ ਬਨਜਾਰਾ ਨਵਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ बनजारा नवमो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥ आगे चला जोग जट धारी ॥ लए संगि चेलका अपारी ॥ देखत बनखंड नगर पहारा ॥ आवत लखा एक बनजारा ॥२००॥ धन कर भरे सबै भंडारा ॥ चला संग लै टाड अपारा ॥ अमित गाव लवंगन के भरे ॥ बिधना ते नही जात बिचरे ॥२०१॥ राति दिवस तिन द्रब की आसा ॥ बेचन चला छाडि घर वासा ॥ और आस दूसर नही कोई ॥ एकै आस बनज की होई ॥२०२॥ छाह धूप को त्रास न मानै ॥ राति अउ दिवस गवन ई ठानै ॥ पाप पुंन की अउर न बाता ॥ एकै रस मात्रा के राता ॥२०३॥ ता कह देखि दत हरि भगतू ॥ जा कर रूप जगति जग मगतू ॥ ऐस भांति जो साहिब धिआईऐ ॥ तब ही पुरख पुरातन पाईऐ ॥२०४॥ इति बनजारा नउमो गुरू समापतं ॥९॥
ਅਥ ਕਾਛਨ ਦਸਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ काछन दसमो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥ चला मुनी तजि परहरि आसा ॥ महा मोनि अरु महा उदासा ॥ परम तत बेता बडभागी ॥ महा मोन हरि को अनुरागी ॥२०५॥ परम पुरख पूरो बडभागी ॥ महा मुनी हरि के रस पागी ॥ ब्रहम भगत खट गुन रस लीना ॥ एक नाम के रस सउ भीना ॥२०६॥ |
| उजल गात महा मुनि सोहै ॥
सुर नर मुनि सभ को मन मोहै ॥ जह जह जाइ दत सुभ करमा ॥ तह तह होत सभै निहकरमा ॥२०७॥ भरम मोह तिह देखत भागै ॥ राम भगति सभ ही उठि लागै ॥ पाप ताप सभ दूर पराई ॥ निसि दिन रहै एक लिव लाई ॥२०८॥ काछन एक तहा मिल गई ॥ सोआ चूक पुकारत भई ॥ भाव याहि मन माहि निहारा ॥ दसवो गुरू ताहि बीचारा ॥२०९॥ जो सोवै सो मूलु गवावै ॥ जो जागै हरि ह्रिदै बसावै ॥ सति बोलि या की हम मानी ॥ जोग धिआन जागै ते जानी ॥२१०॥ इति काछन गुरू दसवो समापतं ॥१०॥
ਅਥ ਸੁਰਥ ਯਾਰਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ सुरथ यारमो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥ आगे दत देव तब चला ॥ साधे सरब जोग की कला ॥ अमित तेज अरु उजल प्रभाउ ॥ जानुक बना दूसर हरि राउ ॥२११॥ सभ ही कला जोग की साधी ॥ महा सिधि मोनी मनि लाधी ॥ अधिक तेज अरु अधिक प्रभावा ॥ जा लखि इंद्रासन थहरावा ॥२१२॥ मधुभार छंद ॥ त्वप्रसादि ॥ मुनि मनि उदार ॥ गुन गन अपार ॥ हरि भगति लीन ॥ हरि को अधीन ॥२१३॥ तजि राज भोग ॥ संन्यास जोग ॥ संन्यास राइ ॥ हरि भगत भाइ ॥२१४॥ मुख छबि अपार ॥ पूरण वतार ॥ खड़गं असेख ॥ बिदिआ बिसेख ॥२१५॥ सुंदर सरूप ॥ महिमा अनूप ॥ आभा अपार ॥ मुनि मनि उदार ॥२१६॥ संनयास देव ॥ गुन गन अभेव ॥ अबियकत रूप ॥ महिमा अनूप ॥२१७॥ सभ सुभ सुभाव ॥ अतिभुत प्रभाव ॥ महिमा अपार ॥ गुन गन उदार ॥२१८॥ तह सुरथ राज ॥ स्मपति समाज ॥ पूजंत चंडि ॥ निसि दिन अखंड ॥२१९॥ न्रिप अति प्रचंड ॥ सभ बिधि अखंड ॥ सिलसित प्रबीन ॥ देवी अधीन ॥२२०॥ निसदिन भवानि ॥ सेवत निधान ॥ करि एक आस ॥ निसि दिन उदास ॥२२१॥ दुरगा पुजंत ॥ नितप्रति महंत ॥ बहु बिधि प्रकार ॥ सेवत सवार ॥२२२॥ |
| अति गुन निधान ॥
महिमा महान ॥ अति बिमल अंग ॥ लखि लजत गंग ॥२२३॥ तिह निरख दत ॥ अति बिमल मति ॥ अनखंड जोति ॥ जनु भिओ उदोत ॥२२४॥ झमकंत अंग ॥ लखि लजत गंग ॥ अति गुन निधान ॥ महिमा महान ॥२२५॥ अनभव प्रकास ॥ निस दिन उदास ॥ अतिभुत सुभाव ॥ संन्यास राव ॥२२६॥ लखि तासु सेव ॥ संन्यास देव ॥ अति चित रीझ ॥ तिह फासि बीझ ॥२२७॥ स्री भगवती छंद ॥ कि दिखिओत दतं ॥ कि परमंति मतं ॥ सु सरबत्र साजा ॥ कि दिखिओत राजा ॥२२८॥ कि आलोक करमं ॥ कि सरबत्र परमं ॥ कि आजित भूपं ॥ कि रतेस रूपं ॥२२९॥ कि आजान बाह ॥ कि सरबत्र साह ॥ कि धरमं सरूपं ॥ कि सरबत्र भूपं ॥२३०॥ कि साहान साहं ॥ कि आजानु बाहं ॥ कि जोगेंद्र गामी ॥ कि धरमेंद्र धामी ॥२३१॥ कि रुद्रारि रूपं ॥ कि भूपान भूपं ॥ कि आदग जोगं ॥ कि तिआगंत सोगं ॥२३२॥ मधुभार छंद ॥ बिमोहियोत देखी ॥ कि रावल भेखी ॥ कि संन्यास राजा ॥ कि सरबत्र साजा ॥२३३॥ कि स्मभाल देखा ॥ कि सुध चंद्र पेखा ॥ कि पावित्र करमं ॥ कि संनिआस धरमं ॥२३४॥ कि संनिआस भेखी ॥ कि आधरम द्वैखी ॥ कि सरबत्र गामी ॥ कि धरमेस धामी ॥२३५॥ कि आछिज जोगं ॥ कि आगम लोगं ॥ कि लंगोट बंधं ॥ कि सरबत्र मंधं ॥२३६॥ कि आछिज करमा ॥ कि आलोक धरमा ॥ कि आदेस करता ॥ कि संन्यास सरता ॥२३७॥ कि अगिआन हंता ॥ कि पारंग गंता ॥ कि आधरम हंता ॥ कि संन्यास भकता ॥२३८॥ कि खंकाल दासं ॥ कि सरबत्र भासं ॥ कि संन्यास राजं ॥ कि सरबत्र साजं ॥२३९॥ कि पारंग गंता ॥ कि आधरम हंता ॥ कि संनिआस भकता ॥ कि साजोज मुकता ॥२४०॥ कि आसकत करमं ॥ कि अबियकत धरमं ॥ कि अतेव जोगी ॥ कि अंगं अरोगी ॥२४१॥ कि सुधं सुरोसं ॥ न नैकु अंग रोसं ॥ न कुकरम करता ॥ कि धरमं सु सरता ॥२४२॥ |
| कि जोगाधिकारी ॥
कि संन्यास धारी ॥ कि ब्रहमं सु भगता ॥ कि आर्मभ जगता ॥२४३॥ कि जाटान जूटं ॥ कि निधिआन छूटं ॥ कि अबियकत अंगं ॥ कि कै पान भंगं ॥२४४॥ कि संन्यास करमी ॥ कि रावल धरमी ॥ कि त्रिकाल कुसली ॥ कि कामादि दुसली ॥२४५॥ कि डामार बाजै ॥ कि सब पाप भाजै ॥ कि बिभूत सोहै ॥ कि सरबत्र मोहै ॥२४६॥ कि लंगोट बंदी ॥ कि एकादि छंदी ॥ कि धरमान धरता ॥ कि पापान हरता ॥२४७॥ कि निनादि बाजै ॥ कि प्मपाप भाजै ॥ कि आदेस बुलै ॥ कि लै ग्रंथ खुलै ॥२४८॥ कि पावित्र देसी ॥ कि धरमेंद्र भेसी ॥ कि लंगोट बंदं ॥ कि आजोति वंदं ॥२४९॥ कि आनरथ रहिता ॥ कि संन्यास सहिता ॥ कि परमं पुनीतं ॥ कि सरबत्र मीतं ॥२५०॥ कि अचाचल अंगं ॥ कि जोगं अभंगं ॥ कि अबियकत रूपं ॥ कि संनिआस भूपं ॥२५१॥ कि बीरान राधी ॥ कि सरबत्र साधी ॥ कि पावित्र करमा ॥ कि संन्यास धरमा ॥२५२॥ अपाखंड रंगं ॥ कि आछिज अंगं ॥ कि अंनिआइ हरता ॥ कि सु न्याइ करता ॥२५३॥ कि करमं प्रनासी ॥ कि सरबत्र दासी ॥ कि अलिपत अंगी ॥ कि आभा अभंगी ॥२५४॥ कि सरबत्र गंता ॥ कि पापान हंता ॥ कि सासध जोगं ॥ कितं तिआग रोगं ॥२५५॥ इति सुरथ राजा यार्हमो गुरू बरननं समापतं ॥११॥
ਅਥ ਬਾਲੀ ਦੁਆਦਸਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ बाली दुआदसमो गुरू कथनं ॥ रसावल छंद ॥ चला दत आगे ॥ लखे पाप भागे ॥ बजै घंट घोरं ॥ बणं जाणु मोरं ॥२५६॥ नवं नाद बाजै ॥ धरा पाप भाजै ॥ करै देब्य अरचा ॥ चतुर बेद चरचा ॥२५७॥ स्रुतं सरब पाठं ॥ सु संन्यास राठं ॥ महाजोग न्यासं ॥ सदाई उदासं ॥२५८॥ खटं सासत्र चरचा ॥ रटै बेद अरचा ॥ महा मोन मानी ॥ कि संन्यास धानी ॥२५९॥ चला दत आगै ॥ लखे पाप भागै ॥ लखी एक कंनिआ ॥ तिहूं लोग धंनिआ ॥२६०॥ |
| महा ब्रहमचारी ॥
सु धरमाधिकारी ॥ लखी पानि वा के ॥ गुडी बालि ता के ॥२६१॥ खिलै खेल ता सो ॥ इसो हेत वा सो ॥ पीऐ पानि न आवै ॥ इसो खेल भावै ॥२६२॥ गए मोनि मानी ॥ तरै दिसट आनी ॥ न बाला निहार्यो ॥ न खेलं बिसार्यो ॥२६३॥ लखी दत बाला ॥ मनो रागमाला ॥ रंगी रंगि खेलं ॥ मनो नाग्र बेलं ॥२६४॥ तबै दत रायं ॥ लखे तास जायं ॥ गुरू तास कीना ॥ महा मंत्र भीना ॥२६५॥ गुरू तास जान्यो ॥ इमं मंत्र ठान्यो ॥ दसं द्वै निधानं ॥ गुरू दत जानं ॥२६६॥ रुणझुण छंद ॥ लखि छबि बाली ॥ अति दुति वाली ॥ अतिभुत रूपं ॥ जणु बुधि कूपं ॥२६७॥ फिर फिर पेखा ॥ बहु बिधि लेखा ॥ तन मन जाना ॥ गुन गन माना ॥२६८॥ तिह गुर कीना ॥ अति जसु लीना ॥ अगि तब चाला ॥ जनु मनि ज्वाला ॥२६९॥ इति दुआदस गुरू लड़की गुडी खेडती समापतं ॥१२॥
ਅਥ ਭ੍ਰਿਤ ਤ੍ਰੋਦਸਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ भ्रित त्रोदसमो गुरू कथनं ॥ तोमर छंद ॥ तब दत देव महान ॥ दस चार चार निधान ॥ अतिभुत उतम गात ॥ हरि नामु लेत प्रभात ॥२७०॥ अकलंक उजल अंग ॥ लखि लाज गंग तरंग ॥ अनभै अभूत सरूप ॥ लखि जोति लाजत भूप ॥२७१॥ अवलोकि सु भ्रित एक ॥ गुन मधि जासु अनेक ॥ अधि राति ठांढि दुआरि ॥ बहु बरख मेघ फुहार ॥२७२॥ अधि राति दत निहारि ॥ गुणवंत बिक्रम अपार ॥ जल मुसलधार परंत ॥ निज नैन देखि महंत ॥२७३॥ इक चित ठांढ सु ऐस ॥ सोवरन मूरति जैस ॥ द्रिड़ देखि ता की मति ॥ अति मनहि रीझे दत ॥२७४॥ नही सीत मानत घाम ॥ नही चित ल्यावत छाम ॥ नही नैकु मोरत अंग ॥ इक पाइ ठांढ अभंग ॥२७५॥ ढिग दत ता के जाइ ॥ अविलोकि तासु बनाए ॥ अधि रात्रि निरजन त्रास ॥ असि लीन ठांढ उदास ॥२७६॥ बरखंत मेघ महान ॥ भाजंत भूमि निधान ॥ जगि जीव सरब सु भास ॥ उठि भाज त्रास उदास ॥२७७॥ |
| इह ठांढ भूपति पउर ॥
मन जाप जापत गउर ॥ नही नैकु मोरत अंग ॥ इक पाव ठांढ अभंग ॥२७८॥ असि लीन पानि कराल ॥ चमकंत उजल ज्वाल ॥ जन काहू को नही मित्र ॥ इह भांति परम पवित्र ॥२७९॥ नही नैकु उचावत पाउ ॥ बहु भांति साधत दाउ ॥ अनआस भूपति भगत ॥ प्रभ एक ही रस पगत ॥२८०॥ जल परत मूसलधार ॥ ग्रिह ले न ओटि दुआर ॥ पसु पछ सरबि दिसान ॥ सभ देस देस सिधान ॥२८१॥ इह ठांढ है इक आस ॥ इक पान जान उदास ॥ असि लीन पानि प्रचंड ॥ अति तेजवंत अखंड ॥२८२॥ मनि आनि को नही भाव ॥ इक देव को चित चाव ॥ इक पाव ऐसे ठांढ ॥ रन ख्मभ जानुक गाड ॥२८३॥ जिह भूमि धारस पाव ॥ नही नैकु फेरि उचाव ॥ नही ठाम भीजस तउन ॥ अवलोक भइओ मुनि मउन ॥२८४॥ अवलोकि तासु मुनेस ॥ अकलंक भागवि भेस ॥ गुरु जानि परीआ पाइ ॥ तजि लाज साज सचाइ ॥२८५॥ तिह जान कै गुरदेव ॥ अकलंक दत अभेव ॥ चित तास के रस भीन ॥ गुरु त्रउदसमो तिह कीन ॥२८६॥ इति त्रउदसमो गुरू भ्रित समापतं ॥१३॥
ਅਥ ਚਤੁਰਦਸਮੋ ਗੁਰ ਨਾਮ ॥ अथ चतुरदसमो गुर नाम ॥ रसावल छंद ॥ चल्यो दत राजं ॥ लखे पाप भाजं ॥ जिनै नैकु पेखा ॥ गुरू तुलि लेखा ॥२८७॥ महा जोति राजै ॥ लखै पाप भाजै ॥ महा तेज सोहै ॥ सिवऊ तुलि को है ॥२८८॥ जिनै नैकु पेखा ॥ मनो मैन देखा ॥ सही ब्रहम जाना ॥ न द्वै भाव आना ॥२८९॥ रिझी सरब नारी ॥ महा तेज धारी ॥ न हारं स्मभारै ॥ न चीरऊ चितारै ॥२९०॥ चली धाइ ऐसे ॥ नदी नाव जैसे ॥ जुवा ब्रिध बालै ॥ रही कौ न आलै ॥२९१॥ लही एक नारी ॥ सु धरमाधिकारी ॥ किधौ पारबती छै ॥ मनो बासवी है ॥२९२॥ स्री भगवती छंद ॥ कि राजा स्री छै ॥ कि बिदुलता छै ॥ कि हईमाद्रजा है ॥ कि परमं प्रभा है ॥२९३॥ कि रामं त्रीआ है ॥ कि राजं प्रभा है ॥ कि राजेस्वरी छै ॥ कि रामानुजा छै ॥२९४॥ |
| कि कालिंद्र का छै ॥
कि कामं प्रभा छै ॥ कि देवानुजा है ॥ कि दईतेसुरा है ॥२९५॥ कि सावित्रका छै ॥ कि गाइत्री आछै ॥ कि देवेस्वरी है ॥ कि राजेस्वरी छै ॥२९६॥ कि मंत्रावली है ॥ कि तंत्रालका छै ॥ कि हईमाद्रजा छै ॥ कि हंसेसुरी है ॥२९७॥ कि जाजुलिका छै ॥ सुवरन आदिजा छै ॥ कि सुधं सची है ॥ कि ब्रहमा रची है ॥२९८॥ कि परमेसुरजा है ॥ कि परमं प्रभा है ॥ कि पावित्रता छै ॥ कि सावित्रका छै ॥२९९॥ कि चंचालका छै ॥ कि कामहि कला छै ॥ कि क्रितयं धुजा छै ॥ कि राजेस्वरी है ॥३००॥ कि राजहि सिरी है ॥ कि रामंकली है ॥ कि गउरी महा है ॥ कि टोडी प्रभा है ॥३०१॥ कि भूपालका छै ॥ कि टोडीज आछै ॥ कि बासंत बाला ॥ कि रागान माला ॥३०२॥ कि मेघं मलारी ॥ कि गउरी धमारी ॥ कि हिंडोल पुत्री ॥ कि आकास उतरी ॥३०३॥ सु सऊहाग वंती ॥ कि पारंग गंती ॥ कि खट सासत्र बकता ॥ कि निज नाह भगता ॥३०४॥ कि र्मभा सची है ॥ कि ब्रहमा रची है ॥ कि गंध्रबणी छै ॥ कि बिदिआधरी छै ॥३०५॥ कि र्मभा उरबसी छै ॥ कि सुधं सची छै ॥ कि हंस एस्वरी है ॥ कि हिंडोलका छै ॥३०६॥ कि गंध्रबणी है ॥ कि बिदिआधरी है ॥ कि राजहि सिरी छै ॥ कि राजहि प्रभा छै ॥३०७॥ कि राजानजा है ॥ कि रुद्रं प्रिआ है ॥ कि स्मभालका छै ॥ कि सुधं प्रभा छै ॥३०८॥ कि अ्मबालिका छै ॥ कि आकरखणी छै ॥ कि चंचालक छै ॥ कि चित्रं प्रभा है ॥३०९॥ कि कालिंद्रका छै ॥ कि सारस्वती है ॥ किधौ जान्हवी है ॥ किधौ दुआरका छै ॥३१०॥ कि कालिंद्रजा छै ॥ कि कामं प्रभा छै ॥ कि कामएसवरी है ॥ कि इंद्रानुजा है ॥३११॥ कि भै खंडणी छै ॥ कि ख्मभावती है ॥ कि बासंत नारी ॥ कि धरमाधिकारी ॥३१२॥ कि परमह प्रभा छै ॥ कि पावित्रता छै ॥ कि आलोकणी है ॥ कि आभा परी है ॥३१३॥ |
| कि चंद्रा मुखी छै ॥
कि सूरं प्रभा छै ॥ कि पावित्रता है ॥ कि परमं प्रभा है ॥३१४॥ कि सरपं लटी है ॥ कि दुखं कटी है ॥ कि चंचालका छै ॥ कि चंद्रं प्रभा छै ॥३१५॥ कि बुधं धरी है ॥ कि क्रुधं हरी है ॥ कि छत्रालका छै ॥ कि बिजं छटा है ॥३१६॥ कि छत्राणवी है ॥ कि छत्रंधरी है ॥ कि छत्रं प्रभा है ॥ कि छत्रं छटा है ॥३१७॥ कि बानं द्रिगी है ॥ नेत्रं म्रिगी है ॥ कि कउला प्रभा है ॥ निसेसाननी छै ॥३१८॥ कि गंध्रबणी है ॥ कि बिदिआधरी छै ॥ कि बासंत नारी ॥ कि भूतेस पिआरी ॥३१९॥ कि जाद्वेस नारी ॥ कि पंचाल बारी ॥ कि हिंडोलका छै ॥ कि राजह सिरी है ॥३२०॥ कि सोवरण पुत्री ॥ कि आकास उत्री ॥ कि स्वरणी प्रिता है ॥ कि सुव्रणं प्रभा है ॥३२१॥ कि पदमं द्रिगी है ॥ कि परमं प्रभी है ॥ कि बीराबरा है ॥ कि ससि की सुभा है ॥३२२॥ कि नागेसजा है ॥ नागन प्रभा है ॥ कि नलनं द्रिगी है ॥ कि मलिनी म्रिगी है ॥३२३॥ कि अमितं प्रभा है ॥ कि अमितोतमा है ॥ कि अकलंक रूपं ॥ कि सभ जगत भूपं ॥३२४॥ मोहणी छंद ॥ जुबणमय मंती सु बाली ॥ मुख नूरं पूरं उजाली ॥ म्रिग नैणी बैणी कोकिला ॥ ससि आभा सोभा चंचला ॥३२५॥ घणि मंझै जै है चंचाली ॥ म्रिदुहासा नासा खंकाली ॥ चखु चारं हारं कंठायं ॥ म्रिग नैणी बेणी मंडायं ॥३२६॥ गज गामं बामं सु गैणी ॥ म्रिदहासं बासं बिध बैणी ॥ चखु चारं हारं निरमला ॥ लखि आभा लजी चंचला ॥३२७॥ द्रिड़ धरमा करमा सुकरमं ॥ दुख हरता सरता जाणु धरमं ॥ मुख नूरं भूरं सु बासा ॥ चखु चारी बारी अंनासा ॥३२८॥ चखु चारं बारं चंचाली ॥ सत धरमा करमा संचाली ॥ दुख हरणी दरणी दुख द्वंदं ॥ प्रिया भकता बकता हरि छंदं ॥३२९॥ र्मभा उरबसीआ घ्रिताची ॥ अछै मोहणी आजे राची ॥ लखि सरबं गरबं परहारी ॥ मुखि नीचे धामं सिधारी ॥३३०॥ |
| गंधरबं सरबं देवाणी ॥
गिरजा गाइत्री लंकाणी ॥ सावित्री चंद्री इंद्राणी ॥ लखि लजी सोभा सूरजाणी ॥३३१॥ नागणीआ न्रितिआ जछाणी ॥ पापा पावित्री पबाणी ॥ पईसाच प्रेती भूतेसी ॥ भि्मभरीआ भामा भूपेसी ॥३३२॥ बर बरणी हरणी सब दुखं ॥ सुख करनी तरुणी ससि मुखं ॥ उरगी गंध्रबी जछानी ॥ लंकेसी भेसी इंद्राणी ॥३३३॥ द्रिग बानं तानं मदमती ॥ जुबन जगमगणी सुभवंती ॥ उरि धारं हारं बनि मालं ॥ मुखि सोभा सिखिरं जन ज्वालं ॥३३४॥ छतपत्री छत्री छत्राली ॥ बिधु बैणी नैणी न्रिमाली ॥ असि उपासी दासी निरलेपं ॥ बुधि खानं मानं संछेपं ॥३३५॥ सुभ सीलं डीलं सुख थानं ॥ मुख हासं रासं निरबानं ॥ प्रिया भकता बकता हरि नामं ॥ चित लैणी दैणी आरामं ॥३३६॥ प्रिय भकता ठाढी एकंगी ॥ रंग एकै रंगै सो रंगी ॥ निर बासा आसा एकातं ॥ पति दासी भासी परभातं ॥३३७॥ अनि निंद्र अनिंदा निरहारी ॥ प्रिय भकता बकता ब्रतचारी ॥ बासंती टोडी गउडी है ॥ भुपाली सारंग गउरी छै ॥३३८॥ हिंडोली मेघ मलारी है ॥ जैजावंती गौड मलारी छै ॥ बंगलीआ रागु बसंती छै ॥ बैरारी सोभावंती है ॥३३९॥ सोरठि सारंग बैरारी छै ॥ परज कि सुध मलारी छै ॥ हिंडोली काफी तैलंगी ॥ भैरवी दीपकी सुभंगी ॥३४०॥ सरबेवं रागं निरबाणी ॥ लखि लोभी आभा गरबाणी ॥ जउ कथउ सोभा सरबाणं ॥ तउ बाढे एकं ग्रंथाणं ॥३४१॥ लखि ताम दतं ब्रतचारी ॥ सब लगे पानं जटधारी ॥ तन मन भरता कर रस भीना ॥ चव दसवो ता कौ गुरु कीना ॥३४२॥ इति प्रिय भगत इसत्री चतुरदसवा गुरू समापतं ॥१४॥
ਅਥ ਬਾਨਗਰ ਪੰਧਰਵੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ बानगर पंधरवो गुरू कथनं ॥ तोटक छंद ॥ करि चउदसवों गुरु दत मुनं ॥ मग लगीआ पूरत नाद धुनं ॥ भ्रम पूरब पछम उत्र दिसं ॥ तकि चलीआ दछन मोन इसं ॥३४३॥ |
| अविलोकि तहा इक चित्र पुरं ॥
जनु क्रांति दिवालय सरब हरं ॥ नगरेस तहा बहु मारि म्रिगं ॥ सब सिंघ म्रिगीपति घाइ खगं ॥३४४॥ चतुरं लए न्रिप संगि घनी ॥ थहरंत धुजा चमकंत अनी ॥ बहु भूखन चीर जराव जरी ॥ त्रिदसालय की जनु क्रांति हरी ॥३४५॥ तह बैठ हुतो इक बाणगरं ॥ बिनु प्राण किधौ नही बैनुचरं ॥ तह बाजत बाज म्रिदंग गणं ॥ डफ ढोलक झांझ मुचंग भणं ॥३४६॥ दल नाथ लए बहु संगि दलं ॥ जल बारिध जानु प्रलै उछलं ॥ हय हिंसत चिंसत गूड़ गजं ॥ गल गजत लजत सुंड लजं ॥३४७॥ द्रुम ढाहत गाहत गूड़ दलं ॥ कर खीचत सीचत धार जलं ॥ सुख पावत धावत पेखि प्रभै ॥ अवलोकि बिमोहत राज सुभै ॥३४८॥ चपि डारत चाचर भानु सूअं ॥ सुख पावत देख नरेस भूअं ॥ गल गजत ढोल म्रिदंग सुरं ॥ बहु बाजत नाद नयं मुरजं ॥३४९॥ कलि किंकणि भूखत अंगि बरं ॥ तन लेपत चंदन चार प्रभं ॥ म्रिदु डोलत बोलत बात मुखं ॥ ग्रिहि आवत खेल अखेट सुखं ॥३५०॥ मुख पोछ गुलाब फुलेल सुभं ॥ कलि कजल सोहत चारु चखं ॥ मुख उजल चंद समान सुभं ॥ अविलोकि छके गण गंध्रबिसं ॥३५१॥ सुभ सोभत हार अपार उरं ॥ तिलकं दुति केसर चारु प्रभं ॥ अनसंख अछूहन संग दलं ॥ तिह जात भए सन सैन मगं ॥३५२॥ फिरि आइ गए तिह पैंड मुनं ॥ कलि बाजत संखन नाद धुनं ॥ अविलोकि तहा इक बान गरं ॥ सिर नीच मनो लिख चित्र धरं ॥३५३॥ अविलोक रिखीसर तीर गरं ॥ हसि बैन सु भांति इमं उचरं ॥ कहु भूप गए लीए संगि दलं ॥ कहिओ सो न गुरू अविलोक द्रिगं ॥३५४॥ चकि चित रहे अचित मुनं ॥ अनखंड तपी नही जोग डुलं ॥ अनआस अभंग उदास मनं ॥ अबिकार अपार प्रभास सभं ॥३५५॥ अनभंग प्रभा अनखंड तपं ॥ अबिकार जती अनिआस जपं ॥ अनखंड ब्रतं अनडंड तनं ॥ हठवंत ब्रती रिखि अत्र सूअं ॥३५६॥ |
| अविलोकि सरं करि धिआन जुतं ॥
रहि रीझ जटी हठवंत ब्रतं ॥ गुरु मानिस पंचदस्वो प्रबलं ॥ हठ छाडि सबै तिन पान परं ॥३५७॥ इमि नाह सौ जो नर नेह करै ॥ भव धार अपारहि पार परै ॥ तन के मन के भ्रम पासि धरे ॥ करि पंद्रसवो गुरु पान परे ॥३५८॥ इति पंद्रसव गुरू बानगर समापतं ॥१५॥
ਅਥ ਚਾਂਵਡਿ ਸੋਰਵੋ ਗੁਰੁ ਕਥਨੰ ॥ अथ चांवडि सोरवो गुरु कथनं ॥ तोटक छंद ॥ मुख बिभूत भगवे भेस बरं ॥ सुभ सोभत चेलक संग नरं ॥ गुन गावत गोबिंद एक मुखं ॥ बन डोलत आस उदास सुखं ॥३५९॥ सुभ सूरति पूरत नाद नवं ॥ अति उजल अंग बिभूत रिखं ॥ नही बोलत डोलत देस दिसं ॥ गुन चारत धारत ध्यान हरं ॥३६०॥ अविलोकय चावंडि चारु प्रभं ॥ ग्रिहि जात उडी गहि मासु मुखं ॥ लखि कै पल चावंडि चार चली ॥ तिह ते अति पुसट प्रमाथ बली ॥३६१॥ अविलोकिस मास अकास उडी ॥ अति जुधु तही तिहं संग मंडी ॥ तजि मासु चड़ा उडि आप चली ॥ लहि कै चित चावंडि चार बली ॥३६२॥ अविलोकि सु चावंडि चार पलं ॥ तजि त्रास भाई थिर भूमि थलं ॥ लखि तासु मनं मुनि चउक रह्यो ॥ चित सोर्हसवे गुरु तासु कह्यो ॥३६३॥ कोऊ ऐस तजै जब सरब धनं ॥ करि कै बिनु आस उदास मनं ॥ तब पाचउ इंद्री तिआग रहै ॥ इन चीलन जिउ स्रुत ऐस कहै ॥३६४॥ इति सोर्हवो गुरू चावंडि समापतं ॥१६॥
ਅਥ ਦੁਧੀਰਾ ਸਤਾਰਵੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ दुधीरा सतारवो गुरू कथनं ॥ तोटक छंद ॥ करि सोरसवो रिखि तासु गुरं ॥ उठि चलीआ बाट उदास चितं ॥ मुखि पूरत नादि निनाद धुनं ॥ सुनि रीझत गंध्रब देव नरं ॥३६५॥ चलि जात भए सरिता निकटं ॥ हठवंत रिखं तपसा बिकट ॥ अविलोक दुधीरया एक तहा ॥ उछरंत हुते नदि मछ जहा ॥३६६॥ |
| थरकंत हुतो इक चित नभं ॥
अति उजल अंग सुरंग सुभं ॥ नही आनि बिलोकत आप द्रिगं ॥ इह भांति रह्यो गड मछ मनं ॥३६७॥ तहा जाइ महा मुनि मजन कै ॥ उठि कै हरि धिआन लगा सुच कै ॥ न टरो तब लौ वह मछ अरी ॥ रथ सूर अथिओ नह डीठ टरी ॥३६८॥ थरकंत रहा नभि मछ कटं ॥ रथ भानु हटिओ नही ध्यान छुटं ॥ अविलोक महा मुनि मोहि रहिओ ॥ गुरु सत्रसवो कर तासु कहिओ ॥३६९॥ इति सतारवो गुरू दुधीरा समापतं ॥१७॥
ਅਥ ਮ੍ਰਿਗਹਾ ਅਠਾਰਸਵੋ ਗੁਰੂ ਬਰਨਨੰ ॥ अथ म्रिगहा अठारसवो गुरू बरननं ॥ तोटक छंद ॥ करि मजन गोबिंद गाइ गुनं ॥ उठि जाति भए बन मधि मुनं ॥ जह साल तमाल मढाल लसै ॥ रथ सूरज के पग बाज फसै ॥३७०॥ अविलोक तहा इक ताल महा ॥ रिखि जात भए हित जोग जहा ॥ तह पत्रण मध लह्यो म्रिगहा ॥ तन सोभत कंचन सुध प्रभा ॥३७१॥ करि संधित बाण कमाण सितं ॥ म्रिग मारत कोट करोर कितं ॥ सभ सैन मुनीसर संगि लए ॥ जह कानन थो तह जात भए ॥३७२॥ कनकं दुति उजल अंग सने ॥ मुनि राज मनं रितु राज बने ॥ रिखि संग सखा निसि बहुत लए ॥ तिह बारिध दूज बिलोकि गए ॥३७३॥ रिखि बोलत घोरत नाद नवं ॥ तिह ठउर कुलाहल उच हूअं ॥ जल पीवत ठउर ही ठउर मुनी ॥ बन मधि मनो रिख माल बनी ॥३७४॥ अति उजल अंग बिभूत धरै ॥ बहु भांति न्यास अनास करै ॥ निवल्यादिक सरबं करम कीए ॥ रिखि सरब चहूं चक दास थीए ॥३७५॥ अनभंग अखंड अनंग तनं ॥ बहु साधत न्यास संन्यास बनं ॥ जट सोहत जानुक धूर जटी ॥ सिव की जनु जोग जटा प्रगटी ॥३७६॥ सिव ते जनु गंग तरंग छुटे ॥ इह हुइ जन जोग जटा प्रगटे ॥ तप सरब तपीसन के सब ही ॥ मुनि जे सब छीन लए तब ही ॥३७७॥ |
| स्रुत जेतिक न्यास उदास कहे ॥
सब ही रिखि अंगन जान लए ॥ घन मै जिम बिदुलता झमकै ॥ रिखि मो गुन तास सबै दमकै ॥३७८॥ जस छाडत भानु अनंत छटा ॥ रिखि के तिम सोभत जोग जटा ॥ जिन की दुख फास कहूं न कटी ॥ रिखि भेटत तासु छटाक छुटी ॥३७९॥ नर जो नही नरकन ते निवरै ॥ रिखि भेटत तउन तराक तरै ॥ जिन के समता कहूं नाहि ठटी ॥ रिखि पूजि घटी सब पाप घटी ॥३८०॥ इत बधि तउन बिठो म्रिगहा ॥ जस हेरत छेरिनि भीम भिडहा ॥ तिह जान रिखीन ही सास सस्यो ॥ म्रिग जान मुनी कहु बान कस्यो ॥३८१॥ सर पेख सबै तिह साध कहै ॥ म्रिग होइ न रे! मुनि राज इहै ॥ नह बान सरासन पान तजे ॥ अस देखि द्रिड़ं मुनि राज लजे ॥३८२॥ बहुते चिर जिउ तिह ध्यान छुटा ॥ अविलोक धरे रिखि पाल जटा ॥ कस आवत हो? डरु डारि अबै ॥ मुहि लागत हो म्रिग रूप सबै ॥३८३॥ रिख पाल बिलोकि तिसै दिड़ता ॥ गुरु मान करी बहुतै उपमा ॥ म्रिग सो जिह को चित ऐस लग्यो ॥ परमेसर कै रस जान पग्यो ॥३८४॥ मुन को तब प्रेम प्रसीज हीआ ॥ गुर ठारसमो म्रिग नास कीआ ॥ मन मो तब दत बीचार कीआ ॥ गुन म्रिगहा को चित बीच लीआ ॥३८५॥ हरि सो हितु जो इह भांति करै ॥ भव भार अपारह पार परै ॥ मल अंतरि याही इसनान कटै ॥ जग ते फिरि आवन जान मिटै ॥३८६॥ गुरु जान तबै तिह पाइ परा ॥ भव भार अपार सु पार तरा ॥ दस असटसमो गुरु तासु कीयो ॥ कबि बाधि कबितन मधि लीयो ॥३८७॥ सब ही सिख संजुति पान गहे ॥ अविलोकि चराचरि चउध रहे ॥ पसु पछ चराचर जीव सबै ॥ गण गंध्रब भूत पिसाच तबै ॥३८८॥ इति अठदसवो गुरू म्रिगहा समापतं ॥१८॥ |
| ਅਥ ਨਲਨੀ ਸੁਕ ਉਨੀਵੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥
अथ नलनी सुक उनीवो गुरू कथनं ॥ क्रिपाण क्रित छंद ॥ मुनि अति अपार ॥ गुण गण उदार ॥ बिदिआ बिचार ॥ नित करत चार ॥३८९॥ लखि छबि सुरंग ॥ लाजत अनंग ॥ पिखि बिमल अंग ॥ चकि रहत गंग ॥३९०॥ लखि दुति अपार ॥ रीझत कुमार ॥ ग्यानी अपार ॥ गुन गन उदार ॥३९१॥ अब्यकत अंग ॥ आभा अभंग ॥ सोभा सुरंग ॥ तन जनु अनंग ॥३९२॥ बहु करत न्यास ॥ निसि दिन उदास ॥ तजि सरब आस ॥ अति बुधि प्रकास ॥३९३॥ तनि सहत धूप ॥ संन्यास भूप ॥ तनि छबि अनूप ॥ जनु सिव सरूप ॥३९४॥ मुख छबि प्रचंड ॥ आभा अभंग ॥ जुटि जोग जंग ॥ नही मुरत अंग ॥३९५॥ अति छबि प्रकास ॥ निसि दिन निरास ॥ मुनि मन सुबास ॥ गुन गन उदास ॥३९६॥ अब्यकत जोग ॥ नही कउन सोग ॥ नितप्रति अरोग ॥ तजि राज भोग ॥३९७॥ मुन मनि क्रिपाल ॥ गुन गन दिआल ॥ सुभि मति सुढाल ॥ द्रिड़ ब्रित कराल ॥३९८॥ तन सहत सीत ॥ नही मुरत चीत ॥ बहु बरख बीत ॥ जनु जोग जीत ॥३९९॥ चालंत बात ॥ थरकंत पात ॥ पीअरात गात ॥ नही बदत बात ॥४००॥ भंगं भछंत ॥ काछी कछंत ॥ किंग्री बजंत ॥ भगवत भनंत ॥४०१॥ नही डुलत अंग ॥ मुनि मन अभंग ॥ जुटि जोग जंग ॥ जिमि उडत चंग ॥४०२॥ नही करत हाइ ॥ तप करत चाइ ॥ नितप्रति बनाइ ॥ बहु भगत भाइ ॥४०३॥ मुख भछत पउन ॥ तजि धाम गउन ॥ मुनि रहत मउन ॥ सुभ राज भउन ॥४०४॥ संन्यास देव ॥ मुनि मन अभेव ॥ अनजुरि अजेव ॥ अंतरि अतेव ॥४०५॥ अनभू प्रकास ॥ नितप्रति उदास ॥ गुन अधिक जास ॥ लखि लजत अनास ॥४०६॥ ब्रहमंन देव ॥ गुन गन अभेव ॥ देवान देव ॥ अनभिख अजेव ॥४०७॥ संनिआस नाथ ॥ अनधर प्रमाथ ॥ इक रटत गाथ ॥ टक एक साथ ॥४०८॥ |
| गुन गनि अपार ॥
मुनि मनि उदार ॥ सुभ मति सुढार ॥ बुधि को पहार ॥४०९॥ संनिआस भेख ॥ अनिबिख अद्वैख ॥ जापत अभेख ॥ ब्रिध बुधि अलेख ॥४१०॥ कुलक छंद ॥ धं धकित इंद ॥ चं चकित चंद ॥ थं थकत पउन ॥ भं भजत मउन ॥४११॥ जं जकित जछ ॥ पं पचत पछ ॥ धं धकत सिंधु ॥ बं बकत बिंध ॥४१२॥ सं सकत सिंधु ॥ गं गकत गिंध ॥ तं तकत देव ॥ अं अकत भेव ॥४१३॥ लं लखत जोगि ॥ भं भ्रमत भोगि ॥ बं बकत बैन ॥ चं चकत नैन ॥४१४॥ तं तजत अत्र ॥ छं छकत छत्र ॥ पं परत पान ॥ भं भरत भान ॥४१५॥ बं बजत बाद ॥ नं नजत नाद ॥ अं उठत राग ॥ उफटत सुहाग ॥४१६॥ छं सकत सूर ॥ भं भ्रमत हूर ॥ रं रिझत चित ॥ तं तजत बित ॥४१७॥ छं छकत जछ ॥ भं भ्रमत पछ ॥ भं भिरत भूप ॥ नव निरख रूप ॥४१८॥ चरपट छंद ॥ गलितं जोगं ॥ दलितं भोगं ॥ भगिवे भेसं ॥ सुफिले देसं ॥४१९॥ अचल धरमं ॥ अखिल करमं ॥ अमित जोगं ॥ तजित भोगं ॥४२०॥ सुफल करमं ॥ सुब्रित धरमं ॥ कुक्रित हंता ॥ सुगतं गंता ॥४२१॥ दलितं द्रोहं ॥ मलितं मोहं ॥ सलितं सारं ॥ सुक्रित चारं ॥४२२॥ भगवे भेसं ॥ सुफलं देसं ॥ सुह्रिदं सरता ॥ कुक्रितं हरता ॥४२३॥ चक्रितं सूरं ॥ बमतं नूरं ॥ एकं जपितं ॥ एको थपितं ॥४२४॥ राजं तजित्वं ॥ ईसं भवित्वं ॥ जपं जपित्वं ॥ एकं थपित्वं ॥४२५॥ बजतं नादं ॥ बिदितं रागं ॥ जपतं जापं ॥ त्रसितं तापं ॥४२६॥ चकितं चंदं ॥ धकतं इंदं ॥ तकतं देवं ॥ भगतं भेवं ॥४२७॥ भ्रमतं भूतं ॥ लखितं रूपं ॥ चक्रतं चारं ॥ सुह्रिदं सारं ॥४२८॥ नलिनं सूअं ॥ लखि अउधूअं ॥ चट दे छटा ॥ भ्रम ते जटा ॥४२९॥ तकितं देवं ॥ बकितं भेवं ॥ दस नव सीसं ॥ करमक दीसं ॥४३०॥ बुधितं धामं ॥ ग्रिहितं बामं ॥ भ्रमतं मोहं ॥ ममतं मोहं ॥४३१॥ ममता बुधं ॥ स्रिहतं लोगं ॥ अहिता धरमं ॥ लहितह भोगं ॥४३२॥ |
| ग्रिसतं बुधं ॥
ममता मातं ॥ इसत्री नेहं ॥ पुत्रं भ्रातं ॥४३३॥ ग्रसतं मोहं ॥ धरितं कामं ॥ जलतं क्रोधं ॥ पलितं दामं ॥४३४॥ दलतं बियोधं ॥ तकितं दावं ॥ अंतह नरकं ॥ गंतह पावं ॥४३५॥ तजितं सरबं ॥ ग्रहितं एकं ॥ प्रभतं भावं ॥ तजितं द्वैखं ॥४३६॥ नलिनी सुकि जयं ॥ तजितं दिरबं ॥ सफली करमं ॥ लहितं सरबं ॥४३७॥ इति नलिनी सुक उनीसवो गुरू बरननं ॥१९॥
ਅਥ ਸਾਹ ਬੀਸਵੋ ਗੁਰੁ ਕਥਨੰ ॥ अथ साह बीसवो गुरु कथनं ॥ चौपई ॥ आगे चला दत जट धारी ॥ बेजत बेण बिखान अपारी ॥ असथावर लखि चेतन भए ॥ चेतन देख चक्रित ह्वै गए ॥४३८॥ महा रूप कछु कहा न जाई ॥ निरखि चक्रित रही सकल लुकाई ॥ जित जित जात पथहि रिखि ग्यो ॥ जानुक प्रेम मेघ बरख्यो ॥४३९॥ तह इक लखा साह धनवाना ॥ महा रूप धरि दिरब निधाना ॥ महा जोति अरु तेज अपारू ॥ आप घड़ा जानुक मुखि चारू ॥४४०॥ बिक्रिअ बीच अधिक सवधाना ॥ बिनु बिपार जिन अउर न जाना ॥ आस अनुरकत तासु ब्रित लागा ॥ मानहु महा जोग अनुरागा ॥४४१॥ तहा रिखि गए संगि संन्यासन ॥ कई छोहनी जात नही गनि ॥ ता के जाइ दुआर पर बैठे ॥ सकल मुनी मुनीराज इकैठे ॥४४२॥ साह सु दिरब ब्रित लग रहा ॥ रिखन ओर तिन चित्यो न कहा ॥ नेत्र मीच एकै धन आसा ॥ ऐस जानीअत महा उदासा ॥४४३॥ तह जे हुते राव अरु रंका ॥ मुनि पग परे छोर कै संका ॥ तिह बिपार करम कर भारी ॥ रिखीअन ओर न द्रिसटि पसारी ॥४४४॥ तासु देखि करि दत प्रभाऊ ॥ प्रगट कहा तज कै हठ भाऊ ॥ ऐस प्रेम प्रभु संग लगईऐ ॥ तब ही पुरखु पुरातन पईऐ ॥४४५॥ इति साह बीसवो गुरू समापतं ॥२०॥ |
| ਅਥ ਸੁਕ ਪੜਾਵਤ ਨਰ ਇਕੀਸਵੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥
अथ सुक पड़ावत नर इकीसवो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥ बीस गुरू करि आगे चला ॥ सीखे सरब जोग की कला ॥ अति प्रभाव अमितोजु प्रतापू ॥ जानुक साधि फिरा सब जापू ॥४४६॥ लीए बैठ देखा इक सूआ ॥ जिह समान जगि भयो न हूआ ॥ ता कहु नाथ सिखावत बानी ॥ एक टक परा अउर न जानी ॥४४७॥ संग लए रिखि सैन अपारी ॥ बडे बडे मोनी ब्रतिधारी ॥ ता के तीर तीर चलि गए ॥ तिनि नर ए नही देखत भए ॥४४८॥ सो नर सुकहि पड़ावत रहा ॥ इनै कछू मुख ते नही कहा ॥ निरखि निठुरता तिह मुनि राऊ ॥ पुलक प्रेम तन उपजा चाऊ ॥४४९॥ ऐसे नेहुं नाथ सो लावै ॥ तब ही परम पुरख कहु पावै ॥ इकीसवा गुरु ता कह कीआ ॥ मन बच करम मोल जनु लीआ ॥४५०॥ इति इकीसवों गुरु सुक पड़ावत नर समापतं ॥२१॥ अथि हर बाहत बाईसवो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥ जब इकीस कर गुरू सिधारा ॥ हर बाहत इक पुरख निहारा ॥ ता की नारि महा सुखकारी ॥ पति की आस हीए जिह भारी ॥४५१॥ भता लए पानि चलि आई ॥ जनुक नाथ ग्रिह बोल पठाई ॥ हर बाहत तिन कछू न लहा ॥ त्रीआ को धिआन नाथ प्रति रहा ॥४५२॥ मुनि पति संगि लए रिख सैना ॥ मुख छबि देखि लजत जिह मैना ॥ तीर तीर ता के चलि गए ॥ मुनि पति बैठ रहत पछ भए ॥४५३॥ अनूप नराज छंद ॥ अनूप गात अतिभुतं बिभूत सोभतं तनं ॥ अछिज तेज जाजुलं अनंत मोहतं मनं ॥ ससोभ बसत्र रंगतं सुरंग गेरू अ्मबरं ॥ बिलोक देव दानवं ममोह गंध्रबं नरं ॥४५४॥ जटा बिलोकि जानवी जटी समान जानई ॥ बिलोकि लोक लोकिणं अलोकि रूप मानई ॥ बजंत चार किंकुरी भजंत भूत भैधरी ॥ पपात जछ किंन्रनी ममोह माननी मनं ॥४५५॥ |
| बचित्र नारि चित्रणी पवित्र चित्रणं प्रभं ॥
र रीझ जछ गंध्रबं सुरारि नारि सु प्रभं ॥ कड़ंत क्रू किंन्रणी हसंत हास कामिणी ॥ लसंत दंतणं दुतं खिमंत जाणु दामिणी ॥४५६॥ दलंत पाप दुभरं चलंत मोनि सिमरं ॥ सुभंत भारगवं पटं बिअंत तेज उफणं ॥ परंत पानि भूचरं भ्रमंत सरबतो दिसं ॥ तजंत पाप नर बरं चलंत धरमणो मगं ॥४५७॥ बिलोकि बीरणो दयं अरुझ छत्र करमणं ॥ तजंति साइकं सितं कटंत टूक बरमणं ॥ थथ्मभ भानणो रथं बिलोकि कउतकं रणं ॥ गिरंत जुधणो छितं बमंत स्रोणतं मुखं ॥४५८॥ फिरंत चक्रणो चकं गिरंत जोधणो रणं ॥ उठंत क्रोध कै हठी ठठुकि क्रुधितं भुजं ॥ भ्रमंत अध बधतं कमध बधतं कटं ॥ परंत भूतलं भटं बकंत मारूड़ै रटं ॥४५९॥ पिपंत असव भटंत भिरंत दारुणो रणं ॥ बहंत तीछणो सरं झलंत झाल खड़िगिणं ॥ उठंत मारूड़ो रणं बकंत मारणो मुखं ॥ चलंत भाजि न हठी जुझंत दुधरं रणं ॥४६०॥ कटंत कारमं सुभं बचित्र चित्रतं क्रितं ॥ सिलेणि उजली क्रितं बहंत साइकं सुभं ॥ बिलोकि मोनिसं जुधं चचउध चक्रतं भवं ॥ ममोह आस्रमं गतं पपात भूतली सिरं ॥४६१॥ सभार भारग बसनिनं जजपि जापणो रिखं ॥ निहारि पान पै परा बिचार बाइसवो गुरं ॥ बिअंत जोगणो सधं असंख पापणो दलं ॥ अनेक चेलका लए रिखेस आसनं चलं ॥४६२॥ इति हर बाहता बाईसवो गुरू इसत्री भात लै आई समापतं ॥२२॥
ਅਥ ਤ੍ਰਿਆ ਜਛਣੀ ਤੇਈਸਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ त्रिआ जछणी तेईसमो गुरू कथनं ॥ अनूप नराज छंद ॥ बजंत नाद दुधरं उठंत निसनं सुरं ॥ भजंत अरि दितं अघं बिलोकि भारगवं भिसं ॥ बिलोकि कंचनं गिरंत तज मानुखी भुअं ॥ स सुहक तापसी तनं अलोक लोकणो बपं ॥४६३॥ अनेक जछ गंध्रबं बसेख बिधिका धरी ॥ निरकत नागणी महा बसेख बासवी सुरी ॥ पवित्र परम पारबती अनूप आलकापती ॥ असकत आपितं महा बिसेख आसुरी सुरी ॥४६४॥ |
| अनूप एक जछणी ममोह रागणो मनं ॥
घुमंत घूमणं छितं लगंत सारंगो सरं ॥ बिसारि नेह गेहणं सनेह रागणो मनं ॥ म्रिगीस जाणु घुमतं क्रितेण क्रिस क्रिती सरं ॥४६५॥ रझीझ रागणो चितं बदंत राग सुप्रभं ॥ बजंत किंगुरी करं ममोह आस्रमं गतं ॥ ससजि साइकं सितं कपंत कामणो कलं ॥ भ्रमंत भूतलं भलं भुगंत भामिणी दलं ॥४६६॥ तोमर छंद ॥ गुनवंत सील अपार ॥ दस चार चार उदार ॥ रस राग सरब सपंनि ॥ धरणी तला महि धंनि ॥४६७॥ इक राग गावत नारि ॥ गुणवंत सील अपार ॥ सुख धाम लोचन चारु ॥ संगीत करत बिचार ॥४६८॥ दुति मान रूप अपार ॥ गुणवंत सील उदार ॥ सुख सिंधु राग निधान ॥ हरि लेत हेरति प्रान ॥४६९॥ अकलंक जुबन मान ॥ सुख सिंधु सुंदरि थान ॥ इक चित गावत राग ॥ उफटंत जानु सुहाग ॥४७०॥ तिह पेख कै जटि राज ॥ संग लीन जोग समाज ॥ रहि रीझ आपन चित ॥ जुग राज जोग पवित ॥४७१॥ इह भांति जो हरि संग ॥ हित कीजीऐ अनभंग ॥ तब पाईऐ हरि लोक ॥ इह बात मै नही सोक ॥४७२॥ चित चउप सो भर चाइ ॥ गुर जानि कै परि पाइ ॥ चित तऊन के रस भीन ॥ गुरु तेईसवो तिह कीन ॥४७३॥ इति जछणी नारि राग गावती गुरू तेईसवो समापतं ॥२३॥ तोमर छंद ॥ तब बहुत बरख प्रमान ॥ चड़ि मेर स्रिंग महान ॥ कीअ घोर तपसा उग्र ॥ तब रीझए कछु सुग्र ॥४७४॥ जग देख के बिवहार ॥ मुनि राज कीन बिचार ॥ इन कउन सो उपजाइ? ॥ फिरि लेति आपि मिलाइ ॥४७५॥ तिह चीनीऐ करि गिआन ॥ तब होइ पूरण ध्यान ॥ तिह जाणीऐ जत जोग ॥ तब होइ देह अरोग ॥४७६॥ तब एक पुरख पछान ॥ जग नास जाहिन जान ॥ सब जगत को पति देखि ॥ अनभउ अनंत अभेख ॥४७७॥ बिन एक नाहिन साति ॥ सभ तीरथ कियुं न अनात ॥ जब सेविहो इकि नाम ॥ तब होइ पूरण काम ॥४७८॥ |
| बिनु एक चौबिस फोक ॥
सब ही धरा सब लोक ॥ जिनि एक कउ पहिचान ॥ तिन चउबिसो रस मान ॥४७९॥ जे एक के रस भीन ॥ तिनि चउबिसो रसि लीन ॥ जिन एक को नही बूझ ॥ तिह चउबिसै नही सूझ ॥४८०॥ जिनि एक कौ नही चीन ॥ तिनि चउबिसै फल हीन ॥ जिन एक को पहिचान ॥ तिनि चउबिसै रस मान ॥४८१॥ बचित्र पद छंद ॥ एकहि जउ मनि आना ॥ दूसर भाव न जाना ॥ दुंदभि दउर बजाए ॥ फूल सुरन बरखाए ॥४८२॥ हरखे सब जट धारी ॥ गावत दे दे तारी ॥ जित तित डोलत फूले ॥ ग्रिह के सब दुख भूले ॥४८३॥ तारक छंद ॥ बहु बरख जबै तपसा तिह कीनी ॥ गुरदेव क्रिआ जु कही धर लीनी ॥ तब नाथ सनाथ हुऐ ब्योत बताई ॥ तब ही दसओ दिसि सूझ बनाई ॥४८४॥ दिज देव तबै गुर चउबिस कै कै ॥ गिरि मेर गए सभ ही मुनि लै कै ॥ तपसा जब घोर तहा तिन कीनी ॥ गुरदेव तबै तिह या सिख दीनी ॥४८५॥ तोटक छंद ॥ गिरि मेरु गए रिखि बालक लै ॥ धर सीस जटा भगवे पट कै ॥ तप घोर करा बहु बरख दिना ॥ हरि जाप न छोरस एक छिना ॥४८६॥ दस लछ सु बीस सहंस्र ब्रखं ॥ तप कीन तहा बहु भांति रिखं ॥ सब देसन देस चलाइ मतं ॥ मुनि देव महा मति गूड़ गतं ॥४८७॥ रिखि राज दसा जब अंत भई ॥ बल जोग हुते मुनि जान लई ॥ धूअरो जग धउलुर जानि जटी ॥ कछु अउर क्रिआ इह भांति ठटी ॥४८८॥ सधि कै पवनै रिख जोग बलं ॥ तजि चाल कलेवर भूमि तलं ॥ कल फोरि उताल कपाल कली ॥ तिह जोति सु जोतिह मध मिली ॥४८९॥ कल काल क्रवाल कराल लसै ॥ जग जंगम थावर सरब कसै ॥ जग कालहि जाल बिसाल रचा ॥ जिह बीच फसे बिन को न बचा ॥४९०॥ |
| सवैया ॥
देस बिदेस नरेसन जीति; अनेस बडे अवनेस संघारे ॥ आठो ई सिध सबै नव निधि; सम्रिधन सरब भरे ग्रिह सारे ॥ चंद्रमुखी बनिता, बहुतै घरि; माल भरे, नही जात स्मभारे ॥ नाम बिहीन अधीन भए जम; अंति को नागे ही पाइ सिधारे ॥४९१॥ रावन के महिरावन के; मनु के नल के चलते न चली गउ ॥ भोज दिलीपति कौरवि कै; नही साथ दयो रघुनाथ बली कउ ॥ संगि चली अब लौ नही काहूं के; साच कहौ अघ ओघ दली सउ ॥ चेत रे! चेत, अचेत! महा पसु! काहू के संगि चली न हली हउ ॥४९२॥ साच और झूठ कहे बहुतै बिधि; काम करोध अनेक कमाए ॥ भाज निलाज बचा धन के डर; लोक गयो, परलोक गवाए ॥ दुआदस बरख पड़ा, न गुड़िओ जड़! राजीवि लोचन नाहिन पाए ॥ लाज बिहीन अधीन गहे जम; अंत के नागे ही पाइ सिधाए ॥४९३॥ काहे कउ बसत्र धरो भगवे? मुनि! ते सब पावक बीच जलैगी ॥ कियों इम रीत चलावत हो? दिन द्वैक चलै स्रबदा न चलैगी ॥ काल कराल की रीति महा इह; काहूं जुगेसि छली न छलैगी ॥ सुंदरि देह तुमारी महा मुनि! अंत मसान ह्वै धूरि रलैगी ॥४९४॥ काहे को पउन भछो? सुनि हो मुनि! पउन भछे कछू हाथि न ऐ है ॥ काहे को बसत्र करो भगवा? इन बातन सो भगवान न ह्वै है ॥ बेद पुरान प्रमान के देखहु; ते सब ही बस काल सबै है ॥ जारि अनंग न, नंग कहावत; सीस की संगि जटाऊ न जै है ॥४९५॥ कंचन कूट गिर्यो कहो काहे न; सातओ सागर कियों न सुकानो ॥ पसचम भानु उद्यो कहु काहे न; गंग बही उलटी अनुमानो ॥ अंति बसंत तप्यो रवि काहे न; चंद समान दिनीस प्रमानो ॥ कियों डमडोल डुबी न धरा; मुनि राज! निपातनि तियों जग जानो ॥४९६॥ |
| अत्रि परासर नारद सारद; ब्यास ते आदि जिते मुन भाए ॥
गालव आदि अनंत मुनीस्वर; ब्रहम हूं ते नही जात गनाए ॥ अगसत पुलसत बसिसट ते आदि; न जान परे, किह देस सिधाए ॥ मंत्र चलाइ बनाइ महा मति; फेरि मिले पर फेर न आए ॥४९७॥ ब्रहम निरंध्र को फोरि मुनीस की; जोति सु जोति के मधि मिलानी ॥ प्रीति रली परमेसर सो इम; बेदन संगि मिलै जिम बानी ॥ पुंन कथा मुनि नंदन की; कहि कै मुख सो कबि स्याम बखानी ॥ पूरण धिआइ भयो तब ही; जय स्री जगनाथ भवेस भवानी ॥४९८॥ इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे दत महातमे रुद्रवतार प्रबंध समापतं ॥ सुभं भवेत गुरू चउबीस ॥२४॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ਅਥ ਪਾਰਸ ਨਾਥ ਰੁਦ੍ਰ ਅਵਤਾਰ ਕਥਨੰ ॥ अथ पारस नाथ रुद्र अवतार कथनं ॥ पातसाही १० ॥ चौपई ॥ इह बिधि दत रुद्र अवतारा ॥ पूरण मत को कीन पसारा ॥ अंति जोति सो जोति मिलानी ॥ जिह बिधि सो पारब्रहम भवानी ॥१॥ एक लछ दस बरख प्रमाना ॥ पाछे चला जोग को बाना ॥ ग्यारव बरख बितीतत भयो ॥ पारसनाथ पुरख भूअ वयो ॥२॥ रोह देस सुभ दिन भल थानु ॥ परस नाथ भयो सुर ग्यानु ॥ अमित तेज असि अवर न होऊ ॥ चक्रत रहे मात पित दोऊ ॥३॥ दसऊ दिसनि तेज अति बढा ॥ द्वादस भान एक ह्वै चढा ॥ दह दिस लोक उठे अकुलाई ॥ भूपति तीर पुकारे जाई ॥४॥ सुनो भूप! इक कहों कहानी ॥ एक पुरख उपज्यो अभिमानी ॥ जिह सम रूप जगत नही कोई ॥ एकै घड़ा बिधाता सोई ॥५॥ कै गंध्रब जछ कोई अहा ॥ जानुक दूसर भानु चड़ रहा ॥ अति जोबन झमकत तिह अंगा ॥ निरखत जा के लजत अनंगा ॥६॥ भूपति देखन काज बुलावा ॥ पहिले द्योस साथ चल आवा ॥ हरख ह्रिदै धर के जटधारी ॥ जानुक दुती दत अवतारी ॥७॥ निरख रूप कापे जटधारी ॥ यह कोऊ भयो पुरखु अवतारी ॥ यह मत दूर हमारा कै है ॥ जटाधार कोई रहै न पै है ॥८॥ |
| तेज प्रभाव निरखि तब राजा ॥
अति प्रसंनि पुलकत चित गाजा ॥ जिह जिहा लखा रहे बिसमाई ॥ जानुक रंक नवो निध पाई ॥९॥ मोहन जाल सभन सिर डारा ॥ चेटक बान चक्रित ह्वै मारा ॥ जह तह मोहि सकल नर गिरे ॥ जान सुभट सामुहि रण भिरे ॥१०॥ नर नारी जिह जिह तिह पेखा ॥ तिह तिह मदन रूप अविरेखा ॥ साधन सरब सिधि कर जाना ॥ जोगन जोग रूप अनुमाना ॥११॥ निरखि रूप रनवास लुभाना ॥ दे तिह सुता न्रिपति मनि माना ॥ न्रिप को भयो जबै जामाता ॥ महा धनुखधर बीर बिख्याता ॥१२॥ महा रूप अरु अमित प्रतापू ॥ जानु जपै है आपन जापू ॥ ससत्र सासत्र बेता सुरि ग्याना ॥ जा सम पंडित जगति न आना ॥१३॥ थोरि बहिक्रम बुधि बिसेखा ॥ जानुक धरा बितन यहि भेखा ॥ जिह जिह रूप तवन का लहा ॥ सो सो चमक चक्रि हुऐ रहा ॥१४॥ सवैया ॥ मान भरे सर सान धरे; मठ सान चड़े, असि स्रोणति साए ॥ लेत हरे जिह डीठ परे; नही फेरि फिरे ग्रिह जान न पाए ॥ झीम झरे जन सेल हरे; इह भांति गिरे, जनु देखन आए ॥ जासु हिरे सोऊ मैन घिरे; गिर भूमि परे, न उठंत उठाए ॥१५॥ सोभत जानु सुधासर सुंदर; काम के मानहु कूप सु धारे ॥ लाजि के जान जहाज बिराजत; हेरत ही हर लेत हकारे ॥ हउ चहु कुंट भ्रम्यो खग ज्यों; इन के सम रूप न नैकु निहारे ॥ पारथ बान कि जुबन खान; कि काल क्रिपान, कि काम कटारे ॥१६॥ तंत्र भरे किधौ जंत्र जरे; अर मंत्र हरे चख चीनत या ते ॥ जोबन जोति जगे अति सुंदर; रंग रंगे मद से मदूआ ते ॥ रंग सहाब फूल गुलाब से; सीखे है जोरि करोरक घाते ॥ माधुरी मूरति सुंदर सूरति; हेरति ही हर लेत हीया ते ॥१७॥ पान चबाइ सीगार बनाइ; सुगंध लगाइ सभा जब आवै ॥ किंनर जछ भुजंग चराचर; देव अदेव दोऊ बिसमावै ॥ मोहित जे महि लोगन माननि; मोहत तउन महा सुख पावै ॥ वारहि हीर अमोलक चीर; त्रीया बिन धीर सबै बल जावै ॥१८॥ |
| रूप अपार पड़े दस चार; मनो असुरारि चतुर चक जान्यो ॥
आहव जुकति जितीक हुती; जग सरबन मै सब ही अनुमान्यो ॥ देसि बिदेसन जीत जुधांबर; क्रित चंदोव दसो दिस तान्यो ॥ देवन इंद्र गोपीन गोबिंद; निसा करि चंद समान पछान्यो ॥१९॥ चउधित चार दिसा भई चक्रत; भूमि अकास दुहूं पहिचाना ॥ जुध समान लख्यो जग जोधन; बोधन बोध महा अनुमाना ॥ सूर समान लखा दिन कै तिह; चंद सरूप निसा पहिचाना ॥ राननि रावि सवानिन साव; भवानिन भाव भलो मनि माना ॥२०॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ बितै बरख द्वै असट मासं प्रमानं ॥ भयो सुप्रभं सरब बिद्या निधानं ॥ जपै हिंगुला ठिंगुला पाण देवी ॥ अनासा छुधा अत्रधारी अभेवी ॥२१॥ जपै तोतला सीतला खग ताणी ॥ भ्रमा भैहरी भीम रूपा भवाणी ॥ चलाचल सिंघ झमाझम अत्रं ॥ हहा हूहि हासं झला झल छत्रं ॥२२॥ अटा अट हासं छटा छुट केसं ॥ असं ओध पाणं नमो क्रूर भेसं ॥ सिरमाल स्वछं लसै दंत पंतं ॥ भजै सत्रु गूड़ं प्रफुलंत संतं ॥२३॥ अलि्मपाति अरधी महा रूप राजै ॥ महा जोत ज्वालं करालं बिराजै ॥ त्रसै दुसट पुसटं हसै सुध साधं ॥ भजै पान दुरगा अरूपी अगाधं ॥२४॥ सुने उसतती भी भवानी क्रिपालं ॥ अधं उरधवी आप रूपी रसालं ॥ दए इख्वधी द्वै अभंगं खतंगं ॥ परस्यं धरं जान लोहं सुरंगं ॥२५॥ जबै ससत्र साधी सबै ससत्र पाए ॥ उघारे चूमे कंठ सीसं छुहाए ॥ लख्यो सरब रावं प्रभावं अपारं ॥ अजोनी अजै बेद बिदिआ बिचारं ॥२६॥ ग्रिहीतुआ जबै ससत्र असत्रं अपारं ॥ पड़े अनुभवं बेद बिदिआ बिचारं ॥ पड़े सरब बिदिआ हुती सरब देसं ॥ जिते सरब देसी सु असत्रं नरेसं ॥२७॥ पठे कागदं देस देसं अपारी ॥ करो आनि कै बेद बिद्या बिचारी ॥ जटे दंड मुंडी तपी ब्रहमचारी ॥ सधी स्रावगी बेद बिदिआ बिचारी ॥२८॥ |
| हकारे सबै देस देसा नरेसं ॥
बुलाए सबै मोन मानी सु बेसं ॥ जटा धार जेते कहूं देख पईयै ॥ बुलावै तिसै नाथ भाखै बुलईयै ॥२९॥ फिरे सरब देसं नरेसं बुलावै ॥ मिले न तिसै छत्र छैणी छिनावै ॥ पठे पत्र एकै दिसा एक धावै ॥ जटी दंड मुंडी कहूं हाथ आवै ॥३०॥ रच्यो जग राजा चले सरब जोगी ॥ जहा लउ कोई बूढ बारो सभोगी ॥ कहा रंक राजा कहा नार होई ॥ रच्यो जग राजा चलिओ सरब कोई ॥३१॥ फिरे पत्र सरबत्र देसं अपारं ॥ जुरे सरब राजा न्रिपं आनि दुआरं ॥ जहा लौ हुते जगत मै जटाधारी ॥ मिलै रोह देसं भए भेख भारी ॥३२॥ जहा लउ हुते जोग जोगिसट साधे ॥ मले मुख बिभूतं सु लंगोट बाधे ॥ जटा सीस धारे निहारे अपारं ॥ महा जोग धारं सुबिदिआ बिचारं ॥३३॥ जिते सरब भूपं बुले सरब राजा ॥ चहूं चक मो दान नीसान बाजा ॥ मिले देस देसान अनेक मंत्री ॥ करै साधना जोग बाजंत्र तंत्री ॥३४॥ जिते सरब भूमि सथली संत आहे ॥ तिते सरब पारस नाथं बुलाए ॥ दए भांति अनेक भोज अरघ दानं ॥ लजी पेख देवि सथली मोन मानं ॥३५॥ करै बैठ के बेद बिदिआ बिचारं ॥ प्रकासो सबै आपु आपं प्रकारं ॥ टकं टक लागी मुखं मुखि पेखिओ ॥ सुन्यो कान हो तो सु तो आखि देखिओ ॥३६॥ प्रकासो सबै आप आपं पुराणं ॥ रड़ो देसि देसाण बिदिआ मुहाणं ॥ करो भांति भातं सु बिदिआ बिचारं ॥ न्रिभै चित दै कै महा त्रास टारं ॥३७॥ जुरे बंगसी राफिजी रोहि रूमी ॥ चले बालखी छाड कै राज भूमी ॥ न्रिभै भि्मभरी कासमीरी कंधारी ॥ कि कै कालमाखी कसे कासकारी ॥३८॥ जुरे दछणी ससत्र बेता अरयारे ॥ द्रुजै द्रावड़ी तपत तईलंग वारे ॥ परं पूरबी उत्र देसी अपारं ॥ मिले देस देसेण जोधा जुझारं ॥३९॥ पाधरी छंद ॥ इह भांति बीर बहु बीर जोरि ॥ मत देस देस राजा करोर ॥ दे हीर चीर बहु दिरब साज ॥ सनमान दान बहु भांति राज ॥४०॥ |
| अनभै अभंग अवधूत छत्र ॥
अनजीत जुध बेता अति अत्र ॥ अनगंज सूर अबिचल जुझार ॥ रण रंग अभंग जिते हजार ॥४१॥ सब देस देस के जीत राव ॥ कर क्रुध जुध नाना उपाव ॥ कै साम दाम अरु दंड भेद ॥ अवनीप सरब जोरे अछेद ॥४२॥ जब सरब भूप जोरे महान ॥ जै जीत पत्र दिनो निसान ॥ दै हीर चीर अनभंग दिरब ॥ महिपाल मोहि डारे सु सरब ॥४३॥ इक दयोस बीत पारस्व राइ ॥ उतिसट देवि पूजंत जाइ ॥ उसतति किन बहु बिधि प्रकार ॥ सो कहो छंद मोहणि मझार ॥४४॥ मोहणी छंद ॥ जै देवी भेवी भावाणी ॥ भउ खंडी दुरगा सरबाणी ॥ केसरीआ बाही कऊमारी ॥ भैखंडी भैरवि उधारी ॥४५॥ अकलंका अत्री छत्राणी ॥ मोहणीअं सरबं लोकाणी ॥ रकतांगी सांगी सावित्री ॥ परमेस्री परमा पावित्री ॥४६॥ तोतलीआ जिहबा कऊमारी ॥ भव भरणी हरणी उधारी ॥ म्रिदु रूपा भूपा बुधाणी ॥ जै ज्मपै सुधं सिधाणी ॥४७॥ जग धारी भारी भगतायं ॥ करि धारी भारी मुकतायं ॥ सुंदर गोफणीआ गुरजाणी ॥ ते बरणी हरणी भामाणी ॥४८॥ भि्मभरीआ जछं सरबाणी ॥ गंधरबी सिधं चाराणी ॥ अकलंक सरूपं निरमलीअं ॥ घण मधे मानो चंचलीअं ॥४९॥ असिपाणं माणं लोकायं ॥ सुख करणी हरणी सोकायं ॥ दुसट हंती संतं उधारी ॥ अनछेदाभेदा कउमारी ॥५०॥ आनंदी गिरजा कउमारी ॥ अनछेदाभेदा उधारी ॥ अनगंज अभंजा खंकाली ॥ म्रिगनैणी रूपं उजाली ॥५१॥ रकतांगी रुद्रा पिंगाछी ॥ कटि कछी स्वछी हुलासी ॥ रकताली रामा धउलाली ॥ मोहणीआ माई खंकाली ॥५२॥ जगदानी मानी भावाणी ॥ भवखंडी दुरगा देवाणी ॥ रुद्रागी रुद्रा रकतांगी ॥ परमेसरी माई धरमांगी ॥५३॥ महिखासुर दरणी महिपाली ॥ चिछुरासर हंती खंकाली ॥ असि पाणी माणी देवाणी ॥ जै दाती दुरगा भावाणी ॥५४॥ |
| पिंगाछी परमा पावित्री ॥
सावित्री संधिआ गाइत्री ॥ भै हरणी भीमा भामाणी ॥ जै देवी दुरगा देवाणी ॥५५॥ दुरगा दल गाही देवाणी ॥ भै खंडी सरबं भूताणी ॥ जै चंडी मुंडी सत्रु हंती ॥ जै दाती माता जैअंती ॥५६॥ संसरणी तराणी लोकाणी ॥ भि्मभराणी दरणी दईताणी ॥ केकरणी कारण लोकाणी ॥ दुख हरणी देवं इंद्राणी ॥५७॥ सु्मभ हंती जयंती खंकाली ॥ कंकड़ीआ रूपा रकताली ॥ तोतलीआ जिहवा सिंधुलीआ ॥ हिंगलीआ माता पिंगलीआ ॥५८॥ चंचाली चित्रा चित्रांगी ॥ भि्मभरीआ भीमा सरबांगी ॥ बुधि भूपा कूपा जुज्वाली ॥ अकलंका माई न्रिमाली ॥५९॥ उछलै लंकुड़ीआ छत्राला ॥ भि्मभरीआ भैरो भउहाला ॥ जै दाता माता जैदाणी ॥ लोकेसी दुरगा भावाणी ॥६०॥ समोही सरबं जगतायं ॥ निंद्रा छुध्या पिपासायं ॥ जै कालं राती सक्राणी ॥ उधारी भारी भगताणी ॥६१॥ जै माई गाई बेदाणी ॥ अनछिज अभिदा अखिदाणी ॥ भै हरणी सरबं संताणी ॥ जै दाता माता! क्रिपाणी! ॥६२॥ अचकड़ा छंद ॥ त्वप्रसादि ॥ अ्मबिका तोतला सीतला साकणी ॥ सिंधुरी सुप्रभा सुभ्रमा डाकणी ॥ सावजा स्मभिरी सिंधुला दुखहरी ॥ सुमिला स्मभिला सुप्रभा दुधरी ॥६३॥ भावना भै हरी भूतिली भैहरा ॥ टाकणी झाकणी साकणी सिंधुला ॥ दुधरा द्रुमुखा द्रुकटा दुधरी ॥ क्मपिला ज्मपिला हिंगुला भैहरी ॥६४॥ चित्रणी चापणी चारणी चछणी ॥ हिंगुला पिंगुला गंध्रबा जछणी ॥ बरमणी चरमणी परघणी पासणी ॥ खड़गणी गड़गणी सैथणी सापणी ॥६५॥ भीमड़ा समदड़ा हिंगुला कारतकी ॥ सुप्रभा अछिदा अधिरा मारतकी ॥ गिंगली हिंगुली ठिंगुली पिंगुला ॥ चिकणी चरकटा चरपटा चांवडा ॥६६॥ अछिदा अभिदा असिता अधरी ॥ अकटा अखंडा अछटा दुधरी ॥ अंजनी अ्मबिका असत्रणी धारणी ॥ अभरं अधरा जगति उधारणी ॥६७॥ |
| अंजनी गंजनी साकड़ी सीतला ॥
सिधरी सुप्रभा सामला तोतला ॥ स्मभरी ग्मभरी अ्मभरी अकटा ॥ दुसला द्रुभिखा द्रुकटा अमिटा ॥६८॥ भैरवी भैहरी भूचरा भानवी ॥ त्रिकुटा चरपटा चांवडा मानवी ॥ जोबना जैकरी ज्मभहरी जालपा ॥ तोतला तुंदला दंतली कालिका ॥६९॥ भरमणा निभ्रमा भावना भैहरी ॥ बर बुधा दात्रणी सत्रणी छैकरी ॥ द्रुकटा द्रुभिदा दुधरा द्रुमदी ॥ अत्रुटा अछुटा अजटा अभिदी ॥७०॥ तंतला अंतला संतला सावजा ॥ भीमड़ा भैहरी भूतला बावजा ॥ डाकणी साकणी झाकणी काकिड़ा ॥ किंकड़ी कालिका जालपा जै म्रिड़ा ॥७१॥ ठिंगुला हिंगुला पिंगुला प्रासणी ॥ ससत्रणी असत्रणी सूलणी सासणी ॥ कंनिका अंनिका धंनिका धउलरी ॥ रकतिका सकतिका भकतका जैकरी ॥७२॥ झिंगड़ा पिंगड़ा जिंगड़ा जालपा ॥ जोगणी भोगणी रोग हरी कालिका ॥ चंचला चांवडा चाचरा चित्रता ॥ तंतरी भि्मभरी छत्रणी छिंछला ॥७३॥ दंतुला दामणी द्रुकटा द्रुभ्रमा ॥ छुधिता निंद्रका न्रिभिखा न्रिगमा ॥ कद्रका चूड़िका चाचका चापणी ॥ चिच्रड़ी चावड़ा चि्मपिला जापणी ॥७४॥ बिसनपद ॥ परज ॥ त्वप्रसादि कथता ॥ कैसे कै पाइन प्रभा उचारों? ॥ जानुक निपट अघट अम्रित; सम स्मपट सुभट बिचारो ॥ मन मधुकरहि चरन कमलन; पर ह्वै मनमत गुंजारो ॥ मात्रिक सपत सपित पितरन; कुल चौदहूं कुली उधारो ॥७५॥ बिसनपद ॥ काफी ॥ ता दिन देह सफल कर जानो ॥ जा दिन जगत मात प्रफुलित ह्वै; देहि बिजै बरदानो ॥ ता दिन ससत्र असत्र कटि बाधो; चंदन चित्र लगाऊं ॥ जा कहु नेत निगम कहि बोलत; तासु सु बरु जब पाऊं ॥७६॥ बिसनपद ॥ सोरठि ॥ त्वप्रसादि कथता ॥ अंतरजामी अभय भवानी ॥ अति ही निरखि प्रेम पारस को; चित की ब्रिथा पछानी ॥ आपन भगत जान भवखंडन; अभय रूप दिखायो ॥ चक्रत रहे पेखि मुनि जन सुर; अजर अमर पद पायो ॥७७॥ |
| सोभित बामहि पानि क्रिपाणी ॥
जा तर जछ किंनर असुरन की; सब की क्रिया हिरानी ॥ जा तन मधु कीटभ कहु खंड्यो; सु्मभ निसु्मभ संघारे ॥ सोई क्रिपान निदान लगे जग; दाइन रहो हमारे ॥७८॥ जा तन बिड़ालाछ चिछ्रादिक; खंडन खंड उडाए ॥ धूलीकरन धूम्रलोचन के; मासन गिध रजाए ॥ राम रसूल किसन बिसनादिक; काल क्रवालहि कूटे ॥ कोटि उपाइ धाइ सभ थाके; बिन तिह भजन न छूटे ॥७९॥ बिसनपद ॥ सूही ॥ त्वप्रसादि कथता ॥ सोभित पानि क्रिपान उजारी ॥ जा तन इंद्र कोटि कई खंडे; बिसन क्रोरि त्रिपुरारी ॥ जा कहु राम उचर मुनि जन सब; सेवत धिआन लगाए ॥ तस तुम राम क्रिसन कई कोटिक; बार उपाइ मिटाए ॥८०॥ अनभव रूप सरूप अगंजन; कहो कवन बिधि गईयै? ॥ जिहबा सहंस्र रटत गुन थाकी; कबि जिहवेक, बतईयै ॥ भूमि अकास पतार जवन कर; चउदहि खंड बिहंडे ॥ जगमग जोति होति भूतलि मै; खंडन अउ ब्रहमंडे ॥८१॥ बिसनपद ॥ सोरठि ॥ जै जै रूप अरेख अपार! ॥ जासि पाइ भ्रमाइ जह तह; भीख को सिव दुआर ॥ जासि पाइ लग्यो निसेसिह; कारमा तन एक ॥ देवतेस सहंस्र भे भग; जासि पाइ अनेक ॥८२॥ क्रिसन राम भए किते; पुनि काल पाइ बिहान ॥ काल को अनकाल कै; अकलंक मूरति मान ॥ जासि पाइ भयो सभै जग; जास पाइ बिलान ॥ ताहि तै अबिचार जड़! करतार काहि न जान? ॥८३॥ नरहरि, जान काहि न लेत? ॥ तै भरोस पर्यो पसू! जिह मोहि बधि अचेत ॥ राम क्रिसन रसूल को; उठि लेत नितप्रति नाउ ॥ कहा वै अब जीअत जग मै? कहा तिन को गाउ? ॥८४॥ सोरठि ॥ तास किउ न पछानही? जे होहि है अब है ॥ निहफल काहे भजत पाहन? तोहि कछु फलि दै ॥ तासु सेवहु जास सेवति; होहि पूरण काम ॥ होहि मनसा सकल पूरण; लैत जा के नाम ॥८५॥ |
| बिसनपद ॥ रामकली ॥ त्वप्रसादि ॥
इह बिधि कीनी जबै बडाई ॥ रीझे देव दिआल तिह उपर; पूरण पुरख सुखदाई ॥ आपनि मिले देवि दरसनि भयो; सिंघ करी असवारी ॥ लीने छत्र लंकुरा कूदत; नाचत गण दै तारी ॥८६॥ रामकली ॥ झमकत असत्र छटा ससत्रनि की; बाजत डउर अपार ॥ निरतत भूत प्रेत नाना बिधि; डहकत फिरत बैतार ॥ कुहकति फिरति काकणी, कुहरत; डहकत कठन मसान ॥ घहरति गगनि सघन रिख दहलत; बिचरत ब्योम बिवान ॥८७॥ देवी बाच ॥ बिसनपद ॥ सारंग ॥ त्वप्रसादि ॥ कछू बर मांगहु पूत सयाने! ॥ भूत भविख नही तुमरी सर; साध चरित हम जाने ॥ जो बरदान चहो, सो मांगो; सब हम तुमै दिवार ॥ कंचन रतन बज्र मुकताफल; लीजहि सकल सु धार ॥८८॥ पारस नाथ बाच ॥ बिसनपद ॥ सारंग ॥ सब ही पड़ो बेद बिदिआ बिधि; सब ही ससत्र चलाऊ ॥ सब ही देस जेर करि आपन; आपे मता मताऊ ॥ कहि तथासतु, भई लोप चंडिका; तास महा बर दै कै ॥ अंत्र ध्यान हुऐ गई आपन पर; सिंघ अरूड़त हुऐ कै ॥८९॥ बिसनपद ॥ गउरी ॥ त्वप्रसादि ॥ पारस करि डंडौत फिरि आए ॥ आवत बीर देस देसन ते; मानुख भेज बुलाए ॥ न्रिप को रूप बिलोकि सुभट सभ; चक्रित चित बिसमाए ॥ ऐसे कबही लखे नही राजा; जैसे आज लखाए ॥ चक्रित भई गगनि की बाला; गन उडगन बिरमाए ॥ झिमझिम मेघ बूंद ज्यों देवन; अमर पुहप बरखाए ॥ जानुक जुबन खान हुऐ निकसे; रूप सिंधु अनुवाए ॥ जानुक धारि निडर बसुधा पर; काम कलेवर आए ॥९०॥ |
| बिसनपदि ॥ सारंग ॥ त्वप्रसादि ॥
भूपति परम ग्यान जब पायो ॥ मन बच करम कठन कर ता को; जौ करि ध्यान लगायो ॥ करि बहु न्यास कठन जपु साध्यो; दरसनि दीयो भवानी ॥ ततछिन परम ग्यान उपदेस्यो; लोक चतुरदस रानी ॥ तिह छिन सरब सासत्र मुख उचरे; तत अतत पछाना ॥ अवर अतत सबै कर जाने; एक तत ठहराना ॥ अनभव जोति अनूप प्रकासी; अनहद नाद बजायो ॥ देस बिदेस जीति राजन कहु; सुभट अभै पद पायो ॥९१॥ बिसनपद ॥ परज ॥ ऐसे अमरपद कहु पाइ ॥ देस अउर बिदेस भूपति; जीति लीन बुलाइ ॥ भांति भांति भरे गुमान; निसान सरब बजाइ ॥ चउप चउप चले चमू्मपति; चित चउप बढाइ ॥ आनि आनि सबै लगे पग; भूप के जुहराइ ॥ आव आव सुभाव सो कहि; लीन कंठ लगाइ ॥ हीर चीर सु बाज दै गज; राज दै पहिराइ ॥ साध दै सनमान कै कर; लीन चित चुराइ ॥९२॥ बिसनपद ॥ काफी ॥ त्वप्रसादि ॥ इम कर दान दै सनमान ॥ भांति भांति बिमोहि भूपति; भूप बुध निधान ॥ भांति भांतिन साज दै बर; बाज अउ गजराज ॥ आपने कीनो न्रिपं सब; पारसै महाराज ॥ लाल जाल प्रवाल बिद्रम; हीर चीर अनंत ॥ लछ लछ स्वरण सिंङी; दिज एक एक मिलंत ॥ मोहि भूपित भूमि कै; इक कीन जग बनाइ ॥ भांति भांति सभा बनाइ सु; बैठि भूपति आइ ॥९३॥ बिसनपद ॥ काफी ॥ इक दिन बैठे सभा बनाई ॥ बडे बडे छत्री बसुधा के; लीने निकटि बुलाई ॥ अरु जे हुते देस देसन मति; ते भी सरब बुलाए ॥ सुनि इह भांति सरब जटधारी; देस देस ते आए ॥ नाना भांति जटन कह धारे; अरु मुख बिभूत लगाए ॥ बलकुल अंगि दीरघ नख सोभत; म्रिगपति देख लजाए ॥ मुंद्रत नेत्र ऊरध कर ओपत; परम काछनी काछे ॥ निस दिन जप्यो करत दतात्रै; महा मुनीसर आछे ॥९४॥ |
| पारसनाथ बाच ॥ धनासरी ॥ त्वप्रसादि ॥
कै तुम हम को परचौ दिखाओ ॥ नातर जिते तुम हो जटधारी; सबही जटा मुंडाओ ॥ जोगी! जोगु जटन के भीतर; जे कर कछूअक होई ॥ तउ हरि ध्यान छोरि दर दर ते; भीख न मांगै कोई ॥ जे कर महा तत कहु चीनै; परम तत कहु पावै ॥ तब यह मोन साधि मनि बैठे; अनत न खोजन धावै ॥ जा की रूप रेख नही जानीऐ; सदा अद्वैख कहायो ॥ जउन अभेख रेख नही, सो कहु; भेख बिखै किउ आयो? ॥९५॥ बिसनपद ॥ सारंग ॥ त्वप्रसादि ॥ जे जे तिन मै हुते सयाने ॥ पारस परम तत के बेता; महा परम कर माने ॥ सबहनि सीस न्याइ करि जोरे; इह बिधि संगि बखाने ॥ जो जो गुरू कहा, सो कीना; अउर हम कछू न जाने ॥ सुनहो महाराज राजन के! जो तुम बचन बखाने ॥ सो हम दत बकत्र ते सुन करि; साच हीऐ अनुमाने ॥ जानुक परम अम्रित ते निकसे; महा रसन रस साने ॥ जो जो बचन भए इह मुखि ते; सो सो सब हम माने ॥९६॥ बिसनपद ॥ सोरठि ॥ जोगी जोगु जटन मो नाही ॥ भ्रम भ्रम मरत कहा पचि पचि करि? देखि समझ मन माही ॥ जो जन महा तत कहु जानै; परम ग्यान कहु पावै ॥ तब यह एक ठउर मनु राखै; दरि दरि भ्रमत न धावै ॥ कहा भयो? ग्रिह तजि उठि भागे; बन मै कीन निवासा ॥ मन तो रहा सदा घर ही मो; सो नही भयो उदासा ॥ अधिक प्रपंच दिखाइआ ठगा जग; जानि जोग को जोरा ॥ तुम जीअ लखा तजी हम माया; माया तुमै न छोरा ॥९७॥ बिसनपद ॥ सोरठि ॥ भेखी! जोग न भेख दिखाए ॥ नाहन जटा बिभूत नखन मै; नाहिन बसत्र रंगाए ॥ जो बनि बसै जोग कहु पईऐ; पंछी सदा बसत बनि ॥ कुंचर सदा धूरि सिरि मेलत; देखहु समझ तुम ही मनि ॥ दादुर मीन सदा तीरथ मो; कर्यो करत इसनाना ॥ ध्यान बिड़ाल बकी बक लावत; तिन, किआ जोगु पछाना? ॥ जैसे कसट ठगन कर ठाटत; ऐसे हरि हित कीजै ॥ तब ही महा ग्यान को जानै; परम पयूखहि पीजै ॥९८॥ |
| बिसनपद ॥ सारंग ॥
सुनि सुनि ऐसे बचन सियाने ॥ उठि उठि महा बीर पारस के; पाइन सो लपटाने ॥ जे जे हुते मूड़ अगिआनी; तिन तिन बैन न माने ॥ उठि उठि लगे करन बकबादह; मूरख मुगध इआने ॥ उठि उठि भजे किते कानन को; केतकि जलहि समाने ॥ केतक भए जुध कहि प्रापति; सुनत सबदु घहराने ॥ केतक आनि आनि सनमुखि भए; केतक छोरि पराने ॥ केतक जूझि सोभे रण मंडल; बासव लोकि सिधाने ॥९९॥ बिसनपद ॥ तिलंग ॥ त्वप्रसादि कथता ॥ जब ही संख सबद घहराए ॥ जे जे हुते सूर जटधारी; तिन तिन तुरंग नचाए ॥ चक्रत भई गगन की तरुनी; देव अदेव त्रसाए ॥ निरखत भयो सूर रथ थ्मभत; नैन निमेख न लाए ॥ ससत्र असत्र नाना बिधि छाडे; बाण प्रयोघ चलाए ॥ मानहु माह मेघ बूंदन ज्यों; बाण ब्यूह बरसाए ॥ चटपट चरम बरम पर चटके; दाझत त्रिणा लजाए ॥ स्रोणत भरे बसत्र सोभित, जनु; चाचर खेलि सिधाए ॥१००॥ बिसनपद ॥ किदारा ॥ इह बिधि भयो आहव घोर ॥ भांति भांति गिरे धरा पर; सूर सुंदर किसोर ॥ कोप कोप हठी घटी रणि; ससत्र असत्र चलाइ ॥ जूझि जूझि गए दिवालय; ढोल बोल बजाइ ॥ हाइ हाइ भई जहा तह; भाजि भाजि सु बीर ॥ पैठि पैठि गए त्रीआलै; हारि हारि अधीर ॥ अप्रमान छुटे सरान; दिसान भयो अंधिआर ॥ टूक टूक परे जहा तह; मारि मारि जुझार ॥१०१॥ बिसनपद ॥ देवगंधारी ॥ मारू सबदु सुहावन बाजै ॥ जे जे हुते सुभट रणि सुंदर; गहि गहि आयुध गाजे ॥ कवच पहरि पाखर सो डारी; अउरै आयुध साजे ॥ भरे गुमान सुभट सिंघन ज्यों; आहव भूमि बिराजे ॥ गहि गहि चले गदा गाजी सब; सुभट अयोधन काजे ॥ आहव भूमि सूर अस सोभे; निरखि इंद्र दुति लाजे ॥ टूक टूक हूऐ गिरे धरणि पर; आहव छोरि न भाजे ॥ प्रापति भए देव मंदर कहु; ससत्रन सुभट निवाजे ॥१०२॥ |
| बिसनपद ॥ कलिआन ॥
दहदिस धाव भए जुझारे ॥ मुदगर गुफन गुरज गोलाले; पटसि परघ प्रहारे ॥ गिरि गिरि परे सुभट रन मंडलि; जानु बसंत खिलारे ॥ उठि उठि भए जुध कउ प्रापति; रोह भरे रजवारे ॥ भखि भखि बीर पीस दातन कह; रण मंडली हकारे ॥ बरछी बान क्रिपान गजाइधु; असत्र ससत्र स्मभारे ॥ भसमी भूत भए गंध्रब गण; दाझत देव पुकारे ॥ हम मत मंद चरण सरणागति; काहि न लेत उबारे? ॥१०३॥ मारू ॥ दोऊ दिस सुभट जबै जुरि आए ॥ दुंदभि ढोल म्रिदंग बजत सुनि; सावन मेघ लजाए ॥ देखन देव अदेव महा हव; चड़े बिमान सुहाए ॥ कंचन जटत खचे रतनन लखि; गंध्रब नगर रिसाए ॥ काछि कछि काछ कछे कछनी; चड़ि कोप भरे निजकाए ॥ कोऊ कोऊ रहे सुभट रण मंडलि; केई केई छाडि पराए ॥ झिमझिम महा मेघ परलै ज्यों; ब्रिंद बिसिख बरसाए ॥ ऐसो निरखि बडे कवतक कह; पारस आप सिधाए ॥१०४॥ बिसनपद ॥ भैरो ॥ त्वप्रसादि ॥ दै रे दै रे दीह दमामा ॥ करहौ रुंड मुंड बसुधा पर; लखत स्वरग की बामा ॥ धुकि धुकि परहि धरणि भारी भट; बीर बैताल रजाऊ ॥ भूत पिसाच डाकणी जोगण; काकण रुहर पिवाऊ ॥ भकि भकि उठे भीम भैरो रणि; अरध उरध संघारो ॥ इंद्र चंद सूरज बरणादिक; आज सभै चुनि मारो ॥ मोहि बर दान देवता दीना; जिह सरि अउर न कोई ॥ मै ही भयो जगत को करता; जो मै करौ सु होई ॥१०५॥ बिसनपद ॥ गउरी ॥ त्वप्रसादि कथता ॥ मो ते अउर बली को है? ॥ जउन मो ते जंग जीते; जुध मै कर जै ॥ इंद्र चंद उपिंद्र कौ; पल मधि जीतौ जाइ ॥ अउर ऐसो को भयो? रण मोहि जीते आइ ॥ सात सिंध सुकाइ डारो; नैकु रोसु करो ॥ जछ गंध्रब किंन्र कोर; करोर मोरि धरो ॥ देव और अदेव जीते; करे सबै गुलाम ॥ दिब दान दयो मुझै; छुऐ सकै को मुहि छाम ॥१०६॥ |
| बिसनपद ॥ मारू ॥
यौ कहि पारस रोस बढायो ॥ दुंदभि ढोल बजाइ महा धुनि; सामुहि संन्यासनि धायो ॥ असत्र ससत्र नाना बिधि छडै; बाण प्रयोघ चलाए ॥ सुभट सनाहि पत्र चलदल ज्यों; बानन बेधि उडाए ॥ दुहदिस बान पान ते छूटे; दिनपति देह दुराना ॥ भूमि अकास एक जनु हुऐ गए; चाल चहूं चक माना ॥ इंदर चंद्र मुनिवर सब कांपे; बसु दिगिपाल डरानीय ॥ बरन कुबेर छाडि पुर भाजे; दुतीय प्रलै करि मानीय ॥१०७॥ बिसनपद ॥ मारू ॥ सुरपुर नारि बधावा माना ॥ बरि है आज महा सुभटन कौ; समर सुय्मबर जाना ॥ लखि है एक पाइ ठाढी हम; जिम जिम सुभट जुझै है ॥ तिम तिम घालि पालकी आपन; अमरपुरी लै जै है ॥ चंदन चारु चित्र चंदन के; चंचल अंग चड़ाऊ ॥ जा दिन समर सुअ्मबर करि कै; परम पिअर वहि पाऊ ॥ ता दिन देह सफल करि मानो; अंग सींगार धरो ॥ जा दिन समर सुय्मबर सखी री! पारस नाथ बरो ॥१०८॥ बिसनपद ॥ काफी ॥ चहु दिस मारू सबद बजे ॥ गहि गहि गदा गुरज गाजी सब; हठि रणि आनि गजे ॥ बान कमान क्रिपान सैहथी; बाण प्रयोघ चलाए ॥ जानुक महा मेघ बूंदन ज्यों; बिसिख ब्यूहि बरसाए ॥ चटपट चरम बरम सब बेधे; सटपट पार पराने ॥ खटपट सरब भूमि के बेधे; नागन लोक सिधाने ॥ झमकत खड़ग काढि नाना बिधि; सैहथी सुभट चलावत ॥ जानुक प्रगट बाट सुर पुर की; नीके हिरदे दिखावत ॥१०९॥ बिसनपद ॥ सोरठि ॥ बानन बेधे अमित संनिआसी ॥ ते तज देह नेह स्मपति को; भए सुरग के बासी ॥ चरम बरम रथ धुजा पताका; बहु बिधि काटि गिराए ॥ सोभत भए इंद्र पुर जम पुर; सुर पुर निरख लजाए ॥ भूखन बसत्र रंग रंगन के; छुटि छुटि भूमि गिरे ॥ जनुक असोक बाग दिवपति के; पुहप बसंति झरे ॥ कटि कटि गिरे गजन कु्मभ सथल; मुकता बिथुरि परे ॥ जानुक अम्रित कुंड मुख छुटै; जल कन सुभग झरे ॥११०॥ |
| देव गंधारी ॥
दूजी तरह ॥ दुह दिस परे बीर हकारि ॥ काढि काढि क्रिपाण धावत; मारु मारु उचारि ॥ पान रोकि सरोख रावत; क्रुध जुध फिरे ॥ गाहि गाहि गजी रथी; रणि अंति भूमि गिरे ॥ तानि तानि संधान बान; प्रमान कान सुबाहि ॥ बाहि बाहि फिरे सुबाहन; छत्र धरम निबाहि ॥ बेधि बेधि सु बान अंग; जुआन जुझे ऐस ॥ भूरि भारथ के समे; सर सेज भीखम जैस ॥१११॥ बिसनपद ॥ सारंग ॥ इह बिधि बहुतु संनिआसी मारे ॥ केतिक बांधि बारि मो बोरे; किते अगनि मो सारे ॥ केतन एक हाथ कटि डारे; केतिन के द्वै हाथ ॥ तिल तिल पाइ रथी कटि डारे; कटे कितन के माथ ॥ छत्र चम्र रथ बाज कितने के; काटि काटि रणि डारे ॥ केतन मुकट लकुट लै तोरे; केतन जूट उपारे ॥ भकि भकि गिरे भि्मभर बसुधा पर; घाइ अंग भिभरारे ॥ जानुक अंत बसंत समै मिलि; चाचर खेल सिधारे ॥११२॥ बिसनपद ॥ अडान ॥ चुपरे चारु चिकने केस ॥ आनि आनि फिरी चहूं दिसि; नारि नागरि भेस ॥ चिबक चारु सु धार बेसर; डारि काजर नैन ॥ जीव जंतन का चली? चित लेत चोर सु मैन ॥ देख री सुकुमार सुंदर; आजु बर है बीर ॥ बीन बीन धरो सबंगन; सुध केसरि चीर ॥ चीन चीन बरि है सुबाह; सु मध जुध उछाह ॥ तेग तीरन बान बरछन; जीत करि है बयाह ॥११३॥ बिसनपद ॥ सोरठि ॥ कहा लौ उपमा इती करौ? ॥ ग्रंथ बढन के काज सुनहु जू! चित मै अधिक डरौ ॥ तउ सुधारि बिचार कथा; कहि कहि संछेप बखानो ॥ जैसे तव प्रताप के बल ते; जथा सकति अनुमानो ॥ जब पारस इह बिधि रन मंड्यो; नाना ससत्र चलाए ॥ हते सु हते जीअ लै भाजे; चहुं दिस गए पराए ॥ जे हठ तिआगि आनि पग लागे; ते सब लए बचाई ॥ भूखन बसन बहुतु बिधि दीने; दै दै बहुत बडाई ॥११४॥ |
| बिसनपद ॥ काफी ॥
पारस नाथ बडो रण पार्यो ॥ आपन प्रचुर जगत मतु कीना; देवदत को टार्यो ॥ लै लै ससत्र असत्र नाना बिधि; भांति अनिक अरि मारे ॥ जीते परम पुरख पारस के; सगल जटा धर हारे ॥ बेख बेख भट परे धरन गिरि; बाण प्रयोघन घाए ॥ जानुक परम लोक पावन कहु; प्रानन पंख लगाए ॥ टूक टूक ह्वै गिरे कवच कटि; परम प्रभा कहु पाई ॥ जणु दै चले निसाण सुरग कह; कुलहि कलंक मिटाई ॥११५॥ बिसनपद ॥ सूही ॥ पारस नाथ बडो रण जीतो ॥ जानुक भई दूसर करणारजुन; भारथ सो हुइ बीतो ॥ बहु बिधि चलै प्रवाहि स्रोण के; रथ गज असव बहाए ॥ भै कर जान भयो बड आहव; सात समुंदर लजाए ॥ जह तह चले भाज संनिआसी; बाणन अंग प्रहारे ॥ जानुक बज्र इंद्र के भै ते; पब सपछ सिधारे ॥ जिह तिह गिरत स्रोण की धारा; अरि घूमत भिभरात ॥ निंदा करत छत्रीय धरम की; भजत दसो दिस जात ॥११६॥ बिसनपद ॥ सोरठि ॥ जेतक जीअत बचे संन्यासी ॥ त्रास मरत फिरि बहुरि न आए; होत भए बनबासी ॥ देस बिदेस ढूंढ बन बेहड़; तह तह पकरि संघारे ॥ खोजि पताल अकास सुरग कहु; जहा तहा चुनि मारे ॥ इह बिधि नास करे संनिआसी; आपन मतह मतायो ॥ आपन न्यास सिखाइ सबन कहु; आपन मंत्र चलायो ॥ जे जे गहे तिन ते घाइल; तिन की जटा मुंडाई ॥ दोही दूर दत की कीनी; आपन फेरि दुहाई ॥११७॥ बिसनपद ॥ बसंत ॥ इह बिधि फाग क्रिपानन खेले ॥ सोभत ढाल माल डफ मालै; मूठ गुलालन सेले ॥ जानु तुफंग भरत पिचकारी; सूरन अंग लगावत ॥ निकसत स्रोण अधिक छबि उपजत; केसर जानु सुहावत ॥ स्रोणत भरी जटा अति सोभत; छबहि न जात कह्यो ॥ मानहु परम प्रेम सौ डार्यो; ईंगर लागि रह्यो ॥ जह तह गिरत भए नाना बिधि; सांगन सत्रु परोए ॥ जानुक खेल धमार पसारि कै; अधिक स्रमित ह्वै सोए ॥११८॥ |
| बिसनपद ॥ परज ॥
दस सै बरख राज तिन कीना ॥ कै कै दूर दत के मत कहु; राज जोग दोऊ लीना ॥ जे जे छपे लुके कहूं बाचे; रहि रहि वहै गए ॥ ऐसे एक नाम लैबे को; जग मो रहत भए ॥ भांति भांति सौ राज करत यौ; भांति भांति धन जोर्यो ॥ जहा जहा मानस स्रउनन सुन; तहा तहा ते तोर्यो ॥ इह बिधि जीत देस पुर देसन; जीत निसान बजायो ॥ आपन करण कारण करि मान्यो; काल पुरख बिसरायो ॥११९॥ रूआमल छंद ॥ दस सहंस्र प्रमाण बरखन; कीन राज सुधारि ॥ भांति भांति धरान लै; अरु सत्रु सरब संघारि ॥ जीति जीति अनूप भूप; अनूप रूप अपार ॥ भूप मेध ठट्यो न्रिपोतम; एक जग सुधारि ॥१२०॥ देस देसन के नरेसन; बाधि कै इक बारि ॥ रोह देस बिखै गयो लै; पुत्र मित्र कुमार ॥ नारि संजुत बैठि बिधवत; कीन जग अर्मभ ॥ बोलि बोलि करोर रितज; और बिप अस्मभ ॥१२१॥ राजमेध कर्यो लगै; आर्मभ भूप अपार ॥ भांति भांति सम्रिध जोरि; सुमित्र पुत्र कुमार ॥ भांति अनेकन के जुरे जन; आनि कै तिह देस ॥ छीनि छीनि लए न्रिपाबर; देस दिरब अविनेस ॥१२२॥ देख के इह भांति सरब सु; भूप स्मपति नैण ॥ गरब सो भुज दंड कै; इह भांति बोला बैण ॥ भूप मेध करो सबै तुम; आज जग अर्मभ ॥ सतजुग माहि भयो जिही बिधि; कीन राजै ज्मभ ॥१२३॥ मंत्रीय बाच ॥ लछ जउ न्रिप मारीयै; तब होत है न्रिप मेध ॥ एक एक अनेक स्मपति; दीजीयै भविखेध ॥ लछ लछ तुरंग एकहि; दीजीऐ अबिचार ॥ जग पूरण होतु है; सुन, राज राज वतार! ॥१२४॥ भांति भांति सुम्रिध स्मपति; दीजीयै इक बार ॥ लछ हसत, तुरंग द्वै लछ; सुवरन भार अपार ॥ कोटि कोटि दिजेक एकहि; दीजीयै अबिल्मब ॥ जग पूरण होइ तउ; सुन, राज राज अस्मभ! ॥१२५॥ |
| पारसनाथ बाच ॥
रूआल छंद ॥ सुवरन की न इती कमी; जउ टुट है बहु बरख ॥ हसत की न कमी मुझै; हय सार लीजै परख ॥ अउर जउ धन चाहीयै; सो लीजीयै अबिचार ॥ चित मै न कछू करो; सुन मंत्र मित्र अवतार! ॥१२६॥ यउ जबै न्रिप उचर्यो; तब मंत्रि बर सुनि बैन ॥ हाथ जोरि सलाम कै; न्रिप नीच कै जुग नैन ॥ अउर एक सुनो न्रिपोतम! उचरौं इक गाथ ॥ जौन मधि सुनी पुरानन; अउर सिम्रित साथ ॥१२७॥ मंत्री बाच ॥ रूआल छंद ॥ अउर जो सभ देस के न्रिप; जीतीयै सुनि भूप! ॥ परम रूप पवित्र गात; अपवित्र हरण सरूप ॥ ऐस जउ सुनि भूप भूपति! सभ पूछीआ तिह गाथ ॥ पूछ आउ सबै न्रिपालन; हउ कहो तुह साथ ॥१२८॥ यौ कहे जब बैन भूपति; मंत्रि बर सुनि धाइ ॥ पंच लछ बुलाइ भूपति; पूछ सरब बुलाइ ॥ अउर सात हूं लोक भीतर; देहु अउर बताइ ॥ जउन जउन न जीतिआ न्रिप; रोस कै न्रिप राइ ॥१२९॥ देखि देखि रहे सबै; तर को, न देत बिचार ॥ ऐस कउन रहा धरा पर? देहु ताहि उचार ॥ एक एक बुलाइ भूपति; पूछ सरब बुलाइ ॥ को अजीत रहा नही; जिह ठउर देहु बताइ ॥१३०॥ एक न्रिप बाच ॥ रूआल छंद ॥ एक भूपति उचरो; सुनि लेहु राजा! बैन ॥ जान माफ करो, कहो तब; राज राज सु नैन! ॥ एक है मुनि सिंधु मै; अरु मछ के उर माहि ॥ मोहि राव बिबेक भाखौ; ताहि भूपति नाहि! ॥१३१॥ एक द्योस जटधरी; न्रिप कीनु छीर प्रवेस ॥ चित्र रूप हुती तहा इक; नारि नागर भेस ॥ तासु देखि सिवेस को; गिर बिंद सिंध मझार ॥ मछ पेट मछंद्र जोगी; बैठि है न्रिप! बार ॥१३२॥ तासु ते चल पुछीऐ; न्रिप सरब बात बिबेक ॥ एन तोहि बताइ है; न्रिप! भाखि हो जु अनेक ॥ ऐस बात सुनी जबै; तब राज राज अवतार ॥ सिंधु खोजन को चला; लै जगत के सब जार ॥१३३॥ |
| भांति भांति मंगाइ जालन; संग लै दल सरब ॥
जीत दुंदभ दै चला; न्रिप जानि कै जीअ गरब ॥ मंत्री मित्र कुमारि स्मपत; सरब मधि बुलाइ ॥ सिंध जार डरे जहा तहा; मछ सत्रु डराइ ॥१३४॥ भांति भातन मछ कछप; अउर जीव अपार ॥ बधि जारन ह्वै कढे; तब तिआगि प्रान सु धार ॥ सिंधु तीर गए जबै; जल जीव एकै बार ॥ ऐस भांति भए बखानत; सिंधु पै मत सार ॥१३५॥ बिप को धरि सिंधु मूरति; आइयो तिह पासि ॥ रतन हीर प्रवाल मानक; दीन है अनिआस ॥ जीव काहि संघारीऐ? सुनि लीजीऐ न्रिप! बैन ॥ जउन कारज को चले तुम; सो नही इह ठैन ॥१३६॥ सिंधु बाच ॥ रूआल छंद ॥ छीर सागर है जहा; सुन राज राज वतार! ॥ मछ उदर मछंद्र जोगी; बैठ है ब्रत धारि ॥ डारि जार निकार ताकहि; पूछ लेहु बनाइ ॥ जो कहा सो कीजीऐ न्रिप! इही सति उपाइ ॥१३७॥ जोरि बीरन नाख सिंधह; आग चाल सुबाह ॥ हूर पूर रही जहा तहा; जत्र तत्र उछाह ॥ भांति भांति बजंत्र बाजत; अउर घुरत निसान ॥ छीर सिंधु हुतो जहा; तिह ठाम पहुचे आनि ॥१३८॥ सूत्र जार बनाइ कै; तिह मधि डारि अपार ॥ अउर जीव घने गहे; न विलोकयो सिव बार ॥ हारि हारि फिरे सबै भट; आनि भूपति तीर ॥ अउर जीव घने गहे; पर सो न पाव फकीर ॥१३९॥ मछ पेटि मछंद्र जोगी; बैठ है बिनु आस ॥ जार भेट सकै न वा को; मोनि अंग सु बास ॥ एक जार सुना नयो; तिह डारीऐ अबिचार ॥ सति बात कहो तुमै; सुनि राज राज वतार! ॥१४०॥ गिआन नामु सुना हमो तिह; जार को न्रिप राइ! ॥ तउन ता मै डारि कै; मुनि राज! लेहु गहाइ ॥ यौ न हाथि परे मुनीसुर; बीत है बहु बरख ॥ सति बात कहौ तुमै; सुन लीजीऐ भरतरख! ॥१४१॥ यौ न पानि परे मुनाबर; होहिं कोटि उपाइ ॥ डार के तुम ग्यान जार सु; तासु लेहु गहाइ ॥ ग्यान जार जबै न्रिप्मबर; डार्यो तिह बीच ॥ तउन जार गहो मुनाबर; जानु दूज दधीच ॥१४२॥ |
| मछ सहित मछिंद्र जोगी; बधि जार मझार ॥
मछ लोक बिलोकि कै सब; ह्वै गए बिस्मभार ॥ द्वै महूरत बिती जबै; सुधि पाइ कै कछु अंगि ॥ भूप द्वार गए सभै भट; बाधि असत्र उतंग ॥१४३॥ मछ उदर लगे सु चीरन; किउहूं न चीरा जाइ ॥ हारि हारि परै जबै; तब पूछ मित्र बुलाइ ॥ अउर कउन बिचारीऐ? उपचार ताकर आज ॥ द्रिसटि जा ते परै मुनीस्वर; सरे हमरो काजु ॥१४४॥ दोहरा ॥ मछ पेट किहूं न फटे; सब कर हटे उपाइ ॥ ग्यान गुरू तिन को हुतो; पूछा तहि बनाइ ॥१४५॥ तोटक छंद ॥ भट त्याग कै सब गरब ॥ न्रिप तीर बोलो सरब ॥ न्रिप! पूछीऐ गुर ग्यान ॥ कहि देइ तोहि बिधान ॥१४६॥ बिधि पूरि कै सुभ चार ॥ अरु ग्यान रीति बिचारि ॥ गुर! भाखीऐ मुहि भेव ॥ किम देखीऐ मुनि देव ॥१४७॥ गुर ग्यान बोल्यो बैन ॥ सुभ बाच सो सुख दैन ॥ छुरका बिबेक लै हाथ ॥ इह फारीऐ तिह साथ ॥१४८॥ तब काम तैसो ई कीन ॥ गुर ग्यान ज्यों सिख दीन ॥ गहि कै बिबेकहि हाथ ॥ तिह चीरिआ तिह साथ ॥१४९॥ जब चीरि पेट बनाइ ॥ तब देखए जग राइ ॥ जुत ध्यान मुंद्रत नैन ॥ बिनु आस चित न डुलैन ॥१५०॥ सत धात पुत्रा कीन ॥ मुनि द्रिसटि तर धर दीन ॥ जब छूटि रिखि के ध्यान ॥ तब भए भसम प्रमान ॥१५१॥ जो अउर द्रिग तरि आउ ॥ सोऊ जीअत जान न पाउ ॥ सो भसम होवत जानु ॥ बिनु प्रीति भगत न मानु ॥१५२॥ जब भए पुत्रा भसम ॥ जन अंधता रवि रसम ॥ पुनि पूछीआ तिहा जाइ ॥ मुनि राज! भेद बताइ ॥१५३॥ नराज छंद ॥ कउन भूप भूमि मै? बताइ मोहि दीजीयै ॥ जो मोहि त्रासि न त्रस्यो; क्रिपा रिखीस कीजीयै ॥ सु अउर कउन है हठी सु? जउन मो न जीतियो ॥ अत्रास कउन ठउर है? जहा न मोह बीतियो ॥१५४॥ |
| न संक चित आनीयै; निसंक भाख दीजीयै ॥
सु को अजीत है रहा? उचार तासु कीजीयै ॥ नरेस देस देस के; असेस जीत मै लीए ॥ छितेस भेस भेस के; गुलाम आनि हूऐ रहे ॥१५५॥ असेख राज काज मो; लगाइ कै दीए ॥ अनंत तीरथ नाति कै; अछिन पुंन मै कीए ॥ अनंत छत्रीआन छै; दुरंत राज मै करो ॥ सो को तिहुं जहान मै; समाज जउन ते टरो ॥१५६॥ अनंग रंग रंग के; सुरंग बाज मै हरे ॥ बसेख राजसूइ जग बाजमेध मै करे ॥ न भूमि ऐस को रही; न जग ख्मभ जानीयै ॥ जगत्र करण कारण करि; दुतीय मोहि मानीयै ॥१५७॥ सु अत्र छत्र जे धरे; सु छत्र सूर सेवही ॥ अदंड खंड खंड के; सुदंड मोहि देवही ॥ सु ऐस अउर कौन है? प्रतापवान जानीऐ ॥ त्रिलोक आज के बिखै; जोगिंदर! मोहि मानीऐ ॥१५८॥ मछिंद्र बाच पारसनाथ सो ॥ सवैया ॥ कहा भयो? जो सभ ही जग जीति सु; लोगन को बहु त्रास दिखायो ॥ अउर कहा? जु पै देस बिदेसन; माहि, भले गज गाहि बधायो ॥ जो मनु जीतत है सभ देस; वहै तुमरै न्रिप! हाथि न आयो ॥ लाज गई, कछु काज सर्यो नही; लोक गयो, परलोक न पायो ॥१५९॥ भूमि को कउन गुमान है? भूपति! सो नही काहूं के संग चलै है ॥ है छलवंत बडी बसुधा यहि; काहूं की है नह काहूं हुऐ है ॥ भउन भंडार सबै बर नारि सु; अंति तुझै कोऊ साथ न दै है ॥ आन की बात चलात हो काहे कउ? संगि की देह न संगि सिधै है ॥१६०॥ राज के साज को कउन गुमान? निदान जु आपन संग न जै है ॥ भउन भंडार भरे घर बार सु; एक ही बार बिगान कहै है ॥ पुत्र कलत्र सु मित्र सखा कोई; अंति समै, तुहि साथ न दै है ॥ चेत रे! चेत अचेत महा पसु! संग बीयो, सो भी संग न जै है ॥१६१॥ कउन भरोस भटान को? भूपति! भार परे जिनि भार सहैंगे ॥ भाज है भीर भयानक हुऐ कर; भारथ सो नही भेर चहैंगे ॥ एक उपचार न चाल है राजन! मित्र सबै म्रित नीर बहैंगे ॥ पुत्र कलत्र सभै तुमरे न्रिप! छूटत प्रान, मसान कहैंगे ॥१६२॥ |
| पारसनाथ बाच मछिंद्र सो ॥
तोमर छंद ॥ मुनि! कउन है वह राउ? ॥ तिह आज मोहि बताउ ॥ तिह जीत हो जब जाइ ॥ तब भाखीअउ मुहि राइ ॥१६३॥ मछिंद्र बाच पारसनाथ सो ॥ तोमर छंद ॥ सुन राज राजन हंस! ॥ भव भूमि के अवतंस ॥ तुहि जीतए सब राइ ॥ पर सो न जीतयो जाइ ॥१६४॥ अबिबेक है तिह नाउ ॥ तव हीय मै तिह ठाउ ॥ तिह जीत कही न भूप ॥ वह है सरूप अनूप ॥१६५॥ छपै छंद ॥ बलि महीप जिन छल्यो; ब्रहम बावन बस किनो ॥ किसन बिसन जिन हरे; दंड रघुपति ते लिनो ॥ दस ग्रीवहि जिनि हरा; सुभट सु्मभासुर खंड्यो ॥ महखासुर मरदीआ मान; मधु कीट बिहंड्यो ॥ सोऊ मदन राज राजा न्रिपति; न्रिप अबिबेक मंत्री कीयो ॥ जिह देव दईत गंध्रब मुनि; जीति अडंड डंडहि लीयो ॥१६६॥ जवन क्रुध जुध करण; कैरव रण घाए ॥ जासु कोप के कीन; सीस दस सीस गवाए ॥ जउन क्रुध के कीए; देव दानव रणि लुझे ॥ जासु क्रोध के कीन; खसट कुल जादव जुझे ॥ सोऊ ता समानु सैनाधिपति; जिदिन रोस वहु आइ है ॥ बिनु इक बिबेक सुनहो न्रिपति! अवर समुहि को जाइ है? ॥१६७॥ पारसनाथ बाच मछिंद्र सो ॥ छपै छंद ॥ सुनहु मछिंद्र! बैन; कहो तुहि बात बिचछन ॥ इक बिबेक अबिबेक; जगत द्वै न्रिपति सुलछन ॥ बड जोधा दुहूं संग; बडे दोऊ आप धनुरधर ॥ एक जाति इक पाति; एक ही मात जोधाबर ॥ इक तात एक ही बंस; पुनि बैर भाव दुह किम गहो? ॥ तिह नाम ठाम आभरण रथ; ससत्र असत्र सब मुनि! कहो ॥१६८॥ मछिंद्र बाच पारसनाथ सो ॥ छपै छंद ॥ असित बरण अबिबेक; असित बाजी रथ सोभत ॥ असित बसत्र तिह अंगि; निरखि नारी नर लोभत ॥ असित सारथी अग्र; असित आभरण रथोतम ॥ असित धनुख करि असित; धुजा जानुक पुरखोतम ॥ इह छबि नरेस अबिबेक न्रिप; जगत जयंकर मानीयै ॥ अनजित जासु कह न तजो; क्रिसन रूप तिह जानीयै ॥१६९॥ |
| पुहप धनुख अलि पनच; मतस जिह धुजा बिराजै ॥
बाजत झाझर तूर; मधुर बीना धुनि बाजै ॥ सब बजंत्र जिह संग बजत; सुंदर छब सोहत ॥ संग सैन अबला स्मबूह; सुर नर मुनि मोहत ॥ अस मदन राज राजा न्रिपति; जिदिन क्रुध करि धाइ है ॥ बिनु इक बिबेक ता के समुहि; अउर दूसर को जाइ है? ॥१७०॥ करत न्रित सुंदरी; बजत बीना धुनि मंगल ॥ उपजत राग स्मबूह; बजत बैरारी बंगलि ॥ भैरव राग बसंत दीप; हिंडोल महा सुर ॥ उघटत तान तरंग; सुनत रीझत धुनि सुर नर ॥ इह छबि प्रभाव रितु राज न्रिप; जिदिन रोस करि धाइ है ॥ बिनु इक बिबेक ता के न्रिपति! अउर समुहि को जाइ है? ॥१७१॥ सोरठि सारंग सुध मलार; बिभास सरबि गनि ॥ रामकली हिंडोल गौड; गूजरी महा धुनि ॥ ललत परज गवरी मलार; कानड़ा महा छबि ॥ जाहि बिलोकत बीर सरब; तुमरे जै है दबि ॥ इह बिधि नरेस रितु राज न्रिप; मदन सूअन जब गरज है ॥ बिनु इक ग्यान सुन हो न्रिपति! सु अउर दूसर को बरजि है? ॥१७२॥ कऊधत दामनि सघन सघन; घोरत चहुदिस घन ॥ मोहित भामिन सघन; डरत बिरहनि त्रिय लखि मनि ॥ बोलत दादुर मोर; सघन झिली झिंकारत ॥ देखत द्रिगन प्रभाव अमित; मुनि मन ब्रित हारत ॥ इह बिधि हुलास मदनज दूसर; जिदिन चटक दै सटक है ॥ बिनु इक बिबेक सुनहो न्रिपति! अउर दूसर को हटक है? ॥१७३॥ त्रितीआ पुत्र अनंद; जिदिन ससत्रन कहु धरि है ॥ करि है चित्र बचित्र सु रण; सुर नर मुनि डरि है ॥ को भट धरि है धीर? जिदिन सामुहि वह ऐ है ॥ सभ को तेज प्रताप; छिनक भीतर हर लै है ॥ इह बिधि अनंद दुर धरख भट; जिदिन ससत्र गह मिक है ॥ बिनु इक धीरज सुनि रे न्रिपति! सु अउर न दूसरि टिक है ॥१७४॥ |
| रतन जटत रथ सुभत; खचित बज्रन मुकताफल ॥
हीर चीर आभरण; धरे सारथी महाबल ॥ कनक देख कुररात; कठन कामिन ब्रित हारत ॥ तनि पट्मबर जरकसी; परम भूखन तन धारत ॥ इह छबि अनंद मदनज न्रिपति; जिदिन गरज दल गाहि है ॥ बिनु इक धीरज सुनि रे न्रिपति! सु अउर समुह को जाहि है? ॥१७५॥ धूम्र बरण सारथी; धूम्र बाजीरथ छाजत ॥ धूम्र बरण आभरण; निरखि सुर नर मुनि लाजत ॥ धूम्र नैन धूमरो गात; धूमर तिह भूखन ॥ धूम्र बदन ते बमत सरब; सत्रू कुल दूखन ॥ अस भरम मदन चतुरथ सुवन; जिदिन रोस करि धाइ है ॥ दल लूट कूट तुमरो न्रिपति! सु सरब छिनक महि जाइ है ॥१७६॥ अउर अउर जे सुभटि; गनो तिह नाम बिचछन ॥ बड जोधा बड सूर; बडे जितवार सुलच्छन ॥ कलहि नाम इक नारि; महा कल रूप कलह कर ॥ लोग चतुरदस माझि; जासु छोरा नही सुर नर ॥ सब ससत्र असत्र भीतर निपुण; अति प्रभाव तिह जानीऐ ॥ सब देस भेस अरु राज सब; त्रास जवन को मानीऐ ॥१७७॥ बैर नाम इक बीर; महा दुर धरख अजै रणि ॥ कबहु दीन नही पीठि; अनिक जीते जिह न्रिप गण ॥ लोचन स्रौणत बरण अरुण; सब ससत्र अंगि तिह ॥ रवि प्रकास सर धुजा; अरुण लाजत लखि छबि जिह ॥ इह भांति बैर बीरा बडै; जिदिन क्रुध करि गरजि है ॥ बिनु एक सांति सुन रे न्रिपति! सु अउर न दूसर बरजि है? ॥१७८॥ धूम्र धुजा रथ धूम्र; धूम्र सारथी बिराजत ॥ धूम्र बसत्र तन धरे; निरखि धूअरो मनि लाजत ॥ धूम्र धनुख कर छक्यो; बान धूमरे सुहाए ॥ सुर नर नाग भुजंग जछ; अरु असुर लजाए ॥ इह छबि प्रभाव आलस न्रिपति; जिदिन जुध कह जुट है ॥ उदम बिहीन सुन रे न्रिपति! अउर सकल दल फुट है ॥१७९॥ |
| हरित धुजा अरु धनुख; हरित बाजी रथ सोभंत ॥
हरत बसत्र तन धरे; निरखि सुर नर मन मोहंत ॥ पवन बेग रथ चलत भ्रमन; बघूला लखि लजित ॥ सुनत स्रवन चक सबद मेघ; मन महि सुखु सजित ॥ इह छबि प्रताप मद नाम न्रिप; जिदिन तुरंग नचाइ है ॥ बिनु इक बिबेक सुन लै न्रिपति! ससु समरि न दूसर जाइ है ॥१८०॥ असित धुजा सारथी असित; बसत्रै अरु बाजी ॥ असित कवच तन कसे; तजत बाणन की राजी ॥ असित सकल तिह बरण; असित लोचन दुख मरदन ॥ असित मणिण के सकल अंगि; भूखण रुचि बरधन ॥ अस कुव्रिति बीर दुर धरख अति; जिदिन समर कह सजि है ॥ बिनु इक धीरज बीरत तजि; अउर सकल दल भजि है ॥१८१॥ चरम बरम कह धरे; धरम छत्री को धारत ॥ अजै जानि आपनहि; सरब रण सुभट पचारत ॥ धरन न आगै धीर; बीर जिह सामुह धावत ॥ सुर असुर अरु नर नारि; जछ गंध्रब गुन गावत ॥ इह बिधि गुमान जा दिन गरज; परम क्रोध कर ढूक है ॥ बिनु इक सील सुन न्रिपति न्रिपाणि; सु अउर सकल दल हूक है ॥१८२॥ कड़कि क्रोध करि चड़गु; भड़कि भादवि ज्यों गजत ॥ सड़क तेग दामिन तड़क; तड़भड़ रण सजत ॥ लुड़क लुथ बिथुरग; सेल सामुहि ह्वै घलत ॥ जिदिन रोस रावत रणहि; दूसर को झलत ॥ इह बिधि अपमान तिह भ्रात भन; जिदिन रुद्र रस मचि है ॥ बिन इक सील दुसील भट; सु अउर कवण रणि रचि है? ॥१८३॥ धनुख मंडलाकार; लगत जा को सदीव रण ॥ निरखत तेज प्रभाव; भटक भाजत है भट गण ॥ कउन बाधि ते धीर? बीर निरखत दुति लाजत ॥ नहन जुध ठहराति; त्रसत दसहूं दिस भाजत ॥ इह बिधि अनरथ समरथ रणि; जिदिन तुरंग मटक है ॥ बिनु इक धीर सुन बीर बरु; सु दूसर कउन हटकि है? ॥१८४॥ |
| प्रीत बसत्र तनि धरे; धुजा पीअरी रथ धारे ॥
पीत धनुख करि सोभ; मान रति पति को टारे ॥ पीत बरण, सारथी पीत; बरणै रथ बाजी ॥ पीत बरन को बाण; खेति चड़ि गरजत गाजी ॥ इह भांति बैर सूरा न्रिपति! जिदिन गरजि दल गाहि है ॥ बिनु इक गिआन सवधान ह्वै; अउर समर को चाहि है? ॥१८५॥ मलित बसत्र तनि धरे; मलित भूखन रथ बाधे ॥ मलित मुकट सिर धरे; परम बाणण कह साधे ॥ मलित बरण सारथी; मलित ताहूं आभूखन ॥ मलयागर की गंध; सकल सत्रू कुल दूखन ॥ इह भांति निंद अनधर सुभट; जिदिन अयोधन मचि है ॥ बिनु इक धीरज सुन बीर बर; सु अउर कवण रणि रचि है? ॥१८६॥ घोर बसत्र तनि धरे; घोर पगीआ सिर बाधे ॥ घोर बरण सिरि मुकट; घोर सत्रन कह साधे ॥ घोर मंत्र मुख जपत; परम आघोर रूप तिह ॥ लखत स्वरग भहरात; घोर आभा लखि कै जिह ॥ इह भांति नरक दुर धरख भट; जिदिन रोसि रणि आइ है ॥ बिनु इक हरिनाम सुन हो न्रिपति! सु अउर न कोइ बचाइ है ॥१८७॥ समट सांग संग्रहै; सेल सामुहि ह्वै सुटै ॥ कलित क्रोध संजुगति; गलित गैवर जियों जुटै ॥ इक इक बिनु कीन; इक ते इक न चलै ॥ इक इक संग भिड़ै; ससत्र सनमुख ह्वै झलै ॥ इह बिधि नसील दुसील भट; सहत कुचील जबि गरजि है ॥ बिनु एक सुचहि सुनि न्रिप न्रिपणि! सु अउर न कोऊ बरजि है ॥१८८॥ ससत्र असत्र दोऊ निपुण; निपुण सब बेद सासत्र कर ॥ अरुण नेत्र अरु रकत बसत्र; ध्रितवान धनुरधर ॥ बिकट बाक्य बड ड्याछ; बडो अभिमान धरे मन ॥ अमित रूप अमितोज अभै; आलोक अजै रन ॥ अस सुभट छुधा त्रिसना सबल; जिदिन रंग रण रचि है ॥ बिनु इक न्रिपति! निग्रह बिना; अउर जीअ न लै बचि है ॥१८९॥ |
| पवन बेग रथ चलत; सु छबि सावज तड़ता क्रित ॥
गिरत धरन सुंदरी; नैक जिह दिसि फिरि झाकत ॥ मदन मोह मन रहत; मनुछ देखि छबि लाजत ॥ उपजत हीय हुलास; निरखि दुति कह दुख भाजत ॥ इमि कपट देव अनजेव न्रिपु; जिदिन झटक दै धाइ है ॥ बिनु एक सांति सुनहो न्रिपति! सु अउर कवन समुहाइ है ॥१९०॥ चखन चारु चंचल प्रभाव; खंजन लखि लाजत ॥ गावत राग बसंत; बेण बीना धुनि बाजत ॥ धधकत ध्रिकट म्रिदंग; झांझ झालर सुभ सोहत ॥ खग म्रिग जछ भुजंग; असुर सुर नर मन मोहत ॥ अस लोभ नाम जोधा बडो; जिदिन जुध कह जुटि है ॥ जस पवन बेग ते मेघ गण; सु अस तव सब दल फुटि है ॥१९१॥ धुज प्रमाण बीजुरी; भुजा भारी जिह राजत ॥ अति चंचल रथ चलत; निरख सुर नर मुनि भाजत ॥ अधिक रूप अमितोज; अमिट जोधा रण दुह कर ॥ अति प्रताप बलवंत; लगत सत्रन कह रिपु हर ॥ अस मोह नाम जोधा जस; जिदिन जुध कह जुटि है ॥ बिन इक बिचार अबिचार न्रिप! अउर सकल दल फुटि है ॥१९२॥ पवन बेग रथ चलत; गवन लखि मोहित नागर ॥ अति प्रताप अमितोज; अजै प्रतमान प्रभाधर ॥ अति बलिसट अधिसट; सकल सैना कहु जानहु ॥ क्रोध नाम बढियाछ; बडो जोधा जीअ मानहु ॥ धरि अंगि कवच धर पनच करि; जिदिन तुरंग मटक है ॥ बिनु एक सांति सुन सति; न्रिप! सु अउर न कोऊ हटकि है ॥१९३॥ गलित दुरद मदि चड़्यो; कढि करवार भयंकर ॥ स्याम बरण आभरण; खचित सब नील मणिण बर ॥ स्वरन किंकणी जाल; बधे बानैत गजोतम ॥ अति प्रभाव जुति बीर; सिध सावंत नरोतम ॥ इह छबि हंकार नामा सुभट; अति बलिसट तिह मानीऐ ॥ जिह जगत जीव जीते सबै; आप अजीत तिह जानीऐ ॥१९४॥ |
| सेत हसत आरूड़; ढुरत चहूं ओरि चवर बर ॥
स्वरण किंकणी बधे निरखि मोहत नारी नर ॥ सुभ्र सैहथी पाणि; प्रभा कर मै अस धावत ॥ निरखि दिपति दामनी प्रभा; हीयरे पछुतावत ॥ अस द्रोह नाम जोधा बडो; अति प्रभाव तिह जानीऐ ॥ जल थल बिदेस देसन न्रिपति; आन जवन की मानीऐ ॥१९५॥ तबल बाज घुंघरार; सीस कलगी जिह सोहत ॥ द्वै क्रिपाण गजगाह; निरखि नारी नर मोहत ॥ अमित रूप अमितोज; बिकट बानैत अमिट भट ॥ अति सुबाह अति सूर; अजै अनभिद सु अनकट ॥ इह भांति भरम अनभिद भट; जिदिन क्रुध जीय धार है ॥ बिन इक बिचार अबिचार न्रिप! ससु अउर न आनि उबारि है ॥१९६॥ लाल माल सुभ बधै; नगन सरपेचि खचित सिर ॥ अति बलिसट अनिभेद; अजै सावंत भटांबर ॥ कटि क्रिपाण सैहथी; तजत धारा बाणन कर ॥ देखत हसत प्रभाव; लजत तड़िता धाराधर ॥ अस ब्रहम दोख अनमोख भट; अकट अजै तिह जानीऐ ॥ अरि दवन अजै आनंद कर; न्रिप अबिबेक को मानीऐ ॥१९७॥ असित बसत्र अरु असित गात; अमितोज रणाचल ॥ अति प्रचंड अति बीर; बीर जीते जिन जल थल ॥ अकट अजै अनभेद; अमिट अनरथि नाम तिह ॥ अति प्रमाथ अरि मथन; सत्रु सोखन है ब्रिद जिह ॥ दुर धरख सूर अनभेद भट; अति प्रताप तिह जानीऐ ॥ अनजै, अनंद दाता अपन; अति सुबाह तिह मानीऐ ॥१९८॥ मोर बरण रथ बाज; मोर ही बरण परम जिह ॥ अमित तेज दुर धरख; सत्रु लख कर क्मपत तिह ॥ अमिट बीर आजान बाहु; आलोक रूप गन ॥ मतस केतु लखि जाहि; ह्रिदै लाजत है दुति मनि ॥ अस झूठ रूठि जिदिन न्रिपति; रणहि तुरंग उथकि है ॥ बिनु इक सति सुण सति न्रिप! सु अउर न आनि हटकि है ॥१९९॥ |
| रथ तुरंग सित असित; असित सित धुजा बिराजत ॥
असित सेतहि बसत्र निरखि; सुर नर मुनि लाजत ॥ असित सेत सारथी; असित सेत छकिओ रथांबर ॥ सुवरण किंकनी केस; जनुक दूसरे देवेसुर ॥ इह छबि प्रभाव मिथिआ सुभट; अति बलिसट तिह कह कह्यो ॥ जिह जगत जीव जीते सबै; नहि अजीत नर को रह्यो ॥२००॥ चक्र बक्र कर धरे; चारु बागा तनि धारे ॥ आनन खात त्मबोल; गंधि उतम बिसथारे ॥ चवरु चारु चहूं ओरि ढुरत; सुंदर छबि पावत ॥ निरखत नैन बसंत प्रभा; ताकह सिर न्यावत ॥ इह बिधि सुबाहु चिंता सुभट; अति दुर धरख बखानीऐ ॥ अनभंग गात अनभै सुभट; अति प्रचंड तिह मानीऐ ॥२०१॥ रूआल छंद ॥ लाल हीरन के धरे जिह; सीस पै बहु हार ॥ स्वरणी किंकणि सौ छक; गज राज पबाकार ॥ दुरद रूड़ दरिद्र नाम सु; बीर है सुनि भूप! ॥ कउन ता ते जीत है रण? आनि राज सरूप ॥२०२॥ जरकसी के बसत्र है; अरु परम बाजारूड़ ॥ परम रूप पवितर गात; अछिज रूप अगूड़ ॥ छत्र धरम धरे महा भट; बंस की जिह लाज ॥ संक नामा सूर सो; सब सूर है सिरताज ॥२०३॥ पिंग बाज नहे रथै; सहि अडिग बीर अखंड ॥ अंत रूप धरे मनो; अछिज गात प्रचंड ॥ नाम सूर असोभ ता कह; जानही सभ लोक ॥ कउन राव बिबेक है? जु न मानि है इह सोक ॥२०४॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ सजे स्याम बाजी रथं जासु जानो ॥ महा जंग जोधा अजै तासु मानो ॥ असंतुसट नाम महाबीर सोहै ॥ तिहूं लोक जा को बडो त्रास मोहै ॥२०५॥ चड़्यो तत ताजी सिराजीत सोभै ॥ सिरं जैत पत्रं लखे चंद्र छोभै ॥ अनास ऊच नामा महा सूर सोहै ॥ बडो छत्रधारी धरै छत्र जो है ॥२०६॥ रथं सेत बाजी सिराजीत सोहै ॥ लखे इंद्र बाजी तरै द्रिसट को है ॥ हठी बाबरी को हिंसा नाम जानो ॥ महा जंग जोधा अजै लोक मानो ॥२०७॥ |
| सुभं संदली बाज राजी सिराजी ॥
लखे रूप ता को लजै इंद्र बाजी ॥ कुमंतं महा जंग जोधा जुझारं ॥ जलं वा थलं जेण जिते बरिआरं ॥२०८॥ चड़्यो बाज ताजी कोपतं सरूपं ॥ धरे चरम बरमं बिसालं अनूपं ॥ धुजा बध सिधं अलजा जुझारं ॥ बडो जंग जोधा सु क्रुधी बरारं ॥२०९॥ धरे छीन बसत्रं मलीनं दरिद्री ॥ धुजा फाट बसत्रं सु धारे उपद्री ॥ महा सूर चोरी करोरी समानं ॥ लसै तेज ऐसो लजै देखि स्वानं ॥२१०॥ फटे बसत्र सरबं सबै अंग धारे ॥ बधे सीस जारी बुरी अरध जारे ॥ चड़्यो भीम भैसं महा भीम रूपं ॥ बिभैचार जोधा कहो तास भूपं ॥२११॥ सभै सिआम बरणं सिरं सेत एकं ॥ नहे गरधपं स्यंदनेकं अनेकं ॥ धुजा स्याम बरणं भुजं भीम रूपं ॥ सरं स्रोणितं एक अछेक कूपं ॥२१२॥ महा जोध दारिद्र नामा जुझारं ॥ धरे चरम बरमं सु पाणं कुठारं ॥ बडो चित्र जोधी करोधी करालं ॥ तजै नासका नैन धूम्रं बरालं ॥२१३॥ रूआल छंद ॥ स्वामिघात क्रितघनता दोऊ; बीर है दुर धरख ॥ सत्रु सूरन के संघारक; सैन के भरतरख ॥ कउन दो थन सो जना; जु न मानि है तिहं त्रास ॥ रूप अनूप बिलोकि कै; भट भजै होइ उदास ॥२१४॥ मित्र दोख अरु राज दोख; सु एक ही है भ्रात ॥ एक बंस दुहूंन को; अर एक ही तिह मात ॥ छत्रि धरम धरे हठी; रण धाइ है जिह ओर ॥ कउन धीर धर भटांबर; लेत है झकझोर ॥२१५॥ ईरखा अरु उचाट ए दोऊ; जंग जोधा सूर ॥ भाजि है अविलोक कै अरु; रीझि है लखि हूर ॥ कउन धीर धरै भटांबर? जीति है सब सत्रु ॥ दंत लै त्रिण भाजि है भट; को न गहि है अत्र ॥२१६॥ घात अउर बसीकरण; बड बीर धीर अपार ॥ क्रूर करम कुठार पाणि; कराल दाड़ बरिआर ॥ बिज तेज अछिज गाति; अभिज रूप दुरंत ॥ कउन कउन न जीतिए? जिनि; जीव जंत महंत ॥२१७॥ |
| आपदा अरु झूठता; अरु बीर बंस कुठार ॥
परम रूप दुर धरख गात; अमरख तेज अपार ॥ अंग अंगनि नंग बसत्र; न अंग बलकुल पात ॥ दुसट रूप दरिद्र धाम; सु बाण साधे सात ॥२१८॥ बियोग अउर अपराध नाम सु; धार है जब कोप ॥ कउन ठांढ सकै महा बलि? भाजि है बिनु ओप ॥ सूल सैथन पानि बान; स्मभारि है तव सूर ॥ भाजि है तजि लाज को; बिस्मभार ह्वै सब कूर ॥२१९॥ भानु की सर भेद जा दिन; तपि है रण सूर ॥ कउन धीर धरै महा भट? भाजि है सभ कूर ॥ ससत्र असत्रन छाडि कै; अरु बाज राज बिसारि ॥ काटि काटि सनाह तव भट; भाजि है बिस्मभार ॥२२०॥ धूम्र बरण अउ धूम्र नैन सु; सात धूम्र जुआल ॥ छीन बसत्र धरे सबै तन; क्रूर बरण कराल ॥ नाम आलस तवन को; सुनि राज राज वतार! ॥ कउन सूर संघारि है तिह? ससत्र असत्र प्रहार ॥२२१॥ तोटक छंद ॥ चड़ि है गहि कोप क्रिपाण रणं ॥ घमकंत कि घुंघर घोर घणं ॥ तिह नाम सु खेद अभेद भटं ॥ तिह बीर सुधीर लखो निपटं ॥२२२॥ कल रूप कराल ज्वाल जलं ॥ असि उजल पानि प्रभा न्रिमलं ॥ अति उजल दंद अनंद मनं ॥ कुक्रिआ तिह नाम सु जोध गनं ॥२२३॥ अति सिआम सरूप करूप तनं ॥ उपजं अग्यान बिलोकि मनं ॥ तिह नाम गिलानि प्रधान भटं ॥ रण मो न महा हठि हारि हटं ॥२२४॥ अति अंग सुरंग सनाह सुभं ॥ बहु कसट सरूप सु कसट छुभं ॥ अति बीर अधीर न भयो कब ही ॥ दिव देव पछानत है सब ही ॥२२५॥ भट करम बिकरम जबै धरि है ॥ रण रंग तुरंगहि बिचरि है ॥ तब बीर सु धीरहि को धरि है ॥ बल बिक्रम तेज तबै हरि है ॥२२६॥ दोहरा ॥ इह बिधि तन सूरा सु धरि; धै है न्रिप अबिबेक ॥ न्रिप बिबेक की दिसि सुभट; ठांढ न रहि है एक ॥२२७॥ इति स्री बचित नाटक ग्रंथे पारस मछिंद्र स्मबादे न्रिप अबिबेक आगमन नाम सुभट बरननं नाम धिआइ समापतम सत सुभम सत ॥ |
| ਅਥ ਨ੍ਰਿਪ ਬਿਬੇਕ ਦੇ ਦਲ ਕਥਨੰ ॥
अथ न्रिप बिबेक दे दल कथनं ॥ छपय छंद ॥ जिह प्रकार अबिबेक न्रिपति; दल सहित बखाने ॥ नाम ठाम आभरन सु रथ; सभ के हम जाने ॥ ससत्र असत्र अरु धनुख धुजा; जिह बरण उचारी ॥ त्वप्रसादि मुनि देव! सकल; सु बिबेक बिचारी ॥ करि क्रिपा सकल जिह बिधि कहे; तिह बिधि वहै बखानीऐ ॥ किह छबि प्रभाव? किह दुति न्रिपति? न्रिप बिबेक अनुमानीऐ ॥२२८॥ अधिक न्यास मुनि कीन; मंत्र बहु भांति उचारे ॥ तंत्र भली बिधि सधे; जंत्र बहु बिधि लिखि डारे ॥ अति पवित्र हुऐ आप; बहुरि उचार करो तिह ॥ न्रिप बिबेक अबिबेक सहित; सैन कथ्यो जिह ॥ सुर असुर चक्रित चहु दिस भए; अनल पवन ससि सूर सब ॥ किह बिधि प्रकास करि है संघार; जके जछ गंधरब सब ॥२२९॥ सेत छत्र सिर धरै; सेत बाजी रथ राजत ॥ सेत ससत्र तन सजे; निरखि सुर नर भ्रमि भाजत ॥ चंद चक्रित ह्वै रहत; भानु भवता लखि भुलत ॥ भ्रमर प्रभा लखि भ्रमत; असुर सुर नर डग डुलत ॥ इह छबि बिबेक राजा न्रिपति! अति बलिसट तिह मानीऐ ॥ मुनि गन महीप बंदत सकल; तीनि लोकि महि जानीऐ ॥२३०॥ चमर चारु चहूं ओर ढुरत; सुंदर छबि पावत ॥ निरखि हंस तिह ढुरनि; मान सरवरहि लजावत ॥ अति पवित्र सब गात; प्रभा अति ही जिह सोहत ॥ सुर नर नाग सुरेस; जछ किंनर मन मोहत ॥ इह छबि बिबेक राजा न्रिपति; जिदिन कमान चड़ाइ है ॥ बिनु अबिबेक सुनि हो न्रिपति! सु अउर न बान चलाइ है ॥२३१॥ अति प्रचंड अबिकार तेज; आखंड अतुल बल ॥ अति प्रताप अति सूर; तूर बाजत जिह जल थल ॥ पवन बेग रथ चलत पेखि; चपला चित लाजत ॥ सुनत सबद चक चार मेघ; मोहत भ्रम भाजत ॥ जल थल अजेअ अनभै भट; अति उतम परवानीऐ ॥ धीरजु सु नाम जोधा बिकट; अति सुबाहु जग मानीऐ ॥२३२॥ |
| धरम धीर बीर जसमीर; अनभीर बिकट मति ॥
कलप ब्रिछ कुब्रितन क्रिपान; जस तिलक सुभट अति ॥ अति प्रतापु अति ओज अनल; सर तेज जरे रण ॥ ब्रहम असत्र सिव असत्र; नहिन मानत एकै ब्रण ॥ इह दुति प्रकास ब्रित छत्र न्रिप; ससत्र असत्र जब छंडि है ॥ बिनु एक अब्रित सुब्रित न्रिपति! अवर न आहव मंडि है ॥२३३॥ अछिज गात अनभंग तेज; आखंड अनिल बल ॥ पवन बेग रथ को प्रतापु; जानत जीअ जल थल ॥ धनुख बान परबीन; छीन सब अंग ब्रितन करि ॥ अति सुबाह संजम सुबीर; जानत नारी नर ॥ गहि धनुख बान पानहि धरम; परम रूप धरि गरजि है ॥ बिनु इक अब्रित सुब्रित न्रिपति; अउर न आनि बरजि है ॥२३४॥ चक्रित चारु चंचल प्रकास; बाजी रथ सोहत ॥ अति प्रबीन धुनि छीन बीन; बाजत मन मोहत ॥ प्रेम रूप सुभ धरे नेम; नामा भट भै कर ॥ परम रूप परमं प्रताप; जुध जै अरि छै कर ॥ अस अमिट बीर धीरा बडो; अति बलिसट दुर धरख रणि ॥ अनभै अभंज अनमिट सुधीस; अनबिकार अनजै सु भण ॥२३५॥ अति प्रताप अमितोज; अमिट अनभै अभंग भट ॥ रथ प्रमाण चपला सु चारु; चमकत है अनकट ॥ निरखि सत्रु तिह तेज; चक्रित भयभीत भजत रणि ॥ धरत धीर नहि बीर; तीर सर है नही हठि रणि ॥ बिग्यान नामु अनभै सुभट; अति बलिसट तिह जानीऐ ॥ अगिआन देसि जा को सदा; त्रास घरन घरि मानीऐ ॥२३६॥ बमत ज्वाल डमरू कराल; डिम डिम रणि बजत ॥ घन प्रमान चक सबद घहरि; जा को गल गजत ॥ सिमटि सांग संग्रहत; सरकि सामुह अरि झारत ॥ निरखि तासु सुर असुर ब्रहम; जै सबद उचारत ॥ इसनान नाम अभिमान जुत; जिदिन धनुख गहि गरजि है ॥ बिनु इक कुचील सामुहि समर; अउर न तासु बरजि है ॥२३७॥ |
| इकि निब्रित अति बीर; दुतीअ भावना महा भट ॥
अति बलिसट अनमिट; अपार अनछिज अनाकट ॥ ससत्र धारि गज है जब; भीर भाजि है निरखि रणि ॥ पत्र भेस भहरात; धीर धर है न अनगण ॥ इह बिधि सु धीर जोधा न्रिपति! जिदिन अयोधन रचि है ॥ तज ससत्र असत्र भजि है सकल; एक न बीर बिरच है ॥२३८॥ संगीत छपय छंद ॥ तागड़दी तुर बाज है; जागड़दी जोधा जब जुटहि ॥ लागड़दी लुथ बिथुरहि; सागड़दी संनाह सु तुटहि ॥ भागड़दी भूत भैरो प्रसिध; अरु सिध निहारहि ॥ जागड़दी जछ जुगणी जूथ; जै सबद उचारहि ॥ संसागड़दी सुभट संजम अमिट; कागड़दी क्रुध जब गरजि है ॥ दंदागड़दी इक दुरमति बिना; आगड़दी सु अउर न बरजि है ॥२३९॥ जागड़दी जोग जयवान; कागड़दी करि क्रोध कड़कहि ॥ लागड़दी लुट अरु कुट; तागड़दी तरवार सड़कहि ॥ सागड़दी ससत्र संनाह; पागड़दी पहिर है जवन दिन ॥ सागड़दी सत्रु भजि है; टागड़दी टिकि है न इक छिन ॥ प्मपागड़दी पीअर सित बरण मुख; सागड़दी समसत सिधार है ॥ अंआगड़दी अमिट दुर धरख भट; जागड़दी कि जिदिन निहार है ॥२४०॥ आगड़दी इक अरचारु; पागड़दी पूजा जब कुपहि ॥ रागड़दी रोस करि जोस; पागड़दी पाइन जब रुपहि ॥ सागड़दी सत्रु तजि अत्र; भागड़दी भजहि सु भ्रमि रणि ॥ आगड़दी ऐस उझड़हि; पागड़दी जणु पवन पत्र बण ॥ संसागड़दी सुभट सब भजि है; तागड़दी तुरंग नचाइ है ॥ छंछागड़दी छत्र ब्रिति छडि कै; आगड़दी अधोगति जाइ है ॥२४१॥ छपय छंद ॥ चमर चारु चहूं ओरि; ढुरत सुंदर छबि पावत ॥ सेत बसत्र अरु बाज सेत; ससत्रण छबि छावत ॥ अति पवित्र अबिकार अचल; अनखंड अकट भट ॥ अमित ओज अनमिट; अनंत अछलि रणाकट ॥ धर असत्र ससत्र सामुह समर; जिदिन न्रिपोतम गरजि है ॥ टिकि है इक भट नहि समरि; अउर कवण तब बरजि है? ॥२४२॥ |
| इकि बिदिआ अरु लाज अमिट; अति ही प्रताप रणि ॥
भीम रूप भैरो प्रचंड; अमिट अदाहण ॥ अति अखंड अडंड; चंड परताप रणाचल ॥ ब्रिखभ कंध आजान बाह; बानैत महाबलि ॥ इह छबि अपार जोधा जुगल; जिदिन निसान बजाइ है ॥ भजि है भूप! तजि लाज सभ; एक न सामुहि आइ है ॥२४३॥ नराज छंद ॥ संजोग नाम सूरमा; अखंड एक जानीऐ ॥ सु धामि धामि जास को; प्रताप आज मानीऐ ॥ अडंड औ अछेद है; अभंग तासु भाखीऐ ॥ बिचार आज तउन सो; जुझार कउन राखीऐ? ॥२४४॥ अखंड मंडलीक सो; प्रचंड बीर देखीऐ ॥ सुक्रित नाम सूरमा; अजित तासु लेखीऐ ॥ गरजि ससत्र सजि कै; सलजि रथ धाइ है ॥ अमंड मारतंड ज्यों; प्रचंड सोभ पाइ है ॥२४५॥ बिसेख बाण सैहथी; क्रिपान पाणि सजि है ॥ अमोह नाम सूरमा; सरोह आनि गज है ॥ अलोभ नाम सूरमा; दुतीअ जो गरजि है ॥ रथी गजी हई पती; अपार सैण भजि है ॥२४६॥ हठी जपी तपी सती; अखंड बीर देखीऐ ॥ प्रचंड मारतंड ज्यों; अडंड तासु लेखीऐ ॥ अजिति जउन जगत ते; पवित्र अंग जानीऐ ॥ अकाम नाम सूरमा; भिराम तासु मानीऐ ॥२४७॥ अक्रोध जोध क्रोध कै; बिरोध सजि है जबै ॥ बिसारि लाज सूरमा; अपार भाजि है सभै ॥ अखंड देहि जास की; प्रचंड रूप जानीऐ ॥ सु लज नाम सूरमा; सु मंत्रि तासु मानीऐ ॥२४८॥ सु परम तत आदि दै; निराहंकार गरजि है ॥ बिसेख तोर सैन ते; असेख बीर बरजि है ॥ सरोख सैहथीन लै; अमोघ जोध जुटि है ॥ असेख बीर कारमादि; क्रूर कउच तुट है ॥२४९॥ नराज छंद ॥ सभगति एक भावना; सु क्रोध सूर धाइ है ॥ असेख मारतंड ज्यों; बिसेख सोभ पाइ है ॥ संघारि सैण सत्रुवी; जुझार जोध जुटि है ॥ करूर कूर सूरमा; तरक तंग तुटि है ॥२५०॥ |
| सिमटि सूर सैहथी; सरकि सांग सेल है ॥
दुरंत घाइ झालि कै; अनंत सैण पेलि है ॥ तमकि तेग दामिणी; सड़कि सूर मटि है ॥ निपटि कटि कुटि कै; अकट अंग सटि है ॥२५१॥ निपटि सिंघ ज्यों पलटि; सूर सेल बाहि है ॥ बिसेख बूथनीस की; असेख सैण गाहि है ॥ अरुझि बीर अप मझि; गझि आनि जुझि है ॥ बिसेख देव दईत जछ; किंनर क्रित बुझि है ॥२५२॥ सरकि सेल सूरमा; मटिक बाज सुटि है ॥ अमंड मंडलीक से; अफुट सूर फुटि है ॥ सु प्रेम नाम सूर को; बिसेख भूप! जानीऐ ॥ सु साख तास की सदा; तिहूंन लोक मानीऐ ॥२५३॥ अनूप रूप भान सो; अभूत रूप मानीऐ ॥ संजोग नाम सत्रुहा; सु बीर तासु जानीऐ ॥ सु सांति नाम सूरमा; सु अउर एक बोलीऐ ॥ प्रताप जास को सदा; सु सरब लोग तोलीऐ ॥२५४॥ अखंड मंडलीक सो; प्रचंड रूप देखीऐ ॥ सु कोप सुध सिंघ की; समान सूर पेखीऐ ॥ सु पाठ नाम तास को; अठाट तासु भाखीऐ ॥ भज्यो न जुध ते कहूं; निसेस सूर साखीऐ ॥२५५॥ सुकरम नाम एक को; सुसिछ दूज जानीऐ ॥ अभिज मंडलीक सो; अछिज तेज मानीऐ ॥ सु कोप सूर सिंघ ज्यों; घटा समान जुटि है ॥ दुरंत बाज बाजि है; अनंत ससत्र छुटि है ॥२५६॥ सु जगि नाम एक को; प्रबोध अउर मानीऐ ॥ सु दान तीसरा हठी; अखंड तासु जानीऐ ॥ सु नेम नाम अउर है; अखंड तासु भाखीऐ ॥ जगत जासु जीतिआ; जहान भानु साखीऐ ॥२५७॥ सु सतु नाम एक को; संतोख अउर बोलीऐ ॥ सु तपु नाम तीसरो; दसंत्र जासु छोलीऐ ॥ सु जापु नाम एक को; प्रताप आज तास को ॥ अनेक जुध जीति कै; बरियो जिनै निरास को ॥२५८॥ छपै छंद ॥ अति प्रचंड बलवंड; नेम नामा इक अति भट ॥ प्रेम नाम दूसरो; सूर बीरारि रणोतकट ॥ संजम एक बलिसटि; धीर नामा चतुरथ गनि ॥ प्राणयाम पंचवो; धिआन नामा खसटम भनि ॥ जोधा अपार अनखंड सति; अति प्रताप तिह मानीऐ ॥ सुर असुर नाग गंध्रब; धरम नाम जवन को जानीऐ ॥२५९॥ |
| सुभाचार जिह नाम; सबल दूसर अनुमानो ॥
बिक्रम तीसरो सुभट; बुधि चतुरथ जीअ जानो ॥ पंचम अनुरकतता; छठम सामाध अभै भट ॥ उदम अरु उपकार; अमिट अनजीत अनाकट ॥ जिह निरखि सत्रु तजि आसननि; बिमन चित भाजत तवन ॥ बलि टारि हारि आहव हठी; अठट ठाट भुलत गवन ॥२६०॥ तोमर छंद ॥ सु बिचार है भट एक ॥ गुन बीच जासु अनेक ॥ संजोग है इक अउर ॥ जिनि जीतिआ पति गउर ॥२६१॥ इक होम नाम सु बीर ॥ अरि कीन जासु अधीर ॥ पूजा सु अउर बखान ॥ जिह सो न पउरखु आनि ॥२६२॥ अनुरकतता इक अउर ॥ सभ सुभट को सिर मउर ॥ बेरकतता इक आन ॥ जिह सो न आन प्रधान ॥२६३॥ सतसंग अउर सुबाह ॥ जिह देख जुध उछाह ॥ भट नेह नाम अपार ॥ बल जउन को बिकरार ॥२६४॥ इक प्रीति अरु हरि भगति ॥ जिह जोति जगमग जगति ॥ भट दत मत महान ॥ सब ठउर मै परधान ॥२६५॥ इक अक्रुध अउर प्रबोध ॥ रण देखि कै जिह क्रोध ॥ इह भांति सैन बनाइ ॥ दुहु दिसि निसान बजाइ ॥२६६॥ दोहरा ॥ इह बिधि सैन बनाइ कै; चड़े निसान बजाइ ॥ जिह जिह बिधि आहव मच्यो; सो सो कहत सुनाइ ॥२६७॥ स्री भगवती छंद ॥ कि स्मबाह उठे ॥ कि सावंत जुटे ॥ कि नीसाण हुके ॥ कि बाजंत्र धुके ॥२६८॥ कि ब्मबाल नेजे ॥ कि जंज्वाल तेजे ॥ कि सावंत ढूके ॥ कि हा हाइ कूके ॥२६९॥ कि सिंधूर गजे ॥ कि तंदूर बजे ॥ कि स्मबाह जुटे ॥ कि संनाह फुटे ॥२७०॥ कि डाकंत डउरू ॥ कि भ्रामंत भउरू ॥ कि आहाड़ि डिगे ॥ कि राकत्र भिगे ॥२७१॥ कि चामुंड चरमं ॥ कि सावंत धरमं ॥ कि आवंत जुधं ॥ कि सानध बधं ॥२७२॥ कि सावंत सजे ॥ कि नीसाण बजे ॥ कि जंज्वाल क्रोधं ॥ कि बिसारि बोधं ॥२७३॥ कि आहाड़ मानी ॥ कि ज्यों मछ पानी ॥ कि ससत्रासत्र बाहै ॥ कि ज्यों जीत चाहै ॥२७४॥ कि सावंत सोहे ॥ कि सारंग रोहे ॥ कि ससत्रासत्र बाहे ॥ भले सैण गाहे ॥२७५॥ कि भैरउ भभकै ॥ कि काली कुहकै ॥ कि जोगन जुटी ॥ कि लै पत्र टुटी ॥२७६॥ |
| कि देवी दमके ॥
कि काली कुहके ॥ कि भैरो भकारै ॥ कि डउरू डकारै ॥२७७॥ कि बहु ससत्र बरखे ॥ कि परमासत्र करखे ॥ कि दईतासत्र छुटे ॥ देवासत्र मुके ॥२७८॥ कि सैलासत्र साजे ॥ कि पउनासत्र बाजे ॥ कि मेघासत्र बरखे ॥ कि अगनासत्र करखे ॥२७९॥ कि हंसासत्र छुटे ॥ कि काकसत्र तुटे ॥ कि मेघासत्र बरखे ॥ कि सूक्रासत्रु करखे ॥२८०॥ कि सावंत्र सजे ॥ कि ब्योमासत्र गजे ॥ कि जछासत्र छुटे ॥ कि किंन्रासत्र मुके ॥२८१॥ कि गंध्राबसात्र बाहै ॥ कि नर असत्र गाहै ॥ कि चंचाल नैणं ॥ कि मैमत बैणं ॥२८२॥ कि आहाड़ि डिगै ॥ कि आरकत भिगै ॥ कि ससत्रासत्र बजे ॥ कि सावंत गजे ॥२८३॥ कि आवरत हूरं ॥ कि सावरत पूरं ॥ फिरी ऐण गैणं ॥ कि आरकत नैणं ॥२८४॥ कि पावंग पुले ॥ कि सरबासत्र खुले ॥ कि हंकारि बाहै ॥ अधं अधि लाहै ॥२८५॥ छुटी ईस तारी ॥ कि संन्यास धारी ॥ कि गंधरब गजे ॥ कि बाद्रित बजे ॥२८६॥ कि पापासत्र बरखे ॥ कि धरमासत्र करखे ॥ अरोगासत्र छुटे ॥ सु भोगासत्र सुटे ॥२८७॥ बिबादासत्र सजे ॥ बिरोधासत्र बजे ॥ कुमंत्रासत्र छुटे ॥ समुंत्रासत्र टुटे ॥२८८॥ कि कामासत्र छुटे ॥ करोधासत्र तुटे ॥ बिरोधासत्र बरखे ॥ बिमोहासत्र करखे ॥२८९॥ चरित्रासत्र छुटे ॥ कि मोहासत्र जुटे ॥ कि त्रासासत्र बरखे ॥ कि क्रोधासत्र करखे ॥२९०॥ चौपई छंद ॥ इह बिधि ससत्र असत्र बहु छोरे ॥ न्रिप बिबेक के भट झकझोरे ॥ आपन चला निसरि तब राजा ॥ भांति भांति के बाजन बाजा ॥२९१॥ दुहु दिसि पड़ा निसानै घाता ॥ महा सबद धुनि उठी अघाता ॥ बरखा बाण गगन गयो छाई ॥ भूति पिसाच रहे उरझाई ॥२९२॥ झिमि झिमि सारु गगन ते बरखा ॥ भल भल सुभट पखरीआ परखा ॥ सिमटे सुभट अनंत अपारा ॥ परि गई अंध धुंध बिकरारा ॥२९३॥ न्रिप बिबेक तब रोसहि भरा ॥ सभ सैना कहि आइसु करा ॥ उमडे सूर सु फउज बनाई ॥ नाम तास कबि देत बताई ॥२९४॥ |
| सिरी पाखरी टोप सवारे ॥
चिलतह राग संजोवा डारे ॥ चले जुध के काज सु बीरा ॥ सूखत भयो नदन को नीरा ॥२९५॥ दोहरा ॥ दुहू दिसन मारू बज्यो; पर्यो निसाणे घाउ ॥ उमडि दुबहीआ उठि चले; भयो भिरन को चाउ ॥२९६॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ रणं सुधि सावंत, भावंत गाजे ॥ तहा तूर भेरी, महा संख बाजे ॥ भयो उच कोलाहलं, बीर खेतं ॥ बहे ससत्र असत्रं, नचे भूत प्रेतं ॥२९७॥ फरी धोप पाइक, सु खंडे बिसेखं ॥ तुरे तुंद ताजी, भए भूत भेखं ॥ रणं राग बजे, ति गजे भटाणं ॥ तुरी तत नचे, पलटे भटाणं ॥२९८॥ हिणंकेत हैवार, गैवार गाजी ॥ मटके महाबीर, सुटे सिराजी ॥ कड़ाकुट ससत्रासत्र, बजे अपारं ॥ नचे सुध सिधं, उठी ससत्र झारं ॥२९९॥ किलंकीत काली, कमछ्या करालं ॥ बक्यो बीर बैतालं, बामंत ज्वालं ॥ चवी चांवडी चाव, चउसठि बालं ॥ करै स्रोणहारं, बमै जोग ज्वालं ॥३००॥ छुरी छिप्र छंडैति, मंडै रणारं ॥ तमकैत ताजी, भभकै भटाणं ॥ सुभे संदली, बोज बाजी अपारं ॥ बहे बोर पिंगी, समुंदे कंधारं ॥३०१॥ तुरे तुंद ताजी, उठे कछ अछं ॥ कछे आरबी, पब मानो सपछं ॥ उठी धूरि पूरं, छुही ऐण गैणं ॥ भयो अंध धुंधं, परी जानु रैणं ॥३०२॥ इतै दत धायो, अनादत उतं ॥ रही धूरि पूरं, परी कटि लुथं ॥ अनावरत बीरं, महाबरत धारी ॥ चड़्यो चउपि कै, तुंद नचे ततारी ॥३०३॥ खुरं खेह उठी, छयो रथ भानं ॥ दिसा बेदिसा, भू न दिख्या समानं ॥ छुटे ससत्र असत्र, परी भीर भारी ॥ छुटे तीर करवार, काती कटारी ॥३०४॥ गहे बाण दतं, अनादत मार्यो ॥ भजी सरब सैणं, न नैणं निहार्यो ॥ जिन्यो बीर एकै, अनेकं परानो ॥ पुराने पलासी, हने पौन मानो ॥३०५॥ रणं रोस कै, लोभ बाजी मटक्यो ॥ भज्यो बीर बाच्यो, अर्यो सु झटक्यो ॥ फिर्यो देख बीरं, अनालोभ धायो ॥ छुटे बाण ऐसे, सबै ब्योम छायो ॥३०६॥ दसं बाण लै बीर धीरं प्रहारे ॥ सरं सठि लै संजमै ताकि मारे ॥ नवं बाण सो नेम को अंग छेद्यो ॥ बली बीसि बाणानि बिग्यान बेध्यो ॥३०७॥ |
| पचिस बाण पावित्रता को प्रहारे ॥
असीह बाण अरचाहि कै अंगि झारे ॥ पचासी सरं पूरि पूजाहि छेद्यो ॥ बडो लसटका लै सलजाहि भेद्यो ॥३०८॥ बिआसी बली बाण बिद्याहि मारे ॥ तपस्याहि पै ताकि तेतीस डारे ॥ कई बाण सों कीरतनं अंग छेद्यो ॥ अलोभादि जोधा भली भांति भेद्यो ॥३०९॥ न्रिहंकार को बान असीन छेद्यो ॥ भले परम तत्वादि को बछ भेद्यो ॥ कई बाण करुणाहि के अंगि झारे ॥ सरं सउक सिछिआ के अंगि मारे ॥३१०॥ दोहरा ॥ दान आनि पुजियो तबै; ग्यान बान लै हाथि ॥ जुआन जानि मार्यो तिसै; ध्यान मंत्र के साथ ॥३११॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ रणं उछल्यो, दान जोधा महानं ॥ सभै ससत्र बेता, अति असत्रं निधानं ॥ दसं बाण सो, लोभ को बछि मार्यो ॥ सरं सपत सो, क्रोध को देहु तार्यो ॥३१२॥ नवं बाण बेध्यो, अनंन्यास बीरं ॥ त्रियो तीर भेद्यो, अनाबरत धीरं ॥ भयो भेदि क्रोधं, सतंसंगि मारे ॥ भई धीर धरमं, ब्रहम गिआन तारे ॥३१३॥ कई बाण कुलहत्रता को चलाए ॥ कई बाण लै, बैर के बीर घाए ॥ किते घाइ आलस कै अंगि लागे ॥ सबै नरक ते आदि लै बीर भागे ॥३१४॥ इकै बाण निसील को अंग छेद्यो ॥ दुती कुसतता को भलै सूत भेद्यो ॥ गुमानादि के, चार बाजी संघारे ॥ अनरथादि के, बीर बांके निवारे ॥३१५॥ पिपासा छुधा, आलसादि पराने ॥ भज्यो लोभ क्रोधी, हठी देव जाने ॥ तप्यो नेम नामा, अनेमं प्रणासी ॥ धरे जोग असत्रं, अलोभी उदासी ॥३१६॥ हत्यो कापटं खापटं, सोक पालं ॥ हन्यो रोह मोहं, सकामं करालं ॥ महा क्रुध कै, क्रोध को बान मार्यो ॥ खिस्यो ब्रहम दोखादि, सरबं प्रहार्यो ॥३१७॥ रूआल छंद ॥ सु द्रोह अउ हंकार को; हजार बान सो हन्यो ॥ दरिद्र असंक मोह को; न चित मै कछ गन्यो ॥ असोच अउ कुमंत्रता; अनेक बान सो हत्यो ॥ कलंक कौ निसंक ह्वै; सहंस्र साइकं छत्यो ॥३१८॥ क्रितघनता बिस्वासघात; मित्रघात मार्यो ॥ सु राज दोख ब्रहम दोख; ब्रहम असत्र झार्यो ॥ उचाट मारणादि; बसिकरण को सरं हन्यो ॥ बिखाध को बिखाध कै; न ब्रिध ताहि को गन्यो ॥३१९॥ |
| भजे रथी हई गजी; सु पति त्रास धारि कै ॥
भजे रथी महारथी; सु लाज को बिसारि कै ॥ अस्मभ जुध जो भयो; सु कैस के बताईऐ? ॥ सहंस बाक जो रटै; न तत्र पार पाईऐ ॥३२०॥ कलंक बिभ्रमादि अउ; क्रितघन ताहि कौ हन्यो ॥ बिखाद बिपदादि को; कछू न चित मै गन्यो ॥ सु मित्रदोख राजदोख; ईरखाहि मारि कै ॥ उचाट अउ बिखाध को; दयो रणं निकारि कै ॥३२१॥ गिलानि कोप मान; अप्रमान बान सो हन्यो ॥ अनरथ को समरथ कै; हजार बान सो झन्यो ॥ कुचार को हजार बान; चार सो प्रहार्यो ॥ कुकसट अउ कुक्रिआ कौ; भजाइ त्रासु डार्यो ॥३२२॥ छपय छंद ॥ अतप बीर कउ ताकि; बान सतरि मारे तप ॥ नवे साइकनि सील; सहस सर हनै अजप जप ॥ बीस बाण कुमतहि; तीस कुकरमहि भेद्यो ॥ दस साइक दारिद्र; काम कई बाणनि छेद्यो ॥ बहु बिधि बिरोध को बध कीयो; अबिबेकहि सर संधि रणि ॥ रणि रोह क्रोह करवार गहि; इम संजम बुल्यो बयण ॥३२३॥ अरुण पछमहि उग्वै; बरुणु उतर दिस तकै ॥ मेरु पंख करि उडै; सरब साइर जल सुकै ॥ कोल दाड़ कड़मुड़ै; सिमटि फनीअर फण फटै ॥ उलटि जान्हवी बहै; सत हरीचंदे हटै ॥ संसार उलट पुलट ह्वै धसकि; धउल धरणी फटै ॥ सुनि न्रिप अबिबेक! सु बिबेक भटि; तदपि न लटि संजम हटै ॥३२४॥ तेरे जोरि मै गुंगा कहता हो ॥ तेरा सदका तेरी सरणि ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ कुप्यो संजमं परम जोधा जुझारं ॥ बडो गरबधारी बडो निरबिकारं ॥ अनंतासत्र लै कै अनरथै प्रहार्यो ॥ अनादत के अंग को छेद डार्यो ॥३२५॥ तेरे जोरि कहत हौ ॥ इसो जुधु बीत्यो, कहा लौ सुनाऊ? ॥ रटो सहंस जिहवा, न तउ अंत पाऊ ॥ दसं लछ जुग्यं, सु बरखं अनंतं ॥ भयो बीरखेतं, कथै कउण खंतं? ॥३२६॥ तेरे जोर संग कहता ॥ भई अंध धुंधं मच्यो बीर खेतं ॥ नची जुगणी चारु चउसठ प्रेतं ॥ नची कालका स्री कमख्या करालं ॥ डकं डाकणी जोध जागंत ज्वालं ॥३२७॥ तेरा जोरु ॥ मच्यो जोर जुधं, हट्यो नाहि कोऊ ॥ बडे छत्रधारी, पती छत्र दोऊ ॥ खप्यो सरब लोकं, अलोकं अपारं ॥ मिटे जुध ते, ए न जोधा जुझारं ॥३२८॥ |
| तेरा जोर ॥
दोहरा ॥ चटपट सुभट बिकट कटे; झटपट भई अभंग ॥ लटि भट हटे न रन घट्यो; अटपट मिट्यो न जंग ॥३२९॥ तेरे जोरि ॥ चौपई ॥ बीस लछ जुग ऐतु प्रमाना ॥ लरे दोऊ भई किस न हाना ॥ तब राजा जीअ मै अकुलायो ॥ नाक चढे मछिंद्र पै आयो ॥३३०॥ कहि मुनि बरि सभ मोहि बिचारा ॥ ए दोऊ बीर बडे बरिआरा ॥ इन का बिरुध निवरत न भया ॥ इनो छडावत सभ जगु गया ॥३३१॥ इनै जुझावत सब कोई जूझा ॥ इन का अंत न काहू सूझा ॥ ए है आदि हठी बरिआरा ॥ महारथी अउ महा भयारा ॥३३२॥ बचनु मछिंद्र सुनत चुप रहा ॥ धरा नाथ सबनन तन कहा ॥ चक्रित चित चटपट ह्वै दिखसा ॥ चरपट नाथ तदिन ते निकसा ॥३३३॥ इति चरपट नाथ प्रगटणो नामह ॥ चौपई ॥ सुनि राजा! तुहि कहै बिबेका ॥ इन कह द्वै जानहु जिनि एका ॥ ए अबिकार पुरख अवतारी ॥ बडे धनुरधर बडे जुझारी ॥३३४॥ आदि पुरख जब आप स्मभारा ॥ आप रूप मै आप निहारा ॥ ओअंकार कह इकदा कहा ॥ भूमि अकास सकल बनि रहा ॥३३५॥ दाहन दिस ते सति उपजावा ॥ बाम परस ते झूठ बनावा ॥ उपजत ही उठि जुझे जुझारा ॥ तब ते करत जगत मै रारा ॥३३६॥ सहंस बरख जो आयु बढावै ॥ रसना सहस सदा लौ पावै ॥ सहंस जुगन लौ करे बिचारा ॥ तदपि न पावत पार तुमारा ॥३३७॥ तेरे जोरि गुंगा कहता ॥ बिआस परासर अउ रिखि घने ॥ सिंगी रिखि बकदालभ भने ॥ सहंस मुखन का ब्रहमा देखा ॥ तऊ न तुमरा अंतु बिसेखा ॥३३८॥ तेरा जोरु ॥ दोहरा ॥ सिंधु सुभट सावंत सभ; मुनि गंधरब महंत ॥ कोटि कलप कलपांत भे; लह्यो न तेरो अंत ॥३३९॥ तेरे जोर सो कहो ॥ भुजंग प्रयात छंद ॥ सुनो राज सारदूल! उचरो प्रबोधं ॥ सुनो चित दै कै, न कीजै बिरोधं ॥ सु स्री आद पुरखं, अनादं सरूपं ॥ अजेअं अभेअं, अदगं अरूपं ॥३४०॥ अनामं अधामं, अनीलं अनादं ॥ अजैअं अभैअं, अवै निर बिखादं ॥ अनंतं महंतं, प्रिथीसं पुराणं ॥ सु भब्यं भविख्यं, अवैयं भवाणं ॥३४१॥ |
| जिते सरब जोगी, जटी जंत्र धारी ॥
जलास्री जवी, जामनी जगकारी ॥ जती जोग जुधी, जकी ज्वाल माली ॥ प्रमाथी परी, परबती छत्रपाली ॥३४२॥ तेरा जोरु ॥ सबै झूठु मानो, जिते जंत्र मंत्रं ॥ सबै फोकटं, धरम है भरम तंत्रं ॥ बिना एक आसं, निरासं सबै है ॥ बिना एक नाम, न कामं कबै है ॥३४३॥ करे मंत्र जंत्रं, जु पै सिध होई ॥ दरं द्वार भिछ्या, भ्रमै नाहि कोई ॥ धरे एक आसा, निरासोर मानै ॥ बिना एक करमं, सबै भरम जानै ॥३४४॥ सुन्यो जोगि बैनं, नरेसं निधानं ॥ भ्रमियो भीत चितं, कुप्यो जेम पानं ॥ तजी सरब आसं, निरासं चितानं ॥ पुनिर उचरे, बाच बंधी बिधानं ॥३४५॥ तेरा जोरु ॥ रसावल छंद ॥ सुनो मोन राजं! ॥ सदा सिध साजं ॥ कछ देह मतं ॥ कहो तोहि बतं ॥३४६॥ दोऊ जोर जुधं ॥ हठी परम क्रुधं ॥ सदा जाप करता ॥ सबै सिध हरता ॥३४७॥ अरीले अरारे ॥ हठील जुझारे ॥ कटीले करूरं ॥ करै सत्रु चूरं ॥३४८॥ तेरा जोरु ॥ चौपई ॥ जो इन जीति सकौ नहि भाई! ॥ तउ मै जोर चिताहि जराई ॥ मै इन कहि मुनि! जीति न साका ॥ अब मुर बल पौरख सब थाका ॥३४९॥ ऐस भांति मन बीच बिचारा ॥ प्रगट सभा सब सुनत उचारा ॥ मै बड भूप बडो बरिआरू ॥ मै जीत्यो इह सभ संसारू ॥३५०॥ जिनि मो को इह बात बताई ॥ तिनि मुहि जानु ठगउरी लाई ॥ ए द्वै बीर बडे बरिआरा ॥ इन जीते जीतो संसारा ॥३५१॥ अब मो ते एई जिनि जाई ॥ कहि मुनि मोहि कथा समझाई ॥ अब मै देखि बनावौ चिखा ॥ पैठौ बीच अगनि की सिखा ॥३५२॥ चिखा बनाइ सनानहि करा ॥ सभ तनि बसत्र तिलोना धरा ॥ बहु बिधि लोग हटकि करि रहा ॥ चटपट करि चरनन भी गहा ॥३५३॥ हीर चीर दै बिधवत दाना ॥ मधि कटास करा असथाना ॥ भांति अनक तन ज्वाल जराई ॥ जरत न भई ज्वाल सीअराई ॥३५४॥ |
| तोमर छंद ॥
करि कोप पारस राइ ॥ करि आपि अगनि जराइ ॥ सो भई सीतल ज्वाल ॥ अति काल रूप कराल ॥३५५॥ तत जोग अगनि निकारि ॥ अति ज्वलत रूप अपारि ॥ तब कीअस आपन दाह ॥ पुरि लखत साहन साहि ॥३५६॥ तब जरी अगनि बिसेख ॥ त्रिण कासट घिरत असेख ॥ तब जर्यो ता महि राइ ॥ भए भसम अदभुत काइ ॥३५७॥ कई द्योस बरख प्रमान ॥ सल जरा जोर महान ॥ भई भूत भसमी देह ॥ धन धाम छाड्यो नेह ॥३५८॥ |