सामग्री पर जाएँ

दसम ग्रन्थ/रूद्र अवतार

विकिपुस्तक से
ਰੁਦ੍ਰ ਅਵਤਾਰ ॥ रुद्र अवतार ॥

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

स्री भगउती जी सहाइ ॥

अथ रुद्र अवतार कथनं ॥

तोमर छंद ॥

अब कहो तउन सुधारि ॥

जे धरे रुद्र अवतार ॥

अति जोग साधन कीन ॥

तब गरब के रसि भीन ॥१॥

सरि आप जान न अउर ॥

सब देस मो सब ठौर ॥

तब कोपि कै इम काल ॥

इम भाखि बैण उताल ॥२॥

जे गरब लोक करंत ॥

ते जान कूप परंत ॥

मुर नाम गरब प्रहार ॥

सुन लेहु रुद्र बिचार ॥३॥

कीअ गरब को मुख चार ॥

कछु चित मो अबिचारि ॥

जब धरे तिन तन सात ॥

तब बनी ता की बात ॥४॥

तिम जनमु धरु तै जाइ ॥

चित दे सुनो मुनि राइ ॥

नही ऐस होइ उधार ॥

सुन लेहु रुद्र बिचार ॥५॥

सुनि स्रवन ए सिव बैन ॥

हठ छाडि सुंदर नैन ॥

तिह जानि गरब प्रहार ॥

छिति लीन आनि वतार ॥६॥

पाधरी छंद ॥

जिम कथे सरब राजान राज ॥

तिम कहे रिखिन सब ही समाज ॥

जिह जिह प्रकार तिह करम कीन ॥

जिह भांति जेमि दिज बरन लीन ॥७॥

जे जे चरित्र किने प्रकास ॥

ते ते चरित्र भाखो सु बास ॥

रिखि पुत्र एस भए रुद्र देव ॥

मोनी महान मानी अभेव ॥८॥

पुनि भए अत्रि रिखि मुनि महान ॥

दस चार चार बिदिआ निधान ॥

लिने सु जोग तजि राज आनि ॥

सेविआ रुद्र स्मपति निधान ॥९॥

किनो सु योग बहु दिन प्रमान ॥

रीझिओ रुद्र ता पर निदान ॥

बरु मांग पुत्र! जो रुचै तोहि ॥

बरु दानु तउन मै देउ तोहि ॥१०॥

करि जोरि अत्रि तब भयो ठांढ ॥

उठि भाग आन अनुराग बाढ ॥

गद गद सु बैण भभकंत नैण ॥

रोमान हरख उचरे सु बैण ॥११॥

जो देत रुद्र! बरु रीझ मोहि ॥

ग्रिह होइ पुत्र सम तुलि तोहि ॥

कहि कै तथासतु भए अंत्र धिआन ॥

ग्रिह गयो अत्रि मुनि मनि महान ॥१२॥

ग्रिहि बरी आनि अनसूआ नारि ॥

जनु पठिओ ततु निज सिव निकारि ॥

ब्रहमा रु बिसन निज तेज काढि ॥

आए सु मधि अनिसूआ छाडि ॥१३॥

भई करत जोग बहु दिन प्रमान ॥

अनसूआ नाम गुन गन महान ॥

अति तेजवंत सोभा सुरंग ॥

जनु धरा रूप दूसर अनंग ॥१४॥

सोभा अपार सुंदर अनंत ॥

सऊहाग भाग बहु बिधि लसंत ॥

जिह निरखि रूप सोरहि लुभाइ ॥

आभा अपार बरनी न जाइ ॥१५॥

निस नाथ देखि आनन रिसान ॥

जलि जाइ नैन लहि रोस मान ॥

तम निरखि केस कीअ नीच डीठ ॥

छपि रहा जानु गिर हेम पीठ ॥१६॥

कंठहि कपोति लखि कोप कीन ॥

नासा निहारि बनि कीर लीन ॥

रोमावलि हेरि जमुना रिसान ॥

लजा मरंत सागर डुबान ॥१७॥

बाहू बिलोकि लाजै म्रिनाल ॥

खिसियान हंस अविलोकि चाल ॥

जंघा बिलोकि कदली लजान ॥

निस राट आप घटि रूप मान ॥१८॥

इह भांति तासु बरणो सिंगार ॥

को सकै कबि महिमा उचार? ॥

ऐसी सरूप अविलोक अत्रि ॥

जनु लीन रूप को छीन छत्र ॥१९॥

कीनी प्रतगि तिह समे नारि ॥

ब्याहै न भोग भोगै भतार ॥

मै बरौ तासु रुचि मानि चित ॥

जो सहै कसट ऐसे पवित ॥२०॥

रिखि मानि बैन तब बर्यो वाहि ॥

जनु लीन लूट सीगार ताहि ॥

लै गयो धामि करि नारि तउन ॥

पित दत देव मुनि अत्रि जउन ॥२१॥

ਅਥ ਰੁਦ੍ਰ ਵਤਾਰ ਦਤ ਕਥਨੰ ॥

अथ रुद्र वतार दत कथनं ॥ तोमर छंद ॥

बहु बरख बीत किनो बिवाहि ॥

इक भयो आनि अउरै उछाहि ॥

तिह गए धामि ब्रहमादि आदि ॥

किनी सु सेव त्रीय बहु प्रसादि ॥२२॥

बहु धूप दीप अरु अरघ दान ॥

पादरघि आदि किने सुजान ॥

अविलोकि भगति तिह चतुर बाक ॥

इंद्रादि बिसनु बैठे पिनाक ॥२३॥

अविलोकि भगति भए रिख प्रसंन ॥

जो तिहू मधि लोकानि धनि ॥

किनो सु ऐस ब्रहमा उचार ॥

तै पुत्रवंत हूजो कुमारि! ॥२४॥

तोमर छंद ॥

कीअ ऐस ब्रहमा उचार ॥

तै पुत्र पावस बार! ॥

तबि नारि ए सुन बैन ॥

बहु आसु डारत नैन ॥२५॥

तब बाल बिकल सरीर ॥

जल स्रवत नैन अधीर ॥

रोमांचि गद गद बैन ॥

दिन ते भई जनु रैन ॥२६॥

रोमांचि बिकल सरीर ॥

तन कोप मान अधीर ॥

फरकंत उसटरु नैन ॥

बिनु बुध बोलत बैन ॥२७॥

मोहण छंद ॥

सुनि ऐस बैन ॥

म्रिगीएस नैन ॥

अति रूप धाम ॥

सुंदर सु बाम ॥२८॥

चल चाल चित ॥

परमं पवित ॥

अति कोप वंत ॥

मुनि त्रिअ बिअंत ॥२९॥

उपटंत केस ॥

मुनि त्रिअ सुदेस ॥

अति कोप अंगि ॥

सुंदर सुरंग ॥३०॥

तोरंत हार ॥

उपटंत बार ॥

डारंत धूरि ॥

रोखंत पूर ॥३१॥

तोमर छंद ॥

लखि कोप भी मुनि नारि ॥

उठि भाज ब्रहम उदार ॥

सिव संगि लै रिख सरब ॥

भयमान ह्वै तजि गरब ॥३२॥

तब कोप कै मुनि नारि ॥

सिर केस जटा उपारि ॥

करि सौ जबै कर मार ॥

तब लीन दत अवतार ॥३३॥

कर बाम मात्र समान ॥

करु दछनत्रि प्रमान ॥

कीआ पान भोग बिचार ॥

तब भए दत कुमार ॥३४॥

अनभूत उतम गात ॥

उचरंत सिम्रित सात ॥

मुखि बेद चार रड़ंत ॥

उपजो सु दत महंत ॥३५॥

सिव सिमरि पूरबल स्राप ॥

बपु दत को धरि आप ॥

उपजिओ निसूआ धामि ॥

अवतार प्रिथम सु ताम ॥३६॥

पाधरी छंद ॥

उपजिओ सु दत मोनी महान ॥

दस चार चार बिदिआ निधान ॥

सासत्रगि सुध सुंदर सरूप ॥

अवधूत रूप गण सरब भूप ॥३७॥

संनिआस जोग किनो प्रकास ॥

पावन पवित सरबत्र दास ॥

जन धरिओ आनि बपु सरब जोग ॥

तजि राज साज अरु तिआग भोग ॥३८॥

आछिज रूप महिमा महान ॥

दस चारवंत सोभा निधान ॥

रवि अनिल तेज जल सो सुभाव ॥

उपजिआ जगत संन्यास राव ॥३९॥

संन्यास राज भए दत देव ॥

रुद्रावतार सुंदर अजेव ॥

पावक समान भये तेज जासु ॥

बसुधा समान धीरज सु तासु ॥४०॥

परमं पवित्र भए देव दत ॥

आछिज तेज अरु बिमल मति ॥

सोवरण देखि लाजंत अंग ॥

सोभंत सीस गंगा तरंग ॥४१॥

आजान बाहु अलिपत रूप ॥

आदग जोग सुंदर सरूप ॥

बिभूत अंग उजल सु बास ॥

संनिआस जोग किनो प्रकास ॥४२॥

अविलोकि अंग महिमा अपार ॥

संनिआस राज उपजा उदार ॥

अनभूत गात आभा अनंत ॥

मोनी महान सोभा लसंत ॥४३॥

आभा अपार महिमा अनंत ॥

संन्यास राज किनो बिअंत ॥

कांपिआ कपटु तिह उदे होत ॥

ततछिन अकपट किनो उदोत ॥४४॥

महिमा अछिज अनभूत गात ॥

आविलोकि पुत्र चकि रही मात ॥

देसन बिदेस चकि रही सरब ॥

सुनि सरब रिखिन तजि दीन गरब ॥४५॥

सरबत्र प्याल सरबत्र अकास ॥

चल चाल चितु सुंदर सु बास ॥

क्मपाइमान हरखंत रोम ॥

आनंदमान सभ भई भोम ॥४६॥

थरहरत भूमि आकास सरब ॥

जह तह रिखीन तजि दीन गरब ॥

बाजे बजंत्र अनेक गैन ॥

दस दिउस पाइ दिखी न रैण ॥४७॥

जह तह बजंत्र बाजे अनेक ॥

प्रगटिआ जाणु बपु धरि बिबेक ॥

सोभा अपार बरनी न जाइ ॥

उपजिआ आन संन्यास राइ ॥४८॥

जनमंत लागि उठ जोग करम ॥

हति कीओ पाप परचुरिओ धरम ॥

राजाधिराज बड लाग चरन ॥

संनिआस जोग उठि लाग करन ॥४९॥

अतिभुति अनूप लखि दत राइ ॥

उठि लगे पाइ न्रिप सरब आइ ॥

अविलोकि दत महिमा महान ॥

दस चार चार बिदिआ निधान ॥५०॥

सोभंत सीस जत की जटान ॥

नख नेम के सु बढए महान ॥

बिभ्रम बिभूत उजल सो सोह ॥

दिज चरज तुलि म्रिग चरम अरोह ॥५१॥

मुख सित बिभूत लंगोट बंद ॥

संन्यास चरज तजि छंद बंद ॥

आसुनक सुंनि अनव्यकत अंग ॥

आछिज तेज महिमा सुरंग ॥५२॥

इक आस चित तजि सरब आस ॥

अनभूत गात निस दिन उदास ॥

मुनि चरज लीन तजि सरब काम ॥

आरकति नेत्र जनु धरम धाम ॥५३॥

अबिकार चित अणडोल अंग ॥

जुत धिआन नेत्र महिमा अभंग ॥

धरि एक आस अउदास चित ॥

संनियास देव परमं पवित ॥५४॥

अवधूत गात महिमा अपार ॥

स्रुति गिआन सिंधु बिदिआ उदार ॥

मुनि मनि प्रबीन गुनि गन महान ॥

जनु भयो परम गिआनी महान ॥५५॥

कबहूं न पाप जिह छुहा अंग ॥

गुनि गन स्मपंन सुंदर सुरंग ॥

लंगोटबंद अवधूत गात ॥

चकि रही चित अवलोकि मात ॥५६॥

संनियास देव अनभूत अंग ॥

लाजंत देखि जिह दुति अनंग ॥

मुनि दत देव संन्यास राज ॥

जिह सधे सरब संन्यास साज ॥५७॥

परमं पवित्र जा के सरीर ॥

कबहूं न काम किनो अधीर ॥

जट जोग जासु सोभंत सीस ॥

अस धरा रूप संनियास ईस ॥५८॥

आभा अपार कथि सकै कउन ॥

सुनि रहै जछ गंध्रब मउन ॥

चकि रहिओ ब्रहम आभा बिचारि ॥

लाजयो अनंग आभा निहारि ॥५९॥

अति गिआनवंत करमन प्रबीन ॥

अन आस गात हरि को अधीन ॥

छबि दिपत कोट सूरज प्रमान ॥

चक रहा चंद लखि आसमान ॥६०॥

उपजिया आप इक जोग रूप ॥

पुनि लगो जोग साधन अनूप ॥

ग्रिह प्रिथम छाडि उठि चला दत ॥

परमं पवित्र निरमली मति ॥६१॥

जब कीन जोग बहु दिन प्रमान ॥

तब काल देव रीझे निदान ॥

इमि भई बिओम बानी बनाइ ॥

तुम सुणहु बैन संन्यास राइ! ॥६२॥

आकास बानी बाचि दत प्रति ॥

पाधड़ी छंद ॥

गुर हीण मुकति नही होत दत! ॥

तुहि कहो बात सुनि बिमल मत! ॥

गुर करहि प्रिथम तब होगि मुकति ॥

कहि दीन काल तिह जोग जुगत ॥६३॥

बहु भांति दत दंडवत कीन ॥

आसा बिरहति हरि को अधीन ॥

बहु भात जोग साधना साधि ॥

आदग जोग महिमा अगाध ॥६४॥

तब नमसकार करि दत देव ॥

उचरंत परम उसतति अभेव ॥

जोगीन जोग राजान राज ॥

अनभूत अंग जह तह बिराज ॥६५॥

जल थल बियाप जिह तेज एक ॥

गावंत जासु मुनि गन अनेक ॥

जिह नेति नेति भाखंत निगम ॥

ते आदि अंत मधह अगम ॥६६॥

जिह एक रूप किने अनेक ॥

पुहमी अकास किने बिबेक ॥

जल बा थलेस सब ठौर जान ॥

अनभै अजोनि अनि आस मान ॥६७॥

पावन प्रसिध परमं पुनीत ॥

आजान बाह अनभउ अजीत ॥

परमं प्रसिध पूरण पुराण ॥

राजान राज भोगी महाण ॥६८॥

अनछिज तेज अनभै प्रकास ॥

खड़गन सपंन परमं प्रभास ॥

आभा अनंत बरनी न जाइ ॥

फिर फिरे सरब मति को चलाइ ॥६९॥

सबहू बखान जिह नेति नेति ॥

अकलंक रूप आभा अमेत ॥

सरबं सम्रिध जिह पान लाग ॥

जिह नाम लेत सब पाप भाग ॥७०॥

गुन सील साधु ता के सुभाइ ॥

बिनु तास सरनि नही कोऊ उपाइ ॥

दीनन उधारणि जासु बान ॥

कोऊ कहै कैसेई लेत मान ॥७१॥

अकलंक रूप अनछिज तेज ॥

आसन अडोल सुभ सुभ्र सेज ॥

अनगन जासु गुन मधि सोभ ॥

लखि सत्र मित्र जिह रहत लोभ ॥७२॥

जिह सत्र मित्र सम एक जान ॥

उसतती निंद जिह एक मान ॥

आसन अडोल अनछिज रूप ॥

परमं पवित्र भूपाण भूप ॥७३॥

जिहबा सुधान खग उध सोहि ॥

अविलोक दईत अरु देव मोहि ॥

बिनु बैर रूप अनभव प्रकास ॥

अनछिज गात निसि दिन निरास ॥७४॥

दुति आदि अंति एकै समान ॥

खड़गंन सपंनि सब बिधि निधान ॥

सोभा सु बहुत तन जासु सोभ ॥

दुति देखि जछ गंध्रब लोभ ॥७५॥

अनभंग अंग अनभव प्रकास ॥

पसरी जगति जिह जीव रासि ॥

किने सु जीव जलि थलि अनेक ॥

अंतहि समेय फुनि रूप एक ॥७६॥

जिह छूआ नैकु नही काल जालु ॥

छ्वै सका पाप नही कउन काल ॥

आछिज तेज अनभूत गात ॥

एकै सरूप निस दिन प्रभात ॥७७॥

इह भांति दत असतोत्र पाठ ॥

मुख पड़त अछ्र गयो पाप नाठ ॥

को सकै बरन? महिमा अपार ॥

संछेप कीन ता ते उचार ॥७८॥

जे करै पत्र कासिपी सरब ॥

लिखे गणेस करि कै सु गरब ॥

मसु सरब सिंध लेखक बनेसि ॥

नही तदिप अंति कहि सकै सेसु ॥७९॥

जउ करै बैठि ब्रहमा उचार ॥

नही तदिप तेज पायंत पार ॥

मुख सहंस नाम फण पति रड़ंत ॥

नही तदिप तासु पायंत अंतु ॥८०॥

निस दिन जपंत सनकं सनात ॥

नही तदिप तासु सोभा निरात ॥

मुख चार बेद किने उचार ॥

तजि गरब नेति नेतै बिचार ॥८१॥

सिव सहंस्र बरख लौ जोग कीन ॥

तजि नेह गेह बन बास लीन ॥

बहु कीन जोग तह बहु प्रकार ॥

नही तदिप तासु लहि सका पार ॥८२॥

जिह एक रूप अनकं प्रकास ॥

अबियकत तेज निस दिन उदास ॥

आसन अडोल महिमा अभंग ॥

अनभव प्रकास सोभा सुरंग ॥८३॥

जिह सत्रु मित्र एकै समान ॥

अबियकत तेज महिमा महान ॥

जिह आदि अंति एकै सरूप ॥

सुंदर सुरंग जग करि अरूप ॥८४॥

जिह राग रंग नही रूप रेख ॥

नही नाम ठाम अनभव अभेख ॥

आजान बाहि अनभव प्रकास ॥

आभा अनंत महिमा सु बास ॥८५॥

कई कलप जोग जिनि करत बीत ॥

नही तदिप तउन धरि गए चीत ॥

मुनि मन अनेक गुनि गन महान ॥

बहु कसट करत नही धरत धिआन ॥८६॥

जिह एक रूप किने अनेक ॥

अंतहि समेय फुनि भए एक ॥

कई कोटि जंत जीवन उपाइ ॥

फिरि अंत लेत आपहि मिलाइ ॥८७॥

जिह जगत जीव सब परे सरनि ॥

मुन मनि अनेक जिह जपत चरन ॥

कई कलप तिहं करत धिआन ॥

कहूं न देखि तिह बिदिमान ॥८८॥

आभा अनंत महिमा अपार ॥

मुन मनि महान अत ही उदार ॥

आछिज तेज सूरति अपार ॥

नही सकत बुध करि कै बिचार ॥८९॥

जिह आदि अंति एकहि सरूप ॥

सोभा अभंग महिमा अनूप ॥

जिह कीन जोति उदोत सरब ॥

जिह हत्यो सरब गरबीन गरब ॥९०॥

जिह गरबवंत एकै न राख ॥

फिरि कहो बैण नही बैण भाख ॥

इक बार मारि मार्यो न सत्रु ॥

इक बार डारि डारिओ न अत्र ॥९१॥

सेवक थापि नही दूर कीन ॥

लखि भई भूल मुखि बिहस दीन ॥

जिह गही बाहिं किनो निबाह ॥

त्रीया एक ब्याहि, नही कीन ब्याह ॥९२॥

रीझंत कोटि नही कसट कीन ॥

सीझंत एक ही नाम लीन ॥

अनकपट रूप अनभउ प्रकास ॥

खड़गन सपंनि निस दिन निरास ॥९३॥

परमं पवित्र पूरण पुराण ॥

महिमा अभंग सोभा निधान ॥

पावन प्रसिध परमं पुनीत ॥

आजान बाहु अनभै अजीत ॥९४॥

कई कोटि इंद्र जिह पानिहार ॥

कई चंद सूर क्रिसनावतार ॥

कई बिसन रुद्र रामा रसूल ॥

बिनु भगति यौ न कोई कबूल ॥९५॥

कई दत सत गोरख देव ॥

मुनमनि मछिंद्र नही लखत भेव ॥

बहु भांति मंत्र मत कै प्रकास ॥

बिनु एक आस सभ ही निरास ॥९६॥

जिह नेति नेति भाखत निगम ॥

करतार सरब कारण अगम ॥

जिह लखत कोई नही कउन जाति ॥

जिह नाहि पिता भ्रित तात मात ॥९७॥

जानी न जात जिह रंग रूप ॥

साहान साहि भूपान भूप ॥

जिह बरण जाति नही क्रित अनंत ॥

आदो अपार निरबिख बिअंत ॥९८॥

बरणी न जाति जिह रंग रेख ॥

अतभुत अनंत अति बल अभेख ॥

अनखंड चित अबिकार रूप ॥

देवान देव महिमा अनूप ॥९९॥

उसतती निंद जिह इक समान ॥

आभा अखंड महिमा महान ॥

अबिकार चित अनुभव प्रकास ॥

घटि घटि बियाप निस दिन उदास ॥१००॥

इह भांति दत उसतति उचार ॥

डंडवत कीन अत्रिज उदार ॥

अरु भांति भांति उठि परत चरनि ॥

जानी न जाइ जिह जाति बरन ॥१०१॥

जउ करै क्रित कई जुग उचार ॥

नही तदिप तासु लहि जात पार ॥

मम अलप बुधि तव गुन अनंत ॥

बरना न जात तुम अति बिअंत ॥१०२॥

तव गुण अति ऊच अ्मबर समान ॥

मम अलप बुधि बालक अजान ॥

किम सकौ बरन? तुमरे प्रभाव ॥

तव परा सरणि तजि सभ उपाव ॥१०३॥

जिह लखत चत्र नहि भेद बेद ॥

आभा अनंत महिमा अछेद ॥

गुन गनत चत्रमुख परा हार ॥

तब नेति नेति किनो उचार ॥१०४॥

थकि गिरिओ ब्रिध सिर लिखत कित ॥

चकि रहे बालिखिलादि चित ॥

गुन गनत चत्रमुख हार मानि ॥

हठि तजि बिअंति किनो बखान ॥१०५॥

तह जपत रुद्र जुग कोटि भीत ॥

बहि गई गंग सिर मुरि न चीत ॥

कई कलप बीत जिह धरति धिआन ॥

नही तदिप धिआन आए सुजान ॥१०६॥

जब कीन नालि ब्रहमा प्रवेस ॥

मुन मनि महान दिजबर दिजेस ॥

नही कमल नाल को लखा पार ॥

कहो तासु कैस पावै बिचार? ॥१०७॥

बरनी न जाति जिह छबि सुरंग ॥

आभा आपार महिमा अभंग ॥

जिह एक रूप किनो अनेक ॥

पग छोरि आन, तिह धरो टेक ॥१०८॥

रूआल छंद ॥

भांति भांति बिअंति देस; भवंत किरत उचार ॥

भांति भांति पगो लगा; तजि गरब अत्रि कुमार ॥

कोटि बरख करी जबै; हरि सेवि वा चितु लाइ ॥

अकसमात भई तबै; तिह बिओम बान बनाइ ॥१०९॥

ब्योम बानी बाच दत प्रति ॥

दत! सति कहो तुझै; गुर हीण मुकति न होइ ॥

राव रंक प्रजा वजा; इम भाखई सभ कोइ ॥

कोटि कसट न किउ करो; नही ऐस देहि उधार ॥

जाइ कै गुर कीजीऐ; सुनि सति अत्रि कुमार ॥११०॥

दत बाच ॥

रूआल छंद ॥

ऐस बाक भए जबै; तब दत सत सरूप ॥

सिंधु सील सुब्रित को; नद ग्यान को जनु कूप ॥

पान लाग डंडौति कै; इह भांति कीन उचार ॥

कउन सो? गुर कीजीऐ; कहि मोहि तत बिचार ॥१११॥

ब्योम बानी बाच ॥

जउन चित बिखै रुचै; सोई कीजीऐ गुरदेव ॥

तिआग करि कै कपट कउ; चित लाइ कीजै सेव ॥

रीझ है गुरदेव तउ; तुम पाइ हो बरु दान ॥

यौ न होइ उधार पै; सुनि लेहु दत सुजान! ॥११२॥

प्रिथम मंत्र दयो जिनै; सोई जानि कै गुरदेव ॥

जोग कारण को चला; जीअ जानि कै अनभेव ॥

तात मात रहे मनै करि; मान बैन न एक ॥

घोर कानिन कौ चला; धरि जोगि न्यास अनेक ॥११३॥

घोर काननि मै करी; तपसा अनेक प्रकार ॥

भांति भांतिन के करे; इक चित मंत्र उचार ॥

कसट कै जब ही कीआ तप; घोर बरख प्रमान ॥

बुधि को बरु देत भे; तब आनि बुधि निधान ॥११४॥

बुधि कौ बरु जउ दयो; तिन आन बुध अनंत ॥

परम पुरख पवित्र कै गए; दत देव महंत ॥

अकसमात्र बढी तबै बुधि; जत्र तत्र दिसान ॥

धरम प्रचुर कीआ जही; तह परम पाप खिसान ॥११५॥

प्रिथम अकाल गुरू कीआ; जिह को कबै नही नास ॥

जत्र तत्र दिसा विसा; जिह ठउर सरब निवास ॥

अंड जेरज सेत उतभुज; कीन जास पसार ॥

ताहि जान गुरू कीयो मुनि; सति दत सु धार ॥११६॥

इति स्री दत महातमे प्रथम गुरू अकाल पुरख समापतं ॥१॥

रूआल छंद ॥

परम रूप पवित्र मुनि मन; जोग करम निधान ॥

दूसरे गुर कउ करा; मन ई मनै मुनि मानि ॥

नाथ तउ ही पछान जो; मन मानई जिह काल ॥

सिध तउ मन कामना; सुध होत है सुनि लाल! ॥११७॥

इति स्री दत महातमे दुतीआ गुरू मन बरननं धिआइ समापतं ॥२॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

जबै द्वै सु कीने गुरू दत देवं ॥

सदा एक चितं करै नित सेवं ॥

जटा जूट सीसं सु गंगा तरंगं ॥

कबै छ्वै सका अंग को न अनंगं ॥११८॥

महा उजली अंग बिभूत सोहै ॥

लखै मोन मानी महा मान मोहै ॥

जटा जूट गंगा तरंगं महानं ॥

महा बुधि उदार बिदिआ निधानं ॥११९॥

भगउहे लसै बसत्र लंगोट बंदं ॥

तजे सरब आसा रटै एक छंदं ॥

महा मोन मानी महा मोन बाधे ॥

महा जोग करमं सभै न्यास साधे ॥१२०॥

दया सिंधु सरबं सुभं करम करता ॥

हरे सरब गरबं महा तेज धरता ॥

महा जोग की साधना सरब साधी ॥

महा मोन मानी महा सिध लाधी ॥१२१॥

उठै प्राति संधिआ करै नान जावै ॥

करै साधना जोग की जोग भावै ॥

त्रिकालग दरसी महा परम ततं ॥

सु संन्यासु देवं महा सुध मतं ॥१२२॥

पियासा छुधा आन कै जो संतावै ॥

रहे एक चितं न चितं चलावै ॥

करै जोग न्यासं निरासं उदासी ॥

धरे मेखला परम ततं प्रकासी ॥१२३॥

महा आतम दरसी महा तत बेता ॥

थिरं आसणेकं महा ऊरधरेता ॥

करै सति करमं कुकरमं प्रनासं ॥

रहै एक चितं मुनीसं उदासं ॥१२४॥

सुभं सासत्रगंता कुकरमं प्रणासी ॥

बसै काननेसं सुपात्रं उदासी ॥

तज्यो काम करोधं सबै लोभ मोहं ॥

महा जोग ज्वाला महा मोनि सोहं ॥१२५॥

करै न्यास एकं अनेकं प्रकारी ॥

महा ब्रहमचरजं सु धरमाधिकारी ॥

महा तत बेता सु संन्यास जोगं ॥

अनासं उदासी सु बासं अरोगं ॥१२६॥

अनास महा ऊरधरेता संन्यासी ॥

महा तत बेता अनासं उदासी ॥

सबै जोग साधै रहै एक चितं ॥

तजै अउर सरबं गह्यो एक हितं ॥१२७॥

तरे ताप धूमं करै पान उचं ॥

झुलै मधि अगनं तउ धिआन मुचं ॥

महा ब्रहमचरजं महा धरम धारी ॥

भए दत के रुद्र पूरण वतारी ॥१२८॥

हठी तापसी मोन मंत्र महानं ॥

परं पूरणं दत प्रग्या निधानं ॥

करै जोग न्यासं तजे राज भोगं ॥

चके सरब देवं जके सरब लोगं ॥१२९॥

जके जछ गंध्रब बिदिआ निधानं ॥

चके देवता चंद सूरं सुरानं ॥

छके जीव जंत्रं लखे परम रूपं ॥

तज्यो गरब सरबं लगे पान भूपं ॥१३०॥

जटी दंड मुंडी तपी ब्रहमचारी ॥

जती जंगमी जामनी जंत्र धारी ॥

परी पारबती परम देसी पछेले ॥

बली बालखी बंग रूमी रुहेले ॥१३१॥

जटी जामनी जंत्र धारी छलारे ॥

अजी आमरी निवलका करम वारे ॥

अतेवागनहोत्री जूआ जग्य धारी ॥

अधं उरधरेते बरं ब्रहमचारी ॥१३२॥

जिते देस देसं हुते छत्रधारी ॥

सबै पान लगे तज्यो गरब भारी ॥

करै लाग सरबं सु संन्यास जोगं ॥

इही पंथ लागे सुभं सरब लोगं ॥१३३॥

सबे देस देसान ते लोग आए ॥

करं दत के आनि मूंडं मुंडाए ॥

धरे सीस पै परम जूटे जटानं ॥

करै लागि संन्यास जोग अप्रमानं ॥१३४॥

रूआल छंद ॥

देस देसन के सबै न्रिप; आनि कै तहि ठउर ॥

जानि पान परै सबै; गुरु दत स्री सरमउर ॥

तिआगि अउर नए मति; एक ही मति ठान ॥

आनि मूंड मुंडात भे; सभ राज पाट निधान ॥१३५॥

आनि आनि लगे सबै पग; जानि कै गुरदेव ॥

ससत्र सासत्र सबै भ्रितांबर; अनंत रूप अभेव ॥

अछिद गात अछिज रूप; अभिद जोग दुरंत ॥

अमित उजल अजित परम; उपजिओ सु दत महंत ॥१३६॥

पेखि रूप चके चराचर सरब ब्योम बिमान ॥

जत्र तत्र रहे नराधप; चित्र रूप समान ॥

अत्र छत्र न्रिपत को तजि; जोग लै संन्यास ॥

आनि आनि करै लगे ह्वै; जत्र तत्र उदास ॥१३७॥

इंद्र उपिंद्र चके सबै; चित चउकियो ससि भानु ॥

लै न दत छनाइ आज; न्रिपत मोर महान ॥

रीझ रीझ रहे जहा तहा; सरब ब्योम बिमान ॥

जान जान सबै परे; गुरदेव दत महान ॥१३८॥

जत्र तत्र दिसा विसा; न्रिप राज साज बिसार ॥

आनि आनि सबो गहे; पग दत देव उदार ॥

जानि जानि सु धरम को घर; मानि कै गुरदेव ॥

प्रीति मान सबै लगे; मन छाडि कै अहमेव ॥१३९॥

राज साज सबै तजे न्रिप; भेस कै संन्यास ॥

आनि जोग करै लगे ह्वै; जत्र तत्र उदास ॥

मंडि अंगि बिभूत उजल; सीस जूट जटान ॥

भांति भातन सौ सुभे; सभ राज पाट निधान ॥१४०॥

जत्र तत्र बिसारि स्मपति; पुत्र मित्र कलत्र ॥

भेस लै संन्यास को; न्रिप छाडि कै जय पत्र ॥

बाज राज समाज सुंदर; छाड के गज राज ॥

आनि आनि बसे महा बनि; जत्र तत्र उदास ॥१४१॥

पाधड़ी छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

इह भांति सरब छित के न्रिपाल ॥

संन्यास जोग लागे उताल ॥

इक करै लागि निवलि आदि करम ॥

इक धरत धिआन लै बसत्र चरम ॥१४२॥

इक धरत बसत्र बलकलन अंगि ॥

इक रहत कलप इसथित उतंग ॥

इक करत अलप दुगधा अहार ॥

इक रहत बरख बहु निराहार ॥१४३॥

इक रहत मोन मोनी महान ॥

इक करत न्यास तजि खान पान ॥

इक रहत एक पग निराधार ॥

इक बसत ग्राम कानन पहार ॥१४४॥

इक करत कसट कर धूम्र पान ॥

इक करत भांति भांतिन सनान ॥

इक रहत इक पग जुग प्रमान ॥

कई ऊरध बाह मुनि मन महान ॥१४५॥

इक रहत बैठि जलि मधि जाइ ॥

इक तपत आगि ऊरध जराइ ॥

इक करत न्यास बहु बिधि प्रकार ॥

इक रहत एक आसा अधार ॥१४६॥

केई कबहूं नीच नही करत डीठ ॥

केई तपत आगि पर जार पीठ ॥

केई बैठ करत ब्रत चरज दान ॥

केई धरत चित एकै निधान ॥१४७॥

केई करत जगि अरु होम दान ॥

केई भांति भांति बिधवति इसनान ॥

केई धरत जाइ लै पिसट पान ॥

केई देत करम की छाडि बान ॥१४८॥

केई करत बैठि परमं प्रकास ॥

केई भ्रमत पब बनि बनि उदास ॥

केई रहत एक आसन अडोल ॥

केई जपत बैठि मुख मंत्र अमोल ॥१४९॥

केई करत बैठि हरि हरि उचार ॥

केई करत पाठ मुनि मन उदार ॥

केई भगति भाव भगवत भजंत ॥

केई रिचा बेद सिम्रित रटंत ॥१५०॥

केई एक पान असथित अडोल ॥

केई जपत जाप मनि चित खोलि ॥

केई रहत एक मन निराहार ॥

इक भछत पउन मुनि मन उदार ॥१५१॥

इक करत निआस आसा बिहीन ॥

इक रहत एक भगवत अधीन ॥

इक करत नैकु बन फल अहार ॥

इक रटत नाम सिआमा अपार ॥१५२॥

इक एक आस आसा बिरहत ॥

इक बहुत भांति दुख देह सहत ॥

इक कहत एक हरि को कथान ॥

इक मुकत पत्र पावत निदान ॥१५३॥

इक परे सरणि हरि के दुआर ॥

इक रहत तासु नामै अधार ॥

इक जपत नाम ता को दुरंत ॥

इक अंति मुकति पावत बिअंत ॥१५४॥

इक करत नामु निस दिन उचार ॥

इक अगनि होत्र ब्रहमा बिचार ॥

इक सासत्र सरब सिम्रिति रटंत ॥

इक साध रीति निस दिन चलंत ॥१५५॥

इक होम दान अरु बेद रीति ॥

इक रटत बैठि खट सासत्र मीत ॥

इक करत बेद चारो उचार ॥

इक गिआन गाथ महिमा अपार ॥१५६॥

इक भांति भांति मिसटान भोज ॥

बहु दीन बोलि भछ देत रोज ॥

केई करत बैठि बहु भांति पाठ ॥

कई अंनि तिआगि चाबंत काठ ॥१५७॥

पाधड़ी छंद ॥

केई भांति भांति सो धरत धिआन ॥

केई करत बैठि हरि क्रित कानि ॥

केई सुनत पाठ परमं पुनीत ॥

नही मुरत कलप बहुत जात बीत ॥१५८॥

केई बैठ करत जलि को अहार ॥

केई भ्रमत देस देसन पहार ॥

केई जपत मध कंदरी दीह ॥

केई ब्रहमचरज सरता मझीह ॥१५९॥

केई रहत बैठि मध नीर जाइ ॥

केई अगन जारि तापत बनाइ ॥

केई रहत सिधि मुख मोन ठान ॥

अनि आस चित इक आस मान ॥१६०॥

अनडोल गात अबिकार अंग ॥

महिमा महान आभा अभंग ॥

अनभै सरूप अनभव प्रकास ॥

अब्यकत तेज निस दिन उदास ॥१६१॥

इह भांति जोगि कीने अपार ॥

गुर बाझ यौ न होवै उधार ॥

तब परे दत के चरनि आनि ॥

कहि देहि जोग के गुर बिधान! ॥१६२॥

जल मधि जौन मुंडे अपार ॥

बन नाम तउन ह्वैगे कुमार ॥

गिरि मधि सिख किने अनेक ॥

गिरि भेस सहति समझो बिबेक ॥१६३॥

भारथ भणंत जे भे दुरंत ॥

भारथी नाम ता के भणंत ॥

पुरि जास सिख कीने अपार ॥

पुरी नाम तउन जान बिचार ॥१६४॥

परबत बिखै सजे सिख कीन ॥

परबति सु नाम लै ताहि दीन ॥

इह भांति उचरि करि पंच नाम ॥

तब दत देव किंने बिस्राम ॥१६५॥

सागर मंझार जे सिख कीन ॥

सागरि सु नाम तिन के प्रबीन ॥

सारसुति तीर जे कीन चेल ॥

सारसुती नाम तिन नाम मेल ॥१६६॥

तीरथन बीच जे सिख कीन ॥

तीरथि सु नाम तिन को प्रबीन ॥

जिन चरन दत के गहे आनि ॥

ते भए सरब बिदिआ निधान ॥१६७॥

इमि करत सिख जह तह बिहारि ॥

आस्रमन बीच जो जो निहारि ॥

तह तही सिख जो कीन जाइ ॥

आस्रमि सु नाम को तिन सुहाइ ॥१६८॥

आरंन बीच जेअ भे दत ॥

संन्यास राज अति बिमल मति ॥

तह तह सु कीन जे सिख जाइ ॥

अरिंनि नाम तिन को रखाइ ॥१६९॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे दत महातमे अनभउ प्रकासे दस नाम ध्याय स्मपूरण ॥

पाधड़ी छंद ॥

आजान बाहु अतिसै प्रभाव ॥

अबियकत तेज संन्यास राव ॥

जह जह बिहार मुनि करत दत ॥

अनभउ प्रकास अरु बिमल मत ॥१७०॥

जे हुते देस देसन न्रिपाल ॥

तजि गरब पान लागे सु ढाल ॥

तजि दीन अउर झूठे उपाइ ॥

द्रिड़ गहिओ एक संन्यास राइ ॥१७१॥

तजि सरब आस इक आस चित ॥

अबिकार चित परमं पवित ॥

जह करत देस देसन बिहार ॥

उठि चलत सरब राजा अपार ॥१७२॥

दोहरा ॥

गवन करत जिहं जिहं दिसा; मुनि मन दत अपार ॥

संगि चलत उठि सब प्रजा; तज घर बार पहार ॥१७३॥

चौपई ॥

जिह जिह देस मुनीसर गए ॥

ऊच नीच सब ही संगि भए ॥

एक जोग अरु रूप अपारा ॥

कउन न मोहै? कहो बिचारा ॥१७४॥

जह तह चला जोगु संन्यासा ॥

राज पाट तज भए उदासा ॥

ऐसी भूमि न देखीअत कोई ॥

जहा संन्यास जोग नही होई ॥१७५॥

इति मन नूं गुरू दूसर ठहराइआ समापतं ॥२॥

ਅਥ ਤ੍ਰਿਤੀ ਗੁਰੂ ਮਕਰਕਾ ਕਥਨੰ ॥

अथ त्रिती गुरू मकरका कथनं ॥ चौपई ॥

चउबीस गुरू कीन जिहा भाता ॥

अब सुन लेहु कहो इह बाता ॥

एक मकरका दत निहारी ॥

ऐस ह्रिदे अनुमान बिचारी ॥१७६॥

आपन हीऐ ऐस अनुमाना ॥

तीसर गुरु याहि हम माना ॥

प्रेम सूत की डोरि बढावै ॥

तब ही नाथ निरंजन पावै ॥१७७॥

आपन आपु आप मो दरसै ॥

अंतरि गुरू आतमा परसै ॥

एक छाडि कै अनत न धावै ॥

तब ही परम ततु को पावै ॥१७८॥

एक सरूप एक करि देखै ॥

आन भाव को भाव ने पेखै ॥

एक आस तजि अनत न धावै ॥

तब ही नाथ निरंजन पावै ॥१७९॥

केवल अंग रंग तिह राचै ॥

एक छाडि रस नेक न माचै ॥

परम ततु को धिआन लगावै ॥

तब ही नाथ निरंजन पावै ॥१८०॥

तीसर गुरू मकरिका ठानी ॥

आगे चला दत अभिमानी ॥

ता कर भाव ह्रिदे महि लीना ॥

हरखवंत तब चला प्रबीना ॥१८१॥

इति त्रिती गुरू मकरका समापतं ॥३॥


ਅਥ ਬਕ ਚਤਰਥ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ बक चतरथ गुरू कथनं ॥ चौपई ॥

जबै दत गुरु अगै सिधारा ॥

मछ रासकर बैठि निहारा ॥

उजल अंग अति धिआन लगावै ॥

मोनी सरब बिलोकि लजावै ॥१८२॥

जैसक धिआन मछ के काजा ॥

लावत बक नावै निरलाजा ॥

भली भांति इह धिआन लगावै ॥

भाव तास को मुनि मन भावै ॥१८३॥

ऐसो धिआन नाथ हित लईऐ ॥

तब ही परम पुरख कहु पईऐ ॥

मछांतक लखि दत लुभाना ॥

चतरथ गुरू तास अनुमाना ॥१८४॥

इति मछांतक चतुरथ गुरू समापतं ॥४॥


ਅਥ ਬਿੜਾਲ ਪੰਚਮ ਗੁਰੂ ਨਾਮ ॥ अथ बिड़ाल पंचम गुरू नाम ॥ चौपई ॥

आगे चला दत मुनि राई ॥

सीस जटा कह जूट छकाई ॥

देखा एक बिड़ाल जु आगे ॥

धिआन लाइ मुनि निरखन लागै ॥१८५॥

मूस काज जस लावत धिआनू ॥

लाजत देखि महंत महानूं ॥

ऐस धिआन हरि हेत लगईऐ ॥

तब ही नाथ निरंजन पईऐ ॥१८६॥

पंचम गुरू याहि हम जाना ॥

या कहु भाव हीऐ अनुमाना ॥

ऐसी भांति धिआन जो लावै ॥

सो निहचै साहिब को पावै ॥१८७॥

इति बिड़ाल पंचमो गुरू समापतं ॥५॥


ਅਥ ਧੁਨੀਆ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ धुनीआ गुरू कथनं ॥ चौपई ॥

आगे चला राज संन्यासा ॥

एक आस गहि ऐस अनासा ॥

तह इक रूम धुनखतो लहा ॥

ऐस भांति मन सौ मुनि कहा ॥१८८॥

भूप सैन इह जात न लही ॥

ग्रीवा नीच नीच ही रही ॥

सगल सैन वाही मग गई ॥

ता कौ नैकु खबर नही भई ॥१८९॥

रूई धुनखतो फिरि न निहारा ॥

नीच ही ग्रीवा रहा बिचारा ॥

दत बिलोकि हीए मुसकाना ॥

खसटम गुरू तिसी कहु जाना ॥१९०॥

रूम हेत इह जिम चितु लायो ॥

सैन गई परु सिर न उचायो ॥

तैसीए प्रभ सौ प्रीति लगईऐ ॥

तब ही पुरख पुरातन पईऐ ॥१९१॥

इति रूई धुनखता पेंजा खसटमो गुरू समापतं ॥६॥


ਅਥ ਮਾਛੀ ਸਪਤਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ माछी सपतमो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥

आगे चला राज संन्यासा ॥

महा बिमल मन भयो उदासा ॥

निरखा तहा एक मछहा ॥

लए जार करि जात न कहा ॥१९२॥

बिनछी एक हाथ मो धारे ॥

जरीआ अंध कंध पर डारे ॥

इसथित एक मछि की आसा ॥

जानुक वा के मध न सासा ॥१९३॥

एकसु ठांढ मछ की आसू ॥

राज पाट ते जान उदासू ॥

इह बिधि नेह नाथ सौ लईऐ ॥

तब ही पूरन पुरख कह पईऐ ॥१९४॥

इति माछी गुरू सपतमो समापतं ॥७॥


ਅਥ ਚੇਰੀ ਅਸਟਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ चेरी असटमो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥

हरखत अंग संग सैना सुनि ॥

आयो दछ प्रजापति के मुनि ॥

तहा एक चेरका निहारी ॥

चंदन घसत मनो मतवारी ॥१९५॥

चंदन घसत नारि सुभ धरमा ॥

एक चित ह्वै आपन घर मा ॥

एक चित नही चित चलावै ॥

प्रितमा चित्र बिलोकि लजावै ॥१९६॥

दत लए संन्यासन संगा ॥

जात भयो तह भेटत अंगा ॥

सीस उचाइ न तास निहारा ॥

राव रंक को जात बिचारा ॥१९७॥

ता को दत बिलोकि प्रभावा ॥

असटम गुरू ताहि ठहरावा ॥

धंनि धंनि इह चेरका सभागी ॥

जा की प्रीति नाथ संगि लागी ॥१९८॥

ऐस प्रीति हरि हेत लगइयै ॥

तब ही नाथ निरंजन पइयै ॥

बिनु चिति दीन हाथि नही आवै ॥

चार बेद इमि भेद बतावै ॥१९९॥

इति चेरका असटमो गुरू समापतं ॥८॥


ਅਥ ਬਨਜਾਰਾ ਨਵਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ बनजारा नवमो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥

आगे चला जोग जट धारी ॥

लए संगि चेलका अपारी ॥

देखत बनखंड नगर पहारा ॥

आवत लखा एक बनजारा ॥२००॥

धन कर भरे सबै भंडारा ॥

चला संग लै टाड अपारा ॥

अमित गाव लवंगन के भरे ॥

बिधना ते नही जात बिचरे ॥२०१॥

राति दिवस तिन द्रब की आसा ॥

बेचन चला छाडि घर वासा ॥

और आस दूसर नही कोई ॥

एकै आस बनज की होई ॥२०२॥

छाह धूप को त्रास न मानै ॥

राति अउ दिवस गवन ई ठानै ॥

पाप पुंन की अउर न बाता ॥

एकै रस मात्रा के राता ॥२०३॥

ता कह देखि दत हरि भगतू ॥

जा कर रूप जगति जग मगतू ॥

ऐस भांति जो साहिब धिआईऐ ॥

तब ही पुरख पुरातन पाईऐ ॥२०४॥

इति बनजारा नउमो गुरू समापतं ॥९॥


ਅਥ ਕਾਛਨ ਦਸਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ काछन दसमो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥

चला मुनी तजि परहरि आसा ॥

महा मोनि अरु महा उदासा ॥

परम तत बेता बडभागी ॥

महा मोन हरि को अनुरागी ॥२०५॥

परम पुरख पूरो बडभागी ॥

महा मुनी हरि के रस पागी ॥

ब्रहम भगत खट गुन रस लीना ॥

एक नाम के रस सउ भीना ॥२०६॥

उजल गात महा मुनि सोहै ॥

सुर नर मुनि सभ को मन मोहै ॥

जह जह जाइ दत सुभ करमा ॥

तह तह होत सभै निहकरमा ॥२०७॥

भरम मोह तिह देखत भागै ॥

राम भगति सभ ही उठि लागै ॥

पाप ताप सभ दूर पराई ॥

निसि दिन रहै एक लिव लाई ॥२०८॥

काछन एक तहा मिल गई ॥

सोआ चूक पुकारत भई ॥

भाव याहि मन माहि निहारा ॥

दसवो गुरू ताहि बीचारा ॥२०९॥

जो सोवै सो मूलु गवावै ॥

जो जागै हरि ह्रिदै बसावै ॥

सति बोलि या की हम मानी ॥

जोग धिआन जागै ते जानी ॥२१०॥

इति काछन गुरू दसवो समापतं ॥१०॥


ਅਥ ਸੁਰਥ ਯਾਰਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ सुरथ यारमो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥

आगे दत देव तब चला ॥

साधे सरब जोग की कला ॥

अमित तेज अरु उजल प्रभाउ ॥

जानुक बना दूसर हरि राउ ॥२११॥

सभ ही कला जोग की साधी ॥

महा सिधि मोनी मनि लाधी ॥

अधिक तेज अरु अधिक प्रभावा ॥

जा लखि इंद्रासन थहरावा ॥२१२॥

मधुभार छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

मुनि मनि उदार ॥

गुन गन अपार ॥

हरि भगति लीन ॥

हरि को अधीन ॥२१३॥

तजि राज भोग ॥

संन्यास जोग ॥

संन्यास राइ ॥

हरि भगत भाइ ॥२१४॥

मुख छबि अपार ॥

पूरण वतार ॥

खड़गं असेख ॥

बिदिआ बिसेख ॥२१५॥

सुंदर सरूप ॥

महिमा अनूप ॥

आभा अपार ॥

मुनि मनि उदार ॥२१६॥

संनयास देव ॥

गुन गन अभेव ॥

अबियकत रूप ॥

महिमा अनूप ॥२१७॥

सभ सुभ सुभाव ॥

अतिभुत प्रभाव ॥

महिमा अपार ॥

गुन गन उदार ॥२१८॥

तह सुरथ राज ॥

स्मपति समाज ॥

पूजंत चंडि ॥

निसि दिन अखंड ॥२१९॥

न्रिप अति प्रचंड ॥

सभ बिधि अखंड ॥

सिलसित प्रबीन ॥

देवी अधीन ॥२२०॥

निसदिन भवानि ॥

सेवत निधान ॥

करि एक आस ॥

निसि दिन उदास ॥२२१॥

दुरगा पुजंत ॥

नितप्रति महंत ॥

बहु बिधि प्रकार ॥

सेवत सवार ॥२२२॥

अति गुन निधान ॥

महिमा महान ॥

अति बिमल अंग ॥

लखि लजत गंग ॥२२३॥

तिह निरख दत ॥

अति बिमल मति ॥

अनखंड जोति ॥

जनु भिओ उदोत ॥२२४॥

झमकंत अंग ॥

लखि लजत गंग ॥

अति गुन निधान ॥

महिमा महान ॥२२५॥

अनभव प्रकास ॥

निस दिन उदास ॥

अतिभुत सुभाव ॥

संन्यास राव ॥२२६॥

लखि तासु सेव ॥

संन्यास देव ॥

अति चित रीझ ॥

तिह फासि बीझ ॥२२७॥

स्री भगवती छंद ॥

कि दिखिओत दतं ॥

कि परमंति मतं ॥

सु सरबत्र साजा ॥

कि दिखिओत राजा ॥२२८॥

कि आलोक करमं ॥

कि सरबत्र परमं ॥

कि आजित भूपं ॥

कि रतेस रूपं ॥२२९॥

कि आजान बाह ॥

कि सरबत्र साह ॥

कि धरमं सरूपं ॥

कि सरबत्र भूपं ॥२३०॥

कि साहान साहं ॥

कि आजानु बाहं ॥

कि जोगेंद्र गामी ॥

कि धरमेंद्र धामी ॥२३१॥

कि रुद्रारि रूपं ॥

कि भूपान भूपं ॥

कि आदग जोगं ॥

कि तिआगंत सोगं ॥२३२॥

मधुभार छंद ॥

बिमोहियोत देखी ॥

कि रावल भेखी ॥

कि संन्यास राजा ॥

कि सरबत्र साजा ॥२३३॥

कि स्मभाल देखा ॥

कि सुध चंद्र पेखा ॥

कि पावित्र करमं ॥

कि संनिआस धरमं ॥२३४॥

कि संनिआस भेखी ॥

कि आधरम द्वैखी ॥

कि सरबत्र गामी ॥

कि धरमेस धामी ॥२३५॥

कि आछिज जोगं ॥

कि आगम लोगं ॥

कि लंगोट बंधं ॥

कि सरबत्र मंधं ॥२३६॥

कि आछिज करमा ॥

कि आलोक धरमा ॥

कि आदेस करता ॥

कि संन्यास सरता ॥२३७॥

कि अगिआन हंता ॥

कि पारंग गंता ॥

कि आधरम हंता ॥

कि संन्यास भकता ॥२३८॥

कि खंकाल दासं ॥

कि सरबत्र भासं ॥

कि संन्यास राजं ॥

कि सरबत्र साजं ॥२३९॥

कि पारंग गंता ॥

कि आधरम हंता ॥

कि संनिआस भकता ॥

कि साजोज मुकता ॥२४०॥

कि आसकत करमं ॥

कि अबियकत धरमं ॥

कि अतेव जोगी ॥

कि अंगं अरोगी ॥२४१॥

कि सुधं सुरोसं ॥

न नैकु अंग रोसं ॥

न कुकरम करता ॥

कि धरमं सु सरता ॥२४२॥

कि जोगाधिकारी ॥

कि संन्यास धारी ॥

कि ब्रहमं सु भगता ॥

कि आर्मभ जगता ॥२४३॥

कि जाटान जूटं ॥

कि निधिआन छूटं ॥

कि अबियकत अंगं ॥

कि कै पान भंगं ॥२४४॥

कि संन्यास करमी ॥

कि रावल धरमी ॥

कि त्रिकाल कुसली ॥

कि कामादि दुसली ॥२४५॥

कि डामार बाजै ॥

कि सब पाप भाजै ॥

कि बिभूत सोहै ॥

कि सरबत्र मोहै ॥२४६॥

कि लंगोट बंदी ॥

कि एकादि छंदी ॥

कि धरमान धरता ॥

कि पापान हरता ॥२४७॥

कि निनादि बाजै ॥

कि प्मपाप भाजै ॥

कि आदेस बुलै ॥

कि लै ग्रंथ खुलै ॥२४८॥

कि पावित्र देसी ॥

कि धरमेंद्र भेसी ॥

कि लंगोट बंदं ॥

कि आजोति वंदं ॥२४९॥

कि आनरथ रहिता ॥

कि संन्यास सहिता ॥

कि परमं पुनीतं ॥

कि सरबत्र मीतं ॥२५०॥

कि अचाचल अंगं ॥

कि जोगं अभंगं ॥

कि अबियकत रूपं ॥

कि संनिआस भूपं ॥२५१॥

कि बीरान राधी ॥

कि सरबत्र साधी ॥

कि पावित्र करमा ॥

कि संन्यास धरमा ॥२५२॥

अपाखंड रंगं ॥

कि आछिज अंगं ॥

कि अंनिआइ हरता ॥

कि सु न्याइ करता ॥२५३॥

कि करमं प्रनासी ॥

कि सरबत्र दासी ॥

कि अलिपत अंगी ॥

कि आभा अभंगी ॥२५४॥

कि सरबत्र गंता ॥

कि पापान हंता ॥

कि सासध जोगं ॥

कितं तिआग रोगं ॥२५५॥

इति सुरथ राजा यार्हमो गुरू बरननं समापतं ॥११॥


ਅਥ ਬਾਲੀ ਦੁਆਦਸਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ बाली दुआदसमो गुरू कथनं ॥ रसावल छंद ॥

चला दत आगे ॥

लखे पाप भागे ॥

बजै घंट घोरं ॥

बणं जाणु मोरं ॥२५६॥

नवं नाद बाजै ॥

धरा पाप भाजै ॥

करै देब्य अरचा ॥

चतुर बेद चरचा ॥२५७॥

स्रुतं सरब पाठं ॥

सु संन्यास राठं ॥

महाजोग न्यासं ॥

सदाई उदासं ॥२५८॥

खटं सासत्र चरचा ॥

रटै बेद अरचा ॥

महा मोन मानी ॥

कि संन्यास धानी ॥२५९॥

चला दत आगै ॥

लखे पाप भागै ॥

लखी एक कंनिआ ॥

तिहूं लोग धंनिआ ॥२६०॥

महा ब्रहमचारी ॥

सु धरमाधिकारी ॥

लखी पानि वा के ॥

गुडी बालि ता के ॥२६१॥

खिलै खेल ता सो ॥

इसो हेत वा सो ॥

पीऐ पानि न आवै ॥

इसो खेल भावै ॥२६२॥

गए मोनि मानी ॥

तरै दिसट आनी ॥

न बाला निहार्यो ॥

न खेलं बिसार्यो ॥२६३॥

लखी दत बाला ॥

मनो रागमाला ॥

रंगी रंगि खेलं ॥

मनो नाग्र बेलं ॥२६४॥

तबै दत रायं ॥

लखे तास जायं ॥

गुरू तास कीना ॥

महा मंत्र भीना ॥२६५॥

गुरू तास जान्यो ॥

इमं मंत्र ठान्यो ॥

दसं द्वै निधानं ॥

गुरू दत जानं ॥२६६॥

रुणझुण छंद ॥

लखि छबि बाली ॥

अति दुति वाली ॥

अतिभुत रूपं ॥

जणु बुधि कूपं ॥२६७॥

फिर फिर पेखा ॥

बहु बिधि लेखा ॥

तन मन जाना ॥

गुन गन माना ॥२६८॥

तिह गुर कीना ॥

अति जसु लीना ॥

अगि तब चाला ॥

जनु मनि ज्वाला ॥२६९॥

इति दुआदस गुरू लड़की गुडी खेडती समापतं ॥१२॥


ਅਥ ਭ੍ਰਿਤ ਤ੍ਰੋਦਸਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ भ्रित त्रोदसमो गुरू कथनं ॥ तोमर छंद ॥

तब दत देव महान ॥

दस चार चार निधान ॥

अतिभुत उतम गात ॥

हरि नामु लेत प्रभात ॥२७०॥

अकलंक उजल अंग ॥

लखि लाज गंग तरंग ॥

अनभै अभूत सरूप ॥

लखि जोति लाजत भूप ॥२७१॥

अवलोकि सु भ्रित एक ॥

गुन मधि जासु अनेक ॥

अधि राति ठांढि दुआरि ॥

बहु बरख मेघ फुहार ॥२७२॥

अधि राति दत निहारि ॥

गुणवंत बिक्रम अपार ॥

जल मुसलधार परंत ॥

निज नैन देखि महंत ॥२७३॥

इक चित ठांढ सु ऐस ॥

सोवरन मूरति जैस ॥

द्रिड़ देखि ता की मति ॥

अति मनहि रीझे दत ॥२७४॥

नही सीत मानत घाम ॥

नही चित ल्यावत छाम ॥

नही नैकु मोरत अंग ॥

इक पाइ ठांढ अभंग ॥२७५॥

ढिग दत ता के जाइ ॥

अविलोकि तासु बनाए ॥

अधि रात्रि निरजन त्रास ॥

असि लीन ठांढ उदास ॥२७६॥

बरखंत मेघ महान ॥

भाजंत भूमि निधान ॥

जगि जीव सरब सु भास ॥

उठि भाज त्रास उदास ॥२७७॥

इह ठांढ भूपति पउर ॥

मन जाप जापत गउर ॥

नही नैकु मोरत अंग ॥

इक पाव ठांढ अभंग ॥२७८॥

असि लीन पानि कराल ॥

चमकंत उजल ज्वाल ॥

जन काहू को नही मित्र ॥

इह भांति परम पवित्र ॥२७९॥

नही नैकु उचावत पाउ ॥

बहु भांति साधत दाउ ॥

अनआस भूपति भगत ॥

प्रभ एक ही रस पगत ॥२८०॥

जल परत मूसलधार ॥

ग्रिह ले न ओटि दुआर ॥

पसु पछ सरबि दिसान ॥

सभ देस देस सिधान ॥२८१॥

इह ठांढ है इक आस ॥

इक पान जान उदास ॥

असि लीन पानि प्रचंड ॥

अति तेजवंत अखंड ॥२८२॥

मनि आनि को नही भाव ॥

इक देव को चित चाव ॥

इक पाव ऐसे ठांढ ॥

रन ख्मभ जानुक गाड ॥२८३॥

जिह भूमि धारस पाव ॥

नही नैकु फेरि उचाव ॥

नही ठाम भीजस तउन ॥

अवलोक भइओ मुनि मउन ॥२८४॥

अवलोकि तासु मुनेस ॥

अकलंक भागवि भेस ॥

गुरु जानि परीआ पाइ ॥

तजि लाज साज सचाइ ॥२८५॥

तिह जान कै गुरदेव ॥

अकलंक दत अभेव ॥

चित तास के रस भीन ॥

गुरु त्रउदसमो तिह कीन ॥२८६॥

इति त्रउदसमो गुरू भ्रित समापतं ॥१३॥


ਅਥ ਚਤੁਰਦਸਮੋ ਗੁਰ ਨਾਮ ॥ अथ चतुरदसमो गुर नाम ॥ रसावल छंद ॥

चल्यो दत राजं ॥

लखे पाप भाजं ॥

जिनै नैकु पेखा ॥

गुरू तुलि लेखा ॥२८७॥

महा जोति राजै ॥

लखै पाप भाजै ॥

महा तेज सोहै ॥

सिवऊ तुलि को है ॥२८८॥

जिनै नैकु पेखा ॥

मनो मैन देखा ॥

सही ब्रहम जाना ॥

न द्वै भाव आना ॥२८९॥

रिझी सरब नारी ॥

महा तेज धारी ॥

न हारं स्मभारै ॥

न चीरऊ चितारै ॥२९०॥

चली धाइ ऐसे ॥

नदी नाव जैसे ॥

जुवा ब्रिध बालै ॥

रही कौ न आलै ॥२९१॥

लही एक नारी ॥

सु धरमाधिकारी ॥

किधौ पारबती छै ॥

मनो बासवी है ॥२९२॥

स्री भगवती छंद ॥

कि राजा स्री छै ॥

कि बिदुलता छै ॥

कि हईमाद्रजा है ॥

कि परमं प्रभा है ॥२९३॥

कि रामं त्रीआ है ॥

कि राजं प्रभा है ॥

कि राजेस्वरी छै ॥

कि रामानुजा छै ॥२९४॥

कि कालिंद्र का छै ॥

कि कामं प्रभा छै ॥

कि देवानुजा है ॥

कि दईतेसुरा है ॥२९५॥

कि सावित्रका छै ॥

कि गाइत्री आछै ॥

कि देवेस्वरी है ॥

कि राजेस्वरी छै ॥२९६॥

कि मंत्रावली है ॥

कि तंत्रालका छै ॥

कि हईमाद्रजा छै ॥

कि हंसेसुरी है ॥२९७॥

कि जाजुलिका छै ॥

सुवरन आदिजा छै ॥

कि सुधं सची है ॥

कि ब्रहमा रची है ॥२९८॥

कि परमेसुरजा है ॥

कि परमं प्रभा है ॥

कि पावित्रता छै ॥

कि सावित्रका छै ॥२९९॥

कि चंचालका छै ॥

कि कामहि कला छै ॥

कि क्रितयं धुजा छै ॥

कि राजेस्वरी है ॥३००॥

कि राजहि सिरी है ॥

कि रामंकली है ॥

कि गउरी महा है ॥

कि टोडी प्रभा है ॥३०१॥

कि भूपालका छै ॥

कि टोडीज आछै ॥

कि बासंत बाला ॥

कि रागान माला ॥३०२॥

कि मेघं मलारी ॥

कि गउरी धमारी ॥

कि हिंडोल पुत्री ॥

कि आकास उतरी ॥३०३॥

सु सऊहाग वंती ॥

कि पारंग गंती ॥

कि खट सासत्र बकता ॥

कि निज नाह भगता ॥३०४॥

कि र्मभा सची है ॥

कि ब्रहमा रची है ॥

कि गंध्रबणी छै ॥

कि बिदिआधरी छै ॥३०५॥

कि र्मभा उरबसी छै ॥

कि सुधं सची छै ॥

कि हंस एस्वरी है ॥

कि हिंडोलका छै ॥३०६॥

कि गंध्रबणी है ॥

कि बिदिआधरी है ॥

कि राजहि सिरी छै ॥

कि राजहि प्रभा छै ॥३०७॥

कि राजानजा है ॥

कि रुद्रं प्रिआ है ॥

कि स्मभालका छै ॥

कि सुधं प्रभा छै ॥३०८॥

कि अ्मबालिका छै ॥

कि आकरखणी छै ॥

कि चंचालक छै ॥

कि चित्रं प्रभा है ॥३०९॥

कि कालिंद्रका छै ॥

कि सारस्वती है ॥

किधौ जान्हवी है ॥

किधौ दुआरका छै ॥३१०॥

कि कालिंद्रजा छै ॥

कि कामं प्रभा छै ॥

कि कामएसवरी है ॥

कि इंद्रानुजा है ॥३११॥

कि भै खंडणी छै ॥

कि ख्मभावती है ॥

कि बासंत नारी ॥

कि धरमाधिकारी ॥३१२॥

कि परमह प्रभा छै ॥

कि पावित्रता छै ॥

कि आलोकणी है ॥

कि आभा परी है ॥३१३॥

कि चंद्रा मुखी छै ॥

कि सूरं प्रभा छै ॥

कि पावित्रता है ॥

कि परमं प्रभा है ॥३१४॥

कि सरपं लटी है ॥

कि दुखं कटी है ॥

कि चंचालका छै ॥

कि चंद्रं प्रभा छै ॥३१५॥

कि बुधं धरी है ॥

कि क्रुधं हरी है ॥

कि छत्रालका छै ॥

कि बिजं छटा है ॥३१६॥

कि छत्राणवी है ॥

कि छत्रंधरी है ॥

कि छत्रं प्रभा है ॥

कि छत्रं छटा है ॥३१७॥

कि बानं द्रिगी है ॥

नेत्रं म्रिगी है ॥

कि कउला प्रभा है ॥

निसेसाननी छै ॥३१८॥

कि गंध्रबणी है ॥

कि बिदिआधरी छै ॥

कि बासंत नारी ॥

कि भूतेस पिआरी ॥३१९॥

कि जाद्वेस नारी ॥

कि पंचाल बारी ॥

कि हिंडोलका छै ॥

कि राजह सिरी है ॥३२०॥

कि सोवरण पुत्री ॥

कि आकास उत्री ॥

कि स्वरणी प्रिता है ॥

कि सुव्रणं प्रभा है ॥३२१॥

कि पदमं द्रिगी है ॥

कि परमं प्रभी है ॥

कि बीराबरा है ॥

कि ससि की सुभा है ॥३२२॥

कि नागेसजा है ॥

नागन प्रभा है ॥

कि नलनं द्रिगी है ॥

कि मलिनी म्रिगी है ॥३२३॥

कि अमितं प्रभा है ॥

कि अमितोतमा है ॥

कि अकलंक रूपं ॥

कि सभ जगत भूपं ॥३२४॥

मोहणी छंद ॥

जुबणमय मंती सु बाली ॥

मुख नूरं पूरं उजाली ॥

म्रिग नैणी बैणी कोकिला ॥

ससि आभा सोभा चंचला ॥३२५॥

घणि मंझै जै है चंचाली ॥

म्रिदुहासा नासा खंकाली ॥

चखु चारं हारं कंठायं ॥

म्रिग नैणी बेणी मंडायं ॥३२६॥

गज गामं बामं सु गैणी ॥

म्रिदहासं बासं बिध बैणी ॥

चखु चारं हारं निरमला ॥

लखि आभा लजी चंचला ॥३२७॥

द्रिड़ धरमा करमा सुकरमं ॥

दुख हरता सरता जाणु धरमं ॥

मुख नूरं भूरं सु बासा ॥

चखु चारी बारी अंनासा ॥३२८॥

चखु चारं बारं चंचाली ॥

सत धरमा करमा संचाली ॥

दुख हरणी दरणी दुख द्वंदं ॥

प्रिया भकता बकता हरि छंदं ॥३२९॥

र्मभा उरबसीआ घ्रिताची ॥

अछै मोहणी आजे राची ॥

लखि सरबं गरबं परहारी ॥

मुखि नीचे धामं सिधारी ॥३३०॥

गंधरबं सरबं देवाणी ॥

गिरजा गाइत्री लंकाणी ॥

सावित्री चंद्री इंद्राणी ॥

लखि लजी सोभा सूरजाणी ॥३३१॥

नागणीआ न्रितिआ जछाणी ॥

पापा पावित्री पबाणी ॥

पईसाच प्रेती भूतेसी ॥

भि्मभरीआ भामा भूपेसी ॥३३२॥

बर बरणी हरणी सब दुखं ॥

सुख करनी तरुणी ससि मुखं ॥

उरगी गंध्रबी जछानी ॥

लंकेसी भेसी इंद्राणी ॥३३३॥

द्रिग बानं तानं मदमती ॥

जुबन जगमगणी सुभवंती ॥

उरि धारं हारं बनि मालं ॥

मुखि सोभा सिखिरं जन ज्वालं ॥३३४॥

छतपत्री छत्री छत्राली ॥

बिधु बैणी नैणी न्रिमाली ॥

असि उपासी दासी निरलेपं ॥

बुधि खानं मानं संछेपं ॥३३५॥

सुभ सीलं डीलं सुख थानं ॥

मुख हासं रासं निरबानं ॥

प्रिया भकता बकता हरि नामं ॥

चित लैणी दैणी आरामं ॥३३६॥

प्रिय भकता ठाढी एकंगी ॥

रंग एकै रंगै सो रंगी ॥

निर बासा आसा एकातं ॥

पति दासी भासी परभातं ॥३३७॥

अनि निंद्र अनिंदा निरहारी ॥

प्रिय भकता बकता ब्रतचारी ॥

बासंती टोडी गउडी है ॥

भुपाली सारंग गउरी छै ॥३३८॥

हिंडोली मेघ मलारी है ॥

जैजावंती गौड मलारी छै ॥

बंगलीआ रागु बसंती छै ॥

बैरारी सोभावंती है ॥३३९॥

सोरठि सारंग बैरारी छै ॥

परज कि सुध मलारी छै ॥

हिंडोली काफी तैलंगी ॥

भैरवी दीपकी सुभंगी ॥३४०॥

सरबेवं रागं निरबाणी ॥

लखि लोभी आभा गरबाणी ॥

जउ कथउ सोभा सरबाणं ॥

तउ बाढे एकं ग्रंथाणं ॥३४१॥

लखि ताम दतं ब्रतचारी ॥

सब लगे पानं जटधारी ॥

तन मन भरता कर रस भीना ॥

चव दसवो ता कौ गुरु कीना ॥३४२॥

इति प्रिय भगत इसत्री चतुरदसवा गुरू समापतं ॥१४॥


ਅਥ ਬਾਨਗਰ ਪੰਧਰਵੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ बानगर पंधरवो गुरू कथनं ॥ तोटक छंद ॥

करि चउदसवों गुरु दत मुनं ॥

मग लगीआ पूरत नाद धुनं ॥

भ्रम पूरब पछम उत्र दिसं ॥

तकि चलीआ दछन मोन इसं ॥३४३॥

अविलोकि तहा इक चित्र पुरं ॥

जनु क्रांति दिवालय सरब हरं ॥

नगरेस तहा बहु मारि म्रिगं ॥

सब सिंघ म्रिगीपति घाइ खगं ॥३४४॥

चतुरं लए न्रिप संगि घनी ॥

थहरंत धुजा चमकंत अनी ॥

बहु भूखन चीर जराव जरी ॥

त्रिदसालय की जनु क्रांति हरी ॥३४५॥

तह बैठ हुतो इक बाणगरं ॥

बिनु प्राण किधौ नही बैनुचरं ॥

तह बाजत बाज म्रिदंग गणं ॥

डफ ढोलक झांझ मुचंग भणं ॥३४६॥

दल नाथ लए बहु संगि दलं ॥

जल बारिध जानु प्रलै उछलं ॥

हय हिंसत चिंसत गूड़ गजं ॥

गल गजत लजत सुंड लजं ॥३४७॥

द्रुम ढाहत गाहत गूड़ दलं ॥

कर खीचत सीचत धार जलं ॥

सुख पावत धावत पेखि प्रभै ॥

अवलोकि बिमोहत राज सुभै ॥३४८॥

चपि डारत चाचर भानु सूअं ॥

सुख पावत देख नरेस भूअं ॥

गल गजत ढोल म्रिदंग सुरं ॥

बहु बाजत नाद नयं मुरजं ॥३४९॥

कलि किंकणि भूखत अंगि बरं ॥

तन लेपत चंदन चार प्रभं ॥

म्रिदु डोलत बोलत बात मुखं ॥

ग्रिहि आवत खेल अखेट सुखं ॥३५०॥

मुख पोछ गुलाब फुलेल सुभं ॥

कलि कजल सोहत चारु चखं ॥

मुख उजल चंद समान सुभं ॥

अविलोकि छके गण गंध्रबिसं ॥३५१॥

सुभ सोभत हार अपार उरं ॥

तिलकं दुति केसर चारु प्रभं ॥

अनसंख अछूहन संग दलं ॥

तिह जात भए सन सैन मगं ॥३५२॥

फिरि आइ गए तिह पैंड मुनं ॥

कलि बाजत संखन नाद धुनं ॥

अविलोकि तहा इक बान गरं ॥

सिर नीच मनो लिख चित्र धरं ॥३५३॥

अविलोक रिखीसर तीर गरं ॥

हसि बैन सु भांति इमं उचरं ॥

कहु भूप गए लीए संगि दलं ॥

कहिओ सो न गुरू अविलोक द्रिगं ॥३५४॥

चकि चित रहे अचित मुनं ॥

अनखंड तपी नही जोग डुलं ॥

अनआस अभंग उदास मनं ॥

अबिकार अपार प्रभास सभं ॥३५५॥

अनभंग प्रभा अनखंड तपं ॥

अबिकार जती अनिआस जपं ॥

अनखंड ब्रतं अनडंड तनं ॥

हठवंत ब्रती रिखि अत्र सूअं ॥३५६॥

अविलोकि सरं करि धिआन जुतं ॥

रहि रीझ जटी हठवंत ब्रतं ॥

गुरु मानिस पंचदस्वो प्रबलं ॥

हठ छाडि सबै तिन पान परं ॥३५७॥

इमि नाह सौ जो नर नेह करै ॥

भव धार अपारहि पार परै ॥

तन के मन के भ्रम पासि धरे ॥

करि पंद्रसवो गुरु पान परे ॥३५८॥

इति पंद्रसव गुरू बानगर समापतं ॥१५॥


ਅਥ ਚਾਂਵਡਿ ਸੋਰਵੋ ਗੁਰੁ ਕਥਨੰ ॥ अथ चांवडि सोरवो गुरु कथनं ॥ तोटक छंद ॥

मुख बिभूत भगवे भेस बरं ॥

सुभ सोभत चेलक संग नरं ॥

गुन गावत गोबिंद एक मुखं ॥

बन डोलत आस उदास सुखं ॥३५९॥

सुभ सूरति पूरत नाद नवं ॥

अति उजल अंग बिभूत रिखं ॥

नही बोलत डोलत देस दिसं ॥

गुन चारत धारत ध्यान हरं ॥३६०॥

अविलोकय चावंडि चारु प्रभं ॥

ग्रिहि जात उडी गहि मासु मुखं ॥

लखि कै पल चावंडि चार चली ॥

तिह ते अति पुसट प्रमाथ बली ॥३६१॥

अविलोकिस मास अकास उडी ॥

अति जुधु तही तिहं संग मंडी ॥

तजि मासु चड़ा उडि आप चली ॥

लहि कै चित चावंडि चार बली ॥३६२॥

अविलोकि सु चावंडि चार पलं ॥

तजि त्रास भाई थिर भूमि थलं ॥

लखि तासु मनं मुनि चउक रह्यो ॥

चित सोर्हसवे गुरु तासु कह्यो ॥३६३॥

कोऊ ऐस तजै जब सरब धनं ॥

करि कै बिनु आस उदास मनं ॥

तब पाचउ इंद्री तिआग रहै ॥

इन चीलन जिउ स्रुत ऐस कहै ॥३६४॥

इति सोर्हवो गुरू चावंडि समापतं ॥१६॥


ਅਥ ਦੁਧੀਰਾ ਸਤਾਰਵੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ दुधीरा सतारवो गुरू कथनं ॥ तोटक छंद ॥

करि सोरसवो रिखि तासु गुरं ॥

उठि चलीआ बाट उदास चितं ॥

मुखि पूरत नादि निनाद धुनं ॥

सुनि रीझत गंध्रब देव नरं ॥३६५॥

चलि जात भए सरिता निकटं ॥

हठवंत रिखं तपसा बिकट ॥

अविलोक दुधीरया एक तहा ॥

उछरंत हुते नदि मछ जहा ॥३६६॥

थरकंत हुतो इक चित नभं ॥

अति उजल अंग सुरंग सुभं ॥

नही आनि बिलोकत आप द्रिगं ॥

इह भांति रह्यो गड मछ मनं ॥३६७॥

तहा जाइ महा मुनि मजन कै ॥

उठि कै हरि धिआन लगा सुच कै ॥

न टरो तब लौ वह मछ अरी ॥

रथ सूर अथिओ नह डीठ टरी ॥३६८॥

थरकंत रहा नभि मछ कटं ॥

रथ भानु हटिओ नही ध्यान छुटं ॥

अविलोक महा मुनि मोहि रहिओ ॥

गुरु सत्रसवो कर तासु कहिओ ॥३६९॥

इति सतारवो गुरू दुधीरा समापतं ॥१७॥


ਅਥ ਮ੍ਰਿਗਹਾ ਅਠਾਰਸਵੋ ਗੁਰੂ ਬਰਨਨੰ ॥ अथ म्रिगहा अठारसवो गुरू बरननं ॥ तोटक छंद ॥

करि मजन गोबिंद गाइ गुनं ॥

उठि जाति भए बन मधि मुनं ॥

जह साल तमाल मढाल लसै ॥

रथ सूरज के पग बाज फसै ॥३७०॥

अविलोक तहा इक ताल महा ॥

रिखि जात भए हित जोग जहा ॥

तह पत्रण मध लह्यो म्रिगहा ॥

तन सोभत कंचन सुध प्रभा ॥३७१॥

करि संधित बाण कमाण सितं ॥

म्रिग मारत कोट करोर कितं ॥

सभ सैन मुनीसर संगि लए ॥

जह कानन थो तह जात भए ॥३७२॥

कनकं दुति उजल अंग सने ॥

मुनि राज मनं रितु राज बने ॥

रिखि संग सखा निसि बहुत लए ॥

तिह बारिध दूज बिलोकि गए ॥३७३॥

रिखि बोलत घोरत नाद नवं ॥

तिह ठउर कुलाहल उच हूअं ॥

जल पीवत ठउर ही ठउर मुनी ॥

बन मधि मनो रिख माल बनी ॥३७४॥

अति उजल अंग बिभूत धरै ॥

बहु भांति न्यास अनास करै ॥

निवल्यादिक सरबं करम कीए ॥

रिखि सरब चहूं चक दास थीए ॥३७५॥

अनभंग अखंड अनंग तनं ॥

बहु साधत न्यास संन्यास बनं ॥

जट सोहत जानुक धूर जटी ॥

सिव की जनु जोग जटा प्रगटी ॥३७६॥

सिव ते जनु गंग तरंग छुटे ॥

इह हुइ जन जोग जटा प्रगटे ॥

तप सरब तपीसन के सब ही ॥

मुनि जे सब छीन लए तब ही ॥३७७॥

स्रुत जेतिक न्यास उदास कहे ॥

सब ही रिखि अंगन जान लए ॥

घन मै जिम बिदुलता झमकै ॥

रिखि मो गुन तास सबै दमकै ॥३७८॥

जस छाडत भानु अनंत छटा ॥

रिखि के तिम सोभत जोग जटा ॥

जिन की दुख फास कहूं न कटी ॥

रिखि भेटत तासु छटाक छुटी ॥३७९॥

नर जो नही नरकन ते निवरै ॥

रिखि भेटत तउन तराक तरै ॥

जिन के समता कहूं नाहि ठटी ॥

रिखि पूजि घटी सब पाप घटी ॥३८०॥

इत बधि तउन बिठो म्रिगहा ॥

जस हेरत छेरिनि भीम भिडहा ॥

तिह जान रिखीन ही सास सस्यो ॥

म्रिग जान मुनी कहु बान कस्यो ॥३८१॥

सर पेख सबै तिह साध कहै ॥

म्रिग होइ न रे! मुनि राज इहै ॥

नह बान सरासन पान तजे ॥

अस देखि द्रिड़ं मुनि राज लजे ॥३८२॥

बहुते चिर जिउ तिह ध्यान छुटा ॥

अविलोक धरे रिखि पाल जटा ॥

कस आवत हो? डरु डारि अबै ॥

मुहि लागत हो म्रिग रूप सबै ॥३८३॥

रिख पाल बिलोकि तिसै दिड़ता ॥

गुरु मान करी बहुतै उपमा ॥

म्रिग सो जिह को चित ऐस लग्यो ॥

परमेसर कै रस जान पग्यो ॥३८४॥

मुन को तब प्रेम प्रसीज हीआ ॥

गुर ठारसमो म्रिग नास कीआ ॥

मन मो तब दत बीचार कीआ ॥

गुन म्रिगहा को चित बीच लीआ ॥३८५॥

हरि सो हितु जो इह भांति करै ॥

भव भार अपारह पार परै ॥

मल अंतरि याही इसनान कटै ॥

जग ते फिरि आवन जान मिटै ॥३८६॥

गुरु जान तबै तिह पाइ परा ॥

भव भार अपार सु पार तरा ॥

दस असटसमो गुरु तासु कीयो ॥

कबि बाधि कबितन मधि लीयो ॥३८७॥

सब ही सिख संजुति पान गहे ॥

अविलोकि चराचरि चउध रहे ॥

पसु पछ चराचर जीव सबै ॥

गण गंध्रब भूत पिसाच तबै ॥३८८॥

इति अठदसवो गुरू म्रिगहा समापतं ॥१८॥

ਅਥ ਨਲਨੀ ਸੁਕ ਉਨੀਵੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥

अथ नलनी सुक उनीवो गुरू कथनं ॥ क्रिपाण क्रित छंद ॥

मुनि अति अपार ॥

गुण गण उदार ॥

बिदिआ बिचार ॥

नित करत चार ॥३८९॥

लखि छबि सुरंग ॥

लाजत अनंग ॥

पिखि बिमल अंग ॥

चकि रहत गंग ॥३९०॥

लखि दुति अपार ॥

रीझत कुमार ॥

ग्यानी अपार ॥

गुन गन उदार ॥३९१॥

अब्यकत अंग ॥

आभा अभंग ॥

सोभा सुरंग ॥

तन जनु अनंग ॥३९२॥

बहु करत न्यास ॥

निसि दिन उदास ॥

तजि सरब आस ॥

अति बुधि प्रकास ॥३९३॥

तनि सहत धूप ॥

संन्यास भूप ॥

तनि छबि अनूप ॥

जनु सिव सरूप ॥३९४॥

मुख छबि प्रचंड ॥

आभा अभंग ॥

जुटि जोग जंग ॥

नही मुरत अंग ॥३९५॥

अति छबि प्रकास ॥

निसि दिन निरास ॥

मुनि मन सुबास ॥

गुन गन उदास ॥३९६॥

अब्यकत जोग ॥

नही कउन सोग ॥

नितप्रति अरोग ॥

तजि राज भोग ॥३९७॥

मुन मनि क्रिपाल ॥

गुन गन दिआल ॥

सुभि मति सुढाल ॥

द्रिड़ ब्रित कराल ॥३९८॥

तन सहत सीत ॥

नही मुरत चीत ॥

बहु बरख बीत ॥

जनु जोग जीत ॥३९९॥

चालंत बात ॥

थरकंत पात ॥

पीअरात गात ॥

नही बदत बात ॥४००॥

भंगं भछंत ॥

काछी कछंत ॥

किंग्री बजंत ॥

भगवत भनंत ॥४०१॥

नही डुलत अंग ॥

मुनि मन अभंग ॥

जुटि जोग जंग ॥

जिमि उडत चंग ॥४०२॥

नही करत हाइ ॥

तप करत चाइ ॥

नितप्रति बनाइ ॥

बहु भगत भाइ ॥४०३॥

मुख भछत पउन ॥

तजि धाम गउन ॥

मुनि रहत मउन ॥

सुभ राज भउन ॥४०४॥

संन्यास देव ॥

मुनि मन अभेव ॥

अनजुरि अजेव ॥

अंतरि अतेव ॥४०५॥

अनभू प्रकास ॥

नितप्रति उदास ॥

गुन अधिक जास ॥

लखि लजत अनास ॥४०६॥

ब्रहमंन देव ॥

गुन गन अभेव ॥

देवान देव ॥

अनभिख अजेव ॥४०७॥

संनिआस नाथ ॥

अनधर प्रमाथ ॥

इक रटत गाथ ॥

टक एक साथ ॥४०८॥

गुन गनि अपार ॥

मुनि मनि उदार ॥

सुभ मति सुढार ॥

बुधि को पहार ॥४०९॥

संनिआस भेख ॥

अनिबिख अद्वैख ॥

जापत अभेख ॥

ब्रिध बुधि अलेख ॥४१०॥

कुलक छंद ॥

धं धकित इंद ॥

चं चकित चंद ॥

थं थकत पउन ॥

भं भजत मउन ॥४११॥

जं जकित जछ ॥

पं पचत पछ ॥

धं धकत सिंधु ॥

बं बकत बिंध ॥४१२॥

सं सकत सिंधु ॥

गं गकत गिंध ॥

तं तकत देव ॥

अं अकत भेव ॥४१३॥

लं लखत जोगि ॥

भं भ्रमत भोगि ॥

बं बकत बैन ॥

चं चकत नैन ॥४१४॥

तं तजत अत्र ॥

छं छकत छत्र ॥

पं परत पान ॥

भं भरत भान ॥४१५॥

बं बजत बाद ॥

नं नजत नाद ॥

अं उठत राग ॥

उफटत सुहाग ॥४१६॥

छं सकत सूर ॥

भं भ्रमत हूर ॥

रं रिझत चित ॥

तं तजत बित ॥४१७॥

छं छकत जछ ॥

भं भ्रमत पछ ॥

भं भिरत भूप ॥

नव निरख रूप ॥४१८॥

चरपट छंद ॥

गलितं जोगं ॥

दलितं भोगं ॥

भगिवे भेसं ॥

सुफिले देसं ॥४१९॥

अचल धरमं ॥

अखिल करमं ॥

अमित जोगं ॥

तजित भोगं ॥४२०॥

सुफल करमं ॥

सुब्रित धरमं ॥

कुक्रित हंता ॥

सुगतं गंता ॥४२१॥

दलितं द्रोहं ॥

मलितं मोहं ॥

सलितं सारं ॥

सुक्रित चारं ॥४२२॥

भगवे भेसं ॥

सुफलं देसं ॥

सुह्रिदं सरता ॥

कुक्रितं हरता ॥४२३॥

चक्रितं सूरं ॥

बमतं नूरं ॥

एकं जपितं ॥

एको थपितं ॥४२४॥

राजं तजित्वं ॥

ईसं भवित्वं ॥

जपं जपित्वं ॥

एकं थपित्वं ॥४२५॥

बजतं नादं ॥

बिदितं रागं ॥

जपतं जापं ॥

त्रसितं तापं ॥४२६॥

चकितं चंदं ॥

धकतं इंदं ॥

तकतं देवं ॥

भगतं भेवं ॥४२७॥

भ्रमतं भूतं ॥

लखितं रूपं ॥

चक्रतं चारं ॥

सुह्रिदं सारं ॥४२८॥

नलिनं सूअं ॥

लखि अउधूअं ॥

चट दे छटा ॥

भ्रम ते जटा ॥४२९॥

तकितं देवं ॥

बकितं भेवं ॥

दस नव सीसं ॥

करमक दीसं ॥४३०॥

बुधितं धामं ॥

ग्रिहितं बामं ॥

भ्रमतं मोहं ॥

ममतं मोहं ॥४३१॥

ममता बुधं ॥

स्रिहतं लोगं ॥

अहिता धरमं ॥

लहितह भोगं ॥४३२॥

ग्रिसतं बुधं ॥

ममता मातं ॥

इसत्री नेहं ॥

पुत्रं भ्रातं ॥४३३॥

ग्रसतं मोहं ॥

धरितं कामं ॥

जलतं क्रोधं ॥

पलितं दामं ॥४३४॥

दलतं बियोधं ॥

तकितं दावं ॥

अंतह नरकं ॥

गंतह पावं ॥४३५॥

तजितं सरबं ॥

ग्रहितं एकं ॥

प्रभतं भावं ॥

तजितं द्वैखं ॥४३६॥

नलिनी सुकि जयं ॥

तजितं दिरबं ॥

सफली करमं ॥

लहितं सरबं ॥४३७॥

इति नलिनी सुक उनीसवो गुरू बरननं ॥१९॥


ਅਥ ਸਾਹ ਬੀਸਵੋ ਗੁਰੁ ਕਥਨੰ ॥ अथ साह बीसवो गुरु कथनं ॥ चौपई ॥

आगे चला दत जट धारी ॥

बेजत बेण बिखान अपारी ॥

असथावर लखि चेतन भए ॥

चेतन देख चक्रित ह्वै गए ॥४३८॥

महा रूप कछु कहा न जाई ॥

निरखि चक्रित रही सकल लुकाई ॥

जित जित जात पथहि रिखि ग्यो ॥

जानुक प्रेम मेघ बरख्यो ॥४३९॥

तह इक लखा साह धनवाना ॥

महा रूप धरि दिरब निधाना ॥

महा जोति अरु तेज अपारू ॥

आप घड़ा जानुक मुखि चारू ॥४४०॥

बिक्रिअ बीच अधिक सवधाना ॥

बिनु बिपार जिन अउर न जाना ॥

आस अनुरकत तासु ब्रित लागा ॥

मानहु महा जोग अनुरागा ॥४४१॥

तहा रिखि गए संगि संन्यासन ॥

कई छोहनी जात नही गनि ॥

ता के जाइ दुआर पर बैठे ॥

सकल मुनी मुनीराज इकैठे ॥४४२॥

साह सु दिरब ब्रित लग रहा ॥

रिखन ओर तिन चित्यो न कहा ॥

नेत्र मीच एकै धन आसा ॥

ऐस जानीअत महा उदासा ॥४४३॥

तह जे हुते राव अरु रंका ॥

मुनि पग परे छोर कै संका ॥

तिह बिपार करम कर भारी ॥

रिखीअन ओर न द्रिसटि पसारी ॥४४४॥

तासु देखि करि दत प्रभाऊ ॥

प्रगट कहा तज कै हठ भाऊ ॥

ऐस प्रेम प्रभु संग लगईऐ ॥

तब ही पुरखु पुरातन पईऐ ॥४४५॥

इति साह बीसवो गुरू समापतं ॥२०॥

ਅਥ ਸੁਕ ਪੜਾਵਤ ਨਰ ਇਕੀਸਵੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥

अथ सुक पड़ावत नर इकीसवो गुरू कथनं ॥ चौपई ॥

बीस गुरू करि आगे चला ॥

सीखे सरब जोग की कला ॥

अति प्रभाव अमितोजु प्रतापू ॥

जानुक साधि फिरा सब जापू ॥४४६॥

लीए बैठ देखा इक सूआ ॥

जिह समान जगि भयो न हूआ ॥

ता कहु नाथ सिखावत बानी ॥

एक टक परा अउर न जानी ॥४४७॥

संग लए रिखि सैन अपारी ॥

बडे बडे मोनी ब्रतिधारी ॥

ता के तीर तीर चलि गए ॥

तिनि नर ए नही देखत भए ॥४४८॥

सो नर सुकहि पड़ावत रहा ॥

इनै कछू मुख ते नही कहा ॥

निरखि निठुरता तिह मुनि राऊ ॥

पुलक प्रेम तन उपजा चाऊ ॥४४९॥

ऐसे नेहुं नाथ सो लावै ॥

तब ही परम पुरख कहु पावै ॥

इकीसवा गुरु ता कह कीआ ॥

मन बच करम मोल जनु लीआ ॥४५०॥

इति इकीसवों गुरु सुक पड़ावत नर समापतं ॥२१॥

अथि हर बाहत बाईसवो गुरू कथनं ॥

चौपई ॥

जब इकीस कर गुरू सिधारा ॥

हर बाहत इक पुरख निहारा ॥

ता की नारि महा सुखकारी ॥

पति की आस हीए जिह भारी ॥४५१॥

भता लए पानि चलि आई ॥

जनुक नाथ ग्रिह बोल पठाई ॥

हर बाहत तिन कछू न लहा ॥

त्रीआ को धिआन नाथ प्रति रहा ॥४५२॥

मुनि पति संगि लए रिख सैना ॥

मुख छबि देखि लजत जिह मैना ॥

तीर तीर ता के चलि गए ॥

मुनि पति बैठ रहत पछ भए ॥४५३॥

अनूप नराज छंद ॥

अनूप गात अतिभुतं बिभूत सोभतं तनं ॥

अछिज तेज जाजुलं अनंत मोहतं मनं ॥

ससोभ बसत्र रंगतं सुरंग गेरू अ्मबरं ॥

बिलोक देव दानवं ममोह गंध्रबं नरं ॥४५४॥

जटा बिलोकि जानवी जटी समान जानई ॥

बिलोकि लोक लोकिणं अलोकि रूप मानई ॥

बजंत चार किंकुरी भजंत भूत भैधरी ॥

पपात जछ किंन्रनी ममोह माननी मनं ॥४५५॥

बचित्र नारि चित्रणी पवित्र चित्रणं प्रभं ॥

र रीझ जछ गंध्रबं सुरारि नारि सु प्रभं ॥

कड़ंत क्रू किंन्रणी हसंत हास कामिणी ॥

लसंत दंतणं दुतं खिमंत जाणु दामिणी ॥४५६॥

दलंत पाप दुभरं चलंत मोनि सिमरं ॥

सुभंत भारगवं पटं बिअंत तेज उफणं ॥

परंत पानि भूचरं भ्रमंत सरबतो दिसं ॥

तजंत पाप नर बरं चलंत धरमणो मगं ॥४५७॥

बिलोकि बीरणो दयं अरुझ छत्र करमणं ॥

तजंति साइकं सितं कटंत टूक बरमणं ॥

थथ्मभ भानणो रथं बिलोकि कउतकं रणं ॥

गिरंत जुधणो छितं बमंत स्रोणतं मुखं ॥४५८॥

फिरंत चक्रणो चकं गिरंत जोधणो रणं ॥

उठंत क्रोध कै हठी ठठुकि क्रुधितं भुजं ॥

भ्रमंत अध बधतं कमध बधतं कटं ॥

परंत भूतलं भटं बकंत मारूड़ै रटं ॥४५९॥

पिपंत असव भटंत भिरंत दारुणो रणं ॥

बहंत तीछणो सरं झलंत झाल खड़िगिणं ॥

उठंत मारूड़ो रणं बकंत मारणो मुखं ॥

चलंत भाजि न हठी जुझंत दुधरं रणं ॥४६०॥

कटंत कारमं सुभं बचित्र चित्रतं क्रितं ॥

सिलेणि उजली क्रितं बहंत साइकं सुभं ॥

बिलोकि मोनिसं जुधं चचउध चक्रतं भवं ॥

ममोह आस्रमं गतं पपात भूतली सिरं ॥४६१॥

सभार भारग बसनिनं जजपि जापणो रिखं ॥

निहारि पान पै परा बिचार बाइसवो गुरं ॥

बिअंत जोगणो सधं असंख पापणो दलं ॥

अनेक चेलका लए रिखेस आसनं चलं ॥४६२॥

इति हर बाहता बाईसवो गुरू इसत्री भात लै आई समापतं ॥२२॥


ਅਥ ਤ੍ਰਿਆ ਜਛਣੀ ਤੇਈਸਮੋ ਗੁਰੂ ਕਥਨੰ ॥ अथ त्रिआ जछणी तेईसमो गुरू कथनं ॥ अनूप नराज छंद ॥

बजंत नाद दुधरं उठंत निसनं सुरं ॥

भजंत अरि दितं अघं बिलोकि भारगवं भिसं ॥

बिलोकि कंचनं गिरंत तज मानुखी भुअं ॥

स सुहक तापसी तनं अलोक लोकणो बपं ॥४६३॥

अनेक जछ गंध्रबं बसेख बिधिका धरी ॥

निरकत नागणी महा बसेख बासवी सुरी ॥

पवित्र परम पारबती अनूप आलकापती ॥

असकत आपितं महा बिसेख आसुरी सुरी ॥४६४॥

अनूप एक जछणी ममोह रागणो मनं ॥

घुमंत घूमणं छितं लगंत सारंगो सरं ॥

बिसारि नेह गेहणं सनेह रागणो मनं ॥

म्रिगीस जाणु घुमतं क्रितेण क्रिस क्रिती सरं ॥४६५॥

रझीझ रागणो चितं बदंत राग सुप्रभं ॥

बजंत किंगुरी करं ममोह आस्रमं गतं ॥

ससजि साइकं सितं कपंत कामणो कलं ॥

भ्रमंत भूतलं भलं भुगंत भामिणी दलं ॥४६६॥

तोमर छंद ॥

गुनवंत सील अपार ॥

दस चार चार उदार ॥

रस राग सरब सपंनि ॥

धरणी तला महि धंनि ॥४६७॥

इक राग गावत नारि ॥

गुणवंत सील अपार ॥

सुख धाम लोचन चारु ॥

संगीत करत बिचार ॥४६८॥

दुति मान रूप अपार ॥

गुणवंत सील उदार ॥

सुख सिंधु राग निधान ॥

हरि लेत हेरति प्रान ॥४६९॥

अकलंक जुबन मान ॥

सुख सिंधु सुंदरि थान ॥

इक चित गावत राग ॥

उफटंत जानु सुहाग ॥४७०॥

तिह पेख कै जटि राज ॥

संग लीन जोग समाज ॥

रहि रीझ आपन चित ॥

जुग राज जोग पवित ॥४७१॥

इह भांति जो हरि संग ॥

हित कीजीऐ अनभंग ॥

तब पाईऐ हरि लोक ॥

इह बात मै नही सोक ॥४७२॥

चित चउप सो भर चाइ ॥

गुर जानि कै परि पाइ ॥

चित तऊन के रस भीन ॥

गुरु तेईसवो तिह कीन ॥४७३॥

इति जछणी नारि राग गावती गुरू तेईसवो समापतं ॥२३॥

तोमर छंद ॥

तब बहुत बरख प्रमान ॥

चड़ि मेर स्रिंग महान ॥

कीअ घोर तपसा उग्र ॥

तब रीझए कछु सुग्र ॥४७४॥

जग देख के बिवहार ॥

मुनि राज कीन बिचार ॥

इन कउन सो उपजाइ? ॥

फिरि लेति आपि मिलाइ ॥४७५॥

तिह चीनीऐ करि गिआन ॥

तब होइ पूरण ध्यान ॥

तिह जाणीऐ जत जोग ॥

तब होइ देह अरोग ॥४७६॥

तब एक पुरख पछान ॥

जग नास जाहिन जान ॥

सब जगत को पति देखि ॥

अनभउ अनंत अभेख ॥४७७॥

बिन एक नाहिन साति ॥

सभ तीरथ कियुं न अनात ॥

जब सेविहो इकि नाम ॥

तब होइ पूरण काम ॥४७८॥

बिनु एक चौबिस फोक ॥

सब ही धरा सब लोक ॥

जिनि एक कउ पहिचान ॥

तिन चउबिसो रस मान ॥४७९॥

जे एक के रस भीन ॥

तिनि चउबिसो रसि लीन ॥

जिन एक को नही बूझ ॥

तिह चउबिसै नही सूझ ॥४८०॥

जिनि एक कौ नही चीन ॥

तिनि चउबिसै फल हीन ॥

जिन एक को पहिचान ॥

तिनि चउबिसै रस मान ॥४८१॥

बचित्र पद छंद ॥

एकहि जउ मनि आना ॥

दूसर भाव न जाना ॥

दुंदभि दउर बजाए ॥

फूल सुरन बरखाए ॥४८२॥

हरखे सब जट धारी ॥

गावत दे दे तारी ॥

जित तित डोलत फूले ॥

ग्रिह के सब दुख भूले ॥४८३॥

तारक छंद ॥

बहु बरख जबै तपसा तिह कीनी ॥

गुरदेव क्रिआ जु कही धर लीनी ॥

तब नाथ सनाथ हुऐ ब्योत बताई ॥

तब ही दसओ दिसि सूझ बनाई ॥४८४॥

दिज देव तबै गुर चउबिस कै कै ॥

गिरि मेर गए सभ ही मुनि लै कै ॥

तपसा जब घोर तहा तिन कीनी ॥

गुरदेव तबै तिह या सिख दीनी ॥४८५॥

तोटक छंद ॥

गिरि मेरु गए रिखि बालक लै ॥

धर सीस जटा भगवे पट कै ॥

तप घोर करा बहु बरख दिना ॥

हरि जाप न छोरस एक छिना ॥४८६॥

दस लछ सु बीस सहंस्र ब्रखं ॥

तप कीन तहा बहु भांति रिखं ॥

सब देसन देस चलाइ मतं ॥

मुनि देव महा मति गूड़ गतं ॥४८७॥

रिखि राज दसा जब अंत भई ॥

बल जोग हुते मुनि जान लई ॥

धूअरो जग धउलुर जानि जटी ॥

कछु अउर क्रिआ इह भांति ठटी ॥४८८॥

सधि कै पवनै रिख जोग बलं ॥

तजि चाल कलेवर भूमि तलं ॥

कल फोरि उताल कपाल कली ॥

तिह जोति सु जोतिह मध मिली ॥४८९॥

कल काल क्रवाल कराल लसै ॥

जग जंगम थावर सरब कसै ॥

जग कालहि जाल बिसाल रचा ॥

जिह बीच फसे बिन को न बचा ॥४९०॥

सवैया ॥

देस बिदेस नरेसन जीति; अनेस बडे अवनेस संघारे ॥

आठो ई सिध सबै नव निधि; सम्रिधन सरब भरे ग्रिह सारे ॥

चंद्रमुखी बनिता, बहुतै घरि; माल भरे, नही जात स्मभारे ॥

नाम बिहीन अधीन भए जम; अंति को नागे ही पाइ सिधारे ॥४९१॥

रावन के महिरावन के; मनु के नल के चलते न चली गउ ॥

भोज दिलीपति कौरवि कै; नही साथ दयो रघुनाथ बली कउ ॥

संगि चली अब लौ नही काहूं के; साच कहौ अघ ओघ दली सउ ॥

चेत रे! चेत, अचेत! महा पसु! काहू के संगि चली न हली हउ ॥४९२॥

साच और झूठ कहे बहुतै बिधि; काम करोध अनेक कमाए ॥

भाज निलाज बचा धन के डर; लोक गयो, परलोक गवाए ॥

दुआदस बरख पड़ा, न गुड़िओ जड़! राजीवि लोचन नाहिन पाए ॥

लाज बिहीन अधीन गहे जम; अंत के नागे ही पाइ सिधाए ॥४९३॥

काहे कउ बसत्र धरो भगवे? मुनि! ते सब पावक बीच जलैगी ॥

कियों इम रीत चलावत हो? दिन द्वैक चलै स्रबदा न चलैगी ॥

काल कराल की रीति महा इह; काहूं जुगेसि छली न छलैगी ॥

सुंदरि देह तुमारी महा मुनि! अंत मसान ह्वै धूरि रलैगी ॥४९४॥

काहे को पउन भछो? सुनि हो मुनि! पउन भछे कछू हाथि न ऐ है ॥

काहे को बसत्र करो भगवा? इन बातन सो भगवान न ह्वै है ॥

बेद पुरान प्रमान के देखहु; ते सब ही बस काल सबै है ॥

जारि अनंग न, नंग कहावत; सीस की संगि जटाऊ न जै है ॥४९५॥

कंचन कूट गिर्यो कहो काहे न; सातओ सागर कियों न सुकानो ॥

पसचम भानु उद्यो कहु काहे न; गंग बही उलटी अनुमानो ॥

अंति बसंत तप्यो रवि काहे न; चंद समान दिनीस प्रमानो ॥

कियों डमडोल डुबी न धरा; मुनि राज! निपातनि तियों जग जानो ॥४९६॥

अत्रि परासर नारद सारद; ब्यास ते आदि जिते मुन भाए ॥

गालव आदि अनंत मुनीस्वर; ब्रहम हूं ते नही जात गनाए ॥

अगसत पुलसत बसिसट ते आदि; न जान परे, किह देस सिधाए ॥

मंत्र चलाइ बनाइ महा मति; फेरि मिले पर फेर न आए ॥४९७॥

ब्रहम निरंध्र को फोरि मुनीस की; जोति सु जोति के मधि मिलानी ॥

प्रीति रली परमेसर सो इम; बेदन संगि मिलै जिम बानी ॥

पुंन कथा मुनि नंदन की; कहि कै मुख सो कबि स्याम बखानी ॥

पूरण धिआइ भयो तब ही; जय स्री जगनाथ भवेस भवानी ॥४९८॥

इति स्री बचित्र नाटक ग्रंथे दत महातमे रुद्रवतार प्रबंध समापतं ॥ सुभं भवेत गुरू चउबीस ॥२४॥



ੴ सतिगुर प्रसादि ॥


ਅਥ ਪਾਰਸ ਨਾਥ ਰੁਦ੍ਰ ਅਵਤਾਰ ਕਥਨੰ ॥ अथ पारस नाथ रुद्र अवतार कथनं ॥ पातसाही १० ॥

चौपई ॥

इह बिधि दत रुद्र अवतारा ॥

पूरण मत को कीन पसारा ॥

अंति जोति सो जोति मिलानी ॥

जिह बिधि सो पारब्रहम भवानी ॥१॥

एक लछ दस बरख प्रमाना ॥

पाछे चला जोग को बाना ॥

ग्यारव बरख बितीतत भयो ॥

पारसनाथ पुरख भूअ वयो ॥२॥

रोह देस सुभ दिन भल थानु ॥

परस नाथ भयो सुर ग्यानु ॥

अमित तेज असि अवर न होऊ ॥

चक्रत रहे मात पित दोऊ ॥३॥

दसऊ दिसनि तेज अति बढा ॥

द्वादस भान एक ह्वै चढा ॥

दह दिस लोक उठे अकुलाई ॥

भूपति तीर पुकारे जाई ॥४॥

सुनो भूप! इक कहों कहानी ॥

एक पुरख उपज्यो अभिमानी ॥

जिह सम रूप जगत नही कोई ॥

एकै घड़ा बिधाता सोई ॥५॥

कै गंध्रब जछ कोई अहा ॥

जानुक दूसर भानु चड़ रहा ॥

अति जोबन झमकत तिह अंगा ॥

निरखत जा के लजत अनंगा ॥६॥

भूपति देखन काज बुलावा ॥

पहिले द्योस साथ चल आवा ॥

हरख ह्रिदै धर के जटधारी ॥

जानुक दुती दत अवतारी ॥७॥

निरख रूप कापे जटधारी ॥

यह कोऊ भयो पुरखु अवतारी ॥

यह मत दूर हमारा कै है ॥

जटाधार कोई रहै न पै है ॥८॥

तेज प्रभाव निरखि तब राजा ॥

अति प्रसंनि पुलकत चित गाजा ॥

जिह जिहा लखा रहे बिसमाई ॥

जानुक रंक नवो निध पाई ॥९॥

मोहन जाल सभन सिर डारा ॥

चेटक बान चक्रित ह्वै मारा ॥

जह तह मोहि सकल नर गिरे ॥

जान सुभट सामुहि रण भिरे ॥१०॥

नर नारी जिह जिह तिह पेखा ॥

तिह तिह मदन रूप अविरेखा ॥

साधन सरब सिधि कर जाना ॥

जोगन जोग रूप अनुमाना ॥११॥

निरखि रूप रनवास लुभाना ॥

दे तिह सुता न्रिपति मनि माना ॥

न्रिप को भयो जबै जामाता ॥

महा धनुखधर बीर बिख्याता ॥१२॥

महा रूप अरु अमित प्रतापू ॥

जानु जपै है आपन जापू ॥

ससत्र सासत्र बेता सुरि ग्याना ॥

जा सम पंडित जगति न आना ॥१३॥

थोरि बहिक्रम बुधि बिसेखा ॥

जानुक धरा बितन यहि भेखा ॥

जिह जिह रूप तवन का लहा ॥

सो सो चमक चक्रि हुऐ रहा ॥१४॥

सवैया ॥

मान भरे सर सान धरे; मठ सान चड़े, असि स्रोणति साए ॥

लेत हरे जिह डीठ परे; नही फेरि फिरे ग्रिह जान न पाए ॥

झीम झरे जन सेल हरे; इह भांति गिरे, जनु देखन आए ॥

जासु हिरे सोऊ मैन घिरे; गिर भूमि परे, न उठंत उठाए ॥१५॥

सोभत जानु सुधासर सुंदर; काम के मानहु कूप सु धारे ॥

लाजि के जान जहाज बिराजत; हेरत ही हर लेत हकारे ॥

हउ चहु कुंट भ्रम्यो खग ज्यों; इन के सम रूप न नैकु निहारे ॥

पारथ बान कि जुबन खान; कि काल क्रिपान, कि काम कटारे ॥१६॥

तंत्र भरे किधौ जंत्र जरे; अर मंत्र हरे चख चीनत या ते ॥

जोबन जोति जगे अति सुंदर; रंग रंगे मद से मदूआ ते ॥

रंग सहाब फूल गुलाब से; सीखे है जोरि करोरक घाते ॥

माधुरी मूरति सुंदर सूरति; हेरति ही हर लेत हीया ते ॥१७॥

पान चबाइ सीगार बनाइ; सुगंध लगाइ सभा जब आवै ॥

किंनर जछ भुजंग चराचर; देव अदेव दोऊ बिसमावै ॥

मोहित जे महि लोगन माननि; मोहत तउन महा सुख पावै ॥

वारहि हीर अमोलक चीर; त्रीया बिन धीर सबै बल जावै ॥१८॥

रूप अपार पड़े दस चार; मनो असुरारि चतुर चक जान्यो ॥

आहव जुकति जितीक हुती; जग सरबन मै सब ही अनुमान्यो ॥

देसि बिदेसन जीत जुधांबर; क्रित चंदोव दसो दिस तान्यो ॥

देवन इंद्र गोपीन गोबिंद; निसा करि चंद समान पछान्यो ॥१९॥

चउधित चार दिसा भई चक्रत; भूमि अकास दुहूं पहिचाना ॥

जुध समान लख्यो जग जोधन; बोधन बोध महा अनुमाना ॥

सूर समान लखा दिन कै तिह; चंद सरूप निसा पहिचाना ॥

राननि रावि सवानिन साव; भवानिन भाव भलो मनि माना ॥२०॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

बितै बरख द्वै असट मासं प्रमानं ॥

भयो सुप्रभं सरब बिद्या निधानं ॥

जपै हिंगुला ठिंगुला पाण देवी ॥

अनासा छुधा अत्रधारी अभेवी ॥२१॥

जपै तोतला सीतला खग ताणी ॥

भ्रमा भैहरी भीम रूपा भवाणी ॥

चलाचल सिंघ झमाझम अत्रं ॥

हहा हूहि हासं झला झल छत्रं ॥२२॥

अटा अट हासं छटा छुट केसं ॥

असं ओध पाणं नमो क्रूर भेसं ॥

सिरमाल स्वछं लसै दंत पंतं ॥

भजै सत्रु गूड़ं प्रफुलंत संतं ॥२३॥

अलि्मपाति अरधी महा रूप राजै ॥

महा जोत ज्वालं करालं बिराजै ॥

त्रसै दुसट पुसटं हसै सुध साधं ॥

भजै पान दुरगा अरूपी अगाधं ॥२४॥

सुने उसतती भी भवानी क्रिपालं ॥

अधं उरधवी आप रूपी रसालं ॥

दए इख्वधी द्वै अभंगं खतंगं ॥

परस्यं धरं जान लोहं सुरंगं ॥२५॥

जबै ससत्र साधी सबै ससत्र पाए ॥

उघारे चूमे कंठ सीसं छुहाए ॥

लख्यो सरब रावं प्रभावं अपारं ॥

अजोनी अजै बेद बिदिआ बिचारं ॥२६॥

ग्रिहीतुआ जबै ससत्र असत्रं अपारं ॥

पड़े अनुभवं बेद बिदिआ बिचारं ॥

पड़े सरब बिदिआ हुती सरब देसं ॥

जिते सरब देसी सु असत्रं नरेसं ॥२७॥

पठे कागदं देस देसं अपारी ॥

करो आनि कै बेद बिद्या बिचारी ॥

जटे दंड मुंडी तपी ब्रहमचारी ॥

सधी स्रावगी बेद बिदिआ बिचारी ॥२८॥

हकारे सबै देस देसा नरेसं ॥

बुलाए सबै मोन मानी सु बेसं ॥

जटा धार जेते कहूं देख पईयै ॥

बुलावै तिसै नाथ भाखै बुलईयै ॥२९॥

फिरे सरब देसं नरेसं बुलावै ॥

मिले न तिसै छत्र छैणी छिनावै ॥

पठे पत्र एकै दिसा एक धावै ॥

जटी दंड मुंडी कहूं हाथ आवै ॥३०॥

रच्यो जग राजा चले सरब जोगी ॥

जहा लउ कोई बूढ बारो सभोगी ॥

कहा रंक राजा कहा नार होई ॥

रच्यो जग राजा चलिओ सरब कोई ॥३१॥

फिरे पत्र सरबत्र देसं अपारं ॥

जुरे सरब राजा न्रिपं आनि दुआरं ॥

जहा लौ हुते जगत मै जटाधारी ॥

मिलै रोह देसं भए भेख भारी ॥३२॥

जहा लउ हुते जोग जोगिसट साधे ॥

मले मुख बिभूतं सु लंगोट बाधे ॥

जटा सीस धारे निहारे अपारं ॥

महा जोग धारं सुबिदिआ बिचारं ॥३३॥

जिते सरब भूपं बुले सरब राजा ॥

चहूं चक मो दान नीसान बाजा ॥

मिले देस देसान अनेक मंत्री ॥

करै साधना जोग बाजंत्र तंत्री ॥३४॥

जिते सरब भूमि सथली संत आहे ॥

तिते सरब पारस नाथं बुलाए ॥

दए भांति अनेक भोज अरघ दानं ॥

लजी पेख देवि सथली मोन मानं ॥३५॥

करै बैठ के बेद बिदिआ बिचारं ॥

प्रकासो सबै आपु आपं प्रकारं ॥

टकं टक लागी मुखं मुखि पेखिओ ॥

सुन्यो कान हो तो सु तो आखि देखिओ ॥३६॥

प्रकासो सबै आप आपं पुराणं ॥

रड़ो देसि देसाण बिदिआ मुहाणं ॥

करो भांति भातं सु बिदिआ बिचारं ॥

न्रिभै चित दै कै महा त्रास टारं ॥३७॥

जुरे बंगसी राफिजी रोहि रूमी ॥

चले बालखी छाड कै राज भूमी ॥

न्रिभै भि्मभरी कासमीरी कंधारी ॥

कि कै कालमाखी कसे कासकारी ॥३८॥

जुरे दछणी ससत्र बेता अरयारे ॥

द्रुजै द्रावड़ी तपत तईलंग वारे ॥

परं पूरबी उत्र देसी अपारं ॥

मिले देस देसेण जोधा जुझारं ॥३९॥

पाधरी छंद ॥

इह भांति बीर बहु बीर जोरि ॥

मत देस देस राजा करोर ॥

दे हीर चीर बहु दिरब साज ॥

सनमान दान बहु भांति राज ॥४०॥

अनभै अभंग अवधूत छत्र ॥

अनजीत जुध बेता अति अत्र ॥

अनगंज सूर अबिचल जुझार ॥

रण रंग अभंग जिते हजार ॥४१॥

सब देस देस के जीत राव ॥

कर क्रुध जुध नाना उपाव ॥

कै साम दाम अरु दंड भेद ॥

अवनीप सरब जोरे अछेद ॥४२॥

जब सरब भूप जोरे महान ॥

जै जीत पत्र दिनो निसान ॥

दै हीर चीर अनभंग दिरब ॥

महिपाल मोहि डारे सु सरब ॥४३॥

इक दयोस बीत पारस्व राइ ॥

उतिसट देवि पूजंत जाइ ॥

उसतति किन बहु बिधि प्रकार ॥

सो कहो छंद मोहणि मझार ॥४४॥

मोहणी छंद ॥

जै देवी भेवी भावाणी ॥

भउ खंडी दुरगा सरबाणी ॥

केसरीआ बाही कऊमारी ॥

भैखंडी भैरवि उधारी ॥४५॥

अकलंका अत्री छत्राणी ॥

मोहणीअं सरबं लोकाणी ॥

रकतांगी सांगी सावित्री ॥

परमेस्री परमा पावित्री ॥४६॥

तोतलीआ जिहबा कऊमारी ॥

भव भरणी हरणी उधारी ॥

म्रिदु रूपा भूपा बुधाणी ॥

जै ज्मपै सुधं सिधाणी ॥४७॥

जग धारी भारी भगतायं ॥

करि धारी भारी मुकतायं ॥

सुंदर गोफणीआ गुरजाणी ॥

ते बरणी हरणी भामाणी ॥४८॥

भि्मभरीआ जछं सरबाणी ॥

गंधरबी सिधं चाराणी ॥

अकलंक सरूपं निरमलीअं ॥

घण मधे मानो चंचलीअं ॥४९॥

असिपाणं माणं लोकायं ॥

सुख करणी हरणी सोकायं ॥

दुसट हंती संतं उधारी ॥

अनछेदाभेदा कउमारी ॥५०॥

आनंदी गिरजा कउमारी ॥

अनछेदाभेदा उधारी ॥

अनगंज अभंजा खंकाली ॥

म्रिगनैणी रूपं उजाली ॥५१॥

रकतांगी रुद्रा पिंगाछी ॥

कटि कछी स्वछी हुलासी ॥

रकताली रामा धउलाली ॥

मोहणीआ माई खंकाली ॥५२॥

जगदानी मानी भावाणी ॥

भवखंडी दुरगा देवाणी ॥

रुद्रागी रुद्रा रकतांगी ॥

परमेसरी माई धरमांगी ॥५३॥

महिखासुर दरणी महिपाली ॥

चिछुरासर हंती खंकाली ॥

असि पाणी माणी देवाणी ॥

जै दाती दुरगा भावाणी ॥५४॥

पिंगाछी परमा पावित्री ॥

सावित्री संधिआ गाइत्री ॥

भै हरणी भीमा भामाणी ॥

जै देवी दुरगा देवाणी ॥५५॥

दुरगा दल गाही देवाणी ॥

भै खंडी सरबं भूताणी ॥

जै चंडी मुंडी सत्रु हंती ॥

जै दाती माता जैअंती ॥५६॥

संसरणी तराणी लोकाणी ॥

भि्मभराणी दरणी दईताणी ॥

केकरणी कारण लोकाणी ॥

दुख हरणी देवं इंद्राणी ॥५७॥

सु्मभ हंती जयंती खंकाली ॥

कंकड़ीआ रूपा रकताली ॥

तोतलीआ जिहवा सिंधुलीआ ॥

हिंगलीआ माता पिंगलीआ ॥५८॥

चंचाली चित्रा चित्रांगी ॥

भि्मभरीआ भीमा सरबांगी ॥

बुधि भूपा कूपा जुज्वाली ॥

अकलंका माई न्रिमाली ॥५९॥

उछलै लंकुड़ीआ छत्राला ॥

भि्मभरीआ भैरो भउहाला ॥

जै दाता माता जैदाणी ॥

लोकेसी दुरगा भावाणी ॥६०॥

समोही सरबं जगतायं ॥

निंद्रा छुध्या पिपासायं ॥

जै कालं राती सक्राणी ॥

उधारी भारी भगताणी ॥६१॥

जै माई गाई बेदाणी ॥

अनछिज अभिदा अखिदाणी ॥

भै हरणी सरबं संताणी ॥

जै दाता माता! क्रिपाणी! ॥६२॥

अचकड़ा छंद ॥ त्वप्रसादि ॥

अ्मबिका तोतला सीतला साकणी ॥

सिंधुरी सुप्रभा सुभ्रमा डाकणी ॥

सावजा स्मभिरी सिंधुला दुखहरी ॥

सुमिला स्मभिला सुप्रभा दुधरी ॥६३॥

भावना भै हरी भूतिली भैहरा ॥

टाकणी झाकणी साकणी सिंधुला ॥

दुधरा द्रुमुखा द्रुकटा दुधरी ॥

क्मपिला ज्मपिला हिंगुला भैहरी ॥६४॥

चित्रणी चापणी चारणी चछणी ॥

हिंगुला पिंगुला गंध्रबा जछणी ॥

बरमणी चरमणी परघणी पासणी ॥

खड़गणी गड़गणी सैथणी सापणी ॥६५॥

भीमड़ा समदड़ा हिंगुला कारतकी ॥

सुप्रभा अछिदा अधिरा मारतकी ॥

गिंगली हिंगुली ठिंगुली पिंगुला ॥

चिकणी चरकटा चरपटा चांवडा ॥६६॥

अछिदा अभिदा असिता अधरी ॥

अकटा अखंडा अछटा दुधरी ॥

अंजनी अ्मबिका असत्रणी धारणी ॥

अभरं अधरा जगति उधारणी ॥६७॥

अंजनी गंजनी साकड़ी सीतला ॥

सिधरी सुप्रभा सामला तोतला ॥

स्मभरी ग्मभरी अ्मभरी अकटा ॥

दुसला द्रुभिखा द्रुकटा अमिटा ॥६८॥

भैरवी भैहरी भूचरा भानवी ॥

त्रिकुटा चरपटा चांवडा मानवी ॥

जोबना जैकरी ज्मभहरी जालपा ॥

तोतला तुंदला दंतली कालिका ॥६९॥

भरमणा निभ्रमा भावना भैहरी ॥

बर बुधा दात्रणी सत्रणी छैकरी ॥

द्रुकटा द्रुभिदा दुधरा द्रुमदी ॥

अत्रुटा अछुटा अजटा अभिदी ॥७०॥

तंतला अंतला संतला सावजा ॥

भीमड़ा भैहरी भूतला बावजा ॥

डाकणी साकणी झाकणी काकिड़ा ॥

किंकड़ी कालिका जालपा जै म्रिड़ा ॥७१॥

ठिंगुला हिंगुला पिंगुला प्रासणी ॥

ससत्रणी असत्रणी सूलणी सासणी ॥

कंनिका अंनिका धंनिका धउलरी ॥

रकतिका सकतिका भकतका जैकरी ॥७२॥

झिंगड़ा पिंगड़ा जिंगड़ा जालपा ॥

जोगणी भोगणी रोग हरी कालिका ॥

चंचला चांवडा चाचरा चित्रता ॥

तंतरी भि्मभरी छत्रणी छिंछला ॥७३॥

दंतुला दामणी द्रुकटा द्रुभ्रमा ॥

छुधिता निंद्रका न्रिभिखा न्रिगमा ॥

कद्रका चूड़िका चाचका चापणी ॥

चिच्रड़ी चावड़ा चि्मपिला जापणी ॥७४॥

बिसनपद ॥ परज ॥ त्वप्रसादि कथता ॥

कैसे कै पाइन प्रभा उचारों? ॥

जानुक निपट अघट अम्रित; सम स्मपट सुभट बिचारो ॥

मन मधुकरहि चरन कमलन; पर ह्वै मनमत गुंजारो ॥

मात्रिक सपत सपित पितरन; कुल चौदहूं कुली उधारो ॥७५॥

बिसनपद ॥ काफी ॥

ता दिन देह सफल कर जानो ॥

जा दिन जगत मात प्रफुलित ह्वै; देहि बिजै बरदानो ॥

ता दिन ससत्र असत्र कटि बाधो; चंदन चित्र लगाऊं ॥

जा कहु नेत निगम कहि बोलत; तासु सु बरु जब पाऊं ॥७६॥

बिसनपद ॥ सोरठि ॥ त्वप्रसादि कथता ॥

अंतरजामी अभय भवानी ॥

अति ही निरखि प्रेम पारस को; चित की ब्रिथा पछानी ॥

आपन भगत जान भवखंडन; अभय रूप दिखायो ॥

चक्रत रहे पेखि मुनि जन सुर; अजर अमर पद पायो ॥७७॥

सोभित बामहि पानि क्रिपाणी ॥

जा तर जछ किंनर असुरन की; सब की क्रिया हिरानी ॥

जा तन मधु कीटभ कहु खंड्यो; सु्मभ निसु्मभ संघारे ॥

सोई क्रिपान निदान लगे जग; दाइन रहो हमारे ॥७८॥

जा तन बिड़ालाछ चिछ्रादिक; खंडन खंड उडाए ॥

धूलीकरन धूम्रलोचन के; मासन गिध रजाए ॥

राम रसूल किसन बिसनादिक; काल क्रवालहि कूटे ॥

कोटि उपाइ धाइ सभ थाके; बिन तिह भजन न छूटे ॥७९॥

बिसनपद ॥ सूही ॥ त्वप्रसादि कथता ॥

सोभित पानि क्रिपान उजारी ॥

जा तन इंद्र कोटि कई खंडे; बिसन क्रोरि त्रिपुरारी ॥

जा कहु राम उचर मुनि जन सब; सेवत धिआन लगाए ॥

तस तुम राम क्रिसन कई कोटिक; बार उपाइ मिटाए ॥८०॥

अनभव रूप सरूप अगंजन; कहो कवन बिधि गईयै? ॥

जिहबा सहंस्र रटत गुन थाकी; कबि जिहवेक, बतईयै ॥

भूमि अकास पतार जवन कर; चउदहि खंड बिहंडे ॥

जगमग जोति होति भूतलि मै; खंडन अउ ब्रहमंडे ॥८१॥

बिसनपद ॥ सोरठि ॥

जै जै रूप अरेख अपार! ॥

जासि पाइ भ्रमाइ जह तह; भीख को सिव दुआर ॥

जासि पाइ लग्यो निसेसिह; कारमा तन एक ॥

देवतेस सहंस्र भे भग; जासि पाइ अनेक ॥८२॥

क्रिसन राम भए किते; पुनि काल पाइ बिहान ॥

काल को अनकाल कै; अकलंक मूरति मान ॥

जासि पाइ भयो सभै जग; जास पाइ बिलान ॥

ताहि तै अबिचार जड़! करतार काहि न जान? ॥८३॥

नरहरि, जान काहि न लेत? ॥

तै भरोस पर्यो पसू! जिह मोहि बधि अचेत ॥

राम क्रिसन रसूल को; उठि लेत नितप्रति नाउ ॥

कहा वै अब जीअत जग मै? कहा तिन को गाउ? ॥८४॥

सोरठि ॥

तास किउ न पछानही? जे होहि है अब है ॥

निहफल काहे भजत पाहन? तोहि कछु फलि दै ॥

तासु सेवहु जास सेवति; होहि पूरण काम ॥

होहि मनसा सकल पूरण; लैत जा के नाम ॥८५॥

बिसनपद ॥ रामकली ॥ त्वप्रसादि ॥

इह बिधि कीनी जबै बडाई ॥

रीझे देव दिआल तिह उपर; पूरण पुरख सुखदाई ॥

आपनि मिले देवि दरसनि भयो; सिंघ करी असवारी ॥

लीने छत्र लंकुरा कूदत; नाचत गण दै तारी ॥८६॥

रामकली ॥

झमकत असत्र छटा ससत्रनि की; बाजत डउर अपार ॥

निरतत भूत प्रेत नाना बिधि; डहकत फिरत बैतार ॥

कुहकति फिरति काकणी, कुहरत; डहकत कठन मसान ॥

घहरति गगनि सघन रिख दहलत; बिचरत ब्योम बिवान ॥८७॥

देवी बाच ॥

बिसनपद ॥ सारंग ॥ त्वप्रसादि ॥

कछू बर मांगहु पूत सयाने! ॥

भूत भविख नही तुमरी सर; साध चरित हम जाने ॥

जो बरदान चहो, सो मांगो; सब हम तुमै दिवार ॥

कंचन रतन बज्र मुकताफल; लीजहि सकल सु धार ॥८८॥

पारस नाथ बाच ॥

बिसनपद ॥ सारंग ॥

सब ही पड़ो बेद बिदिआ बिधि; सब ही ससत्र चलाऊ ॥

सब ही देस जेर करि आपन; आपे मता मताऊ ॥

कहि तथासतु, भई लोप चंडिका; तास महा बर दै कै ॥

अंत्र ध्यान हुऐ गई आपन पर; सिंघ अरूड़त हुऐ कै ॥८९॥

बिसनपद ॥ गउरी ॥ त्वप्रसादि ॥

पारस करि डंडौत फिरि आए ॥

आवत बीर देस देसन ते; मानुख भेज बुलाए ॥

न्रिप को रूप बिलोकि सुभट सभ; चक्रित चित बिसमाए ॥

ऐसे कबही लखे नही राजा; जैसे आज लखाए ॥

चक्रित भई गगनि की बाला; गन उडगन बिरमाए ॥

झिमझिम मेघ बूंद ज्यों देवन; अमर पुहप बरखाए ॥

जानुक जुबन खान हुऐ निकसे; रूप सिंधु अनुवाए ॥

जानुक धारि निडर बसुधा पर; काम कलेवर आए ॥९०॥

बिसनपदि ॥ सारंग ॥ त्वप्रसादि ॥

भूपति परम ग्यान जब पायो ॥

मन बच करम कठन कर ता को; जौ करि ध्यान लगायो ॥

करि बहु न्यास कठन जपु साध्यो; दरसनि दीयो भवानी ॥

ततछिन परम ग्यान उपदेस्यो; लोक चतुरदस रानी ॥

तिह छिन सरब सासत्र मुख उचरे; तत अतत पछाना ॥

अवर अतत सबै कर जाने; एक तत ठहराना ॥

अनभव जोति अनूप प्रकासी; अनहद नाद बजायो ॥

देस बिदेस जीति राजन कहु; सुभट अभै पद पायो ॥९१॥

बिसनपद ॥ परज ॥

ऐसे अमरपद कहु पाइ ॥

देस अउर बिदेस भूपति; जीति लीन बुलाइ ॥

भांति भांति भरे गुमान; निसान सरब बजाइ ॥

चउप चउप चले चमू्मपति; चित चउप बढाइ ॥

आनि आनि सबै लगे पग; भूप के जुहराइ ॥

आव आव सुभाव सो कहि; लीन कंठ लगाइ ॥

हीर चीर सु बाज दै गज; राज दै पहिराइ ॥

साध दै सनमान कै कर; लीन चित चुराइ ॥९२॥

बिसनपद ॥ काफी ॥ त्वप्रसादि ॥

इम कर दान दै सनमान ॥

भांति भांति बिमोहि भूपति; भूप बुध निधान ॥

भांति भांतिन साज दै बर; बाज अउ गजराज ॥

आपने कीनो न्रिपं सब; पारसै महाराज ॥

लाल जाल प्रवाल बिद्रम; हीर चीर अनंत ॥

लछ लछ स्वरण सिंङी; दिज एक एक मिलंत ॥

मोहि भूपित भूमि कै; इक कीन जग बनाइ ॥

भांति भांति सभा बनाइ सु; बैठि भूपति आइ ॥९३॥

बिसनपद ॥ काफी ॥

इक दिन बैठे सभा बनाई ॥

बडे बडे छत्री बसुधा के; लीने निकटि बुलाई ॥

अरु जे हुते देस देसन मति; ते भी सरब बुलाए ॥

सुनि इह भांति सरब जटधारी; देस देस ते आए ॥

नाना भांति जटन कह धारे; अरु मुख बिभूत लगाए ॥

बलकुल अंगि दीरघ नख सोभत; म्रिगपति देख लजाए ॥

मुंद्रत नेत्र ऊरध कर ओपत; परम काछनी काछे ॥

निस दिन जप्यो करत दतात्रै; महा मुनीसर आछे ॥९४॥

पारसनाथ बाच ॥ धनासरी ॥ त्वप्रसादि ॥

कै तुम हम को परचौ दिखाओ ॥

नातर जिते तुम हो जटधारी; सबही जटा मुंडाओ ॥

जोगी! जोगु जटन के भीतर; जे कर कछूअक होई ॥

तउ हरि ध्यान छोरि दर दर ते; भीख न मांगै कोई ॥

जे कर महा तत कहु चीनै; परम तत कहु पावै ॥

तब यह मोन साधि मनि बैठे; अनत न खोजन धावै ॥

जा की रूप रेख नही जानीऐ; सदा अद्वैख कहायो ॥

जउन अभेख रेख नही, सो कहु; भेख बिखै किउ आयो? ॥९५॥

बिसनपद ॥ सारंग ॥ त्वप्रसादि ॥

जे जे तिन मै हुते सयाने ॥

पारस परम तत के बेता; महा परम कर माने ॥

सबहनि सीस न्याइ करि जोरे; इह बिधि संगि बखाने ॥

जो जो गुरू कहा, सो कीना; अउर हम कछू न जाने ॥

सुनहो महाराज राजन के! जो तुम बचन बखाने ॥

सो हम दत बकत्र ते सुन करि; साच हीऐ अनुमाने ॥

जानुक परम अम्रित ते निकसे; महा रसन रस साने ॥

जो जो बचन भए इह मुखि ते; सो सो सब हम माने ॥९६॥

बिसनपद ॥ सोरठि ॥

जोगी जोगु जटन मो नाही ॥

भ्रम भ्रम मरत कहा पचि पचि करि? देखि समझ मन माही ॥

जो जन महा तत कहु जानै; परम ग्यान कहु पावै ॥

तब यह एक ठउर मनु राखै; दरि दरि भ्रमत न धावै ॥

कहा भयो? ग्रिह तजि उठि भागे; बन मै कीन निवासा ॥

मन तो रहा सदा घर ही मो; सो नही भयो उदासा ॥

अधिक प्रपंच दिखाइआ ठगा जग; जानि जोग को जोरा ॥

तुम जीअ लखा तजी हम माया; माया तुमै न छोरा ॥९७॥

बिसनपद ॥ सोरठि ॥

भेखी! जोग न भेख दिखाए ॥

नाहन जटा बिभूत नखन मै; नाहिन बसत्र रंगाए ॥

जो बनि बसै जोग कहु पईऐ; पंछी सदा बसत बनि ॥

कुंचर सदा धूरि सिरि मेलत; देखहु समझ तुम ही मनि ॥

दादुर मीन सदा तीरथ मो; कर्यो करत इसनाना ॥

ध्यान बिड़ाल बकी बक लावत; तिन, किआ जोगु पछाना? ॥

जैसे कसट ठगन कर ठाटत; ऐसे हरि हित कीजै ॥

तब ही महा ग्यान को जानै; परम पयूखहि पीजै ॥९८॥

बिसनपद ॥ सारंग ॥

सुनि सुनि ऐसे बचन सियाने ॥

उठि उठि महा बीर पारस के; पाइन सो लपटाने ॥

जे जे हुते मूड़ अगिआनी; तिन तिन बैन न माने ॥

उठि उठि लगे करन बकबादह; मूरख मुगध इआने ॥

उठि उठि भजे किते कानन को; केतकि जलहि समाने ॥

केतक भए जुध कहि प्रापति; सुनत सबदु घहराने ॥

केतक आनि आनि सनमुखि भए; केतक छोरि पराने ॥

केतक जूझि सोभे रण मंडल; बासव लोकि सिधाने ॥९९॥

बिसनपद ॥ तिलंग ॥ त्वप्रसादि कथता ॥

जब ही संख सबद घहराए ॥

जे जे हुते सूर जटधारी; तिन तिन तुरंग नचाए ॥

चक्रत भई गगन की तरुनी; देव अदेव त्रसाए ॥

निरखत भयो सूर रथ थ्मभत; नैन निमेख न लाए ॥

ससत्र असत्र नाना बिधि छाडे; बाण प्रयोघ चलाए ॥

मानहु माह मेघ बूंदन ज्यों; बाण ब्यूह बरसाए ॥

चटपट चरम बरम पर चटके; दाझत त्रिणा लजाए ॥

स्रोणत भरे बसत्र सोभित, जनु; चाचर खेलि सिधाए ॥१००॥

बिसनपद ॥ किदारा ॥

इह बिधि भयो आहव घोर ॥

भांति भांति गिरे धरा पर; सूर सुंदर किसोर ॥

कोप कोप हठी घटी रणि; ससत्र असत्र चलाइ ॥

जूझि जूझि गए दिवालय; ढोल बोल बजाइ ॥

हाइ हाइ भई जहा तह; भाजि भाजि सु बीर ॥

पैठि पैठि गए त्रीआलै; हारि हारि अधीर ॥

अप्रमान छुटे सरान; दिसान भयो अंधिआर ॥

टूक टूक परे जहा तह; मारि मारि जुझार ॥१०१॥

बिसनपद ॥ देवगंधारी ॥

मारू सबदु सुहावन बाजै ॥

जे जे हुते सुभट रणि सुंदर; गहि गहि आयुध गाजे ॥

कवच पहरि पाखर सो डारी; अउरै आयुध साजे ॥

भरे गुमान सुभट सिंघन ज्यों; आहव भूमि बिराजे ॥

गहि गहि चले गदा गाजी सब; सुभट अयोधन काजे ॥

आहव भूमि सूर अस सोभे; निरखि इंद्र दुति लाजे ॥

टूक टूक हूऐ गिरे धरणि पर; आहव छोरि न भाजे ॥

प्रापति भए देव मंदर कहु; ससत्रन सुभट निवाजे ॥१०२॥

बिसनपद ॥ कलिआन ॥

दहदिस धाव भए जुझारे ॥

मुदगर गुफन गुरज गोलाले; पटसि परघ प्रहारे ॥

गिरि गिरि परे सुभट रन मंडलि; जानु बसंत खिलारे ॥

उठि उठि भए जुध कउ प्रापति; रोह भरे रजवारे ॥

भखि भखि बीर पीस दातन कह; रण मंडली हकारे ॥

बरछी बान क्रिपान गजाइधु; असत्र ससत्र स्मभारे ॥

भसमी भूत भए गंध्रब गण; दाझत देव पुकारे ॥

हम मत मंद चरण सरणागति; काहि न लेत उबारे? ॥१०३॥

मारू ॥

दोऊ दिस सुभट जबै जुरि आए ॥

दुंदभि ढोल म्रिदंग बजत सुनि; सावन मेघ लजाए ॥

देखन देव अदेव महा हव; चड़े बिमान सुहाए ॥

कंचन जटत खचे रतनन लखि; गंध्रब नगर रिसाए ॥

काछि कछि काछ कछे कछनी; चड़ि कोप भरे निजकाए ॥

कोऊ कोऊ रहे सुभट रण मंडलि; केई केई छाडि पराए ॥

झिमझिम महा मेघ परलै ज्यों; ब्रिंद बिसिख बरसाए ॥

ऐसो निरखि बडे कवतक कह; पारस आप सिधाए ॥१०४॥

बिसनपद ॥ भैरो ॥ त्वप्रसादि ॥

दै रे दै रे दीह दमामा ॥

करहौ रुंड मुंड बसुधा पर; लखत स्वरग की बामा ॥

धुकि धुकि परहि धरणि भारी भट; बीर बैताल रजाऊ ॥

भूत पिसाच डाकणी जोगण; काकण रुहर पिवाऊ ॥

भकि भकि उठे भीम भैरो रणि; अरध उरध संघारो ॥

इंद्र चंद सूरज बरणादिक; आज सभै चुनि मारो ॥

मोहि बर दान देवता दीना; जिह सरि अउर न कोई ॥

मै ही भयो जगत को करता; जो मै करौ सु होई ॥१०५॥

बिसनपद ॥ गउरी ॥ त्वप्रसादि कथता ॥

मो ते अउर बली को है? ॥

जउन मो ते जंग जीते; जुध मै कर जै ॥

इंद्र चंद उपिंद्र कौ; पल मधि जीतौ जाइ ॥

अउर ऐसो को भयो? रण मोहि जीते आइ ॥

सात सिंध सुकाइ डारो; नैकु रोसु करो ॥

जछ गंध्रब किंन्र कोर; करोर मोरि धरो ॥

देव और अदेव जीते; करे सबै गुलाम ॥

दिब दान दयो मुझै; छुऐ सकै को मुहि छाम ॥१०६॥

बिसनपद ॥ मारू ॥

यौ कहि पारस रोस बढायो ॥

दुंदभि ढोल बजाइ महा धुनि; सामुहि संन्यासनि धायो ॥

असत्र ससत्र नाना बिधि छडै; बाण प्रयोघ चलाए ॥

सुभट सनाहि पत्र चलदल ज्यों; बानन बेधि उडाए ॥

दुहदिस बान पान ते छूटे; दिनपति देह दुराना ॥

भूमि अकास एक जनु हुऐ गए; चाल चहूं चक माना ॥

इंदर चंद्र मुनिवर सब कांपे; बसु दिगिपाल डरानीय ॥

बरन कुबेर छाडि पुर भाजे; दुतीय प्रलै करि मानीय ॥१०७॥

बिसनपद ॥ मारू ॥

सुरपुर नारि बधावा माना ॥

बरि है आज महा सुभटन कौ; समर सुय्मबर जाना ॥

लखि है एक पाइ ठाढी हम; जिम जिम सुभट जुझै है ॥

तिम तिम घालि पालकी आपन; अमरपुरी लै जै है ॥

चंदन चारु चित्र चंदन के; चंचल अंग चड़ाऊ ॥

जा दिन समर सुअ्मबर करि कै; परम पिअर वहि पाऊ ॥

ता दिन देह सफल करि मानो; अंग सींगार धरो ॥

जा दिन समर सुय्मबर सखी री! पारस नाथ बरो ॥१०८॥

बिसनपद ॥ काफी ॥

चहु दिस मारू सबद बजे ॥

गहि गहि गदा गुरज गाजी सब; हठि रणि आनि गजे ॥

बान कमान क्रिपान सैहथी; बाण प्रयोघ चलाए ॥

जानुक महा मेघ बूंदन ज्यों; बिसिख ब्यूहि बरसाए ॥

चटपट चरम बरम सब बेधे; सटपट पार पराने ॥

खटपट सरब भूमि के बेधे; नागन लोक सिधाने ॥

झमकत खड़ग काढि नाना बिधि; सैहथी सुभट चलावत ॥

जानुक प्रगट बाट सुर पुर की; नीके हिरदे दिखावत ॥१०९॥

बिसनपद ॥ सोरठि ॥

बानन बेधे अमित संनिआसी ॥

ते तज देह नेह स्मपति को; भए सुरग के बासी ॥

चरम बरम रथ धुजा पताका; बहु बिधि काटि गिराए ॥

सोभत भए इंद्र पुर जम पुर; सुर पुर निरख लजाए ॥

भूखन बसत्र रंग रंगन के; छुटि छुटि भूमि गिरे ॥

जनुक असोक बाग दिवपति के; पुहप बसंति झरे ॥

कटि कटि गिरे गजन कु्मभ सथल; मुकता बिथुरि परे ॥

जानुक अम्रित कुंड मुख छुटै; जल कन सुभग झरे ॥११०॥

देव गंधारी ॥

दूजी तरह ॥

दुह दिस परे बीर हकारि ॥

काढि काढि क्रिपाण धावत; मारु मारु उचारि ॥

पान रोकि सरोख रावत; क्रुध जुध फिरे ॥

गाहि गाहि गजी रथी; रणि अंति भूमि गिरे ॥

तानि तानि संधान बान; प्रमान कान सुबाहि ॥

बाहि बाहि फिरे सुबाहन; छत्र धरम निबाहि ॥

बेधि बेधि सु बान अंग; जुआन जुझे ऐस ॥

भूरि भारथ के समे; सर सेज भीखम जैस ॥१११॥

बिसनपद ॥ सारंग ॥

इह बिधि बहुतु संनिआसी मारे ॥

केतिक बांधि बारि मो बोरे; किते अगनि मो सारे ॥

केतन एक हाथ कटि डारे; केतिन के द्वै हाथ ॥

तिल तिल पाइ रथी कटि डारे; कटे कितन के माथ ॥

छत्र चम्र रथ बाज कितने के; काटि काटि रणि डारे ॥

केतन मुकट लकुट लै तोरे; केतन जूट उपारे ॥

भकि भकि गिरे भि्मभर बसुधा पर; घाइ अंग भिभरारे ॥

जानुक अंत बसंत समै मिलि; चाचर खेल सिधारे ॥११२॥

बिसनपद ॥ अडान ॥

चुपरे चारु चिकने केस ॥

आनि आनि फिरी चहूं दिसि; नारि नागरि भेस ॥

चिबक चारु सु धार बेसर; डारि काजर नैन ॥

जीव जंतन का चली? चित लेत चोर सु मैन ॥

देख री सुकुमार सुंदर; आजु बर है बीर ॥

बीन बीन धरो सबंगन; सुध केसरि चीर ॥

चीन चीन बरि है सुबाह; सु मध जुध उछाह ॥

तेग तीरन बान बरछन; जीत करि है बयाह ॥११३॥

बिसनपद ॥ सोरठि ॥

कहा लौ उपमा इती करौ? ॥

ग्रंथ बढन के काज सुनहु जू! चित मै अधिक डरौ ॥

तउ सुधारि बिचार कथा; कहि कहि संछेप बखानो ॥

जैसे तव प्रताप के बल ते; जथा सकति अनुमानो ॥

जब पारस इह बिधि रन मंड्यो; नाना ससत्र चलाए ॥

हते सु हते जीअ लै भाजे; चहुं दिस गए पराए ॥

जे हठ तिआगि आनि पग लागे; ते सब लए बचाई ॥

भूखन बसन बहुतु बिधि दीने; दै दै बहुत बडाई ॥११४॥

बिसनपद ॥ काफी ॥

पारस नाथ बडो रण पार्यो ॥

आपन प्रचुर जगत मतु कीना; देवदत को टार्यो ॥

लै लै ससत्र असत्र नाना बिधि; भांति अनिक अरि मारे ॥

जीते परम पुरख पारस के; सगल जटा धर हारे ॥

बेख बेख भट परे धरन गिरि; बाण प्रयोघन घाए ॥

जानुक परम लोक पावन कहु; प्रानन पंख लगाए ॥

टूक टूक ह्वै गिरे कवच कटि; परम प्रभा कहु पाई ॥

जणु दै चले निसाण सुरग कह; कुलहि कलंक मिटाई ॥११५॥

बिसनपद ॥ सूही ॥

पारस नाथ बडो रण जीतो ॥

जानुक भई दूसर करणारजुन; भारथ सो हुइ बीतो ॥

बहु बिधि चलै प्रवाहि स्रोण के; रथ गज असव बहाए ॥

भै कर जान भयो बड आहव; सात समुंदर लजाए ॥

जह तह चले भाज संनिआसी; बाणन अंग प्रहारे ॥

जानुक बज्र इंद्र के भै ते; पब सपछ सिधारे ॥

जिह तिह गिरत स्रोण की धारा; अरि घूमत भिभरात ॥

निंदा करत छत्रीय धरम की; भजत दसो दिस जात ॥११६॥

बिसनपद ॥ सोरठि ॥

जेतक जीअत बचे संन्यासी ॥

त्रास मरत फिरि बहुरि न आए; होत भए बनबासी ॥

देस बिदेस ढूंढ बन बेहड़; तह तह पकरि संघारे ॥

खोजि पताल अकास सुरग कहु; जहा तहा चुनि मारे ॥

इह बिधि नास करे संनिआसी; आपन मतह मतायो ॥

आपन न्यास सिखाइ सबन कहु; आपन मंत्र चलायो ॥

जे जे गहे तिन ते घाइल; तिन की जटा मुंडाई ॥

दोही दूर दत की कीनी; आपन फेरि दुहाई ॥११७॥

बिसनपद ॥ बसंत ॥

इह बिधि फाग क्रिपानन खेले ॥

सोभत ढाल माल डफ मालै; मूठ गुलालन सेले ॥

जानु तुफंग भरत पिचकारी; सूरन अंग लगावत ॥

निकसत स्रोण अधिक छबि उपजत; केसर जानु सुहावत ॥

स्रोणत भरी जटा अति सोभत; छबहि न जात कह्यो ॥

मानहु परम प्रेम सौ डार्यो; ईंगर लागि रह्यो ॥

जह तह गिरत भए नाना बिधि; सांगन सत्रु परोए ॥

जानुक खेल धमार पसारि कै; अधिक स्रमित ह्वै सोए ॥११८॥

बिसनपद ॥ परज ॥

दस सै बरख राज तिन कीना ॥

कै कै दूर दत के मत कहु; राज जोग दोऊ लीना ॥

जे जे छपे लुके कहूं बाचे; रहि रहि वहै गए ॥

ऐसे एक नाम लैबे को; जग मो रहत भए ॥

भांति भांति सौ राज करत यौ; भांति भांति धन जोर्यो ॥

जहा जहा मानस स्रउनन सुन; तहा तहा ते तोर्यो ॥

इह बिधि जीत देस पुर देसन; जीत निसान बजायो ॥

आपन करण कारण करि मान्यो; काल पुरख बिसरायो ॥११९॥

रूआमल छंद ॥

दस सहंस्र प्रमाण बरखन; कीन राज सुधारि ॥

भांति भांति धरान लै; अरु सत्रु सरब संघारि ॥

जीति जीति अनूप भूप; अनूप रूप अपार ॥

भूप मेध ठट्यो न्रिपोतम; एक जग सुधारि ॥१२०॥

देस देसन के नरेसन; बाधि कै इक बारि ॥

रोह देस बिखै गयो लै; पुत्र मित्र कुमार ॥

नारि संजुत बैठि बिधवत; कीन जग अर्मभ ॥

बोलि बोलि करोर रितज; और बिप अस्मभ ॥१२१॥

राजमेध कर्यो लगै; आर्मभ भूप अपार ॥

भांति भांति सम्रिध जोरि; सुमित्र पुत्र कुमार ॥

भांति अनेकन के जुरे जन; आनि कै तिह देस ॥

छीनि छीनि लए न्रिपाबर; देस दिरब अविनेस ॥१२२॥

देख के इह भांति सरब सु; भूप स्मपति नैण ॥

गरब सो भुज दंड कै; इह भांति बोला बैण ॥

भूप मेध करो सबै तुम; आज जग अर्मभ ॥

सतजुग माहि भयो जिही बिधि; कीन राजै ज्मभ ॥१२३॥

मंत्रीय बाच ॥

लछ जउ न्रिप मारीयै; तब होत है न्रिप मेध ॥

एक एक अनेक स्मपति; दीजीयै भविखेध ॥

लछ लछ तुरंग एकहि; दीजीऐ अबिचार ॥

जग पूरण होतु है; सुन, राज राज वतार! ॥१२४॥

भांति भांति सुम्रिध स्मपति; दीजीयै इक बार ॥

लछ हसत, तुरंग द्वै लछ; सुवरन भार अपार ॥

कोटि कोटि दिजेक एकहि; दीजीयै अबिल्मब ॥

जग पूरण होइ तउ; सुन, राज राज अस्मभ! ॥१२५॥

पारसनाथ बाच ॥

रूआल छंद ॥

सुवरन की न इती कमी; जउ टुट है बहु बरख ॥

हसत की न कमी मुझै; हय सार लीजै परख ॥

अउर जउ धन चाहीयै; सो लीजीयै अबिचार ॥

चित मै न कछू करो; सुन मंत्र मित्र अवतार! ॥१२६॥

यउ जबै न्रिप उचर्यो; तब मंत्रि बर सुनि बैन ॥

हाथ जोरि सलाम कै; न्रिप नीच कै जुग नैन ॥

अउर एक सुनो न्रिपोतम! उचरौं इक गाथ ॥

जौन मधि सुनी पुरानन; अउर सिम्रित साथ ॥१२७॥

मंत्री बाच ॥

रूआल छंद ॥

अउर जो सभ देस के न्रिप; जीतीयै सुनि भूप! ॥

परम रूप पवित्र गात; अपवित्र हरण सरूप ॥

ऐस जउ सुनि भूप भूपति! सभ पूछीआ तिह गाथ ॥

पूछ आउ सबै न्रिपालन; हउ कहो तुह साथ ॥१२८॥

यौ कहे जब बैन भूपति; मंत्रि बर सुनि धाइ ॥

पंच लछ बुलाइ भूपति; पूछ सरब बुलाइ ॥

अउर सात हूं लोक भीतर; देहु अउर बताइ ॥

जउन जउन न जीतिआ न्रिप; रोस कै न्रिप राइ ॥१२९॥

देखि देखि रहे सबै; तर को, न देत बिचार ॥

ऐस कउन रहा धरा पर? देहु ताहि उचार ॥

एक एक बुलाइ भूपति; पूछ सरब बुलाइ ॥

को अजीत रहा नही; जिह ठउर देहु बताइ ॥१३०॥

एक न्रिप बाच ॥

रूआल छंद ॥

एक भूपति उचरो; सुनि लेहु राजा! बैन ॥

जान माफ करो, कहो तब; राज राज सु नैन! ॥

एक है मुनि सिंधु मै; अरु मछ के उर माहि ॥

मोहि राव बिबेक भाखौ; ताहि भूपति नाहि! ॥१३१॥

एक द्योस जटधरी; न्रिप कीनु छीर प्रवेस ॥

चित्र रूप हुती तहा इक; नारि नागर भेस ॥

तासु देखि सिवेस को; गिर बिंद सिंध मझार ॥

मछ पेट मछंद्र जोगी; बैठि है न्रिप! बार ॥१३२॥

तासु ते चल पुछीऐ; न्रिप सरब बात बिबेक ॥

एन तोहि बताइ है; न्रिप! भाखि हो जु अनेक ॥

ऐस बात सुनी जबै; तब राज राज अवतार ॥

सिंधु खोजन को चला; लै जगत के सब जार ॥१३३॥

भांति भांति मंगाइ जालन; संग लै दल सरब ॥

जीत दुंदभ दै चला; न्रिप जानि कै जीअ गरब ॥

मंत्री मित्र कुमारि स्मपत; सरब मधि बुलाइ ॥

सिंध जार डरे जहा तहा; मछ सत्रु डराइ ॥१३४॥

भांति भातन मछ कछप; अउर जीव अपार ॥

बधि जारन ह्वै कढे; तब तिआगि प्रान सु धार ॥

सिंधु तीर गए जबै; जल जीव एकै बार ॥

ऐस भांति भए बखानत; सिंधु पै मत सार ॥१३५॥

बिप को धरि सिंधु मूरति; आइयो तिह पासि ॥

रतन हीर प्रवाल मानक; दीन है अनिआस ॥

जीव काहि संघारीऐ? सुनि लीजीऐ न्रिप! बैन ॥

जउन कारज को चले तुम; सो नही इह ठैन ॥१३६॥

सिंधु बाच ॥

रूआल छंद ॥

छीर सागर है जहा; सुन राज राज वतार! ॥

मछ उदर मछंद्र जोगी; बैठ है ब्रत धारि ॥

डारि जार निकार ताकहि; पूछ लेहु बनाइ ॥

जो कहा सो कीजीऐ न्रिप! इही सति उपाइ ॥१३७॥

जोरि बीरन नाख सिंधह; आग चाल सुबाह ॥

हूर पूर रही जहा तहा; जत्र तत्र उछाह ॥

भांति भांति बजंत्र बाजत; अउर घुरत निसान ॥

छीर सिंधु हुतो जहा; तिह ठाम पहुचे आनि ॥१३८॥

सूत्र जार बनाइ कै; तिह मधि डारि अपार ॥

अउर जीव घने गहे; न विलोकयो सिव बार ॥

हारि हारि फिरे सबै भट; आनि भूपति तीर ॥

अउर जीव घने गहे; पर सो न पाव फकीर ॥१३९॥

मछ पेटि मछंद्र जोगी; बैठ है बिनु आस ॥

जार भेट सकै न वा को; मोनि अंग सु बास ॥

एक जार सुना नयो; तिह डारीऐ अबिचार ॥

सति बात कहो तुमै; सुनि राज राज वतार! ॥१४०॥

गिआन नामु सुना हमो तिह; जार को न्रिप राइ! ॥

तउन ता मै डारि कै; मुनि राज! लेहु गहाइ ॥

यौ न हाथि परे मुनीसुर; बीत है बहु बरख ॥

सति बात कहौ तुमै; सुन लीजीऐ भरतरख! ॥१४१॥

यौ न पानि परे मुनाबर; होहिं कोटि उपाइ ॥

डार के तुम ग्यान जार सु; तासु लेहु गहाइ ॥

ग्यान जार जबै न्रिप्मबर; डार्यो तिह बीच ॥

तउन जार गहो मुनाबर; जानु दूज दधीच ॥१४२॥

मछ सहित मछिंद्र जोगी; बधि जार मझार ॥

मछ लोक बिलोकि कै सब; ह्वै गए बिस्मभार ॥

द्वै महूरत बिती जबै; सुधि पाइ कै कछु अंगि ॥

भूप द्वार गए सभै भट; बाधि असत्र उतंग ॥१४३॥

मछ उदर लगे सु चीरन; किउहूं न चीरा जाइ ॥

हारि हारि परै जबै; तब पूछ मित्र बुलाइ ॥

अउर कउन बिचारीऐ? उपचार ताकर आज ॥

द्रिसटि जा ते परै मुनीस्वर; सरे हमरो काजु ॥१४४॥

दोहरा ॥

मछ पेट किहूं न फटे; सब कर हटे उपाइ ॥

ग्यान गुरू तिन को हुतो; पूछा तहि बनाइ ॥१४५॥

तोटक छंद ॥

भट त्याग कै सब गरब ॥

न्रिप तीर बोलो सरब ॥

न्रिप! पूछीऐ गुर ग्यान ॥

कहि देइ तोहि बिधान ॥१४६॥

बिधि पूरि कै सुभ चार ॥

अरु ग्यान रीति बिचारि ॥

गुर! भाखीऐ मुहि भेव ॥

किम देखीऐ मुनि देव ॥१४७॥

गुर ग्यान बोल्यो बैन ॥

सुभ बाच सो सुख दैन ॥

छुरका बिबेक लै हाथ ॥

इह फारीऐ तिह साथ ॥१४८॥

तब काम तैसो ई कीन ॥

गुर ग्यान ज्यों सिख दीन ॥

गहि कै बिबेकहि हाथ ॥

तिह चीरिआ तिह साथ ॥१४९॥

जब चीरि पेट बनाइ ॥

तब देखए जग राइ ॥

जुत ध्यान मुंद्रत नैन ॥

बिनु आस चित न डुलैन ॥१५०॥

सत धात पुत्रा कीन ॥

मुनि द्रिसटि तर धर दीन ॥

जब छूटि रिखि के ध्यान ॥

तब भए भसम प्रमान ॥१५१॥

जो अउर द्रिग तरि आउ ॥

सोऊ जीअत जान न पाउ ॥

सो भसम होवत जानु ॥

बिनु प्रीति भगत न मानु ॥१५२॥

जब भए पुत्रा भसम ॥

जन अंधता रवि रसम ॥

पुनि पूछीआ तिहा जाइ ॥

मुनि राज! भेद बताइ ॥१५३॥

नराज छंद ॥

कउन भूप भूमि मै? बताइ मोहि दीजीयै ॥

जो मोहि त्रासि न त्रस्यो; क्रिपा रिखीस कीजीयै ॥

सु अउर कउन है हठी सु? जउन मो न जीतियो ॥

अत्रास कउन ठउर है? जहा न मोह बीतियो ॥१५४॥

न संक चित आनीयै; निसंक भाख दीजीयै ॥

सु को अजीत है रहा? उचार तासु कीजीयै ॥

नरेस देस देस के; असेस जीत मै लीए ॥

छितेस भेस भेस के; गुलाम आनि हूऐ रहे ॥१५५॥

असेख राज काज मो; लगाइ कै दीए ॥

अनंत तीरथ नाति कै; अछिन पुंन मै कीए ॥

अनंत छत्रीआन छै; दुरंत राज मै करो ॥

सो को तिहुं जहान मै; समाज जउन ते टरो ॥१५६॥

अनंग रंग रंग के; सुरंग बाज मै हरे ॥

बसेख राजसूइ जग बाजमेध मै करे ॥

न भूमि ऐस को रही; न जग ख्मभ जानीयै ॥

जगत्र करण कारण करि; दुतीय मोहि मानीयै ॥१५७॥

सु अत्र छत्र जे धरे; सु छत्र सूर सेवही ॥

अदंड खंड खंड के; सुदंड मोहि देवही ॥

सु ऐस अउर कौन है? प्रतापवान जानीऐ ॥

त्रिलोक आज के बिखै; जोगिंदर! मोहि मानीऐ ॥१५८॥

मछिंद्र बाच पारसनाथ सो ॥

सवैया ॥

कहा भयो? जो सभ ही जग जीति सु; लोगन को बहु त्रास दिखायो ॥

अउर कहा? जु पै देस बिदेसन; माहि, भले गज गाहि बधायो ॥

जो मनु जीतत है सभ देस; वहै तुमरै न्रिप! हाथि न आयो ॥

लाज गई, कछु काज सर्यो नही; लोक गयो, परलोक न पायो ॥१५९॥

भूमि को कउन गुमान है? भूपति! सो नही काहूं के संग चलै है ॥

है छलवंत बडी बसुधा यहि; काहूं की है नह काहूं हुऐ है ॥

भउन भंडार सबै बर नारि सु; अंति तुझै कोऊ साथ न दै है ॥

आन की बात चलात हो काहे कउ? संगि की देह न संगि सिधै है ॥१६०॥

राज के साज को कउन गुमान? निदान जु आपन संग न जै है ॥

भउन भंडार भरे घर बार सु; एक ही बार बिगान कहै है ॥

पुत्र कलत्र सु मित्र सखा कोई; अंति समै, तुहि साथ न दै है ॥

चेत रे! चेत अचेत महा पसु! संग बीयो, सो भी संग न जै है ॥१६१॥

कउन भरोस भटान को? भूपति! भार परे जिनि भार सहैंगे ॥

भाज है भीर भयानक हुऐ कर; भारथ सो नही भेर चहैंगे ॥

एक उपचार न चाल है राजन! मित्र सबै म्रित नीर बहैंगे ॥

पुत्र कलत्र सभै तुमरे न्रिप! छूटत प्रान, मसान कहैंगे ॥१६२॥

पारसनाथ बाच मछिंद्र सो ॥

तोमर छंद ॥

मुनि! कउन है वह राउ? ॥

तिह आज मोहि बताउ ॥

तिह जीत हो जब जाइ ॥

तब भाखीअउ मुहि राइ ॥१६३॥

मछिंद्र बाच पारसनाथ सो ॥

तोमर छंद ॥

सुन राज राजन हंस! ॥

भव भूमि के अवतंस ॥

तुहि जीतए सब राइ ॥

पर सो न जीतयो जाइ ॥१६४॥

अबिबेक है तिह नाउ ॥

तव हीय मै तिह ठाउ ॥

तिह जीत कही न भूप ॥

वह है सरूप अनूप ॥१६५॥

छपै छंद ॥

बलि महीप जिन छल्यो; ब्रहम बावन बस किनो ॥

किसन बिसन जिन हरे; दंड रघुपति ते लिनो ॥

दस ग्रीवहि जिनि हरा; सुभट सु्मभासुर खंड्यो ॥

महखासुर मरदीआ मान; मधु कीट बिहंड्यो ॥

सोऊ मदन राज राजा न्रिपति; न्रिप अबिबेक मंत्री कीयो ॥

जिह देव दईत गंध्रब मुनि; जीति अडंड डंडहि लीयो ॥१६६॥

जवन क्रुध जुध करण; कैरव रण घाए ॥

जासु कोप के कीन; सीस दस सीस गवाए ॥

जउन क्रुध के कीए; देव दानव रणि लुझे ॥

जासु क्रोध के कीन; खसट कुल जादव जुझे ॥

सोऊ ता समानु सैनाधिपति; जिदिन रोस वहु आइ है ॥

बिनु इक बिबेक सुनहो न्रिपति! अवर समुहि को जाइ है? ॥१६७॥

पारसनाथ बाच मछिंद्र सो ॥

छपै छंद ॥

सुनहु मछिंद्र! बैन; कहो तुहि बात बिचछन ॥

इक बिबेक अबिबेक; जगत द्वै न्रिपति सुलछन ॥

बड जोधा दुहूं संग; बडे दोऊ आप धनुरधर ॥

एक जाति इक पाति; एक ही मात जोधाबर ॥

इक तात एक ही बंस; पुनि बैर भाव दुह किम गहो? ॥

तिह नाम ठाम आभरण रथ; ससत्र असत्र सब मुनि! कहो ॥१६८॥

मछिंद्र बाच पारसनाथ सो ॥

छपै छंद ॥

असित बरण अबिबेक; असित बाजी रथ सोभत ॥

असित बसत्र तिह अंगि; निरखि नारी नर लोभत ॥

असित सारथी अग्र; असित आभरण रथोतम ॥

असित धनुख करि असित; धुजा जानुक पुरखोतम ॥

इह छबि नरेस अबिबेक न्रिप; जगत जयंकर मानीयै ॥

अनजित जासु कह न तजो; क्रिसन रूप तिह जानीयै ॥१६९॥

पुहप धनुख अलि पनच; मतस जिह धुजा बिराजै ॥

बाजत झाझर तूर; मधुर बीना धुनि बाजै ॥

सब बजंत्र जिह संग बजत; सुंदर छब सोहत ॥

संग सैन अबला स्मबूह; सुर नर मुनि मोहत ॥

अस मदन राज राजा न्रिपति; जिदिन क्रुध करि धाइ है ॥

बिनु इक बिबेक ता के समुहि; अउर दूसर को जाइ है? ॥१७०॥

करत न्रित सुंदरी; बजत बीना धुनि मंगल ॥

उपजत राग स्मबूह; बजत बैरारी बंगलि ॥

भैरव राग बसंत दीप; हिंडोल महा सुर ॥

उघटत तान तरंग; सुनत रीझत धुनि सुर नर ॥

इह छबि प्रभाव रितु राज न्रिप; जिदिन रोस करि धाइ है ॥

बिनु इक बिबेक ता के न्रिपति! अउर समुहि को जाइ है? ॥१७१॥

सोरठि सारंग सुध मलार; बिभास सरबि गनि ॥

रामकली हिंडोल गौड; गूजरी महा धुनि ॥

ललत परज गवरी मलार; कानड़ा महा छबि ॥

जाहि बिलोकत बीर सरब; तुमरे जै है दबि ॥

इह बिधि नरेस रितु राज न्रिप; मदन सूअन जब गरज है ॥

बिनु इक ग्यान सुन हो न्रिपति! सु अउर दूसर को बरजि है? ॥१७२॥

कऊधत दामनि सघन सघन; घोरत चहुदिस घन ॥

मोहित भामिन सघन; डरत बिरहनि त्रिय लखि मनि ॥

बोलत दादुर मोर; सघन झिली झिंकारत ॥

देखत द्रिगन प्रभाव अमित; मुनि मन ब्रित हारत ॥

इह बिधि हुलास मदनज दूसर; जिदिन चटक दै सटक है ॥

बिनु इक बिबेक सुनहो न्रिपति! अउर दूसर को हटक है? ॥१७३॥

त्रितीआ पुत्र अनंद; जिदिन ससत्रन कहु धरि है ॥

करि है चित्र बचित्र सु रण; सुर नर मुनि डरि है ॥

को भट धरि है धीर? जिदिन सामुहि वह ऐ है ॥

सभ को तेज प्रताप; छिनक भीतर हर लै है ॥

इह बिधि अनंद दुर धरख भट; जिदिन ससत्र गह मिक है ॥

बिनु इक धीरज सुनि रे न्रिपति! सु अउर न दूसरि टिक है ॥१७४॥

रतन जटत रथ सुभत; खचित बज्रन मुकताफल ॥

हीर चीर आभरण; धरे सारथी महाबल ॥

कनक देख कुररात; कठन कामिन ब्रित हारत ॥

तनि पट्मबर जरकसी; परम भूखन तन धारत ॥

इह छबि अनंद मदनज न्रिपति; जिदिन गरज दल गाहि है ॥

बिनु इक धीरज सुनि रे न्रिपति! सु अउर समुह को जाहि है? ॥१७५॥

धूम्र बरण सारथी; धूम्र बाजीरथ छाजत ॥

धूम्र बरण आभरण; निरखि सुर नर मुनि लाजत ॥

धूम्र नैन धूमरो गात; धूमर तिह भूखन ॥

धूम्र बदन ते बमत सरब; सत्रू कुल दूखन ॥

अस भरम मदन चतुरथ सुवन; जिदिन रोस करि धाइ है ॥

दल लूट कूट तुमरो न्रिपति! सु सरब छिनक महि जाइ है ॥१७६॥

अउर अउर जे सुभटि; गनो तिह नाम बिचछन ॥

बड जोधा बड सूर; बडे जितवार सुलच्छन ॥

कलहि नाम इक नारि; महा कल रूप कलह कर ॥

लोग चतुरदस माझि; जासु छोरा नही सुर नर ॥

सब ससत्र असत्र भीतर निपुण; अति प्रभाव तिह जानीऐ ॥

सब देस भेस अरु राज सब; त्रास जवन को मानीऐ ॥१७७॥

बैर नाम इक बीर; महा दुर धरख अजै रणि ॥

कबहु दीन नही पीठि; अनिक जीते जिह न्रिप गण ॥

लोचन स्रौणत बरण अरुण; सब ससत्र अंगि तिह ॥

रवि प्रकास सर धुजा; अरुण लाजत लखि छबि जिह ॥

इह भांति बैर बीरा बडै; जिदिन क्रुध करि गरजि है ॥

बिनु एक सांति सुन रे न्रिपति! सु अउर न दूसर बरजि है? ॥१७८॥

धूम्र धुजा रथ धूम्र; धूम्र सारथी बिराजत ॥

धूम्र बसत्र तन धरे; निरखि धूअरो मनि लाजत ॥

धूम्र धनुख कर छक्यो; बान धूमरे सुहाए ॥

सुर नर नाग भुजंग जछ; अरु असुर लजाए ॥

इह छबि प्रभाव आलस न्रिपति; जिदिन जुध कह जुट है ॥

उदम बिहीन सुन रे न्रिपति! अउर सकल दल फुट है ॥१७९॥

हरित धुजा अरु धनुख; हरित बाजी रथ सोभंत ॥

हरत बसत्र तन धरे; निरखि सुर नर मन मोहंत ॥

पवन बेग रथ चलत भ्रमन; बघूला लखि लजित ॥

सुनत स्रवन चक सबद मेघ; मन महि सुखु सजित ॥

इह छबि प्रताप मद नाम न्रिप; जिदिन तुरंग नचाइ है ॥

बिनु इक बिबेक सुन लै न्रिपति! ससु समरि न दूसर जाइ है ॥१८०॥

असित धुजा सारथी असित; बसत्रै अरु बाजी ॥

असित कवच तन कसे; तजत बाणन की राजी ॥

असित सकल तिह बरण; असित लोचन दुख मरदन ॥

असित मणिण के सकल अंगि; भूखण रुचि बरधन ॥

अस कुव्रिति बीर दुर धरख अति; जिदिन समर कह सजि है ॥

बिनु इक धीरज बीरत तजि; अउर सकल दल भजि है ॥१८१॥

चरम बरम कह धरे; धरम छत्री को धारत ॥

अजै जानि आपनहि; सरब रण सुभट पचारत ॥

धरन न आगै धीर; बीर जिह सामुह धावत ॥

सुर असुर अरु नर नारि; जछ गंध्रब गुन गावत ॥

इह बिधि गुमान जा दिन गरज; परम क्रोध कर ढूक है ॥

बिनु इक सील सुन न्रिपति न्रिपाणि; सु अउर सकल दल हूक है ॥१८२॥

कड़कि क्रोध करि चड़गु; भड़कि भादवि ज्यों गजत ॥

सड़क तेग दामिन तड़क; तड़भड़ रण सजत ॥

लुड़क लुथ बिथुरग; सेल सामुहि ह्वै घलत ॥

जिदिन रोस रावत रणहि; दूसर को झलत ॥

इह बिधि अपमान तिह भ्रात भन; जिदिन रुद्र रस मचि है ॥

बिन इक सील दुसील भट; सु अउर कवण रणि रचि है? ॥१८३॥

धनुख मंडलाकार; लगत जा को सदीव रण ॥

निरखत तेज प्रभाव; भटक भाजत है भट गण ॥

कउन बाधि ते धीर? बीर निरखत दुति लाजत ॥

नहन जुध ठहराति; त्रसत दसहूं दिस भाजत ॥

इह बिधि अनरथ समरथ रणि; जिदिन तुरंग मटक है ॥

बिनु इक धीर सुन बीर बरु; सु दूसर कउन हटकि है? ॥१८४॥

प्रीत बसत्र तनि धरे; धुजा पीअरी रथ धारे ॥

पीत धनुख करि सोभ; मान रति पति को टारे ॥

पीत बरण, सारथी पीत; बरणै रथ बाजी ॥

पीत बरन को बाण; खेति चड़ि गरजत गाजी ॥

इह भांति बैर सूरा न्रिपति! जिदिन गरजि दल गाहि है ॥

बिनु इक गिआन सवधान ह्वै; अउर समर को चाहि है? ॥१८५॥

मलित बसत्र तनि धरे; मलित भूखन रथ बाधे ॥

मलित मुकट सिर धरे; परम बाणण कह साधे ॥

मलित बरण सारथी; मलित ताहूं आभूखन ॥

मलयागर की गंध; सकल सत्रू कुल दूखन ॥

इह भांति निंद अनधर सुभट; जिदिन अयोधन मचि है ॥

बिनु इक धीरज सुन बीर बर; सु अउर कवण रणि रचि है? ॥१८६॥

घोर बसत्र तनि धरे; घोर पगीआ सिर बाधे ॥

घोर बरण सिरि मुकट; घोर सत्रन कह साधे ॥

घोर मंत्र मुख जपत; परम आघोर रूप तिह ॥

लखत स्वरग भहरात; घोर आभा लखि कै जिह ॥

इह भांति नरक दुर धरख भट; जिदिन रोसि रणि आइ है ॥

बिनु इक हरिनाम सुन हो न्रिपति! सु अउर न कोइ बचाइ है ॥१८७॥

समट सांग संग्रहै; सेल सामुहि ह्वै सुटै ॥

कलित क्रोध संजुगति; गलित गैवर जियों जुटै ॥

इक इक बिनु कीन; इक ते इक न चलै ॥

इक इक संग भिड़ै; ससत्र सनमुख ह्वै झलै ॥

इह बिधि नसील दुसील भट; सहत कुचील जबि गरजि है ॥

बिनु एक सुचहि सुनि न्रिप न्रिपणि! सु अउर न कोऊ बरजि है ॥१८८॥

ससत्र असत्र दोऊ निपुण; निपुण सब बेद सासत्र कर ॥

अरुण नेत्र अरु रकत बसत्र; ध्रितवान धनुरधर ॥

बिकट बाक्य बड ड्याछ; बडो अभिमान धरे मन ॥

अमित रूप अमितोज अभै; आलोक अजै रन ॥

अस सुभट छुधा त्रिसना सबल; जिदिन रंग रण रचि है ॥

बिनु इक न्रिपति! निग्रह बिना; अउर जीअ न लै बचि है ॥१८९॥

पवन बेग रथ चलत; सु छबि सावज तड़ता क्रित ॥

गिरत धरन सुंदरी; नैक जिह दिसि फिरि झाकत ॥

मदन मोह मन रहत; मनुछ देखि छबि लाजत ॥

उपजत हीय हुलास; निरखि दुति कह दुख भाजत ॥

इमि कपट देव अनजेव न्रिपु; जिदिन झटक दै धाइ है ॥

बिनु एक सांति सुनहो न्रिपति! सु अउर कवन समुहाइ है ॥१९०॥

चखन चारु चंचल प्रभाव; खंजन लखि लाजत ॥

गावत राग बसंत; बेण बीना धुनि बाजत ॥

धधकत ध्रिकट म्रिदंग; झांझ झालर सुभ सोहत ॥

खग म्रिग जछ भुजंग; असुर सुर नर मन मोहत ॥

अस लोभ नाम जोधा बडो; जिदिन जुध कह जुटि है ॥

जस पवन बेग ते मेघ गण; सु अस तव सब दल फुटि है ॥१९१॥

धुज प्रमाण बीजुरी; भुजा भारी जिह राजत ॥

अति चंचल रथ चलत; निरख सुर नर मुनि भाजत ॥

अधिक रूप अमितोज; अमिट जोधा रण दुह कर ॥

अति प्रताप बलवंत; लगत सत्रन कह रिपु हर ॥

अस मोह नाम जोधा जस; जिदिन जुध कह जुटि है ॥

बिन इक बिचार अबिचार न्रिप! अउर सकल दल फुटि है ॥१९२॥

पवन बेग रथ चलत; गवन लखि मोहित नागर ॥

अति प्रताप अमितोज; अजै प्रतमान प्रभाधर ॥

अति बलिसट अधिसट; सकल सैना कहु जानहु ॥

क्रोध नाम बढियाछ; बडो जोधा जीअ मानहु ॥

धरि अंगि कवच धर पनच करि; जिदिन तुरंग मटक है ॥

बिनु एक सांति सुन सति; न्रिप! सु अउर न कोऊ हटकि है ॥१९३॥

गलित दुरद मदि चड़्यो; कढि करवार भयंकर ॥

स्याम बरण आभरण; खचित सब नील मणिण बर ॥

स्वरन किंकणी जाल; बधे बानैत गजोतम ॥

अति प्रभाव जुति बीर; सिध सावंत नरोतम ॥

इह छबि हंकार नामा सुभट; अति बलिसट तिह मानीऐ ॥

जिह जगत जीव जीते सबै; आप अजीत तिह जानीऐ ॥१९४॥

सेत हसत आरूड़; ढुरत चहूं ओरि चवर बर ॥

स्वरण किंकणी बधे निरखि मोहत नारी नर ॥

सुभ्र सैहथी पाणि; प्रभा कर मै अस धावत ॥

निरखि दिपति दामनी प्रभा; हीयरे पछुतावत ॥

अस द्रोह नाम जोधा बडो; अति प्रभाव तिह जानीऐ ॥

जल थल बिदेस देसन न्रिपति; आन जवन की मानीऐ ॥१९५॥

तबल बाज घुंघरार; सीस कलगी जिह सोहत ॥

द्वै क्रिपाण गजगाह; निरखि नारी नर मोहत ॥

अमित रूप अमितोज; बिकट बानैत अमिट भट ॥

अति सुबाह अति सूर; अजै अनभिद सु अनकट ॥

इह भांति भरम अनभिद भट; जिदिन क्रुध जीय धार है ॥

बिन इक बिचार अबिचार न्रिप! ससु अउर न आनि उबारि है ॥१९६॥

लाल माल सुभ बधै; नगन सरपेचि खचित सिर ॥

अति बलिसट अनिभेद; अजै सावंत भटांबर ॥

कटि क्रिपाण सैहथी; तजत धारा बाणन कर ॥

देखत हसत प्रभाव; लजत तड़िता धाराधर ॥

अस ब्रहम दोख अनमोख भट; अकट अजै तिह जानीऐ ॥

अरि दवन अजै आनंद कर; न्रिप अबिबेक को मानीऐ ॥१९७॥

असित बसत्र अरु असित गात; अमितोज रणाचल ॥

अति प्रचंड अति बीर; बीर जीते जिन जल थल ॥

अकट अजै अनभेद; अमिट अनरथि नाम तिह ॥

अति प्रमाथ अरि मथन; सत्रु सोखन है ब्रिद जिह ॥

दुर धरख सूर अनभेद भट; अति प्रताप तिह जानीऐ ॥

अनजै, अनंद दाता अपन; अति सुबाह तिह मानीऐ ॥१९८॥

मोर बरण रथ बाज; मोर ही बरण परम जिह ॥

अमित तेज दुर धरख; सत्रु लख कर क्मपत तिह ॥

अमिट बीर आजान बाहु; आलोक रूप गन ॥

मतस केतु लखि जाहि; ह्रिदै लाजत है दुति मनि ॥

अस झूठ रूठि जिदिन न्रिपति; रणहि तुरंग उथकि है ॥

बिनु इक सति सुण सति न्रिप! सु अउर न आनि हटकि है ॥१९९॥

रथ तुरंग सित असित; असित सित धुजा बिराजत ॥

असित सेतहि बसत्र निरखि; सुर नर मुनि लाजत ॥

असित सेत सारथी; असित सेत छकिओ रथांबर ॥

सुवरण किंकनी केस; जनुक दूसरे देवेसुर ॥

इह छबि प्रभाव मिथिआ सुभट; अति बलिसट तिह कह कह्यो ॥

जिह जगत जीव जीते सबै; नहि अजीत नर को रह्यो ॥२००॥

चक्र बक्र कर धरे; चारु बागा तनि धारे ॥

आनन खात त्मबोल; गंधि उतम बिसथारे ॥

चवरु चारु चहूं ओरि ढुरत; सुंदर छबि पावत ॥

निरखत नैन बसंत प्रभा; ताकह सिर न्यावत ॥

इह बिधि सुबाहु चिंता सुभट; अति दुर धरख बखानीऐ ॥

अनभंग गात अनभै सुभट; अति प्रचंड तिह मानीऐ ॥२०१॥

रूआल छंद ॥

लाल हीरन के धरे जिह; सीस पै बहु हार ॥

स्वरणी किंकणि सौ छक; गज राज पबाकार ॥

दुरद रूड़ दरिद्र नाम सु; बीर है सुनि भूप! ॥

कउन ता ते जीत है रण? आनि राज सरूप ॥२०२॥

जरकसी के बसत्र है; अरु परम बाजारूड़ ॥

परम रूप पवितर गात; अछिज रूप अगूड़ ॥

छत्र धरम धरे महा भट; बंस की जिह लाज ॥

संक नामा सूर सो; सब सूर है सिरताज ॥२०३॥

पिंग बाज नहे रथै; सहि अडिग बीर अखंड ॥

अंत रूप धरे मनो; अछिज गात प्रचंड ॥

नाम सूर असोभ ता कह; जानही सभ लोक ॥

कउन राव बिबेक है? जु न मानि है इह सोक ॥२०४॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

सजे स्याम बाजी रथं जासु जानो ॥

महा जंग जोधा अजै तासु मानो ॥

असंतुसट नाम महाबीर सोहै ॥

तिहूं लोक जा को बडो त्रास मोहै ॥२०५॥

चड़्यो तत ताजी सिराजीत सोभै ॥

सिरं जैत पत्रं लखे चंद्र छोभै ॥

अनास ऊच नामा महा सूर सोहै ॥

बडो छत्रधारी धरै छत्र जो है ॥२०६॥

रथं सेत बाजी सिराजीत सोहै ॥

लखे इंद्र बाजी तरै द्रिसट को है ॥

हठी बाबरी को हिंसा नाम जानो ॥

महा जंग जोधा अजै लोक मानो ॥२०७॥

सुभं संदली बाज राजी सिराजी ॥

लखे रूप ता को लजै इंद्र बाजी ॥

कुमंतं महा जंग जोधा जुझारं ॥

जलं वा थलं जेण जिते बरिआरं ॥२०८॥

चड़्यो बाज ताजी कोपतं सरूपं ॥

धरे चरम बरमं बिसालं अनूपं ॥

धुजा बध सिधं अलजा जुझारं ॥

बडो जंग जोधा सु क्रुधी बरारं ॥२०९॥

धरे छीन बसत्रं मलीनं दरिद्री ॥

धुजा फाट बसत्रं सु धारे उपद्री ॥

महा सूर चोरी करोरी समानं ॥

लसै तेज ऐसो लजै देखि स्वानं ॥२१०॥

फटे बसत्र सरबं सबै अंग धारे ॥

बधे सीस जारी बुरी अरध जारे ॥

चड़्यो भीम भैसं महा भीम रूपं ॥

बिभैचार जोधा कहो तास भूपं ॥२११॥

सभै सिआम बरणं सिरं सेत एकं ॥

नहे गरधपं स्यंदनेकं अनेकं ॥

धुजा स्याम बरणं भुजं भीम रूपं ॥

सरं स्रोणितं एक अछेक कूपं ॥२१२॥

महा जोध दारिद्र नामा जुझारं ॥

धरे चरम बरमं सु पाणं कुठारं ॥

बडो चित्र जोधी करोधी करालं ॥

तजै नासका नैन धूम्रं बरालं ॥२१३॥

रूआल छंद ॥

स्वामिघात क्रितघनता दोऊ; बीर है दुर धरख ॥

सत्रु सूरन के संघारक; सैन के भरतरख ॥

कउन दो थन सो जना; जु न मानि है तिहं त्रास ॥

रूप अनूप बिलोकि कै; भट भजै होइ उदास ॥२१४॥

मित्र दोख अरु राज दोख; सु एक ही है भ्रात ॥

एक बंस दुहूंन को; अर एक ही तिह मात ॥

छत्रि धरम धरे हठी; रण धाइ है जिह ओर ॥

कउन धीर धर भटांबर; लेत है झकझोर ॥२१५॥

ईरखा अरु उचाट ए दोऊ; जंग जोधा सूर ॥

भाजि है अविलोक कै अरु; रीझि है लखि हूर ॥

कउन धीर धरै भटांबर? जीति है सब सत्रु ॥

दंत लै त्रिण भाजि है भट; को न गहि है अत्र ॥२१६॥

घात अउर बसीकरण; बड बीर धीर अपार ॥

क्रूर करम कुठार पाणि; कराल दाड़ बरिआर ॥

बिज तेज अछिज गाति; अभिज रूप दुरंत ॥

कउन कउन न जीतिए? जिनि; जीव जंत महंत ॥२१७॥

आपदा अरु झूठता; अरु बीर बंस कुठार ॥

परम रूप दुर धरख गात; अमरख तेज अपार ॥

अंग अंगनि नंग बसत्र; न अंग बलकुल पात ॥

दुसट रूप दरिद्र धाम; सु बाण साधे सात ॥२१८॥

बियोग अउर अपराध नाम सु; धार है जब कोप ॥

कउन ठांढ सकै महा बलि? भाजि है बिनु ओप ॥

सूल सैथन पानि बान; स्मभारि है तव सूर ॥

भाजि है तजि लाज को; बिस्मभार ह्वै सब कूर ॥२१९॥

भानु की सर भेद जा दिन; तपि है रण सूर ॥

कउन धीर धरै महा भट? भाजि है सभ कूर ॥

ससत्र असत्रन छाडि कै; अरु बाज राज बिसारि ॥

काटि काटि सनाह तव भट; भाजि है बिस्मभार ॥२२०॥

धूम्र बरण अउ धूम्र नैन सु; सात धूम्र जुआल ॥

छीन बसत्र धरे सबै तन; क्रूर बरण कराल ॥

नाम आलस तवन को; सुनि राज राज वतार! ॥

कउन सूर संघारि है तिह? ससत्र असत्र प्रहार ॥२२१॥

तोटक छंद ॥

चड़ि है गहि कोप क्रिपाण रणं ॥

घमकंत कि घुंघर घोर घणं ॥

तिह नाम सु खेद अभेद भटं ॥

तिह बीर सुधीर लखो निपटं ॥२२२॥

कल रूप कराल ज्वाल जलं ॥

असि उजल पानि प्रभा न्रिमलं ॥

अति उजल दंद अनंद मनं ॥

कुक्रिआ तिह नाम सु जोध गनं ॥२२३॥

अति सिआम सरूप करूप तनं ॥

उपजं अग्यान बिलोकि मनं ॥

तिह नाम गिलानि प्रधान भटं ॥

रण मो न महा हठि हारि हटं ॥२२४॥

अति अंग सुरंग सनाह सुभं ॥

बहु कसट सरूप सु कसट छुभं ॥

अति बीर अधीर न भयो कब ही ॥

दिव देव पछानत है सब ही ॥२२५॥

भट करम बिकरम जबै धरि है ॥

रण रंग तुरंगहि बिचरि है ॥

तब बीर सु धीरहि को धरि है ॥

बल बिक्रम तेज तबै हरि है ॥२२६॥

दोहरा ॥

इह बिधि तन सूरा सु धरि; धै है न्रिप अबिबेक ॥

न्रिप बिबेक की दिसि सुभट; ठांढ न रहि है एक ॥२२७॥

इति स्री बचित नाटक ग्रंथे पारस मछिंद्र स्मबादे न्रिप अबिबेक आगमन नाम सुभट बरननं नाम धिआइ समापतम सत सुभम सत ॥

ਅਥ ਨ੍ਰਿਪ ਬਿਬੇਕ ਦੇ ਦਲ ਕਥਨੰ ॥

अथ न्रिप बिबेक दे दल कथनं ॥ छपय छंद ॥

जिह प्रकार अबिबेक न्रिपति; दल सहित बखाने ॥

नाम ठाम आभरन सु रथ; सभ के हम जाने ॥

ससत्र असत्र अरु धनुख धुजा; जिह बरण उचारी ॥

त्वप्रसादि मुनि देव! सकल; सु बिबेक बिचारी ॥

करि क्रिपा सकल जिह बिधि कहे; तिह बिधि वहै बखानीऐ ॥

किह छबि प्रभाव? किह दुति न्रिपति? न्रिप बिबेक अनुमानीऐ ॥२२८॥

अधिक न्यास मुनि कीन; मंत्र बहु भांति उचारे ॥

तंत्र भली बिधि सधे; जंत्र बहु बिधि लिखि डारे ॥

अति पवित्र हुऐ आप; बहुरि उचार करो तिह ॥

न्रिप बिबेक अबिबेक सहित; सैन कथ्यो जिह ॥

सुर असुर चक्रित चहु दिस भए; अनल पवन ससि सूर सब ॥

किह बिधि प्रकास करि है संघार; जके जछ गंधरब सब ॥२२९॥

सेत छत्र सिर धरै; सेत बाजी रथ राजत ॥

सेत ससत्र तन सजे; निरखि सुर नर भ्रमि भाजत ॥

चंद चक्रित ह्वै रहत; भानु भवता लखि भुलत ॥

भ्रमर प्रभा लखि भ्रमत; असुर सुर नर डग डुलत ॥

इह छबि बिबेक राजा न्रिपति! अति बलिसट तिह मानीऐ ॥

मुनि गन महीप बंदत सकल; तीनि लोकि महि जानीऐ ॥२३०॥

चमर चारु चहूं ओर ढुरत; सुंदर छबि पावत ॥

निरखि हंस तिह ढुरनि; मान सरवरहि लजावत ॥

अति पवित्र सब गात; प्रभा अति ही जिह सोहत ॥

सुर नर नाग सुरेस; जछ किंनर मन मोहत ॥

इह छबि बिबेक राजा न्रिपति; जिदिन कमान चड़ाइ है ॥

बिनु अबिबेक सुनि हो न्रिपति! सु अउर न बान चलाइ है ॥२३१॥

अति प्रचंड अबिकार तेज; आखंड अतुल बल ॥

अति प्रताप अति सूर; तूर बाजत जिह जल थल ॥

पवन बेग रथ चलत पेखि; चपला चित लाजत ॥

सुनत सबद चक चार मेघ; मोहत भ्रम भाजत ॥

जल थल अजेअ अनभै भट; अति उतम परवानीऐ ॥

धीरजु सु नाम जोधा बिकट; अति सुबाहु जग मानीऐ ॥२३२॥

धरम धीर बीर जसमीर; अनभीर बिकट मति ॥

कलप ब्रिछ कुब्रितन क्रिपान; जस तिलक सुभट अति ॥

अति प्रतापु अति ओज अनल; सर तेज जरे रण ॥

ब्रहम असत्र सिव असत्र; नहिन मानत एकै ब्रण ॥

इह दुति प्रकास ब्रित छत्र न्रिप; ससत्र असत्र जब छंडि है ॥

बिनु एक अब्रित सुब्रित न्रिपति! अवर न आहव मंडि है ॥२३३॥

अछिज गात अनभंग तेज; आखंड अनिल बल ॥

पवन बेग रथ को प्रतापु; जानत जीअ जल थल ॥

धनुख बान परबीन; छीन सब अंग ब्रितन करि ॥

अति सुबाह संजम सुबीर; जानत नारी नर ॥

गहि धनुख बान पानहि धरम; परम रूप धरि गरजि है ॥

बिनु इक अब्रित सुब्रित न्रिपति; अउर न आनि बरजि है ॥२३४॥

चक्रित चारु चंचल प्रकास; बाजी रथ सोहत ॥

अति प्रबीन धुनि छीन बीन; बाजत मन मोहत ॥

प्रेम रूप सुभ धरे नेम; नामा भट भै कर ॥

परम रूप परमं प्रताप; जुध जै अरि छै कर ॥

अस अमिट बीर धीरा बडो; अति बलिसट दुर धरख रणि ॥

अनभै अभंज अनमिट सुधीस; अनबिकार अनजै सु भण ॥२३५॥

अति प्रताप अमितोज; अमिट अनभै अभंग भट ॥

रथ प्रमाण चपला सु चारु; चमकत है अनकट ॥

निरखि सत्रु तिह तेज; चक्रित भयभीत भजत रणि ॥

धरत धीर नहि बीर; तीर सर है नही हठि रणि ॥

बिग्यान नामु अनभै सुभट; अति बलिसट तिह जानीऐ ॥

अगिआन देसि जा को सदा; त्रास घरन घरि मानीऐ ॥२३६॥

बमत ज्वाल डमरू कराल; डिम डिम रणि बजत ॥

घन प्रमान चक सबद घहरि; जा को गल गजत ॥

सिमटि सांग संग्रहत; सरकि सामुह अरि झारत ॥

निरखि तासु सुर असुर ब्रहम; जै सबद उचारत ॥

इसनान नाम अभिमान जुत; जिदिन धनुख गहि गरजि है ॥

बिनु इक कुचील सामुहि समर; अउर न तासु बरजि है ॥२३७॥

इकि निब्रित अति बीर; दुतीअ भावना महा भट ॥

अति बलिसट अनमिट; अपार अनछिज अनाकट ॥

ससत्र धारि गज है जब; भीर भाजि है निरखि रणि ॥

पत्र भेस भहरात; धीर धर है न अनगण ॥

इह बिधि सु धीर जोधा न्रिपति! जिदिन अयोधन रचि है ॥

तज ससत्र असत्र भजि है सकल; एक न बीर बिरच है ॥२३८॥

संगीत छपय छंद ॥

तागड़दी तुर बाज है; जागड़दी जोधा जब जुटहि ॥

लागड़दी लुथ बिथुरहि; सागड़दी संनाह सु तुटहि ॥

भागड़दी भूत भैरो प्रसिध; अरु सिध निहारहि ॥

जागड़दी जछ जुगणी जूथ; जै सबद उचारहि ॥

संसागड़दी सुभट संजम अमिट; कागड़दी क्रुध जब गरजि है ॥

दंदागड़दी इक दुरमति बिना; आगड़दी सु अउर न बरजि है ॥२३९॥

जागड़दी जोग जयवान; कागड़दी करि क्रोध कड़कहि ॥

लागड़दी लुट अरु कुट; तागड़दी तरवार सड़कहि ॥

सागड़दी ससत्र संनाह; पागड़दी पहिर है जवन दिन ॥

सागड़दी सत्रु भजि है; टागड़दी टिकि है न इक छिन ॥

प्मपागड़दी पीअर सित बरण मुख; सागड़दी समसत सिधार है ॥

अंआगड़दी अमिट दुर धरख भट; जागड़दी कि जिदिन निहार है ॥२४०॥

आगड़दी इक अरचारु; पागड़दी पूजा जब कुपहि ॥

रागड़दी रोस करि जोस; पागड़दी पाइन जब रुपहि ॥

सागड़दी सत्रु तजि अत्र; भागड़दी भजहि सु भ्रमि रणि ॥

आगड़दी ऐस उझड़हि; पागड़दी जणु पवन पत्र बण ॥

संसागड़दी सुभट सब भजि है; तागड़दी तुरंग नचाइ है ॥

छंछागड़दी छत्र ब्रिति छडि कै; आगड़दी अधोगति जाइ है ॥२४१॥

छपय छंद ॥

चमर चारु चहूं ओरि; ढुरत सुंदर छबि पावत ॥

सेत बसत्र अरु बाज सेत; ससत्रण छबि छावत ॥

अति पवित्र अबिकार अचल; अनखंड अकट भट ॥

अमित ओज अनमिट; अनंत अछलि रणाकट ॥

धर असत्र ससत्र सामुह समर; जिदिन न्रिपोतम गरजि है ॥

टिकि है इक भट नहि समरि; अउर कवण तब बरजि है? ॥२४२॥

इकि बिदिआ अरु लाज अमिट; अति ही प्रताप रणि ॥

भीम रूप भैरो प्रचंड; अमिट अदाहण ॥

अति अखंड अडंड; चंड परताप रणाचल ॥

ब्रिखभ कंध आजान बाह; बानैत महाबलि ॥

इह छबि अपार जोधा जुगल; जिदिन निसान बजाइ है ॥

भजि है भूप! तजि लाज सभ; एक न सामुहि आइ है ॥२४३॥

नराज छंद ॥

संजोग नाम सूरमा; अखंड एक जानीऐ ॥

सु धामि धामि जास को; प्रताप आज मानीऐ ॥

अडंड औ अछेद है; अभंग तासु भाखीऐ ॥

बिचार आज तउन सो; जुझार कउन राखीऐ? ॥२४४॥

अखंड मंडलीक सो; प्रचंड बीर देखीऐ ॥

सुक्रित नाम सूरमा; अजित तासु लेखीऐ ॥

गरजि ससत्र सजि कै; सलजि रथ धाइ है ॥

अमंड मारतंड ज्यों; प्रचंड सोभ पाइ है ॥२४५॥

बिसेख बाण सैहथी; क्रिपान पाणि सजि है ॥

अमोह नाम सूरमा; सरोह आनि गज है ॥

अलोभ नाम सूरमा; दुतीअ जो गरजि है ॥

रथी गजी हई पती; अपार सैण भजि है ॥२४६॥

हठी जपी तपी सती; अखंड बीर देखीऐ ॥

प्रचंड मारतंड ज्यों; अडंड तासु लेखीऐ ॥

अजिति जउन जगत ते; पवित्र अंग जानीऐ ॥

अकाम नाम सूरमा; भिराम तासु मानीऐ ॥२४७॥

अक्रोध जोध क्रोध कै; बिरोध सजि है जबै ॥

बिसारि लाज सूरमा; अपार भाजि है सभै ॥

अखंड देहि जास की; प्रचंड रूप जानीऐ ॥

सु लज नाम सूरमा; सु मंत्रि तासु मानीऐ ॥२४८॥

सु परम तत आदि दै; निराहंकार गरजि है ॥

बिसेख तोर सैन ते; असेख बीर बरजि है ॥

सरोख सैहथीन लै; अमोघ जोध जुटि है ॥

असेख बीर कारमादि; क्रूर कउच तुट है ॥२४९॥

नराज छंद ॥

सभगति एक भावना; सु क्रोध सूर धाइ है ॥

असेख मारतंड ज्यों; बिसेख सोभ पाइ है ॥

संघारि सैण सत्रुवी; जुझार जोध जुटि है ॥

करूर कूर सूरमा; तरक तंग तुटि है ॥२५०॥

सिमटि सूर सैहथी; सरकि सांग सेल है ॥

दुरंत घाइ झालि कै; अनंत सैण पेलि है ॥

तमकि तेग दामिणी; सड़कि सूर मटि है ॥

निपटि कटि कुटि कै; अकट अंग सटि है ॥२५१॥

निपटि सिंघ ज्यों पलटि; सूर सेल बाहि है ॥

बिसेख बूथनीस की; असेख सैण गाहि है ॥

अरुझि बीर अप मझि; गझि आनि जुझि है ॥

बिसेख देव दईत जछ; किंनर क्रित बुझि है ॥२५२॥

सरकि सेल सूरमा; मटिक बाज सुटि है ॥

अमंड मंडलीक से; अफुट सूर फुटि है ॥

सु प्रेम नाम सूर को; बिसेख भूप! जानीऐ ॥

सु साख तास की सदा; तिहूंन लोक मानीऐ ॥२५३॥

अनूप रूप भान सो; अभूत रूप मानीऐ ॥

संजोग नाम सत्रुहा; सु बीर तासु जानीऐ ॥

सु सांति नाम सूरमा; सु अउर एक बोलीऐ ॥

प्रताप जास को सदा; सु सरब लोग तोलीऐ ॥२५४॥

अखंड मंडलीक सो; प्रचंड रूप देखीऐ ॥

सु कोप सुध सिंघ की; समान सूर पेखीऐ ॥

सु पाठ नाम तास को; अठाट तासु भाखीऐ ॥

भज्यो न जुध ते कहूं; निसेस सूर साखीऐ ॥२५५॥

सुकरम नाम एक को; सुसिछ दूज जानीऐ ॥

अभिज मंडलीक सो; अछिज तेज मानीऐ ॥

सु कोप सूर सिंघ ज्यों; घटा समान जुटि है ॥

दुरंत बाज बाजि है; अनंत ससत्र छुटि है ॥२५६॥

सु जगि नाम एक को; प्रबोध अउर मानीऐ ॥

सु दान तीसरा हठी; अखंड तासु जानीऐ ॥

सु नेम नाम अउर है; अखंड तासु भाखीऐ ॥

जगत जासु जीतिआ; जहान भानु साखीऐ ॥२५७॥

सु सतु नाम एक को; संतोख अउर बोलीऐ ॥

सु तपु नाम तीसरो; दसंत्र जासु छोलीऐ ॥

सु जापु नाम एक को; प्रताप आज तास को ॥

अनेक जुध जीति कै; बरियो जिनै निरास को ॥२५८॥

छपै छंद ॥

अति प्रचंड बलवंड; नेम नामा इक अति भट ॥

प्रेम नाम दूसरो; सूर बीरारि रणोतकट ॥

संजम एक बलिसटि; धीर नामा चतुरथ गनि ॥

प्राणयाम पंचवो; धिआन नामा खसटम भनि ॥

जोधा अपार अनखंड सति; अति प्रताप तिह मानीऐ ॥

सुर असुर नाग गंध्रब; धरम नाम जवन को जानीऐ ॥२५९॥

सुभाचार जिह नाम; सबल दूसर अनुमानो ॥

बिक्रम तीसरो सुभट; बुधि चतुरथ जीअ जानो ॥

पंचम अनुरकतता; छठम सामाध अभै भट ॥

उदम अरु उपकार; अमिट अनजीत अनाकट ॥

जिह निरखि सत्रु तजि आसननि; बिमन चित भाजत तवन ॥

बलि टारि हारि आहव हठी; अठट ठाट भुलत गवन ॥२६०॥

तोमर छंद ॥

सु बिचार है भट एक ॥

गुन बीच जासु अनेक ॥

संजोग है इक अउर ॥

जिनि जीतिआ पति गउर ॥२६१॥

इक होम नाम सु बीर ॥

अरि कीन जासु अधीर ॥

पूजा सु अउर बखान ॥

जिह सो न पउरखु आनि ॥२६२॥

अनुरकतता इक अउर ॥

सभ सुभट को सिर मउर ॥

बेरकतता इक आन ॥

जिह सो न आन प्रधान ॥२६३॥

सतसंग अउर सुबाह ॥

जिह देख जुध उछाह ॥

भट नेह नाम अपार ॥

बल जउन को बिकरार ॥२६४॥

इक प्रीति अरु हरि भगति ॥

जिह जोति जगमग जगति ॥

भट दत मत महान ॥

सब ठउर मै परधान ॥२६५॥

इक अक्रुध अउर प्रबोध ॥

रण देखि कै जिह क्रोध ॥

इह भांति सैन बनाइ ॥

दुहु दिसि निसान बजाइ ॥२६६॥

दोहरा ॥

इह बिधि सैन बनाइ कै; चड़े निसान बजाइ ॥

जिह जिह बिधि आहव मच्यो; सो सो कहत सुनाइ ॥२६७॥

स्री भगवती छंद ॥

कि स्मबाह उठे ॥

कि सावंत जुटे ॥

कि नीसाण हुके ॥

कि बाजंत्र धुके ॥२६८॥

कि ब्मबाल नेजे ॥

कि जंज्वाल तेजे ॥

कि सावंत ढूके ॥

कि हा हाइ कूके ॥२६९॥

कि सिंधूर गजे ॥

कि तंदूर बजे ॥

कि स्मबाह जुटे ॥

कि संनाह फुटे ॥२७०॥

कि डाकंत डउरू ॥

कि भ्रामंत भउरू ॥

कि आहाड़ि डिगे ॥

कि राकत्र भिगे ॥२७१॥

कि चामुंड चरमं ॥

कि सावंत धरमं ॥

कि आवंत जुधं ॥

कि सानध बधं ॥२७२॥

कि सावंत सजे ॥

कि नीसाण बजे ॥

कि जंज्वाल क्रोधं ॥

कि बिसारि बोधं ॥२७३॥

कि आहाड़ मानी ॥

कि ज्यों मछ पानी ॥

कि ससत्रासत्र बाहै ॥

कि ज्यों जीत चाहै ॥२७४॥

कि सावंत सोहे ॥

कि सारंग रोहे ॥

कि ससत्रासत्र बाहे ॥

भले सैण गाहे ॥२७५॥

कि भैरउ भभकै ॥

कि काली कुहकै ॥

कि जोगन जुटी ॥

कि लै पत्र टुटी ॥२७६॥

कि देवी दमके ॥

कि काली कुहके ॥

कि भैरो भकारै ॥

कि डउरू डकारै ॥२७७॥

कि बहु ससत्र बरखे ॥

कि परमासत्र करखे ॥

कि दईतासत्र छुटे ॥

देवासत्र मुके ॥२७८॥

कि सैलासत्र साजे ॥

कि पउनासत्र बाजे ॥

कि मेघासत्र बरखे ॥

कि अगनासत्र करखे ॥२७९॥

कि हंसासत्र छुटे ॥

कि काकसत्र तुटे ॥

कि मेघासत्र बरखे ॥

कि सूक्रासत्रु करखे ॥२८०॥

कि सावंत्र सजे ॥

कि ब्योमासत्र गजे ॥

कि जछासत्र छुटे ॥

कि किंन्रासत्र मुके ॥२८१॥

कि गंध्राबसात्र बाहै ॥

कि नर असत्र गाहै ॥

कि चंचाल नैणं ॥

कि मैमत बैणं ॥२८२॥

कि आहाड़ि डिगै ॥

कि आरकत भिगै ॥

कि ससत्रासत्र बजे ॥

कि सावंत गजे ॥२८३॥

कि आवरत हूरं ॥

कि सावरत पूरं ॥

फिरी ऐण गैणं ॥

कि आरकत नैणं ॥२८४॥

कि पावंग पुले ॥

कि सरबासत्र खुले ॥

कि हंकारि बाहै ॥

अधं अधि लाहै ॥२८५॥

छुटी ईस तारी ॥

कि संन्यास धारी ॥

कि गंधरब गजे ॥

कि बाद्रित बजे ॥२८६॥

कि पापासत्र बरखे ॥

कि धरमासत्र करखे ॥

अरोगासत्र छुटे ॥

सु भोगासत्र सुटे ॥२८७॥

बिबादासत्र सजे ॥

बिरोधासत्र बजे ॥

कुमंत्रासत्र छुटे ॥

समुंत्रासत्र टुटे ॥२८८॥

कि कामासत्र छुटे ॥

करोधासत्र तुटे ॥

बिरोधासत्र बरखे ॥

बिमोहासत्र करखे ॥२८९॥

चरित्रासत्र छुटे ॥

कि मोहासत्र जुटे ॥

कि त्रासासत्र बरखे ॥

कि क्रोधासत्र करखे ॥२९०॥

चौपई छंद ॥

इह बिधि ससत्र असत्र बहु छोरे ॥

न्रिप बिबेक के भट झकझोरे ॥

आपन चला निसरि तब राजा ॥

भांति भांति के बाजन बाजा ॥२९१॥

दुहु दिसि पड़ा निसानै घाता ॥

महा सबद धुनि उठी अघाता ॥

बरखा बाण गगन गयो छाई ॥

भूति पिसाच रहे उरझाई ॥२९२॥

झिमि झिमि सारु गगन ते बरखा ॥

भल भल सुभट पखरीआ परखा ॥

सिमटे सुभट अनंत अपारा ॥

परि गई अंध धुंध बिकरारा ॥२९३॥

न्रिप बिबेक तब रोसहि भरा ॥

सभ सैना कहि आइसु करा ॥

उमडे सूर सु फउज बनाई ॥

नाम तास कबि देत बताई ॥२९४॥

सिरी पाखरी टोप सवारे ॥

चिलतह राग संजोवा डारे ॥

चले जुध के काज सु बीरा ॥

सूखत भयो नदन को नीरा ॥२९५॥

दोहरा ॥

दुहू दिसन मारू बज्यो; पर्यो निसाणे घाउ ॥

उमडि दुबहीआ उठि चले; भयो भिरन को चाउ ॥२९६॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

रणं सुधि सावंत, भावंत गाजे ॥

तहा तूर भेरी, महा संख बाजे ॥

भयो उच कोलाहलं, बीर खेतं ॥

बहे ससत्र असत्रं, नचे भूत प्रेतं ॥२९७॥

फरी धोप पाइक, सु खंडे बिसेखं ॥

तुरे तुंद ताजी, भए भूत भेखं ॥

रणं राग बजे, ति गजे भटाणं ॥

तुरी तत नचे, पलटे भटाणं ॥२९८॥

हिणंकेत हैवार, गैवार गाजी ॥

मटके महाबीर, सुटे सिराजी ॥

कड़ाकुट ससत्रासत्र, बजे अपारं ॥

नचे सुध सिधं, उठी ससत्र झारं ॥२९९॥

किलंकीत काली, कमछ्या करालं ॥

बक्यो बीर बैतालं, बामंत ज्वालं ॥

चवी चांवडी चाव, चउसठि बालं ॥

करै स्रोणहारं, बमै जोग ज्वालं ॥३००॥

छुरी छिप्र छंडैति, मंडै रणारं ॥

तमकैत ताजी, भभकै भटाणं ॥

सुभे संदली, बोज बाजी अपारं ॥

बहे बोर पिंगी, समुंदे कंधारं ॥३०१॥

तुरे तुंद ताजी, उठे कछ अछं ॥

कछे आरबी, पब मानो सपछं ॥

उठी धूरि पूरं, छुही ऐण गैणं ॥

भयो अंध धुंधं, परी जानु रैणं ॥३०२॥

इतै दत धायो, अनादत उतं ॥

रही धूरि पूरं, परी कटि लुथं ॥

अनावरत बीरं, महाबरत धारी ॥

चड़्यो चउपि कै, तुंद नचे ततारी ॥३०३॥

खुरं खेह उठी, छयो रथ भानं ॥

दिसा बेदिसा, भू न दिख्या समानं ॥

छुटे ससत्र असत्र, परी भीर भारी ॥

छुटे तीर करवार, काती कटारी ॥३०४॥

गहे बाण दतं, अनादत मार्यो ॥

भजी सरब सैणं, न नैणं निहार्यो ॥

जिन्यो बीर एकै, अनेकं परानो ॥

पुराने पलासी, हने पौन मानो ॥३०५॥

रणं रोस कै, लोभ बाजी मटक्यो ॥

भज्यो बीर बाच्यो, अर्यो सु झटक्यो ॥

फिर्यो देख बीरं, अनालोभ धायो ॥

छुटे बाण ऐसे, सबै ब्योम छायो ॥३०६॥

दसं बाण लै बीर धीरं प्रहारे ॥

सरं सठि लै संजमै ताकि मारे ॥

नवं बाण सो नेम को अंग छेद्यो ॥

बली बीसि बाणानि बिग्यान बेध्यो ॥३०७॥

पचिस बाण पावित्रता को प्रहारे ॥

असीह बाण अरचाहि कै अंगि झारे ॥

पचासी सरं पूरि पूजाहि छेद्यो ॥

बडो लसटका लै सलजाहि भेद्यो ॥३०८॥

बिआसी बली बाण बिद्याहि मारे ॥

तपस्याहि पै ताकि तेतीस डारे ॥

कई बाण सों कीरतनं अंग छेद्यो ॥

अलोभादि जोधा भली भांति भेद्यो ॥३०९॥

न्रिहंकार को बान असीन छेद्यो ॥

भले परम तत्वादि को बछ भेद्यो ॥

कई बाण करुणाहि के अंगि झारे ॥

सरं सउक सिछिआ के अंगि मारे ॥३१०॥

दोहरा ॥

दान आनि पुजियो तबै; ग्यान बान लै हाथि ॥

जुआन जानि मार्यो तिसै; ध्यान मंत्र के साथ ॥३११॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

रणं उछल्यो, दान जोधा महानं ॥

सभै ससत्र बेता, अति असत्रं निधानं ॥

दसं बाण सो, लोभ को बछि मार्यो ॥

सरं सपत सो, क्रोध को देहु तार्यो ॥३१२॥

नवं बाण बेध्यो, अनंन्यास बीरं ॥

त्रियो तीर भेद्यो, अनाबरत धीरं ॥

भयो भेदि क्रोधं, सतंसंगि मारे ॥

भई धीर धरमं, ब्रहम गिआन तारे ॥३१३॥

कई बाण कुलहत्रता को चलाए ॥

कई बाण लै, बैर के बीर घाए ॥

किते घाइ आलस कै अंगि लागे ॥

सबै नरक ते आदि लै बीर भागे ॥३१४॥

इकै बाण निसील को अंग छेद्यो ॥

दुती कुसतता को भलै सूत भेद्यो ॥

गुमानादि के, चार बाजी संघारे ॥

अनरथादि के, बीर बांके निवारे ॥३१५॥

पिपासा छुधा, आलसादि पराने ॥

भज्यो लोभ क्रोधी, हठी देव जाने ॥

तप्यो नेम नामा, अनेमं प्रणासी ॥

धरे जोग असत्रं, अलोभी उदासी ॥३१६॥

हत्यो कापटं खापटं, सोक पालं ॥

हन्यो रोह मोहं, सकामं करालं ॥

महा क्रुध कै, क्रोध को बान मार्यो ॥

खिस्यो ब्रहम दोखादि, सरबं प्रहार्यो ॥३१७॥

रूआल छंद ॥

सु द्रोह अउ हंकार को; हजार बान सो हन्यो ॥

दरिद्र असंक मोह को; न चित मै कछ गन्यो ॥

असोच अउ कुमंत्रता; अनेक बान सो हत्यो ॥

कलंक कौ निसंक ह्वै; सहंस्र साइकं छत्यो ॥३१८॥

क्रितघनता बिस्वासघात; मित्रघात मार्यो ॥

सु राज दोख ब्रहम दोख; ब्रहम असत्र झार्यो ॥

उचाट मारणादि; बसिकरण को सरं हन्यो ॥

बिखाध को बिखाध कै; न ब्रिध ताहि को गन्यो ॥३१९॥

भजे रथी हई गजी; सु पति त्रास धारि कै ॥

भजे रथी महारथी; सु लाज को बिसारि कै ॥

अस्मभ जुध जो भयो; सु कैस के बताईऐ? ॥

सहंस बाक जो रटै; न तत्र पार पाईऐ ॥३२०॥

कलंक बिभ्रमादि अउ; क्रितघन ताहि कौ हन्यो ॥

बिखाद बिपदादि को; कछू न चित मै गन्यो ॥

सु मित्रदोख राजदोख; ईरखाहि मारि कै ॥

उचाट अउ बिखाध को; दयो रणं निकारि कै ॥३२१॥

गिलानि कोप मान; अप्रमान बान सो हन्यो ॥

अनरथ को समरथ कै; हजार बान सो झन्यो ॥

कुचार को हजार बान; चार सो प्रहार्यो ॥

कुकसट अउ कुक्रिआ कौ; भजाइ त्रासु डार्यो ॥३२२॥

छपय छंद ॥

अतप बीर कउ ताकि; बान सतरि मारे तप ॥

नवे साइकनि सील; सहस सर हनै अजप जप ॥

बीस बाण कुमतहि; तीस कुकरमहि भेद्यो ॥

दस साइक दारिद्र; काम कई बाणनि छेद्यो ॥

बहु बिधि बिरोध को बध कीयो; अबिबेकहि सर संधि रणि ॥

रणि रोह क्रोह करवार गहि; इम संजम बुल्यो बयण ॥३२३॥

अरुण पछमहि उग्वै; बरुणु उतर दिस तकै ॥

मेरु पंख करि उडै; सरब साइर जल सुकै ॥

कोल दाड़ कड़मुड़ै; सिमटि फनीअर फण फटै ॥

उलटि जान्हवी बहै; सत हरीचंदे हटै ॥

संसार उलट पुलट ह्वै धसकि; धउल धरणी फटै ॥

सुनि न्रिप अबिबेक! सु बिबेक भटि; तदपि न लटि संजम हटै ॥३२४॥

तेरे जोरि मै गुंगा कहता हो ॥

तेरा सदका तेरी सरणि ॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

कुप्यो संजमं परम जोधा जुझारं ॥

बडो गरबधारी बडो निरबिकारं ॥

अनंतासत्र लै कै अनरथै प्रहार्यो ॥

अनादत के अंग को छेद डार्यो ॥३२५॥

तेरे जोरि कहत हौ ॥

इसो जुधु बीत्यो, कहा लौ सुनाऊ? ॥

रटो सहंस जिहवा, न तउ अंत पाऊ ॥

दसं लछ जुग्यं, सु बरखं अनंतं ॥

भयो बीरखेतं, कथै कउण खंतं? ॥३२६॥

तेरे जोर संग कहता ॥

भई अंध धुंधं मच्यो बीर खेतं ॥

नची जुगणी चारु चउसठ प्रेतं ॥

नची कालका स्री कमख्या करालं ॥

डकं डाकणी जोध जागंत ज्वालं ॥३२७॥

तेरा जोरु ॥

मच्यो जोर जुधं, हट्यो नाहि कोऊ ॥

बडे छत्रधारी, पती छत्र दोऊ ॥

खप्यो सरब लोकं, अलोकं अपारं ॥

मिटे जुध ते, ए न जोधा जुझारं ॥३२८॥

तेरा जोर ॥

दोहरा ॥

चटपट सुभट बिकट कटे; झटपट भई अभंग ॥

लटि भट हटे न रन घट्यो; अटपट मिट्यो न जंग ॥३२९॥

तेरे जोरि ॥

चौपई ॥

बीस लछ जुग ऐतु प्रमाना ॥

लरे दोऊ भई किस न हाना ॥

तब राजा जीअ मै अकुलायो ॥

नाक चढे मछिंद्र पै आयो ॥३३०॥

कहि मुनि बरि सभ मोहि बिचारा ॥

ए दोऊ बीर बडे बरिआरा ॥

इन का बिरुध निवरत न भया ॥

इनो छडावत सभ जगु गया ॥३३१॥

इनै जुझावत सब कोई जूझा ॥

इन का अंत न काहू सूझा ॥

ए है आदि हठी बरिआरा ॥

महारथी अउ महा भयारा ॥३३२॥

बचनु मछिंद्र सुनत चुप रहा ॥

धरा नाथ सबनन तन कहा ॥

चक्रित चित चटपट ह्वै दिखसा ॥

चरपट नाथ तदिन ते निकसा ॥३३३॥

इति चरपट नाथ प्रगटणो नामह ॥

चौपई ॥

सुनि राजा! तुहि कहै बिबेका ॥

इन कह द्वै जानहु जिनि एका ॥

ए अबिकार पुरख अवतारी ॥

बडे धनुरधर बडे जुझारी ॥३३४॥

आदि पुरख जब आप स्मभारा ॥

आप रूप मै आप निहारा ॥

ओअंकार कह इकदा कहा ॥

भूमि अकास सकल बनि रहा ॥३३५॥

दाहन दिस ते सति उपजावा ॥

बाम परस ते झूठ बनावा ॥

उपजत ही उठि जुझे जुझारा ॥

तब ते करत जगत मै रारा ॥३३६॥

सहंस बरख जो आयु बढावै ॥

रसना सहस सदा लौ पावै ॥

सहंस जुगन लौ करे बिचारा ॥

तदपि न पावत पार तुमारा ॥३३७॥

तेरे जोरि गुंगा कहता ॥

बिआस परासर अउ रिखि घने ॥

सिंगी रिखि बकदालभ भने ॥

सहंस मुखन का ब्रहमा देखा ॥

तऊ न तुमरा अंतु बिसेखा ॥३३८॥

तेरा जोरु ॥

दोहरा ॥

सिंधु सुभट सावंत सभ; मुनि गंधरब महंत ॥

कोटि कलप कलपांत भे; लह्यो न तेरो अंत ॥३३९॥

तेरे जोर सो कहो ॥

भुजंग प्रयात छंद ॥

सुनो राज सारदूल! उचरो प्रबोधं ॥

सुनो चित दै कै, न कीजै बिरोधं ॥

सु स्री आद पुरखं, अनादं सरूपं ॥

अजेअं अभेअं, अदगं अरूपं ॥३४०॥

अनामं अधामं, अनीलं अनादं ॥

अजैअं अभैअं, अवै निर बिखादं ॥

अनंतं महंतं, प्रिथीसं पुराणं ॥

सु भब्यं भविख्यं, अवैयं भवाणं ॥३४१॥

जिते सरब जोगी, जटी जंत्र धारी ॥

जलास्री जवी, जामनी जगकारी ॥

जती जोग जुधी, जकी ज्वाल माली ॥

प्रमाथी परी, परबती छत्रपाली ॥३४२॥

तेरा जोरु ॥

सबै झूठु मानो, जिते जंत्र मंत्रं ॥

सबै फोकटं, धरम है भरम तंत्रं ॥

बिना एक आसं, निरासं सबै है ॥

बिना एक नाम, न कामं कबै है ॥३४३॥

करे मंत्र जंत्रं, जु पै सिध होई ॥

दरं द्वार भिछ्या, भ्रमै नाहि कोई ॥

धरे एक आसा, निरासोर मानै ॥

बिना एक करमं, सबै भरम जानै ॥३४४॥

सुन्यो जोगि बैनं, नरेसं निधानं ॥

भ्रमियो भीत चितं, कुप्यो जेम पानं ॥

तजी सरब आसं, निरासं चितानं ॥

पुनिर उचरे, बाच बंधी बिधानं ॥३४५॥

तेरा जोरु ॥

रसावल छंद ॥

सुनो मोन राजं! ॥

सदा सिध साजं ॥

कछ देह मतं ॥

कहो तोहि बतं ॥३४६॥

दोऊ जोर जुधं ॥

हठी परम क्रुधं ॥

सदा जाप करता ॥

सबै सिध हरता ॥३४७॥

अरीले अरारे ॥

हठील जुझारे ॥

कटीले करूरं ॥

करै सत्रु चूरं ॥३४८॥

तेरा जोरु ॥

चौपई ॥

जो इन जीति सकौ नहि भाई! ॥

तउ मै जोर चिताहि जराई ॥

मै इन कहि मुनि! जीति न साका ॥

अब मुर बल पौरख सब थाका ॥३४९॥

ऐस भांति मन बीच बिचारा ॥

प्रगट सभा सब सुनत उचारा ॥

मै बड भूप बडो बरिआरू ॥

मै जीत्यो इह सभ संसारू ॥३५०॥

जिनि मो को इह बात बताई ॥

तिनि मुहि जानु ठगउरी लाई ॥

ए द्वै बीर बडे बरिआरा ॥

इन जीते जीतो संसारा ॥३५१॥

अब मो ते एई जिनि जाई ॥

कहि मुनि मोहि कथा समझाई ॥

अब मै देखि बनावौ चिखा ॥

पैठौ बीच अगनि की सिखा ॥३५२॥

चिखा बनाइ सनानहि करा ॥

सभ तनि बसत्र तिलोना धरा ॥

बहु बिधि लोग हटकि करि रहा ॥

चटपट करि चरनन भी गहा ॥३५३॥

हीर चीर दै बिधवत दाना ॥

मधि कटास करा असथाना ॥

भांति अनक तन ज्वाल जराई ॥

जरत न भई ज्वाल सीअराई ॥३५४॥

तोमर छंद ॥

करि कोप पारस राइ ॥

करि आपि अगनि जराइ ॥

सो भई सीतल ज्वाल ॥

अति काल रूप कराल ॥३५५॥

तत जोग अगनि निकारि ॥

अति ज्वलत रूप अपारि ॥

तब कीअस आपन दाह ॥

पुरि लखत साहन साहि ॥३५६॥

तब जरी अगनि बिसेख ॥

त्रिण कासट घिरत असेख ॥

तब जर्यो ता महि राइ ॥

भए भसम अदभुत काइ ॥३५७॥

कई द्योस बरख प्रमान ॥

सल जरा जोर महान ॥

भई भूत भसमी देह ॥

धन धाम छाड्यो नेह ॥३५८॥