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दसम ग्रन्थ/शब्द हजारे

विकिपुस्तक से
सबद ॥

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

वाहिगुरू जी की फतहि ॥

ਰਾਗ ਰਾਮਕਲੀ ਪਾਤਸਾਹੀ ੧੦ ॥ राग रामकली पातसाही १० ॥

रे मन! ऐसो करि संनिआसा ॥

बन से सदन सबै कर समझहु; मन ही माहि उदासा ॥१॥ रहाउ ॥

जत की जटा, जोग को मजनु; नेम के नखुन बढाओ ॥

गिआन गुरू, आतम उपदेसहु; नाम बिभूत लगाओ ॥१॥

अलप अहार, सुलप सी निंद्रा; दया छिमा तन प्रीति ॥

सील संतोख सदा निरबाहिबो; ह्वैबो त्रिगुण अतीत ॥२॥

काम क्रोध हंकार लोभ हठ; मोह न मन मो लयावै ॥

तब ही, आतम तत को दरसै; परम पुरख कह पावै ॥३॥१॥

रामकली पातसाही १० ॥

रे मन! इह बिधि जोग कमाओ ॥

सिंङी साचु, अकपट कंठला; धिआन बिभूत चड़ाओ ॥१॥ रहाउ ॥

ताती गहु, आतम बसि कर की; भिछा नामु अधारं ॥

बाजै परम तार ततु हरि को; उपजै राग रसारं ॥१॥

उघटै तान तरंग रंगि अति; गिआन गीत बंधानं ॥

चकि चकि रहे देव दानव मुनि; छकि छकि ब्योम बिवानं ॥२॥

आतम उपदेस भेसु संजम को; जाप सु अजपा जापै ॥

सदा रहै कंचन सी काया; काल न कबहूं ब्यापै ॥३॥२॥

रामकली पातसाही १० ॥

प्रानी! परम पुरख पगि लागो ॥

सोवत कहा मोह निंद्रा मै? कबहूं सुचित ह्वै जागो ॥१॥ रहाउ ॥

औरन कहा उपदेसत है? पसु! तोहि प्रबोध न लागो ॥

सिंचत कहा परे बिखियन कह? कबहूं बिखै रस त्यागो ॥१॥

केवल करम भरम से चीनहु; धरम करम अनुरागो ॥

संग्रहि करो सदा सिमरन को; परम पाप तजि भागो ॥२॥

जा ते दूख पाप नहि भेटै; काल जाल ते तागो ॥

जौ सुख चाहो सदा सभन कौ; तौ, हरि के रसि पागो ॥३॥३॥

राग सोरठि पातसाही १० ॥

प्रभ जू! तो कह लाज हमारी ॥

नीलकंठ नरहरि नाराइण; नील बसन बनवारी ॥१॥ रहाउ ॥

परम पुरख परमेसुर सुआमी! पावन पउन अहारी ॥

माधव महा जोति मधु मरदन! मान मुकंद मुरारी! ॥१॥

निरबिकार निरजुर निद्रा बिनु! निरबिख नरक निवारी! ॥

क्रिपा सिंधु काल त्रै दरसी! कुक्रित प्रनासन कारी! ॥२॥

धनुर पान ध्रितमान धराधर! अनिबिकार असि धारी ॥

हउ मति मंद चरन सरनागति; कर गहि लेहु उबारी ॥३॥१॥४॥

राग कलिआण पातसाही १० ॥

बिनु करतार, न किरतम मानो ॥

आदि अजोनि अजै अबिनासी; तिह परमेसुर जानो ॥१॥ रहाउ ॥

कहा भयो? जो आनि जगत मै; दसकु असुर हरि घाए ॥

अधिक प्रपंच दिखाइ सभन कह; आपहि ब्रहमु कहाए ॥१॥

भंजन गड़्हन समरथ सदा प्रभ; सो किम जाति गिनायो? ॥

ता ते सरब काल के असि को; घाइ बचाइ न आयो ॥२॥

कैसे तोहि तारि है? सुनि जड़! आप डुबयो भव सागर ॥

छुटि हो काल फास ते तब ही; गहो सरनि जगतागर ॥३॥१॥५॥

ਖ੍ਯਾਲ ਪਾਤਿਸਾਹੀ ੧੦ ॥ ख्याल पातिसाही १० ॥ मित्र पिआरे नूं; हालु मुरीदा दा कहणा ॥

तुधु बिनु रोगु रजाईया दा ओढणु; नाग निवासा दा रहणा ॥

सूल सुराही खंजर पियाला; बिंगु कसाईया दा सहणा ॥

यारड़े दा सानूं सथर चंगा; भठ खेड़िआं दा रहणा ॥१॥१॥६॥

राग तिलंग काफी पातसाही १० ॥

केवल, काल ई करतार ॥

आदि अंति अनंत मूरति; गड़न भंजन हार ॥१॥ रहाउ ॥

निंद उसतति जउन के सम; सत्र मित्र न कोइ ॥

कउन बाट परी तिसै? पथ सारथी रथ होइ ॥१॥

तात मात न जाति जाकर; पुत्र पौत्र मुकंद ॥

कउन काज कहाहिंगे ते? आनि देविक नंद ॥२॥

देव दैत दिसा विसा; जिह कीन सरब पसार ॥

कउन उपमा तौन कौ? मुखि लेत नामु मुरारि ॥३॥१॥७॥

राग बिलावलु पातसाही १० ॥

सो, किम मानस रूप कहाए? ॥

सिध समाधि साध कर हारे; क्यो हूं न देखन पाए ॥१॥ रहाउ ॥

नारद बिआस परासर धूअ से; धिआवत धिआन लगाए ॥

बेद पुरान हारि हठ छाडिओ; तदपि धिआन न आए ॥१॥

दानव देव पिसाच प्रेत ते; नेतह नेत कहाए ॥

सूछम ते सूछम कर चीने; ब्रिधन ब्रिध बताए ॥२॥

भूमि अकास पताल सभै सजि; एक अनेक सदाए ॥

सो नर काल फास ते बाचे; जो हरि सरणि सिधाए ॥३॥१॥८॥

राग देवगंधारी पातसाही १० ॥

इक बिन, दूसर सो न चिनार ॥

भंजन गड़न समरथ सदा प्रभ; जानत है करतार ॥१॥ रहाउ ॥

कहा भइओ? जो अति हित चिति करि; बहु बिधि सिला पुजाई ॥

प्रान थकिओ पाहन कह परसत; कछु करि सिध न आई ॥१॥

अछत धूप दीप अरपत है; पाहन कछू न खै है ॥

ता मै कहा सिधि है? रे जड़! तोहि कछू बरु दै है ॥२॥

जौ जिय होत, तौ देत कछु तुहि; कर मन बच करम बिचारु ॥

केवल एक सरणि सुआमी बिनु; यौ नहि कतहि उधार ॥३॥१॥९॥

राग देवगंधारी पातसाही १० ॥

बिनु हरि नामु, न बाचन पै है ॥

चौहद लोक जाहि बसि कीने; ता ते कहा पलै है? ॥१॥ रहाउ ॥

राम रहीम उबार न सकहै; जा कर नाम रटै है ॥

ब्रहमा बिसनु रुद्र सूरज ससि; ते बसि काल सबै है ॥१॥

बेद पुरान कुरान सबै मत; जा कर नेति कहै है ॥

इंद्र फनिंद्र मुनिंद्र कलप बहु; धिआवत, धिआन न ऐ है ॥२॥

जा कर रूप रंग नहि जनियति; सो किमि स्याम कहै है? ॥

छुटहो काल जाल ते तब ही; ताहि चरनि लपटै है ॥३॥१॥१०॥