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दसम ग्रन्थ/सवैये

विकिपुस्तक से

ੴ वाहिगुरू जी की फतहि ॥

ਖਾਲਸਾ ਮਹਿਮਾ ॥ खालसा महिमा ॥

स्वैया ॥

पातसाही १० ॥

जो किछु लेखु लिखिओ बिधना; सोई पायतु मिस्र जू! सोक निवारो ॥

मेरो कछू अपराधु नही; गयो याद ते भूल, नह कोपु चितारो ॥

बागो निहाली पठै दैहो आजु; भले तुम को निहचै जीअ धारो ॥

छत्री सभै भ्रित बिप्पन के; इनहू पै कटाछ क्रिपा कै निहारो ॥१॥

जुद्ध जिते, इनही के प्रसादि; इनही के प्रसादि सु दान करे ॥

अघ अउघ टरै, इनही के प्रसादि; इनही की क्रिपा, फुन धाम भरे ॥

इनही के प्रसादि, सु बिदिआ लई; इनही की क्रिपा, सभ सत्र मरे ॥

इनही की क्रिपा के, सजे हम है; नही, मो से गरीब करोर परे ॥२॥

सेव करी, इनही की भावत; अउर की सेव सुहात न जीको ॥

दान दयो, इनही को भलो; अरु आन को दान, न लागत नीको ॥

आगै फलै, इनही को दयो; जग मै जसु अउर, दयो सभ फीको ॥

मो ग्रिह मै तन ते, मन ते; सिर लउ धन है, सब ही इनही को ॥३॥

दोहरा ॥

चटपटाइ चित मै जरयो; त्रिण जयों क्रुद्धत होइ ॥

खोज रोज के हेत लग; दयो मिशरजू रोइ ॥४॥