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दसम ग्रन्थ/३३ सवैये

विकिपुस्तक से
੩੩ ਸਵਯੇ ॥

३३ सवये ॥

ੴ वाहिगुरू जी की फतहि ॥

स्री मुखवाक पातसाही १० ॥


सवैया ॥

जागत जोति जपै निस बासुर; एकु बिना, मनि नैक न आनै ॥

पूरन प्रेम प्रतीत सजै; ब्रत गोर मड़्ही मठ भूल न मानै ॥

तीरथ दान दइआ तप संजम; एकु बिना नहि एक पछानै ॥

पूरन जोति जगै घट मै; तब खालस ताहि न खालस जानै ॥१॥

सति सदैव सरूप सत ब्रत; आदि अनादि अगाध अजै है ॥

दान दया दम संजम नेम; जत ब्रत सील सुब्रित अबै है ॥

आदि अनील अनादि अनाहद; आपि अद्वेख अभेख अभै है ॥

रूप अरूप अरेख जरारदन; दीन दयाल क्रिपाल भए है ॥२॥

आदि अद्वैख अवेख महा प्रभ; सति सरूप सु जोति प्रकासी ॥

पूर रहयो सभ ही घट कै पट; तत समाधि सुभाव प्रनासी ॥

आदि जुगादि जगादि तुही प्रभ! फैल रहयो सभ अंतर बासी ॥

दीन दयाल, क्रिपाल! क्रिपा कर; आदि अजोन अजै अबिनासी! ॥३॥

आदि अभेख अछेद सदा प्रभ! बेद कतेबनि भेदु न पायो ॥

दीन दयाल क्रिपाल क्रिपानिधि! सति सदैव सभै घट छायो ॥

सेस सुरेस गणेस महेसुर; गाहि फिरै स्रुति, थाह ना आयो ॥

रे मन मूड़ि! अगूड़ इसो प्रभ; तै किहि काजि कहो बिसरायो? ॥४॥

अचुत आदि अनील अनाहद; सत सरूप सदैव बखाने ॥

आदि अजोनि अजाइ जहा बिनु; परम पुनीत पर्मपर माने ॥

सिध सय्मभू प्रसिध सबै जग; एक ही ठौर अनेक बखाने ॥

रे मन रंक! कलंक बिना हरि; तै किह कारण ते न पहिचाने? ॥५॥

अछर आदि अनील अनाहद; सत सदैव तुही करतारा! ॥

जीव जिते जल मै थल मै; सब कै सद पेट कौ पोखन हारा ॥

बेद पुरान कुरान दुहूं मिलि; भांति अनेक बिचार बिचारा ॥

और जहान निदान कछू नहि; ए सुबहान! तुही सिरदारा ॥६॥

आदि अगाधि अछेद अभेद; अलेख अजेअ अनाहद जाना ॥

भूत भविख भवान तुही; सबहूं सब ठौरन मो मन माना ॥

सदेव अदेव मणीधर नारद; सारद सति सदैव पछाना ॥

दीन दयाल क्रिपानिधि को; कछु भेद पुरान कुरान न जाना ॥७॥

सति सदैव सरूप सदाब्रत! बेद कतेब तुही उपजायो ॥

देव अदेवन देव महीधर; भूत भवान वही ठहरायो ॥

आदि जुगादि अनील अनाहद; लोक अलोक बिलोक न पायो ॥

रे मन मूड़! अगूड़ि इसो प्रभ; तोहि कहो किहि आन सुनायो? ॥८॥

देव अदेव महीधर नागन; सिध प्रसिध बडो तपु कीनो ॥

बेद पुरान कुरान सबै; गुन गाइ थके, पै तो जाइ न चीनो ॥

भूमि अकास पतार दिसा; बिदिसा, जिहि सो सब के चित चीनो ॥

पूर रही महि मो महिमा; मन मै तिनि आनि, मुझै कहि दीनो ॥९॥

बेद कतेब न भेद लहयो; तिहि सिध समाधि सबै करि हारे ॥

सिम्रित सासत्र बेद सबै; बहु भांति पुरान बीचार बीचारे ॥

आदि अनादि अगाधि कथा; ध्रूअ से प्रहिलादि अजामल तारे ॥

नामु उचार तरी गनिका; सोई नामु अधार बीचार हमारे ॥१०॥

आदि अनादि अगाधि सदा प्रभ; सिध स्वरूप सबो पहिचानयो ॥

गंध्रब जछ महीधर नागन; भूमि अकास चहूं चक जानयो ॥

लोक अलोक दिसा बिदिसा; अरु देव अदेव दुहूं प्रभ मानयो ॥

चित अगयान! सु जान सुय्मभव; कौन की कानि? निधान भुलानयो ॥११॥

काहूं लै ठोकि बधे उरि ठाकुर? काहूं महेस को एस बखानयो? ॥

काहू कहियो हरि मंदर मै? हरि काहू मसीत कै बीच प्रमानयो? ॥

काहूं ने राम कहयो, क्रिसना कहु; काहू मनै अवतारन मानयो ॥

फोकट धरम बिसार सबै; करतार ही कउ करता जीअ जानयो ॥१२॥

जौ कहो राम अजोनि अजै अति; काहे कौ कौसलि कुख जयो जू? ॥

काल हूं काल कहो जिह कौ; किहि कारण काल ते दीन भयो जू? ॥

सति सरूप बिबैर कहाइ सु; कयों पथ को रथ हाकि धयो जू? ॥

ताही को मानि प्रभू करि कै; जिह को कोऊ भेदु न लैन लयो जू ॥१३॥

क्यो कहो क्रिसन क्रिपानिधि है? किह काज ते बधक बाणु लगायो? ॥

अउर कुलीन उधारत जो; किह ते अपनो कुलि नासु करायो? ॥

आदि अजोनि कहाइ कहो; किम देवकि के जठरंतर आयो? ॥

तात न मात कहै जिह को; तिह कयो बसुदेवहि बापु कहायो? ॥१४॥

काहे कौ एस महेसहि भाखत? काहि दिजेस को एस बखानयो? ॥

है न रघ्वेस जद्वेस रमापति; तै जिन को बिसुनाथ पछानयो ॥

एक को छाडि, अनेक भजे; सुकदेव परासर बयास झुठानयो ॥

फोकट धरम सजे सब ही; हम एक ही कौ बिधि नेक प्रमानयो ॥१५॥

कोऊ दिजेस कु मानत है; अरु कोऊ महेस को एस बतै है ॥

कोऊ कहै बिसनो बिसुनाइक; जाहि भजे अघ ओघ कटै है ॥

बार हजार बिचार अरे जड़! अंत समे, सब ही तजि जै है ॥

ता ही को धयान प्रमानि हीए; जोऊ के अब है, अर आगै ऊ ह्वै है ॥१६॥

कोटक इंद्र करे जिह के; कई कोटि उपिंद्र बनाइ खपायो ॥

दानव देव फनिंद्र धराधर; पछ पसू नहि जाति गनायो ॥

आज लगे तपु साधत है; सिव ऊ ब्रहमा कछु पार न पायो ॥

बेद कतेब न भेद लखयो जिह; सोऊ गुरू, गुर मोहि बतायो ॥१७॥

धयान लगाइ ठगिओ सब लोगन; सीस जटा न हाथि बढाए ॥

लाइ बिभूत फिरयो मुख ऊपरि; देव अदेव सबै डहकाए ॥

लोभ के लागे फिरयो घर ही घरि; जोग के नयास सबै बिसराए ॥

लाज गई, कछु काजु सरयो नहि; प्रेम बिना प्रभ पानि न आए ॥१८॥

काहे कउ डि्मभ करै? मन मूरख! डि्मभ करे, अपुनी पति ख्वै है ॥

काहे कउ लोग ठगे? ठग लोगनि; लोग गयो, परलोग गवै है ॥

दील दयाल की ठौर जहा; तिहि ठौर बिखै, तुहि ठौर न ह्वै है ॥

चेत रे चेत, अचेत महा जड़! भेख के कीने, अलेख न पै है ॥१९॥

काहे कउ पूजत पाहन कउ? कछु पाहन मै परमेसर नाही ॥

ताही को पूज, प्रभू करि के; जिह पूजत ही, अघ ओघ मिटाही ॥

आधि बिआधि के बंधन जेतक; नाम के लेत, सबै छुटि जाही ॥

ताही को धयानु, प्रमान सदा; इन फोकट धरम करे, फलु नाही ॥२०॥

फोकट धरम भयो फल हीन; जु पूज सिला, जुगि कोटि गवाई ॥

सिधि कहा, सिल के परसै? बलु ब्रिध घटी, नव निधि न पाई ॥

आज ही आजु, समो जु बितयो; नहि काजि सरयो, कछु लाजि न आई ॥

स्री भगवंत भजयो न अरे जड़! ऐसे ही ऐसे सु बैस गवाई ॥२१॥

जौ जुग ते कर है तपसा; कुछ तोहि प्रसंनु न पाहन कै है ॥

हाथि उठाइ भली बिधि सो जड़! तोहि कछू बरदानु न दै है ॥

कउन भरोसो भया इह को? कहु; भीर परी, नहि आनि बचै है ॥

जानु रे जानु, अजान हठी! इह फोकट धरम, सु भरम गवै है ॥२२॥

जाल बधे सब ही म्रित के; कोऊ राम रसूल न बाचन पाए ॥

दानव देव फनिंद धराधर; भूत भविख उपाइ मिटाए ॥

अंत मरे पछुताइ प्रिथी परि; जे जग मै अवतार कहाए ॥

रे मन लैल! इकेल ही काल के; लागत काहि न पाइन धाए? ॥२३॥

काल ही पाइ भइओ ब्रहमा; गहि दंड कमंडल भूमि भ्रमानयो ॥

काल ही पाइ सदा सिव जू; सभ देस बदेस भइआ हम जानयो ॥

काल ही पाइ भयो मिट गयो जग; या ही ते ताहि सभो पहिचानयो ॥

बेद कतेब के भेद सबै तजि; केवल काल क्रिपानिधि मानयो ॥२४॥

काल गयो इन कामन सिउ जड़! काल क्रिपाल हीऐ न चितारयो ॥

लाज को छाडि न्रिलाज अरे! तजि काजि अकाज के काज सवारयो ॥

बाज बने गजराज बडे; खर को चड़िबो, चित बीच बिचारयो ॥

स्री भगवंत भजयो न अरे जड़! लाज ही लाज तै काजु बिगारयो ॥२५॥

बेद कतेब पड़े बहुते दिन; भेद कछू तिन को नहि पायो ॥

पूजत ठौर अनेक फिरयो; पर एक कबै हीय मै न बसायो ॥

पाहन को असथालय को; सिर नयाइ फिरयो, कछु हाथि न आयो ॥

रे मन मूड़! अगूड़ प्रभू तजि; आपन हूड़, कहा उरझायो? ॥२६॥

जो जुगियान के जाइ उठि आस्रम; गोरख को तिह जाप जपावै ॥

जाइ संनयासन के, तिह कौ कहि; दत ही सति है मंत्र द्रिड़ावै ॥

जो कोऊ जाइ तुरकन मै; महिदीन के दीन तिसे गहि लयावै ॥

आपहि बीच गनै करता; करतार को भेदु न कोऊ बतावै ॥२७॥

जो जुगीआन के जाइ कहै; सब जोगन को ग्रिह माल उठै दै ॥

जो परो भाजि संन्यासन कै; कहै दत्त के नाम पै धाम लुटै दै ॥

जो करि कोऊ मसंदन सौ कहै; सरब दरब लै मोहि अबै दै ॥

लेउ ही लेउ कहै सब को नर; कोऊ न ब्रहम बताइ हमै दै ॥२८॥

जो करि सेव मसंदन की; कहै, आनि प्रसादि सबै मोहि दीजै ॥

जो कछु माल तवालय सो; अब ही उठि भेट हमारी ही कीजै ॥

मेरो ई धयान धरो निसि बासुर; भूल कै अउर को नामु न लीजै ॥

दीने को नामु सुनै भजि रातहि; लीने बिना, नहि नैकु प्रसीजै ॥२९॥

आखन भीतरि तेल कौ डार; सु लोगन नीरु बहाइ दिखावै ॥

जो धनवानु लखै निज सेवक; ताही परोसि प्रसादि जिमावै ॥

जो धन हीन लखै तिह देत न; मागन जात, मुखो न दिखावै ॥

लूटत है पसु लोगन को; कबहूं न प्रमेसुर के गुन गावै ॥३०॥

आंखन मीचि रहै बक की जिम; लोगन एक प्रपंच दिखायो ॥

निआत फिरयो सिरु बधक जयो; धयान बिलोक बिड़ाल लजायो ॥

लागि फिरयो धन आस जितै तित; लोग गयो, परलोग गवायो ॥

स्री भगवंत भजयो न, अरे जड़! धाम के काम कहा उरझायो? ॥३१॥

फोकट करम द्रिड़ात कहा? इन लोगन को, कोई काम न ऐ है ॥

भाजत, का धन हेत? अरे! जम किंकर ते नह भाजन पै है ॥

पुत्र कलित्र न मित्र सबै; ऊहा सिख सखा कोऊ साख न दै है ॥

चेत रे चेत, अचेत महा पसु! अंत की बार, इकेलो ई जै है ॥३२॥

तो तन तयागत ही सुन रे जड़! प्रेत बखान त्रिआ भजि जै है ॥

पुत्र कलत्र सु मित्र सखा इह; बेग निकारहु, आइसु दै है ॥

भउन भंडार धरा गड़ जेतक; छाडत प्रान बिगान कहै है ॥

चेत रे चेत, अचेत महा पसु! अंत की बारि इकेलो ई जै है ॥३३॥