प्रकृति की कथा यानि कथा की प्रकृति
प्रकृति की कथा यानि कथा की प्रकृति
रामनाथ शिवेंद्र


कहानियों के बारे में बातंे होते ही अतीत की रहस्यमयी परतें खुलने लगती हैं, लगता है कि कहानी कहन का चलन बहुत पुराना है जो भले ही पहले की तरह नहीं पर आज तक चल रहा है। अतीत की परतें खुलते ही अतीत ही नहीं हमारा वर्तमान भी कलैया खाने लगता है, फिर तो अतीत और वर्तमान के बीच अपने पुरखों को लटकता हुआ देख कर मन बेचैन हो जाता है। कभी दादी की याद आती है तो कभी नानी की, पर दादा तथा नाना याद आते ही नही, याद आती हैं नानी और दादी। लगता है कि अतीत या वर्तमान की मानव सभ्यता में कहानियों से जितना मधुर रिश्ता नानी और दादी के रूप में नारियों का रहा है उतना नर रूपी जीव नाना और दादा का नहीं। कहानी कहन के मामलों में चाहे वह अतीत हो या वर्तमान नर विलुप्त दिखता है। कहानियों के प्रतिनिधि के रूप में नानी तथा तथा दादी का ही दिखना तथा उनमें से दादा तथा नाना का गायब होना, पुरुष समर्थित लिंगभेद का भी मामला हो सकता है। वैसे तो कहानियों के कहन का चलन अब कहीं नहीं दिख रहा है। नानी हों या दादी अब कहानियां नहीं कह रहीं, लोरियां नहीं सुना रहीं, इस तथ्य को इस तर्क से संतुष्ट नहीं किया जा सकता कि लोगों के पास समय ही नहीं, समय है भी तो वे कहानी कहन को अपनी कार्यसूची में नहीं डाल रहे। समान्य जीवन से कहानियों का विलुप्त होना और साहित्य में कविताओं के समानान्तर या उससे बढ़ कर कहानियों का स्थापित होना मानव सभ्यता के कई कोणों की ओर संकेत देता है। पर सामान्य जीवन से कहानियों का गायब होना विचारने वाली बात है? कहानियों की तरह ही हम विभिन्न संस्कारों के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों व गेय गारियों आदि को विलुप्त होता देख रहे हैं। साहित्य में कहानियों का स्थापित होना यह तो शुभ संकेत है पर सामान्य जनजीवन से इसका विलुप्त होना चिन्तनीय है। अगर हम परंपरा की बात करें तो हमें विचारना होगा कि कहानियों से जुड़ाव के मामलों में नारियों की तुलना में नर पीछे क्यों है? यह कभी नहीं सुना गया कि कोई नर बच्चों को सुलाने, बहलाने के लिए लोरी सुनाता है या उसे यह समझ है कि बच्चों को सुलाने के लिए उसे लोरी या उसके समकक्ष कोई चीज गा कर सुनाना है। जाहिर है उसके पास कंठ होता ही नहीं फिर वह क्या गुनगुनाएगा बच्चों को सुलाने के लिए जबकि नारी के पास कंठ होता है। नर का सामान्य जीवन तो पेट के अगल बगल ही घूमता और डोलता रहता है। नर सदैव अपने पेट के सहारे या उसे भरने के लिए ही समय का मूल्यांकन करता है और समय के साथ उसी के अनुसार छेड़, छाड़ भी। नारी ऐसा नहीं करती। नारी का सारा जीवन कंठ और पेट दोनों के अगल बगल घूमता और डोलता रहता है। अगर हम मनोविज्ञान का सहारा लें तो यह बात साफ हो जायेगी कि राग तभी निकलते हैं जब पेट और कंठ दोनों में हलचल हो, दोनों में संगति हो और दोनों में खुद को अभिव्यक्त करने की लालसा हो। कंठ की बेचैनी और पेट की जलन का विलीनीकरण या आत्मसातीकरण ही लोरी की धुनों व रागों का सर्जक हो सकता है, अन्य कोई बात नहीं। यही बात नानी और दादी को कहानियां कहने पर विवश करती थी। मेरा मानना है कि सामान्य जीवन से कहानियां गायब हो चुकी हैं और अब कहीं नहीं है, घुर से घुर देहात में भी कहानियां नहीं हैं, छठ्ठ,अन्नपं्रासन, और जिउतिया जैसे संस्कार अवसरों पर भी कहानियां नहीं कही जा रहीं। कहानियां किताबों की सामग्री बनती जा रही हैं शायद यही हमारी नियति भी है। बहरहाल ऐसा क्यों हो रहा है इस पर हमें विचार कर करना चाहिए। आज का समय न केवल जटिल है वरन क्रूर भी है, आज के समय में सामान्य को असामान्य में, सरल को जटिल में, सहज को असहज में, खंडन को विखंडन में तब्दील करने और करते रहने का चलन जीवन के सभी क्षेत्रों में विस्मयकारी ढंग से बढ़ रहा है और आदमी है कि खुद से संतुष्ट (आत्म मुग्ध नहीं) रहने की आदिम कला को भी नहीं जानता गोया वह अपनी प्रकृति के विपरीत जाने का अभ्यासी होता जा रहा है। कहानियों का नाता एक तरह से नारियों से साफ साफ दिखता है, इसका अर्थ यह नहीं कि कहानियां केवल स्त्रैणमना होती हैं और उनमें नर वाला प्रतिरोध नहीं होता, कहानियां चाहे जब की हों उनमें करुणा, दया, प्रेम, त्याग, वलिदान आदि ही नहीं प्रतिरोध व प्रतिकार भी होते हैं और उसे होना भी चाहिए। समकालीन हिन्दी कहानियों की बात करें तो सारा कुछ अन्धकार और प्रकाश के खेलों में उलझा दीख रहा है, आज की कहानी दृश्य श्रव्य माध्यमों के अराजक करतबों में उलझ कर अपना अस्तित्व तलाश रही है। कहानियों के हमारे प्रिय लेखक प्रेमचन्द के आदर्श व सिद्धान्त आज की कहानियों एवं उपन्यासों से गांधी के सिद्धान्तों की तरह गायब हो चुके हैं। आज राजनीति में गांधी के तस्वीर की पूजा ही प्रमुख है उनके विचारों या शिक्षाओं का अनुपालन नहीं। तो यह हाल है आज की कहानियों का। आज की कहानियों की जमीन ऐसी नहीं जिस पर पांव रख कर दो कदम भी चला जा सके, वहां बैठने सुस्ताने की बात सोचना बेवकूफी होगी। प्रेमचन्द के समय में यानि आजादी के पूर्व की कहानियों की जमीन देख लीजिए उसमें न केवल वह समय होगा बल्कि समय से प्रतिरोध करने की ऊर्जा भी होगी। कहा जा सकता है कि वह समय आजादी के संघर्षोे का था, सो कहानियां भी उसी मिजाज और तेवर की हुआ करती थीं जबकि आज का समय वैसा नहीं है। अब तो हम आजाद हैं सो हमारी कहानियों की जमीन भी आजादी वाली ही होगी, कुछ दूसरी होगी पर कैसी होगी? या कैसी होनी चाहिए, इस पर आप बहस करके देख लीजिए मुंहकी खानी पड़ेगी, चारो खाने चिŸा हो कर गिरने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा। आजादी के संघर्षों के दौरान कहानियों ने प्रतिरोध वाली जमीन को कहानियों का आधार बनाया था और साबित किया था कि कहानियों का अस्तित्व किसी मायने में कविताओं से कम नहीं। कहानियों को लोकसम्मान भी मिला, फलस्वरूप कहानियां कविताओं की तुलना में कुछ अधिक सम्मान पाने लगीं। लोगों ने कहानियों को चूमना चाटना शुरू किया और कविताओं को अपने दिलों से थोड़ा अलगिया दिया। हालांकि उस दौर की कवितायें भी प्रतिरोधी जमीन पर खड़ी थीं। बिना प्रतिरोध के तब साहित्य का कोई मतलब ही नहीं था। आज के समय में अनुरोध एवं प्रतिरोध दोनों वैश्विक हो गये हैं और बाजार के द्वारा चलाए जा रहे हैं। आज का समय अन्य बातों के अलावा इसलिए भी खतरनाक एवं जटिल है कि हमें क्या करना है और क्या करना चाहिए यह सारा कुछ बाजार द्वारा तय किया जा रहा है। बाजार का साहित्य पर खासतौर से कहानियों पर कैसा असर है इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि आज की भारतीय कहानियों से सारी दुनिया के तीन प्रमुख सवाल जमीन के सवाल, संपŸिा के सवाल तथा नारी के सवाल ही गायब हो चुके हैं। आज कहानियां दूसरे तरह के रहस्यमयी सवालों को उद्घाटित करने में अपनी सारी ऊर्जा का प्रयोग कर रही हैं। कम से कम भारतीय परिवेश में तो इन सवालों को कहानियों के माध्यम से प्रकाश में नहीं लाया जा रहा और कहीं लाया भी जा रहा तो उसे साहित्य के केन्द्र में नहीं, हासिए पर रखा जा रहा है, किसी कूड़ा करकट की तरह। आज बाजार ने कहानियों के बाजार के लिए नारी तन को नीति निर्देशक तत्व की तरह स्थापित कर दिया है। अभिव्यक्ति के सारे माघ्यमों में हम नारी तन के कत्थक नृत्य को देख भी रहे हैं, तथा उन दृश्यों को देखने के लिए विवश किए जा रहे हैं। क्या उसके प्रतिरोध में हम कुछ कर सकते हैं? लगता है कि जमीन, संपŸिा,(property) तथा नारी के सवालों पर बेहद कमजोर किस्म के जो कानून बनाए गए हैं उसे साहित्यि की जनता ने पर्याप्त मान लिया और महसूस कर लिया कि समाज के सारे अन्तरविरोध खुद बखुद समाप्त हो जाएंगे पर ऐसा हुआ नहीं। सारा कुछ पहले की तरह ही चल रहा है बिना किसी बदलाव के। यह समझना थोड़ा चौंकाने वाला हो सकता है कि जब जमीनदारी विनाश हो गया, जब घरेलू हिन्सा का कानून आ गया फिर साम्राज्यवादी व्यवस्था वाले बवाल क्यों रहेंगे, साथ ही साथ मानवाधिकार का कानून भी आ गया इतना ही नहीं सूचना का अधिकार भी आ गया, बाल शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया ऐसे में तो सारा कुछ ठीक ठाक और सबका राज्य वाले वसूलों से चलना चाहिए पर क्या ऐसा है? और बतौर साहित्यकार हमें भी समझ और अनुभूति के दोनों संस्तरों पर ऐसा ही मान व जान लेना चाहिए? इतना सारा कुछ होने के बाद का जो रहस्य है, और हम वाजिब समानता से भी जो काफी दूर हैं उन कारणों पर हमारी साहित्यिक जनता सोच व गुन ही नही रही। प्रेमचन्द हमारे लिए अविस्मरणीय हैं और आदर्श भी, पर क्या हम उनसे कुछ सीख पा रहे हैं। अपने समय के खतरनाक सवालों से हम प्रेमचंद जी की तरह क्यों नहीं टकरा रहे? हमारे मन में आज के खतरनाक समय से टकराने की आवश्यक बेचैनी क्यों नहीं है? हम क्यों खुद को बाजार के चकाचौंध में झोंक रहे हैं। हमें सोचना होगा। एक साहित्यकार के नाते बाजार के कार्टूनों में बन्द होना हमारी कार्य सूची नहीं होनी चाहिए। हालांकि यह सच है कि कहानियों का भी मुकम्मिल बाजार है और कहानियों को बाजारू बनाने वाली ताकतें भी काफी मजबूत हैं फिर भी एक साहित्यकार के नाते हमारा कर्तव्य क्या होना चाहिए, कुछ न कुछ तो निर्णय लेना ही होगा भले ही वह निर्णय आत्घाती किस्म का ही क्यों न हो। निश्चित है कि बाजार से टकराने पर बाजार के सारे उपभोगवादी संस्कारों से मुक्तिवोध की तरह या प्रेमचंद की तरह खुद को अलगियाना होगा यानि खुद को बदलना होगा और उस रूप में आना होगा जो बाजार के सारे कौशलों को ठेंगा दिखाने की क्षमता रखता हो। यही प्रकृति के करीब जाना होगा तभी होरी से मुलाकात हो सकती है, तभी कोई गोदान जन्म ले सकता है। बाजार की छतरी ओढ़ कर आत्ममुग्ध तो हुआ जा सकता है और तमाम तरह के आकर्षक मंचों पर बैठा जा सकता है पर जीवन के सच के करीब कभी भी नहीं जाया जा सकता है। जीवन का सच तो वहां है जहां प्रकृति है, जहां वे लोग है जो जीवन जीने की सारी ऊर्जा पेड़, पौधों, नदी नालों से प्राप्त करते हैं। उनके लिए बाजार कोई अर्थ नहीं रखता। कहानी के लिए कहानी के विषय का चुनाव खुद को खोलना है और बताना है कि आप बाजार के हसीन करतबों में गोता लगाने वाले हैं या लुकाठी हाथ में ले कर खुद का घर जलाने वाले हैं। आप कबीर हैं या दिल्ली के अकादमिहा हीरो। यह जो कहानी के विषय के चुनाव का मामला है, बहुत ही जहरीला है इसके जहर को भविष्य कभी माफ नहीं करता, वह अदालती कटघरे में खड़ा कर देता है और साफ साफ पूछता है ‘पार्टनर तुम्हारी राजनीति क्या है?’ खैर अभी उस तरह का समय नहीं है कि प्रकृति के करीब रहने वाले बाजारू लोगों के बाजार में खड़े होकर आदेश दे सकें... ‘तय करो किस ओर हो तुम।’ यह जो ‘ओर’(side) वाला मामला है वह कहानी के विषय वस्तु से ले कर पात्रों के चयन तक का है और पात्रों की पात्रता बरतने तक का भी। कहानीकार तो सर्जक होता है वह मनचाहा सृजन के लिए स्वतंत्र होता है पर उसकी लिखी कहानी तो स्वतंत्र होती नहीं, वह पाठकों की गुलाम होती है। पाठक उसका विश्लेषण अपनी समझ और लोकनिष्ठा के अनुसार करता है। कभी वह अनुभूति को ही समझ मान लेता है जबकि समझ, समझ है और अनुभूति अनुभूति है, दोनों में किसी भी तरह की समानता नहीं, दोनों दो छोर हैं। गनीमत है कि दोनों एक दूसरे पर जानलेवा हमला नहीं करते। यह साहित्य के लिए बहुत ही खतरनाक स्थिति है, अब ऐसे में कहानीकार करे क्या क्योंकि उसके पास भी अपनी अनुभूति और समझ दोनों होती है, यहीं लेखन का द्वन्द उपस्थित हो जाता है। अगर साहित्यकार अपनी समझ एवं अनुभूति को लोक अनुभूति और समझ से नहीं जोड़ता या जोड़ पा रहा तो निश्चितरूप से वह यह तय नहीं कर सकता कि वह किस ओर है। मेरा मानना है कि कहानीकार को उस लोक की तरफ जाना ही होगा जिस लोक के लोग सारे संसाधनों से वंचित हैं, उपेक्षित हैं, जो प्रकृति की नाच से जीवन जीने की ऊर्जा पाते हैं वे ही तो प्रकृति के उत्पाद हैं। जो प्रकृति के साथ हैं, वहीं प्रकृति का असली लोक है। प्रकृति के साथ चलने वाली रचना ही कृति हो सकती है इस लिए चाहेे कहानी हो या कविता उसे प्रकृति की कृति बनना ही होगा। ऐसा नहीं है कि समकालीन कहानियां प्रकृति के बुनियादी सवालों जमीन, संपŸिा तथा नारी से नहीं टकरा रहीं, वे टकरा रही हैं पर उन्हें जिस प्रतिरोधी चेतना के साथ इन सवालों से टकराना चाहिए, नहीं टकरा रहीं। लगता है आज के समय में जो प्रतिरोधी चेतना है वह भी सुविधावादी इच्छाओं की शिकार हो गई है। कथाकारों को आज के बाजारवादी व उपभोक्तावादी समय से टकराने के लिए पूंजीमूल्यवोधों वाली चेतना से अलग हटकर लोकमूल्य वोध वाली चेतना की तरफ जाना होगा, नहीं तो पूंजी के द्वारा ही गढ़े गये औजारों के द्वारा आज के समय से नहीं टकराया जा सकता। उदाहरण के लिए अगर आप ग्रामीण संस्कृति बचाने के लिए चिंतित हैं तो आपको विचाराना होगा कि आज का जो ग्राम है वह पहले वाला ग्राम नहीं है। ग्राम की पूरी सामाजिक संरचना को पूंजीमूल्यवोध वाली सŸाा ने बदल दिया है। अब वहां परधान जी हैं, सेक्रेटरी हैं, लेखपाल हैं, जो पूरी तरह से पूंजीमूल्य वोध वाली चेतना के प्रायोगिक प्रतिनिधि हैं। ये सभी लोग सुविधावादी इच्छाओं की पूर्ति के लिए मर मिटने वाले लोग हैं, इनके लिए जीवन का मतलब एकला चलो है, पूंजी के बिछौने पर सोने की कामना है, संपŸिा के विविध रूपों को चूमना चाटना है। ये पूंजी की कुटिल चेतना द्वारा संस्कारित किये गये लोग हैं, ये नहीं जानते हैं कि समाज क्या होता है, समानता क्या होती है? सहभागिता क्या होती है? पूंजी तो वैसे भी ‘आपन भला सकल जग माही’ की कुटिल चेतना वाली होती है, सो वे अपने विकास को समाज तथा देश का विकास मानते हैं। अगर आज के ग्राम को अगर कहानी का विषय बनाना है तो कथाकारों के लिए आवश्यक होगा कि वे परधान, सेक्रेटरी, लेखपाल आदि की पूंजीमूल्यवोध वाली चेतनाओं से टकराने के लिए गांवों में लोकचेतना वाले प्रतिरोधों को सृजित करें, तभी उनसे टकराया जा सकेगा नहीं तो नहीं।