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मध्यकालीन भारत/मराठों का उत्कर्ष

विकिपुस्तक से

''''🏰 मध्यकालीन भारत / मराठों का उत्कर्ष' भूमिका

मध्यकालीन भारत का इतिहास अनेक राजनीतिक उतार-चढ़ाव, साम्राज्यों के उदय और पतन से भरा हुआ है। इसी काल में दक्षिण भारत के पश्चिमी भाग — महाराष्ट्र में — मराठा शक्ति का उदय हुआ, जिसने आगे चलकर सम्पूर्ण भारत की राजनीति को प्रभावित किया। मराठों का उत्कर्ष केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि यह भारतीय आत्मगौरव, स्वतंत्रता और शासन कौशल का प्रतीक भी बना।

मराठों का उदय

17वीं शताब्दी में जब मुगल साम्राज्य अपनी चरम सीमा पर था, तब दक्कन क्षेत्र में मराठों ने अपनी स्वतंत्र सत्ता की नींव रखनी शुरू की। इस आंदोलन के केंद्र में छत्रपति शिवाजी महाराज (1627–1680) का व्यक्तित्व था।

शिवाजी महाराज का योगदान

राज्य स्थापना (1674) — शिवाजी ने रायगढ़ में छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक कर मराठा साम्राज्य की औपचारिक स्थापना की।

संगठित शासन — उन्होंने ‘अष्टप्रधान परिषद्’ के रूप में एक सुसंगठित प्रशासनिक ढांचा बनाया।

नौसेना निर्माण — भारत के प्रथम शासक थे जिन्होंने संगठित नौसेना का निर्माण किया, जिससे पश्चिमी तट की सुरक्षा सुनिश्चित हुई।

गनिमी कावा (गुरिल्ला युद्धनीति) — शिवाजी ने पर्वतीय प्रदेशों के अनुकूल छापामार युद्धनीति अपनाकर विशाल मुगल सेना को परास्त किया।

धार्मिक सहिष्णुता — उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को समान दृष्टि से देखा, जिससे जनता में व्यापक समर्थन मिला।

शिवाजी के पश्चात् मराठा शक्ति का विस्तार

शिवाजी की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी संभाजी, राजाराम, और ताराबाई ने मराठा साम्राज्य को बनाए रखने के लिए संघर्ष किया। 18वीं शताब्दी में पेशवाओं के नेतृत्व में मराठा शक्ति अपने चरम पर पहुँची।

प्रमुख पेशवा और उनका योगदान

बालाजी विश्वनाथ (1713–1720) — मराठा संघ (confederacy) की नींव रखी।

बाजीराव प्रथम (1720–1740) — दिल्ली तक मराठा प्रभाव स्थापित किया, ‘दिल्ली चलो’ नीति अपनाई।

बालाजी बाजीराव (नाना साहेब) — मराठा साम्राज्य का विस्तार चरम पर पहुँच गया, परंतु 1761 की तीसरी पानीपत की लड़ाई ने उनकी शक्ति को आघात पहुँचाया।

मराठा शासन की विशेषताएँ

विकेन्द्रित शासन प्रणाली (संघीय स्वरूप)

कुशल कर व्यवस्था (चौथ और सरदेशमुखी)

जनसामान्य से गहरा जुड़ाव

क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृति का संरक्षण

पतन और प्रभाव

पानीपत की हार के बाद भी मराठों ने शीघ्र ही अपनी स्थिति पुनः सुदृढ़ की और 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक भारत की राजनीति में निर्णायक शक्ति बने रहे। यद्यपि 1818 में अंग्रेजों से हार के बाद मराठा साम्राज्य समाप्त हो गया, लेकिन उनकी स्वतंत्रता की भावना, संगठन कौशल और शासन व्यवस्था ने भारत के स्वाधीनता आंदोलन को प्रेरणा दी।

निष्कर्ष

मराठों का उत्कर्ष भारतीय इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। शिवाजी महाराज के नेतृत्व में आरंभ हुआ यह आंदोलन विदेशी शासन के विरुद्ध भारतीय अस्मिता का प्रतीक बना। मराठों ने न केवल मुगल सत्ता को चुनौती दी बल्कि यह सिद्ध किया कि जनता की शक्ति और नेतृत्व के बल पर कोई भी राष्ट्र आत्मनिर्भर हो सकता है। ''''बोल्ड टेक्स्ट'