मौद्रिक नीति और मुद्रास्फीति/मौद्रिक नीति और मुद्रास्फीति

विकिपुस्तक से
Jump to navigation Jump to search

विकसित देशों में, समय-समय पर जो मौद्रिक नीति उनके केंद्रीय बैंकों द्वारा घोषित की जाती है, उसका लक्ष्य मुद्रास्फीति की दर को निम्न स्तर पर बनाए रखना होता है। भारत और अन्य अनेक विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रीय बैंकों के दो लक्ष्य होते हैं-मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना और विकास को गति देना।

अत: भारतीय रिजर्व बैंक को हमेशा संतुलन का काम करना होता है। तीन-तीन महीने पर होने वाली मौद्रिक नीति की समीक्षा में विकास की गति में कोई बाधा पहुंचाएं बिना मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना होता है। यदि ऐसी कोई असामान्य स्थिति सामने आती है, जिसमें नीतिगत कार्रवाई की आवश्यकता होती है तो निश्चय ही, केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप कर सकता है।

वर्ष 2008 में उभर कर सामने आया विश्वव्यापी मुद्रा संकट देखते-देखते ऐसी अप्रत्याशित आर्थिक मंदी में बदल गया, जिसका अनुभव 1928 की भीषण मंदी के बाद पहले कभी नहीं हुआ। इसके मद्देनजर भारत सहित पूरे विश्व के केंद्रीय बैंकों को इस भयावह संकट से उबरने के लिए तेजी से मौद्रिक कार्रवाई करनी पड़ी।

बैंकिंग प्रणाली में आई तरलता#नकदी की भीषण कमी और डूबने वाले कर्जों की बढ़ती संख्या के कारण अनेक प्रमुख अंतराष्ट्रीय बैंकों के लड़खड़ा जाने से प्रणाली में पैसा डालने के लिए नीतिगत कार्रवाई की जरूरत थी ताकि मांग में तेजी आए और अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए निर्णायक विकास की विपरीत गति को रोका जा सके।

मुद्रा की आपूर्ति और ब्याज दरों पर कठोर नियंत्रण करने के स्थान पर केंद्रीय बैंक ने सरल मौद्रिक नीति अपना कर बैंकिंग प्रणाली में धन लगाने और ब्याज दरों में कमी करने की नीति अपनाई। कुछ विकसित देशों में तो ब्याज दर लगभग शून्य तक पहुंच गई थी। ऐसा इसलिए किया गया ताकि नकारात्मक (ऋणात्मक) विकास की दिशा को पलट कर उसे फिर से सकारात्मक (धनात्मक) मोड़ दिया जा सके। आरबीआई का रूढ़िवादी दृष्टिकोण

अन्य अनेक देशों के विपरीत भारतीय रिजर्व बैंक का रवैया अपनी मौद्रिक नीति के प्रति अभी भी रूढ़िवादी बना हुआ है और सरकार रुपए की पूर्ण परिवर्तनशीलता के बारे में बहुत सतर्क है। भारत के इस दृष्टिकोण से भारी संकट को टालने में मदद मिली है और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंदी से हम ज्यादा तेजी से उबर सके हैं, तथा अर्थव्यवस्था वापस पटरी पर आ गई है। संकट के दौरान सरकार और रिजर्व बैंक राजकोषीय और मौद्रिक प्रोत्साहन पैकेज लेकर आए ताकि अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित किया जा सके। बढ़े हुए व्यय के कारण सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6.7% (2009-10) तक पहुंच गया। इसलिए अधिक ऋण लेना पड़ा।

रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति काफी उदार हो गई और प्रणाली में और अधिक नकदी डाली गई; नीतिगत दरों को नीचे लाया गया ताकि ब्याज दरों में कमी लायी जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि कर्ज लेने की लागत कम बनी रहे।

इस उद्देश्य के लिए केंद्रीय बैंक ने जो मौद्रिक साधन अपनाए, वे हैं नकद आरक्षी अनुपात (कैश रिजर्व रेशियो-सी आर आर), धनराशि का प्रतिशत, जमा राशि का वह अंश जो बैंकों को केंद्रीय बैंक के पास रखना होता है और महत्वपूर्ण लघु अवधि नीतिगत दरें-रेपो और रिवर्स रेपो दरें (रेपो वह दर होती है, जिस पर बैंक रिजर्व बैंक से रात भर के लिए अथवा लघु अवधि के लिए कर्ज लेते हैं। रिवर्स रेपो दर उस दर को कहते हैं जिस पर बैंक अपनी अति शेष राशि केंद्रीय बैंक के पास जमा करते हैं)।

विदेशों से भारी मात्रा में आने वाली पूंजी तथा निवेश के लिए देश में बढ़ती मांग के कारण, वैश्विक संकट से पूर्व, बड़ी तादाद में ऋण उठाए जा रहे थे। केंद्रीय बैंक ने नकद आरक्षी अनुपात धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 9% तक पहुंचा दिया था ताकि बैंकिंग प्रणाली में पड़ी हुई अतिशेष नकदी को सोख लिया जाए और अर्थव्यवस्था में आवश्यकता से अधिक गर्मी न आ सके, विशेष कर रियल एस्टेट (जमीन-जायदाद) क्षेत्र में, जहां बुलबुले उठने लगे थे अर्थात् खतरा नजर आने लगा था। इसी तरह, रिजर्व बैंक ने कई चरणों में रेपो और रिवर्स रेपो दरों में वृध्दि की। रेपो दर तो बढ़ कर 6% तक पहुंच गई थी। ऐसा इसलिए कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उधार देना बैंकों के लिए महंगे का सौदा बन जाए।