योग द्वारा मानसिक आरोग्यता

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योग द्वारा मानसिक आरोग्यता की अवधारणा

सारांश[सम्पादन]

भूमण्डलीकरण, कम्प्यूटरीकरण, अभूतपूर्व तीव्र आवागमन एवं संदेशवाहन, जनसंख्या वृद्धि की तीव्र गति, सूचना प्रौद्योगिकी के अभूतपूर्व विकास एवं विश्व स्तर पर मानव अर्न्तक्रिया के वर्तमान युग में मनुष्यों में तनाव का स्तर तेजी से बढ़ा है और मानसिक आरोग्य बनाये रखना कठिन हो गया है। पूरब और पश्चिम सब कहीं इस समस्या पर विचार किया जा रहा है और सुलझाव उपस्थित किये जा रहे हैं। इस विषय पर सब कहीं अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं। मनोविज्ञान के क्षेत्र में बुद्धि लब्धि (IQ) की उपस्थिति को मानव विकास के लिए अपर्याप्त पाकर अब संवेग लब्धि (EQ) आवेग लब्धि (PQ) और आध्यात्मिक लब्धि (SQ) की बात की जाने लगी है।

पाश्चात्य मनोचिकित्सा के क्षेत्र में नये-नये विकास होने के साथ पूरब और पश्चिम में सब कहीं विचारकों और चिकित्सकों ने योग द्वारा मानसिक आरोग्य की सम्भावनाएं खोजने का प्रयास किया है। भावातीत ध्यान योग का पश्चिम में इस क्षेत्र में भारी स्वागत किया गया है। प्रचार के अभाव में भारत की विभिन्न योग प्रणालियों एवं श्री अरविन्द के योग समन्वय के विषय में पश्चिम में अभी अधिक जानकारी नहीं हैं फिर भी सभी प्रकार की योग प्रणालियों, विशेषतया हठयोग के आश्चर्य जनक परिणाम सामने आये हैं। विभिन्न योग प्रणालियों द्वारा मानसिक आरोग्य कहां तक प्राप्त किया जा सकता है, इस विषय पर तुलनात्मक समीक्षा का अभी अभाव है। प्रस्तुत प्रस्तावित लेख द्वारा इसी कमी को पूरा करने का प्रयास है।

प्रायः दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक सम्प्रदायों में मन को स्वीकार किया गया है। मन के नियन्त्रण से ही योग मार्ग में आगे बढ़ा जा सकता है। मन क्या है? इसके विषय में दार्शनिकों ने अपने-अपने मत दिए हैं तथा मन को अन्तःकरण के अन्तर्गत स्थान दिया है। मन को नियन्त्रण करने की विभिन्न योग प्रणालियां विभिन्न दार्शनिकों ने बतलायी है। मेरे विषय का यही विचारणीय प्रश्न है क्योंकि वर्तमान समय में योग द्वारा मन को नियन्त्रण में करते हुए व मानसिक आरोग्यता प्राप्त करते हुए ही हम आध्यामित्कता (समाधि) को प्राप्त करते हैं तथा आध्यात्मिकता (समाधि) में ही हमें मानसिक आरोग्यता प्राप्त होती है यह सर्वविदित है।

इस लेख में मानसिक आरोग्य की अवधारणा, पाश्चात्य तथा भारतीय अवधारणा मनोवैज्ञानिकों, दार्शनिकों द्वारा बतलाये हुए योग द्वारा मानसिक आरोग्यता प्रदान करना बतलाया गया है।

शब्दखोज - भारतीय अवधारणा , पाश्चात्य अवधारणा , गीता, पतंजलि

परिचय[सम्पादन]

श्री आर0एस0 भोगल (कैवल्यधाम) के अनुसार यदि संसार के मनौवैज्ञानिक विवेचन के इतिहास को निष्पक्ष रूप से खोजा जाए, तो यह ज्ञात होगा कि यूनानी मनोविज्ञान के जन्म के सैकड़ो वर्ष पूर्व भारतीय मनोवैज्ञानिकों ने आत्म-विकास, चरित्र निर्माण, आदत का मनोविज्ञान, पशु मनोविज्ञान नारी और पुरूष मनोविज्ञान, यौन मनोविज्ञान, मानसिक आरोग्य मनोविज्ञान, बाल मनोविज्ञान, चिकित्सात्मक मनोविज्ञान इत्यादि मनोविज्ञान के अनेक पहलुओं में महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक तथ्यों का पता लगाया था। प्राचीन उपनिषदों तथा भारत में हजारों साल तक करोड़ो व्यक्तियों ने इन तथ्यों पर अमल करके इनकी प्रमाणिकता को सिद्व किया है। भले ही इसे दार्शनिक मनोविज्ञान माना जाए तो भी इससे उसका महत्व कम नही होता क्योंकि प्राचीन यूनानी मनोविज्ञान भी दार्शनिक मनोविज्ञान ही था। मानसिक आरोग्यता को जानने से पहले यह जानना आवश्यक है कि स्वास्थ्य क्या है? विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ‘‘ स्वास्थ्य शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक सुख की एक पूर्ण अवस्था है न कि केवल रोग विशेष तथा शारीरिक कमी की अनुपस्थिति।’’ यह परिभाषा विकासपूर्ण है। अतः विद्वानों के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य की परिभाषा-‘‘मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना और निराकरण करने की तथा ऐसा करते हुए योग्य व समुचित पर्यायों का चयन करने की वह क्षमता है जिससे सुख की भावना और सन्तोष का अनुभव हो।’’ ‘‘मानसिक स्वास्थ्य स्वीकार करता है कि सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ केवल मानसिक रोगों से मुक्त होना नहीं बल्कि कुछ और है।’’

मूल्याकंन के उददेश्य व अनुभव के आधार पर मानसिक स्वास्थ्य के चार प्रभाव-शाली परिणाम हो सकते हैं।

  • 1.सकारात्मक उददेश्य व प्रभावशाली अनुभव का मूल्यांकन।
  • 2. नकारात्मक प्रभावपूर्ण अनुभव का मूल्यांकन।
  • 3. नकारात्मक व्यवहार की योग्यता में व्यक्तिगत योग्यता का अनुभव।
  • 4. व्यक्तिगत सकारात्मक अनुभव का ज्ञान (साहू और विद्याधर 1998)

विभिन्न कारणों से वर्तमान काल में मानसिक आरोग्यता को प्राप्त करना कठिन हो गया है। हजारों वर्षो पहले रचित मनोवैज्ञानिक व दार्शनिक पतंजलि योग सूत्र के अनुसार मानसिक अस्वास्थ्य के मूल में मुख्य रूप से ‘‘क्लेश’’ होते हैं। क्लेश पॉंच प्रकार के हैं।

  • 1. अविद्या : दृश्य जगत के साथ आत्मीकरण होना तथा अपने वास्तविक स्वरूप को भूला देना अविद्या है। दूसरे शब्दों में अपने शरीर स्थान वस्तुओं इत्यादि के प्रति आसक्ति उत्पन्न होना तथा उन्हे शाश्वत सत्य मान लेना अविद्या है।
  • 2. अस्मिता : ‘‘मैं हॅूं’’ का भान या अहंकार भाव अस्मिता है। इस भाव के कारण जीवन के प्रत्येक क्षण व विशेष आध्यात्मिक प्रगति में सबसे अधिक बाधा मानी गयी है।
  • 3. राग : सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्त होना राग है।
  • 4. द्वेष : दूसरों के प्रति घृणा का भाव रखना द्वेष है।
  • 5. अभिनिवेश : जीवन में प्रत्येक क्षण मृत्यु का भय अभिनिवेश है।

उक्त क्लेश आनुवंशिकता के कारण प्राप्त होते हैं तथा फिर ये क्लेश पर्यावरण से प्राप्त हुए तनावों से मिलकर मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह बिगाड़ देते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य का सिद्वान्त[सम्पादन]

पाश्चात्य अवधारणा[सम्पादन]

पाश्चात्य अवधारणा के अनुसार ‘‘ मानसिक आरोग्य’’ को समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि पाश्चात्य मनोविज्ञान क्या है? पाश्चात्य मनोविज्ञान मानव व्यवहार का विज्ञान है। यह मानव जीवन के व्यावहारिक पक्षों का अध्ययन करता है। पाश्चात्य मनोविज्ञान में मन द्वारा मानसिक जगत् का ही अध्ययन किया जाता है तथा यह मानव के व्यवहार जगत् तक ही सीमित रहता है। पाश्चात्य मनोविज्ञान में यह मान्यता है कि ‘‘शरीर की क्रिया से ही मन क्रियाशील होता है’’उसमें मन को स्वतंत्र सत्ता नहीं माना गया है। बल्कि मन को साधारण मानसिक प्रक्रियाओं के ज्ञान का साधन माना गया है। मन को कम्प्यूटरवत् यंत्र माना गया है। उसमें वस्तु प्रत्यक्ष के आधार पर ही , वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा प्रयोग से प्राप्त ज्ञान को वास्तविक ज्ञान माना गया है।’’ पाश्चात्य मनोविज्ञान में मन को मस्तिष्क की एक क्रिया या कार्य माना गया है , और क्रिया के अतिरिक्त मन का कोई अस्तित्व स्वीकार नहीं किया गया है। पाश्चात्य मनोविज्ञान में मानसिक आरोग्यता प्राप्त करने के लिए मन को प्रसन्न रखने को कहा गया है।

मनोविद् स्टेंन्ज के अनुसार -‘‘मानसिक स्वास्थ्य से तात्पर्य उस सीखे हुए व्यवहार से अधिक कुछ भी नहीं है , जो कि सामाजिक रूप से अनुकूल है और जो व्यक्ति को जीवन का पर्याप्त रूप से सामना करने की क्षमता देता है।’’

पी0 वी0 ल्यूकन के अनुसार -‘‘मानसिक रूप स्वस्थ व्यक्ति वह है जो स्वयं सुखी है। अपने पडोसियों के साथ शांतिपूर्वक रहता है , अपने बच्चों को स्वस्थ नागरिक बनाता है और इन आधारभूत कर्त्तव्यों को करने के बाद भी जिसमें इतनी शक्ति बच जाती है कि वह समाज के हित में कुछ कर सके।’’

कार्ल मेनिंगर के अनुसार - ‘‘मानसिक स्वास्थ्य अधिकतम प्रभावशीलता एवं सहर्षता के साथ वातावरण एवं उसके प्रत्येक दूसरे व्यक्ति के साथ मानव समायोजन एक संतुलित मनोदशा, सजग बुद्वि , सामाजिक रूप से मान्य व्यवहार और प्रसन्नचित बनाए रखने की क्षमता है।’’

अतः मानसिक स्वास्थ्य व्यक्तित्व के विश्वस्त गुणों की स्थितियों को परिभाषित करता है। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति समाज से समायोजन कर सकता है। वह संतुलित मानसिक स्थिति को प्रदर्शित करता है जिससे विभिन्न परिस्थितियों में वह एक श्रेष्ठ व्यवहार कर सकता है। समाज के साथ समायोजन करने के लिए व्यक्ति को सामान्य होना आवश्यक है।

सामान्य तथा असामान्य के सन्दर्भ में मनौवैज्ञानिकों में आज भी आम सहमति नहीं है। एक समाज में सामान्य मानी जाने वाली व्यवहार शैली दूसरे समाज में असामान्य मानी जा सकती है। किसी भी समाज में संस्कृति, परिस्थिति तथा काल के अनुसार ‘‘सामान्य’’ और ‘‘असामान्य’’ की संकल्पनायें बन जाती है। उसी प्रकार यह आवश्यक नहीं है कि किसी कार्य में प्राप्त क्षमता तथा परिणामकारिता यदि मनोविज्ञान की दृष्टि से भी सामान्य मानी जाय। सामान्य को समझने के लिए हमें आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के अर्थो को समझना आवश्यक है।

  • 1- फ्रायड का विचार : फ्रायड के मतानुसार ‘‘मन के उपकरण’’ के तीन घटक इदम् , अहम् , परम् है। इन तीनों घटकों में होने वाले असन्तुलन के परिणाम स्वरूप ‘‘असामान्यता’’ का उद्भव होता है। इनका कारण बचपन में दबी हुयी आवश्यकतायें, इच्छायें तथा व्यक्तिगत मूल्य निर्माण में असफला ही है। ये सभी ‘‘असामान्यता’’ के कारण हैं। फ्रायड की दृष्टि से प्रेम करने की तथा प्रेम को स्वीकार करने की क्षमता तथा उत्पादन क्षमता ‘‘समान्यता’’ के संकेतक हैं।
  • 2- एरिक्सन का विचार : ऐरिक्सन के अनुसार ‘व्यक्तित्व’ क्रमशः धीरे धीरे विकसित होने की प्रक्रिया है। जन्म से मृत्यु तक कुछ प्रमुख विकास अवस्थायें हैं जिनमें व्यक्तित्व के विशेष पहलू विकसित होते है जैसे - विश्वास, स्वनियंत्रण, उपक्रमशीलता उत्पादन क्षमता, सुसवादित्व इत्यादि। ऐरिक्सन के मत में इस विचार प्रक्रिया में गड़बड़ी उत्पन्न होने पर मानसिक ‘‘असामान्यता’’ का उदभव हो सकता है या किसी एक पहलू का विकास ठीक से न हो पाये तो भी ‘‘असामान्यता’’ की स्थिति होती है।
  • 3- आलपोर्ट के विचार : मैत्री के सामाजिक सम्बन्ध जीवन में स्वयं से परे जाकर विचार करने की क्षमता , वास्तविकता का अहसास, योग्य तथा उपयुक्त कुशलताओं की परिपूर्ति का प्रयास इत्यादि बातें मानसिक ‘‘समान्यता’’ की परिचायक है।
  • 4- मैस्लों का विचार : मैस्लों ने उन लोगों का अध्ययन किया जो जीवन में को्रई उच्च ध्येय रखते थे और जिन्हें उन ध्येयों की परिपूर्ति के सम्बन्ध में समुचित शुद्व ज्ञान था उसके अनुसार मनुष्य के सामने पॉंच प्रकार की आवश्यकताओं के एक के ऊपर एक ऐसे पॉंच स्तर होते हैं-
  • 1. आत्मक्षमता पूर्णतया साकार करना।
  • 2. आत्मसम्मान तथा स्वतत्व।
  • 3. प्रेम तथा सामाजिक सम्बन्ध।
  • 4. सुरक्षा।
  • 5. शारीरिक मूलभूत आवश्यकताओं जैसे भूख , प्यास इत्यादि।
  • 5- आदर्शवादी विचार : मैस्लो के मतानुसार किसी एक या अधिक आवश्कताओं की पूर्ति में मनुष्य की असफलता मानसिक ‘‘असामान्यता’’ का कारण बन सकती है। यह विचार मानव को अपेक्षाकृत उच्च दृष्टि से देखता है। इस श्रेणी में प्रमुख रूप से मनोवैज्ञानिक मैस्लो और रोजर्स आते हैं। मैस्लो मनुष्यों के स्वप्रकटीकरण और स्वत्व विकास की उच्चस्तरीय आवश्यकताओं की पूर्ति को अधिक महत्व देता है। उसके अनुसार मनुष्य स्वयं में निहित सुप्त क्षमता विकसित कर अपनी एक वास्तविक पहचान बनाता है। इस प्रकार वह एक विशेष स्वतंत्रता का उपभोग करता है। ऐसा व्यक्ति ही मानसिक दृष्टि से ‘‘सामान्य’’ कहलाता है। उसका व्यवहार ‘‘सामान्य’’ होगा।

एक आदर्श जीवन शैली - (W.H.O) के अनुसार ‘‘सकारात्मक अच्छा क्रियाकलाप’’ ही मानसिक स्वास्थ्य का सिद्वान्त है। अतः मानसिक स्वास्थ्य से हमारा दृष्टिकोण रोगों की कमी के बजाय एक आदर्श के सम्बन्ध में है। कोर्चिन के शब्दों में समान्यतया- ‘‘मूल्यों से बचना न तो सम्भव है और न तो वांछित।’’ ऑफर और सबरीन ने मनोविज्ञान, मनोरोग विज्ञान, समाजशास्त्र एवं मानव शास्त्र में सामान्यतया के विषय में बतलाया। कोर्चिन ने 'सामान्यता' का निर्धारण इन पॉंच कसौटियों पर किया है-

  • 1- स्वास्थ्य की मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सामान्यता : स्वास्थ्य का सामान्य अर्थ ‘‘बीमार न होना’’ या रोग का अभाव है। यदि व्यक्ति में कोई गम्भीर विकृति नहीं है तो व्यवहार को सामान्य माना जाता है। ऑफर व सबरीन के अनुसार - यह श्रेष्ठ या आदर्श की स्थिति में नहीं बल्कि केवल पर्याप्त की स्थिति को इंगित करता है। उक्त प्रकार से सामान्य व्यवहार वाला व्यक्ति स्वस्थ है तथा समाज से समायोजन करके चलते हुए मानसिक आरोग्यता प्राप्त करता है।
  • 2- आदर्श की मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सामान्यता : आदर्श व श्रेष्ठ की स्थिति में व्यक्ति सामान्य हो तो वह सामान्य है। कार्लरोजर्स के अनुसार पूर्णतया क्रियाशील व्यक्ति तथा आलपार्ट का परिपक्व व्यक्तित्व आदि इस आदर्श के विविध रूप है। फ्रायड के अनुसार- सामान्यता एक आदर्श कल्पना है। दूसरे अर्थ में प्रत्येक विचारक के लक्षण अपने अपने मूल्यों के अनुसार भिन्न भिन्न होने से ये आदर्श या उपचार की प्रक्रिया को लक्ष्य प्रदान करता है। इस विचार से मानसिक आरोग्यता प्राप्त होती है।
  • 3- मनोवैज्ञानिक दृष्टि से औसत की सामान्यता : सांख्यिकी के अनुसार जो औसत है, वही सामान्य है तथा औसत से अधिक या कम असमान्य होता है। उदाहरणनुसार - बुद्धि लब्धि का मध्यमान (औसत) 100 है। 100 से कम 80 व 100 से अधिक 120 तक सामान्य बुद्धि तथा 100 से कम 50 व 100 से अधिक 150 तक असामान्य कहा जायेगा। यह विचार वैज्ञानिक दृष्टि की अपेक्षा व्यावहारिक दृष्टि से सही व उपयोगी है क्योंकि यह व्यक्ति के गुणों के वास्तविक अनुभव के उत्पन्न तथा वर्गीकरण के आधार पर तैयार होता है।
  • 4- सामाजिक स्वीकार्यता की मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सामान्यता : समाजशास्त्री एवं मानवशास्ति्रयों के अनुसार यदि कोई व्यवहार शैली, आदर्श समाज के द्वारा मान्य या समाज के अनुरूप होते हैं तो उसे सामान्य कहा जाता है और यदि ऐसा नहीं है तो उसे असामान्य कहा जाता है। लिनटन के अनुसार - ‘‘सामान्य व्यवहार वही है जो सामाजिक प्रत्याशाओं के साथ मेल खाता हो।’’ परन्तु यह जरूरी नहीं है कि एक समाज में सामान्य कही जाने वाली व्यवहार शैली, आदर्श दूसरे समाज में भी सामान्य कही जाये कुछ व्यवहार शैली, आदर्शो को दूसरे समाज में असामान्य माना जा सकता है।
  • 5- एक प्रक्रिया की मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सामान्यता : एरिक्सन का व्यक्तित्व सिद्वान्त इसी पर आधारित है। इसके अनुसार शिशु अवस्था की सामान्य क्रियाओं के प्रौढ़ावस्था में असामान्य माना जाता है। इसी प्रकार युवावस्था की सामान्य क्रियाओं को वृद्वावस्था में असामान्य माना जाता है। इस प्रकार एक समय जो प्रक्रिया शिशु के लिये सामान्य है वही प्रक्रिया प्रौढ़ावस्था तथा युवावस्था में असामान्य हो जाती है। यदि शिशु वाले कार्य प्रौढावस्था में भी किए जायेगें तो वह असामान्य कार्य समाज द्वारा बतलाये जायेंगे। इस प्रकार पाश्चात्य मनौवैज्ञानिकों द्वारा मानसिक रूप से आरोग्यता हेतु वह व्यक्ति सामान्य है, जो रोगी नहीं, औसत है। सामाजिक मानक मानता है और आदर्श, परिपक्व एवं पूर्ण क्रियाशील व्यक्तित्व है। मानसिक स्वास्थ्य की पहचान उसके लक्षणों से करना उचित प्रतीत होने से मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के कुछ प्रमुख लक्षण इस प्रकार से हैं :-
  • 1- आत्म मूल्यांकन
    2- आत्म नियंत्रण की भावना
    3- समायोजन की क्षमता
    4- सुरक्षा की क्षमता
    5- जीवन के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण
  • 6- समन्वित व्यक्तित्व :- इसमें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, बौद्धिक, भावनात्मक आदि आयाम संतुलित रहते हैं जिससे व्यक्ति अन्दरूनी तनाव से मुक्त रहता है क्योंकि सभी बुद्धि संवेग , क्रिया आदि आयाम पूरी शक्ति से कार्य करते हैं जिससे अन्दरूनी संघर्ष में शक्ति नष्ट नहीं होती तथा व्यक्ति मानसिक आरोग्यता को प्राप्त करता है।

जहोदा (1958) ने मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के विषय में कई परिभाषाएॅं दी हैं और मानसिक स्वास्थ्य के निम्नलिखित सिद्वान्त प्रतिपादित किये है।

  • 1- स्वयं के प्रति व्यक्ति का रूझान
  • 2- वृद्धि विकास और आत्म निरीक्षण
  • 3- युग्मन
  • 4- स्वयत्तता
  • 5- वास्तविकता का ज्ञान
  • 6- वातावरणीय आधिपत्य

भारतीय अवधारणा[सम्पादन]

‘‘ संसार के सभी प्रगतिशील देशों में सभ्यता के जटिल होने के साथ साथ मानसिक रोगों की संख्या भी बढ़ रही है और इस दिशा में चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में बराबर अनुसन्धान किये जाते रहे हैं। हिन्दू मनोविज्ञान अर्थात भारतीय मनोविज्ञान ने अति प्राचीनकाल से मानसिक आरोग्य के क्षेत्र में विचार किया तथा दो दिशायें बतलायी एक तो चिकित्सात्मक दृष्टि से और दुसरा अध्यात्मिक दृष्टि से। भारतीय चिकित्सा के ग्रन्थों में विभिन्न मानसिक रोगों के लक्षणों और कारणों तथा उपचारों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। दूसरी ओर समाधि की चरम अवस्था को प्राप्त करने के लिए साधना करने वाले मनीषियों ने भी विभिन्न प्रकार की मानसिक व्याधियों और उनकों दूर करने के उपायों पर विचार किया है। भारतीय आध्यात्मिक साधना में मानसिक आरोग्य एक आवश्यक शर्त रही है। इसे प्राप्त किए बिना आध्यात्मिक साधना सम्भव नहीं है। अतः आध्यात्मिक साधना के मार्ग में आगे बढ़ने वाले जिज्ञासुओं को सबसे पहले मानसिक आरोग्य प्राप्त करना चाहिए। इस दिशा में भारतीय विचारको का महत्वपूर्ण योगदान है।’’ मानसिक आरोग्य और चिकित्सा के क्षेत्र में भारतीय मनोवैज्ञानिकों के विचार लम्बी सांस्कृतिक परम्पराओं और हजारों सालों के अनुभवों पर आधारित है।

उपनिषद् ग्रन्थों में मानवचेतना की दशाओं की चर्चा की गयी है। माण्डूक्य उपनिषद् के अनुसार आत्मा की 4 दशायें होती हैं जिनमें भिन्न-भिन्न प्रकार की चेतना पायी जाती है। जैसे जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। जाग्रत चेतना वेश्वानर कहलाती है। स्वप्न की चेतना तेजस कहलाती है। सुषुप्ति की चेतना को प्रज्ञा कहा जाता है। तुरीय की अवस्था आनन्द की अवस्था है। अधिकतर उपनिषदों ने चेतना की इन्हीं चार अवस्थाओं को माना है। किन्तु फिर इसके अपवाद भी हैं। प्रपंच सार तन्त्र के अनुसार उपरोक्त चार दशाओं के अलावा चेतना की एक अन्य दशा भी है जिसको तुरीयातीत कहा गया है। ब्रह्म बिन्दु उपनिषद में उन्मनी भाव नाम से तुरीय अवस्था से परे एक अवस्था बतायी गयी है। यह चेतना की सर्वोच्च अवस्था है।

योगशिखोपनिषद के अनुसार- उन्मनी भाव की चेतना में मन की समस्त वृत्तियॉं समाप्त हो जाती है। मानसिक आरोग्यता को प्राप्त करते -करते साधक अपने लक्ष्य (समाधि) की तरफ अग्रसर होता जाता है। इस प्रकार भारतीय मनोवैज्ञानिक ने चेतना की विभिन्न अवस्थाओं का विश्लेषण करके मनोवैज्ञानिक समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया है। चूॅंकि अनेक मनोजनित रोग मनस में ही जन्म लेते हैं। भारत के मनोवैज्ञानिक खोज का लक्ष्य चेतन और अचेतन सभी प्रकार के प्रयासों से एक अति चेतन अवस्था को प्राप्त करना रहा है जो कि सब प्रकार के संकलन की अवस्था है। इसे परमार्थ कहा जा सकता है। इसे आत्म अथवा ब्रह्म का साक्षात्कार भी कहा गया है। इन्दि्रय सुख भोग अथवा नैतिक विकास इत्यादि सभी इस परम लक्ष्य के सामने गौण हैं। इसलिए सर्वप्रथम मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हुए परम लक्ष्य को प्राप्त किया जाना सहज है अन्यथा परम लक्ष्य को पाना कठिन या असम्भव ही समझना चाहिए।

भारतीय विचाराकों के अनुसार जीवन का परम लक्ष्य सर्वांग है। इससे तात्पर्य यह नही है कि वे सभी प्रकार की प्रवृत्तियों को बराबर मानते हैं या उन्हें एक सा सन्तोष देन चाहते हैं। वास्तव में सर्वोच्च मानव मूल्यों के साक्षात्कार के लक्ष्य को लेकर ही प्रत्येक मानव प्रवृत्ति के सन्तोष की व्यवस्था की जायेगी। यह सर्वोच्च लक्ष्य बदल देने से ही सब कुछ बदल जाता है। भारतीय विचारक निरंकुश भोग का विरोध करते हैं। जहॉं कुछ विचारकों ने भोगों को पूर्णतया तिलॉंजलि देने की सलाह दी है वहॉं अन्य विचारक नियंत्रित सुखोपभोग के पक्ष में रहे हैं। भोगवादी तथा भोगों विरोधी दोनों ही प्रकार के विचारक तनावयुक्त जीवन को अच्छा नहीं मानते। भारतीय भोगवादियों ने शारीरिक, मानसिक और आध्यत्मिक विकास को दृष्टि में रखते हुए सदैव नियंत्रित भोग की सलाह दी है। अतः अनियंत्रित भोगवाद के स्थान पर परम लक्ष्य ले आने से ही समस्त मानसिक तनाव, संघर्ष और हताशायें दूर हो जाती हैं।

स्वामी अखिलानन्द के अनुसार- ‘‘संघर्ष और तनाव उत्पन्न करने के स्थान पर भारतीय मनोविज्ञान धार्मिक आदर्श को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य बनाकर इन मानसिक व्याधियों के कारणों का ही निराकरण कर देता है। चिकित्सात्मक और परामर्शवादी अनुभवों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सुखवाद और सुख के सिद्वान्त से जीवन के दृष्टिकोण को हटाकर धार्मिक आदर्श पर लाये बिना मनोविकारों और मनोस्नायु विकारों के उपचार की कोई भी स्थायी योगदान नहीं दे सकता।

भारतीय विचारकों ने अनेक स्थान पर सब में ईश्वर, ब्रह्म आत्मा देखने की बात कही है। इसलिए इसके अतिरिक्त कोई भी आधार सामाजिक व्यवहार को ठोस आलम्बन प्रदान नहीं कर सकता। जैसे- यदि मैं स्वभाव से ही स्वार्थी हूॅं, यदि प्रकृति ने मुझे दूसरों से अलग बनाया है, यदि मैं अन्य से पूर्णतया असम्बद्व हूॅं तो किसी भी तर्क से यह सिद्व नहीं किया सकता कि मुझे दूसरों का भला करना चाहिए। समानता और भ्रातृत्व के नारों का कोई भी अर्थ तभी हो सकता है जबकि जो वे हैं वहीं मैं भी हूॅं। इस दृष्टि से भारतीय मनोविज्ञान मनुष्य के सामाजिक विकास का सही दृष्टिकोण उपस्थित करता है। अनेक चिकित्साशास्ति्रयों ने स्पष्ट किया है कि सामाजिकता के समुचित विकास के बिना कोई भी व्यक्ति मानसिक आरोग्य लाभ नहीं कर सकता। अनेक मानसिक व्याधियों के मूल में ’व्यक्ति’ के सामाजिक पहलू का अपर्याप्त विकास ही है। इस दृष्टि से भारतीय मनोवैज्ञानिकों के सुझाव अत्यधिक उपयोगी हैं।

मानसिक आरोग्यता प्राप्त करने के लिए व्यक्तित्व का विकास और सन्तुलन आवश्यक है। भारतीय मनोवैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्तित्व का संकलन तभी प्राप्त हो सकता है जबकि समस्त मन समन्वित और एकात्मक हो। संकलित व्यक्तित्व से जहॉं व्यक्ति को स्वयं आनन्द मिलता है वहॉं वह दूसरों के लिए भी कल्याणकारी सिद्व होता है। इसलिए भारतवर्ष में गुरु के लिए संकलित व्यक्तित्व अत्यन्त आवश्यक माना गया है। यह आध्यात्मिक गुरू की अनिवार्य योग्यता है। इसके बिना वह शिष्य का कल्याण नहीं कर सकता। भारतीय मनोविज्ञान के अनुसार केवल संकलित व्यक्तित्व और समन्वित मन वाले मनोचिकित्सक ही मानसिक व्याधियों का उपचार कर सकते हैं। भारतीय मनोचिकित्सक जैसे - पतंजलि, शंकराचार्य, विवेकानन्द, श्री अरविन्द ये सब दार्शनिक अपने-अपने सिद्वान्तों के तथा संकलित व्यक्तित्व और समन्वित मन के कारण मनोचिकित्सक भी कहलाते हैं। भारतीय मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार की मानसिक व्याधियों को दूर करने की विधियॉं बतलायी हैं। पतंजलिनुसार - सुखी और दुःखी, शुभ और अशुभ, विषयों के विषय में मैत्री, करूणा, मुदिता तथा उपेक्षा के विचार मन को शान्त करते हैं।

राजयोग में यम और नियम के पश्चात आसन और प्रणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान को आवश्यक माना गया है। जिससे चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण किया जाता है तथा मानसिक आरोग्यता प्राप्त की जाती है। भारतीय मनोवैज्ञानिकों ने सदा से ही शारीरिक और मनोवैज्ञानिक क्रियाओं और व्याधियों में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध माना है और इसलिए मानसिक आरोग्य के लिए ऐसी विधियॉं सुझायी हैं जिनसे शारीरिक और स्नायविक आरोग्य भी प्राप्त होता है।

योग द्वारा मानसिक आरोग्य[सम्पादन]

‘‘योग‘‘ सकल्पना की जड़ मूल रूप से भारतीय विचारधारा से आयी है जबकि पश्चिमी विचारधारा के मूल में मानसिक आरोग्यता की संकल्पना रही है। भारतीय विचारधारा में ‘‘मन‘‘ की विभिन्न अवस्थाओं- मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र, निरूद्व आदि का उल्लेख मिलता है। महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन के अन्तर्गत अष्टांग योग में समाधि का वर्णन किया है। इसलिए समाधि, मुक्ति, निर्वाण, आत्म साक्षात्कार, भगवद् प्राप्ति की अवस्था में व्यक्ति मानसिक रूप से आरोग्यता प्राप्त करता है। भारतीय विचारधारा में स्वस्थ मन के लिए विभिन्न साधन बताने पर भी मानसिक आरोग्यता जैसी स्वतन्त्र संकल्पना भारतीय विचारधार में न आने का कारण यह है कि भारतीय विचाधारा में व्यक्तित्व को सदैव समग्र रूप से लिया गया है न कि उसके विभिन्न पहलुओं पर अलग-अलग रूप से विचार किया गया है। योग शब्द जिस धातु से निष्पन्न हुआ है, वह पाणिनीय व्याकरणानुसार, दिवादि, रूधादि एवं चुरादि तीनों गणों में प्राप्त होता है। युज् समाधौ (दिवादिगण), युज संयमने (चुरादिगण), युजिर् योगे (रूधादिगण)। युज् धातु से व्युत्पन्न होने वाला योग भी पुल्लिंग में प्रयुक्त होने पर समाधि अर्थ का वाचक है परन्तु नपुसंकलिंग में प्रयुक्त होने पर योग-शास्त्र रूप अर्थ का ज्ञापक है। महर्षि व्यास ने भी योग का अर्थ समाधि बतलाया है। इस प्रकार गण भेद से योग शब्द के प्रमुख अर्थ समाधि, संयोग तथ संयमन होता है।

विष्णुपुराण के अनुसार -‘‘जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग (अद्वेतानुभूतियोग) कहलाता है।’’

भगवद्गीताबोध के अनुसार- ‘‘दुःख-सुख, पाप-पुण्य, शत्रु-मित्र, शीत-उष्ण आदि द्वन्दों से अतीत (मुक्त) होकर सर्वत्र समभाव से व्यवहार करना ही योग है।’’

महर्षि पतंजलि के अनुसार - ‘‘अभ्यास-वैराग्य द्वारा चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण करना ही योग है।’’

सांख्य के अनुसार - ‘‘पुरूष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरूष का स्वतः के शुद्व रूप में अवस्थित होना ही योग है।

महर्षि चरक - ‘‘मन का इन्दि्रय एवं विषयों से पृथक् होकर आत्मा में स्थिर होना ही योग है।’’ ‘‘भारतीय धर्म में दर्शनशास्त्र व मानसशास्त्र एक दूसरे से जुड़कर चलते हैं। मनोचिकित्सा और मानसिक स्वास्थ्य के भारतीय विचार हजारों वर्षों पुराने रीति-रिवाजों, अनुभवों व प्रयोगों पर आधरित हैं।

प्राचीन उपनिषदों में चैतन्य के विभिन्न स्तरों के बारे में बताया गया है जैसे जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति व तूर्य। श्री अरविन्द ने अपनी उपनिषदीय व्याख्या मे व अन्य भारतीय लेखकों ने निम्न से लेकर उच्चतम मनोचिकित्सा के स्तरों को प्रस्तुत किया जबकि फ्रायड व अन्य पाश्चात्य विद्वानों ने उच्च चैतन्य के मानसिक स्तर का निम्न स्तर की शीर्ष पर मनोचिकित्सा को प्रस्तुत किया जिसे गार्डनर मर्फी ने उच्च-आध्यात्मिक श्री अरविन्दों ने उच्च-मानसिक व महेश योगी ने भवातीत चैतन्य कहा है जो केवल उच्च ही नहीं बल्कि निम्न चैतन्य को सयुग्मित भी करता है वही भारतीयों का उद्देश्य है इसे परमार्थ चैतन्य कहा जाता है। यही ब्राह्माण चैतन्य या आत्म चैतन्य भी है। हिन्दु इसे आत्म-ज्ञान या आत्म साक्षात्कार कहते हैं। यह केवल मानसिक या भावनात्मक अनुभवों को पार करना ही नहीं बल्कि इससे दूर यह भावनात्मक व मानसिक व मन व शरीर का एकीकरण भी है। संस्कृत वाड्मय में उक्त योग की प्रमुख तीन विधाएं प्रतिपादित हैं।

  • 1. ज्ञानयोग
  • 2. भक्तियोग
  • 3. कर्मयोग।

ज्ञानयोग का अन्वारव्यान विशेष रूप से उपनिषद्-ब्रह्मसूत्र-वेदान्त दर्शन में हुआ है। भक्तियोग का निरूपण विशेषतया इतिहास-पुराणों में तथा कर्मयोग का निरूपण योग दर्शन में हुआ है।

ज्ञानयोग[सम्पादन]

‘‘ऋते ज्ञानान्नमुक्तिः’’ इस महावाक्य के अनुसार तत्वज्ञान के बिना मुक्ति कदापि सम्भव नहीं तथा जीवात्मा को तत्वज्ञान सद्गुरू की कृपा से ही प्राप्त होता है तभी जीवात्मा मुक्त होती है। सद्गुरू से तत्वज्ञान की प्राप्ति तभी सम्भव होती है जब साधक के स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर तथा महाकारण शरीर इन चारों शरीरों की तथा मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार रूप अन्तःकरण चतुष्टय की पूर्णतया शुद्धि होती है। योगवासिष्ठ वेदान्तसिद्वन्तादर्श आदि ग्रन्थों के अनुसार शम-दम आदि सम्पन्न सद्गुरू के द्वारा उपदिष्ट ज्ञान की प्राप्ति के साधन के रूप में ज्ञान की सात भूमिकाएॅं 1- शुभेच्छा, 2- विचारणा, 3- तनुमानसा ये तीन जाग्रद भूमिकाएॅं हैं जिनमें जीवात्मा एवं परमात्मा (ब्रह्म) में पार्थक्य का भान होता है तथा इनसे तत्वज्ञान को प्राप्त करने की योयता प्राप्त होती है तथा आगे 4-सत्वापत्ति, 5- असंसक्ति, 6-पदार्थविभाविनी, 7- तुर्यगा। इनमें चौथी अवस्था स्वप्नावस्था पॉंचवी सुषुप्ति अवस्था छठी प्रगाढ़ सुषुप्ति अवस्था तथा सातवीं अवस्था में साधक निरन्तर ब्रह्म का ध्यान करता है। यह ब्रहमीभूत अवस्था होती है। उक्त अवस्थाओं को साधक सद्गुरू की कृपा से तत्वज्ञान प्राप्त कर ही पार कर पाता है। एवम् ‘‘ज्ञानयोग तथा सन्यासयोग ये सांख्य के नाम हैं। क्योंकि सम् = सम्यक् + ख्या = ख्याति- ज्ञान को सांख्य कहते हैं। आत्मा का अपने स्वरूप का ज्ञान सांख्य योग कहलाता है। अथवा प्रकृति - पुरूष का ज्ञान करके अपने को प्रकृति के बन्धन से मुक्त कर लेना ही सांख्य का प्रयोजन है।

भक्तियोग[सम्पादन]

परमेश्वर के गुणों में प्रीति, उसके गुणों का कीर्तन, स्तुति करना एवं अपने को सर्वथा उसके अधीन मानकर समस्त कर्म और उसका फल भगवान् को अर्पण कर देना, भगवान के प्रत्येक विधान में सन्तुष्ट रहना तथा निरन्तर उसके नाम का स्मरण करते रहना भक्तियोग है। भक्तियोग से अतिशीघ्र समाधि की प्राप्ति होती है। भक्ति योग का विस्तृत वर्णन नारदभक्ति सूत्र में किया गया है। भक्ति, ज्ञानयोग, कर्मयोग तथा अन्य योग से भी ऊॅंची है। भक्ति ईश्वर से कुछ मॉंगने के लिए नहीं की जाती, बल्कि वह स्वयं सब इच्छओं पर रोक लगाती है तथा भक्त वह होता है जो अपना सर्वस्व ईश्वर को अर्पण कर देता है। ‘‘ भक्ति ईश्वर के प्रति तीव्र, अनुराग और दिव्य प्रेम का स्वरूप है।’’

कर्मयोग[सम्पादन]

‘‘अन्तःकरण की शुद्धि के लिए निष्काम भाव से कर्म करना बहुत आवश्यक है।’’ योग के मार्ग में चलने वाले मन्नशील पुरूष के लिए निष्काम भाव से कर्म करना ही योग प्राप्ति का हेतु या साधन कहा है। संकल्प निष्ठा मे ज्ञान और योगनिष्ठा में निष्काम कर्म की प्रधानता है। ज्ञानयोग की साधना सीधी होने पर भी दुष्कर है। जिसे योग के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता। योग से युक्त होकर मुनिजन शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं। अपने वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थिति के अनुसार शास्त्रविहित कर्मों को फल की कामना और आसक्ति का त्याग करके कर्त्तव्य समझकर करना, प्रत्येक कर्म की सिद्धि- असिद्धि तथा उसके फल के समभाव रखना, इन्दियों के भोगों में आसक्त न होकर समस्त संकल्पों का परित्याग करके योग की साधना करना ही कर्मयोग है। अर्थात निष्काम भाव से कर्म करते हुए योगाभ्यास करना कर्मयोग कहलाता है। जैसे-यज्ञ के लिए कुशा की आवश्यकता होती है। इसके लाने के लिए ऐसे व्यक्ति को भेजा जाता है जो हाथों को आहत होने से बचाकर सावधानी से कुश का चयन करके ले आये। ऐसे व्यक्ति का नाम कुशल प्रसिद्व हुआ। बाद में किसी भी कार्य के कुशलता और सावधानी के साथ करने वाले व्यक्ति को भी कुशल कहा जाने लगो। कर्मों में कुशलता का यही अभिप्राय है कि कर्म तो किए जाएॅं, परन्तु उनके प्रति आसक्ति या फल की इच्छा का भाव कर्ता में न रहे। किसी भी कर्म को कर्त्तव्यभावना से किया जाना चाहिए। यज्ञ अर्थात् परोपकार के अतिरिक्त अन्य कर्म बन्धक का कारण बनता है। ‘‘निष्काम कर्म के द्वारा योगारूढ़ होकर पुनः सब संकल्पों का परित्याग करना ही कल्याण का हेतु है। योगदर्शन के अनुसार कर्मयोग के प्रमुख चार प्रकार हैं-

  • 1- लययोग,
  • 2- मन्त्रजपयोग,
  • 3- हठयोग,
  • 4-राजयोग।

ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग इन तीनों के सामन्जस्य से ही ‘‘सम्पूर्ण योग’’ की उपलब्धि एवं सिद्धि हो सकती है। , अन्यथा नहीं। पातन्जल योग दर्शन ‘‘सम्पूर्ण योग’’ है क्योंकि इसमें ज्ञान, भक्ति, कर्मयोग तीनों प्रकार आते हैं। पातन्जलि के अनुसार ज्ञान के उदय होने पर ही साधक पंच क्लेश - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश से मुक्त होता है। भक्ति योग के द्वारा ईश्वर प्राणिधान करते हुए ईश्वर की शरण में जाता है व चित्त की वृत्तियों पर अभ्यास-वैराग्य अर्थात कर्मयोग द्वारा निंयत्रण कर योग की उच्चतम अवस्था को प्राप्त करता हैं।

विचार -विमर्श[सम्पादन]

एक साहित्यिक लेख में ई0जे0 शावन (1957) ने एक ‘‘युग्मित समन्वय’’ का नमूना प्रस्तुत किया है जिसमें चारित्रिक विशेषताओं में ‘‘आत्म नियंत्रण, व्यक्तिगत दायित्व, सामाजिक दायित्व, राजनीतिक-सामाजिक रूचि और आदर्श बतायी गयी है। जो कि मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तित्व के लिए आवश्यक है।’’ अपने सिद्वान्त में उन्होंने पूर्णतः कार्य सम्पादन करने वाले व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बताया है। सी0आर0 रोजर्स (1962) ने अनुभवों से अवगत होने व उनसे खुलेपन की सीमा को उल्लेखित किया है। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति की विभिन्न चरित्रिक विशेषताओं का वर्णन करते हुए तथा आदर्श सिद्वान्त को प्रस्तुत करते हुए एस0जे0 कोर्चिन (1976) ने कहा है - कि ‘‘विकसित रूप से मानसिक स्वस्थ व्यक्ति विलक्षण और अच्छी प्रकार से युग्मित होते हैं। वे हीनता व आवश्यकता के बजाय प्रचुरता से प्रेरित होते हैं। वहॉं परव्यक्तिगत पहचान का शक्तिशाली बिन्दु होता है। वास्तविकता में स्वयं का सम्मान करना, अपने आप व दूसरों से अलगाव व संवेदनशीलता वह पारिस्थितिकीय सम्भावनाओं का स्वायत्त अभिकर्ता होता है। वह वातावरण के बल के उददेश्य व सामाजिक आज्ञाओं से दबने के बजाय उनका स्वयं ही मालिक होता है।’’ मानसिक आरोग्य के लिए धार्मिक साधना आवश्यक है। मानसिक रोगों से मुक्त यदि होना है तो एक ऐसा जीवन दर्शन बनाना पड़ेगा जिसमें आत्म ज्ञान अथवा सर्वोच्च मानव लक्ष्यों की प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य माना गया हो। इस आदर्श के प्रकाश में ही अन्य प्रवृत्तियों को सन्तुष्ट किया जायेगा। सब कही एकात्मक भावना के बिना व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्धों का कोई भी ठोस आधार नहीं हो सकता। इस एकात्म भावना के लिए साकार ईश्वर की मान्यता आवश्यकता नहीं है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति के अपने अनुभव में आने वाली अन्तर्रात्मा को ही ईश्वर माना जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति में अवस्थित एक आत्मा ही समान बनाता है, वही प्रत्येक व्यक्ति के सामाजिक जीवन का आधार है। वहीं आत्म केन्दि्रता से बाहर निकलता है। इस प्रकार भारतीय मनोवैज्ञानिक एकात्मवाद के आधार पर मनुष्य के व्यक्तिगत और सामाजिक विकास के द्वारा उसे मानसिक रूप से स्वस्थ बनाते हैं।

निष्कर्ष[सम्पादन]

स्वस्थ व्यक्तित्व पूर्णता स्वयं विक्ष्रान्तिपूर्ण तथा अन्य लोगों के द्वारा मूल्यांकित होता है। एक मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति असफल व निराश भी हो सकता है। वह तनावमय कष्ट भी झेल सकता है , इस समय वह मूर्खतापूर्ण व स्वयं से हारा हुआ भी महसूस कर सकता है लेकिन स्वस्थ व्यक्ति का आधार क्या है? वह है अपने भावों का संतुलन जैसे कि निराशा उसे सकारात्मक क्रियाकलाप से नही रोक सकती। विशेष भार उसके लिए सृजित नहीं होता तथा हीनता उसे दब्बू कष्ट झेलने वाला व्यक्ति नहीं बनाती। वह अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व की शक्ति से कठिनाइयों से उभरने का प्रयत्न करता है और एक परिपक्व, तेज तर्रार, अच्छा योग्य व वातावरण का भार झेलने वाला बनाता है। अतः मानसिक स्वास्थ्य एक आदर्श है। जिस व्यक्ति के उक्त गुण जितने अधिक पाये जाते हैं वह उस आदर्श के उतना ही निकट होता है। पाश्चात्य मनोविज्ञान में मानसिक तनावों से मुक्ति का कोई समुचित साधन परिलक्षित नहीं होता, जो उसके व्यक्तित्व में निहित निषेधात्मक परिवेशों को स्थायी निदान प्रस्तुत कर सके। पाश्चात्य अवधारणानुसार समाज में व्यक्ति के पारस्परिक समायोजन की गुणवत्तता को समाज की मान्यताओं के अनुसार परिष्कृत कर मानसिक आरोग्यता प्रदान करने का प्रयास करता है। लेकिन जीवनमुक्त समाधि की मनोशारीरिक अवस्था की तरफ नहीं ले जा पाता क्योंकि वह व्यक्ति की व्यवहार शैली को समझने उसे नियंत्रित करने तथा उससे अनुमान लगाने तक ही सीमित है तथा देशकाल परिस्थिति के अनुसार मानसिक आरोग्य की परिभाषा, अर्थ पाश्चात्य अवधारणानुसार बदल जाते हैं। महर्षि पतंजलि ने स्वस्थ मन की अवस्था प्राप्त करने के लिए योगदर्शन के अन्तर्गत अष्टांग योग बतलाकर मानसिक आरोग्यता की आदर्श स्थिति को समाधि के रूप में सूत्रबद्ध किया है जिससे पंच क्लेश नष्ट होते है इसलिए समाधि, मुक्ति, निर्वाण, आत्म साक्षात्कार, भगवद् प्राप्ति की अवस्था में व्यक्ति मानसिक रूप से आरोग्यता प्राप्त करता है।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची[सम्पादन]

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19. पं0 हरिकृष्ण शास्त्री दातार-योग सिद्वान्त एवं साधना चौखम्बा विधानभवन (बनारस स्टेट बैंक के पीछे ) वाराणसी, 1998, पृ0सं0 5, 8, 9

20. शद्वात्मत्तवविज्ञान सांख्यमित्यभिधीयते - शंकर विष्णुसहस्त्रनाम।

इन्हें भी देखें[सम्पादन]