रघुचरित्र का राजनैतिक स्वरूप

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भारतीय राजनीति, धर्मनीति एवं समाजशास्त्र के मर्मज्ञ प्राचीन आचार्यो केद्वारा स्मृति आदि ग्रंथों और व्यास आदि रचित पुराणों में राजनीति विषयक तत्त्व को लेकर भारतीय राजनीतिपद्धति का निरूपण किया गया है उन आचार्यों का अभिप्राय यह है कि भारतीय राजा धर्म, अर्थ आदि में सामंजस्य स्थापित कर न्यायोचित मार्ग का आश्रय लेकर राजनीति के वास्तविक कर्त्तव्य और अपने उत्तरदायित्व का सफलतापूर्वक निर्वहण कर सके।

राजतंत्र में राजा का रहना समाज की रक्षा के लिये आवश्यक था। प्रजा के रक्षा के रूप में राज्याभिषेक प्राप्त कर राज्य को स्थिर किया जाता था। महर्षि याज्ञवल्क्य ने राजा के संबंध में कहा है कि ‘‘राजा को अत्यधिक उत्साही, दान करनेवाला, विनम्र, सत्यगुणसम्पन्न, अच्छे कुल में उत्पन्न, सत्यवादी, पवित्र, विलंब से काम न करने वाला, स्मरणशक्तियुक्त, अच्छे गुण वाला, धार्मिक, निव्यर्सनी, बुद्धिमान्, वीर, रहस्य को जानने वाला अपने दोषों को गुप्तों रखने वाला, आन्वीक्षिकी, दंडनीति और त्रयी विद्याओं का ज्ञाता होना चाहिए।

महोत्साहः स्थूलक्षः कृतज्ञो वृद्धसेवकः।
विनीताः सत्त्वसम्पन्नः कुलीनः सत्यवाक्शुचिः ॥
दीर्घसूत्रः स्मृतिमानऽचक्षुद्वोऽपरुषस्तथा।
धार्मिकोऽव्यसनश्चैव प्राज्ञः शूरो रहस्यवित्॥
स्वरन्ध्रगोप्ताऽन्वीक्षिक्यां दण्डनीत्यां तथैव च।
विनीतस्त्वथ वार्तायां त्रय्यां चैव नराधिपः ॥ (याज्ञवलक्यस्मृतिः आचार- अध्याय, राजधर्म-श्लोक 309-311)

जब तक राजा श्रुति, समृति, शास्त्र के ज्ञाता नहीं होगें, प्रजा के पालन करने की क्षमता नहीं होगी, वे राजपद के लायक नहीं होंगे। जो राजा अन्यायपूर्वक राष्ट्रशोषण करते हैं वे शीघ्र ही श्रीहीन होकर नष्ट हो जाते हैं।

इसलिए राजतंत्र में राजा का कर्त्तव्य था कि वे देन वेदान्त आदि विषयों का अध्ययन करें। जब तक राजा को इन्द्रियदमन की शक्ति नहीं होती है, काम, क्रोध और व्यसन से विहीन नहीं होते हैं तब तक वे राज्य का समुचित विकास नहीं कर पाते हैं इसलिए सूर्यवंश का उत्तराधिकारी होने के कारण रघु को एक राजा के रुप में आवश्यक शास्त्रज्ञान कराने के लिए शिक्षणव्यवस्था की गई।

महाकवि कालिदास द्वारा रघुवंश महाकाव्य में बहुत हीअल्प शब्दों में कुमार रघु के प्रारंभिक जीवन में उनके कुमारोचित चरित्र को दर्शाया गया है, जो गागर में सागर के समान जान पड़ता है। महाराज दिलीप की धर्मपत्नी सुदक्षिणा ने सूर्यवंश की वंशपरम्परा को आगे बढ़ाने के लिए रघु रूपी पुत्ररत्न को उत्पन्न किया।

ग्रहैस्ततः पञ्चभिरच्च संश्र भैर सूर्यगैः सूचित भाग्यसम्पदम्।
असूत पुत्रं समये शचोसभा त्रिसाधना शक्ति रिवार्थमक्षयम॥ (रघु तृतीय सर्ग श्लोक 14)

जन्म से सूर्य की समीपता से अस्त न हुए पाँच ग्रहों से सूचित भाग्य सम्पत्ति वाले पुत्र को प्रभाव, उत्साह और मंत्र से उत्पन्न होनेवाली शक्ति के द्वारा पृथ्वीलोक के कल्याण के लिए जन्म दिया। तपस्वी पुरोहित वशिष्ठ जी तपोवन से आकर महाराज दिलीप के पुत्ररत्न को विधिपूर्वक जातकर्म, संस्कार सम्पन्न कर खान से निकालकर शान पर चढ़ाकर पालिस की गई मणि के समान शोभित कर दिलीप को कृतार्थ किया।

महाराज दिलीप ने अपने पुत्र के नामकरण से पहले शास्त्रों का स्मरण कर अर्थविशेषज्ञ यह बालक शास्त्रों के अंत तक जायगा और युद्ध में शत्रुओं का संहार करेगा, इस प्रकार ‘लघि’ धातु को गमनार्थक जानकर अपने पुत्र का नाम रघु रखा। बालक रघु सम्पूर्ण सम्पत्ति वाले अपने पिता के प्रयत्न से सुन्दर अंगों द्वारा सूर्य किरणों के प्रवेश से बाल चन्द्रमा के समान प्रतिदिन बढ़ने लगा।

श्रुतस्ययायादयमन्तमर्भकस्तथा परेषां युधि चेति पार्थिवः।
अवेक्ष्य धातोगर्ममनार्थमर्थविच्चकार नाम्ना रघुमात्समसम्भवम्!॥ (रघु-3.21)

बाल रघु धाय से पहले सिखाये हुए वचन बोलने लगा,उसकी अंगुली पकड़कर चलने लगा औ प्रणाम की शिक्षा से नम्र होने लगा।

उवाच छात्र्या प्रथमोदितं वचो ययौ तदियामवलम्ब्य चांगुलिम्।
अमूच्च नम्रः प्रणिपात शक्षया पितुर्मदं तेन ततान सोऽर्भकः॥’’(रघु-3.25)

चूडाकरण के बाद बालक रघु मत्रियों के समानवयस्क पुत्रों के साथ वर्णमाला का यथाविधि परिचय पाकर शब्दशास्त्र में प्रविष्ट हुआ, जिस प्रकार नदी के मुहाने से घड़ियाल आदि समुद्र में प्रवेश करते हैं।

स वृतचूलश्वलकाकपक्षकैरमात्यपुत्रैः सवयोभिरन्वितः।
लिपेर्यथावद् ग्रहणेन वाघमय नदी मुखेनेव समुद्रमाविशत्॥
(रघु 3. वर्ग श्लोक-28)

विधिपूर्वक यज्ञोपवीत हुए गुरुप्रिय राजकुमार रघु को विद्वान् गुरुजन शिक्षा देने लगे और वह सफल भी हुयेक्योंकि सुपात्र को दी हुई शिक्षा सफल होती है।

अथोपनीतं विधिवद्रिपश्चि विनिन्युरेनंमुखाप्रियम्।
अबन्ध्यत्नाश्च वभूदुरत्रते क्रिया कि वस्तूपहिता प्रसीदति॥ (रघु 3. 19)

राजा को चाहिए की तीनों वेद, के ज्ञाता ब्राह्मणों से तीनों वेद सनातन दण्डनीति तर्कशास्त्र और ब्रह्मविद्या सीखें और अन्य कृषि-वाणिज्य आदि बातों को आरम्भ लोक से सीखें , यह मनु ने स्मृति में कहा है।

त्रैविद्येम्यस्त्रीय विद्यां दण्डनीतिंच शाश्वतीम्।
आन्वीक्षिकीं चात्मा विद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः ॥ (मनु अध्याय 7 श्लोक 43)

अर्थशास्त्र के प्रणेता कौटिल्य के मतानुसार राजा को चाहिए की तीनों वेद के ज्ञाता तीनों वेदब्राह्मणों से सनातन दंडनीति, तर्कशास्त्रओर ब्रह्मविद्या सीखें और अन्य कृषि- वाणिज्य आदि बातों को आरम्भ में लोक से सीखें।

आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्डनीतिश्चेति विद्याः। (अर्थशास्त्र)

शिक्षा में सबसे पहला स्थान विनय (अनुशासन) का बताया गया, जिसमें निम्नलिखित गुण होने चाहिएः- शुश्रूषा-ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा, श्रवणम्-सीखे हुये सत्य पर ध्यान देना, ग्रहणम्-जो कुछसीखा जाय उसे अच्छी तरह समझना, धारणम्-जे समझ में आ जाये उसे हृदय र्घैंम करना। विज्ञानम्-सीखे हुए सत्य को प्राप्त करने के उपाय तथा साधन जानना, ऊहा-निष्कर्ष निकालना और चिन्तन-मनन करना क्रिया से केवल उसी पदार्थ को वश में किया जा सकता है, जा इसके योग्य हो, उसे नहीं जा इसको योग्य न हो। शिक्षा में अध्ययन तथा व्यवहार दोनों का ही समावेश होना चाहिए। उसे केवल सैद्धान्तिक नहीं होना चाहिए। राजकुमारों को अपनी शिक्षा संख्या और लिपि से प्रारम्भ करनी चाहिए और पुनः इन विषयों का अध्ययन करना चाहिए। त्रयी यानी तीनों वेद,अध्यापकों से आन्वीक्षकी की अर्थात् दर्शन शास्त्र अनुभवी प्रशासकों से आर्थिकजीवन, वार्त्ता के विभिन्न विभागों का ज्ञान, राज्य शासन के सिद्धान्त तथा व्यवहार के विद्वान् अध्यापकों से दंडनीति अर्थात् शासन कला का ज्ञान ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए सीखना चाहिए।

आचार्य कामन्दक की नीतिसार मतानुसार विद्यायें चार हैं आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्त्ता और शाश्वत रहने वाली दंडनीति। ये चारों विद्यायें देहधारियों के जीवननिर्वाह और कल्याण के लिए होती है। आन्वीक्षिकी विद्या में आत्मविज्ञान त्रयी विद्या में धर्म-अधर्म का वर्णन, वार्त्ता से अर्थ-अनर्थ का ज्ञान एवं दंडनीति से नीति और अनीति कापूर्ण ज्ञान होता है।

आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्डनीतिश्च शाश्वती।
विद्याश्चतस्त्र एवैतायोगक्षेमाया देहिनाम् ॥
आन्वीक्षिक्यात्म विज्ञान धर्माधर्म्मौ त्रयी स्थितौ।
अर्थानर्थे तु वार्त्ताया दण्डनीतौ नयानयौ ॥ (कामन्दक-नीति, सर्ग 2, श्लोक-2, 7)

विदुर ने तो यहाँ तक कहा है कि निरर्थक बोलने वाले, पागल तथा बकवाद करनेवाले बच्चों से भी उसी भांति तत्त्व की बात ग्रहण करनी चाहिए जैसे पत्थरों में से सोना ले लिया जाता है। जैसे उच्छावृत्ति से जीविका चलानेवाला एक-एक दाना चुगता रहता है, उसी प्रकार धीर पुरुष को जहाँ-तहाँ से भावपूर्ण वचनों सूक्तियों और सत्यकर्म का संग्रह करते रहना चाहिए। विदुर ने ठीक ही कहा है कि सुपात्र को सभी समय जागते हुए हर पल के घटना क्रम से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

अप्युन्मत्रात् प्रलपतो वालाच्च परिजल्पतः।
सर्वतः सारमाद द्यादश्मभ्य इव कान्चनम् ॥
सुव्याहृतानि सूक्तानि सुकृतानि ततस्ततः।
संचिन्द्रन् धीर आसीत शिलाहारी शिलंयथा॥ (विदुरनीति अध्याय 2, श्लोक 32,33

राजा भर्तृहरि ने नीतिशतक में लिखा है कि विद्या ही मनुष्य का सुन्दर रूप और गुप्त धन है। विद्या ही भोग, यश और सुख को प्राप्त कराने वाली है, विद्या ही गुरुओं की भी गुरु है। विद्या ही विदेशगमन में बंधुस्वरूप होता है, विद्या ही बड़ा देवता है और विद्या ही राजा के द्वारा भी पूजी जाती है, धन नहीं पूजा जाता। इसलिए विद्याविहीन मनुष्य पशु ही है।

विद्या वन्धुजन्यो विदेशगमने विद्या परादेवता।
विद्या राजसु पूज्यते न हि धन द्यि विहीन पशु॥ (नीतिशतक श्लोक 20)

आदि कवि वाल्मीकि ने रामायण में कहा कि शिक्षा का अभिप्राय शास्त्रीय ज्ञान या विद्वत्ता मात्र नहीं होता।

यदि विद्यार्थी ग्रंथों के अध्ययनमात्र से अपने को ‘‘तत्त्वज्ञ’’ नहीं बना सकता, अध्ययनजन्य व्युत्पत्ति या प्रतिभा नहीं प्राप्त कर सकता है तो उसका पांडित्य व्यर्थ है। इस प्रकार व्यवहारिक योग्यता या पटुता के अभाव में शास्त्रीय ज्ञान को स्पष्टतः अज्ञान के तुल्य माना है।

आचार्यगुरवो वृद्धा वृथा वां पयुपासिताः।
सारयदाजशास्त्राणा मनुजीव्यनगृह्यते॥
गृहीतों वान विज्ञातो भारोऽज्ञानस्यवाह्मते।
ईदृशैः सचिवैयुक्तोभूरवैदिस्ट याधराम्यहमा॥ (रामायण 6, 29, 9-10)

विद्या को नेत्र कहते हुए शास्त्रकार ने कहा कि अनेक संशयों को दूर करने वाला एवं छिपे हुए अर्थ को बताने वाला सबका नेत्र शास्त्र होता है। जिसके ये ज्ञान रूपी नेत्र नहीं वे अन्धे हैं।

अनेक संशयोच्छेदि परीक्षार्यस्व दर्शकम्।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्तयन्ध एव सः ॥

उपनिषद् की मान्यता यह है कि जो मानव उन दोनों विद्या (ज्ञान) को और अविद्या (अज्ञान) को एक साथ जानता है वह अविद्या रूपी मृत्यु को पार करके विद्या से अमृत का आस्वादन प्राप्त कर लेता है।

विद्यां चविद्यां च भस्तद वेदोभय सह।
अविद्याभमृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥ (ईशावास्योपनिषद् 11 मन्त्र)

आचार्य शुक्र ने विद्या का लक्षण विस्तार से किया है। शुक्रनीतिमतानुसार जो जो वाणी का विषय है उसी को विद्या कहते हैं। आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्त्ता दण्डनीति और इन चारों विद्याओं का सदा, नृपति को अध्ययन करना चाहिए। न्यायशास्त्र और वेदान्त के ज्ञान आन्वीक्षिकी से होता है। आन्वीक्षिकी विद्या आत्मा के ज्ञान से आनन्द और शोक को नष्ट करती है। तीनों वेदों का ज्ञान को त्रयी कहते हैं। त्रयी में धर्म, अधर्म, काम और अकाम का प्रतिपादन है। त्रयी में वेद के छः अंग माने गये हैं। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द, और चारों वेद, मीमांसा, न्यायशास्त्र, धर्मशास्त्र, पुराण के विस्तार आदि इन सभी को त्रयी कहते हैं। अर्थ और अनर्थ का ज्ञान वार्त्ता के द्वारा होता है। आचार्य शुक्र ने सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक व्यवस्था, वर्ण और आश्रम आदि को इन चारों विद्याओं में सन्निहित माना है।

(क) ‘‘य़त्स्या द्राचिकं सम्यककर्म विद्याभि संज्ञकम्।’’ (शुक्र 4/264)
(ख) ‘‘आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता दण्डनीतिश्च शाश्वती।
विद्याश्चतस्त्र एवैता अभ्यैसेन्नृपति सदा॥’’ (शुक्र 1/151)
(ग) ‘‘आन्वीक्षिक्यां तर्कशास्त्रं वेदान्ताद्य प्रतितिष्ठम।
त्रययां धर्मोह्मधर्मश्च कामेडकामः प्रतिष्ठितः ॥’’ (शुक्र 1/152)
(घ) ‘‘दण्डनीत्यांनयानयौ’’ (शुक्र 1/153)

आदिकवि वाल्मीकि जी ने किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व पर माता पिता के प्रभाव के बारे में कहा है कि लड़कियाँ अपनी माता और लड़के अपने पिता का अनुकरण करते हैं।

‘‘पितृन्समनुजायन्ते नश मातरमं गनाः ॥ (रामायण 2/35/28)

विमलबुद्धि रघु ने बुद्धि के समग्र गुणों से चारों समुद्रों के समान चारों विद्याओं के स्वामी सूर्य, वायु से अधिक वेगशाली अपने घोड़ों से चार दिशाओं को पार करते हैं।

धियः समग्तैः स गुणैरूदारधीः क्रमाच्यत ड्डश्चतु रर्णवोपमाः।

शास्त्रशिक्षा में प्रवीण होकर राजकुमार रघु ने शास्त्र विद्या का आरम्भकिया। आदिकवि वाल्मीकि के मतानुसार क्षत्रिय राजाओं का कर्त्तव्य है कि वे विद्या के विभिन्न अंगों तथा बुद्धि की कला हों दोनों में समान रूप से विशारद् हो विद्वत्ता के साथ-साथ युद्ध में सफलता भी नितान्त आपेक्षित है। रघु ने पवित्र कृष्ण मृग के चर्म को धारण कर अपने पिता से ही मंत्रों के साथ शस्त्र का ज्ञान सीखा उनके पिता दिलीप पृथ्वी पर अद्वितीय चक्रवर्ती ही नहीं, एक धनुर्धारी भी थे। रघु ने शास्त्रशिक्षा के साथ-साथ अपने शरीर को, पोषण करते हुए, हृष्ट-पुष्ट किया। जैसा कि आदि कवि वाल्मीकि ने स्पष्ट कहा है कि प्राचीन आर्यों ने सदैव स्वस्थ तन में स्वस्थ बुद्धि का आग्रह किया है। हमें अपनी शरीर की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। स्वस्थ्यऔर शक्ति के अभाव में कर्त्तव्यों का पालन कैसे हो सकेगा। राजकुमार रघु वृषभत्व को प्राप्त होते हुए बछड़ेके समान, गजत्व को पहुँचते हुए हाथी के बच्चे के समान क्रम से यौवन द्वारा बालकपन दूर होने पर अपने गंभीर और सुन्दर शरीर को हृष्ट-पुष्ट करने लगे। मैथिली के कोकिल कवि विद्यापति ने पुरुषपरीक्षा में कहा है कि पुरुषार्थवान् पुरुष वह है जो वीर अर्थात् उत्साहसम्पन्न सुधी उत्तम बुद्धि वाला एवं सविद्य विद्या उपविद्या आदि से युक्तहों इसके अतिरिक्त पुरुषरूप में दिखने वाले बिना पूँछ के पशु हैं। रघु गुण कों विशेषताओं से भरपूर थे विद्यापति ने कहा है कि जो एक बार में कहने से समझ जाय, सुनी हुए बात का स्मरण न करें, जिसका समय रूप स्पष्ट बुद्धि हो वह मेधावी कहलाता है। धारणावती बुद्धि मेधा है। नव-नव उन्मेषशालिनी स्फूर्तिमती बुद्धि प्रतिभा और जिनकी बोधशक्ति विशेष रूप से हैं, वह सुबुद्धिसम्पन्न किसी भी निर्णय को लेने में सक्षम व्यक्ति ही राजा होते हैं। युवराज रघु में ये सारे गुण व्याप्त थे। कुमार रघु के प्रारंभिक जीवन में कुमारोचित चरित्र की राजनीतिक शास्त्रीयसमीक्षा लिखने के क्रम में सहसा हमें महाकवि बाणभट्टविरचित कादम्बरी के शुकनासोपदेश का स्मरण आ जाता है जिसमें बाण ने अपने पात्र के माध्यम से भारतीय राजनीति के सारभूत तत्त्व, जो एक राजकुमार में होने चाहिए, का वर्णन किया है।

शुकनास ने समुचित अवसर का विचार कर विनय की शिक्षा देते हुए कहा है कि युवा अवस्था में स्वभावतः एक ऐसा अंधकार उत्पन्न होता है जो न सूर्य की प्रभा से हटता है और न रत्नों तथा दीपों के प्रकाश से ही दूर होता है। लक्ष्मी का मद दारुन होए अंत में शान्तिभंग कर देता है। ऐश्वर्य से आँखों के आगे अंधेरा छा जाता है और विषयरस के आस्वादन से ऐसा मोह चढ़ जाता है जो मन्त्रों के प्रभाव से भीदूर नहीं होता। राजसुख के कारण निद्रा समय पर भी नहीं खुलती जन्मजात प्रभुता, अभिनव यौवन, अनुपम सौन्दर्य और असाधारण शक्ति-ये सब अनर्थ की जड़ हैं। इनमें से एक-एक भी सब प्रकार के अनिष्ट का उत्पादक हैं, सबके समूह की बात ही क्या ? शास्त्र के जल से धुल कर निर्मलबुद्धिसम्पन्न पुरुषों की इन्द्रियाँ भी विषयभोग की मृगतृष्णा में लुभा जाती हैं। कामिनी और कांचन कीआसक्ति मनुष्य को पथभ्रष्ट कर डालती है।

गुरुओं के उपदेश जलसदृश् निर्मलचित्त वाले पुरुष ही ग्रहण कर सकते हैं। क्षुद्र प्रकृति के पुरुष को तो यह शूल जैसा प्रतीत होता है। गुरु का उपदेश समस्तदोषों को भी गुणों में बदल देता है। वह एक दिव्य प्रकाश है जिसकी ज्योति सूर्यचन्द्रादि से भी बढ़कर है। गुरु का उपदेश मनुष्य के अज्ञानजनित अंधकार को सायंकालीन चन्द्रमा के समान दूर करदेता है। वह उपदेश राजाओं के लिए विशेष उपयोगी है क्योंकि उन्हें भयवश कोई उपदेश देने का साहस नहीं करता। एक तो राजा लोग उपदेशवचन सुनते ही नहीं हैं अथवा सुनकर भी राजमद से आँखे भींच लेते हैं। राज्यलक्ष्मी राजमद का विष चढ़ाकर भोगों की तंद्रा उत्पन्न कर देती है।

आप सर्वप्रथम लक्ष्मी की परीक्षा करें। समुद्रमंथन के अवसर पर जब वह प्रादुर्भूत हुई तभी क्षीरसागर में पारिजात पल्लवों से राग, चन्द्रमा की कोर से बक्रता, उच्चैश्रवा से चंचलता, कालकूट से मोहनशक्ति मदिर से मद और कौस्तुभमणि से कठोरता लेकर उन-उन वस्तुओं के विरह में अपने मनोविनोद के लिए उनके चिर्किं साथ बहानों आयी है। यह बड़ी चंचल और निःस्पृह है। दृढ़ पाशों से बांधने पर भी भाग जाती है। यह न तो कसी की जान-पहचान रखती है और न किसी कुलशीलादि का ही विचार करती है। राजाओं के द्वारा प्रयत्नपूर्वक रखी जानेवाली पर भी उन्हें धता बता देती है। अपने विविध रूप दिखाने के लिए ही मानों इसने विराट रूप विष्णु का आश्रय लिया है। यह इतनी चञ्चला है कि इसका कोई एक ठिकाना नहीं है यह लक्ष्मी मूर्खों के पास ही रहना चाहती है और सरस्वती के उपासकों से दूर रहतीहै। इसने अपने विरोधी चरित्र का, संसार में, एक जाल सा फैला दिया है। देखिए न जल से उत्पन्न होकर भी तृष्णा को बढ़ाती है, उन्नत होकर भी तृष्णा को बढ़ाती है, उन्नत होकर भी स्वभाव में नीचता लाती है। वह अमृत की बहन होकर भी कड़वा फल देती है। यह चंचलता ज्यों-ज्यों अधिक झिलकती है, त्यों-त्यों दीपशिखा उत्पन्न काजल के समान मलिन कर्म ही निकलता है। यह शास्त्रचक्षु के लिए रतौंधी है, शिष्टाचार को दूर हटाने के लिए बेंत की छड़ी है और धर्म रूपी चन्द्रमा को ग्रसने के लिए राहु की जिह्वाहै।

इसके स्वभाव को न पहचानने वाला ऐसा कौन व्यक्ति है जिसका इस अपरिचित नवेली ने कसकर आलिंगन न किया हो, अपना प्रियपात्र बनाकर उसे छोड़ न दिया हो इस प्रकार यह दुराचारिणी लक्ष्मी दैववश राजाओं को परिग्रह करके भी उन्हें दुखी बना देती है।

लक्ष्मी के कुप्रभाव से ही वे अनेक प्रकार के अविनयों केअधिष्ठान बन जाते हैं। राज्याभिषेक के समय ही मंगलकलशों के अभिषिञ्चन से राजाओं का दाक्षिण्य धुल जाता है। रेशमी वस्त्र की पगड़ी बांधते ही आनेवाले वार्धक्य की याद चली जाती है।श्वेत छत्र के लगते ही परलोक दिखाई नहीं पड़ता। राजा के प्रशासापरक जय-जयकार के कलरव सेजनता की बाणी तिरस्कृत हो जाती है और इस प्रकार वे अपने राज्योचित गुणों से वंचितकर दिये जाते हैं। यह लक्ष्मी कितने लोगों को अपने मधुर प्रलोभन का मधुर शिकार बनाती है। लक्ष्मी केप्रलोभन में पड़कर वे ऐसे विह्नल हो जाते हैं जैसे उन्हें दुष्ट ग्रहों ने पकड़ लिया हो। मदन के बाणों से मर्माहत होकर वे विभिन्न भाव और भंगिमायें प्रकट करते हैं। सप्तवर्ण के वृक्ष की तरह वे रजोगुणी विकारों से पास के लोगों में सिरदर्द पैदा कर देते हैं तथा मरणासन्न पुरुष की भांति अपने निकटवर्ती सगे-संबंधियों को भी नहीं पहचान पाते हैं। अलंकार रूपी खंभों से बंधे दुष्ट हाथी की भांति वे उपदेशवचन उपेक्षा कर देते हैं। तृष्णा की विषवल्ली से लिपट जाने के कारण संसारकी भी वस्तुओं को कनकमय देखते है।

मद्यपान से शान चढ़े रहते हैं। बाण की तरह कुटिल स्वभाव वाले होकर विध्वंसकार्यो में अपनी बुद्धि का दुरुपयोग करते हैं और असमय में खिले हुयेफूलों की तरह लोक का नाश करने पर उतारू हो जाते हैं। श्मशान की अग्नि की भांति उनकी संपदाएँ भी लोगों के लिये भयोत्पादिका होती हैं। उनके घरों में वार-वनिताओं का प्रवेश हो जाता है। इस प्रकार के लोगों की चर्चा भी उद्वेग उत्पन्न कर देती है। उनके विषय में कुछ सोचना महापातक की भांति उपद्रवों के लिये पर्याप्त है। सैकड़ों दुव्यसनों से वे घिर जाते हैं। बॉबी की घास से गिरे हुये जलकणों की तरह अपने पतन को भी नहीं जान पाते।

स्वार्थसाधन में निरत, धन पर गिद्ध की भांति टूटने वाला तथा सभामंडल रूपी सरोवर में बगुले की भांति घुस कर दोषी को भी बतलाने वाले धूर्त जुआखेलना विनोद है, व्यसन नहीं है। परदारागमन चतुरता है, व्यभिचार नहीं है। मृगया है हिंसा नहीं गुरुवचनों की उपेक्षा स्वातन्त्र्य है अवज्ञा नहीं, नृत्य-गीत और वैश्या में आसक्ति रसिकता है वासना नहीं, इत्यादि उलटी बातों को कहकर राजाओं को गलत मार्गनिर्देश करते हैं, धूर्त लोग इस प्रकार की बातों से राजाओं को ठग कर मन ही मन उनकी हंसी उड़ाते हैं। प्रशंसा केऐसे पुल बांधते है कि वे फूले नही समाते लक्ष्मीमद से उनमत कुछ वन्दनाओं से अपने को विष्णु और शिव का अवतार मान लेते हैं।

कुछ राजा अपने को इतना महत्त्व देने लगते हैं कि लोगों को उनका अपना दर्शन देना भी उनपर अपनी कृपा समझते हैं। किसी से बोलना भी उनका पुरुस्कारमानते हैं। अपनी आज्ञा को उनके लिये वरदान मान लेते हैं। झूठे बड़प्पन के घमण्ड न तो देवताओं को नमस्कार करते हैं और न ब्राह्मणों की पूजा करते हैं और न उठकर गुरुजनों कीअभ्यर्थना ही करते हैं। वे मंत्रियों के हितवचनों की अवहेलना करते है और अपने झूठे प्रशंसकों को निकट बैठा कर उन्हें अपना विश्वासपात्र मान लेते हें। पशुबलि चढ़ाने वाले पुरोहित को अपना गुरु मानते है धूर्त मंत्री जिसके उपदेशक होते हैं अनेक राजाओं द्वारा उपभोग क छोड़ दी जाने वाली राज्यलक्ष्मी में जिनकी आसक्ति रहती है और स्वभावतः स्नेही भाइयों को समूलनष्ट करने की जिनकी बुद्धि है, ऐसे राजाओं में उचित-अनुचित का विवेक कहाँ है।

राजकुमार ! इस प्रकार की अति कुटिल ओर कष्टदायक शताधिक चेष्टाओं से भीषण राजतंत्र के विषय में तथा अतिशय मोहकारी इस यौवन में आप इस प्रकार व्यवहार करें कि लोग आपकी हंसी नहीं उड़ा सकें, आप गुरुजनों कीफटकार न सुन पावें, और विद्वान् आपके व्यवहार से दुखी न हों। आप ऐसा उपाय करें जिससे चालबाजों की चालबाजी बंद हो जाय। लंपट सेवकों को आपका धन लूटने का अवसर न मिले। ललनायेंआपको अपने रूपजाल में न फंसा सके, लक्ष्मी आपके स्वभाव को बिगाड़ न पावें और सुख की अभिलाषा आपको कुर्मागगामी न बना दे।

रघुवंशमहाकाव्य में कालिदास ने रघु के चरित्र में उपर्युक्त दोष प्रवेश न कर सकें, इस तरह की कुमारोचित शिक्षा, राजशासन हाथ में आने से पहले प्रदर्शित करते हुये, समस्त राजशास्त्रीय ज्ञान का रघु में समावेश दिखाया है।