राजव्यवस्था व स्वामित्व, कथा के संदर्भ में
राजव्यवस्था व स्वामित्व, कथा के संदर्भ में'
रामनाथ शिवेंद्र

कानून, राजनीति और संपत्ति के अर्न्तसंबन्धों को आज तक मानवीय वुद्धि ने विविध तरीकों से समझने का प्रयास किया है, अनेक चर्चित अचर्चित किताबें प्रकाशित की हैं फिर भी इनके अर्न्तसंबधों की कोई सर्वस्वीकार्य धारा नहीं बहायी जा सकी है। सारी सामाजिक व्यवस्था तो तभी से गड़बड़ाने लगी जब संपत्ति के स्वामित्व के अगल बगल धर्म, राजनीति तथा कानूनों को घुमाया जाने लगा और संपत्ति को स्वामित्व की धारा में ला कर, उसे कानूनी बना कर, समाज के अस्तित्व को को डुबो दिया गया। हमें इस गड़बड़ी को कथाओं के सृजन में अनिवार्यरूप से लाने का प्रयास करना चाहिए। मुझे जान पड़ता है कि भूमि, संपत्ति और स्त्री के सवाल जो आज के समय में जितने जरूरी हैं उतने पहले भी थे, पर इस विमर्श से वौद्धिक भागते हुए जान पड़ते हैं। आज का वैश्वीकरण, उदारवाद और बाजारवाद या वैश्विक पूंजीवाद की कूटरचना उन्हें विमर्श करने ही नहीं देगी। मेरा मानना है ऐसा है भी। हम मूलरूप से समस्याओं की जड़ों तक पहुंचने वाले लोग हैं ही नहीं, हमारा समाज फुनगी बाज है, हवा में लहराने वाला, आज्ञाओं और आदेशों को मानने वाला और अपनी पीठ पर कानून की धाराओं को स्वर्णाक्षरों में लिखवाने वाला। हमारे देश का आदिवासी, वनवासी समूह जिन्हें मूलनिवासी कहा जाना चाहिए, उन्हें देख कर, उनके साथ रह कर यह तथ्य भलीभंाति समझा जा सकता है कि कानूनी और राजनीतिक खेलों को कैसे खेला गया। यह जो अधिकार का मामला है, इस बाबत विचारों व चिंतनों में सदैव एकरूपता का अभाव ही रहा है। इसे बिडंबना ही कहा जायेगा कि कानून और राजनीति की एकात्मकता पर पुराने काल से लेकर आज तक के वौद्धिक लगातार टिप्पड़ियां करते रहे हैं, और मानते रहे हैं कि कानून के साथ राजनीति का गठजोड़ हर हाल में समाज की सहिष्णुता तथा समीपता को लीलता रहा है और लीलता रहेगा तथा एक नये किस्म का अधिकारवादी वर्ग समूह पैदा करता रहेगा। कानून और राजनीति के संबन्धों को समझने के लिए आवश्यक है कि कानून तथा राजनीति की अवधरणा को समझ लिया जाये फिर देखा जाये िक ये दोनों कितने करीब हैं और कितने दूर? इन दोनों में कोई संबन्ध है भी या नहीं है और संबन्ध है भी तो क्या ये दोनों विपरीत धाराओं में चलने वाली व मानव समाज को नियंत्रित करने वाली विरोधी प्रणालियां है? या पूरक? या आज के आधुनिक समाज को इन दोनों की उपस्थिति की आवश्यकता ही नहीं, इन दोनों ने अपनी उपयोगिता स्वयं नष्ट कर दिया है? कानून तथा राजनीति के सवाल पर पहले की तरह ही आज भी मतभिन्नतायें हैं। कानून अपने प्रारंभिक स्थापनाकाल से ही अन्तर्द्वन्दों में उलझा रहा है, इसके क्रियान्वयन को लेकर उदारता और कट्टरता के संघर्ष लगातार चलते रहे हैं। उदारधारा हमेशा प्रयास करती रही है कि कानून समाज के उत्थान ही नहीं मानवीय समीपता का बाहक बने और मनुष्य की संप्रभुता की हिफाजत करे। पर राजनीति तो अपनी चाल चलती है और सर्वग्राह्य कानूनों में भी बदलाव करती रहती है। कानून की व्यावहारिक व्यापकता जो पीर पराई की अनुभूति वाली है, वहां तक इसकी पहुंच कल्पना की बात है, परिणामतः कानून लगातार अपनी उपयोगिता को शिथिल करता रहा है तथा समाज को वैयक्तिकता के उत्सवों में जकड़ता रहा हैं यानि मेरी भूमि, मेरा मकान, मेरी पूंजी आदि आदि। कानून का आदि और अन्तिम पवित्र लक्ष्य होता है मानवीय समीपता की स्थापना तथा वैयक्तिक संप्रभुता की हिफाजत करना जिसका समान्य अर्थ होता है अभिन्न समाज की स्थापना और उसका जागरण यानि कि यह जो आदमी और आदमी के बीच की दूरी व भिन्नता है वह कानून के बुनियादी आधारों के लिए स्वीकार्य नहीं अगर ऐसा है तो कहीं न कहीं कानून अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। कानून तो आचरण है, ऐसा नहीं कि जब चाहा बदल लिया। वन अधिनियम 1927 के द्वारा आखिर क्या किया गया? सोनभद्र के लाखों गरीब आदिवासियों को उनके सारे संसाधनों एवं जमीन के कब्जों से बेदखल कर दिया गया। यहां कानून का ऐसा खेल खेला गया जिसने प्राकृतिक न्याय की अवधारणा को भी धत्ता पढ़ा दिया। इस कानून को भारतीय लोकतंत्र ने अंग्रेजों के 1878 वाले कानून से उधार लिया था जिसका खुला अर्थ था सारे वनक्षेत्रों को अंग्रेजी राज्य के स्वामित्व में लाना और उन्हें सफलता भी मिली। 1878 वाला कानून तो अंग्रेजों ने सिर्फ इस लक्ष्य से बनाया था जिससे वे बिना किसी परेशानी के सारे वनक्षेत्रों को राजाओं की अधीनता से बाहर निकाल लें और उस पर अंग्रजी सत्ता स्थापित कर लें। अंग्रेजों का तर्क देखिए कितना प्राकृतिक था, तर्क था कि वन क्षेत्र तो प्रकृति का उत्पाद है, इस पर किसी का अधिकार कैसे हो सकता है? इस पर तो राज्य का ही अधिकार न्याय सम्मत है। राजाओं के पास अंग्रेजों के इस तर्क का कोई जबाब नहीं था वैसे भी वे विवश थे, वे अंग्रेजों के सामने नतमस्तक होने के अलावा कुछ कर नहीं सकते थे। कानून की सहज अभिव्यक्ति तथा आशय है पीर पराई जानने वाली, पराई पीर को अपनी पीर समझने वाली। मेरा मानना है कि आज के जटिल समय में कानून की परिभाषा पर बात करने की आवश्यकता नहीं है, आवश्यकता है उसे समाजोपयोगी बनाने की, सभी इसके बारे में जानते हैं कि इसकी उपस्थिति सदैव रही है, भले ही छीजती रही है। तो क्या आज हम जिसे राजनीति कहते और जानते हैं, यह भी आदिकाल से ही है? यानि कि मानवीय सभ्यता के प्रारंभ से ही? कबीलाई समाज वाले युग से। यह बहुत ही पेचीदा सवाल है, शायद ही इसे प्रमाणित किया जा सके कि हमारे समाज में कौन पहले स्थापित हुआ कानून या राजनीति या दोनों साथ साथ आये। राजनीति को तो राज से जोड़ कर ही देखना चाहिए, राज और राजनीति दोनों वैसे भी एक दूसरे से इतने घुले मिले हुए हैं कि इन्हें अलग अलग देखना मूर्खता ही होगी। मेरा मानना है कि राज को समझ लेना राजनीति को समझ लेना होगा, अगर यह सवाल हल हो सके कि भारत ही नहीं सारी दुनिया में राज्यों की स्थापनायें कब और कैसे हुईं? उनके कारक क्या थे तो राजनीति को समझा जा सकता है। जहां तक भारत का सवाल है वैदिक काल में हमें राज्यों के अस्तित्व नहीं दिखते। वैदिक काल के बाद से ही हमारे यहां राज्य के अस्तित्व देखने में आते हैं। राज्यों की स्थापनाओं के बाद राज्यों की सुरक्षा एवं उसकी संप्रभुता का दूसरा चरण प्रारंभ होता है जो आज तक किसी न किसी रूप में चला आ रहा है। राज्यों की सुरक्षा और संप्रभुता तथा राज्यों पर सत्ता धिकार आदि कुछ ऐसे तत्व हैं जो वैचारिक रूप से राजनीति को जन्माते हैं, कहा जाना चाहिए कि राज है तो उसकी राजनीति भी है। यहां हम इसी राजनीति की चर्चा कर रहे हैं जिसका अस्तित्व राज की स्थापना पर टिका होता है, राज के अलावा इसका कोई अस्तित्व ही नहीं और राज बिना कानूनों के चल नहीं सकता। अच्छा राज उसे ही कहा जा सकता है जिसे संचालित करने के लिए कानूनी उदारतायें व्यापक हों, पर ऐसा सोनभद्र में नहीं हुआ। अगर ऐसा हुआ होता तो सोनभद्र जो आदिवासी बहुल परिक्षेत्र है यहां पर संविधान की अनुसूची पांच के नियम चल रहे होते। सोनभद्र में तो राजनीतिक षडयंत्र के तहत आदिवासियों की सही गणना भी नहीं की गई। अधिकांश आदिवासी जन जातियों को अनुसूचित जाति में बदल दिया गया और इस परिक्षेत्र को संविधान की अनुसूची पांच का लाभ लेने से वंचित कर दिया गया। सोनभद्र की इस घटना को हम राजनीति और कानून के उलट पुलट का उदाहरण मान सकते हैं। आज के जटिल समय में कानून तथा राजनीति के बुनियादी फर्क को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा और कोशिश की जा रही कि जो थोड़े बहुत फर्क बचे भी हैं उन्हें समाप्त कर दिये जायें यानि कि राजनीति और कानून को रासायनिक विलयन बना दिया जाये, राजनीति तथा कानून दोनों को एक माना जाये, दोनों को अलग अलग ढंग से न देखा जाये। इस तरह के विलयनों को हम बौद्धकाल की राजव्यवस्थाओं में देख सकते हैं। बाद के कालों में भी ऐसे विलयनों के अनेक उदाहरण हमारे अतीत में रहे हैं पर उन विलयनों तथा रसायनों ने मानवीय समीपता के परम लक्ष्यों को हासिल कर लिया ऐसा नहीं कहा जा सकता। उससे सामाजिक समरसता खंडित हुई है तथा समाज कई कई खानों में बंटा है। आज यह प्रमाणित किया जाना शेष नहीं है कि जब समाज का अंकुश राज पर नहीं रहेगा तब न तो राज रहेगा न ही समाज दोनों को क्षतिग्रस्त होने से कोई ताकत बचा नहीं सकती। आज वही हर ओर देखा जा रहा है कि राज पर समाज का अंकुश नहीं रह गया है, इसके ठीक उलट राज का ही एकतरफा अंकुश समाज पर हो गया है और समाज है कि राज द्वारा बनाये गये कानूनों के मकड़जाल में मछली की तरह फड़फड़ा रहा है। कहने को तो कहा जा रहा है कि लोकतंत्र है, जनता का राज है पर आज की राजव्यवस्था में सिर्फ राज है और जन का कहीं अता पता नहीं। होना तो यह चाहिए था कि जन, मन हर हाल में राज के तंत्र पर प्रभावकारी ढंग से शासन करता दिखे तथा जन भी महसूस करे कि वही राज को चला रहा। पर ऐसी स्थिति को किसी कवि की कल्पना साबित कर खारिज भी किया जा सकता है भला ऐसा कहां संभव है? हमारे समाज में ऐसी अवधारणाओं की कमी भी नही,ं लोग साफ बोलते और कहते हैं कि सभी राजा तो हो नहीं सकते, राजा तो कोई एक ही होगा जिसके भाग्य में होगा। यानि कि राज और राजा दोनों मानवीय कुशलताओं के परिणाम नहीं, वरन् दैवीय परिणाम हैं। हमें ध्यान रखना होगा कि राज की स्थापनायें वौद्धिक कुशलताओं के परिणाम हैं वरना हम आज भी राज पूर्व वाली व्यवस्थाओं के जीव होते। कबीलाई समाज तक आते आते हम समूह से स्व मोह तक उतरते गये यानि कि हमारा समूह, हमारा कबीला, तब कबीला ही हमारा देश था। कबीलाई समाज तक भी कहीं न कहीं सहभागी प्रबंधन के रूप, सामूहिक रहवास, सामूहिक भोजन, सामूहिक श्रम तथा उत्पादन के मौलिक गुण दिखते हैं पर कबीलाई समाज के राज में रूपांतरण के बाद तो सामूहिकता तथा सहभागिता पूरी तरह से छिन्न भिन्न हो गयी। इस स्तर तक आते आते हम समाज से बहुत दूर छिटक कर स्व में केन्द्रित होते चले गये। इस तरह व्यक्ति और समाज पर अंकुश रखने के लिए एक नया घटक राज भी धर्म की तरह हमारी सभ्यता का अनिवार्य हिस्सा बन गया और पूरी सभ्यता धर्म के आचरण तथा राज के कानूनों के झगड़ों में उलझ कर छटपटाने लगी। किसे नहीं मालूम कि आचरण आत्मानुभूति का अंग है जबकि कानून आत्मानुभूति से बाहर सŸाा के दंड विधानों की उपज। आचरण व कानून में दूर दूर तक समानता के तत्व नहीं। जब हमारा समाज लिखित कानूनों की दुनिया से बाहर था तब धार्मिक व सांस्कृतिक विधि व विधान ही हमें नियंत्रित किया करते थे। तब हमारा आचरण हमें नियंत्रित किया करता था। आज तो स्थिति यह है कि हम कल्पना तक नहीं कर सकते कि कोई सभ्यता राजविहीन यानि कानून विहीन भी हो सकती है। व्यक्ति तथा समाज ही आचरण के आत्मानुभूति के सहारे एक दूसरे को अनुशासित करने के लिए पर्याप्त हैं, मानव सभ्यता के लिए राज जैसे दण्ड उत्पादित करने वाले घटक की आवश्यकता ही नहीं। पहले तो व्यक्ति तथा समाज के बीच परंपरा, संस्कृति, रीति रिवाज आदि के अनुशासन प्रभावी थे, संपत्ता तथा स स्वामित्व के मामले सहभागिता पर केन्द्रित थे। किसी व्यक्ति के अधिकार में कुछ नहीं होता था, सारे निर्णय सामूहिक हुआ करते थे। जबकि आज राज के अनुशासनों ने पहले के सारे अनुशासनों को रौंद दिया है। राजव्यवस्था हमेशा इस बात का दंभ भी भरती रही है कि उसी का ही अनुशासन प्रभावी है, पर ऐसा है नहीं, अगर ऐसा होता तब तो झगड़ा ही नहीं था। संपत्ति पर स्वामित्व के मिथक ने ही सोनभद्र के आदिवासियों को उनके पुश्तैनी जमीनों से बेदखल कर दिया है। निश्छल आदिवासियों के पास कब्जे वाली जमीन के कागज कहां थे, उन्हें तो पता ही नहीं था कि कब्जों के कागज भी होते हैं। ऐसे आदिवासी समूहों से जमीन के स्वामित्व के कागज मांगे गये पर वे बेचारे जमीन के स्वामित्व का कागज कहां से देते। स्वामित्व का मामला तो उनकी संस्कृति में था ही नहीं। अंग्रेजों ने लिखित कानूनों के द्वारा स्वामित्व के मुद्दे को महिमामंडित किया फिर उसी राह पर हमारी देशी हुकूमत भी चलने लगी। हमारे सोनभद्र में वन अधिनियम की धारा 4 और 20 का जैसा उपयोग हमारी तत्कालीन सरकार ने किया वैसा उपयोग शायद देश में कहीं नहीं हुआ होगा। लाखों आदिवासियों तथा वनवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीनों से विस्थापित कर दिया गया और बताया गया कि उनके वन की जमीनों पर कब्जे अवैध थे। कभी राजनीति, धार्मिकीकरण के जाल में थी पर आज देखा जा रहा है कि राजनीति, धार्मिकीकरण के साथ साथ जातीयकरण की जाल में है। लोकतंत्र के उदारवादी विधानों के तहत जातियां, जातिगत राजनीति के ध्रुवीकरण की तरफ बढ़ रही हैं। जातीयकरण के बूते सरकारें भी बनने लगी हैं जहां तक राजनीति के धार्मिकीकरण की बात है, वह प्रयोग भी फेल कर चुका है। फेल इसलिए हुआ क्योंकि उसका हिन्दूकरण या इस्लामीकरण किए जाने का अपवित्र लक्ष्य रखा गया। अगर केवल धार्मिकीकीरण का ही लक्ष्य रखा गया होता तो शायद ठीक होता, अगर वैसा हुआ होता तब सत्य, अहिंसा, अचौर्य, अपरिग्रह, दया, सहिष्णुता, सहकार, प्रेम व वंधुत्व आदि समाज के साथ साथ व्यक्ति के गुण बन जाते पर ऐसा हुआ ही कहां? और नही दूर भविष्य में ऐसा होने वाला है। डा. लोहिया ने धर्म तथा राजनीति को परिभाषित करते हुए कहा है कि ‘धर्म दूरगामी राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म।’ गांधी और लोहिया दोनों राजनीति को अल्पकालीन धर्म की तरह मानते थे तथा उसे तात्कालिकता का कर्म समझते थे। राजनीति में अवकाश है ही नहीं, सदैव कर्म करते रहना है, वह भी निष्काम कर्म, फलहीन। आज की सत्ताकांक्षी राजनीति की तरह नहीं। समाजिक विषमताओं के सवालों पर, उसे मिटाने के लिए जनतांत्रिक हस्तक्षेपों के माध्यम से आत्मवलिदान का संकल्प लेना यह अल्पकालीन धर्म है। धर्म पूजा, पाठ, आराधना में लीन रहना तथा समाज लुटता रहे, उसकी लूट के प्रति निर्पेक्ष रहना तथा केवल अपने हित अहित के लिए चिन्तित रहना यह क्रियाशील समाज के लक्षण नहीं है, न ही संस्कृति है, संस्कृति तो विषमताओं से टकराने का एक सगुण माध्यम है। यही जीवन का सच है। हमारे संत और ऋषियों ने भी तो यही किया। उन्होंने सहभागिता पूर्ण सामाजिक वातावरण पर जोर दिया तो व्यक्ति की सत्ता व महत्ता पर भी। सहभागितापूर्ण वातावरण पर जोर देते हुए ऋषियों ने जनसंगठन के अभूतपूर्व सिद्धांतों की भी खोजें कीं और बताया कि राजव्यवस्था पर हर हाल में समाज का अंकुश रहना ही चाहिए, उन्होंने समाज का सत्ता पर नियंत्रण रखने के लिए हर संभव प्रयास किये। समाज का एक अर्थ जनसंगठन भी होता है। कोई भी निरंकुश राजव्यवस्था जनहितकारी नहीं हो सकती। संत तथा ऋषि दोनों सत्ता और समाज के बीच हमेशा संतुलन स्थापित करने के प्रयास करते रहे तभी संत कहलाये, जनता आक्रामक हुई तो उसे रोका, सत्ता जन विरोधी हुई तो उस पर अंकुश लगाया। आज ऐसा कहां है? वैसा समाज तो तब होता जब राज व्यवस्था निश्चित रूप से सभी को बिना भेदभाव के रोजी, रोटी, रोजगार तथा शिक्षा देती और अपने नागरिकों के साथ पुत्रवत व्यवहार करती। राजव्यवस्था की स्थापना के तथा उसका बचाव के प्रयास दो ऐसे कारक हैं जो समाज में कई तरह की विषमताओं को उत्पादित करते हैं। यह माना हुआ सच है कि संपूर्ण सृष्टि प्राकृतिक उपहार है, मनुष्य से लेकर जीव जन्तु, वनस्पतियां, नदी नाले, पर्वत पहाड़ यानि की जो कुछ भी धरती पर दृश्य या अदृश्य है सारा कुछ। हमें समझना चाहिए कि प्रकृति के ऐसे उपहारों पर यह जो स्वामित्व वाला मामला है वह कैसे स्थापित हो गया? कहां से आगया स्वमित्व? राजव्यवस्था ने अपनी स्थापना के लिए अपने हितैषियों एवं शुभचिंतकांे को प्राकृतिक संसाधनों पर स्वमित्व देकर पूरी सभ्यता को कई कई खानों में विभक्त कर दिया। एक खाना संसाधनों के मालिकों वाला तो दूसरा खाना संसाधनों के मालिकाने से वंचितों का। जाहिर है राजव्यवस्था अपनी स्थापना ही नहीं अपना बचाव भी बहुत बारीकी से करती है, हम इसे अपने देश में देख सकते है कि संसद में क्या हो रहा? हमारे यहां सरकार बचाने या चलती सरकार गिराने के लिए कैसे कैसे प्रयास किये जा रहे हैं, संसद में पहुंचने के लिए नये नये तरीकों की खोजें की जा रही हैं, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल विधेयक की मांग की जा रही है (अब नहीं) सूचना पाने वाले अधिकार या अनिवार्य शिक्षा वाले कानूनों के परिणामों को देख कर आखिर क्या आशा रखनी चाहिए? लोकपाल विधेयक के बारे में अन्ना हजारे साहब क्या गलत बोल रहे थे, सरकार से वे ऐसा क्या मांग रहे थे? वे तो यही मांग रहे थे कि सिविल सोसाइटी के लोगों की भागीदारी विधेयक बनाने के संदर्भ में दो। यह कोई असंगत मांग है क्या? जिसे सरकार को मान लेने में पसीना छूटने लगा था। दरअसल लोकराज का भयानक रोग है आदिम शासकों का रूप धर लेना, वे भूल जाते हैं कि वे भी अन्ना जी की तरह ही एक आम जन हैं। लोकसेवक का लोकशासक में रूपांतरण बहुत ही घातक होता लोकशासक को समझना चाहिए कि वे शासक नहीं, शासक तो अतीत में दफनाये जा चुके हैं। पर ऐसा नहीं है, शासकों के नये अवतार लोकतंत्रात्मक शासन सत्ता व्यवस्था में हर ओर होने लगे हैं और जनता ऐसे शासकों के दमन से पीड़ित है। वुद्धिजीवी मानते हैं कि भारत में नये कानूनों को बनाने की उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी उनके अनुपालन और क्रियान्वयन की है, लेकिन वुद्धिजीवियों की सुनता कौन है? कहा जा रहा है कि कानून और राजनीति का हमारे देश में गठजोड़ हो चुका है, और समाज के बहुजनों को हाशिए पर धकेल दिया गया है। राजनीति को जातिगत बनाया जा रहा है? राजनीति तो राजनीति होती है, एक ऐसा आचरण जो जड़ तथा चेतन सभी के प्रति जबाबदेह होती है फिर क्या जाति, उपजाति, क्या वर्ण क्या अवर्ण, इस तरह के घृणित बटवारे के क्या मायने? समझना मुश्किल। पहले आदमी के अस्तित्व को पिछड़ा, आदिवासी, दलित, सभ्य, असभ्य, राजपोषित, कुपोषित, अधिकारी, विशेषाधिकारी के खानों में बांटा गया और अब राजनीति को भी बांटा जा रहा है। अल्पमत तथा बहुमत का डंका बजा कर जिस लोकराज की स्थापना की गयी है क्या इस लोकराज में 60 फीसदी से अधिक बहुमत वाले गरीबों की भी चल रही? दो फीसदी से भी कम अंग्रेजी बोलने वालों तथा देश के 80 फीसदी संसाधनों पर अप्राकृतिक ढंग से कब्जेदारों की ही क्यों चल रही? बहुमत तो 60 फीसदी से अधिक गरीबों का है, क्या उन्हें मतदान के अधिकार और आरक्षण के लाली पाप से अलग हट कर संसाधनों के स्वामित्व में भी हिस्सेदारी देने की कूबत लोकतांत्रिक सरकार में है? उनका हिस्सा क्या यहां के संसाधनों में नहीं है? जाहिर है ऐसी कूबत लोकतंत्र की खाल ओढ़े भेड़ियों की सरकार में नहीं हो सकती। हमें नहीं भूलना चाहिए कि पूरा देश एक बार लोकतंत्र की तानाशाही क्रूरता का दमन आपात काल के दोरान भुगत चुका है। राजनीति तो कहती है, सभै भूमि गोपाल की जिसका समर्थन हमारी संस्कृति भी करती है, फिर संसाधनों पर मालिकाना कैसे स्थापित कर दिया गया? बात साफ है राजव्यवस्था को वैयक्तिक सत्ता में रूपातंरित करना अलग बात है पर राजनीति को संस्कृति के आधारभूत तत्वों से समायोजित करके राजनीति को शुचितापूर्ण बनाना अलग बात। बांटो तथा राज करो कि व्यवस्था पर टिकी राज सत्ता से हमें ऐसी आशा करनी भी नहीं चाहिए कि वह स्वामित्व के वैयक्तिक अधिकारों को स्थापित करने के बजाय सामाजिक सत्ता को स्थापित करने का काम करेगी। अगर ऐसा हुआ होता तो आज हमारे देश का आदिवासी, वनवासी चीख नहीं रहा होता। बतौर कथाशिल्पी हमें इन सवालों से सकारात्मक ढंग से टकराने की आवष्यकता है।