रामनाथ शिवेंद्र के आदिवासी एवं दलित केंद्रित कहानी सँग्रह
रामनाथ शिवेंद्र के आदिवासी एवं दलित केंद्रित कहानी सँग्रह

‘पनसाल’ कहानी संग्रह

अपनी बात
‘पनसाल’ कहानी संग्रह मेरा पहला कहानी संग्रह था जो 1980 में प्रकाशित हुआ था इसके दो साल पहले ‘सहपुरवा’ उपन्यास प्रकाशित हो चुका था। संकलन की सभी कहानियॉ देहाती पृष्ठभूमि से उपजी हुई हैं। मुझे याद है वह समय जब छपाई बहुत ही कठिन हुआ करती थी। पहले कम्पोजिंग वह भी एक एक अक्षर चुनना और उसे एक फ्र्रेम में बिठाना फिर छापने के लिए ट्रेडिल मशीन पर सेट करना। तो प्रकाशन का वह मुश्किल दौर था। प्रूफ देखना भी कठिन हुआ करता था भीगे कागज पर कम्पोज्ड सामग्री को हाथ से उतार कर फिर प्रूफ देखा जाता था। ‘पनसाल’ संग्रह के लेखकीय वक्तव्य को बिना फेर बदल किए उसी को यहां प्रस्तुत किया जाना आवश्यक जान पड़ रहा है जिससे पता चले सके कि वह दौर कथा साहित्य के लिए कितना मुश्किल था? ‘यकीनन ‘पनसाल’ कहानी संग्रह छाप कर ऐश्वर्य और वैभव प्राप्त करने का कुटिल इरादा कम से कम मेरे जैसा आदमी तो नहीं ही रखेगा इसका मतलब यह भी नहीं कि गॉव-गॉव गली-गली उभरती सोच को प्रकाशन के दायरे में कैद न करके अपने साथ ही अमानुषिक व्यवहार किया जाये। पनसाल संग्रह की सारी कहानियॉ आपके अगल बगल की उपज हैं जिसमें पात्रों की अल्हड़ता तथा अखण्डता के साथ साथ उनकी अपनी विचारधारा की लड़ाई व्यवस्था के खिलाफ निरंतर जारी है। इस कहानी संग्रह में ऐसा कुछ मौके गर मौके नहीं मिलेगा जिससे रति सुख की बनावटी जरूरत दिमाग में उपजे और एकांत की सुगबुगी को हास्य और विनोद से झकझोरे। सही मायनों में देशी संस्कृति के इर्द-गिर्द चौंकाऊ तथा उत्तेजक आचरण का जुनून कुछ इस तरह फेल गया है कि लोग बाग चौंधिया कर बेइमानी को ईमानदारी के सॉचें में ढालने का अनुपयोगी कुप्रयास कर रहे हैं। रोजी-रोटी के लिए मुहताज लोगों को विज्ञापन की तरह इस्तेमाल करके कानून की अधिकांश धाराओं को ‘हर माल छह आना’ बेचा जा रहा है। यह सच है कि हम जिनके लिए लिख रहे हैं उनके दिमाग में साठ करोड़ की बात नहीं है, अपनी मुसीबत को साठ करोड़ की मुसीबत बताने की क्षमता नहीं है। जनहित तथा राष्ट्रहित की व्यवस्था को निजी संदर्भों से जोड़ने का जुगाड़ नहीं है, फिर वे हमारी कहानियों से, कविताओं से, गीतों से किस तरह जुड़ेंगे, स्पष्ट नहीं है। फिर भी हम तथा हमारे जैसे लोग उन्हीं की बस्तियों, उन्हीं कीे जिन्दगियों से गंभीरता पूर्वक रिश्ता कायम कर रहे हैं क्योंकि हमें जो कुछ करना है जन मन की सार्थक सोच की धारा से ही करना है। यह सवाल भी आयातीत लगता है कि जब वे पढ़ नहीं सकते, जब वे समझ नहीं सकते तब उनके लिए क्यों लिखा
जाये। इस तरह के सवाल भ्रम पैदा करने के लिए बहुत ही मौजू हुआ करते हैं क्योंकि इनकी पैदाइश ही हास्यास्पद, विवादास्पद तथा घृणित है। इस तरह के सवाल को बाजारू बनाने वाले लोग निश्चित ही साजिशी तौर पर जन आन्दोलनों के खिलाफ हैं और हो सकता है, हो सकेगा, ऐसा नहीं होता के रोमांचकारी परिणामों पर उत्सर्ग हैं। विज्ञापनों और अन्य जरूरी, गैर जरूरी जगहों पर औरत को अधनंगी, नंगी, खूबसूरत देह वाली बनाने की प्रवृत्ति के खिलाफ आपका भीतरी मन झटपट कुछ करने के लिए भले ही तैयार न हो पर आपका लोक मन निश्चित ही सार्वजनिक ढंग से विरोध ही करता होगा। यह हास्यास्पद तर्क लगता है कि विस्मय, कोलाहल, रोमांच, रोमांस से ऊपर उठ कर मानवीय संवेदनाओं से जुड़ने का मतलब, हक की लड़ाई की अगुआई करने का मतलब सिर्फ दिमागी बोझ ढोना है, अपने को गर्त में ढकेलने से है। बमुश्किल तमाम फुर्सत के क्षण हासिल होते हैं और उन्हें साठ करोड़ के साठ करोड़ समस्याओं से जोड़ कर, बिस्तरे की स्पंजनुमा फुसफुसाहट, आनन्द और उत्साह को क्यों बर्बाद कर दिया जाये। वैसे समान्य रूप से ‘अन्धा प्रेम’, ‘पागलप्रेमी’,‘ प्रेम का दिवाना’ जैसी तमाम बिस्तर बाज कहानियॉ ही प्रचलन में हैं और जहां अन्याय, शेषाण, और अत्याचार के खिलाफ बगावत की रूपरेखा में कहानियॉ हो उन्हें सामाजिक जीवन में नहीं स्वीकारा जाता। वैसे पनसाल कहानी संग्रह जैसे संग्रहों का प्रकाशन अत्यंत ही कठिन काम है, तरह तरह की परेश्शानियां छोटे प्रकाशनों को उठानी पड़ती हैं फिर भी चैलेन्ज के तौर पर इस काम को बड़े बड़े एकाधिकारवादी संरक्षण प्राप्त प्रकाशनों के खिलाफ प्रयास किया ही जाना चाहिए। दक्षिणांचल के आदिवासियों, कल-कारखानों के मजूरों को भजाने वाली सरकारी सुविधा प्राप्त पत्रिकाओं के विरूद्ध छोटे छोटे प्रकाशनों के जरिए विरोधी माहौल तैयार करने की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता। झूठ की समझ सार्वजनिक ढंग से विकसित हो भी जाये तब भी वह झूठ ही रहेगा। गरीबी हटाने, बेरोजगारी मिटाने समता और समृद्धि लाने का मतलब कदाचित सत्तर फीसदी लोगों का गरीबी रेखा के नीचे का जीवन जीने से ही है। धन प्राप्त करने के तमाम संसाधनों को प्रतियोगिता के जरिए हासिल करवाने और वादा दर वादा से मौजूदा समस्याओं को हल करने का कुशल विज्ञान इस देश में जिस तेजी से उभर रहा है लगता है हम सभी लोगों की तटस्थता का दुष्परिणाम ही है। पनसाल कहानी संग्रह बिना विराम के हर जगह संघर्ष की जुझारू यात्रा तय करते हुए मिहनती हाथों को मजबूत बनाने की ओर अग्रसर है। संघर्ष की सार्थक रूपरेखा बनाने की योजना में इस संग्रह के पात्रों की पात्राता निहित है। जिसका आशय जितना स्पष्ष्ट, सपाट और बेबाक है उतना ही आकर्षक, चौंकाऊ और झकझोरू भी, पनसाल आपके हाथ में है, देखें.... नवम्बर 2019 रामनाथ शिवेन्द्र
डफली बजाये जा

हम तुम्हें खोना नहीं चाहते कामरेड
‘जयकरन पाडे़ को छोड़कर तुमने अच्छा नहीं किया कामरेड ! सेक्रेटरिएट की बैठक में क्या जबाब दिया जाएगा ?‘ कहते हुए चुप हो गए थे कॉमरेड दŸा , और सतीश का चेहरा बुझ सा गया था , हां गलती तो हो गई है पर करता क्या ? वह बेचारी औरत पैर पर गिर पड़ी थी, ‘भईया‘, ‘भईया ‘ कह कर देह से लिपट गई थी, सामने पेड़ में बंधा था उसका पति , उसके ससुर को मार ही दिया गया था, पूरी बखरी धंू-धूं कर जल रही थी, सामने दो-दो लाशें झुकी गर्दनें, पेड़ में लटकी हुई, गोलियों से छलनी हुआ सीना, हमारा लक्ष्य पूरा हो गया था, केवल जयकरन ही तो छूट गया....... क्या फर्क पड़ जाएगा इससे ?‘ कामरेड सतीश आगे कुछ नहीं बोल पाया, एक अंतहीन उदासी में लीन हो गया, कामरेड सतीश का जबाब अच्छा नहीं लगा कामरेड़ प्रभुदŸा को , पर होता भी क्या ? जयकरन को तो छोड़ ही दिया गया था, वर्ग -दुश्मन सफाया अभियान के लिए भविष्य में घातक हो सकता था जयकरन, इतिहास की वैज्ञानिक व्याखांए भी अवांक्षनीय के विनाश और वांक्षनीय की प्राप्ति की पक्षधर हैं, बुद्धि और बल सभी स्तर पर, बहुत ही संकटपूर्ण स्थिति थी कामरेड प्रभुदत्त के समक्ष ,कामरेड प्रभुदत्त अभियान के मुखिया हैं, सारी जबाब देही इनके ऊपर है, पर सतीश के साहस ; संकल्प ; और समर्पण से इतना प्रभावित कि उसके विरूद्ध कुछ निर्णय लेना, इस अनुशासनहीनता के खिलाफ; अब उनके वश का नही रह गया है, जयकरन का छोडा़ जाना, कई वर्षों से चल रहे अभियान की बहुत ही त्रासद घटना थी, ऐसा कभी सुना नहीं गया था , अभियान में संलग्न तमाम कामरेड, कामरेड सतीश के इस कृत्य से सख्त नाराज हो गए थे, उनमें कामरेड सतीश को लेकर कामरेड प्रभुदत्त के प्रति संदेह के बीज अंकुरित होने लग गए थे, जगह-जगह गोष्ठियां होने लगीं थीं , मार्क्स , एजिंल, लेनिन और माओत्से तुंग की छितराई व्याख्याएं-व्याख्यायित होने लगीं थीं, सवाल था....‘फैसला तो फैसला‘, ‘क्या हमें अपने अभियान की सफलता के लिए भावनाओं, इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखना चाहिए, वहीं भावनाएं , इच्छाएं जो बदचलन समाज की कुप्रवृत्तियां हैं,‘अभियान के एक महत्वपूर्ण कामरेड रवि सक्सेना तो अपना आपा ही खो बैठे थे- खूब करो वर्ग दुश्मनों की पहचान, और सफाया का काम, लाओ सर्वहारा की तानाशाही, घूम-घूम जलाते रहो घरों को जहां कुछ अपने काम का दीख जाए; उसे छोड़ते जाओ, मार्क्सबाद....मार्क्स तो नहीं रहे, उनकी बातें भी मर जाएंगी इसी तरह, मार्क्स को कोई धन-पशु थोडे़ मारेगा,हम लोग ही मार डालेगें, इससे भी बड़ा मजाक और क्या हो सकता है, कि कोई वांक्षित दुश्मन सामने हो और भावनाओं ,उदारताओं, दया तथा कृपा जैसी वाहियात संवेदनाओं के कारण जीवित छोड़ दिया जाए बिना विचार के, कि कल वह क्या करेगा ? कामरेड रवि घूम-घूम कर संगठन में सबसे इसी तरह कहने लगे थे, मार्क्सबाद की मोटा-मोटी समझ रखने वाले अन्य कामरेड भी उनकी बात से प्रभावित होते जा रहे थे, ‘हां बहुत गलत हुआ‘ यहीं तक संगठन का माहौल रह जाता तो ठीक था, किन्तु कामरेड प्रभुदत्त के बीसों साल के समर्पण, प्रतिबद्धता और संघर्ष को त्याग कर, उन्हें भी सवालों के घेरे में रख लिया गया था-‘आखिर सतीश अब तक छुट्टा सांड़ की तरह क्यों घूम रहा है ? संगठन का नियम एक समान सब पर लागू किया जाना चाहिए और संगठन का नियम ऐसे में किसी को मृत्यु-दान नहीं देता ,‘ ऐसा नहीं था कि , कामरेड प्रभुदत्त को ; संगठन में चल रही कानाफूसी और रवि सक्सेना के षड्यंत्रकारी कार्यों की जानकारी नहीं थी, उन्हें बराबर सूचनाएं प्राप्त हो रही थीं , फिर भी कामरेड सतीश के बारे में चुप ही रहे ,कामरेड प्रभुदत्त। संगठन के हित में सतीश की गलती को भूल जाना ही ठीक था , पर संगठन के लोग तो सतीश को दंडित किया जाना आवश्यक समझते थे। दंड़ देने की परंपरा पुरानी थी संगठन में , कई कामरेडों को इस तरह की गलतियों के कारण गोली से भूना जा चुका था , वे लोग भी समर्पित तथा प्रतिबद्ध लोग हुआ करते थे। कामरेड प्रभुदत्त ने संगठन के लोगों को अलग-अलग तरीकों से समझाना भी चाहा था , प्रयास भी किया था ; पर सफलता नहीं मिली थी , उन्होंने इसी क्रम में रवि सक्सेना से भी बात की थी ,पर वह तुनक गया था , यह वही रवि सक्सेना है जो कामरेड प्रभुदत्त की विद्धता एवं प्रतिबद्धता की घूम-घूम कर तारीफ किया करता था ,जब कभी कामरेड प्रभुदत्त के क्लासों को वह छोड़ दिया करता था , उसे कोफ्त होती थी, भौतिक द्वंद्ववाद का ज्ञान इन क्लासों में जाने से ही उसे हासिल हुआ, पर अब वह प्रभुदत्त को सतीश के मुद्दे पर संवेदनशील, भावुक और प्रतिक्रिया-वादी तथा संशोधनवादी करार दे रहा था, कामरेड प्रभुदत्त किसी भी तरह से सतीश को दंडित किए जाने के पक्ष में नहीं थे, संगठन बनाने से लेकर,चलाने तक की पूरी प्रक्रिया में सतीश उनसे अलग नहीं हुआ था। पढ़ाई-लिखाई समाप्त हो जाने के बाद जब घर-गृहस्थी का सवाल आया , कामरेड प्रभुदत्त घर-बार छोड़कर भाग खडे़ हुए थे, पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र और लेनिन की प्रसिद्ध पुस्तक ‘क्या करें‘ का अध्ययन कर लिया था, बाद में ‘पूंजी‘ तथा विभिन्न इंटरनेशनल्स में हुए निर्णयों का भी, रूस की अक्टूबर क्रांति और चीन में हुई सांस्कृतिक क्रांति की वैज्ञानिक समझ भी उन्हें कड़े अध्ययन से ही हासिल हो पाई थी, ‘जनता के साथ, जनता का काम ‘ करने का फैसला उन्होंने स्वेच्छा से लिया था, सत्ता बंदूक की नाल से ही हासिल होगी, इसे पूर्ण सत्य मानते थे, इतिहास में मजाक औरघटी तमाम घटनाओं के क्रूर परिदृश्य भी तो इसी तरह दीखते हैं, अतीत को बिना जीते भविष्य को नहीं जीता जा सकता ,ऐसा कुछ मानने लगे थे प्रभुदत्त। वे निकल पडे़ थे सोचे-समझे अभियान की तरफ, जगह-जगह जो थोड़े-बहुत लोग इस दिशा में सक्रिय थे उनसे संपर्क भी किया था कामरेड़ प्रभुदत्त ने, फिर बाद में अपना संगठन बना लिया था उन्हंे ,संगठन बनाने के दौरान ही कामरेड सतीश मिल गया था, बी.ए. में पढ़ने वाले विद्यार्थी के रूप में , सतीश के भीतर की आग पहचान लिया था उन्होंने , धीरे-धीरे जोड़ने लगे थे सतीश को अपने साथ, जब भी शहर आना होता सतीश के यहॉ निश्चित रूप से ठहरते कामरेड प्रभुदत्त। सामाजिक ,राजनीतिक धार्मिक तमाम तरह की बातें होतीं जिनसे निरंतर प्रभावित होता चला गया सतीश। पढ़ाई समाप्त होने के बाद सतीश के विधायक पिता श्री ने चाहा था कि वह ‘कम्पटीशन‘ दे, पर उनका प्रयास बेकार गया, किसी दूसरे किस्म की नौकरी या व्यवसाय करने का दबाव उसके ऊपर पड़ा ,पर सतीश ने सब नकार दिया, बाप की इच्छाओं को ठुकराकर संगठन में शामिल हो गया, कामरेड! प्रभुदत्त के साथ। कामरेड प्रभुदत्त के लिए संगठन और सतीश दोनों ही पर्याय हैं एक दूसरे के। कई-कई मोर्चों पर सतीश ने ही बचाया था कामरेड़ प्रभुदत्त को जान से, किसी भी जटिल एवं संघर्ष पूर्ण मोर्चें को आसान बना देना आसान हुआ करता था सतीश के लिए ...... और संगठन चलाना , नए लोगों को शामिल कर लेना , कोई सतीश से सीखे , आज संगठन का यह बढ़ता स्वरूप उसी के कारण ही तो है, इसलिए कामरेड प्रभुदत्त ,सतीश के बारे में कुछ फैसला नहीं ले पा रहे थे, जबकि संगठन में विद्रोह तेजी से उभरता जा रहा था, कामरेड रवि सक्सेना ने विरोधी मोर्चा संभाल लिया था, संगठन में उभरते-असंतोष के कारण सेक्रेटरिएट की बैठक आहूत कर ली गई थी , कामरेड रवि सक्सेना ने सतीश को दंडित किए जाने के निर्णय के पक्ष में अन्य कामरेडों को खुलकर सामने आने के लिए, प्रयास तेज कर दिया था, एक पल भी गंवाना उनके वश में नहीं रह गया था इससे अलग , यहां तक कि उसने कहना शुरू कर दिया था कि ‘जयकरन की औरत कामरेड सतीश की पूर्व प्रेमिका है, और उसका मायका उसके गांव की तरफ है भी,कामरेडों में कृत्रिम घृणा उत्पन्न होती जा रही थी, निश्चित ही सेक्रेटरिएट सतीश के लिए मृत्युदंड का ही फैसला लेगा,यह करीब-करीब तय था,कामरेड प्रभुदत्त टूटते जा रहे थे, इस तरह के अनावश्यक बदलाव अंौर उभरते असहमतियों के कारण, लगातार बीस वर्ष का उनका प्रयास विखरता जा रहा था ,ख्ंाड-,खंड होकर टूटता दीख रहा था उन्हें। उन्होंने जो संगठन की ईमारत बनाई थी वह धूं-धूं कर वर्ग-दुश्मनों की बखरियों की तरह जलती जान पड़ रही थी, उन्हें महसूस हो रहा था कि इस समय वे जयकरन की औरत की तरह रवि सक्सेना के पेैरों पर गिर कर सतीश के जीवन-दान की भीख मांग रहे हों फिर भी रवि सक्सेना ठोकर मार-मार कर उन्हें चोटिल कर रहा हो। उन्हें ऐसा भी लग रहा था कि रवि सक्शेना सतीश की हत्या करने के बाद उनके पेट में संगीन घोंपना चाहता है। कामरेड प्रभुदत्त ऐसा सोचकर कांप जाते हैं अब सेक्रेटरिएट की बैठक तो नाटक की तरह है, फैसला तो पहले ही करा चुका है रवि सक्सेना । खूब दारू पीते हैं, कामरेड प्रभुदत्त फिर सो जाते हैं उन्हीं के बगल में बैठा रह जाता है सतीश रात भर बिना सोए। अच्छी तरह से महसूस कर रहा है सतीश , कामरेड प्रभुदत्त में आए बदलाव का कारण। सुबह होते ही झगड़ जाता है प्रभुदत्त से ,‘आखिर क्यों हैं परेशान कामरेड ! यही न कि मुझे गोली मार दी जायेगी, कोई जीवित रहने के लिए जनमा है क्या? संगठन को बचाइए कामरेड ! मुझे छोड़िये मैने वस्तुतः अपराध किया है सामूहिक निर्णय को व्यक्तिगत निर्णय से क्षति पहुंचाया है , भला बताएं मैंने संगठन के लिए किया ही क्या है ? मैं वर्ग-च्युत भी तो नहीं हो पाया अब तक.........सर्वहारा समाज का भी नहीं हंू कामरेड ! मैं आत्म-हत्या कर लेता अब तक .....और आपको चिंतित भी न होना पड़ता मैं जानता हंू ‘विश्वास जब मर जाय तब मर जाना ही बेहतर होता है ‘ पर मुझे बहुत कुछ कहना है सेक्रेटरिएट में , इसी लिए जीवित हूं ...‘निवेदन है ,आप मेरी चिंता न करें,‘ ‘चुप रहो‘! डांट दिया था कामरेड प्रभुदत्त ने कामरेड सतीश को, ‘बहुत सालों से संगठन के संचालन का काम देख रहे हो तुम ,जो कार्य हमारे लिए लक्ष्यगत तथा अनिवार्य रहे हैं और हमारे दुश्मनों के लिए भयानक, घृणित तथा क्रूर ,क्या कभी विरत हो पाए थे उनके कार्यों से तुम जयकरन को गोली मारना तय था, फिर तुम उसकी औरत के कारण ,कैसे भावुक हो गए ? कहॉ से उपज गई तुम्हारे भीतर संवेदन-शीलता ,वही संवेदनशीलता जो करोड़ों-करोड़ की हैं जिसके लिए हम प्रयास कर रहे है, फिर किसी एक के लिए कैसे-क्यों ? बता सकते हो, मैं जानता हूं तुम उस औरत को जानते तक नहीं.............. फिर उससे संबंध होने का सवाल ही नहीं, ‘सतीश चुप था , अकुलाया हुआ भीतर से , वह भी सोचता रहा है ‘ क्यों छोड़ दिया उसने जयकरन को ‘ इसका जबाब उसे नही मिल पा रहा था , वह इन थोथी संबेदनाओं से , संगठन के कार्य के निमित्त बाहर हो चुका था , फिर भी छोड़ दिया जयकरन को ............ ‘कामरेड! मैं समझ नहीं पाया अब तक; आखिर क्या हो गया था मुझे उस दिन, उस औरत की रूलाइयों और चीखों ने मुझे कैसे भटका दिया उस दिन,मेरे लक्ष्य से ,उसने भइया कहा था शायद और मैं बेबस ,बेसहारा बहन का भाई बन गया था, संभवतः यही हुआ होगा, हालांकि हमारे किसी से कोई रिश्ते नहीं है‘ , फिर भी रिश्तों से बाहर नहीं हो पाए हम ..... ताज्जुब है कामरेड,‘ सतीश को आश्वस्त करते हुए कामरेड प्रभुदत्त ने कहा- ‘यही रिश्तों की भावुकता का यथार्थ है जो हमारे-तुम्हारे बीच है, जिसके कारण हम तुम्हें नहीं खोना चाहते कामरेड , और न ही संगठन तोड़ना चाहते हैं पर यह रवि सक्सेना.....,लगता है तोड़ डालेगा हमारे घरौंदे को, रवि ने हमारे संगठन को व्यक्तिवादी राजनीति का अखाड़ा बना दिया है, उसका लक्ष्य सिर्फ तुम्हें ही नहीं ,मुझे भी समाप्त करने तक का है ,अजीब तरह का षड़यंत्र रच रहा है वह। पचासवां पार कर चुके हैं कामरेड प्रभुदत्त, शरीर के अधिकांश हिस्सों से कभी छर्रे तो कभी गोलियां निकाली जा चुकी है उनके, पुरवइया बहते ही देह ऐंठने लगती है ,अब घर की याद नहीं आती, मां-पिता के मृत्यु का समाचार उन्हें मिला था, पर संगठन के कार्यों एवं नीतियों के चलते नहीं जा पाए थे गांव, जहां वे जन्मे थे, उनके कर्म का हिस्सा नहीं रह गया था यह सब, पूरी दुनिया उनकी है और उस पर वे अपनी नीतियों तथा कार्यक्रमों के साथ काबिज होना चाहते है ,उनका संगठन देश के एक दो जिलों तक ही प्रसार पा सका था, अन्य संगठन जो दूसरी जगहों पर कार्यरत थे, उनके साथ ताल-मेल हो ,ऐसा प्रयास भी किया गया था ,पर सब बेकार गया था। वैचारिक भिन्नताओं एवं पार्टी लाइन के चलते सभी संगठनों की हैसियत जुगनू से ऊपर नहीं- इसे जानते थे कामरेड प्रभुदत्त! इसी उधेड़-बुन और नई सुबह की आशा में गुजर चुके हैं बीस साल कामरेड प्रभुदत्त के। वे जानते है, सिर्फ दस साल आगे ही कुछ किया जा सकता है, फिर तो शरीर ही साथ नहीं देगा, इधर का सामाजिक एवं राजनीतिक माहौल भी तो काफी कुछ बदल गया है ,बीस वर्ष पहले जिन वर्ग-दुश्मनों की पहचान जिन आधारों पर की गई थी; वे आधार भी तो काफी कुछ घिस-पिट गए हैं, बीस वर्ष पहले वाला वर्ग-दुश्मन अपना ही शत्रु बनता जा रहा है , आज जमीनों पर का उसका एकाधिकार सरकारी छद्म उदारताओं के कारण बहुत कुछ कम हुआ है, चुनाव की प्रक्रियाओं से लघु-मानव बहुत अर्थाें में सचेतन हुआ है,आज पुराना वर्ग-शत्रु नए रूपों में समाज में स्थापित होता जा रहा है, सरकार से सीधा तालुक रखने वाला राज-पोषित व्यक्ति आज सामंती चरित्र जी रहा है जिसमें अधिकारी भी है और नागरिक तथा प्रतिनिधि भी ,कामरेड प्रभुदत्त महसूसने लगे हैं कि आज की सामाजिक संरचना काफी-कुछ बदल गई है, जिसके संदर्भ में ही कामरेड प्रभुदत्त वर्ग-संघर्ष को व्याख्यायित करना चाहते हैं,खेतिहार मजदूर,औद्योगिक मजदूर, तमाम गरीब लोगों को एक साथ शामिल करना चाहते हैं कामरेड प्रभुदत्त, एक नया रास्ता बनाना चाहते हैं- वे इसे भी विश्लेषित करना-कराना चाहते हैं कि वे कौन से कारण हैं जिसकी वजह से भूख से परेशान आदमी भी गरीबी की भूख नहीं महसूस करता ? यातना और शोषण से त्रस्त आदमी सब कुछ ईश्वरीय मान लेता है ,क्यों नहीं चुनता संघर्ष का रास्ता ? जीवन और मृत्यु का कारण , वह खुद क्यों नहीं बनना चाहता ? बहुत कुछ लिखा है अपनी डायरी में प्रभुदत्त ने , यह भी लिख लिया है कि कामरेड सतीश हमारे न रहने के बाद भी अच्छी तरह समर्पित भाव से संचालित करता रहेगा हमारे संगठन के कार्यों को, बदलाव की इस दिया को कभी बुझने नहीं देगा कामरेड सतीश। सेक्रेटरिएट की बैठक की अध्यक्षता करते हुए कामरेड प्रभुदत्त,कामरेड सतीश को गोली से उड़ा देने का आदेश दे देते हैं , हालांकि यह कार्य कोई नया नहीं था कामरेड प्रभुदत्त के लिए, फिर भी साफ-साफ महसूस कर रहा था सतीश कि कामरेड़ प्रभुदत्त कांप रहे हैं और उनकी जुबान लड़खड़ा रही है , फैसला हो चुका था ,संगठन के नियमानुसार कामरेड़ सतीश को अस्थाई हवालात में बंद कर दिया गया था ,ऐसे अवसरों पर जश्न मनाया जाता रहा है संगठन में ,ताकि अभियुक्त से जुड़ी तमाम संवेदनाओं को भुलाया जा सके और स्मृति क्षय हो सके , नियमानुसार ठीक तीसरे दिन कामरेड सतीश को गोली से उड़ा दिया जाना था। कामरेड प्रभुदत्त के लिए उनके संघर्षपूर्ण जीवन का सबसे क्रूर और अनिष्टकारी फैसला था यह , सेक्रेटरिएट की कार्यवाही समाप्त होते ही अपने नियत विश्राम स्थल तक लौट आते हैं कामरेड प्रभुदत्त। सेक्रेटरिएट की बैठक में कामरेड सतीश ने कहा था....... ‘महोदय मुझे तीन दिन तक जीवित रहने का मौका न दिया जाए, यह मेरे साथ अन्याय होगा , मैं अपराधी बनकर एक क्षण भी नहीं जीना चाहूंगा ,आज और अभी ,इसी क्षण मुझे गोली मार दी जाए , यह तीन दिन बाद गोली मारे जाने का नियम भी संभवतः हम कामरेडों ने छद्म भावुकता में ही बनाया था, कृपया इसे आज और इसी वक्त तोड़ दीजिए ,‘ ऐसी भावुकता व संवेदनशीलता नहीं चलनी चाहिए। कौन सुनता एक अपराधी की बात ,सभी जश्न मनाने में मशगूल हो गए थे, पर रवि सक्सेना सक्रिय था ,वह कुछ और ही चाहता था, उधर कामरेड प्रभुदत्त के लिए कठिन होता जा रहा था वक्त काटना, सतीश से मिलना चाह रहे थे, पर नहीं मिल पा रहे थे......मानसिक अंतर्द्वद्व के शिकार प्रभुदत्त ; अनिर्णय की स्थिति में काफी लाचार और बेबस हुए जा रहे थे, लेनिन की पुस्तक ‘क्या करें‘ को आखिर कितना पढ़ते ? कहां से मिलता उसमें इस तरह की कार्यवाहियों पर कोई विचार ? सक्रिय , समर्पित तथा प्रतिबद्ध कामरेड़ों की एकाध भूलों को किस प्रकार माफ किया जा सकता है, वैसे एंजिल ने भी तो कई-कई बार अपनी स्थापनाओं में काफी फेर बदल किया था , अंततः कामरेड प्रभुदत्त बिफर पड़ते हैं, आंखे छल-छला जाती हैं, क्रांति का यह क्रूर दर्शन उन्हें काफी बोझिल लगने लगता है, हिंसा-प्रतिहिंसा यह क्या है ? उत्पीड़कों का सफाया उत्पीड़न के द्वारा, हिंसा की समाप्ति हिंसा के द्वारा ,कदापि नहीं ,चीख पड़ते हैं कामरेड प्रभुदत्त ‘नहीं-नहीं , ऐसा नहीं होने दूंगा ,‘ कामरेड प्रभुदत्त जान चुके थे कि रवि सक्सेना हमारे संगठन की जमीन में बो चुका है उन्नत किस्म का षड़यंत्रकारी बीज, और मौजूदा राजनीति की व्यक्तिवादी संस्कृति से संस्कारित करना चाहता है पूरे संगठन को, छोड़ देना चाहता है संगठन की अनिवार्य प्रक्रियाओं को ,कामरेड सतीश को हटाकर , वह अपना लक्ष्य पा सकता है और बदल सकता है संगठन को एक उग्रवादी दल में, सिद्धांत हीन..कामरेड प्रभुदत्त को अपनी मानसिक संरचना की तिलिस्म में हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा दीखने लगता है ,रात काफी जा चुकी थी....सो नहीं पा रहे थे प्रभुदत्त, सोना भी कहां था ? थोड़ी खड़-खड़ाहट होती है, जग जाता है सतीश ,कौन है ? पूछना चाहता है, तब तक उसका मुंह ढक जाता है,एक बलिष्ठ पंजे से, हंू धीरे से.....मैं हूं ‘ ‘अरे कामरेड ! आप ! ‘ ‘चुप ! वक्त नहीं है बातें फिर होंगी, चलो, ‘फैसले की दूसरी रात थी यह, घुप्प अंधेरे में काफी दूर निकल आए थे दोनों लोग, स्टेशन थोड़ी ही दूर पर था, कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद रेल आ जाती है ,दोनों लोग डिब्बे में सवार हो जाते हैं, बिना जाने कहां जाना है और क्यों जाना है, भीतर से व्याकुल था सतीश ‘यह क्या किया कामरेड़ आपने, अब क्या होगा संगठन का, आखिर हम सब ने जो किया अब तक उसका क्या होगा ? गाड़ी में बैठने के बाद ही, पूछता है सतीश , कामरेड प्रभुदत्त से ‘यह क्या किया आपने कामरेड ? चाहे जो हो, जिस संगठन में रवि सक्सेना जैसा महत्वाकांक्षी हो ,जिसके राजनीति का आधार ही षडयंत्र हो, उस संगठन का भविष्य क्या और क्या वर्तमान? जिस दिन तुमने जयकरन को छोड़ दिया था उस अभियान में रवि सक्सेना भी तो था, वहीं मौके पर ही उसने विरोध क्यों नहीं किया था ? आखिर वह क्या चाहता था, यही न कि सतीश को संगठन के फैसले से ही मारा जाए और संगठन पर अपना दबाब बनाया जाए,‘ मैं तुम्हें नही खोना चाहता था कॉमरेड ! तुम्हें खोने का मतलब ;खोना बहुत कुछ और पाना कुछ भी नहीं,‘ कॉमरेड प्रभुदत्त ने कहते-कहते कॉमरेड सतीश को गले लगा लिया था , ‘हमें तुम पर उतना ही नाज है जितना अपने आप पर घ्णा , मै अनायास ही टकरा गया था सिंद्धांतों के पहाड़ों से...सिर फूटते-फूटते बचा है कामरेड सतीश, हमें फिर से सोचना समझना होगा ,सामाजिक संरचना को ,जीवन के द्वंद्व को, प्रकृति और पुरूष को, व्यक्ति तथा समष्टि के यथार्थ को नए संदर्भों में व्यक्ति और पदार्थ के रिश्तों को व्याख्यायित करना होगा, फिर नई रूप-रेखा निकलेगी संघर्ष की, वही हमारे लिए आवश्यक होगा‘, गाड़ी अपनी रफ्तार से चली जा रही थी , निश्चित ही वे लोग वहीं उतरे होंगे जहां गाड़ी का आखिरी पड़ाव होगा और उन लोगों का प्रस्थान स्थल।
दूसरी परंपरा

काली रात , हर ओर सांय-सांय, बादलों की तड़क-गरज भी नहीं, कुछ भी दिख नहीं रहा, भयानक अंधेरा-अंधेरा भी बोलता, बतियाता, गुदगुदाता, अब उसे अंधेरे की गुदगुदियों से कुछ लेना-देना नहीं, पहले की बात दूसरी थी........वे पढ़ाई के दिन थे, पिता जीवित थे, घर पहुंचते ही पिता के सवाल उसकी खोपड़ी झनझना देते थे, ‘इतनी रात तक कहां थे? पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहे?’ पहले तो नहीं, पर बाद में उसे विश्वसनीय झूठ बोलने की आदत पड़ गई थी, बाद में पिता ने तो पूछना ही बंद कर दिया था... शायद वे समझने लगे थे कि कुछ- कुछ इतर है, उसके बाद तो उसे पिता या मां को कुछ भी न बताना पड़ता कि व अंधेरे की भाषा को झूठ की लिपि पहनाने की कला सीख रहा है, अब तो उसे विशेषज्ञता भी हासिल हो चुकी है... उसे लगता कि सारी गुदगुदियां अंधेरे की भाषा में कैद हैं... वह वही दौर था जब उसे हर ओर हंसियां ही हंसियां दिखतीं.... खूबसूरत आंखे, पांव, पतले-पतले होठ , पतली कमर का लहराना, दिखता फिर तो उसे लगता कि यह अंधेरे की भाषा है जिससे सारी चीजें चमकदार दिखती हैं, चमकदार चीजें उसे इतना प्रभावित करतीं कि उसे उजाले से घिन होने लगी थी, अचानक नहीं हुआ ऐसा कि उसे अब अंधेरे की भाषा व उसकी गुदगुदियों में कोई रूचि नहीं जबकि वह दिखावटी ही सही रामरामी, गायत्री या वेदों वाला कोई संत नहीं.... सन्तई व उसके प्रबोधनों से उसका दूर का भी नाता नहीं..... वैसे आज भी जरूरी कामों को उसे अंधेरे में ही निपटाना पड़ता है, अंधेरे से बोलना बतियाना होता है पर उसमें गुदगुदियां नहीं, लक्ष्य होता है, बलिदानी उर्जा होती है, उन कामों को उजाले मेें करते समय अप्रत्याशित , बाधाओं, उलझाओं का उसे डर बना रहता है, उसका मानना है कि काम तो काम होता है, काम के समय गुदगुदियों से यदि परहेज नहीं किया गया फिर तो लक्ष्य में भटकाव आना असम्भव नहीं, अब तो उसे पहले वाली गुदगुदियां अंधेरे की भाषा में नहीं दिखतीं.... वही अंधेरा, वही सांय-सांय गुदगुदियों वाला मौका पर अब वैसा नहीं, किसी भी तरह का डर भी नहीं, पहले अंधेरा उसे पीता था पर अब उसे वह पीता है, लेकिन आज वह डर रहा है, उसे आज यह डर क्यों आक्रांत कर रहा है, कुछ भी स्पष्ट नहीं, डरते हुए ही उसे महसूस हुआ कि उसके पास वाले मोटे-मोटे दरखत दिखने लगे हैं पर साफ-साफ नहीं कि वे पहचाने जा सकें, उसे लगा कि दरख्त भी डरे हुए हैं तथा भयानक चुप्पी में हैं, तभी उसकी कमर में तथा पीठ में तेज दर्द उभरा... वह रस्से का यातनादायी बधाव था, एकदम से कसा हुआ, हिल भी न सको, बांधे जाते समय ही नहीं उसे पहले से ही गुमान था कि वह पेड़ की तरह सख्त व स्थिर है, पेड़ जैसा ही सालों साल खड़ा रह सकता है, पेड़ों की जड़ों की तरह उसकी जड़े भी काफी गहरे तक धंसी हैं, कोई दुलारे , खिलाए या नहीं फिर भी उससे उसका लहराना, झूमना नहीं छीना जा सकता , उसे याद है पहले की बात जब उसने कामरेड मौर्या से कहा था , ‘कामरेड कोई मेरी चमड़ी उतार ले फिर भी नहीं बताऊंगा कि मैं कौन हूं, क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मेरे होने का मतलब क्या है........’ कामरेड मौर्या किसी मुर्झाए फूल की हंसी हंस दिए थे, उस वक्त मौर्या का हंसना उसे अच्छा नहीं लगा था, पर आज, पेड़ों की तरह लहराना व झूमना आखिर क्या है कि सारा कुछ छिना जा रहा है, वह डर क्यों रहा है ? क्या उसे नहीं मालूम कि मृत्यु को विज्ञान या कोई विचार स्थगित नहीं कर सकता, कहीं..... पागल तो नहीं हो गया ? नहीं ऐसा नहीं , उसे पागलपन कभी नहीं जकड़ सकता, उसने मन की चंचलता को दृढ़ किया तथा स्नेहिल आत्मीयता से जंगल के बारे में सोचा, उसे मालूम था कि वह जंगल में है, उसी जंगल में जिसके दरख्तों, झाड़ियों,नालों व पठारों से उसकी मर्मभरी गुफ्तगू होती रही है, अंतरंगता इतनी कि उसे झाड़ियों तक से वह सब बताना पड़ता था जो सामान्यतया छिपाव की बातें होती हैं पर उसे कटे हुए खुत्थों को देखकर अनामंत्रित गुस्सा आ जाता है, उसकी मुट्ठियां कस जाती हैं..... ‘कितने हरामजादे हैं लोग जो दरख्तों तक का कत्ल करते हैं, उनकी आंतों में से कुर्सियां पलंग, टेबुल जैसी किसम किसम की बस्तुएं निकालते हैं.... उसके इस जंगल में होने के बाद से ही तो यह खेल स्थगित है... वरना अब तक तो सूरज यहां के चप्पे-चप्पे पर काबिज होकर जंगल का सारा हरापन सोख चुका होता, पहाड़ियों को छेद कर उसकी दृढ़ता को लुजलुज बना चुका होता.... बंधे हुए ही उसने थोड़ा झुकने की कोशिश की कि जानकारी ले सके, पांवों के पास होने वाली सरसराहट आखिर क्यों है, पर झुक पाना उसके लिए आसान या संभव ही नहीं था, उसे मजबूती से जकड़ा गया था, हाथों को पहले ही बांध दिया गया था, अब उसकी स्थिति उसी पेड़ जैसी थी जिससे उसे बांधा गया था, पेड़ हिलता तभी उसमें हरकत होती, थोड़ा झुकने की कोशिश में उसे दर्द का आभास हुआ लगा कि पीठ दो फांकों में चीरी जा रही है, फिर तो सरसराहट उसके मन से कहीं निकल गई, पर ऐसा नहीं था, सरसराहट जारी थी, जो पांवों ,घुटनों से होते हुए सिर तक जा चुकी थी तभी अचानक सरसराहट नीचे उतरी, पांवों पर आकर स्थिर हो गई.... उसने पैरों को झटका दिया, भद्द जैसी गिरने की आवाज हुई, जैसे कोई मुलायम चीज गिरी हो, वह सांप भी हो सकता था, या गिरगिटान, नेवला, गिलहरी, चूहा, मेढ़क, कुछ भी, उसने अनुमान लगाया फिर विश्लेषित करने लगा कि सांप होता तो उसका ठंडापन पांव पीते, नेवला होता तो उसके पंजे गड़ते, इसी तरह जाने कितने जीव जंतुओं के बारे में किसी जीव विज्ञानी की तरह उसने सोचा, तभी उसे महसूस हुआ कि उसके पांवों पर फिर से सरसराहट होने लगी है.... इस सरसराहट ने उसे डरा दिया पर प्रतिकार स्वरूप कुछ कर सकने की क्षमता उसमें न थी, उसने दुबारा पांव झटकना चाहा पर, सरसराहट थी कि उसके पेट को नापते, मुंह व नाक को सहलाते ऊपर चढ़ चुकी थी फिर अचानक गायब , उसने अनुमान किया कि कोई जन्तु या कीड़ा रहा होगा, पेड़ पर चढ़कर मौज लेने वाला, हालांकि उसे अनुमान तक न हो सका कि चढ़ने वाला क्या था, किस प्रजाति का था पर उसके चढ़ने से उसे जिस तरह की गुदगुदी का आभास हुआ उस पर उसे हंसी आ गई.... क्योंकि गुदगुदी पहले की तरह थी... दिल सहलाने वाली, कानों में श्रृंगार घोलने वाली , उसे खुद पर ताज्जुब हुआ, आखिर उसे अंधेरे की भाषा भूलने के लिए कितना समय चाहिए.... एक ऐसे समय में जबकि उसे बधस्थल पर बांधा जा चुका है बध करने के लिए.... शांति व्यवस्था पर बलि चढ़ाने के लिए फिर भी उसे गुदगुदियों में गोता लगाने की सूझ रही है, उसने खुद को लताड़ा.... अब उसे अपना बंधना महसूस हुआ..... ‘पेड़ से बंधे हुए दो घंटे तो गुजर ही गए होगें, आखिर क्यों देरी कर रहे हैं सब?’ उसे गोली मारनेवालों पर, उनकी लेट-लतीफी व लापरवाही पर घृणा हुई, उसने उन्हें भद्दी सी गाली दी ‘साले तनख्वाह लेंगे मोटी, सुविधा राजा महाराजाओं की तरह और काम, बाकी कामों में तो वे गैर जिम्मेदारी बरतते ही हैं, गोली मारने में भी देरी करते हें... छिः लानत है, उसने गर्दन घुमाया तथा पिच्च से थूक दिया जैसे घृणा से उसके मुंह में खंखार आ गया हो तथा सांस लेने में दिक्कत हो रही हो, जब उसे पकड़ा गया था तभी उसने निश्चित कर लिया था कि उसे गोली मारी जायगी, काउन्टर साहब यहीं होगा कहीं आसपास, उसे कोतवाल बनना है, आखिर किसे तरक्की पसंद नहीं ? ‘तरक्की भी वाह! क्या चीज है’ तभी तो सुधेसर ने ऐसा करवाया , नही ंतो उसे कौन पकड़ पाता, किसी को क्या पता कि मैं कहां हूं, कहां आता-जाता हूं, कामरेड़ मौर्या भी तो नहीं जानते.... सुधेसर का सोचना है कि संगठन में सवर्णों की भर्ती नहीं होनी चाहिए.... फिर यह ठाकुर तो संगठन का आला अगुआ है, इसके रहते उसकी तरक्की नहीं हो पाएगी...... उसे सुधेसर का चेहरा दिखा....लाल-लाल खूनी चकत्तों वाला .... उसे चिंता हुई.... आखिर जाति से मुक्त होने के लिए क्या रास्ते हैं उसके पास ... अक्ल हो तो कोई देख ले उसका काम , आज किसी भी ठाकुर की गर्दन आसमान की ओर तनती नहीं, सभी की आंखे जमीन की तरफ... जान बचाने का रास्ता तलाशती , आखिर यह किसे नहीं मालुम कि सिर का नाता यदि धड़ से बनाए रखना है फिर तो जमीन की तरफ ही देखना होगा तथा माथा पांवों से चिपकाना होगा दूसरों के नहीं अपने पांवों से , सुधेसर के लिए आसान था उसे पकड़वाना तथा मानकर चलना कि काउंटर साहब गोली ही मारेगा फिर तो उसने किसी ठाकुर की मद्द लेकर पुलिस को अवगत कर दिया होगा, नहीं तो पुलिस झोकहवा नाले तक क्यों आती ? किसी भी हाल में उसे साल में एक बार, निश्चित तिथि पर यानी ठीक सत्रह जुलाई को झोकहवा नाले के पास वाली पहाड़ी पर जाना ही है.... पूरी रात के लिए जहां सत्तो की मुठभेड़ में हत्या की गई थी... सुधेसर भाग लिया था पर सत्तो डटी रह गई थी, रायफल की अंतिम गोली तक, सत्तो सुधेसर के जाति की थी पर थी जाति से बाहर, वह स्त्री होने से भी बाहर थी, कायदा-कानूनों के कष्टदायी लदावों से घृणा करने वाली, वह सिर्फ मनुष्य बनकर रहना चाहती थी, कायदा-कानून , या किसी अप्राकृतिक चीज का उपकरण नहीं..... सुधेसर सत्तो से चिढ़ता था कि वह उसे क्यों नहीं सहलाती ? किसी ठाकुर के साथ क्यों है? लेकिन यह सब सोचना उसे मजाक जैसा लगा क्या होगा सोचकर ? घंटे दो घंटे में ही काउंटर साहब उसे गोली मार देगा फिर वह प्रकृति में घुल जाएगा लेकिन तभी उसे झटका जैसा लगा, जैसे उसके जिस्म का सारा खून चूस लिया गया हो, ‘कहीं बैजू की तरह उसे भी यातनागृह में डाल दिया गया तो!’ यह डर तो उसे पहले भी था, हो सकता है यातनागृह में डाल दे फिर सिगरेटों व बिजली के करंेट से देह निचोड़ना शुरू करे लेकिन जब उसे थाना तक नहीं ले जाया गया, जंगल में ही पेड़ से बांध दिया गया फिर तो उसके मन से डर जैसी चीज फुर्र हो गई थी.... शायद ऐसा नहीं है ‘गोली मारना होता तो मार दिया होता, उसी समय जब उसे पकड़ा गया था, जब वह झोकहवा नाले के पास वाली पहाड़ी पर बैठकर सत्तो की स्मृतियों से छेड़-छाड़ कर रहा था और सत्तो उसकी आंखों में उन्मुक्त गोता लगा रही थी, हूबहू वही, रूप वही रंग वही, चाल वही’ उसने उस समय अपनी रायफल चट्टान पर रख दिया था तथा जहां बैठता था सत्तों में डूबने के लिए बैठ गया था तभी उसकी पकड़ हो गई, पकड़ तो होनी ही थी , उसका हाथ पैर मारकर प्रतिकार करना बेकार गया, दो चट्टानों की दरारों में से उगी हुई पत्थर चट्टा घास भी उस समय इतनी मुलायम हो गई थी कि रौंदा गई थी, उसे पत्थर चट्टा तथा सत्तो की सख्ती में कभी फर्क समझ में नहीं आया पर सत्तो पत्थर चट्टा के अलावा भी बहुत कुछ थी उसके लिए, पेड़ से बंधा होना उसे काफी कष्टदायी लगने लगा, अचानक उसने भाग्य को कोसा , हालांकि वह भाग्यवादी नहीं था फिर भी .... उसे सत्तो याद आने लगी थी कि पहली गोली में ही उसकी मुलाकात सत्तो से हो जाएगी क्योंकि पुलिस वाले बंधे हुए आदमी को गोली मारने में असावधानी नहीं करते, ठीक-ठीक खोपड़ी में मारते हैं... पर ऐसा हो कहां रहा था ... पुलिस वालों की वहां गंध तक न थी.... विगत के उतार-चढ़ाव के दौरान ही उसे आहट लगी कि बूटों की आवाज उसकी तरफ आ रही है....... उसने अपना ध्यान उस तरफ मोड़ दिया... उसे समझ में आया कि कोई अकेला आ रहा है, पुलिस अकेली तो होती नहीं.... वास्तव में आने वाला अकेला ही था जो जमीन दबाते हुए आ रहा था हालांकि आने वाला दिखने में बाहर था...झिलमिल जैसा.... उसने आंखों पर दबाब बनाया कि आने वाला साफ-साफ दिखे... कुछ देर बाद दबाब की आवश्यकता न थी.....आने वाले की गंध ही ऐसी थी कि उसने अनुमान पक्का कर लिया,‘पुलिस वाला है’, आने वाला पुलिस वाला ही था हुक्मरानी गंध में सरोबार, हाथ में रायफल लिए, कड़क चाल, आने वाला इतना पास आ गया कि उसने पहचान लिया ‘काउंटर साहब’, उसे इतनी खुशी हुई कि उसके मन मस्तिष्क से डर जैसी बेबुनियाद चीज फुर्र हो गई, अंधेरे की बदली हुई भाषा उसके अनुकूल लगने लगी..... काउंटर साहब कुछ ही क्षण में उसके सामने था..... उसने तनेन होकर उससे पूछा.. ‘तो तुम कुछ नहीं बताओगे, यहां तक कि अपना नाम भी’, मैं बताना जरूरी नहीं समझता... उसने बताया, तुम्हें मालूम होना चाहिए कि तुम बन्दी हो, तुम अपराधी ही नहीं आतंकवादी भी हो और तुम्हारी सजा... काउंटर साहब बोलते-बोलते रूक गया, जैसे जो कह रहा है, वह नहीं कहना चाहिए.... उसने काउंटर साहब की बात का सिरा जोड़ा... ‘मौत, फांसी या गोली, यही न... तुम्हारे जैसे डरपोक गोली नहीं मारा करते’, ‘अच्छा! मैं डरपोक हूं’ कहकर काउंटर साहब ने रायफल की नाल उसकी खोपड़ी पर टिका दिया... फिर पहले वाला सवाल दुहराया, ‘तो तुम अब भी कुछ नहीं बताओगे,’ ‘अब भी नहीं, कभी भी कुछ नहीं?’ उसने सगर्व बताया, ‘देखता हूं कितना दम है?’ काउंटर साहब ने राइफल की नाल उसकी खोपड़ी मंे धसांया ... उसे दर्द हुआ वैसे भी रस्से का बंधन उसे काफी तकलीफ दे रहा था, काउन्टर साहब ने नाल थोड़ा जोर से सटाकर उसे धमकाया..... ‘खोपड़ी उधरा जाएगी’ थोड़ी मासूमियत से सरकारी गवाह बनाने की तर्ज पर काउंटर साहब ने उसे फिर फुसलाना चाहा... ‘आखिर बता क्यों नहीं देते संगठन के बारे में ... मैं वादा करता हूं तुम्हें कुछ नहीं होगा ... दो चार साल जेल में रहने के बाद बाहर आ जाओगे... तब तक तो तुम इतने प्रचारित व चर्चित हो चुके रहोगे कि किसी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर कम से कम विधायक तो बन ही जाओगे..’. अच्छा! उसे हंसी आ गई, उसने मजाक किया... ‘तो तुम गोशाले में बंधने की सलाह दे रहे हो?’ आखिर तुम मुझमें किस स्वार्थ के कारण रूचि ले रहे हो... अगर कुछ जानना चाहते हो तो सुनो... वैसे तुम्हारा सवाल काफी बेहूदा है... मैं तो तुम्हारी पुलिस के बारे में नहीं पूछ रहा... ‘फिर भी तुम्हें बता दूं पर तुम्हें यकीन नहीं होगा, मेरे संगठन के बारे में जितना तुम या तुम्हारी पुलिस जानती है उतना भी मुझे नहीं मालूम, चाहूं भी तो नहीं जान सकता- आंध्र से लेकर यहां तक , तुम्हारे थाने से लेकर तुम्हारे गांव व घर तक... कहां नहीं है संगठन... अब ऐसे में भला मैं क्या बताऊं ?’ ‘तो तुम नहीं बताओगे... कोई भी अपराधी अपने बारे में नहीं बताता..’ काउन्टर साहब खीझ उठा... तथा उसे अपराधी संबोधित करने पर गुस्सा आ गया... उसने साफ-साफ पूछा... कौन है अपराधी ? मैं या तुम .... तो सुन लो मैं अपराधी नहीं, अपराधी तुम और तुम्हारे जैसे लोग हैं जो बेमतलब का कानूनी शर्बत हर उस आदमी को पिलाते है जिसकी भूख तथा गरीबी कोई कानून नहीं मिटा सका.....?’ काउंटर साहब ने उसकी खोपड़ी पर से नाल हटा लिया तथा एक ही हाथ से रायफल हवा में लहराया.... फिर धांय... जंगल की प्रति ध्वनि गूंजी, काउंटर साहब ख्यात व कुख्यात के बीच का इन्सान था, अक्सर लोगों के एनकाउंटर ही करता था, एनकाउंटर के लिए वह पल्ले से रूपया खर्चता , अपराधिक इतिहास वालों का पता करता... जंगल के किसी पेड़ से बंधवाकर गोली मरवा देता... फिर ईनाम लेता, अखबारों में मुठभेड़ की खबर छपती... पुलिस के उच्चाधिकारी इस तरह के उत्तर आधुनिक मुठभेड़ पर सीना फुलाते तथा एनजीओ वाले सबाल्टर्न कहानी गढ़कर फंड जोगाड़ लेते, ‘साला गोली नहीं मारेगा’ उसे कामरेड बैजू का ख्याल दुबारा आया, फिर तो उसे आंतरिक कंपकंपी रोकना था क्योंकि काउन्टर साहब सामने था, वह मजाक उड़ाता... उसने खुद को संयत किया फिर दृढ़ होकर बोलना शुरू किया... लगभग आदेशात्मक शैली में- ‘नाल अपनी तरफ कर लो, उसकी मर्यादा होती है, तुम्हारे जैसा हत्यारा इसे नहीं समझेगा, तूने एक गोली बेमतलब हवा में उड़ा दिया, मालूम है जंगल इस समय गहरी नींद में है, सारे पेड़ दिनभर की थकान मिटाने में हैं, ऊपर देखो पत्ते कांप रहे हैं, पतली सी डार पेड़ से अलग होकर अभी गिरी है, बांई ओर से हटकर थोड़ा दाहिने घूमो... पेड़ों की जड़ के पास कान लगाकर सुनो, तुम्हें कराह सुनाई देगी... लेकिन पेड़ों से संवाद करना तो तुम्हें पढ़ाया नहीं गया, जंगल का अनुशासन तुम सीखना नहीं चाहोगे, पेड़ों को थोड़ा सहलाओ, फिर देखो तो वहां तुम्हारी मूर्खताओं के काले धब्बे दिखेंगे, खैर तुमसे उम्मीद करना कि प्रकृति का न्याय जो प्रकृति की भाषा में है, उसे तुम पढ़ोगे बेवकूफी होगी.... वैसे बेवकूफी तो यह भी है कि मैं तुमसे बातें कर रहा हूं, जल्दी करो, अपना काम निपटाओ तथा गोली मारो जिसके लिए मोटी तनख्वाह डकारते हो.....? काउन्टर सहाब उसे देखने में लगातार था, उसने रायफल सीधी कर लिया, कहीं से अचरज का एक अनगढ़ टुकड़ा आया तथा उसके चेहरे पर चिपक गया... ‘बातें इन्ट्रेस्टिंग करते हो, पढ़े-लिखे जान पड़ते हो , वैसे तुम्हारे जैसा अब तक कोई नहीं मिला,’ काउन्टर साहब ने तर्क प्रति तर्क को आगे बढ़ाया जैसे काफी फुर्सत में हो तथा पुलसिया काम को खेल समझता हो, उसने कुछ सोचकर कहा... जो पूछने जैसा था ...... गोया तुम दार्शनिक हो... तुम मुझे गाली दे रहे हो... उसने फटाका काउन्टर साहब को रोका... दार्शनिक कहना गाली देना है क्या ? लगता है गलियों को तुम नीतिशतक का हिस्सा मानते हो.... काउन्टर साहब ने उसके ऊपर व्यंग्य फेका.... आखिर तुम देर क्यों कर रहे हो ? क्यों नहीं मारते गोली, उसने झुंझलाकर पूछा... वस्तुतः उसे घबराहट होने लगी थी, कुछ न कुछ गड़बड़ अवश्य है, ‘तो क्या तुम मुंह नहीं खोलोगे ?’ काउन्टर साहब ने पूछा... ‘कभी नहीं, क्योंकि यह तुम्हारी चिंता है मेरी नहीं कि तुम मेरा उपयोग कैसे करोगे... गोली मारोगे या यातनागृह में डालकर जबरिया कहलवाओगे कि मैं अपराधी हूं, वगैरह-वगैरह... इस तरह का घटिया काम तुम्हारे जैसे लोग ही किया करते हैं, काउन्टर साहब हंसने लगा... हंसते हुए ही उसने अपना पक्ष रखा.... ‘इस समय कोई बेवकूफ ही तुम्हें गोली मारेगा, वैसे भी तुम्हारी काबिलियत किसी को भी गोली मारने से रोक देगी, जरा सोचो तो...’ थोड़ा रूककर काउन्टर साहब बोला..... इस समय तुम रस्से से बंधे हो, भयानक जंगल में, हर ओर सांय-सांय, फिल्मी दृश्य जैसा...हूबहू वैसा ही... दृश्य....फिल्म का खलनायक हीरो को बंधवा देता है फिर गोली मारने का उपक्रम करता है, दर्शक समझते हैं कि गोली चलेगी पर चलती नहीं, नाटकीय ढंग से कुछ लोग आते हैं तथा हीरो को छुड़ा ले जाते हैं... लेकिन तुम छुड़ाए नहीं जा सकोगे, पूरा बार्डर सील है... ऐसे में कुछ नहीं हो सकता... मैं तुम्हें आखिरी मौका देता हूं साफ-साफ बता दो...’ कहकर काउंटर साहब ने रायफल की मैगजीन देखा उसमें एक कारतूस और लोड किया... उसने काउन्टर साहब को आवेशित करने की गरज से टोका... ‘तुम कायर हो मिस्टर एनकाउंटर , गोली मारना तुम्हारे वश का नहीं, साथ ही साथ तुम मूर्ख भी हो , यदि तुम समझते हो कि यातनागृह में मैं अपने होने के बारे में बता दूंगा तो यह तुम्हारी बेवकूफी होगी... कहो तो अपना चमड़ा उतार कर दिखाऊं.....’ ‘अच्छा! ऐसा कर सकते हो’ काउंटर साहब ने उसे कसा.... फिर उसने काउंटर साहब से कहा... जहां चाहो छील दो, या कील ठोंको, उफ्फ तक न करूंगा... काउंटर साहब ने वैसा किया भी पर उसने सी तक नहीं किया... यह देखकर काउंटर साहब चकरा गया...एक बार तो उसके मन में आया कि गोली मार दे पर उसने यह विचार समाप्त कर दिया.... आखिरी बार काउंटर साहब से उसने कहा... साफ-साफ बताओ... क्या अब भी गोली नहीं मारोगे, सुबह होने वाली है...आसमान साफ होने पर गोली मारोगे तो जंगल तुम पर थूकेगा, पेड़ गालिया दंेगे...समझे... ‘सही सही जानना चाहते हो तो जान लो, मैं तुम्हें गोली नहीं मारूंगा... तुम्हारे जैसों को गोली मारना मूर्खता होती है, तुम तो यातनागृह में सड़ने के काबिल हो... जब तुम्हें देखा नहीं था तो निश्चित था कि गोली मारूंगा, तुम्हारी पकड़ के समय मैं था भी नहीं... तुम्हें यहीं देखा, पहली बार देखते ही मुझे महसूस हुआ कि तम्हारी आंखों में तुम्हारे विचार क्या कहोगे आइडियोलाजी... हां-हां वही तैर रहे थे, तुम्हारे चेहरे पर उसकी दृढ़ता थी तथा बलिदान होने की अप्रतिम चाहना भी ... जबकि सिपाहियों ने बताया था कि पकड़ के समय तुम डरे हुए थे...शायद बांधे जाने के समय भी... काउंटर साहब ठीक उसके सामने था, तथा उसकी आंखें प्रशासनिक नीतियों की तरह ऊपर नीचे हो रही थीं, सहज ही अनुमान किया जा सकता था कि उसमें धोखे तैर रहे हैं, उसने डर के बारे में सफाई देना ठीक समझा तथा काउंटर साहब से बोला... ‘मिस्टर काउंटर , यानी कि दरोगा जी, हालांकि तुम एक संवेदनहीन आदमी नहीं हो फिर भी मैं तुम्हंे बताऊं कि मुझे यातनगृहों से काफी डर लगती है, क्योंकि योगियों जैसे देह साधक भी करेंटों, बेंत की मारों, चूतड़ पर गर्म पानी (खौलता हुआ) का छिड़काव, फिर हाथों, पावों के नाखूनों का खिंचाव नहीं सह सकता, वह चीख पड़ेगा... मनुष्य होने की प्राकृतिक कमजोरी उसके साथ बनी रहेगी...’ सो मैं बांधे जाते समय डर रहा था, अब भी डर रहा हूं क्योंकि तुम पुलिस वाले हो, क्या मालूम कि कब क्या करोगे ? काउंटर साहब गंभीर होकर उसे सुन रहा था, उसने थोड़ा रूककर काउंटर साहब से पूछा... मिस्टर काउंटर! मैं समझता था कि तुम धोखेबाज नहीं हो, पर तुम धोखे बाज निकले, मुझे धोखे से पकड़वा लिया... ‘धोखा नहीं कार्य योजना बोलो कामरेड, यह इक्कीसवीं सदी है सारा कुछ वर्क प्लान से किया जाता है, तुम्हारी गिरफ्तारी ‘आपरेशन कैट ’का हिस्सा है, समझे.’ काउन्टर साहब ने खुलासा किया, उसने काउंटर सहाब के खुलासे पर प्रहार किया... ‘बकवास ! यह सरासर झूठ है मि0 काउंटर... आपरेशन कैट...वाह! क्या नाम है, तुम बाघ हो क्या ? गीदड़ की तरह भागने वाला, मुठभेड़ों से डरने वाला... मैं समझ सकता हूं तुम्हारी मजबूरियां... तुम नौकरी करते हो, जो गुलामी का ही एक रूप है... आखिरी बार तुमसे पूछता हूं...’ ‘क्या तुम सही में गोली नहीं मारेगे ?’ काउंटर साहब को हंसी आ गई, वह खूब हंसा, उसकी हंसी में उसे भी घुलना होता पर वह गंभीर था, तथा यातनागृह में जाने की मानसिक तैयारी में था... उसे यातनागृह का उद्धरण बनना है... तभी काउंटर साहब ने साफ बताया... ‘क्षमा करना कामरेड! मैं तुम्हें गोली नहीं मारूंगा... क्योंकि मैं जानता हूं तुम्हारे जैसे आइडियोलाजी वाले लोग गोली लगते ही जीवित हो जाते हैं, एक दो नहीं जाने कितने...तुम्हें मौका है यातनागृह में (तुम्हारे शब्दों में) चलने का मन बना लो..’ उसे काउंटर साहब पर गुस्सा आया जिसका कुछ मतलब न था क्यों कि उसके हाथ बंधे थे... उसने काउंटर साहब से पूछा, जो निवेदन था... ‘क्या तुम मेरा एक हाथ खोल सकते हो ?’ ‘नहीं,’ उसका उपयोग जाने क्या करो... काउंटर साहब बोला, अब उसे पक्का यकीन हो चुका था कि उसे यातनागृह तक जाना ही होगा... उसने सवालों को नाजुक बनाते हुए काउंटर साहब से पूछा... ‘तुम चालीस के आसपास हो...साठ के बाद क्या करोगे ? तब तो बिल्ला तथा वर्दी नहीं रहेगी... तुम्हारे अधिकार जो गिरफ्तारी व हत्या से संबंधित हैं वे नहीं रहेंगे, तो क्या साठ के बाद संत बनोगे... मुझे तम्हारे भविष्य की चिंता है...’ काउन्टर साहब के माथे पर थोड़ा सिकुड़नें उग आई, थोड़ा होंठ सूखे, पर नकली गंभीरता से उसने उसे रूआब में बताया... ‘ये मूर्खतापूर्ण सवाल हैं... मैं वर्तमान में जीता हूं, सपनों में नहीं , तुम्हें भी समझाऊंगा कि सपना देखना बंद कर दो, दुनिया नहीं बदलने वाली... यह ऐसे ही चलती है...’ उसने काउंटर साहब का दर्शन सुनकर उसें झिड़का... ‘क्या बकते हो, सपना मैं नहीं तुम देखते हो, अपने बच्चे का , घर का ... देखो मैं ऊब चुका हूं तुमसे बातंे कर, लगता है तम्हारे पास समय का अभाव नहीं, जो करना हो जल्दी करो... पीठ में काफी दर्द हो रहा है, मैं कुछ बताने से रहा, यातनागृह में डालना चाहते हो तो वहीं डाल दो... चमड़ी उतारो चाहे नाखून कुछ फर्क नहीं लेकिन वह न करना जो तुम्हारी पुलिस ने बैजू के साथ किया था.... काउंटर साहब ने उसे रोककर पूछा... क्या हुआ था बैजू के साथ...? मैं नहीं बता सकता, कोई भी नहीं बता सकता... तुम तो दरोगा हो, समझ सकते हो कि पुरूष के साथ ऐसा क्या किया जा सकता है जिसे वह बता नहीं सकता..उसने काउंटर साहब को बताया... काउंटर साहब ने उंगलियां मोड़ी , घुमावदार घेरा बनाया फिर उसमें दूसरे हाथ की उंगली डाल दी, यही न... उसने उससे सगर्व पूछा... जैसे वह पहेली बूझने का विशेषज्ञ हो... उसने सिर हिलाया फिर काउंटर साहब ने अपनी नैतिकता का बखान किया... मैं गंदी चीजों, तरीकों के सहारे अपराधियों से नही निपटता ... उनसे कबूलवाने के कई रास्ते हैं... उन्हें आजमाता हूं... यदि तुम्हारा रिमांड मिल गया फिर देखना... बंधे हुए ही उसने गर्दन सीधी की , पांवों को झटका, हाथ को आजमाया कहीं शून्य तो नहीं हुए, उसे लगा कि वह ठीक-ठाक है फिर उसने काउंटर साहब से पूछा... ‘आखिर क्या करोगे ? कुछ तो बताओ, मुझे मानसिक तैयारी में सुविधा होगी,’ मैं भी चाहता हूं कि सुविधापूर्ण तरीके से तुम संगठन के बारे में बताओ, अपने साथियों के नाम व पते भी बताओ.... लेकिन कैसे, बीच में उसेने टोका... काउंटर साहब के होंठ खुले, उस पर हंसी नाची , जो भद्दी थी...‘कैसे’ बहुत आसान है कामरेड! लेकिन है बहुत सटीक, अब कुछ इस तरह समझो, ‘मान लो हम और तुम एक आलीशान मकान के आलीशान कमरे में हैं, आलीशान मकान, आलीशान कमरा तथा आलीशान चीजें जो उस कमरे में होंगी उसके बारे में तुम्हारी क्या जानकारी है, मैं नहीं जान सकता लेकिन मैं वीवीआईपी ड्युटी करते-करते बहुत कुछ सीख व जान चुका हूं, जब पहली बार पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ का भारत आना हुआ था, मुझे मौका मिला था... एसपी तथा आईजी साहब के साथ मैं भी उस होटल में आता जाता था तथा उस कमरे में भी जिसमें उन्हें सोना थाः उन कमरों में भी जहां खाना था... जहां वीवीआईपीओ से मिलना मिलाना था... मैं ही तो कमरों की सारी चीजों को ठोकता ठाकता था, तथा उन्हें पारंपरिक स्थानों से हटाकर दूसरी जगह पर रखता था.... काउंटर साहब को जैसे कुछ याद आया हो वह चौंका...फिर बोला.... भला कैसे भूल सकता हूं कि एसपी ने अपनी स्टिक से मुझे मारा था..जब इधर उधर हटाने में एक आदमक्रद शीशा फर्श पर गिर कर टुकड़ा बन गया था...एसपी ने अनुमान लगाया था कि पचास हजार से ऊपर का रहा होगा... कहीं उनमें विस्फोटक वगैरह तो नहीं! ‘तुम कहानी सुनाने लगे...‘उसने काउंटर साहब को विषयांतरित होने पर टोका.... उसके टोकने के बाद काउंटर साहब ‘कैसे’ वाले सवाल पर आ गया ..... ‘तो कामरेड! तुम मान लो कि एक आलीशान कमरे में हो, उसमें आलीशान चीजें हैं एक से एक कीमती व खूबसूरत... रात के ग्यारह बजने वाले हैं , तुम्हें झपकियां आ रही हैं, कुछ सेकेंड के लिए तुम्हारी आंखें बंद हो जाती हैं तुम कमरे में अकेले हो, ऐसे में कोई वर्दी वाला बिना वर्दी के आएगा, तुमसे गहन दोस्ताना अंदाज में पूछेगा... तुम्हें जगाते हुए... ‘ क्यों कामरेड नींद आ रही है क्या?’ इस तरह एक दो बार नहीं जाने कितनी बार... यह तो एक बानगी है....कुछ ऐसे कि तुम नींद में न जा सको... संक्षेप में बताऊं... तुम्हारी आंखें पानी देखेंगी, प्यास महसूसोगे तुम , पर पानी नहीं मिलेगा... इसी तरह खाना भी तथा देह ! वह तो तुममें इतना गहरे तक जाएगी कि तुम सत्तो को देखोगे, नाचते, गाते, आलिंगनबद्ध होते, किसी दूसरे के साथ नहीं, खुद अपने साथ पर सत्तो तक तुम न पहुंच पाओगे... वैसे भी सत्तो ... मारी जा चुकी है.... बस, बस, बस...बस करो मुझ पर रहम करो, मुझे गोली मार दो... सारा कुछ समझ गया कि तुम मुझसे, नींद, भूख, प्यास यहां तक कि सोचने की शक्ति भी छीन लोगे.... मैं जीवित रहूंगा पर लाश की तरह यही न... फिर भी तुम मुझसे संगठन के बारे में कुछ भी न कहलवा सकोगे... ठीक चौदहवें दिन तुम्हारा रिमांड खत्म हो जाएगा तथा अदालत मुझे जेल भिजवा देगी... क्योंकि अदालतें नक्सल पंथियों की जमानतें करती नहीं... चलो ठीक है....तो फिर ले चलो यातनागृह की तरफ, थोडा़ जल्दी करो, जंगल जागने वाला है, जागे हुए जंगल में से तुम्हारा निकलना मुश्किल होगा... मैं तो बेमतलब का परेशान था.. अब समझा...बहुत-बहुत धन्यवाद मि. काउंटर ! काउंटर साहब उसके चेहरे की प्रतिक्रिया देखने में था, वहां शांति थी, तथा अदभुत आश्वस्ति... ऐसा तजबीज कर काउंटर साहब चकरा गया, साश्चर्य पूछा... ‘मि. कामरेड, काहे का धन्यवाद, ‘इतना भी नहीं समझे, धन्यवाद इसलिए कि तुम्हारी वजह से मैं यातनागृह में होऊंगा.... जहां मेरे साथियों की सांसे हैं, गंध हैं... जीवित दिलों की धड़कने हैं... फिर जाने क्या हुआ कि काउंटर साहब ने रायफल की नाल सीधी किया... धांय...धांय....धांय.. जंगल कांप उठा, पेड़ हिल गए, पत्ते डारों से चिपके हुए कांपने लगे... यह अंधेरे की दूसरी परंपरा वाली भाषा थी... जिसका कोई अर्थ नहीं....
‘चित्रकथा और वह’

'चित्रकथा और वह’ कहानी संग्रह की कहानियॉ पिछले आठ-दस वर्षों से लगातार मेरा पीछा करती रही हैं, पीछा ही करतीं तब भी गनीमत थी पर वे तो मुझे फटकारने तथा दुतकारने की सीमा तक जा पहुंचती थीं, मजा यह कि मैं नहीं समझ पाता था कि मेरे साथ मेरी ही रचित कहानियॉ दुर्व्यवहार क्यों कर रही हैं, मुझे ही फटकार रही हैं...। ऐसा तो नहीं होना चाहिए, सृजन के सर्जक को फटकारें, यह नैतिक नहीं है। हॉ आलोचक, समीक्षक फटकारते तो बात दूसरी थी। शब्दों की अदालत में खड़ा करने का उन्हें पूरा पूरा हक है, उनके हक को दुनिया का कोई भी रचनाकार, कलमकार ललकार नहीं सकता। मैं तो अबदना सा कलमकार भला मेरी जुर्रत कि उनसे कुछ बोल सकूं, नहीं, नहीं ऐसा कत्तई संभव नहीं। मेरी ही कानियॉ मुझे फटकारती रहीं और में ओबरा की पहाड़ियों की तरह लगातार टूटता रहा, विखंडित होता रहा। अब देखिए नऽ, संग्रह की पहली कहानी ‘चित्राकथा और वह’ का वह नामक पात्रा ने तो मुझे इतिहास के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया जहां से प्यास लगने पर एक बूॅद पानी भी न मिल पाये... अरे! इतिहास में घुसने की कया जरूरत थी, काहे के लिए राणाप्रताप, भगत सिंह और विरसा मुण्डा को ले आये कहानी में, क्या तुझे नहीं पता कि आज के समय में जो परधानी जीत गया वही बहादुर है, वही शक्तिशाली है तथा दुनिया को बदल देने वाली कूवत का है। लगता है आजकल तूॅ टी.वी. चैनलों के समाचारों को नहीं देख रहा अ।ैर न ही सुन रहा...’ समाचारों को जरा देखा करो तथा उसकी पवित्रा वाणी को सुना करो...चुनाव जो जीत जाता है, वह सारा कुछ जीत जाता है। वह केवल जीतता ही नहीं वल्कि दुश्मन को भारी मतों से पटक देता है, चित्त कर देता है। कोई पारटी चुनाव हारती नहीं वह चुनाव में धाराशाई होती है, चारो खाने चित्त होती है। उसमें रणनीति तथा रण कौशल की बातें होती हैं, मुद्दों रूपी वाण छोड़े जाते हैं। रैलियॉ नहीं निकलतीं, रैलियों रूपी योद्धा निकलते हैं, वे अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हैं गोया मध्यकाल के हमलांे वाला पूरा परिदृश्य भाषण कौशल से निर्मित कर दिया जाता है। तो मध्यकाल के इतिहास में घुसने की क्या जरूरत है? अब जो यह दुनिया का आधुनिक इतिहास बन रहा है उसे देखो, उसे अपने चित्त तथा चेतना का हिस्सा बनाओ। कहते हैं लोकतंत्रा में विपक्ष की भूमिका का बहुत अधिक महत्व होता है पर जब सत्ता संस्थान खुद अपना पक्ष हो तथा विपक्ष भी हो तब विपक्ष की क्या जरूरत? अब पहले वाला जमाना नहीं रहा कि सत्ता का अपना विपक्ष नहीं। ‘चित्राकथा और वह’ कहानी का पात्रा खुद अपना पक्ष है तो विपक्ष भी। संग्रह की दूसरी कहानी ‘श्रद्धांजलि’ भी अतीत से मेल बिठाती मेरी कलम पर सवार हो गयी। जब रुपये प्रचलन में नहीं थे तब सारा समाज सामानों के बदलवन वाला था। एक बार फिर नोटबन्दी के कारण पूरा देश पुराने जमाने वाला बन गया था, ऐसी स्थिति में कहानी का एक महिला पात्रा रुपया तलाश रही है, रुपये के खेल में वह उलझ जाती है, रुपया उसे नहीं मिलता, न ही बैंक से न ही मजदूरी के भुगतान का। अचानक उसे आदिम निर्णय लेना पड़ता है और अपने मृत पति को पअुरवट की चिता पर लेटाकर उसमें आग लगा देना पड़ता है। हो गया दाह संस्कार, हो गयी श्रद्धांजलि... बिना रुपयों के कफन कैसे खरीदे? आदिम जमाने वाली पूरी तरह से कुदरती श्रद्धांजलि प्रक्रिया। संग्रह की तीसरी कहानी ‘चलिए लौट चलें’ कुछ अलग किस्म की है, इसमें केवल नर और नारी हैं। मैं इन्हें पहचान नहीं सका कि ये किस सदी के हैं तथा ये चाहते क्या हैं... कहानी की पृष्ठिभूमि में घूमता रह गया फिर भी पता नहीं चला कि कहानी में जो नर है तथा नारी है, वे क्या हैं, उपभोक्ता हैं, कोई वस्तु हैं, बाजार में बिके हुए हैं या केवल पाठ हैं और पाठ भी कैसा...पठित भी अपठित भी। इनके अतीत तथा व्यतीत में मुझे फर्क नजर नहीं आता... ये प्रेमकथा के इतिहास के नायकों की प्रतिलिपि भी नहीं, फिर क्या हैं ये? अब आप ही समझें... लाइन कहानी जैविकताबोधी चाहनाओं की उपज जैसी उग गयी मेरे दिमाग में... जान पड़ा कि आधुनिकताबोधी इसके पात्रा वर्तमान के सामयिक जालों को जानने, पहचानने, तोड़ने में समर्थ होंगे पर वे तो खुद में सिमटे हुए हैं। वैयक्तिक संप्रभुता कोई बुरी बात नहीं पर जो मन में है वही चित्त में होना चाहिए फिर तन का क्या वह तो मन से संगति बिठा ही लेगा। कुछ इसी तरह की कहानियॉ संग्रह में संग्रहीत हैं। मैंने प्रयास किया है कि मौजूदा समय को भी जॉचते परखते चलना चाहिए भले ही जॉच पड़ताल में ठोकरे खानी पड़ें, अपनी ही कहानियों की उपेक्षा का शिकार होना पड़े फिर भी... कहानियों की जमीन की बात करें तो कहानियॉ सोनभद्र की अनगढ़ माटी की उपज हैं, कुछ तो करइल माटी की तरह हैं तो कुछ धनुस्सर माटी की तरह जिसका सीधा अर्थ है मानवीय समीपता की पगडंडी पर चलना, किसी सुसज्जित राजमार्ग पर नहीं। इस पद यात्रा का यह प्रयास इसलिए भी जमीन से पैदा होने वाले कथा चरित्रों का लगातार साक्षात्कार होता रहे, उनसे हाल अहवाल लेने को मौका मिलता रहे।ै उनके सुखों दुखों से दो चार होते हुए कहानी की खुरदुरी जमीन पर जितना संभव हो सके उतना दूर तक चला जा सके। चलने को तो मैं चल ही रहा था कहानियों की खुरदुरी जमीन पर मुझे क्या पता था कि थाने वाली महिला जिसे में अपने नये उपन्यास में जस के तस उतारना चाहता था वह मुझे फटकारने लगेगी... ‘तूॅ का लिखेगा मेरे बारे में? तूॅ भी तो मरद जाति का है, थूथुन वाला, कहते हैं नाक न हो तो मैला खाने वाला, तूॅ का जानेगा मेहरारुन के बारे में, कि मेहरारू का होती हैं। मेहरारुन को तूॅ जब जैसा चाहता है गढ़ लेता है, कभी देवी बनाता है तो कभी जरूरत के हिसाब से रण्डी बना देता है। देवी बनाकर माला-फूल चढ़ाता तो रण्डी बनाकर जोंक की तरह चूसता है। देह को बिछौना बना देता है खुश हुआ तो खेत बनाकर जोतने कोड़ने लगता है, बेंगा डाल देता है। खेत में बेगा पड़ जायेगा तो कुछ न कुछ जामेगा ही। जाम जाने के बाद फिर दूसरा बेंगा उालने के लिए उसे दुबारा जोत देता है। देखना है तो दरोगा को देख ले, तोहरे मुहें में मेहरारुन के बारे में विषैला लार है कि जलता हुआ लोर है। पर तोहरे पास लोर कहां से होगा? लोर तो मेहरारुन के पास होता है जो उनके दिलों को लगातार हिलोरता रहता है।’ इसी करइल माटी की उपज किरदार कहानी की वह थाने वाली महिला जिस किरदार का प्रतिनिधित्व करने लगी थी उससे तो मैं कॉप उठा। इस तरह की भूमिका में तो नारीवादिनी भी नहीं होतीं वे पुरुष सत्ता के प्रतिरोध में लड़ती हुई दिखती तो हैं पर वे समझती हैं कि उनसे उनका महिला होना छिना नहीं गया है। बहरहाल कहानियों की खुरदुरी जमीन को समतलियाते हुए चलना सरल नहीं था, मेरी मजबूरी थी कि मैं खुरदुरी जमीन पर अनाथ की तरह पड़ी कहानियों के साथ संवाद करूं।, उनके सुख दुख को महसूस करूं और उनके साथ उनकी तरह ही चलूॅ फिर वह जमीन समतल हो या खुरदुरी का फर्क पड़ता है? मुझे यह भी पता था कि मेरी कहानियों का कोई बाजार नहीं है, इनका कोई खरीददार नहीं है, कोई पाठक नहीं फिर भी कहानियॉ लिख रहा था कि भविष्य को नहीं जाना जा सकता के कल क्या होने वाला है? एक सौतीस करोड़ की आबादी में गोदान के कितने पाठक हैं? अगर उनका प्रतिशत निकाला जाये तो काफी शर्मनाक होगा। सो मुझे इस चक्कर में अपने लेखन का चक्कर नहीं बनाना। मैं लगातार लिखता रहा और कहानियों से दोचार होता रहा... लेखन के ही माध्यम से मैंने समाजनीति, राजनीति, धर्मनीति, अर्थनीति तथा नीति को समझने का प्रयास किया है। फिर समझ में आया कि मानवीय समीपताओं की स्थापना के बिना किसी नीति का नीति होना ही गलत है। उस नीति का नीति होना इसलिए भी गलत है जो आदमी और आदमी के बीच खाइयॉ उगाती हो। जाहिर है कोई भी मानव सभ्यता आदमी और आदमी के बीचा खाइयॉ उगाने का प्रस्ताव नहीं कर सकती। फिर भी वही हो रहा है जो नहीं होना चाहिए। मानवीय समीपता की स्थापना के लिए किए जाने वाले प्रयास संतुष्टि प्रदान करने वाले नहीं दिख रहे। मेरी कोशिश रही हे कि कहानियों के माध्यम से खुद को विश्लेषित करते हुए सामाजिक संरचना, राजनीतिक विचारधाराओं, धार्मिक प्रयोजनों को समझ सकूॅ तथा यह भी समझ सकूं कि यह जो आर्थिक तथा सामाजिक असमानता की खांई है आखिर इसे क्यों नहीं पाटा जा सकता तथा लोकतंत्र के शास्वत लक्ष्य संभव बराबरी को क्यों नहीं हासिल किया जा सकता? वैसे संग्रह की तमाम कहानियॉ देश की चर्चित पत्रिकाओं में पहले ही प्रकाशित हो चुकी हैं... अब आपको कैसी लगीं बताने की कृपा करेंगे।
चित्र कथा और वह
बांस भर धूप चढ़ जाने के बाद वह जागा। रात में देर से सोया था। खेती किसानी में वैसे भी कई काम ऐसे होते हैं जो रात में ही निपटाये जा सकते हैं, उन्हीं कामों को निपटाने में उसे पता ही नहीं चला कि रात कितनी गुजर चुकी है। उसे पता था कि उसकी पत्नी घर पर अकेली घबरा रही होगी। पत्नी घबरा तो रही थी पर उसके घर आने पर वह प्रेम से मिली, कोई उलाहना नहीं, उलाहना देना उसकी पत्नी जानती ही नहीं थी। जल्दी जल्दी दैनिक क्रिया निपटाकर दिन में किए जा सकने वाले कामों को वह याद करने लगा। वह जब से बालिग हुआ है यानि कि वोट देने लायक तब से ही वह सारे कामों पर विचार करता है, कामों को कब और कैसे करना है उसके बारे में गुनता है। दिन में निपटाये जाने वाले कामों के बारे में वह गुन ही रहा था कि उसे ख्याल आया, उसे तो परधान जी से मिलना है। पुल बनाने के अलावा भी दूसरे काम हैं जिनमें पहला काम है गॉव की पोखर और नाले की सफाई करवाना जिसे करवाने के लिए चुनाव के दौरान परधान जी ने वादा किया था। उनके द्वारा चुनाव में किए गये वादों को उन्हें याद दिलाना है, और शिलान्यास के कार्यक्रम में भी उनके साथ जाना है। परधान जी का घर उसके टोले से करीब दो किलोमीटर दूर था, बीच में एक नाला पड़ता था। वह उस नाले को करीब बीस सालों से उसी तरह से लगातार देखता आ रहा है, बीस साल के पहले का उसे पता नहीं। वह जानता है कि गॉव में बहुत कुछ बदल चुका है, कुछ लोगों के कच्चे मकान पक्के हो चुके हैं। पर वह नाला तथा गॉव के बीच में स्थित पोखर तथा गॉव के दक्षिण वाली दलित बस्ती आज भी जस के तस हैं। नाले तथा पोखर में पक्के मकानों की नालियां जाने कब से गन्दा पानी उगल रही हैं। ये वही नाला और पोखर हैं जिसमें गॉव के बहुलांश नहाते हैं, कपड़ा धोते हैं, गोया पोखर और नाला गॉव के लिए सुलभ जलश्रोत हैं, जिनकी सफाई कराना गाॉव से संक्रमक रोगों को भगाने के लिए सबसे जरूरी है। गॉव परधानी के चुनाव के दौरान गॉव के लोगों से विजेता परधान ने वादा किया था कि वह नाले तथा गॉव की अकेली पोखर की सफाई करायेगा, मनरेगा के बन्द पड़े कामों को शुरू करायेगा, लगता है वह अपने वादे को भूल गया है। उसने कहीं पढ़ा था कि जागरूक नागरिकों के लिए जरूरी है कि वे जन प्रतिनिधियों को उनके वादों को लगातार याद दिलाते रहें सो परधान से जनहित का काम करवाने के लिए उसे तो पहल करना ही होगा। पहली बार उसे वोट देना था। वह काफी उत्साहित था। उसके बपई ने उसे समझाया था कि देखो ‘कलम दावात’ वाले निशान पर ही मोहर मारना, कलम दावात वाला ही गॉव को साफ सुथरा बना सकता है तथा गरीबों के लिए तमाम तरह की कमाऊ योजनांयें भी ला सकता है, वह दलितों का हितुआ है। उसकी अइया ने भी बपई की तरह ही उसे समझाया था और उसने वैसा किया भी था। कलम दावात निशान वाला दलितों के समर्थन से चुनाव जीत भी गया था। कलम दावात निशान वाला गरीबों, प्रताड़ितों का आदमी था, वह उनके लिए थाना और ब्लाक घेर लिया करता था। परधान की जीत से वह खुश था, उसके मन में था कि परधान मेरे गॉव का बड़ा और प्रभावशाली आदमी है। परधान की प्रतिभा ने उसे इतना प्रभावित किया कि उसके भीतर कुलबुलाता चित्राकार जागृत हो गया। बचपन में वह पटरी पर किसिम किसिम के चित्रा बनाया करता था पशु पक्षी से लेकर आदमी तक के। चित्रा बनाने में उसकी रूचि थी। उसे याद है बचपन की बातें, साथ में जब पटरी नहीं होती थी तो वह जमीन पर ही चित्रा बना लिया करता था। अब भी वह किसी का भी चित्रा बना सकता है, कागज, कपड़े या जमीन पर ही, उसकी कला की सीख खतम नहीं हुई है। उसके मन में आया कि गॉव के जमे जमाये और तपे तपाये लोगों को हरा कर जीते हुए जनप्रिय परधान का चित्रा बनाये। गॉव में चित्रा बनाने वाले सामान तो थे नहीं, सो वह बाजार गया और ब्रश, पेपर, रंग आदि खरीद लाया। उसने परधान का चित्रा बनाया, उसके लिए सुविधा थी। परधान के चित्रा का उसके पास एक पोस्टर था उसने पोस्टर वाले चित्रा की नकल किया। चित्रा तो एकदम परधान की तरह ही बन गया पर उसकी समझ में आया कि इस चित्रा से बहादुरी नहीं छलक रही, परधान का रूआब नहीं दिख रहा क्योंकि चित्रा में घोड़ा नहीं है, नही परधान की मूंछ है। प्राइमरी की पढ़ाई के दौरान उसने कक्षा पांच की किताब में राणा प्रताप का चित्रा देखा था, वे घोड़े पर सवार थे, उनके माथे पर एक विशेष किसिम का टोप था, उनकी नुकीली मूंछ थीं, उसने सोचा ‘बहादुर को तो राणाप्रताप की तरह दिखना चाहिए या फिर भगत सिंह की तरह, अगर परधान का चेहरा चन्द्रष्शेखर आज़ाद की माफिक बन जाये तब भी ठीक पर परधान का चेहरा तो वैसा नहीं बन रहा फिर तो उसने पहले के बनाये परधान के चित्रा को मिटा दिया। वह परधान का चित्रा किस तरह का बनाये सोचने लगा। उसके जेहन में बहादुरों के कई तरह के चित्रा उभरे, जिन्हें वह केवल किताबों के सहारे जानता था कि वे इतिहास के बहादुर लोग थे, वे ऐसे लोग थे जो अपने समय की बद्जात हुकूमत से टकराने का साहस रखने वाले थे। इस तरह से वह इतिहास में उतर गया मानो उसके सामने इतिहास के बहादुर जस के तस उपस्थित हो गये हों फिर तो उसने तय किया कि परधान का चित्रा तो ओज और साहस से चमकता हुआ बनाना चाहिए, आखिर परधान हमारे गॉव का मुखिया है, वह भी गॉव के जमे जमाये लोगों को पटक कर परधान बना है, क्या हुआ दंगल में नहीं, वोट में उसने पटका है। वह उन्हें पटका है जो हमेशा बाहें फुलाते रहते हैं। एक तरह से परधान ने गॉव के जमे जमाये लोगों को पटक कर हजारों साल के बद्जात इतिहास को पटका है पर वह परधान के चित्रा को किस तरह का बनाये निश्चित नहीं कर पा रहा था। किसी चीज को गंभीरता से सोचो तो कोई न कोई रास्ता निकल ही आता है। कुछ दिनों बाद रास्ता निकल आया, उसे समझ आ गया कि परधान का चित्रा किस तरह का बनाना है। फिर तो उसने वैसा ही किया, कुछ अतिरिक्त श्रम और कल्पना से उसने परधान का चित्रा बनाया। पर चित्रा तो जैसा वह चाहता था वैसा नहीं बन पाया हालांकि उसने परधान को घोड़े पर सवार करा दिया था, मूंछ भी लगा दी थी फिर भी परधान का चित्रा राणाप्रताप वाले चित्रा की तरह प्रभाव वाला नहीं बना पाया। उसे अपनी कला पर संदेह हुआ, शायद वह अनुभूति और अभिव्यक्ति में एकरसता नहीं सृजित कर पा रहा है। चित्रा को तो संवाद करना चाहिए पर परधान का चित्रा तो गूंगा बन गया है। उसे अपनी गलती समझ नहीं आ रही थी उसे लगा...‘कहीं न कहीं उसकी कला में कमी है।’ उसे समझ आया कि स्मृति के सहारे काम नहीं चलने वाला स्मृति से चित्रा बनाने में गलती हो सकती है। सो वह राणा प्रताप का चित्रा कहीं से ले आया। परधान के चित्रा से राणा प्रताप के चित्रा का उसने मिलान किया, बहुत फर्क था दोनों चित्रों में। फिर तो उसने पहले के बनाये परधान के चित्रा को फिर मिटा दिया। चित्र मिटाते समय उसे जान पड़ा था कि वह पूरा मुगलकालीन इतिहास ही मिटा रहा है पर ऐसा नहीं था। इतिहास तो जहां था, पड़ा था, भला इतिहास मिटाने वाली चीज है? अब क्या करे? वह सोच में पड़ गया। उसे समझ आया कि आज के जमाने में राणा प्रताप की तरह किसी को बनाया नहीं जा सकता, राणा प्रताप तो तभी बनाये जा सकते हैं जब अकबर हो, सच है कि अब अकबर नहीं है। परधान का बहादुराना चित्रा बनाने में असफल होने के बाद वह जिद्द पर आ गया, परधान का बहादुराना चित्रा वह बनायेगा ही बनायेगा, बनेगा क्यों नहीं। कला निरंतर अभ्यास मांगती है, उसका अभ्यास छूट गया है, शायद इसी लिए परधान का बहादुराना चित्रा नहीं बन पा रहा। अपनी कला के बारे में बहुत विचार और चिंतन करने के बाद उसने दुबारा परधान का चित्रा बनाना शुरू किया। ज्योंही उसने परधान का चित्रा बनाना शुरू किया अचानक उसे लगा कि वह गलत कर रहा है, वैश्वीकरण और औद्योगीकरण के बदलते जमाने के आदमी को राणा प्रताप की तरह भला कैसे बनाया जा सकता है। वह चिन्तित हो गया। परधान तो परधान था, उसका अपना चेहरा था जो किसी से मेल नहीं खा रहा था। परधान इक्कीसवीं शताब्दी का आदमी है, वह देश के तमाम लोगों की तरह केवल एक उपभोक्ता है भले ही गॉव का परधान बन गया है तो इससे क्या हुआ? उसे भी तो थाने के दारोगा, तहसील के लेखपाल, ब्लाक के बी.डी.ओ. स्कूल के मास्टर आदि माफिक सरकारी कर्मचारियों की निगरानी में ही रहना है। सो परधान बहादुर कैसे बन सकता है? वैसे वह जानता था कि समाज बदल के लिए आत्मोसर्ग करने वाली प्रतिभाओं को गढ़ा नहीं जा सकता, वे तो खुद पैदा होती हैं, पर उसने तो निश्चित कर लिया था कि परधान उसके गॉव का है, सरकारी कर्मचारियों से भी वह लड़ने का काम किया करता है। एक तरह से वह हुकूमत से ही तो लड़ रहा है। परधान को वह हर हाल में इतिहास के बहादुर लोगों से जोड़ेगा, उन लोगों से जिन लोगों ने आतताई हकूमत से मोर्चा लिया था, उनकी तरह, ऐसा सोचते ही वह इतिहास में उतर गया। इतिहास में उसने देखा कि एक चेहरा तो भगत सिंह का भी है, उनकी तरह से परधान का चित्रा उसे बनाना चाहिए। पर भगत सिंह तो अंग्रेजों के जमाने के थे, अब अंग्रेज तो हैं नहीं सो भगत सिंह की तरह वह परधान का चित्रा कैसे बना सकता है? उसका माथा अंग्रेजों में उलझ गया पर तत्काल ही उसके माथा ने काम किया...विदेशी अंग्रेज नहीं हैं तो का हुआ देशी अंग्रेज तो हैं ही, अब तो बहादुर उन्हें ही कहना होगा जो देशी अंग्रेजों से टकराने का साहस रखते हों। परधान का उसने एक रफ स्केच बनाया जो वास्तविक था। उसने भगत सिंह का भी स्केच बनाया। भगत सिंह वाले स्केच को उसने परधान के स्केच पर चिपका दिया। यह क्या है, चित्रा देखते ही वह चकरा गया। परधान के स्केच को भगत सिंह के स्केच ने पूरी तरह से ढक लिया फिर तो परधान कहीं गायब हो गया। कुछ सेाचने के बाद उसने परधान के स्केच पर से भगत सिंह के स्केच के कुछ हिस्से को मिटाया, उनकी हैट और मूंछ को परधान के स्केच पर जस के तस रहने दिया फिर भी परधान का चेहरे पर वह चमक नहीं उभर पायी जैसी कि बहादुरों व वलिदानियों के चहरों पर होती है। हालांकि वह प्रशिक्षित चित्राकार नहीं था पर उसकी ललक ने उसे चित्राकार बना दिया था। वह कल्पनाओं में डूब सकता था और प्रकृति के रहस्यों को चित्रामय बना सकता था। उसने गंभीरता से परधान के चित्रा को देखा और कुछ जरूरी बदलाव किया इस बार तो परधान का चित्रा पूरी तरह से बदल गया उसके चेहरे पर हिंसक जानवरों जैसी लकीरें जम गईं, देखते देखते ही परधान का चित्रा दुबारा बदल गया हिंसक जानवरों से अलग। परधान के हाथ में त्रिश्षूल और शंख आ गया, माथे पर लाल बिन्दी भी उभर आयी, उसे समझ नहीं आया कि आखिर परधान का चेहरा अपने आप क्यों बदल रहा है? क्या परधान के चित्रा की तरह इतिहास भी स्वतः बदल जाया करता है? नहीं नहीं ऐसा तो नहीं होना चाहिए। वह परधान का चित्रा जैसा बनाना चाहता है वैसा बनाने के लिए उसका चित्त स्थिर क्यों नहीं हो रहा है? पर उसकी समझ में कुछ नहीं आया। वह निराश हो गया उसे लगा कि परधान का चित्रा वह नहीं बना सकता फिर उसे क्या मिलेगा परधान का चित्रा बना कर। चूंकि वह मन से चित्राकार था सो हार मानना उसके लिए संभव नहीं था। यह बात अलग थी कि उसने अपनी चित्राकारिता को व्यवसाय नहीं बनाया था पर था तो चित्राकार ही। वह अपनी रोजी रोटी खेती किसानी से ही चलाता था। अपनी चित्राकारिता के लिए वह धनिया, लहसुन, गोभी आदि की कियारियों को किसी सालअष्टकोणीय बनाता था तो किसी साल किसी गुंबद या मीनार का आकार दे दिया करता था। उसने घर के सामने सेहन में उगे फूलों के पौधों की कियारियां भी कलात्मक ढंग से रचा हुआ था, जिसे देख कर वह मन ही मन खुश हुआ करता है। वह कपड़े भी गॉव वालों से अलग ढंग का पहनता है, चेहरे पर हल्की सी दाढ़ी भी रखता है। वह अपने कपड़े खुद सिल लिया करता है और दाढ़ी भी छांट लिया करता है। उसका मानना है कि कला तो हर जगह होती है बस चीजों व समय को कला की तरह देखने की ऑखें होनी चाहिए। एक बार तो उसे जाने क्या हुआ कि करीब एक महीना लगा दिया जहां देखो उसके हाथ में चित्राकला की कापी ही होती थी उस पर वह कुछ न कुछ बनाता रहता था, उसकी पत्नी भी कई बार पूछ चुकी थी पर उसने सच नहीं बताया था। करीब एक माह बाद उसने पत्नी को अपनी कला दिखाया था... उसकी पत्नी तो उस चित्रा को देखते ही उछल पड़ी थी...कृकृ ‘तो क्या हम ऐसे हैं’ पत्नी ने उससे पूछा था। ‘और नहीं तो का’ वह मुस्करा दिया था वह एक खूबसूरत चित्रा बन गया था, भावुकता पूर्ण, गरिमा युक्त। वह चित्रा खाना खिलाते समय का था। वह जमीन पर पलथी मार कर खाना खा रहा है और उसकी पत्नी पंखा झल रही है, सामने ढिबरी टिमटिमा रही है। मद्धिम रोशनी में पत्नी के चेहरे से मुलायम किरणें निकल रही हैं। पत्नी ने अपने पति के बनाये चित्रा की फ्रेमिंग करवा कर दीवार पर टांग दिया था। वह उस चित्रा को अक्सर देखती और पति पर मोहित हो जाती। कभी कभी उलाहना भी दिया करती थी... ‘तुम चित्रा बनाने या कपड़े सिलने का ही काम क्यों नहीं करते, चार पैसे तो घर में आते, धान चावल से का होने वाला है? पेट भी तो नहीं भरता। कपड़े भी सिलते तो ठीक रहता, तुमने मेरा ब्लाउज बिना नाप लिए ही पिछले साल सिला था वह अभी तक जस के तस है और जो दर्जी से सिलवाया था उसकी सिलाई उभर रही हैं, और ढीली भी है, देह से बाहर।’ वह पत्नी की बातें मुस्करा कर टाल देता था... ‘कला का रोजगार नहीं होता मुनिया। कला केवल मन के लिए होती है, धन के लिए नही, तुम्हारा चित्रा मैंने मन से बनाया था बिना देखे, बिना नकल किये और ब्लाउज भी मैंने जो सिला था उसके लिए तुम्हारा नाप नहीं लिया था, बिना नाप के ब्लाउज सिला था, अनुमान से, और वह तुम पर फिट हो गया, जानती हो मुनिया कला मन की उपज होती है मन के लिए और मन के भीतर।’ करीब चार पांच दिन तक उसने सोचने में लगा दिया कि क्या उसे परधान का चित्रा बनाना चाहिए या नहीं। छठवें दिन उसने तय किया कि उसे परधान का चित्रा बनाना चाहिए, ऐसा करने के लिए उसे इतिहास में जाने की जरूरत नहीं है, इतिहास तो गॉवों के निवासियों व गावों का होता ही नहीं, इतिहास तो केवल शासकों का ही होता है, शोषित तो हर हाल में शोषित होता है गॉव का परधान भी शोषित है सो उसके चेहरे पर इतिहास कैसे चिपक सकता है? उसने इतिहास में उतर कर खुद से सवाल किया। सवाल टेढ़ा था पर था सटीक। वह इतिहास में दर्ज वैसे लोगों के बारे में सोचने लगा जो शासक नहीं रहे थे। उसे पता था विरसा मुंडा तथा सोनभद्र के जूरा और बुद्धू भगत के बारे में, वे तो सामान्य जन थे पर दिक्कत थी उसके पास न तो विरसा मुंडा का चित्रा था और न ही जूरा और बुद्धू भगत का। उसने काफी सोच विचार के बाद तय किया कि विरसा मुंडा, जूरा या बुद्धू भगत में से किसी एक की तरह ही वह परधान का चित्रा बनाएगा। इन तीनों चित्रों में से किसी न किसी की तरह का चित्रा तो परधान का बन ही जाएगा। उनके चित्रों को वह कहीं से खोज कर ले आयेगा। ऐसा तो हो नहीं सकता कि सोनभद्र के नामी विद्वानों व लेखकों के पास यहां के बहादुर पुरखों के चित्रा न हों, ऐसे बहादुरांे व स्वतंत्राता प्रेमियों के जिन्होंने जनहित में अपनी जान की बाजी लगा दिया हो। वह आश्वस्त था कि किसी का चित्रा विद्वानों के पास हो न हो पर लक्ष्मण सिंह का तो होगा ही। वे तो 1857 के क्रान्तिकारी थे। विजयगढ़ राज से पूरे दो साल तक अंग्रेजी हुकूमत को बेदखल कर दिया था और खुद को स्वतंत्रा घोषित कर लिया था। बाद में क्रूर अंग्रेजो ने उनकी तथा उनके दो सौ क्रान्तिकारी साथियों की निर्मम हत्या माची के जंगल में करवा दिया था। मॉची का जंगल खून से लाल हो गया था। फिर क्या था वह सोनभद्र के सभी नामधारी लेखकों से मिला जो इतिहास के जानकार के रूप में जाने जाते थे, पर किसी के पास जूरा और बुद्धू भगत के चित्रा नहीं थे, न ही लक्ष्मण सिंह के। उन्हें तो यह भी पता नहीं था कि जूरा और बुद्धू भगत ने अंग्रेजी सेना को विजयगढ़ किले वाले युद्ध में तीर धनुष से ही पस्त कर दिया था। वह काफी निराश हुआ। उसने मान लिया कि इतिहास तो सिर्फ शासकों का ही होता है, परजा का इतिहास तो होता नहीं। किसी तरह से उसे एक ऐसे आदमी से विरसा मुण्डा का चित्रा मिला जो किताबों का केवल पाठक था। वह आदिवासी तथा विरसा की जाति का था, विरसा को भगवान की तरह पूजता था। उसके पूजा वाले स्थान पर कुछ दूसरे देवताओं की तरह विरसा का भी फ्रेम किया हुआ चित्रा रखा हुआ था। विरसा मुण्डा का चित्रा पाते ही वह बासों उछल पड़ा अनमोल रतन धन पायो जैसे। वह परधान का चित्रा विरसा की तरह बनाने में जुट गया। परधान का चित्रा बनाने के पहले उसने विरसा का चित्रा बनाया उसके बाद उसने परधान का चित्रा बनाया। परधान के चित्रा को विरसा की तरह बनाना बहुत टेढ़ा काम था पर उसे तो बनाना ही था। वह लगातार परधान का चित्रा बनाता रहा, बनाता फिर बिगाड़ता ऐसा करते हुए एक महीना गुजर गया पर परधान का चित्रा विरसा की तरह नहीं बन पाया। वह ज्योंही परधान के कंधे पर विरसा वाला तीर धनुष चढ़ाता परधान का चेहरा बिगड़ जाता वह अधिकारियों व मंत्रियों की दलाली करने वालों की तरह दिखने लगता। एक बार तो उसने परधान के चित्रा से उसकी सर्ट ही मिटा दिया। परधान के चित्रा से सर्ट मिटा देने के बाद उसे लगा कि यह जो परधान है वह तो बौद्ध भिक्षु की तरह संसद का प्रत्याशी दिखने लगा है। उसे लगा कि परधान के चित्रा से साधारण वाला पैंट मिटा कर जिन्स की पैंट पहना देना चाहिए, फिर परधान बौद्ध भिक्षु की तरह नहीं दिखेगा, केवल प्रत्याशी दिखेगा। पर उसका सोचना गलत निकला। परधान का चित्र तो फिल्मों में दिखाये जाने वाले एलियंस की तरह दिखने लगा। परधान का चित्रा बनाते बनाते वह थक गया, कुछ कुछ निराश भी हुआ, उसे लगा कि वह परधान का चित्रा बना ही नहीं सकता, वह महज कलाकार है, वह कोई देवता नहीं जो किसी को सिरज दे, रचना तो देवता करते हैं। पर अचानक उसे लगा कि भले ही वह देवता नहीं है तो क्या हुआ? कलाकार तो है, कलाकार भी कल्पित देवताओं से कम नहीं होता। परधान का चित्रा वह बनाएगा ही बनाएगा। कुछ महीने के लिए उसने परधान का चित्रा बनाना छोड़ दिया और घर के बकाया कामों को निपटाने में जुट गया। वैसे भी उसे पता था कि कोई कला मन माफिक न बन पाये तो कुछ समय के लिए उसे बनाना छोड़ देना चाहिए। कुछ समय बाद मन में नये नये भाव स्वतः जागृत हो जाते हैं। फिर अनुभूति और अभिव्यक्ति में संतुलन आ जाता है। नहीं तो अनुभूति कहीं होती है और अभिव्यक्ति कहीं और। वैसे कोई काम छूट जाता है तो छूट जाता है, रोजी रोटी के जुगाड़ में पहले चूल्हा ही दिखता है फिर कला, या कोई दूसरी चीजें। शिलान्यास वाले दिन उसने परधान को देखा। परधान स्कार्पियो पर सवार था, सफेद कपड़ों में लकदक, जिन्स की पैन्ट में खुंसा हुआ रिवाल्वर, चाल में ऐंठन, उसके साथ तीन असलहाधारी थे, जिनके हाथों में रायफलें थीं। परधान एक पुलिया का शिलान्यास करने आया था। परधान के उस रूप को वह देखता रह गया, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह किसे देख रहा है परधान को या किसी बाहुबली को। उसे समझ आया कि आज के समय के यही बहादुर हैं, वह अपने क्षेत्रा के एक बाहुबली विधायक को कई बार देख चुका है, उसे पता है कि उसकी अपनी सेना भी है तथा सुरक्षा कमाण्डो भी। अचानक उसके दिमाग ने काम करना बन्द कर दिया। परधान तो गॉव का प्यारा आदमी है फिर उसे किस बात का डर, काहे की सुरक्षा, उसे जान पड़ा कि अब बहादुरों की नश्ल बदल रही है। अब बहादुर ऐसे ही होते हैं, खुद को बदलने वाले, वे गॉव व समाज के लिए लड़ाकू नहीं, लड़ाकू हैं अपनी तरक्की के लिए। वह तत्काल शिलान्यास स्थल से अपने घर लौट आया। उसने तय किया कि ऐसे परधान से गॉव के विकास के बारे में वह कभी बातें नहीं करेगा। ‘काहे लौट आये, ‘शिलानास’ में नाहीं गये थे का?’ पूछा था उसकी पत्नी मुनिया ने.... ‘का तो बोल रहे थे कि परधान जी ‘शिलानास’ करेंगे, शिलानास नाहीं हुआ का’ उसने दुबारा पूछा...’ ‘नाही रे! शिलान्यास काहे रूकेगा, वह शिलानास नाहीं था गॉव का नाश था, हमारा मन उहां नाही लगा।’ मुनिया उसे ताकती रह गयी थी जैसे उसे उसके सवाल का उत्तर न मिला हो फिर वह रसोईं में चली गयी। वह परेशान था, परेशान था परधान के बदले रूप को देख कर। उसे अनुमान तक नहीं था कि साधारण रंग रूप का दिखने वाला परधान, परधान बनते ही अपना चोला बदल लेगा, बगल में रिवाल्वर खोंस लेगा, असलहाधारियों के साथ चलेगा। उसके हाथ में माला होती, जेब में शंख और माथे पर चंदन की बिन्दी होती तब भी ठीक था पर नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं, उसकी तरह तो वे लोग भी नहीं दिखते थे जो खानदानी लुटेरे हैं, जिनकी गॉव में हकूमत चला करती है? वे भी ऐसे अवसरों पर समान्य जन बन जाया करते हैं। वह सीधे उस कमरे में गया जिसमें परधान का उसके द्वारा बनाया हुआ चित्रा रखा हुआ था। उसने परधान का चित्रा उठाया और फाड़ दिया। चित्रा फाड़ते समय उसे समझ में आया कि परधान कभी भी विरसा, जूरा या बुद्धू भगत नहीं हो सकता, इसी लिए परधान का चित्रा विरसा की तरह नहीं बन पा रहा था, बनता भी कैसे। परधान जैसे आदमी की चित्राकथा तो बन ही नहीं सकती। वह परधान की चित्राकथा न बना पाने के कारण परेष्शान हो गया था, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि का करे और का न करे। जाड़े के दिन थे, उसने धूप में खटिया निकाला और उस पर लेवा बिछा कर लेट गया और खुद में खो गया। कब नींद आ गई उसे पता ही नहीं चला। वह तब जागा जब उसके बपई ने उसे झकझोरा... ‘गॉव के सारे जवान उहां है शिलानास वाली जगह पर, अउर तूं खर्राटे मार रहा है, ऊहां रहना चाहिए था’ ‘का करेंगे ऊहां रह कर’उसने बपई को जबाब दिया ‘का करेंगे ऊहां रह कर पूछ रहा है, तोहैं का पता, आजु तऽ परधन ने कमाल कर दिया। ‘परधान ने एक घंटा भाषण दिया अउर साफ कहा कि जो भी गरीबों के साथ ‘अनिआव’ करेगा वह उनकी ऑखें फोड़ देगा, गॉव की जगह जमीन पर सभी का बराबर हक है, अनियाव के खिलाफ गॉव के हर आदमी को बाबा विरसा बनना होगा, अब वह वंशवाद नहीं चलने देगा, जल्दी ही वह गॉव में विरसा भगवान की बहुत बड़ी मूरत लगवायेगा। विरसा बाबा की मूरत बनवाने के लिए आप सभी लोगों को दान में कुछ न कुछ देना होगा फिर क्या था...गॉव ने नारा लगाया...कृ ‘विरसा बाबा जिन्दाबाद।’ अइसहीं बहुत कुछ नारा लगा, हमैं खियाल नाहीं पड़ रहा’ वह बपई की बातें सुन रहा था और ऑखें मलते हुए ही बपई से पूछा... ‘किस जमीन पर गरीबों का हक मिलेगा बाबू! कोई ऐसी जमीन है का गॉव में, जिस पर किसी का नाम न चढ़ा हो, विरसा बाबा की मूरत लगाने से का होगा? जिनके पास घर नाही है औन्है घर मिल जाएगा का?’ बपई को भी पता है कि गॉव की एक ईच जमीन भी ऐसी नाहीं है जिस पर किसी का नाम न चढ़ा हुआ हो फिर कैसे देगा परधान गॉव के गरीबों को जमीन। बपई का बोलता, उसे छोड़ कर चला गया। उसकी नींद खुल चुकी थी। आंखें मलते हुए उसने तय किया कि अब वह परधान का चित्रा नहीं बनाएगा, जमाना बदल चुका है अब कोई ऐसा बन ही नहीं सकता जिसे इतिहास के फटे पन्ने पर भी रचा जा सके। कथाक्रम, अक्टूबर-दिसंबर 2016 पृ..55-60