राष्ट्रभाषा : मनन, मंथन, मंतव्य

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भाषा का प्रश्न समग्र है। भाषा अनुभूति को अभिव्यक्त करने का माध्यम भर नहीं है। भाषा सभ्यता को संस्कारित करने वाली वीणा एवं संस्कृति को शब्द देनेवाली वाणी है। किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति नष्ट करनी हो तो उसकी भाषा नष्ट कर दीजिए। इस सूत्र को भारत पर शासन करने वाले विदेशियों ने भली भॉंति समझा। आरंभिक आक्रमणकारियों ने संस्कृत जैसी समृद्ध और संस्कृतिवाणी को हाशिए पर कर अपने-अपने इलाके की भाषाएँ लादने की कोशिश की। बाद में सभ्यता की खाल ओढ़कर अँगरेज़ आया। उसने दूरगामी नीति के तहत भारतीय भाषाओं की धज्जियॉं उड़ाकर अपनी भाषा और अपना हित लाद दिया। लद्दू खच्चर की तरह हिंदुस्तानी उसकी भाषा को ढोता रहा। अंकुश विदेशियों के हाथ में होने के कारण वह असहाय था

यहॉं तक तो ठीक था। शासक विदेशी था, उसकी सोच और कृति में परिलक्षित स्वार्थ व धूर्तता उसकी सभ्यता के अनुरुप थीं। असली मुद्दा है स्वाधीनता के बाद का। अँगरेज़ी और अंग्रेज़ियत को ढोते लद्दू खच्चरों की उम्मीदें जाग उठीं। जिन्हे वे अपना मानते थे, अंकुश उनके हाथ में आ चुका था। किंतु वे इस बात से अनभिज्ञ थे कि अंतर केवल चमड़ी के रंग में हुआ था। फिरंगी देसी चमड़ी में अंकुश हाथ में लिए अब भी खच्चर पर लदा रहा। अलबत्ता आरंभ में पंद्रह बरस बाद बोझ उतारने का "लॉलीपॉप' ज़रूर दिया गया। धीरे-धीरे "लॉलीपॉप' भी बंद हो गया। खच्चर मरियल और मरियल होता गया। अब तो देसी चमड़ी के फिरंगियों की धूर्तता देखकर गोरी चमड़ी का फिरंगी भी दंग रह गया है। प्रश्न है कि जब राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा माना जाता है तो क्या हमारी व्यवस्था को एक डरा-सहमा लोकतंत्र अपेक्षित था जो मूक और अपाहिज हो? विगत इकसठ वर्षों का घटनाक्रम देखें तो उत्तर "हॉं' में मिलेगा।    

राष्ट्रभाषा को स्थान दिये बिना राष्ट्र के अस्तित्व और सांस्कृतिक अस्मिता को परिभाषित करने की चौपटराजा प्रवृत्ति के परिणाम भी विस्फोटक रहे हैं। इन परिणामों की तीव्रता विभिन्न क्षेत्रों में अनुभव की जा सकती है। इनमें से कुछ की चर्चा यहॉं की जा रही है।    राष्ट्रभाषा शब्द के तकनीकी उलझाव और आठवीं अनुसूची से लेकर सामान्य बोलियों तक को राष्ट्रभाषा की चौखट में शामिल करने के शाब्दिक छलावे की चर्चा यहॉं अप्रासंगिक है। राष्ट्रभाषा से स्पष्ट तात्पर्य देश के सबसे बड़े भूभाग पर बोली-लिखी और समझी जाने वाली भाषा से है। भाषा जो उस भूभाग पर रहनेवाले लोगों की संस्क़ृति के तत्वों को अंतर्निहित करने की क्षमता रखती हो, जिसमें प्रादेशिक भाषाओं और बोलियों से शब्दों के आदान-प्रदान की उदारता निहित हो। हिन्दी को उसका संविधान प्रदत्त पद व्यवहारिक रूप में प्रदान करने के लिए आम सहमति की बात करने वाले भूल जाते हैं कि राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत और राष्ट्रभाषा अनेक नहीं होते। हिन्दी का विरोध करने वाले कल यदि राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगीत पर भी विरोध जताने लगें, अपने-अपने ध्वज फहराने लगें, गीत गाने लगें तो क्या कोई अनुसूची बनाकर उसमें कई ध्वज और अनेक गीत प्रतिष्ठित कर दिये जायेंगे? क्या तब भी यह कहा जायेगा कि अपेक्षित राष्ट्रगीत और राष्ट्रध्वज आम सहमति की प्रतीक्षा में हैं? भीरु व दिशाहीन मानसिकता दुःशासन का कारक बनती है जबकि सुशासन स्पष्ट नीति और पुरुषार्थ के कंधों पर टिका होता है।    सांस्कृतिक अवमूल्यन का बड़ा कारण विदेशी भाषा में देसी साहित्य पढ़ाने की अधकचरी सोच है। राजधानी के एक अँगरेज़ी विद्यालय ने पढ़ाया- Seeta was sweetheart of Rama! ठीक इसके विपरीत श्रीरामचरित मानस में श्रीराम को सीताजी के कानन-कुण्डल मिलने पर पहचान के लिए लक्ष्मणजी को दिखाने का प्रसंग स्मरण कीजिए। लक्ष्मणजी का कहना कि मैने सदैव भाभी मॉं के चरण निहारे, अतएव कानन-कुण्डल की पहचान मुझे कैसे होगी?-  यह भाव संस्कृति की आत्मा है। कुसुमाग्रज की मराठी कविता में शादीशुदा बेटी का मायके में "चार भिंतीत नाचली' का भाव तलाशने के लिए सारा यूरोपियन भाषाशास्त्र खंगाल डालिये। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी।    शिक्षा के माध्यम को लेकर बनी शिक्षाशास्त्रियों की अधिकांश समितियों ने प्राथनिक शिक्षा मातृभाषा में देने की सिफारिश की। यह सिफारिशें आज कूड़े-दानों में पड़ी हैं। त्रिभाषा सूत्र में हिन्दी, प्रादेशिक भाषा एवं संस्कृत/अन्य क्षेत्रीय भाषा का प्रावधान किया जाता तो देश को ये दुर्दिन देखने को नहीं मिलते। अब तो हिन्दी को पालतू पशु की तरह दोहन मात्र का साधन बना लिया गया है। सिनेमा में हिन्दी में संवाद बोलकर हिन्दी की रोटी खानेवाले सार्वजनिक वक्तव्य अँगरेज़ी में करते हैं। जनता से हिन्दी में मतों की याचना करनेवाले निर्वाचित होने के बाद अधिकार भाव से अँगरेज़ी में शपथ उठाते हैं।

छोटी-छोटी बात पर और प्रायः बेबात  संविधान को इत्थमभूत धर्मग्रंथ-सा मानकर अशोभनीय व्यवहार करने वाले छुटभैयों से लेकर कथित राष्ट्रीय नेताओं तक ने कभी राष्ट्रभाषा को मुद्दा नहीं बनाया। जब कभी किसीने इस पर आवाज़ उठाई तो बरगलाया गया कि भाषा संवेदनशील मुद्दा है। तो क्या देश को संवेदनहीन समाज अपेक्षित है? कतिपय बुद्धिजीवी भाषा को कोरी भावुकता मानते हैं। शायद वे भूल जाते हैं कि युद्ध भी कोरी भावुकता पर ही लड़ा जाता है। युद्धक्षेत्र में "हर-हर महादेव' और "पीरबाबा सलामत रहें' जैसे भावुक (!!!) नारे ही प्रेरक शक्ति का काम करते हैं। यदि भावुकता से राष्ट्र एक सूत्र में बंधता हो, व्यवस्था शासन की दासता से मुक्त होती हो, शासकों की संकीर्णता पर प्रतिबंध लगता हो, अनुशासन कठोर होता हो तो भावुकता अनिवार्य रूप से देश पर लाद दी जानी चाहिए।

वर्तमान में सीनाजोरी अपने चरम पर है। काली चमड़ी के अंगरेज़ पैदा करने के लिए भारत में अँगरेज़ी शिक्षा लानेवाले मैकाले के प्रति नतमस्तक होता  आलेख पिछले दिनों एक हिन्दी अख़बार में पढ़ने को मिला। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब जनरल डायर और जनरल नील-छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान के स्थान पर देश में शौर्य के प्रतीक के रूप में पूजे जाने लगेंगे। सामान्यतः श्राद्धपक्ष में आयोजित होनेवाले हिन्दी पखवाड़े के किसी एक दिन हिन्दी के नाम का तर्पण कर देने या सरकारी सहभोज में सम्म्मिलित हो जाने भर से हिन्दी के प्रति भारतीय नागरिक के कर्तव्य  की इतिश्री नहीं हो सकती। आवश्यक है कि नागरिक अपने भाषाई अधिकार के प्रति जागरुक हों। वह सूचना के अधिकार के तहत राष्ट्रभाषा को राष्ट्र भर में मुद्दा बनाएँ।

लगभग तीन दशक पूर्व दक्षिण अफ्रीका का एक छोटा-सा देश आज़ाद हुआ। मंत्रिमंडल की पहली बैठक में निर्णय लिया गया कि देश आज से "रोडेशिया' की बजाय "जिम्बॉब्वे' कहलायेगा।  राजधानी "सेंटलुई' तुरंत प्रभाव से "हरारे' होगी। नई सदी प्रतीक्षा में है कि कब "इंडिया'की केंचुली उतारकर "भारत' बाहर आयेगा। आवश्यकता है महानायकों के जन्म की बाट जोहने की अपेक्षा भीतर के महानायक को जगाने की। अन्यथा भारतेंदु हरिशचंद्र की पंक्तियॉं - "आवहु मिलकर रोवहुं सब भारत भाई, हा! हा! भारत दुर्दसा न देखन जाई!' क्या सदैव हमारा कटु यथार्थ बनी रहेंगी?

विषय सूची

विदेशों में हिन्दी शिक्षण : समस्यायें और समाधान [सम्पादन]

सन् 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकड़े मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था । सन् 1997 में सैन्सस ऑफ़ इंडिया का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ प्रकाशित होने तथा संसार की भाषाओं की रिपोर्ट तैयार करने के लिए यूनेस्को द्वारा सन् 1998 में भेजी गई यूनेस्को प्रश्नावली के आधार पर उन्हें भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफेसर महावीर सरन जैन द्वारा भेजी गई विस्तृत रिपोर्ट के बाद अब विश्व स्तर पर यह स्वीकृत है कि मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से संसार की भाषाओं में चीनी भाषा के बाद हिन्दी का दूसरा स्थान है। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्या हिन्दी भाषा से अधिक है किन्तु चीनी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा सीमित है। अँगरेज़ी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा अधिक है किन्तु मातृभाषियों की संख्या अँगरेज़ी भाषियों से अधिक है।

विश्व के लगभग 100 देशों में या तो जीवन के विविध क्षेत्रों में हिन्दी का प्रयोग होता है अथवा उन देशों में हिन्दी के अध्ययन अध्यापन की व्यवस्था है। इन देशों को हम तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं -

- वे देश जिनकी भारतीय मूल के आप्रवासी नागरिकों की आबादी अपने देश की जनसंख्या में लगभग 40 प्रतिशत या उससे अधिक है।

- इस वर्ग में वे देश आते हैं जो हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में सीखते हैं।

- वे देश जिनमें हिन्दी-उर्दू मातृभाषियों की बड़ी संख्या निवास करती है। इन देशों में भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, भूटान आदि देशों के अप्रवासियों/अनिवासियों की रहने वाली विपुल आबादी सम्पर्क भाषा के रूप में ‘हिन्दी-उर्दू’ का प्रयेाग करती है, हिन्दी-उर्दू की फ़िल्में देखती है, गाने सुनती है, टेलीविज़न के कार्यक्रम देखती है।    हिन्दी के वैश्विक व्यवहार एवं प्रयोग की संक्षिप्त विवेचना के साथ ही यह विवेच्य है कि विदेशों में हिन्दी शिक्षण की प्रमुख समस्याएँ कौन-सी हैं तथा उनका व्यवहारिक दृष्टि से क्या समाधान है, क्या करणीय है।  इस सम्बंध में सूत्रवत शैली में कुछ विचार हिन्दी के विद्वानों के लिए प्रस्तुत हैं।

(1) प्रत्येक देश के शिक्षण स्तर एवं हिन्दी प्रशिक्षण के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों को ध्यान में रखकर हिन्दी शिक्षण के पाठ्यक्रम का निर्माण करना चाहिए। पाठ्यक्रम इतना व्यापक एवं स्पष्ट होना चाहिए जिससे शिक्षक एवं अध्येता का मार्गदर्शन हो सके।

(2)  विदेशों में हिन्दी शिक्षण करने वाले शिक्षकों के लिए शिक्षण-प्रशिक्षण एवं नवीकरण पाठ्यक्रमों का आयोजन एवं संचालन होना चाहिए ।

(3) श्रवण कौशल, वाचन कौशल, वार्तालाप कौशल एवं रचना कौशल के शिक्षण की दृष्टि से सामग्री के निर्माण की परियोजना बननी चाहिए एवं उस दिशा में विद्वानों को कार्य सम्पन्न करना चाहिए।

(4) विदेशी अध्येताओं के भाषा शिक्षण के उद्देश्य एवं लक्ष्य को ध्यान में रखकर आवृत्ति के आधार पर आधारभूत शब्दावली के निर्माण का कार्य होना चाहिए।

(5) देवनागरी लेखन तथा हिन्दी वर्तनी व्यवस्था की दृष्टि से निम्न लिखित क्षेत्रों में कार्य सम्पन्न होने चाहियें:-

  • ( क ) देवनागरी लिपि के लिपि चिन्हों का विश्लेषण।
  • ( ख ) एक लिपि चिन्ह से रूपान्तरित होने वाले अन्य लिपि चिन्हों का क्रमिक विस्तार।
  • ( ग ) मात्राओं से युक्त व्यंजन एवं संयुक्त व्यंजन तथा हिन्दी वर्तनी की अन्य विशेषताओं के अनुरूप वर्णों से बनने वाले शब्दों के अनुप्रयोगात्मक पाठों का निर्माण।

(6) वास्तविक भाषा व्यवहार को आधार बनाकर व्यावहारिक हिन्दी संरचना - ध्वनि संरचना, शब्द संरचना तथा पदबंध संरचना - के अनुप्रयोगात्मक पाठों के निर्माण के क्षेत्र में विद्वानों को कार्य करते समय समस्त सामग्री का निर्माण अभिक्रमित रूप में करना चाहिए तथा शिक्षार्थी के अधिगम की पुष्टि के लिए प्रत्येक बिन्दु पर विभिन्न अभ्यासों की योजना भी होनी चाहिए।

(7) हिन्दी के आर्थी प्रयोगों के लिए सामग्री का निर्माण होना चाहिए।

(8) जीवन के विविध प्रयोजनों की सिद्धि के लिए हिन्दी भाषा के आधारभूत व्याकरणिक एवं संरचनात्क बिन्दुओं की अनुस्तारित सामग्री निर्मित होनी चाहिए।

(9) हिन्दी साहित्य का अध्ययन करने वाले विदेशी अध्येताओं के लिए ‘हिन्दी साहित्य के इतिहास’ का निर्माण करते समय प्रत्येक काल की मुख्य धाराओं, प्रमुख प्रवृत्तियों, प्रसिद्ध रचनाकारों तथा उनकी रचनाओं का विवरण भारत के हिन्दी समाज के उस काल की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत की जानी चाहिए।

(10) हिन्दी की संस्कृति: हिन्दी साहित्य में अभिव्यक्त सांस्कृतिक संकल्पनाओं से परिचित कराने के लिए सामग्री का निर्माण सचित्र होना चाहिए।

(11) कम्प्यूटर साधित हिन्दी भाषा शिक्षण की प्रभूत सामग्री के निर्माण के लिए ऐसी परिचालन प्रणाली का विकास किया जाना चाहिए जिससे हिन्दी में काम करना अधिक सुविधाजनक हो। हिन्दी इन्टरफ़ेस सभी प्लेटफ़ार्मों पर उपलब्ध हो, जिससे सारे आदेश उपकरण पट्टियाँ, संवाद कक्ष तथा मदद हिन्दी में उपलब्ध हो सके।

(12) विदेशी अध्येताओं को ध्यान में रखकर ‘स्पेल चैकर’ तथा ‘आन-लाइन शब्दकोष’ की सुविधा का विकास किया जाना चाहिए।

(13) लीला प्रबोध की तर्ज पर जीवन के विविध प्रयोजनों की सिद्धि के लिए हिन्दी में स्वयं शिक्षण पैकेज की दिशा में प्रगति एवं विकास होना चाहिए।

(14) कम्प्यूटर आधारित भाषा प्रयोगशाला के उपयोग में आने वाली सामग्री का निर्माण होना चाहिए।

(15) डाउनलोड करने वाली अनेक प्रसिद्ध साइटों पर विश्व की अन्य सभी प्रमुख भाषाएँ उपलब्ध हैं किन्तु हिन्दी नहीं है। इसके लिए सार्थक पहल की जानी चाहिए।

(16) महात्मा गाँधी हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा आदि संस्थाओं को हिन्दी में ऐसे पोर्टल विकसित करने चाहिए जिससे कोई भी विदेशी अध्येता हिन्दी से सबन्धित प्रत्येक जानकारी प्राप्त कर सके।लाइनेक्स और ओपन सोर्स साफ्टवेयर के ज़रिए इन संस्थाओं को हिन्दी का लोकलाइजेशन ग्रुप विकसित करना चाहिए जो हिन्दी भाषा की ध्वनि, लिपि, शब्द, भाषा प्रयोग आदि के सम्बन्ध में अपने विचार हिन्दी में दे सकें, हिन्दी में अभिलेख एवं ई-मेल अधिकाधिक भेज सकें, विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत कर सकें, प्रस्तुत विचार-सामग्री में संशोधन कर सकें। हिन्दी में साफ्टवेयर निर्मिति का कार्य तीव्र गति से होना चाहिए। हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान की प्रत्येक शाखा के प्रत्येक विषय पर प्रभूत सामग्री कप्यूटर पर उपलब्ध होनी चाहिए।

हिंदी पर हमला [सम्पादन]

पिछले दिनों बैंगलोर में भारतीय भाषाओं के कुंभ के नाम से विद्वतजनों का एक सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन का उद्धाटन हिन्दी के नामचीन साहित्यकार एवं मार्क्सवादी बुध्दिजीवी डॉ. नामवर सिंह ने किया था। डॉ. नामवर सिंह ने अपन उद्धाटन भाषण में कहा कि 1.- हिन्दी समूचे देशकी भाषा नहीं है वरन वह तो अब एक प्रदेश की भाषा भी नहीं है। उत्तरप्रदेश, बिहार जैसे राज्यों की भाषा भी हिन्दी नहीं है। वहाँ की क्षेत्रीय भाषाएँ यथा अवधी, भोजपुरी, मैथिल आदि हैं। अत: देश को द्विभाषा फ़ार्मूला चाहिए। एक - क्षेत्रीय भाषा दूसरी अँगरेज़ी। ख्यातिनाम व्यक्ति के ऐसे भाषण से, जहाँ एक तरफ़ देश में चर्चित त्रिभाषा फ़ार्मूले पर प्रश्नचिन्न खड़ा हुआ तथा हिन्दी के राष्ट्रभाषा बनने की स्थिति पर एक हिन्दी प्रदेश के हिन्दी भाषी द्वारा ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर चुनौती दी गई। वहीं तमिलनाडु में निरंतर बहाई जा राजनीति प्रेरित हिन्दी विरोधी हिंसा को साम्राज्यवादी बताने वाली धारणा को बल मिला है तथा तमिलनाडु के कुछ अख़बारों ने डॉ. नामवर सिंह के इस भाषण को प्रमुखता से छापा है। हो सकता है कि डॉ. नामवर सिंह ने इस भाषण को सुनियोजित सोच के आधार पर दिया हो। 2.- दक्षिण भारत में हिन्दी विरोधी भावना को उकसाकर और वह भी हिन्दी के एक साहित्यकार द्वारा उन्हें दक्षिण में कुछ विशेष प्रशंसा मिली हो तथा दूसरे विवाद प्रचार का सशक्त माध्यम होता है इस सिध्दांत के तहत श्री नामवर सिंह जी ने, विवादास्पद भाषण को माध्यम बनाया हो ताकि विवाद हो- कुछ गाली-गलौच हो, पत्थर चलें तथा उसकी चर्चा सुर्खियों में हो। कुछ लोगों का यह भी मत है कि डॉ. नामवर सिंह मार्क्सवादी हैं तथा वे जिस वर्ग संघर्ष में विश्वास रखते हैं उसे नहीं चला सकें। अत: भाषा संघर्ष को चलाकर ही संतोष कर रहे हैं। बहरहाल दक्षिण भारत के तमिलनाडु प्रदेश को जहाँ आज़ादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकारने के आंदोलन का केन्द्र बनाया था। जहाँ गांधी जी ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का कार्य प्रारंभ किया था, उसी दक्षिण भारत से श्री नामवर सिंह द्वारा राष्ट्रभाषा हिन्दी के वृक्ष को उखाड़ने की पहल की पड़ताल ज़रूरी है।

पिछले कुछ दिनों से अँगरेज़ी ने हिन्दी पर एक नये ढंग से आक्रमण शुरू किया है। शायद इसकी एक वजह यह हो सकती है कि विश्व व्यापार संगठन की भाषा अँगरेज़ी बन चुकी है और इस अर्थ में अँगरेज़ी विश्व व्यापार की प्रवक्ता भाषा बन गई है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि भारत जैसे देशों ने किसी भी स्तर पर इसका विरोध नहीं किया। क्योंकि भारत व रंगीन दुनिया के सत्ताधीश तो अँगरेज़ी के सामने पहले से ही नतमस्तक हैं। अब भारत के नामवरी बुध्दिजीवियों का वर्ग और उसमें से भी चुनकर ऐसे लोगों का इस्तेमाल, हिन्दी के विरोध में और अँगरेज़ी के पक्ष में हो रहा है, जिन्हें अभी तक हिन्दी सेवियों की अग्रिम पँक्ति में रखा जाता था। जब श्री नामवर सिंह के इस भाषण की आलोचना हुई, तो श्री गोपालराव, जो जाने-माने मार्क्सवादी साहित्यकार एवं बुध्दिजीवी हैं, ने श्री नामवर सिंह के समर्थ में लम्बे लेख लिखे तथा अनेक कुतर्क देने का प्रयास किया। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि हमारे देश के वामपंथी मित्र आज़ादी के आंदोलन से लेकर लगभग 20वीं सदी के अंत तक अँगरेज़ी को ही अपनी मुख्य भाषा के रूप में प्रयोग करते रहे हैं व मानते रहे हैं। श्री नामवर सिंह ने जिस द्विभाषा फ़ार्मूले को प्रस्तुत किया है, याने राज्य स्तर पर या केन्द्र स्तर पर अँगरेज़ी तथा घर में क्षेत्रीय बोली, उसका व्यवहारिक प्रयोग हमारे देश के मार्क्सवादी मित्र तो आज़ादी के ज़माने से ही करते रहे हैं। हालांकि वे इस सिध्दांत का प्रयोग चीन, रूस या क्यूबा में नहीं करा सके। वहाँ क्रमश: रूस या चीनी, देशज भाषाएँ हैं तथा अँगरेज़ी विदेशी। परन्तु ब्रिटेन के कैम्ब्रिज जैसे ज्ञानतीर्थों से स्नातक होकर लौटे इन मार्क्सवादी बुध्दिजीवियों की दर्शन प्रक्रिया अलग ही है।

श्री नामवर सिंह व श्री गोपालराव का तर्क है कि अँगरेज़ी राष्ट्रीय भाषा तथा मातृभाषा क्षेत्रीय भाषा होने से छात्रों का बोझ घटेगा क्योंकि केवल दो ही भाषाएँ सीखना होंगी, एक क्षेत्रीय या मातृभाषा, दूसरी अँगरेज़ी। अगर इस तर्क को आगे बढ़ाया जाये तो किसी दिन ये मित्र यह भी कहेंगे कि क्षेत्रीय मातृभाषा सीखने-सिखाने की क्या आवश्यकता है। अँगरेज़ी ही चले - घर से लेकर दिल्ली तक, तब छात्रों को केवल एक बी भाषा पढ़ना होगी। और मुझे विश्वास है कि कुछ दशकों के बाद उपयुक्त अवसर मिलते ही ये हमारे वामपंथी बुध्दिजीवी यह दर्शन प्रचारित करेंगे।

दरअसल हिन्दी पर यह हमला अनेक कारणों से है। परन्तु उनमें से एक बडा कारण भारत राष्ट्र की पराजित मानसिकता भी है। आज भारत अपना आत्मविश्वास खो चुका है तथा दुनिया का शोषण करने वालों के हर आदेश को यह कहते हुए स्वीकारने को तैयार है कि अब कोई विकल्प नहीं है। बाजारीकरण स्वीकारो क्योंकि अब कोई विकल्प नहीं है। इसी में मानवता खोजो। अमेरिकी संप्रभुता स्वीकारो क्योंकि कोई विकल्प नहीं है, अब अमेरिका की शरण में जाना ही मुक्ति है। अँगरेज़ी स्वीकारो क्योंकि कोई रास्ता नहीं है। अत: स्वत: बढ़कर अँगरेज़ी के दरवाज़े खोलो तथा अँगरेज़ी के नाम पर जो सुविधाएँ हासिल कर सकते हो हासिल करो। पिछले कुछ अरसे से कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं के महाप्रभुओं, जिनका अर्थसत्ता केन्द्र विदेशों में है, समाचार पत्रों में लेखों व वक़्तव्यों के द्वारा देश को अँगरेज़ी की सत्ता स्वीकारने के लिए, मानसिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। एक मित्र लिखते हैं कि अब अँगरेज़ी विरोध बंद कर अँगरेज़ी की गुनगुनी धूप को तापना शुरू करें। विश्व बाज़ार की आर्थिक शक्तियाँ, हर दौर में अपने विरोधी के लिए अपने अनुकूल नेताओं का सृजन करती है। उनका प्रचारतंत्र इस कार्य को बखूबी अंजाम देता है और फिर उपयुक्त समय आने पर उन्हें अपने पक्ष में खड़ा कर वास्तविक विरोधियों को समर्थन करने के लिए मानसिक रूप से तैयार करती है। जब सेनापति हथियार डालता है तो सेना निराश होती है, उसी प्रकार जब कोई नायक हथियार डालता है तो देश व जनता में निराशा होती है। श्री शरद जोशी, जो एक ज़माने में किसानों के नेता बनाए गए थे, अचानक पेप्सी कोला के समर्थन में खड़े दिखाई दिए। मार्क टुली, जिनका बी.बी.सी के संवाददाता के रूप में भारत में काफ़ी सम्मान है, अचानक अँगरेज़ी की वक़ालत करते दिखाई देते हैं। कुछ विद्वान मित्र राष्ट्रभाषा व राजभाषा में फ़र्क करते हैं तथा चाहते हैं कि हिन्दी राष्ट्रभाषा तो रहे परन्तु राजभाषा अँगरेज़ी हो। क्या राज राष्ट्र से ऊपर है ? आखिर राष्ट्रभाषा राजभाषा क्यों नहीं हो सकती ? क्या दुनिया में दूसरा कोई ऐसा उदाहरण होगा ? दरअसल यह अँगरेज़ी की चालाक व बौध्दिक वक़ालत है।

जवाहरलाल नेहरू वि.वि. के कुछ मित्र अचानक हिन्दी राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर विचारगोष्ठी आमंत्रित करते हैं तथा हिन्दी के इन गद्दार नायकों को मंच देकर इन्हें प्रतिष्ठित करने का प्रयास करते हैं।

बोली और भाषा के प्रश्न पर कुछ विस्तार से विचार ज़रूरी है। बोली के लिए लिपि ज़रूरी नहीं है। यद्यपि कुछ विद्वान कहते हैं कि लिए भाषा के लिए भी लिपि ज़रूरी नहीं है। केवल बोली या व्याकरण पर्याप्त हैं। श्री रमाकांत अग्निहोत्री ने शैक्षिक संदर्भ के सितम्बर  अक्टूबर के अंक में यही स्थापना की तथा कहा कि भाषा किसे कहा जाए यह सामाजिक-राजनैतिक प्रश्न है। वे कहते हैं कि सत्ताधारी और पैसे वाले लोग अक्सर जो बोली बोलते हैं, वह भाषा कहलाने लगती है। श्री रमाकांत जी की स्थापना से सहमत होना संभव नहीं है। अगर यह स्थिति होती तो भारत में तो दशकों पूर्व ही अँगरेज़ी भाषा तथा हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाएँ बोली हो गई होतीं। क्योंकि कश्मीर से कन्याकुमारी तक सत्ता व पैसे वाले लोग अँगरेज़ी का इस्तेमाल करते रहे तथा लगभग 200 वर्षों से वह इस्तेमाल हो रही है। तब भी अँगरेज़ी भारत की जनभाषा नहीं बन सकी व देश की क्षेत्रीय भाषाएँ व कुछ क्षेत्रों में हिन्दी, भाषाएँ भी रहीं, बोली भी, वे परिवर्तित नहीं हो सकी। संस्कृत, प्राकृत, पाली, दक्षिण की तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयाली, उर्दू, मराठी, पंजाबी, गुरूमुखी, गुजराती, उड़िया, बंगाली आदि भाषाएँ जिनकी लिपियाँ पृथक हैं, परन्तु मैथिली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी, गोंडी मालवी आदि बोलियाँ ही हैं, जिनकी लिपि तो के ही हैं। देवनागरी शब्द संस्कृत आधारित है परन्तु लोक प्रयोग से व लोग लहजे से शब्दों में कुछ नए गढ़ाव व बदलाव आए हैं। भारत में तो बोली के भी कुछ नए स्वरूप नज़र आते हैं। पूना की मराठी में तथा विदर्भ की मराठी में कुछ फ़र्क है। विदर्भ की मराठी में हिन्दी के साथ सामंजस्य है क्योंकि सी.पी. एँड बरार अँगरेज़ी ज़माने में पृथक राजधानी थी तथा विदर्भ उसका हिस्सा था, जबकि पूना की मराठी शुध्दता की ओर ज़्यादा प्रवृत्त है।

आजकल एक और नया दर्शन अँगरेज़ी समर्थक लोगों ने गढ़ा है और जो हिन्दी और अँगरेज़ी के शब्दों को मिलाकर गढ़ा जा रहा है। कुछ विद्वानों ने कहना शुरू किया है कि अब भारत में हिंगलिश चाहिए, जिसमें अँगरेज़ी और हिन्दी के मिले शब्द होंगे। सच्चाई तो यह है कि भारत के महानगरों के रहवासी जो पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित हैं, पहले से ही इसका इस्तेमाल करते रहे और आधी हिन्दी और आधी अँगरेज़ी या कहा जाए कि जितनी बन सके उतनी अँगरेज़ी और फिर हिन्दी या अपनी क्षेत्रीय भाषा का इस्तेमाल करते रहे। परन्तु यह उनकी नगरीय मानसिकता की या अँगरेज़ी के अल्पज्ञान की कमज़ोरी का परिणाम था, जिसे वे अब विधिवत वाद या दर्शन के रूप में परोसा जा रहा है। हिंगलिश के पीछे एक सुनियोजित षड़यंत्र है, जिसके पीछे लोगों को क्रमश: अँगरेज़ी की ओर ले जाना है और राष्ट्रभाषा के मानसिक आधार को शिथिल करना है। क्या दुनिया के किसी और देश में इस प्रकार का प्रयोग हो रहा है ? अमेरिका में जहाँ यूरोपीय नस्ल के लोग ही मूलत: हैं। वहाँ भी अमेरिकी अँगरेज़ी और यूरोप की अँगरेज़ी में अंतर है। जिसे मिलाने का प्रयास उन्होंने कभी नहीं किया। यूरोप के अधिकांश देश ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से ब्रिटेन के सहोदर और हिस्से रहे हैं। वहाँ भी भाषाओं का इतना घालमेल नहीं रहा है। फ्रांस में फ्रेंच बोली जाती है, फ्रेंच-इंग्लिश नहीं। जर्मनी में जर्मन भाषा बोली जाती है, जर्मन-इंग्लिश। टिली में इटेलियन भाषा बोली जाती है, इटेलियन-इंग्लिश नहीं। जबकि यूरोप की अधिकांश भाषाएँ लैटिन से उसी प्रकार करीब हैं जैसे की भारतीय भाषाएँ संस्कृत से।

तथ्य तो यह है कि फ्रांस, जर्मनी, इटली आदि में कोई अँगरेज़ी बोलना पसंद नहीं करता और अँगरेज़ी बोलने वाले को एक प्राकार से राष्ट्रीय घृणा का पात्र माना जाता है। जबकि संपर्क, रिश्तों, नस्ल, इतिहास के आधार पर ये देश अँगरेज़ी के स्वाभाविक रूप से नज़दीक हैं। इतना ही नहीं इन मुल्कों की बहुमत आबादी एक ही धर्मावलंबी अर्थात इसाई है। यूरोप के इन देशों का यह सौभाग्य है कि वहाँ पर अभी तक नामवर सिंह और गोपाल राय जैसे विद्वानों का जन्म नहीं हुआ।

मैं भाषाई शुध्दता का पक्षधर नहीं हूँ और यह मानता हूँ कि भाषाओं को यदि समृध्द बनाना है तो उसे व्यापक बनाना होगा। दूसरी भाषाओं के आमजनों में प्रचलित शब्दों को अपनी भाषा में समाहित करना होगा। सांस्कृतिक समन्वय के समान ही भाषा समन्वय आवश्यक है। परन्तु भाषा समन्वय का अर्थ अपनी भाषा को या अपनी लिपि को ही समाप्त करना नहीं है। नि:संदेह संस्कृतनिष्ठ हिन्दी या रघुवंशी हिन्दी हमारा आदर्श ध्येय नहीं है। हम अँगरेज़ी के प्रचलित शब्दों यथा स्टेशन, प्लेटफार्म आदि और उसी प्रकार अरबी, फारसी, उर्दू के प्रचलित शब्दों को, हिन्दी में समाहित करना चाहते हैं, जो हिन्दी भाषियों की ज़ुबान पर चढ़े हुए हैं। क्योंकि भाषा का प्रथम उद्देश्य संवाद है और संवाद के लिए समझ अपरिहार्य है, परन्तु समाहित और आत्म समर्पण या आत्महत्या में फ़र्क है। अपने भाषाई समुद्र में अन्य भाषाओं के जन बोलू शब्दों के नदी नालों को समाहित करना, भाषाओं के प्रचलित शब्दों के मिलन के बाद की गंगा बनाना हमें अभीष्ट है। परन्तु हिन्दी राष्ट्रभाषा को समग्र रूप से नकारना और अँगरेज़ी के छोटे से नाले में हिन्दी की गंगा को मिलाना, यह हमारा अभीष्ट नहीं है। हिन्दी भाषियों को भारतीय भाषा भाषियों को या क्षेत्रीय भाषाओं के समर्थकों को इस षड़यंत्र के प्रति सावधान होना होगा। यह षड़यंत्र बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अलिखित वैश्विक सत्ता के द्वारा चलाया जा रहा है, जिसमें प्रत्यक्ष रूप से हिन्दी के इन नामवरी साहित्यकारों को उसी प्रकार सामने खड़ा किया जा रहा है जिस प्रकार महाभारत काल में भीष्म पितामह के समक्ष शिखंडी को खड़ा किया गया था। अगर श्री नामवर सिंह और गोपाल राय हिन्दी को इतना अनुपयोगी मानते हैं तो उन्हें सबसे पहले हिन्दी लेखन बंद कर देना चाहिए। हिन्दी में भाषण देना बंद कर देना चाहिए और अँगरेज़ी साहित्य रचना और अँगरेज़ी में अपनी क़िस्मत आजमाना चाहिए। उन्हें असलियत का पता चल जाएगा। और अपने तर्कों के रेत के खम्बों की सच्चाई का भी पता चल जाएगा। देश के सत्ताधारी जो पहले से ही अँगरेज़ी के मानसिक गुलाम हैं, ने व्यवस्था के माद्यम से एक नया खेल शुरू किया है। भारत के आकाशवाणी की बहुचर्चित और जनप्रिय प्रसारण एफ.एम. में जो कार्यक्रम देने वाले लोग आते हैं, वे आपसी संवाद हिन्दी और अँगरेज़ी का मिला-जुला इस्तेमाल करते हैं। अब तो स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि हिन्दी के समाचारों के बीच में अँगरेज़ी के उध्दरण पढ़े जाते हैं और लगभग हिन्दी समाचारों का एक तिहाई हिस्सा अँगरेज़ी में पढ़ा या उध्दृत किया जाने लगा है। यह क्रम अभी कुछ ही माहों से शुरू हुआ है। क्या सत्ताधीशों ने कभी यह भी सोचा है कि भारत के दूरस्थ ग्रामों, क़स्बों में बैठा हुआ आदमी अँगरेज़ी के उध्दरणों को समझ पाएगा और क्या इस प्रक्रिया के माध्यम से हिन्दी के श्रोताओं को अँगरेज़ी सीखने के लिए बाध्य नहीं किया जा रहा है ? अँगरेज़ी समाचारों के प्रसारण में हिन्दी के उध्दरणों को शामिल क्यों नहीं किया जाता ? फिर यदि यही प्रक्रिया जारी रही तो आकाशवाणी और एफ.एम. हिन्दी के समाचाह ही बंद कर देगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि देश के एक हिस्से में यह समझ है कि अँगरेज़ी विश्वभाषा है या दुनिया में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। यह समझ कुछ ग़लती से है और कुछ योजनापूर्ण प्रचार से। सच्चाई तो यह है कि अँगरेज़ी दुनिया के बहुत छोटे से हिस्से की भाषा है। अँगरेज़ीदाँ लोगों को यह भी पता नहीं है कि बाज़ार की बाध्यताएँ राष्ट्रीय भाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं को भले ही मुनाफे के लिए ही सही गले लगा रही हैं। आज अमेरिका में अँगरेज़ी भाषा जानने वालों की संख्या और चीन में चीनी भाषा जानने वालों की संख्या ब्रिटेन की अँगरेज़ी भाषा जानने वालों की तुलना में कहीं ज़्यादा है। अमेरिका और यूरोप के अनेक देशों ने भारत में अपने व्यापार का जाल फैलाने के लिए बड़े पैमाने पर अपने अपने देशों में हिन्दी प्रशिक्षण प्रारंभ किया है।

क्या हमारे ये हिन्दी के नामवर महाप्रभु यह नहीं जानते कि ब्रिटेन के लिए भारत बाज़ार है भारत के लिए ब्रिटेन बाज़ार नहीं है। और यदि बाज़ार की अनिवार्यता और शर्त को देखा जाए तो ब्रिटेन को हिन्दी सीखने की आवश्यकता है न कि भारत को अँगरेज़ी। पहले ही देश के क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपने राजनैतिक लाभ के लिए हिन्दी साम्राज्यवाद जैसे जुमले चलाए और क्षेत्रीय जन भावनाओं को प्रदूषित और विकृत किया है। उन्हें अँगरेज़ी साम्राज्यवाद कुबूल है, परन्तु राष्ट्र की एकता के तंतुओं को जोड़ने वाली जन भाषा हिन्दी कुबूल नहीं है। यह अँगरेज़ी साम्राज्यवाद की उपज है। जो भाषा के नाम पर क्षेत्रवाद को मजबूत किले में बदलना चाहता है ताकि राष्ट्र मानसिक रूप खंडित हो सके। सैकड़ों साल पहले आदि शंकराचार्य दक्षिण से उत्तर जाकर जन संवाद करते थे और उत्तर का गैर पढ़ा लिखा हिन्दी भाषी दक्षिण के रामेश्वरम जाकर संवाद कर सकता था। श्री नामवर सिंह जैसे मित्रों को एक सूचना देते मैं अपनी बात समाप्त करना चाहूँगा कि ब्रिटेन के 1300 स्कूलों में हाल ही के सर्वेक्षण यह पाया गया कि मात्र 13 प्रतिशत छात्र ही अँगरेज़ी सीखने वाले थे। जो अँगरेज़ी ख़ुद ब्रिटेन में ख़त्म हो रही है उसे भारत के सिर पर बिठाना क्या अपने वतन, राष्ट्रभाषा और मादरीजबान के साथ वफ़ादारी होगी ? मैं जानता हूँ यह अँगरेज़ी समर्थक मित्र राष्ट्रवाद को संकीर्णता और विश्व व्यापकता के फैलाव का तर्क देंगे परन्तु क्या कभी ये रूस, चीन और क्यूबा जैसे साम्यवादी सत्तावाले देशों से कुछ राष्ट्रीयता का सबक सीखेंगे ?

हिंदी साहित्य के विकास और मिशनरी[सम्पादन]

धर्म किसी-न-किसी रूप में मनुष्य के जीवन को निरंतर प्रभावित करता रहता है। समाज के वर्तमान स्वरूप में संस्थाबद्ध संबंधों को बनाने में धर्म और आध्यात्मिकता का योगदान महत्त्पूर्ण माना जाता है। इसमें भाषा की मध्यस्था को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता क्योंकि उसकी प्रमुख भूमिका संप्रेषण है। चूँकि ईसा के वचनों का प्राचर-प्रसार उनके अनुयायियों का परम कर्तव्य समझा जाता है इसीलिए ईसा की मृत्यु के बाद उनके चेलों ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जाकर धर्म-प्रचार किया । भारत में सेंट थॉमस का आगमन सन् 52 का माना जाता है।

वैसे तो प्राचीनकाल से भारत और पश्चिम के बीच संबंध रहे हैं। ईसा पूर्व 975 में लाल समुद्र स्थित अकाबा बंदरगाह और भारत के पश्चिमी तट के बीच व्यापार का ज़िक्र अफ्रीका के इतिहास में मिलता है। वहाँ के निवासी-पोनेश्यिन-भारत और यूनान के बीच मध्यस्थ थे। यूनान के लोग वेद एवं पुराणों के बारे में ईसा से 300 वर्ष पूर्व परिचित थे। लगभग इसी समय बौद्ध धर्म के सिद्धांतों की गूँज भूमध्सागरीय इलाकों तक पहुँची । लेकिन रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भारत और पश्चिम के बीच सीधा संपर्क 20 मई, 1498 को पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा के कालिकट आगमन के बाद प्रारंभ हुआ । राजा जामोरिन द्वारा यात्रा का कारण पूछे जाने पर उत्तर मिला, “ईसाईयत और मसाले”।

अँगरेज़ बहुत बाद में आए। सन् 1579 में प्रथम अँगरेज़ जेसुइट पादरी थॉमस स्टीवेंसन गोवा पहुँचा । भारतीय बोलियों के व्याकरण में उसकी गहरी रुचि थी और 1615 में उसने कोंकणी व्याकरण पर एक किताब प्रकाशित की। साथ ही ‘क्रिस्टियन पुराण’ नामक काव्य लिखा।

सन् 1583 में महारानी एलिजाबेथ प्रथम की एक सिफ़ारिशी चिट्ठी लेकर अँगरेज़ व्यापारियों का शिष्टमंडल भारत के लिए र्वाना हुआ जो सम्राट अकबर के दरबार में आगरा सन् 1585 में पहुँचा। अकबर अत्यंत उदार हृदय सम्राट था और राज्य में शांति स्थापना के उद्देश्य से उसने सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता का दृष्टिकोण अपना रखा था। उसके निमंत्रण पर गोवा से दो पादरी उसके दरबार में आए। अकबर, शाहजहाँ और जहाँगीर के जमाने में ईसाई धर्मप्रचारकों को कोई कठिनाई नहीं हुई।  ‘दी जेसुइट एँड दी ग्रेट मुगलस’ नामक किताब में सर एडवर्ड मेकलेगन ने लिखा है कि स्थानीय सूबेदारों ने धर्मप्रचार में कभी बाधा नहीं डाली बल्कि वे कैथोलिक पादरियों का बड़ा आदर करते थे।

यह वह समय था जब इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति का परवान चढ़ रहा था। सन् 1600के अंतिम दिन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का गठन किया गया जिसके प्रतिनिधि के रूप में सर टामस रो जहाँगीर के दरबार में आया और सूरत में फैक्ट्री खोलने का फ़रमान पाने में सफल हुआ। कंपनी की प्रारंभिक नीति ईसाई प्रचारकों को दूर रखने की थी। अँगरेज़ भारत में व्यापार करने के इरादे से आए थे लेकिन यहाँ की परिस्थिति और राजनीतिक कमज़ोरियों का फ़ायदा  उठाकर शासक बन बैठे। उन्होंने भारत के उद्योग-धंधों को चौपट कर दिया। इस शोषण का विरोध उन प्रोटेस्टेंट प्रचारकों ने किया जो डेनमार्क से भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करने तंजाबूर आए थे। जीगन बाल्गा और हेनरी प्लुचू नामंक दो पादरियों ने दक्षिण भारत की सभी भाषाओं का अध्ययन किया। जीगन ने 1706 में बाईबिल का तमिल भाषा में अनुवाद किया। भारतीय भाषाओं में बाइबिल का यह प्रथम अनुवाद था। सन् 1712 में उन्होंने एक छापाखाना लगाया और हिंदुस्तानी भाषा का व्याकरण प्रकाशित किया।

अठारहवीं शताब्दी में फारसी राजदरबार में अपना रंग खो चुकी थी, ब्रजभाषा की शक्ति क्षीण हो चुकी थी और मुसलमानों के बीच फारसी  मिश्रित  शब्दों वाली खड़ीबोली उर्दू जोर पकड़ चुकी थी। अब तक उत्तर भारत के अनेक स्थानों पर ईसाई मिशन स्थापित हो चुके थे जिसमें आगरा, पटना, मुंगेर, बनारस, मिर्जापुर व इलाहाबाद प्रमुख थे। सन् 1793 में कलकत्ता में विलियम कैरी के आगमन के बाद ईसाई धर्म प्रचार में नया अध्याय प्रारंभ हुआ जिसमें स्थानीय भाषाओं में रचना करने को प्रमुख गतिविधि के रूप में चिह्नित किया गया। विलियम कैरी के इस कार्य में समाज-सुधारक राजा राममोहन राय ने बड़ी मदद की। वैसे उनका उद्देश्य सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं पर रोक लगाना था। लेकिन राममोहन राय के अनुयायी कैरी के साथ उनकी मित्रता को संदेह की दृष्टि से देखने लगे। तब राममोहन राय ने कहा कि डॉ. होरेल और डॉक्टर विल्सन जैसे मसीहियों ने हिंदू शास्त्रों का गहन अध्ययन किया लेकिन इससे वे हिंदू तो नहीं बन गए।

बहरहाल स्थानीय भाषा में धर्म-प्रचार करने की बाध्यता के कारण ईसाई मिशनरियों ने हिन्दी भाषा और व्याकरण के क्षेत्र में विशेष ध्यान दिया। इस दिशा में 1704 में कार्य प्रारंभ हुआ। इसके पीछे मूल उद्देश्य था विदेशों से आनेवाले मिशनरिरयों को हिन्दी सिखाने में मदद मिले और साथ ही प्रशासन चलाने में शासकों की समझ बढ़ाई जाए। लेकिन इस तात्कालिक कारणों के अलावा आध्यात्मिक कारण भी थे जिन पर शोधकर्ताओं का ध्यान कम गया है।

पाश्चात्य जगत में यूरोपीय पुनर्जागरण का काल नवचेतना के नवयुग के प्रारंभ का काल था। इस काल में दार्शनिक चिंतन चर्च और धर्मगुरुओं के प्रभाव से मुक्त होकर साधारणजन विशेषतः विज्ञान की ताकिंकता और इहलौकिकता से प्रभावित विद्धत जगत के बीच आया । इस काल की एक विशेष उपलब्धि यह है कि यूरोप में पहली बार ईश्वर विषयक चिंतन और दार्शनिक चिंतन को अलग-अलग करके देखने की कोशिशें हुई। चौदहवीं शताब्दी में दांते की ‘डिवाइन कॉमेडी’ प्रकाशित होने के बाद ईसाई धर्म-प्रचारकों में ‘पाप’ और ‘मुक्ति’ पर पुनः बहस छिड़ गई। सोलहवीं सदी के प्रारंभ में धर्म-सुधार आंदोलन ने प्रोटेस्टेंट धर्म को जन्म दिया । दांते के बाद जॉन मिल्टन (1608-1674) की ‘पैराडाइस लॉस्ट’ से  ‘चचुनने की स्वतंत्रता’ के सिद्धांत पर बहस चली। क्या हव्वा ने बाग में फल अपनी मर्जी से खाया और क्या आदम ने हव्वा के अनुरोध पर स्वविवेक से निर्णय लिया था। यह प्रश्न यूरोप में बुद्धिजीवियों और धर्म-प्रचारकों के बीच चर्चा का विषय बनने लगे। इसी बीच ईसाई जगत में जोन काल्विन (1509-1564) के नियतिवाद-कि सब कुछ पूर्व सुनिश्चित है-काफ़ी जोर पकड़ने लगा। उसने यह प्रचारित किया कि आदिपुरुष आदम के पतन के बाद-सिवाय के कुछ चुनिंदा लोगों के-अन्यों के लिए मुक्ति संभव नहीं है। इस नियतिवादी ईसाई विचारधारा से यूरोप में बड़ी निराशा फैली लेकिन काल्विन का प्रभाव फ्रांस, इंग्लैड, स्कॉटलैंड, नीदरलैंड और जिनेवा में बढ़ता गया। उधर मार्टिन लूवर (1483-1546) का प्रभाव भी बढ़ रहा था। सन् 1555 तक जर्मनी प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक प्रभाव वाले क्षत्रों में बैंट चुका था और यह प्रवृत्ति पूरे यूरोप में फैलन लगी थी। ईसाइयत के इस दोनों धड़ों में अब यूरोप ही नहीं बल्कि अन्य भू-भागों में भी प्रतिस्पर्धा होने लगी। उपनिवेशवादी संघर्ष भी इससे अछूता न रहा।

इस संदर्भ में मुक्ति या उद्धार के लिए क्या किया जाना चाहिए अथवा क्या किसी मार्ग से मुक्ति संभव है ये भी चर्चा का विषय बना। मिल्टन ने ‘पैराडाइस लॉस्ट’ में ईश्वर और शैतान के बीच युद्ध का बखान करते हुए कुछ प्रश्न उठाए। जैसे, शैतान बेलजुबेब और उसके विद्रोही साथी परिश्ते अपनी हार का बदला कैसे लेंगे ? क्या वे पुनः युद्ध करेंगे या फिर ईश्वर की सृष्टि में नवनिर्मित मानव को भ्रष्ट कर ईश्वर को लज्जित कर बदला लेंगे ? यदि मानव का पतन पूर्व नियोजित न होकर शैतान द्वारा रचित षड्यंत्र या फिर मानव की स्वयं स्वतंत्र इच्छा का परिणाम था तो फिर मानव को  ‘मोक्ष’ कैसे मिलेगा ?  आदम और हव्वा द्वारा प्रथम संभोग के बाद उन्हें कौन बचायेगा। जहाँ दांते ने अंतिम पुरस्कार और दंड का संघर्ष बताया वहीं मिल्टन ने मानव द्वारा स्वतंत्र निर्णय लेन की क्षमता को लेकर मानव की परीक्षा और ज्ञान से उत्पन्न दुविधा को झेलते हुए दुविधा का वर्णन किया। मिल्टन की कृति ‘पैराडाइस रिगेंड’ (स्वर्ग की पुनः प्राप्ति) इसी का परिणाम थी। इन प्रश्नों को लेकर यूरोप के इवेंजेलिक्स समाज के मन में एक अजीब-सी झटपटाहट थी। तो ईसा को मुक्तिदाता का अवतार किस रूप में बताया जाए जो सभी को स्वीकार्य हो। इस समय तक यूरोप में अरबी और फारसी ग्रंथों से अनूदित सामग्री के आधार पर भी भारतवर्ष की छवि पहचानी जाती थी। काल्विन के नियतिवाद के प्रत्युत्तर में एक जोरदार आध्यात्मिक अपील वाले दर्शन की तलाश ईसाई प्रचारकों को थी जो कि  ‘नई आत्माओं’ को नष्ट होने से बचाने के लिए उपनिवेशों में धर्मप्रचार कर रहे थे। यही समय था जब उन्हें वेदों और  उपनिषदों में वर्णित अच्छाई और बुराई-देवताओं को और असुरों के संग्राम, अमृत मंथन और स्वर्ग-नरक की हिंदू कल्पना और मोक्ष पाने के माध्यमों को जानने की तीव्र आवश्यता महसूस हुई। नए भूभागों में धर्म-प्रचार के लिए स्थानीय संस्कृति और भाषा को जानने की आवश्यकता को कोई नहीं नकार सकता।

अँगरेज़ों के भारत आने का मुख्य ध्येय व्यापार था न कि पुरातत्व विषयक खोज । और धर्म या संस्कृति की खोज तो कतई नहीं। लेकिन धुन के पक्के इवेंजेलिकल पादरियों ने एक साधारण यात्री के रूप में इन व्यापारियों के साथ यात्रा की और पश्चिम का ध्यान पूरब, विशेषकर भारत की ओर आकर्षित किया। सन 1630 में दोपादरियों-हेनी और ओविंगटन ने ‘डिसप्ले ऑफ टू फिरंग सेक्ट इन दे इस्ट इंडिया’ नामक किताब में पहली बार सूरत के हिंदू और पारसी समुदाय के बारे में यूरोप को जानकारी दी। इसके बाद कई यात्रा-वृतांत प्रकाशित हुए। इंग्लैड और जर्मनी के बुद्धिजीवियों में भारत के प्रति उत्सुकता बढ़ने लगी।

प्रवासी साहित्य - नई व्याकुलता और बेचैनी  [सम्पादन]

प्रेमचंद स्कालर और प्रेमचंद विशेषज्ञ श्री कमल किशोर गोयनका से रूबरू हुई अमेरिका की साहित्यकार सुधा ओम ढींगरा, जो अपनी साहित्य की रचनात्मक दुनिया में कई संस्थानों से जुड़ी रहकर हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार को नियमित रूप से आगे बढ़ा रही हैं। उनकी बातचीत साहित्य की चौखट पार करती हुई सवालों के दरमियान मुड़ी है प्रवासी साहित्य के भविष्य की ओर। प्रवासी साहित्य की इस नई प्रवृत्ति की ओर ध्यान नहीं दिया गया है और उपेक्षा-भाव रखा जा रहा है, इस सिलसिले में कुछ मान्यताएँ, कुछ शंकायें, कुछ समाधान जो श्री कमल किशोर ने अपनी बातचीत के दौरान विस्तार से खुलासा किये हैं, उनको जानते हुये उनका लगाव हिन्दी के प्रवासी साहित्य के प्रति जाहिर होता है। हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार तथा प्रतिष्ठा के लिये वह जो प्रोत्साहन का कार्य कर रहे हैं वह काबिले-तारीफ़ है।

गुफ्तगू की धारा में आते-जाते हिन्दी भाषा को लेकर जो साहित्य का सफ़र है इसी की राह की विडंबनाएँ, अड़चनाएँ, उपेक्षाएँ पढ़ते हुये जहाँ मुझे हैरानी हुई, वहीं ख़ुशी भी हुई। हैरानी इसलिये हुई यह जानकर कि साहित्य का मूल्याँकन करने वाले अपनी विचारधारा, अपनी सोच से समीक्षात्मक टिप्पणियों से यह जतलाते हैं कि प्रवासी साहित्य तो साहित्य ही नहीं है और अगर है तो वह आधुनिकता से शून्य है। ख़ुशी इस सोच की प्रस्तुति से हुई कि श्री कमल किशोर जी की मान्यता एक नहीं अनेक विचारधाराओं से स्पष्टीकरण देती है कि हिन्दी का प्रवासी साहित्य हिन्दी का ही साहित्य है, जो परदेश में रचा गया है।

हिन्दी हमारे भारत देश की राष्ट्रभाषा के पहले हमारी मातृभाषा भी है जो आदान-प्रदान का माध्यम है, हर क्षेत्र में, घरों में, स्कूल-कालेज में, कई कार्यशालाओं में, जहाँ के कर्मचारी अँगरेज़ी भाषा से ज़्यादा परिचित नहीं हैं। बात भाषा की है- हिन्दी भाषा की, कोई भी साहित्य जो हिन्दी में रचा है या रचा जा रहा है वह हिन्दी का साहित्य ही है, अन्यथा कुछ नहीं, साहित्य की धारायें तो अपनी-अपनी विचारधाराओं की उपज हैं। जिस किसी भाषा में एक रचनाकार कलम के ज़रिये साहित्य कला को प्रस्तुत करेगा वह उसी भाषा का साहित्य होगा। अगर सिंधी भाषा में लिखा गया कोई लेख, आलेख, संस्मरण, कहानी, गीत या ग़ज़ल - जो भी स्वरूप रचना का हो तो वह सिंधी साहित्य का हिस्सा ही है, चाहे वह भारत में बैठकर लिखा गया हो या विदेश में और वह बिल्कुल पत्रिकाओं और अख़बारों में छपता है क्योंकि सिंधी लेखक की रचना उसकी मूलभाषा में है। कभी तो संपादकों की माँग रहती है कि कुछ प्रवास की रोजमर्रा ज़िंदगी के बारे में, आचार-विचार के बारे में, या वहाँ जो दिक्कतें, दुश्वारियाँ सामने आती हैं उनके बारे में लिख भेजें।

कमल किशोर जी से मैं सहमत हूँ, जिनका कहना है- प्रवासी साहित्य हिन्दी का साहित्य है जिसका रंग-रूप, उसकी चेतना और संवेदना भारत के हिन्दी पाठकों के लिये नई वस्तु है, एक नये भाव-बोध का साहित्य है, एक नई व्याकुलता और बेचैनी का साहित्य है जो हिन्दी साहित्य को अपनी मौलिकता एवं नये साहित्य संसार से समृध्द करता है। इस प्रवासी साहित्य की बुनियाद भारत-प्रेम तथा स्वदेश-परदेश के द्वन्द्व पर टिकी है। साहित्य तो एक माध्यम है अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का, समाज में एक-दूसरे के साथ जुड़ने का शंकाओं से निकलकर समाधान पाने के रास्तों पर बढ़ने का।

यहाँ पर उनकी पारखी नज़र और दूरदेशी को मान्यता देते हुये यही कह सकती हूँ कि उनके सुझाये हुये समाधान जो प्रवासी हिन्दी साहित्य को हिन्दी की मुख्यधारा का अंग बना सके और इस बात को भी उजागर कर सके कि साहित्य का उद्देश्य साहित्यिक ही है, राजनीतिक नहीं। अगर कोई दलित लेखक या उस साहित्य का शोध करने वाला दलितों के बारे में, उनकी समस्याओं के बारे में, कुछ शंकाओं, समाधानों का विवरण एक राय के तौर पर प्रस्तुत करता है तो वह दलित साहित्य ही हो जाता है और वह पूरे हक के साथ प्रकाशित होता है और होना भी चाहिये। साहित्य राजनीति नहीं है। इस आधुनिक युग में जहाँ युवा पीढ़ी अपनी पढ़ाई के उपरांत बाहर जाती है विकास के लिये तो भारत की वह संतान अपने साथ भारतीय परम्पराएँ और संस्कृति भी ले जाती है, जिसे वह अपनी आने वाली नस्ल को भी प्रदान करने की भरपूर चेष्टा में लगी हुई है। यह इस बात का पुष्टीकरण है कि जैसे-जैसे अमेरिका में भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे हमारे कुछ कर्मठ हिन्दी प्रेमी बड़ी लगन के साथ हिन्दी के प्रचार-प्रसार में तन-मन और धन से लगे हुये हैं। वह भारतीयता का जज़्बा अभी ज़िन्दा है जिसको लेकर हिन्दी प्रेमी व्यक्तियों ने हिन्दी की कक्षाएँ शुरू की हैं। यह इन प्रवासी भारतीयों का योगदान है जो निरंतर भारतीय संस्कृति को बनाए रखने में लगे हुये हैं।

आज अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। भारतीय बच्चों को भाषा और संस्कृति सिखाने के लिये जगह-जगह भारतीय शालाएँ प्रारम्भ हुई हैं। लोग साप्ताहिक कार्यक्रम के तहत मंदिरों में, घरों में या सार्वजनिक स्थानों में बच्चों को हिन्दी पढ़ाने में लगे हुये हैं। अमेरिकी शिक्षा विभाग का ध्यान भी इस ओर आकर्षित किया जा रहा है ताकि जर्मन, फ्रेंच, रूसी, चीनी और जापानी भाषाओं की तरह प्रत्येक स्कूल में हिन्दुस्तानी भाषा भी पढ़ाई जाये। यह उन्हीं प्रवासी हिन्दुस्तानियों की बदौलत, उनकी साहित्य निष्ठा की एवज आज यू।एस।ए में हिन्दी भाषा और अनेक मातृभाषाओं के सीखने-सिखाने की हलचल शुरू हो चुकी है। अमेरिका विश्व के उन देशों में से है जहाँ प्रवासी भारतीयों और भारतवंशियों की सबसे ज़्यादा उपस्थिति है, न्यूयार्क विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहाँ भारतीय मूल के वासी अपनी प्रतिभा लगन और मेहनत से बनाए हुए हैं। हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल रही है उसका एक मूल कारण है प्रवासी भारतीय, जो भारत की संस्कृति को जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास करती आ रहा है। इस भाषा के विकास में अनिवासी भारतीयों तथा विद्वानों, लेखकों और शिक्षकों का योगदान है। इससे ज़ाहिर है कि जो जन देश से परदेस में जा बसा है और अपनी मात्रभाषा या राष्ट्रभाषा में साहित्य का स्रजन करता है, वह स्वदेशी साहित्य है, परदेसी नहीं। अपनी सोच से खींची हुई अगर ये भाषाई रेखाएँ व उनकी हदों सरहदों की लकीरें मिटा दें तो यह साफ़ साफ़ नज़र आएगा कि अपने देश की भाषा में रचित साहित्य देश का है, क्योंकि हम भारतवासी हैं और भाषा बोलते और लिखते वक्त हमारी वाणी व लेखनी द्वारा जाति के अध्याय का गौरव छलकता है, इस बात को नकारा नहीं जा सकता। हम इस देश के वारिस है, यहाँ की संस्कृति के वारिस हैं, अतिशयोक्ति न होगी कहने में में अँगरेज़ी माहौल के बीच में हिन्दी भाषा व उस स्स्क्रुति को बनाये रखने की दिशा में जो लगन व निश्चय से काम कर रहे हैं वह काबिले तारीफ़ है। अँधेरों से एक सुरंग जिससे अपनी भाषा की रोशनी की किरणें फैलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उजाला प्रदान करने वाले साहित्य के सेनानी है उन्हें नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। भारतीय राष्ट्र की इमारत किसी विदेशी भाषा की नींव पर नहीं रखी जा सकती। भारतीय भाषा को सीखने और सिखाने के इस निष्फल प्रयास को अभिनंदन करते हुये यही कहा जा सकता है कि ये प्रवासी भारतीय सैनिक की भांति अपने वतन से दूर, गर्दिशों से जूझते, मुश्किलों के बीच से भाषा की एक सुरंग खोद रहे हैं जहाँ पर भारतीय भाषा और उस भारतीय संस्कृति को जीवंत रख कर ये सच्चे सिपाही इन्हीं संस्थाओं, शिक्षा घरों, विद्यालयों में तैनात अगर कुछ कर पा रहे हैं तो एकमात्र, हाँ एकमात्र वह सिर्फ़ हिन्दुस्तान की महिमा बढ़ा रहे हैं। अगर ऐसा न होता तो कौन पहचानता वहाँ पर हिन्दुस्तानियों को जो अब प्रवासी कहलाये जा रहे हैं और जो साहित्य वहाँ रचा जा रहा है उसे प्रवासी साहित्य से अलंकृत किया जा रहा है। हिन्दी साहित्य जहाँ भी लिखा जा रहा है देश में हो चाहे परदेश में वह हिन्दी साहित्य ही है।

महात्मा गाँधी ने विश्वग्राम का जो सपना देखते हुये कहा था- मैं नहीं चाहता कि मेरा घर चारों ओर दीवारों से घिरा रहे। न मैं अपनी खिड़कियों को ही कसकर बंद रखना चाहता हूँ। मैं तो सभी देशों की संस्कृति का अपने घर में बेरोक-टोक संचार चाहता हूँ। आज विज्ञान के प्रसारित ज्ञान के एवज़ में इंटरनेट के द्वारा विश्व जुड़ता हुआ नज़र आता है। अपनी सारी भौगोलिक सीमाएँ तोड़कर एक 'विश्वग्राम' को साकार स्वरूप देकर। द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन मारिशस में प्रस्तुत डॉ. ओदोलेन स्मेकल के भाषण के एक अंश में हिन्दी-राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता के संदर्भ में कहा था- मेरी दृष्टि में जो स्वदेशी सज्जन अपनी मातृभाषा या किसी अपनी मूल भारतीय भाषा की अवहेलना करके किसी एक विदेशी भाषा का प्रयोग प्रात: से रात्रि तक दिनों दिन करता है, वह अपने देश में स्वदेशी नहीं, परदेशी है।

हिन्दी की न केवल भौगोलिक परन्तु भाषागत सीमाएँ वास्तव में असीम हैं। इस सत्य के आइने में यह विचारधारा सरासर अनुचित है कि जो लेखक प्रवास में, देश से परे रहकर अपनी मातृभाषा में या राष्ट्रभाषा हिन्दी में लिखते हैं तो वह साहित्य 'प्रवासी' है। देश के वासी क्या वतन से दूर रहकर अपने देश के वासी नहीं रहते? क्या वे परदेशी हो जाते हैं? आज इसी बात को लेकर यह सवाल मन में उभरकर आता है कि अन्य भाषाओं की बात तो दूर है, पर विदेश में लिखी हुई हिन्दी भाषा के साहित्य को अपने देश के हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा का अंग भी माना जाता है या नहीं? हिन्दी का साहित्य और प्रवासी साहित्य एक है या नहीं? हालाँकि इस बात में कोई शक नहीं कि हिन्दी के प्रवासी साहित्य का रंग-रूप, उसकी चेतना और संवेदना भारत के हिन्दी पाठकों के लिये नई वस्तु है। ऐसा साहित्य जो अपनी मौलिकता एवं नये साहित्य संसार से हिन्दी साहित्य को समृध्द करता है।

कहानी संग्रह 'प्रवासी आवाज़' के प्रवेश पन्नों में डॉ. कमल किशोर गोयनका का यह अंश इस बात की ओर बखूबी इशारा कर रहा है कि अमेरिका में रचा हुआ यह संकलन हिन्दी की मुख्यधारा का अंग बनेगा। उनके शब्दों में- अमेरिका के 44 प्रवासी हिन्दी कहानीकारों की कहानियों का यह संकलन निश्चय ही हिन्दी में नई संवेदना, नया परिवेश, नयी जीवनदृष्टि तथा नये सरोकारों का द्वार खोलेगा। संकलन के बहाने राजी सेठ का कहती हैं- हिन्दी साहित्य लेखन की मुख्यधारा में वृध्दि, समृध्दि और विश्वास का वातावरण पैदा करेगी। इतना ही नहीं, प्रवासी भारतीयों के इस योगदान के चलते सांस्कृतिक राष्ट्रीय धरातल पर उनका स्थान भी सुरक्षित करेगी। हिन्दी लेखन की मुख्यधारा को ऐसी समावेशिता के लिये कृतज्ञ होना होगा। अंजना का भी, जिसके यत्नों ने इन सब मुद्दों को विचारणीय और दर्शनीय धरातल पर ला दिया है।

यह सब उदाहरण अपने संकेतों से स्पष्टीकरण कर रहे हैं कि साहित्य राजनीति नहीं है जिसके हम उसे किसी धारा के तहत रखें, परखें या नामकरण दें। साहित्य साहित्य है और कुछ नहीं। अगर भारत के हिन्दी साहित्य को एक धारा के अंतर्गत शामिल किया जाता है और प्रवासी हिन्दी साहित्य धारा को एक और धारा के अंतर्गत रखा जाता है तो फिर भाषा के विकास में उतनी गति नहीं आ पायेगी। भारत में लिखे जाने वाले हिन्दी साहित्य को अन्य देशों तक और अन्य देशों में साहित्यकारों की हिन्दी रचनाओं को भारत तक पहुँचाना एक महत्वपूर्ण कार्य है। आज जब हिन्दी राष्ट्र भाषा से विश्वभाषा बनने जा रही है उस राष्ट्रभाषा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी साहित्यकारों का बड़ा हाथ होगा, चाहे वो भारत देश का हो या भारत के बाहर रहने वाले प्रवासी भारतीय। जब राष्ट्रभाषा में इतना संगठन, इतना एकात्मपन न होगा कि वह एक भाषा में बात कर सके तो विचार करने योग्य बात है कि उस भाषा का प्रचार कैसे बढ़े। 1934, 29 दिसम्बर को भारत हिन्दी प्रचार सभा मद्रास में एक भाषण में मुंशी प्रेमचंद के विचार 'राष्ट्रभाषा और उसकी समस्याओं' के तहत कुछ यूँ थे- मैं जो कुछ अनाप-शनाप बकूँ, उसकी खूब तारीफ कीजिये, उसमें जो अर्थ न हो, वह पैदा कीजिये, उसमें अध्यात्म के और साहित्य के तत्व खोज निकालिये... तमिलनाडू हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष डा॰ बालशौरि रेड्डी का इस विषय पर एक सिद्धाँतमय कथन है "हिंदी का साहित्य जहाँ भी रचा गया हो और जिसने भी रचा हो, चाहे वह जंगलों में बैठ कर लिखा गया हो या ख़लिहानों में, देश में हो या विदेश में, लिखने वाला कोई आदिवासी हो, या अमेरिका के भव्य भवन का रहवासी, वर्ण, जाति धर्म और वर्ग की सोच से परे, अपनी अनुभूतियों को अगर हिंदी भाषा में एक कलात्मक स्वरूप देता है, तो वह लेखक हिन्दी भाषा में लिखने वाला कलमकार होता है और उसका रचा साहित्य हिन्दी का ही साहित्य है।"

हिन्दी का साहित्य विश्व में, हिन्दी की अंतरराष्ट्रीयता को बुलंदी के साथ स्थापित कर रहा है, इस बात में कोई शक नहीं,चाहे वह मारिशस का हिन्दी साहित्य हो या अमेरिका का हिन्दी साहित्य, मास्को का हो या चीन का, सूरीनाम का हो या इंग्लैंड का। हिन्दी के साहित्य की हर धारा उसी में मिलकर एक राष्ट्रीय भाषा हिन्दी की सरिता जब बनकर बहेगी तब ही वह सैलाब अंतरराष्ट्रीय धरातल पर अपना स्थान पा सकेगा।

विश्व में हिन्दी फिर पहले स्थान पर[सम्पादन]

विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा के संबंध में मैने 1981 शोध कार्य करना शुरू किया था। इस शोध की पहली रिपोर्ट भारत सरकार की राजभाषा पत्रिका में 1997 में प्रकाशित हुई थी। इस शोध अध्ययन को 2005 में अद्यतन किया गया। इस रिपोर्ट का सार विश्व  के 185 देशों में दैनिक समाचार पत्रों के इन्टरनेट संस्करणों में प्रकाशित हुआ। इस रिपोर्ट को पुनः 2007 में अद्यतन किया गया है। अद्यतन शोध का संक्षिप्त सार प्रस्तुत हैः  यद्यपि अब तक सभी यह मानते आए हैं कि मंदारिन जानने वाले विश्व में सबसे अधिक हैं। परन्तु चीन में तो बड़ी संख्या में चीनी में व विश्व के अनेक भागों में बोली जाती है। यहाँ तक कि मंदारिन के नाम पर तो उत्तरी चीन एवं दक्षिणी चीन के मतभेद साफ़ नज़र आते हैं। तिब्बती, कैंटोनीज, फुकीन, हक्का जैसी उप भाषाओं का वर्चस्व चीन में व इसके बाहर देखा जा सकता है। चीनी भाषा की लिपि समान होने पर विश्व के भाषाविदों ने समस्त चीनी बोलियों, उपबोलियों व चीनी भाषा परिवार को जोड़ कर इसकी संख्या 1990 में लगभग 730 आँकी जो 2005 में बढ़कर लगभग 900 मिलियन हुई व आज 2007 तक 900 मिलियन है। 2005 के बाद इसमें मामूली वृद्धि हुई है।

हिन्दी के विषय में आरंभ से ही विदेशियों की धारणा ग़लत रही है। संसार भर के भाषाविद हिन्दी के नाम पर सिर्फ़ खड़ी बोली को ही हिन्दी मानते आए हैं जबकि यह सच नहीं है। हिन्दी की बोलियाँ भी इसमें शामिल की जानी चाहिए थी। साथ ही विदेशियों ने उर्दू को अलग भाषा के रूप में गिना है। यह तो बिल्कुल ही ग़लत है। उर्दू अलग से भाषा नहीं है बल्कि हिन्दी का ही एक रूप है। संसार का कोई भी भाषाविज्ञानी उर्दू को अलग कैसे मान सकता है ? क्योंकि भाषा तो भाषिक संरचना से वर्गीकृत होती है। उर्दू का अलग से व्याकरण नहीं है। इसमें अधिकांश शब्द व व्याकरण व्यवस्था हिन्दी की ही है। अतः हिन्दी से इसे अलग भाषा मानना क़तई युक्तिसंगत नहीं है। हिन्दी की बोलियाँ और उर्दू बोलने वालों की संख्या मिला देने से विश्व में हिंन्दी जानने वाले 1023 मिलियन से अधिक हैं जबकि मंदारिन जानने वाले केवल 900 मिलियन से थोड़ा-सा अधिक हैं। अर्थात् मंदारिन जानने वालों से हिन्दी जानने वाले 123 मिलियन अधिक हैं। अतः यह सिद्ध हो गया है कि हिन्दी जानने वाले विश्व में सर्वाधिक हैं। हाल ही एक रिपोर्ट में यह दर्शाया गया था कि विश्व में चीनी भाषी एक अरब हैं। अर्थात् 1000 मिलियन है। यह संख्या सभी प्रकार की चीनी भाषा परिवार की भाषाओं को जोड़ कर निकली गई है। यदि हिन्दी में आर्य भाषा परिवार की भाषाओं को मिला दें तथा अन्य भाषाओं में प्रयुक्त हिन्दी शब्दों की समानता को देखकर संख्या निकालें तो यह संख्या विश्व में 2 अरब अर्थात् (दो हज़ार मिलियन) होगी। इसके लिए में एक छोटा-सा उदाहरण देना चाहूँगा । मलय भाषा को ही लें, यह भाषा दक्षिणी थाईलैंड, फिलिपीन्स, सिंगापुर, पूर्वी सुमात्रा, बोर्नियो, नीदरलैंड्स, ब्रूनेई आदि देशों में बोली जाती है। इसमें थोड़ा-सा परिवर्तन करके इसे ही भाषा इंडोनेशिया कहा जाता है जो इंडोनेशिया की भी राजभाषा है। यह भाषा हिन्दी से काफ़ी मिलती-जुलती है। लेकिन इसे हिन्दी परिवार से बहुत दूर मलाया पोलिनेशियन परिवार में गिना जाता है। आर्य भाषा परिवार में नहीं। जबकि हिन्दी से साम्य होने के कारण इसे हिन्दी में शामिल होने चाहिए था।

मलय भाषा में अधिकांश शब्द हिन्दी और संस्कृत के हैं जैसे-पादरी, मनुष्य, लिम्मू (निम्बू), बूमि (भूमि), दीवान, दुक (दुख) कापल, हर्फ, गुरू, महा, मुफलिस, जबाब, हद, फलसफा, जंदला (जंगला), पाव, रोटी, फीता, ऊंट, तौलिया, सूका, संसार, वक्त, माफ, समामत आदि हज़ारों शब्द हैं। इसी प्रकार कहीं-कहीं तो वाक्य रचना भी समान है जैसे आपका नामा  (मलय भाषा) आपका नाम (हिन्द भाषा)? अपा खबर (क्या खबर) आदि । इसी प्रकार कम्बोडिया की खमेर भाषा में 3000 से अधिक संस्कृत एवं भारतीय भाषाओं के शब्द हैं। इन भाषाओं को तथा भारत की अन्य भाषाओं के विदेशी रूपों को सम्मिलित करने से इसकी संख्या कितनी होगी आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं।

मेरा मानना है कि भाषा भाषियों की संख्या की गणना में एक ही मानदण्ड होना चाहिए। चीनी भाषा (मंदारिन) की गणना करते हुए चीनी लिपि में लिखी गई चीन की सभी भाषाओं को शामिल किया गया है जबकि वे बोलियाँ बोलने वाले दूसरी बोली को समझ नहीं पाते हैं। फिर भी इन्हें मंदारिन में शामिल किया गया है, जबकि हिन्दी की बिल्कुल समान बोलियों, जैसे ब्रज, अवधी, भोजपुरी आदि को भी हिन्दी बोलने वालों की सख्या से हटा दिया गया है। इस प्रकार विश्व के प्रकाशनों में हिन्दी भाषियों की संख्या सिर्फ़ 3 या 4 करोड़ ही दर्शाई जाती है जबकि हिन्दी जानने वाले विश्व में एक अरब से अधिक हैं। अर्थात् एक हज़ार तेईस मिलियन चीनी भाषियों से एक सौ तेइस मिलियन अधिक। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि कुछ भारतीय प्रकाशनों में भी विदेशी विद्वानों की गणना के आधार पर ही आँकड़ें छापे जा रहे हैं।

मेरे इस शोध का सारांश सन् 2005 में जब भारतीय व विदेशी समाचार पत्रों के इन्टरनेट संस्करणों के माध्यम से विश्व के 185 देशों में प्रकाशित हुआ तो कई पोर्टलों ने इस पर इन्टरनेट चैट कराया व पाठकों के विचार आमंत्रित किए। संसार में किसी भी विद्वान के छपने के बाद कुछ विद्वानों ने कुछ देशों के अद्यतन आँकड़े उपलब्ध कराए, मैं उनका आभारी हूँ। इस आँकड़ों को शोध रिपोर्ट 2007 में शामिल कर लिया गया है। इस आधार पर जून 2007 तक के आँकड़ों के आधार पर भी हिन्दी भाषा, विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा सिद्ध हुई है।

आज भारत और विश्व के कई प्रकाशन इसे मानने लगे हैं व हिन्दी को प्रथम स्थान पर दिखाने लगे हैं। परन्तु अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी हैं। मेरा अनुरोध है कि संसार के हर प्रकाशन में हिन्दी जानने वालों की संख्या 1023 मिलियन दर्शायी जानी चाहिए व मंदारिन की संख्या 900 मिलियन। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ को अविलम्ब हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा का दर्ज़ा दे देना चाहिए।

अतः प्रत्येक हिन्दी प्रेमी से मेरा आग्रह है कि हिन्दी को विश्व की सर्वाधित बोली समझी जाने वाली भाषा के रूप में स्थापित करने में योगदान दें। 

विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास एवं हिंदी[सम्पादन]

अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दबाव के कारण आज प्रौद्योगिकी की  आवश्यकता बढ़ गई है। वास्तव में प्रौद्योगिकीय गतिविधियों को बनाए रखने के लिए तथा सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतीय जन मानस में वैज्ञानिक चेतना का विकास करना अनिवार्य है। देश की सम्पर्क भाषा हिन्दी में वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकीय ज्ञान के सतत विकास और प्रसार के लिए वैज्ञानिक भाषा के रूप में हिन्दी विकास के लिए वैज्ञानिकों एवं हिन्दी भाषा के विशेषज्ञों को मिलकर निरन्तर कार्य करना होगा।

हिन्दी में विज्ञान सम्बन्धी साहित्य का लेखन-कार्य भारतेन्दु काल से प्रारम्भ हो गया था। 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही इस दिशा में यत्र तत्र हुए प्रयास बिखरे हुए मिलते हैं। स्कूल बुक सोसायटी, आगरा (सन् 1847), साइंटिफिक सोसायटी, अलीगढ़ (सन् 1862), काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी (सन् 1898), गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार (सन् 1900) विज्ञान परिषद, इलाहाबाद (सन् 1913), वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली मण्डल (सन् 1950), वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग (सन् 1961) आदि ने वैज्ञानिक साहित्य के निर्माण में उल्लेखनीय कार्य किया । इस वैज्ञानिक साहित्य-लेखन की भाषिक स्थिति के सम्बन्ध में अपेक्षित विचार सम्भव नहीं हो सका। हिन्दी में जो पुस्तकें वैज्ञानिक विषयों पर उच्चतर माध्यमिक एवं इन्टरमीडिएट कक्षा के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर लिखी गई हैं उनकी संख्या बहुत अधिक है। उनकी भाषा-शैली भी अपेक्षाकृत सहज एवं बोधगम्य है । किन्तु जिन ग्रन्थों का निर्माण मानक ग्रन्थ अनुवाद योजना के अंतर्गत किया गया है उनकी भाषा-शैली में अस्पष्टता, अस्वाभाविकता तथा अँगरेज़ी के वाक्य-विन्यासों की छाया की बहुलता है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के अनुरूप हिन्दी भाषा के विकास में नए आयाम जोड़ने की आवश्यकता है जिससे सुगम एवं बोधगम्य तकनीकी लेखन की शैली का तीव्र गति से अधिकाधिक विकास हो सके, जन-सामान्य के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी को सुबोध और सम्प्रेषणीय बनाया जा सके, उसमें जिज्ञासा की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से उत्प्रेरित की जा सके। विश्लेषणात्मक चिंतन शक्ति का विकास किया जा सके और प्रकृति की प्रक्रियाओं के बीच समन्वय स्थापित करने की दृष्टि पैदा की जा सके। साथ ही, बच्चों और किशोरों की कल्पनाशीलता को आकर्षित किया जा सके तथा वयस्कों को रोचक ढंग से समुचित ज्ञान उपलब्ध हो सके।

विद्वानों को वैज्ञानिक लेखन की विषय-वस्तु और उसके प्रस्तुतीकरण, सरलीकरण, मानकीकरण, शैलीकरण आदि पर विचार-विमर्श करना चाहिए, एक स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी के विभिन्न विषयों के ग्रन्थों के हिन्दी अनुवाद की चर्चा होती है। मैं यह स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी के विभिन्न विषयों के ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद करते समय भाषा जटिल, बोझिल एवं दुरूह हो जाती है। अनुवादित ग्रन्थ को पढ़ते समय उसे समझने के लिए यदि मूल ग्रन्थ को पढ़ने की आवश्यकता का अनुभव हो तो ऐसे अनुवाद की क्या सार्थकता।

इसकी अपेक्षा वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी के विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ विद्वानों के हिन्दी में व्याख्यानों की योजना बननी चाहिए। विद्वानों को अँगरेज़ी के तकनीकी शब्दों के प्रयोग की छूट मिलनी चाहिए। इन व्याख्यानों को टेपाँकित किया जाना चाहिए। इस सामग्री को आधार बनाकर ग्रन्थों के निर्माण की योजना बनाई जानी चाहिए। इसके लिए भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय एवं विज्ञान एवं अभियांत्रिकी अनुसंधान परिषद् को मिलकर कार्यक्रम का मार्ग प्रशस्त करने की पहल करनी चाहिए।

विश्वविद्यालयों, आई.आई.टी. संस्थानों, राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं तथा उद्योगों के हिन्दी जानने वाले विख्यात वैज्ञानिकों एवं तकनीकी विशेषज्ञों की श्रम-शक्ति एवं निष्ठा के समन्वयन से यह कार्य अपेक्षाकृत कम धनराशि के नियोजन तथा कम समय में सम्पन्न हो सकता है।

इसी पध्दति, विधि एवं प्रक्रिया से भिन्न-भिन्न विषयों के विश्व कोष निर्मित हो सकते हैं तथा इन्टरनेट पर सम्पूर्ण सामग्री सुलभ करायी जा सकती है। एक बार यह कार्य हिन्दी में निष्पन्न हो गया तो उसी पध्दति, विधि एवं प्रक्रिया से भारत की अन्य आधुनिक भाषाओं में भी यह कार्य सम्पन्न कराना सहज होगा।

हमें विज्ञान की अद्यतन एवं जटिल संकल्पनाओं को हिन्दी में यथासंभव सरल ढंग से व्यक्त करने की विधि विकसित करनी चाहिए। वैज्ञानिकों संकल्पनाओं को किस प्रकार सुबोध बनाने का प्रयास किया जाए; विज्ञान एवं तकनीक से संबंधित विभिन्न शाखाओं के तथ्यों, विचारों एवं संकल्पनाओं को हिन्दी भाषा की प्रकृति के अनुरूप सहज रूप में प्रस्तुत किया जाए - इन दृष्टियों से विचार-विमर्श आवश्यक है। वैज्ञानिक साहित्य की विषय-वस्तु को हिन्दी भाषा के प्रयोजनमूलक और व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना आवश्यक है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास और प्रसार के लिए तदनुरूप भाषिक विकास भी आवश्यक है।

विश्व हिंदी सचिवालय : एक नज़र में[सम्पादन]

हिन्दी का एक अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में संवर्धन करने और विश्व हिन्दी सम्मेलनों के आयोजन को संस्थागत व्यवस्था प्रदानकरने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना का निर्णय लिया गया और इसकी संकल्पना 1975 में नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान की गई । जब मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर शिव सागर रामगुलाम ने मॉरीशस में विश्व हिन्दी सचिवालय स्थापित करने का प्रस्ताव किया ।   हिन्दी का एक अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में संवर्द्धन करने और विश्व हिन्दी सम्मेलनों के आयोजन को संस्थागत व्यवस्था प्रदान करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना का निर्णय लिया गया । इसकी संकल्पना 1975 में नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान की गई जब मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर शिव सागर रामगुलाम ने मॉरीशस में विश्व हिन्दी सचिवालय स्थापित करने का प्रस्ताव किया ।   इस संकल्पना को मूर्त रूप देने के लिए भारत और मॉरीशस की सरकारों के बीच 20 अगस्त 1999 को एक समझौता ज्ञापन सम्पन्न किया गया । 12 नवम्बर 2002 को मॉरीशस के मंत्रिमंडल द्वारा विश्व हिन्दी सचिवालय अधिनियम पारित किया गया और भारत सरकार तथा मॉरीशस की सरकार के बीच 21 नवम्बर 2001 को एक द्विपक्षीय करार सम्पन्न किया गया ।   विश्व हिन्दी सचिवालय की एक शासी परिषद (गवर्निंग कौंसिल) तथा एक कार्यकारी मंडल (एग्ज़िक्यूटिव बोर्ड) है । विश्व हिन्दी सचिवालय के महासचिव इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं ।

शासी परिषद   विश्व हिन्दी सचिवालय की शासी परिषद में भारत तथा मॉरीशस, दोनों पक्षों, की ओर से 5-5 सदस्य हैं जो निम्नानुसार है

गैर-सरकारी सदस्य

शासी परिषद की बैठक

  शासी परिषद की प्रथम बैठक, भारत के विदेश मंत्री श्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में 28 जनवरी 2008 को नई दिल्ली में आयोजित की गई । बैठक में भारत की ओर से श्री प्रणब मुखर्जी, विदेश मंत्री; श्री अर्जुन सिंह, मानव संसाधन विकास मंत्री; श्रीमती अम्बिका सोनी, संस्कृति मंत्री, डॉ. रत्नाकर पांडेय, डॉ. आर पी मिश्र, नामित उपमहासचिव, विश्व हिन्दी सचिवालय तथा विदेश मंत्रालय, मानव संसाधन मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय के अधिकारीगण उपस्थित थे । मॉरीशस की ओर से श्री डी. गोखुल, शिक्षा एवं मानव संसाधन मंत्री, श्री एम.एम डल्लु, विदेश कार्य, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार एवं सहयोग मंत्री, श्री मुकेश्वर चुन्नी, मॉरीशस के उच्चायुक्त, डॉ.(श्रीमती) विनोद बाला अरूण, महासचिव, विश्व हिन्दी सचिवालय, श्री अजामिल माताबदल, श्री सत्यदेव टेंगर तथा भारत में मॉरीशस के उच्चायोग से अन्य अधिकारी उपस्थित थे ।

कार्यकारी मंडल

सदस्य

सचिव, विदेश मंत्रालय            स्थायी सचिव, विदेश कार्य, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार                                    एवं सहयोग मंत्रालय   सचिव, मानव संसाधन विकास मंत्रालय    स्थायी सचिव, शिक्षा एवं मानव संसाधन मंत्रालय   सचिव, संस्कृति मंत्रालय                स्थायी सचिव, कला एवं संस्कृति मंत्रालय   मॉरीशस में भारत का उच्चायुक्त          स्थायी सचिव, प्रधानमंत्री कार्यालय, मॉरीशस

कार्यकारी मंडल की बैठक  

कार्यकारी मंडल की प्रथम बैठक श्री आर पी अग्रवाल, सचिव (उच्चतर शिक्षा), मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार की अध्यक्षता में 24-25 मई को मॉरीशस में आयोजित की गई । बैठक में भारत की ओर से श्री आर पी अग्रवाल, सचिव(उच्चतर शिक्षा), मानव संसाधन मंत्रालय, श्री वीपी हरन, संयुक्त सचिव, विदेश मंत्रालय, श्री आर सी मिश्र, संयुक्त सचिव, संस्कृति मंत्रालय, श्री बी जयशंकर, मॉरीशस में भारत के उच्चायुक्त उपस्थित थे और मॉरीशस की ओर से श्री एस रेगन, स्थायी सचिव, शिक्षा एवं मानव संसाधन मंत्रालय, श्री एन के बल्लाह, स्थायी सचिव, कला एवं संस्कृति मंत्रालय, श्री वी चितू, प्रथम सचिव, विदेश कार्य मंत्रालय, श्रीमती एस बहादुर, सहायक सचिव, प्रधानमंत्री कार्यालय तथा डॉ.(श्रीमती) विनोद बाला अरूण, महासचिव, विश्व हिन्दी सचिवालय उपस्थित थे ।

महासचिव

भारत सरकार तथा मॉरीशस की सरकार के बीच सम्पन्न द्विपक्षीय करार के अनुसार विश्व हिन्दी सचिवालय का प्रथम महासचिव मॉरीशस से होगा और इसका कार्यकाल 3 वर्ष का होगा । तद्नुसार मारीशस से डॉ.(श्रीमती) विनोद बाला अरूण की विश्व हिन्दी सचिवालय की प्रथम महासचिव के रूप में नियुक्त की गई है ।

उपमहासचिव

भारत सरकार तथा मॉरीशस की सरकार के बीच सम्पन्न द्विपक्षीय करार के अनुसार विश्व हिन्दी सचिवालय का प्रथम उपमहासचिव भारत से होगा और इसका कार्यकाल 3 वर्ष का होगा । तद्नुसार भारत से डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र की विश्व हिन्दी सचिवालय के प्रथम उपमहासचिव के रूप में नियुक्त की गई हैं ।   विश्व हिन्दी सचिवालय ने 11 फरवरी 2008 से औपचारिक रूप से कार्य करना आरंभ कर दिया है।

भाषा और संस्कृति[सम्पादन]

अब विदेशों में हमारे प्रवासी भारतीय अपनी भाषा संस्कृति, आदर्श एवं मूल्यों के प्रबल समर्थक होते हुए भी विदेशी भाषा को अपनी आजीविका तथा वैज्ञानिक उन्नति का स्त्रोत एवं साधन मानकर उसकी उपासना में लगे हुए हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अब आत्म विश्लेषण करना होगा कि हम मूलत: भारतीय हैं और भारत गणतंत्र की राजभाषा, संपर्क भाषा एवं राष्ट्रभाषा हिन्दी की उपेक्षा करना उचित नहीं हैं। यह जागृति व चेतना पुन: हिन्दी के उत्थान में सहायक सिध्द होगी।

भाषा मानव मन की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का साधन है। साथ ही एक-दूसरे को जोड़ने का माध्यम है। परस्पर सुख-दुखों आशा-आकांक्षाओं, आचार-विचार, वेष-भूषा, ज्ञान-विज्ञान, कला समस्त प्रकार की भाव संपक्ष आध्यात्मिक विरासत, संस्कृति तथा समस्त चिंतन भाषा में निबद्ध होता है।

वैदिक संस्कृत एवं ग्रीक भाषा एवं साहित्य विश्व के अत्यंत प्राचीनतम एवं समृद्ध भाषाएँ मानी जाती हैं। जिस भाषा में ज्ञान-विज्ञान, शिल्प एवं समस्त कलाओं की अभिव्यक्ति की गहनक्षमता होती है, वह भाषा संपन्न मानी जाती है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ  ठाकुर ने अपने एक गीत में स्पष्ट बताया है- हम देश में आर्य भी आये। अनार्य भी आए, द्रविड़, चीन, शक-हूण, पठान मुगल सभी यहाँ आये, लेकिन कोई भी अलग नहीं रहा। सब इस महासागर (संस्कृति) में विलीन होकर एक हो गये।

निश्चय ही भारत एक महासागर है और भारतीय संस्कृति भी महासागर है। इसमें विश्व की तमाम संस्कृतियाँ आकर समाहित हो गई। आज जिसे लोग हिन्दू संस्कृति मानते है वह वस्तुत: भारतीय संस्कृति है जो सिंधुघाटी की सभ्यता, प्राग्वैतिहासिक एवं वैदिक संस्कृति का विकसित रूप है। इसने अनेक धर्मों, सभ्यताओं एवं संस्कृतियों को आत्मस सात कर लिया है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति सामासिक कहलाती है।

भारतीय संस्कृति की अन्य विशेषताएँ है। यह प्रगतिशील है, सांप्रदायिकता से परे तथा सहिष्णुता की भावना से ओतप्रोत है। समस्त भारत को धार्मिक, सामासिक  सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक स्तर पर एक सूत्र में गूँथने की भावना एक भारतीय भावना-एकात्म भावना में बदरीनाथ केदारनाथ से लेकर कन्याकुमारी को, काशी से रामेश्वरम द्वारका से पुरी को जोड़ रखा है। जगद्गुरु श्री शंकराचार्य ने भारत के चारों दशाओं में चार पीठों की स्थापना की। तुलसी के अयोध्यावासी राम रामेश्वरम में शिव की उपासना करते हैं।

धार्मिक स्तर पर भी समन्वय की भावना भारतीय संस्कृति की महान उपलब्धि है। भारतीय वाडमय भी सांस्कृतिपरक है। डॉ. पी. राघवन ने अपनी भारतीय साहित्य रत्नमाला पुस्तक मे बताया है- भारत की प्रादेशिक भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य के प्रथम प्रयास संस्कृत के अनुवाद मात्र ही थे। ये सभी भाषाएँ शब्दराभि, दार्शनिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमि, विषयवस्तु और साहित्यिक शैलियों के लिए संस्कृत पर ही पूरी तरह आश्वित थी।

यह कथन सर्वथा सत्य है हमारे देश की प्राकृत, पालि अपभ्रंश, ब्रज अवधी राजस्थानी भाषाएँ ही यहीं अपितु बांगला, मराठी, गुज़राती, तेलगु, कन्ड़, मलयालम आदि इतर भाषाएँ भी अपनी साहित्यिक संपदा के लिए किसी न किसी रूप में संस्कृत पर आधारित रही हैं अर्थात् समस्त भारतीय भाषाएँ संस्कृत वाडमय से अनुप्राणित हैं। महर्षि वाल्मिकी कृत आदि काव्य रामायण से लेकर व्यास प्रणीत महाभारत, भागवत इत्यादि काव्य-ग्रंथों के साथ भास, बाणभट्ट, हर्ष, कालिदास आदि के द्वारा विरचित साहित्य भारतीय भाषाओं में रूपांतरित है और उसके विभिन्न उपाख्यानों के आधार अपने पाडमय भण्डार को संपन्न कर चुकी है और यह क्रम भी जारी है।

अलावा इसके संस्कृत में भारती दर्शन, वेदांत, उपनिषद, तर्क, व्याकरण, न्याय रसायन, इतिवास, चिकित्सा, अर्थशास्त्र, नीतिशास्त्र, ज्योतिष, गणित, धनुर्वेद, मीमांसा, पुराण इत्यादि ज्ञान-विज्ञान संबंधी समस्त साहित्य उपलब्ध है जिसका रूपांतर समस्त भारतीय भाषाओं में हुआ है और ये सारी  क्षेत्रीय भाषाएँ उपरोक्त वाड:मय के लिए केवल संस्कृत पर ही प्रारंभ में आधारित रहीं जिसमें हमारी संपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा अक्षुण्ण है। अर्थात् संस्कृत भारतीय संस्कृति की स्त्रोत भाषा रही है और संस्कृत साहित्य उसका मूलाधार रहा है।

दरअसल किसी देश की सभ्यता एवं संस्कृति के विकास में उस देश या राष्ट्र की भाषा अहम् भूमिका रखती है। वैदिक युग से लेकर मुगल एवं अँग्ररेज़ों के आगमन तक भारत का इतिहास भाव्य रहा है। इस महान देश की सभ्यता की तूती सारे विश्व में बोल रही थी। भारत सभी क्षेत्रों में अ ग्रिम पंक्ति में था। रोम, ग्रीक आदि देशों के साथ भारत का व्यापार आदि वाणिज्य के क्षेत्रों में गहरा संपर्क था। बौद्ध एवं जैन युगों के समय में भारत की शिल्प स्थापत्य, चित्रकला एवं काष्ठकला चरमसीमा तक पहुँच चुकी थी। विदेशों से विद्यार्थी यहाँ के तक्षशिला, नालन्दा तथा विक्रम शिला के विश्व विद्यालयों में शिक्षा पाने हेतु आया करते थे। यहाँ की राज दरबारों में विदेशी राजदूत नियुक्त थे। मेगस्थनीस, टालमी, विदेशी यात्रियों ने हमारे देश का भ्रमण करके जो यात्रा वृतान्त लिखे हैं, उससे हमारे देश के प्राचीन वैभव एवं संस्कृति का भली भाँति पता चलता है। ईस्वी पूर्व पाँचवी शती से लेकर ईस्वीं दसवीं शताब्दी तक भारत के क्षेत्रों में स्पृहणीय विकास को प्राप्त था। इस प्रकार हमारे देश के चतुमुखी विकास में भाषा एवं साहित्य अगुणी भूमिका निभा रहे थे। दो हजार वर्ष पूर्व भारत में जहाँ न्यायी एवं पराक्रमी सम्राट विक्रमादित्य का वैभवपूर्ण  शासन था, चन्द्रगुप्त जैसे प्रतापी और चाणक्य जैसे कुशल राजनीतिज्ञ विश्व के इतिहास में दुर्लभ हैं। महामात्य चाणक्य ने राज्य व्यवस्था चलाने के लिए अर्थशास्त्र, नाम से एक अद्भुत राजनीति शास्त्र का प्रणयन किया था, जिससे भारत की शानदार राज्य व्यवस्था का पता चलता है। परन्तु यवनों के आक्रमण के पश्चात् क्रमश: हमारे शास्त्र वाड:मय  एवं कलाओं के विकास का मार्ग अवरूद्ध हुआ। अँग्ररेज़ों के आगमन के साथ हम अपने धर्म-कर्म को भी भूल बैठे और पाश्चात्य रंग में रंगने लगे। लार्ड मेकाले ने भारत में शासन तंत्र एवं शिक्षा का माध्यम अँगरेज़ी बनाने के सिफ़ारिश करके भारतवासियों को इंग्लैण्ड का बौद्धिक  गुलाम बनाया। आज हम उसी भाषा के चश्मे से दुनिया को देखते हैं और अपनी अस्मिता को खो बैठे हैं। हमारे देश की सुद्र भाषाओं पर हमारा विश्वास नहीं रहा। पाश्चात्य सभ्यता के प्रवाह में बहते हुए भाषा के स्तर पर पराश्रित बन गये हैं। कुछ लोगों का विश्वास है कि विश्व का समस्त ज्ञान-विज्ञान एवं प्रतिभा कौशल केवल अँगरेज़ी भाषा में सुरक्षित है। यह उनकी गलत धारणा है। पुरातत्व  फलां संगीत चित्रकारी इत्यादि विषयों में फे्रंच भाषा में जैसा समृद्ध साहित्य उपलब्ध है, वैसा साहित्य अँगरेज़ी में नहीं है फिर हम लोग अँगरेज़ी के बैशाखी पर चलते में गौरव तथा वर्ग का अनुभव करते हैं जब कि यथार्थ में रूसी, जापानी, जर्मन, फ्रेंच एवं फारसी भाषाएँ भी कम समृद्ध नहीं है। इन भाषओं  में प्रचुर मात्रा में ज्ञान-विज्ञान का साहित्य रचा गया है और महत्वपूर्ण  अनुसंधान हुआ है। उनकी संस्कृति परंपरा इन भाषाएं में अक्षुण्ण है और आज वैश्विक स्तर पर ये देश व्यापर वाणिज्य कला संस्कृति तथा विज्ञान के क्षेत्रों में अग्रिम पंक्ति में है। ये देश किसी भी हानि से अँगरेज़ी के मुंह ताज नहीं है। फिर भारत क्यों अँगरेज़ी का मुखापेक्षी है। यह हमारी मानसिक दासता का द्योतक है।

प्रजातंत्रीय राष्ट्र के चार अनिवार्य तत्वों में- संविधान राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्रगीत के साथ राष्ट्रभाषा भी नितांत आवश्यक है। साथ ही किसी भी राष्ट्र पर किसी विदेशी भाषा को थोपना आधुनिकता के मूलभूत सिद्धांतों के विरूद्ध है। वास्तव में यदि किसी राष्ट्र  पर जब कोई विदेशी भाषा हावी होने लगती है तभी उस राष्ट्र की संस्कृति का हास ने लगता है। किसी जाति के पूर्वजों द्वारा विचार एवं कर्म के क्षेत्र में अर्जित श्रेष्ठ संपत्ति उसकी संस्कृति होती है। वह संस्कृति उस जाति की भाषा के माध्यम से जीवित रहती है। सदियों से कोई भी जाति अपने जो मूल्य एवं आदर्श अपने अनुभव श्रमनिष्ठा चिन्तन मेधा समझ, विवेक द्वारा स्थापित करती है। उस जाति की संस्कृति मानी जाती है। भाषा संस्कृति की वाहिका होती है। अर्थात् संस्कृति की आधारशिला उस जाति की भाषा होती है। इसलिए संस्कृति भाषा पर टिकी होती है। इस प्रकार भाषा और संस्कृति का अविभाज्य संबन्ध है।

आज हमारे देश और विदेशों में भी हमारी संस्कृति खतरे में फँसी हुई है। विरासत को भूल बैठे हैं और अंधाधुंध पाश्चात्य भाषाओं साहित्य, कला, रहन-सहन आचार-विचार, संप्रदायों का अनुकरण करते जा रहे हैं, पाश्चात्य सभ्यता के आदर्श एवं मूल्य भौतिक सुख-सुविधाओं पर टिके हुए हैं और बौद्धिक विकास को प्रश्चय देते है। जबकि हमारे आदर्श एवं मूल्य निशुद्ध अध्यात्मपरक हैं। यह आदर्श तथा मूल्य भारतीय भाषाओं में सुरक्षित हैं। अब विदेशों में हमारे प्रवासी भारतीय अपनी भाषा संस्कृति, आदर्श एवं मूल्यों के प्रबल समर्थक होते हुए भी विदेशी भाषा को अपनी आजीविका तथा वैज्ञानिक उन्नति का स्त्रोत एवं साधन मानकर उसकी उपासना में लगे हुए हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अब आत्म विश्लेषण करना होगा कि हम मूलत: भारतीय हैं और भारत गणतंत्र की राजभाषा, संपर्क भाषा एवं राष्ट्रभाषा हिन्दी की उपेक्षा करना उचित नहीं हैं। यह जागृति व चेतना पुन: हिन्दी के उत्थान में सहायक सिध्द होगी।

आज वैश्विक स्तर पर हिन्दी को एक प्रकार से मान्यता प्राप्त हो चुकी हैं। दूतावासों के माध्यम से ही नहीं अनेक विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पठन-पाठन तथा अनुसंधान की व्यवस्था हो चुकी है। हिन्दी भाषा भाषी ही नहीं, अन्य समस्त भारतवासी विदेशों में निवास करते हुए यह अनुभव करते हैं कि वे अपनी संस्कृति व अस्मिता खोते जा रहे हैं, यह अनुभव और आत्मविश्लेषण हिन्दी को अपनाने तथा जीवित बनाने रखते का शुभ संकेत है। यत्र-तत्र वे हिन्दी को द्वितीय भाषा के रूप में पाठशालाओं में पढ़ाने की व्यवस्था कराने के लिए आकुल-व्याकुल हैं।

मेरी समझ में विदेशों में हिन्दी को स्थापित करने तथा उसके उत्थान के उपायों हो सकते हैं :

1.     प्रत्येक परिवार में माता-पिता या अभिभावक अपनी मातृभाषा या हिन्दी में ही वार्तालाप करें और बच्चों के साथ घर में सदा-सर्वदा हिन्दी में ही बोले अर्थात हिन्दी का वातावरण बनाये रखें।

2. प्रवासी भारतीय विदेशों में जहाँ भी रहें, जिस स्थिति में भी रहें, भारतीय संस्कृति के आदर्शों  तथा मूल्यों से पूर्ण साहित्य का पठन-पाठन करें व करायें।

3. विदेशों में बच्चों के लिए हिन्दी पाठशालाओं में हिन्दी पढ़ाने का प्रबंध करावें। चाहे द्वितीय या तृतीय भाषा के रूप में ही क्यों न दो पाठयक्रम में स्थान दिलावें।

4. भारतीय बहुल नगरों शहरों व कस्बों में हिन्दी ग्रंथालय तथा वाचनालय स्थापित करें, प्रमुख पत्रिकाएँ मंगवाकर सब को सुलभ करावें। हिन्दी में रचित उत्तम साहित्य तथा विज्ञान संबंधी पुस्तकें मंगवायें अथवा दूतावास के माध्यम से उपलब्ध करावें।

5. भारतीय पर्व व त्यौहार अवश्य निष्ठापूर्वक मनाकर उनके महत्व पर व्याख्यानों का आयोजन करें।

6. हिन्दी की विविध विधाओं पर प्रतियोगिताएँ चलाएँ तथा विजेताओं  को पदक पुरस्कार प्रदान कर प्रोत्साहित करें।

7. समय-समय पर गोष्ठियों, परिसंवादों, समारोहों, सम्मेंलनों तथा सभाओं का आयोजन करके अपने ज्ञान की वृद्धि करें और हिन्दी भाषा के प्रतिममत्व आकर्षण तथा श्रद्धा-भाव पैदा करें।

8. विभिन्न भारतीय भाषाओं तथा साहित्यों के आदान प्रदान-अनुवाद इत्यादि का प्रबंध हो। ताकि विभिन्न भाषा भाषी भारतीयों के बीच सद्भाव, सौमनस्य एवं सौजन्य के अंकुर फूटे।

9.  पिकनिक, सांस्कृतिक कार्य भी संगीत, नृत्य नाटक एवं चित्रकलाओं के प्रदर्शन भी हिन्दी के उत्थान में सहायक हो सकते हैं।

10.  इन सब से बढ़ कर महत्वपूर्ण कार्य यह होना चाहिए कि दादी-नानी के माध्यम से ही नहीं, माता-पिता तथा भारतीय समाज के लोग भारतीय साहित्य, कला, वैभव, इतिहास आदि का बच्चों के बोध करावे तथा अपनी मातृभूमि प्रति श्रद्धा-भक्ति उनके हृद्यों में  उदित हो सके।   तेलुगु के महा कवि आचार्य रायप्रोलु सुब्बाराव ने अपने एक राष्ट्रीय गीत में यह उद्बोधन किया है-

(देश मेगिनाएवं कालिडिना, पोगडरा भी तल्ली भूमि भारतीनी। अर्थात् तुम किसी भी देश में जाओ, जहाँ भी कदम रखें, अपनी मातृसदृश भारत भूमि की प्रस्तुति करना न भूलो।)

अब रहा, भारत के भीतर हिन्दी के उत्थान का प्रश्न-हिन्दी तो संवैधानिक स्तर पर 26जनवरी 1956 से ही भारत की राजभाषा का स्थान व गौरव प्राप्त कर चुकी है। अँगरेज़ी सहभाषा के रूप में व्यवहत्त होनी चाहिए थी परंतु आज भी उसका वर्चस्व सर्वत्र स्थापित है। यह हमारी मानसिकता की गुलामी का प्रतीक है। गृह मंत्रालय द्वारा हिन्दी को क्रमश: शासन तंत्र में अर्थात प्रशासन में प्रवेश कराने के प्रयत्न दशकों से हो रहे हैं, जो संतोष जनक नहीं है वैसे 1965 में तत्कालीन प्रधान मंत्री स्वर्गीय श्री लालबहादुर शास्त्री की अध्यक्षता में संपन्न मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में सर्वसम्मति से सभी राज्यों में त्रिभाषा सूत्र अमल करने का निश्चय हुआ था- प्रथम भाषा- मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, द्वितीय भाषा हिन्द या तृतीय भाषा के रूप में अँगरेज़ी पढ़ाई जाए। दक्षिण के आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक एवं केरल ने ईमानदारी के साथ इस सिद्धांतों पर अमल किया परंतु शेष राज्यों ने या तो आंशिक रूप में अनुपालक किया अथवा उपेक्षा की। इस क्रम से हिन्दी वास्तव में राजभाषा के पद पर सही मान में कभी स्थापित नहीं हो सकती। इसके दो ही उपाय है- एक तो यह है कि अँगरेज़ी के समान हिन्दी में उत्तीण स्नातकों को नौकवियों में प्राथमिकता दी जाए। यह प्रावधान शासन के स्तर पर विधयक द्वारा होना चाहिए। क्योंकि हिन्दी को आज भावना के स्तर पर नहीं, रोजी-रोटी के साथ जोड़ना होगा। तब झखमार कर तब लोग हिन्दी पढ़ेंगे-सारे देश का समर्थन हिन्दी को प्राप्त होगा और अँगरेज़ी अपने आप छूट जाएगी। दो -संसद में यह प्रस्ताव पारित करना चाहिए कि पाँच या छ: वर्ष की अवधि तक भारत में प्रशासन में अँगरेज़ी का प्रचलन होगा। तत्पश्चात केवल मात्र हिन्दी का प्रचलन होगा अन्यथा हमारी संकल्पना कभी आचरण में साध्य न होगी।

हमारे रासू के मनीषी विद्वान स्वर्गीय डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने सही कहा था कि भारतीय वाङमय एक है और यह विभिन्न भाषाओं में सृजित है। यह हमारी एकात्मता का द्योतक है साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि हमें भारतीय अध्यात्म को पूर्ण रूप  में बनाये रखते हुए पश्चिम के वैज्ञानिक उन्मेष को भी अपनाना होगा। तभी हमारा भौतिक एवं अध्यात्मिक स्तर पर समग्र विकास संभव है। परंतु आज हम भारतीयों में कथनी-करनी में बहुत बड़ा अंतर आ गया है। परिणाम स्वरूप हम इस  संक्रांति काल से गुज़र रहे हैं। इस ओर हिन्दी के महा कवि, कामायनी कार  श्री जयशंकर प्रसाद ने संकित किया था-

ज्ञान दूर कुछ, क्रिया भिन्न है, इच्छा पूरी हो मन की; एक दूसरे से न मिल सके, यह विडम्बना है जीवन की। आइये, हम इस विडंबना पर विजय प्राप्त करें तथा महात्मा गाँधी के इस कथन को-

एक राष्ट्रभाषा हो भारत की।

 एक हृदय हो भारत जननी।  सार्थक बनाने का संकल्प करें और  उसे पूर्ण रूप में आचरण  में लावें।

हिंदी में वैज्ञानिक-तकनीकी शिक्षण और चुनौतियाँ[सम्पादन]

हिन्दी अपनी वैश्विक पहचान बनाने की दिशा में तेज़ी के साथ बढ़ रही है। लेकिन तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षण की दिशा में अनेक स्तुत्य प्रयासों के बावजूद अभी भी बहुत कुछ करना शेष है। चीन, जापान, जर्मन,फ्रांस और रूस जैसे अनेक देशों में राष्ट्रभाषा में कर सका है। हमारे यहाँ अँगरेज़ी का रोना रोया जाता है। गुलामी एक बड़ा कारण रही है। आज भी हमारा तंत्र अँगरेज़ी के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल सका है। इसीलिए यह कह दिया जाता है, कि यहाँ हिन्दी में तकनीकी या वैज्ञानिक शिक्षण नहीं हो सकता । जबकि ऐसा बिल्कुल नही हैं। हमारे भाषाविदों ने इस चुनौती को स्वीकार करके वर्षों पहले इस दिशा मे महत्वपूर्ण कार्य शूरू कर दिया है। डॉ. रघुवीर और उनके जैसे बहुत से लोंगो ने शुरुआत की, तो अरविंदकुमार जैसे एकनिष्ठ महानुभावों ने उस कार्य को और आगे बढ़ाया । लेकिन दिक्कत यही है कि तकनीकी शिक्षण के नाम पर जो अनुवाद हो रहा है, जो शब्द गढ़े जा रहे हैं, वे इनते क्लिष्ट हैं, कि उनको ग्राह्रा कर पाना संभव नहीं हो पा रहा। चुनौती यही है, कि हमारे भाषाविद् अँगरेज़ी के बरक्स ऐसे नए-नए शब्द सर्जित करें, जो  बेहद आसान किस्म के हों। राजभाषा के रूप मे ही अनेक शब्दों की सर्जना हुई है, वही लोगों के समझ में नहीं आते। वे उच्चारण की दृष्टि से भी बेहद कठिन हैं। फिर भी उन्हें प्रचलन में लाने की कोशिश हो रही है, जबकि शिक्षण के लिए सरल शब्दों के लिए और अधिक कठिन साधना ज़रूरी है। एक तरफ़ पूरा मीडिया हिंग्लिश अथावा हिंगरेज़ी नामक नई भाषा विकसित करने पर तुला हुआ है, दूसरी तरफ़ उत्तरआधुनिकता का राग अलापने वाले लोग हैं, जो ऐसी ही वर्णसंकर भाषा पसंद कर रहे हैं। यह अगर एक नई सर्वमान्य संस्कृति होती, तो भी उसे स्वीकृति मिल सकती थी, मगर यह तो विशुद्ध रूप से अपसंस्कृति है। इसे कैसे आत्मसात किया जा सकता है ?  ऐसे विद्रूप समय में हिन्दी की वैज्ञानिक शिक्षा के मार्ग में चुनौतियाँ हैं । फिर हिन्दी हिन्दी है। संभावनाओं का ऐसा द्वार जो सर्जनात्मकता के लिए सदैव खुला रहता है।   स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हिन्दी को निरंतर समृद्ध बनाने की दिशा में भाषाविदों अपनी जवानी होम कर दी। आज भी कुछ लोग अपना बुढापा होम कर रहे हैं। इन सबके प्रयासों से ही हिन्दी की तकनीकी शिक्षण का मार्ग प्रशस्त हुआ है। हिन्दी में अनुवाद के रूप में या अनुसंधान के रूप में अनेक नए शब्दों की सर्जना हुई है, हो रही है, लेकिन अधिकांश मामले में उसकी बुनावट जटिल है, इसे स्वीकारना होगा । शब्द गढ़ने के नाम पर कई बार असफल प्रयास हुए हैं। लोक प्रचलित हो चुके अँगरेज़ी के शब्दों के कठिन अनुवाद अब ग्राह्रा नहीं हो सकते । टाई के लिए कंठलंगोट और कंठभूषण अथवा सिगरेट के लिए श्वेत धूम्रपान दंडिका जैसे शब्द मजाक बन कर ही रह गए। कुछ शब्दों को तो जस का तस आत्मसात करना होगा, मगर जो अन्य शब्दावलियाँ हैं, उनकी सरलता पर काम करने की ज़रूरत है। टेक्निकल को तकनीकी बनाकर हमने उसे लोकप्रिय कर दिया। रिपोर्ट को रपट किया । अल्टीमेटम को अंतिमेत्थम कहा। अलेक्जेंडर सिकंदर बना। अरिश्टोटल अरस्तू हो गया, और रिक्रूट रंगरूट में बदल गया। कई बार भाषाविदों का काम समाज भी करता चलता है। जैसे मोबाइल को चलितवार्ता भी कहा जाता है। भाषाविद् प्रयास कर रहे होंगे कि इस शब्द का सही अनुवाद सामने आए । कोई सरल शब्द संभव न हो सके तो मोबाइल को ही गोद लेने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। पराई संतानों को स्वीकार करके हम उनके नए नामकरण की कोशिश करते हैं लेकिन हर बार सफलता मिल जाए, यह ज़रूरी नहीं।

हिन्दी की तकनीकी शब्दावली को समृद्ध करने के लिए यह अति आवश्यक है कि हम सरल अनुवाद की संस्कृति को प्रोत्साहित करते रहें। अनुवाद ही वह सर्वोत्तम प्रविधि है, जो हिन्दी के तकनीकी शिक्षण का आधार बनेगी। अनुवाद एक पुल है, जो दो दिलों को, दो भाषिक संस्कृतियों को जोड़ देता है। हिन्दी की तकनीकी या वैज्ञानिक-चिकित्सकीय शिक्षण में अनुवाद का अप्रतिम योगदान रहेगा। अनुवाद के सहारे ही विदेशी या स्वदेशी भाषाओं के अनेक शब्द हिन्दी में आते हैं और नया संस्कार ग्रहण करते हैं। कोई भाषा तभी समृद्ध होती है, जब वह अन्य भाषाओं के शब्द भी ग्रहण करती चले। हिन्दी में शब्द आते हैं और नया संस्कार ग्रहण करते हैं। हिन्दी भाषा में आकर अँगरेज़ी के कुछ शब्द समरस होते हैं, तो यह खुशी की बात है। लेकिन इस चक्कर में हमारे मूल शब्द ही हाशिये पर चले जाएँ, तकनीकी शब्दावली सरल होगी, तभी स्वीकार्य होगी। वरना सारी शब्दावलियाँ पुस्तकों तक ही सीमित होकर रह जाएँगी । या फिर उनका हश्र भी संस्कृत भाषा की  तरह हो जाएगा। व्यवहार में अँगरेज़ी ही चलती रहेगी। अनुवाद पत्रिका सदभावना दर्पण का प्रकाशन करते हुए मैंने महसूस किया कि पत्रिका में जो कविता या कहानी सरल भाषा में अनूदित हुई, उस पर तो पाठकीय प्रतिक्रियाओं की भरमार रही, मगर जिन रचनाओं के अनुवाद क्लिष्ट थे, उन पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आई। इक्का-दुक्का अगर आई भी, तो यही कहा गया, कि सरल अनुवाद पर ध्यान दें।

पिछले कुछ वर्षों में नए-नए शब्द-संसार से गुज़रते  हुए बहुतों ने यह महसूस किया कि हिन्दी के तकनीकी शिक्षण में फिलहाल सबसे बड़ी दिक्कत यही है, कि जो नए-नए शब्द गढ़े जा रहे हैं, वे तत्सम-प्रकृति के हैं और क्लिष्ट भी हैं। उनमे सरलीकरण का खाँटी अभाव है। जैसे समय के साथ-साथ शब्द भी आसान होते चलते हैं, तद्भवी रूप लेते रहते हैं, उसी तरह तकनीकी शब्दों को भी थोड़ा आसान बनाना होगा। जिव्हा से जीभ, वृच्श्रिक से बिच्छू, अक्षि से आँख, स्तन से थन, कोकिल से कोयल और इंतकाल का रूपांतरण अंतकाल सचमुच  सरल और व्यावहारिक लगता है। लेकिन संस्कृत या अंगरेजी़ के कुछ शब्दों का हिन्दीकरण करने के चक्कर में उसे और ज़्यादा क्लिष्ट बना देना अन्याय ही है। जैसे अपमार्जिका को अपमार्जक जंतु, उरका को सरीसृप जीव कहना मूल शब्द से एक तरह का खिलवाड़ ही लगता है। संस्कृत के अतिचित्र को कैरिकेयर और प्रक्षेपित्र को प्रोजक्टर के विकल्प रूप में रखना तो सुखद लगता है, मगर मीसोन को मध्योण, पोजीट्रोन को धनोण, न्यूट्रोन को नपुंसोण और ऐक्स क्रोमोसोम का अक्षसोप या अक्षोम नामकरण शिक्षण को और दुरूह कर देगा। बेहतर यही होगा कि हम वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षण के लिए सरल एवं ग्राह्म हो सकने वाले शब्दों की ही सर्जना करें। जैसे गलूकोज को मधुरोस, प्रोटीन को प्रोथीन, चार्जिक को चार्जन करना ज़्यादा व्यावहवारिक एवं ग्राह्म प्रतीत होता है।

मूल्य शब्दों से परे जाकर अनुवाद करना और और मूल शब्द से मिलते-जुलते शब्दों की सर्जना में अंतर है। शब्दकोश की समृद्धि के लिए दुरूह प्रयोग ठीक हो सकते हैं, लेकिन शिक्षण की दृष्टि से देखें तो ये कतई उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकेंगे । जैसे प्रक्षालित्र, उत्थापित्र, प्रोत्थापित्र, प्रदोलित्र, संरोधित्र, श्यानित्र जैसे शब्द लाख कोशिशों के बावजूद छात्र ग्राह्म नहीं कर पाएँगे। इससे बेहतर तो यही होगा कि हम अँगरेज़ी के शब्दों को ही जस का तस रख दें, या फिर रुपांतरण इतना आसान बनाएँ, कि अटपटा न लगे। फ्रिजर का अनुवाद श्यानित्र, एयरकूलर का शीतित्र अथवा वातानुशीतित्र तथा इनवाइटर को इग्रित्र कहना अटपटा प्रयोग लगता है। ऐसा करके हम छात्रों को शिक्षण ही नहीं, हिन्दी से भी दूर ले जाएँगे। एयरकूल का वातानुकूल तो ठीक है, लेकिन यह भी स्वीकारना होगा, कि हर युग में और हर कहीं केवल सरलता ही स्वीकार्य होती है। वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में रची गयी रामायण संस्कृत के विद्वान तो समझ पाए, लेकिन वह आम लोगों से दूर ही रही, लेकिन जैसे ही तुलसीदास जी ने रामचरित मानस की अवधी जैसी खड़ी बोली में, सर्जना की, तो वह देखते ही वैश्वीक हो गई।

विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षण के लिए गढ़े जाने वाले शब्दों के साथ भाषाविद् इस बात का भी ध्यान रखें, कि उसे लोक-स्वीकृति मिले। नए तकनीकी शब्द अगर किताबी बन कर रह गए, तो उनकी उपादेयता क्या रहेगी ? वे हमारे जीवन के भी अनिवार्य हिस्से क्यों न बनें ? नित नए शब्दों के सर्जक दिन-रात एक कर रहे हैं। लैंस को चंद्रक, कार्डियल को हृदयल, पैथसिन के लिए जठरिन, एयर कन्वेटर के लिए परिवत्र या संवाहित्र, और इंक्केरी के लिए परिपृष्टा जैसे शब्दों की सर्जना वंदनीय है लेकिन यह ग्राह्रा नहीं हो सकते। अगर हम ऐसे शब्दों के सहारे शिक्षण करने की तैयारी कर रहे हैं, तो छात्र दूर होते जाएँगे। सरलीकरण का ध्यान रखते हुए शब्द-संधान हो। ऐसे शब्द तैयार हों, जो पानी की तरह बहते हों। नए सृजित शब्दों के अधिकांश उदाहरण मैंने अरविंदकुमार जी के समांतर कोश से ही लिए हैं। अरविंदकुमार जी ने अपनी धर्मपत्नी के साथ मिल कर निसंदेह युगांतकारी काम किया है। हिन्दी साहित्य उनका ऋणी है, लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से उनके अनेक शब्द शायद अप्रचलित ही रह जाएँगे । शिक्षण-प्रशिक्षण की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध नहीं हो पाएँगे। जिस तरीके के शब्द सामने आ रहे हैं, उसे देख कर ही यह माना जाने लगा है कि हमारे यहाँ भी हिन्दी में तकनीकी शिक्षण सर्वाधिक जटिल का है।

भूमंडलीकरण के इस दौर में एक भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द भी सहज रूप से समरस होने लगे हैं। यह वैश्वीकरण की दिशा में रचनात्मक पहल है। आक्सफोर्ड शब्दकोश में पक्का, अचार, गंगा, पंडा, हिन्दी, पंडित जैसे अनेक शब्द शामिल हो चुके हैं। तब हम अँगरेज़ी के बेहद प्रचिलत शब्दों का शिक्षण में इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकते ? शब्दों की नई संरचनाएँ स्वागतेय हैं, मगर वे पर्यायवाची के रूप में ही रहें। जैसे ब्लैकहोल को कालत्र कहना या विटामिन के लिए जीवामिन शब्द बनाना ठीक है, लेकिन समीचीन यही होगा, कि हम ब्लैकहोल और विटामिन का ही व्यवहार करते रहे, क्योंकि ये शब्द अब बेहद प्रचलित हो गए हैं। एयरकूल एयरकूल ही ठीक है। इसे वातानुशीतित्र करने से गरमी बढ़ सकती है। मानसिक शीतलता दृष्टि से कठिन शब्दावलियों से परहेज भी ज़रूरी है। तभी तकनीकी शिक्षण सफल हो पाएगा। (क्रमश...) अनेक उदाहरणों को देखने के बाद मैं यह मानता हूँ कि हिन्दी में तकनीकी- वैज्ञानिक शिक्षण के लिए नए सिरे सोचने की ज़रूरत है। क्लिष्टता ही विद्वता का पर्याय नहीं है। सरलता ही सर्वकालिक होती है। इस दृष्टि से हिन्दी में नई शैक्षणिक प्रविधि विकसित करने की ज़रूरत है। अंतरजाल (इंटरनेट) के माध्यम से हिन्दी वैश्विक होती जा रही है। अब उसे शिक्षण-प्रशिक्षण की सार्थक भाषा बनाने के लिए नई परियोजनाएँ बनानी होंगी। बन भी रही हैं। शब्दावली आयोग तो 1961 से ही इसी काम में प्राणपण से सक्रिय है। आयोग ने अब तक लगभग पाँच लाख पारिभाषित शब्दों का जाल-सा बिछा दिया है। मानविकी, विज्ञान, प्रशासन आदि से जुड़े हजारों नए शब्द तैयार हुए। यह अभूतपूर्व काम है। भाषाविदों को भी अलग-अलग मोर्चों पर काम करना पड़ेगा। शर्त यही है, कि अनुसंधान एवं सर्जना के लिए सरल भाषा में ही वैकल्पिक शब्दों की संरचना हो। वह आम बोलचाल की भाषा भी न हो, लेकिन कम से कम ऐसी तो हो, कि विद्यार्थी उसे आसानी से समझ और उच्चारित कर सकें।

अपने समय के महान भाषा विज्ञानी डॉ. रघुवीर, डॉ. भोलानाथ तिवारी, हरदेव बाहरी, फादर कॉमिल बुल्के आदि ने हज़ारों शब्द सर्जित किए थे। डॉ. रघुवीर ने डेढ़ लाख पारिभाषिक शब्दों का भारी-भरकम कोश तैयार किया था। उन्होंने अँगरेज़ी के अनेक शब्दों के हिन्दी अनुवाद किए, नए शब्द भी गढ़े, मगर तत्सम रूपों के कारण उन्हें स्वीकृति नहीं मिल सकी, लेकिन उन्होंने युगांतकारी काम किया था, वे शुद्धतावादी थे अब केवल संस्कृतनिष्ठ शब्दों से काम नहीं चलेगा। हमें भारतीय भाषाओं के सहारे शब्दों की रचना करनी होगी। डॉ. रघुवीर के काम को जी-तोड़ श्रम करने वाले अरविंदकुमार जी आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन अनेक शब्द व्यावहारिकता के निकष पर खरे नहीं उतर सके हैं। अभी और मेहनत करनी होगी और विज्ञान-तकनीकी शिक्षण के लिए दुरूह शब्दों के साथ-साथ मूल शब्द भी प्रचलन में रखना होगा। धीरे-धीरे ही सही, क्लिष्ट शब्द भी हमारे शैक्षणिक जीवन के हिस्से बन जाएँगे। ज़रूरत इस बात की है, कि नए शब्द  पर्यायवाची रूप में निरंतर प्रचलन में रहें। इस बात का ध्यान भी रखना होगा, कि अपनी भाषा की श्रेष्ठता का दंभ न पाला जाए। अन्य भारतीय भाषाओं से भी शब्द लेने की कोशिशें हों। संस्कृत को देववाणी कह दिया जाता है। महाराष्ट्र के महान संत नामदेव इसीलिए तो पूछते हैं, कि संस्कृत अगर देववाणी है तो मराठी क्या चोरवाणी है ? दरअसल अस्मिता के नाम पर हमारे हिन्दी विद्वान कुछ ज़्यादा ही भावुक और शुद्धतावादी हो गए। यही भावुकता शिक्षण-प्रशिक्षण में बाधा बन रही है।

हिन्दी का बृहत्तर समाज अब वैश्विक होता जा रहा है, इसलिए वह शिक्षण के मामले में भी उदार बने। हिंग्लिश या हिंगरेज़ी या अँगरेज़ी का तेज़ी से विस्तार हो रहा है। यह इस बात का प्रतीक है, कि वर्जनाएँ टूट रही हैं। शुद्धता अब कोई अहम् मुद्दा नहीं। अब तो जो हमारी सेवा में तैनात है, उसकी भाषिक प्रविधि को ही निखारने की ज़रूरत है। अँगरेज़ी हमारी जीवन शैली का हिस्सा बनती जा रही है। ऐसे समय में अगर कुछ यौगिक शब्द बनें या अँगरेज़ी शब्दों की सरल अनुसर्जना हो, तो यह स्वागतेय है। जेल-खाना, रेल-गाड़ी, रेलवे, प्लेटफार्म, बस स्टैंड, शेयरधारक, आदि को हम हिन्दी को हम हिन्दी मानकर चलें। रेडियो, टीवी, भाषा के मामले में हम सर्वग्रह्म प्रवृत्ति के संत बन कर यौगिक एवं सरल शब्दों को प्रोत्साहित करें। ग.मा. मुक्तिबोध ने कहा था, कि राष्ट्रभाषा वही है जिसकी पहुँच ज़्यादा आदमियों तक रहे। किंतु हम तो हिन्दी की प्रेषणीयता को ही ख़त्म करने जा रहे हैं। बात बिल्कुल सही है। दुरूह शब्दों को परोसने की कोशिश प्रकारांतर से हिन्दी की प्रेषणीयता को ख़त्म कर देगी।

भाषिक संरचना की दिशा में निरंतर अनुसंधान हो रहे हैं इसलिए विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षण की शब्दावलियों  के बारे में आम राय यही है कि उनके लोकव्यापीकरण पर ध्यान दिया जाए। जैसे प्रजनन सरल लगता है, मगर उस प्रवर्णन कितना कठिन हो जाएगा। एल्फा के लिए अकाराणु, कन्वैक्टर के लिए पंखित्र जैसे शब्द उचित-से प्रतीत नहीं होते। मेरे ख्याल से हारमोन को हारमोन ही रहने दिया जाए। कन्वेक्टर अगर कन्वक्तर भी हो जाए तो चल सकता है। जैसे रिपोर्ट का रपट हो गया। कार्डियल को हृदयल अनुवाद हृदयग्राही है। ज्ञापन, परमाणु, अणु, रेडियोएक्टिवता, अधीक्षक, निगम, मुदा-स्फीति, प्रायोजित अनुवांशिकी, डाक्टर, इंजीनियर, जैसे अनेक शब्द हैं, जो धीरे-धीरे जीवन में घुल-मिल रहे हैं। मगर लाइटर के लिए प्रज्वलित्र कठिन है। उजालक जैसे विकल्प पर विचार किया जाए। कम्प्यूटर के माउस को माउस ही रहने दें। उसे चुहा न बनाएँ।

बहरहाल, हिन्दी में तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षण शिक्षण की दिशा में जो भगीरथ प्रयास हो रहे हैं, वे विफल नहीं हो सकते। वह दिन दूर नहीं जब हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी में संपूर्ण तकनीकी शिक्षण शुरू हो जाएगा। बस, हमें  अँगरेज़ी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं को भी खंगालना होगा। वहाँ भी हमें अँगरेज़ी के पर्यायवाची शब्द मिल सकते हैं। उर्दू या कहें कि हिंदुस्तानी भाषा के उनके शब्द लिए जा सकते हैं । दक्षिण की भाषाओं के भी शब्द तलाशे जा सकते हैं। प्रख्यात व्याकरणाचार्य किशोरीदास वाजपेयी कहते थे, कि हिन्दी को तो अंतर-प्रांतीय व्यावहार का माध्यम स्वीकार करना है। अँगरेज़ी भाषा के लदे रहने से प्रांतीय भाषाएँ नहीं दबीं, तब हिन्दी से क्या दबेंगी ? हिन्दी के सहयोग से तो वे अत्यधिक विकसित होंगी। महावीरप्रसाद द्विवेदी जी कहते हैं, कि हिन्दी भाषा जीवित भाषा है। जो लोग उसे किसी परिमित सीमा के बीतर ही आवद्व करना चाहते हैं, वे मानो उसका उपचय-उसकी कलेवर-वृद्धि-नहीं चाहते।...संसार में शायद ही ऐसी एक भी भाषा न होगी जिस पर, संपर्क के कारण, अन्य भाषाओं का प्रभाव न पड़ा हो और अन्य भाषाओं के शब्द उसमें सम्मिलित न हो गए हों । अंगरेज़ी भाषा संसार की समृद्ध भाषाओं में है। उसी को देखिए - उसमें लैटिन, ग्रीक, फ्रेंच, जर्मन आदि अनेक भाषाओं के शब्दों, भावों और मुहावरों का सम्मिश्रण है। उसमें संस्कृत भाषा तक के कुछ थोड़े ही परिवर्तित रूप में पाए जाते हैं। उदाहरणार्थ पाथ के रूप में हमारा पथ और ग्रास के रूप में घास प्रायः ज्यों का त्यों विद्यमान है। ये सब उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि हमारे पुरखे भी प्रगातिशील सोच वाले थे, और वे भाषाई आदान-प्रदान का प्रबल पक्षधर थे।

हिन्दी की शब्दावली को समृद्ध करने के लिए दूसरी भाषाओं की नदी में उतरना ही होगा। वैसे हमारी लोक भाषाएँ भी बेहद प्राणवान हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा में ही एक-एक शब्द के अनेक पर्यायवाची शब्द मिल जाते हैं। भारतीय भाषाएँ समृद्ध है। इनमें अँगरेज़ी के समतुल्य अनेक शब्द मिल जाएँगे। ऐसा करके हम भाषाई सद्भावना की दिशा में भी एक सशक्त कदम बढ़ाएँगे और तकनीकी शिक्षण के स्वप्न को भी पूरा करेंगे।

अहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी[सम्पादन]

विश्व हिन्दी सम्मेलनों में यह प्रस्ताव बार-बार पारित किया गया है कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाया जाए। यह भी सच है कि आज हिन्दी विश्व के एक सौ से अधिक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। प्राध्यापकों में भारत से गए प्रवक्ता तो होते ही है, उन्हीं देशों के लोग भी हिन्दी में पूरी दक्षता प्राप्त करके वहाँ  अध्यापन कार्य करते है। प्राय: यह भी कहा जाता है कि पहले आप अपने देश में हिन्दी को अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिष्ठित कर लीजिए, फिर उसे संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के विषय में सोचिए। यह एक ऐतिहासिक सच है कि हिन्दी और उसका मध्यकालीन स्वरूप ब्रज भाषा कभी हिन्दी पट्टी तक सीमित भाषा नहीं रही। अठारहवीं शती में ब्रज भाषा लगभग संपूर्ण देश की काव्य-भाषा बन गई थी। उन्नीसवी-बीसवीं शती में आए नवजागरण के साथ ही प्रादेशिक भाषाओं में लिखने का रुझान बढ़ता जाता है। आम जनता से सीधा संवाद स्थापित करने के लिए यह आवश्यक था। लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी ने अधिकतर लेखन कार्य मराठी और गुजराती में किया।

भाई वीर सिंह के पिता डा. चरण सिंह ब्रज भाषा में कविता लिखते थे, किंतु भाई वीर सिंह ने अपना लेखन पंजाबी में किया। राष्ट्रीयता के प्रसार और संपूर्ण देश में एक संपर्क भाषा की आवश्यकता अनुभव करते हुए विभिन्न प्रदेशों के सुधारकों और राजनेताओं ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किए जाने पर पूरा बल दिया। स्वामी दयानंद गुजराती थे और केशव चंद्र सेन बंगाली थे, किंतु राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के समर्थक थे। देश के विभिन्न भागों में राष्ट्रभाषा प्रचार समितियों की स्थापना हुई। इनके साथ जुड़ने और हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने में जिन लोगों ने सक्रिय भूमिका निभाई उनमें से अधिसंख्य की मातृ भाषा हिन्दी नहीं थी। जिस प्रकार अठारहवीं शती में ब्रजभाषा में कविता लिखने वालों में उत्तर से दक्षिण भारत तक के कवि थे उसी प्रकार हिन्दी में सृजनात्मक लेखन करने की प्रवृत्ति सारे देश में रही है, किंतु अहिन्दी प्रदेशों के हिन्दी लेखकों में यह भावना सदा विद्यमान रही है कि हिन्दी साहित्य का मूल्याँकन करने वाले आलोचक उन्हे हिन्दी की मुख्यधारा में शामिल करने के प्रति अनिच्छुक रहते है। अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के लेखकों को हिन्दी में साहित्य-सृजन के लिए प्रोत्साहित करने के लिए 1966 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा एक पुरस्कार योजना शुरू की गई। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दस लेखकों को पुरस्कार दिया था। इनमें कन्नड़, तेलगू, मलयालम, कोंकणी, मराठी, उड़िया, बंगला और पंजाबी भाषी लेखक सम्मिलित थे। यह योजना आज भी चल रही है।

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान भी प्रतिवर्ष एक अहिन्दी भाषी लेखक को 'सौहार्द पुरस्कार' देता है। ऐसे अहिन्दी भाषी हिन्दी लेखकों की संख्या अगणित है। पुरस्कृत होने वाले लेखकों की संख्या भी पाँचच सौ से अधिक होगी, किंतु इनमें से ऐसे कितने है जो हमारे संज्ञान में हैं या जिनकी रचनाओं को हिन्दी की पाठ्य पुस्तकों में सम्मिलित किया जाता है? मुझे कुछ लेखक याद आते है। अनंत गोपाल शेवड़े मराठी भाषी थे, किंतु हिन्दी में उन्होंने स्तरीय साहित्य सृजन किया। उनके उपन्यास ज्वालामुखी का भारत की 14 भाषाओं में अनुवाद कराया गया। उनके एक अन्य उपन्यास 'मंगला' को ब्रेल लिपि में भी प्रकाशित किया गया था। अनंत गोपाल शेवड़े का महत्व इस दृष्टि से भी कम नहीं है कि उन्हीं के प्रयासों से 1976 में नागपुर में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हुआ था। मुझे दूसरा नाम याद आता है रमेश चौधरी अरिगपूडि का। उनकी मातृभाषा तेलगू थी। शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रथम बार जो अहिन्दी भाषी हिन्दी लेखक पुरस्कृत हुए थे उनमें अरिगपूडि भी थे। हिन्दी में उनका विपुल साहित्य प्रकाशित हुआ। उन्होंने अनेक उपन्यास, नाटक और कहानियाँ लिखीं। आंध्र प्रदेश की साहित्य अकादमी और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा वह पुरस्कृत भी हुए थे। चेन्नई में रह रहे बाल शौरि रेड्डी और शौरिराजन आज भी अपने लेखन में सक्रिय है, किंतु ये सभी लेखक हिन्दी संसार द्वारा या तो भुला दिए गए है या हाशिए पर चले गए है।

वर्धा में स्थापित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय इस दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य कर सकता था, आज भी कर सकता है। इस समय इस विश्वविद्यालय के कुलपति गोपीनाथन स्वयं मलयालम भाषी है। केरल में हिन्दी अध्यापन का उनका लंबा अनुभव है। इस विश्वविद्यालय को सही अर्थो में संपूर्ण हिन्दी लेखन का केंद्र बनना चाहिए। देश के किस भाग में किनके द्वारा, किस विधा में, किस प्रकार का सृजन हो रहा है, इसकी विस्तृत जानकारी इस विश्वविद्यालय में उपलब्ध होनी चाहिए। इसी के साथ विश्व के अन्य देशों में कौन से लेखक हिन्दी में सृजन-कार्य कर रहे है, उनकी क्या कठिनाइयां है, इसका पूरा संज्ञान इस विश्वविद्यालय को होना चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि आज हिन्दी में जिसे मुख्यधारा का लेखन माना जाता है वह कुछ क्षेत्रों और कुछ आलोचकों की पूरी जकड़ में आ गया है।

इस समय हिन्दी साहित्य की ट्रेन वाराणसी से चलकर गोरखपुर, लखनऊ और इलाहाबाद होती हुई नई दिल्ली पर आकर रुक जाती है। अब न वह पंजाब की ओर जाती है, न बिहार की ओर, न राजस्थान की ओर, न मध्य प्रदेश की ओर, न गुजरात की ओर, न महाराष्ट्र की ओर। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल की तो बात ही मत करिए। एक समय कोचीन से मलयालम मनोरमा की ओर से 'युग प्रभात' नाम से साप्ताहिक हिन्दी पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। अनेक वर्षो तक उसने हिन्दी के अखिल भारतीय स्वरूप को उभारने का प्रयास किया। फिर उसका प्रकाशन बंद हो गया। आज भी हिन्दी विद्यापीठ (केरल) से 'संग्रथन' मासिक पत्रिका गत बीस वर्ष से प्रकाशित हो रही है। कर्नाटक महिला हिन्दी सेवा समिति की ओर से हिन्दी प्रचार वाणी (मासिक) अनेक वर्षो से नियमित प्रकाशित हो रही है। इन प्रदेशों में सभी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हिन्दी के प्रचार में लगे लोगों का अभाव नहीं है, किंतु इन सभी प्रदेशों में हिन्दी में सृजनात्मक लेखन का निरंतर ह्रास हो रहा है।

मुझे लगता है कि अहिन्दी भाषी प्रदेशों में हिन्दी में किया गया मौलिक लेखन आने वाले कुछ वर्षो में थम जाएगा। वहाँ  के लेखक अपनी-अपनी भाषाओं की ओर झुकते चले जाएँगे, क्योंकि वहाँ  उन्हे अपनी पहचान और स्वीकृति प्राप्त करने में उन व्याधियों में से नहीं गुज़र पड़ेगा जो हिन्दी में लिखकर मिलती है। हिन्दी का प्रकाशन व्यवसाय भी बुरी तरह सिमटता जा रहा है। इस समय पूरा प्रकाशन-व्यवसाय दिल्ली में केंद्रित हो गया है। एक समय वाराणसी, इलाहाबाद, लखनऊ, कानपुर, पटना, भोपाल और नागपुर जैसे नगरों में बहुत अच्छे प्रकाशन-गृह थे। आज इन नगरों में अच्छे प्रकाशकों की संख्या गिनी-चुनी रह गई है। अहिन्दी भाषी प्रदेशों में यह संकट और गहरा है। पता नहीं पुस्तक विक्रेताओं की स्थिति इतनी विषम क्यों हो गई है? विक्रेताओं की शिकायत यह है कि हिन्दी में खरीद कर पुस्तक पढ़ने वाला पाठक नहीं है। दूसरी बात यह है कि पुस्तकें इतनी महँगी हो गई है कि पाठक की क्रयशक्ति जवाब दे जाती है। तर्क-वितर्क में कितने ही कारण दिए जा सकते है, किंतु इतना तय है कि हिन्दी का संसार निरंतर सिकुड़ता जा रहा है। इसका विस्तार कैसे होगा, इस पर गंभीर विचार किया जाना चाहिए। (आयुष्मान से)

दक्षिण भारत मे हिंदी का प्रचलन[सम्पादन]

दक्षिण भारत की संज्ञा भारत के दक्षिणी भू-भाग को दी जाती है जिसमें केरल, कर्नाटक, आंध्र एवं तमिलनाडु राज्य तथा संघ शासित प्रदेश पुदुच्चेरी शामिल हैं। केरल में मलयालम, कर्नाटक में कन्नड, आंध्र में तेलुगु और तमिलनाडु तथा पुदुच्चेरी में तमिल अधिक प्रचलित भाषाएँ हैं। ये चारों द्रविड परिवार की भाषाएँ मानी जाती हैं। इन चारों भाषा-भाषियों की संख्या भारत की आबादी में लगभग 25 प्रतिशत है। दक्षिण की इन चारों भाषाओं का अपनी-अपनी विशिष्ट लिपियाँ हैं। सुसमृद्ध शब्द-भंडार, व्याकरण तथा समृद्ध साहित्यिक परंपरा भी है। अपने-अपने प्रदेश विशेष की भाषा के प्रति लगाव के बावजूद अन्य प्रदेशों के भाषाओं के प्रति यहाँ की जनता में निस्संदेह आत्मीयता की भावना है। अतः यह बात स्वतः स्पष्ट है कि दक्षिण भारत भाषाई सद्भावना के लिए उर्वर भूमि है।

धार्मिक, व्यापारिक और राजनीतिक कारणों से उत्तर भारत के लोगों का दक्षिण में आने-जाने की परंपरा शुरू होने के साथ ही दक्षिण में हिन्दी का प्रवेश हुआ। यहाँ के धार्मिक, व्यापारिक केंद्रों में हिन्दीतर भाषियों के साथ व्यवहार के माध्यम के रूप में, एक बोली के रूप में हिन्दी का धीरे-धीरे प्रचलन हुआ।  दक्षिणी भू-भाग पर मुसलमान शासकों के आगमन और इस प्रदेश पर उनके शासन के दौर में एक भाषा विशेष के रूप में दक्खिनी का प्रचलन चौदहवीं से अठारहवीं सदी के बीच हुआ, जिसे 'दक्खिनी हिन्दी' की संज्ञा भी दी जाती है। बहमनी, कुतुबशाही, आदिलशाही आदि शाही वंशों के शासकों के दौर में बीजापुर, गोलकोंडा, गुलबर्गा, बीदर आदि प्रदेशों में दक्खिनी हिन्दी का चतुर्दिक विकास हुआ। दक्खिनी हिन्दी का विकास एक जन भाषा के रूप में हुआ था। इसमें उत्तर-दक्षिण की कई बोलियों के शब्द जुड़ जाने से यह आम आदमी की भाषा के रूप में प्रचलित हुई। हैदरअली और टीपू के शासन काल में कर्नाटक के मैसूर रियासत में, अर्काट नवाबों की शासनावधि में तमिलनाडु के तंजावूर प्रांत में, आंध्र के कुछ सीमावर्ती प्रांतों में मराठे शासकों के द्वारा भी यह काफी प्रचलित हुई। आगे चलकर दक्खिनी हिन्दी में प्रचुर मात्रा में साहित्य का सृजन भी हुआ है। यहाँ यह बात महत्वपूर्ण है कि हिन्दी, हिंदुस्तानी, हिंदवी, उर्दू, दक्खिनी, दक्खिनी हिन्दी आदि को एक ही मूल भाषा के विभिन्न शैलियों, बोलियों के रूप में मानकर चलने पर ही यह कथन आधारित है कि दक्षिण भारत में इस भाषा का प्रसार शताब्दियों पूर्व ही हुआ था।

शताब्दियों पूर्व ही दक्षिण में हिन्दी भाषा के प्रचलन के संबंध में एक और तथ्यात्मक उदाहरण केरल प्रांत से मिलता है। 'स्वाति तिरुनाल' के नाम से सुविख्यात तिरुवितांकूर राजवंश के राजा राम वर्मा (1813-1846) न केवल हिन्दी के निष्णात् साबित हुए थे बल्कि स्वयं उन्होंने हिन्दी में कई रचे थे। मिसाल के तौर पर उनका एक गीत यहाँ प्रस्तुत है –

मैं तो नहीं जाऊँ जननी जमुना के तीर।
इतनी सुनके मात यशोदा पूछति मुरहर से,
क्यों नहिं जावत धेन चरावन बालक कह हमसे।
कहत हरि कब ग्वालिन मिल हम
मींचत धन कुच से,
जब सब लाज भरी ब्रजवासिन कहे,
न कहो दृग से।
ऐसी लीला कोटि कियो कैसे जायो मधुवन से,
पद्मनाभ प्रभु दीन उधारण पालो सब दुःख से।

माता यशोदा के समक्ष बाल-कृष्ण की शिकायत पर आधारित स्वाति तिरुनाल का यह गीत सैकडों वर्षों पूर्व दक्षिण में हिन्दी की सर्जना का भी एक श्रेष्ठ उदाहरण है।

दक्षिण में हिन्दी के प्रचलन के कारणों अथवा आधारों का पता लगाने पर यह बात स्पष्ट है कि धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक आदि आनेक आधार हमें मिलते हैं।  इससे यह स्पष्ट होता है कि हिन्दी भाषा को दक्षिण पहुँचने का एक व्यापक आधार प्राप्त हुआ था। हाँ, यह मान्य तथ्य है कि यहाँ पहुँचकर हिन्दी भाषा को कई शैलियाँ, कई शब्द और रूप मिल गए हैं। आदान-प्रदान का एक बड़ा काम हुआ, यही आगे एकता के आधार बिंदु की खोज का मूल साबित हुआ है। फलतः भिन्न भाषा-भाषियों के बीच आदान-प्रदान का एक सशक्त एवं स्वीकृत भाषा के रूप में दक्षिण में हिन्दी प्रचलित हुई है। 

आधुनिक काल अर्थात 19 वीं, 20 वीं सदियों के दौरान हिन्दी का दक्षिण भारत में व्यापक प्रचलन हुआ। एकता की भाषा के रूप में हिन्दी के महत्व को समझकर कई विभूतियों ने इसे अपनी अभिव्यक्ति की वाणी के रूप में अपनाकर देश की जनता से अपील की थी। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने हिन्दी का प्रबल समर्थन किया था। उन्होंने हिन्दी को 'आर्य भाषा' की संज्ञा देकर अपना महत्वपूर्ण ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' की रचना हिन्दी में ही की थी। स्वामीजी द्वारा संस्थापित आर्य समाज ने जहाँ एक ओर समूचे भारत में भारतीयता एवं राष्ट्रीयता का प्रबल प्रचार किया, वहीं दूसरी ओर हिन्दी का प्रचार-प्रसार भी किया। आंध्र में निजाम शासन के दौरान आर्य समाजियों ने चार हिन्दी पत्र-पत्रिकाएँ भी प्रकाशित की थीं। उस समय निजाम शासन द्वारा आर्य समाज की गतिविधियों पर रोक लगाए जाने पर राज्य के सीमा पार सोलापुर से इन पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन करके बड़ी चुनौती के साथ राज्य में इनका प्रसार किया जाता था। हिन्दी के प्रचलन में आर्य समाज के योगदान का यह एक मिसाल है।

स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में भावात्मक एकता स्थापित करने में हिन्दी को सशक्त माध्यम मानकर इसके प्रचार के लिए कई प्रयास किए गए। तमिल के सुख्यात राष्ट्रकवि सुब्रह्मण्य भारती ने अपने संपादन में प्रकाशित तमिल पत्रिका 'इंडिया' के माध्यम से 1906 में ही जनता से हिन्दी सीखने की अपील की थी एवं अपनी पत्रिका में हिन्दी में सामग्री प्रकाशित करने हेतु कुछ पृष्ठ सुरक्षित रखने की घोषणा की थी। आगे भारती के ही नेतृत्व में 1907-1908 के बीच मद्रास के ट्रिप्लिकेन में जनसंघ के तत्वावधान में हिन्दी कक्षाओं का संचालन आरंभ हुआ था, जिसकी सूचना भारती ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को प्रेषित अपने पत्र (दि.29 मई, 1908) में दी थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी ने अपने रचनात्मक कार्यक्रमों में हिन्दी प्रचार को भी जोड़ लिया था। दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों के बीच कार्य करते हुए गांधीजी ने यह महसूस किया था कि भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलनेवाले भारतीयों के बीच व्यवहार की भाषा के रूप में हिन्दी सर्वोपयुक्त भाषा है। दक्षिण अफ्रीका में बसे हुए प्रवासी भारतीयों में एकता स्थापित करने कि लिए हिन्दी को एक सफल माध्यम के रूप में पाकर उन्होंने अपने अनुभव अपनी पत्रिका 'हिंद स्वराज' में 1909 में व्यक्त करते हुए लिखा था कि भारतवासियों को एकता की कड़ी में जोड़ने के लिए हिन्दी उपयोगी भाषा है। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने न केवल हिन्दी भाषा का पक्ष समर्थन किया, बल्कि इसे राष्ट्रवाणी होने की अधिकारिणी बनाने हेतु इसके व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु कारगर क़दम भी उठाए थे। हिन्दी गंगोत्री की धारा को दक्षिण के गाँवों तक ले आने संबंधी गांधीजी के भागीरथ प्रयासों से संबंधित ऐतिहासिक तथ्यों से कोई भी अनभिज्ञ नहीं हैं। 29 मार्च, 1918 को इंदौर में संपन्न हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में सभापति के मंच से भाषण देते हुए गांधीजी ने कहा था कि जब तक हम हिन्दी भाषा को राष्ट्रीय और अपनी-अपनी प्रांतीय भाषाओं को उनका योग्य स्थान नहीं देते, तब तक स्वाराज्य की सब बातें निरर्थक हैं। गांधीजी की राय में भाषा वही श्रेष्ठ है, जिसको जनसमूह सहज में समझ ले। आगे चलकर गांधीजी की संकल्पना से दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार का एक बड़ा अभियान शुरू हुआ। आज़ादी हासिल होने के बाद जब स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण हो रहा था, तब भी गांधीजी के इन महत्वपूर्ण विचारों के अनुरूप ही भारत के संविधान में राष्ट्रीय राजकाज की भाषाओं के रूप में हिन्दी को तथा देश के विभिन्न राज्यों में वहाँ की क्षेत्रीय भाषाओं को राजकाज की भाषाओं के रूप में मान्यता देने की चेष्टा की गई है।  गांधीजी के प्रयासों से 16 जून, 1918 को मद्रास में हिन्दी वर्गों के आयोजन के साथ ही दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार के प्रयासों को 'हिन्दी प्रचार आंदोलन' के रूप में एक व्यवस्थित आधार मिला। अपनी संकल्पनाओं को साकार बनाने की दिशा में गांधीजी ने अपने सुपुत्र देवदास गांधी को मद्रास भेजा था। गांधीजी से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रेरणा पाकर बिहार, उत्तर प्रदेश आदि प्रांतों के कई युवक दक्षिण पहुँचकर हिन्दी प्रचार-प्रसार कार्य में अपना योगदान सुनिश्चित करने लगे थे। उनसे हिन्दी सीखनेवाले हजारों हिन्दी प्रेमी हिन्दी प्रचारकों के रूप में निष्ठा एवं लगन के साथ दक्षिण के गावों में हिन्दी का प्रचार करने लगे थे।

1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का क्षेत्रीय कार्यालय जो मद्रास में खुला था, वही आगे परिवर्धित होकर दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के रूप में ख्यात हुई। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद जब गांधीजी द्वारा संस्थापित संस्थाओं को राष्ट्रीय महत्व की संस्थाओं के रूप में घोषित करने की परंपरा शुरू हुई, उसी क्रम में 1964 में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा भी राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित हुई। फिलहाल इस सभा के दक्षिण के चारों राज्यों में शाखाओं के अलावा उच्च शिक्षा शोध-संस्थान भी हैं। सभा द्वारा हिन्दी प्रचार कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न हिन्दी परीक्षाओं का संचालन किया जाता है। उच्च शिक्षा एवं शोध संस्थान के माध्यम से उच्च शिक्षा एवं शोध की औपचारिक उपाधियाँ भी प्रदान की जा रही हैं। दक्षिण में हिन्दी प्रचार के क्रम में ऐसी कई छोटी-बड़ी संस्थाएँ स्थापित हुई हैं। ऐसे कुछ बड़ी संस्थाओं हिन्दी प्रचार कार्य में संलग्न संस्थाएँ शामिल हैं। केरल में 1934 में केरल हिन्दी प्रचार सभा, आंध्र में 1935 में हिन्दी प्रचार सभा, हैदराबाद और कर्नाटक में 1939 में कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति, 1943 में मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद तथा 1953 में कर्नाटक महिला हिन्दी सेवा समिति की स्थापना हुई। ये संस्थाएँ हिन्दी प्रचार कार्य में अपने ढंग से सक्रिय हैं। इन संस्थाओं के द्वारा संचालित कक्षाओं में हिन्दी सीखकर इन्हीं संस्थाओं द्वारा संचालित परीक्षाएँ देनेवाले छात्रों की संख्या आजकल लाखों में है। तमिलनाडु को छोड़कर बाकी तीनों राज्यों के स्कूलों में एक भाषा के रूप में हिन्दी की पढ़ाई जारी है। तमिलनाडु में तथाकथित राजनीतिक विरोध के कारण भले ही सरकारी स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई नहीं हो रही हो, कई निजी स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई जारी है, साथ ही यहाँ भी हिन्दी प्रचार संस्थाओं की परीक्षाओं में बैठनेवाले छात्रों की संख्या भी लाखों में है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि तमिलनाडु में 'हिन्दी स्पीकिंग कोर्स' के बोर्ड हर कोई छोटे-बड़े शहर की छोटी-बड़ी गलियों में नज़र आते हैं।

इसी क्रम में दक्षिण में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में योग देने में कई निजी प्रयास भी सामने आए हैं। निःशुल्क हिन्दी कक्षाओं का संचालन, लेखन, प्रकाशन, पत्रकारिता, गोष्ठियों का आयोजन आदि कई रूपों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु कई प्रयास किए जा रहे हैं। यहाँ हिन्दी फिल्मों के प्रदर्शन की बड़ी मांग रहती है, इनके दर्शकों में अधिकांश हिन्दीतर भाषी भी होते हैं। हिन्दी गीतों की लोकप्रियता की बात तो अलग ही है। अंत्याक्षरी, गायन आदि कई रूपों में हिन्दी गीत दक्षिण के सांस्कृतिक जीवन के अभिन्न अंग बन गए हैं। हिन्दीतर भाषियों का हिन्दी भाषा का अर्जित ज्ञान इतना परिमार्जित हुआ है कि यहाँ सैकडों की संख्या में हिन्दी के लेखक उभर कर सामने आए हैं। परिनिष्ठित हिन्दी में इनकी लेखनी से सृजित हजारों कृतियाँ हिन्दी साहित्य की धरोहर बन गई हैं। दक्षिण से सैकडों की संख्या में हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई हैं। इनमें हिन्दीतर भाषियों द्वारा हिन्दी प्रचार हेतु निजी प्रयासों से संचालित पत्रिकाएँ भी कई हैं। हैदराबाद, बैंगलूर तथा चेन्नई नगरों से तीन बड़े हिन्दी अखबार प्रकाशित हो रहे हैं। कई छोटे अखबार भी इन नगरों के अलावा अन्य शहरों से भी प्रकाशित हो रहे हैं। लेखन द्वारा हिन्दी जगत में ख्यात होने वाले दक्षिण के हस्ताक्षरों में उपन्यासकार आरिगपूडि रमेश चौधरी, डॉ. बालशौरि रेड्डी के नाम उल्लेखनीय हैं। इनके अलावा कई लब्धप्रतिष्ठ लेखक भी हैं, इस लेख का आकार तथा सीमाओं को ध्यान में रखते हुए उन सबके नामों तथा योगदान का उल्लेख यहाँ करना संभव नहीं हो रहा है।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि दक्षिण में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के साथ अध्ययन, अध्यापन, लेखन, प्रकाशन में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। दक्षिण में हिन्दीतर भाषी विभिन्न भाषा-भाषियों के बीच भी एक आम संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी की भूमिका अविस्मरणीय है। भारत संघ की राजभाषा के रूप में इसका प्रचार-प्रसार एवं प्रयोग अन्य गैर-हिन्दी प्रांतों की तुलना में दक्षिण में अधिक है। जनता की ज़रूरतों तथा सरकार की नीतियों के आलोक में दक्षिण भारत में हिन्दी भाषा का भविष्य निश्चय ही उज्जवल रहेगा।

बाजार की मार से बेज़ार हैं किताबें[सम्पादन]

बाजार की मार और प्रहार इतने गहरे हैं कि किताबें दम तोड़ने को मजबूर है। इलेक्ट्रानिक मीडिया का गहराता नशा, उपभोक्तावादी ताकतों के खेल तथा पाठकों के संकट से जूझतीं ‘किताबें’ जिएं तो जिए कैसे? इस दमघोंटू माहौल में क्या किताबें सिर्फ पुस्तकालयों की शोभा बनकर रह जाएगी या मीडिया के नए प्रयोग उसकी उपयोगिता ही समाप्त कर देंगे, यह सवाल अब गहरा रहा है।   अरसा पहले ईश्वर की मौत की घोषणा के बाद उपजे विमर्शों में नई दुनिया के विद्वानों ने इतिहास, विचारधारा, राजनीति, संगीत, किताबें, रंगमंच एक-एक कर सबकी मौत की घोषणा कर दी। यह सिलसिला रुकता इसके पूर्व ही सुधीश पचौरी ने ‘कविता की मौत’ की घोषणा कर दी। यह सिलसिला कहां रुकेगा कहा नहीं जा सकता। और अब बात किताबों के मौत की। हमने देखा कि मृत्यु की घोषणाओं के बावजूद ये सारी चीजें अपनी-अपनी जगह ज्यादा मजबूती से स्थापित हुईं और आदमी की जिंदगी में ज्यादा बेहतर तरीके से अपनी जगह बना ले गयीं।

किताबों की मौत का सवाल इस सबसे थोड़ा अलग है, क्योंकि उसके सामने चुनौतियां आज किसी भी समय से ज्यादा हैं। शोर है कि किताबों के दिन लद गए। किताबों के ये आखिरी दिन हैं। किताब तो बीते जमाने की चीज है। शोर में थोड़ा सच भी है, उनकी पाठकीयता प्रभावित जरूर हुई, स्वीकार्यता भी घटी। इसके बावजूद वह मरने को तैयार नहीं है। जिन देशों में आज इलेक्ट्रानिक माध्यमों के 300 से ज्यादा चैनल है, 10 में से 6 लोगों के पास इंटरनेट कनेक्शन हैं, वहां भी किताबें किसी न किसी रूप में क्यों आ रही है? वे कौन से सामाजिक, आर्थिक दबाव हैं, जो किताब और पाठक की रिश्तेदारी के अर्थ और आयाम बदलने पर आमादा हैं। खासकर हिन्दी भाषी क्षेत्रों में किताबों की जैसी दुर्गति है, उसके कारण क्या हैं? इलेक्ट्रानिक मीडिया एवं सूचना आधारित वेबसाइटों के भयावह प्रसार वाले देशों में किताबें अगर उसकी चुनौती को स्वीकार कर अपनी जमीन मजबूत बना पाई हैं जो भारतीय संदर्भ में यह चित्र इतना विकृत क्यों हैं? निश्चय ही हिन्दी क्षेत्र के लिए यह चुनौती सहज नहीं खासी विकट है। इसे हल्के ढंग से नहीं लिया जा सकता। किताब लिखने और छापने वालों सबके लिए यह समय महत्व का है, जब उन्हें ऐसी सामग्री पाठकों को देनी होगी, जो उन्हें अन्य मीडिया नहीं दे पाएगा। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने वैसे भी जैसी छिछली, सस्ती और सतही सूचनाओं का जखीरा अपने दर्शकों पर उड़ला है, उसमें ‘किताब’ के बचे रहने की उम्मीदें ज्यादा है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में गंभीरता के अभाव के चलते किताबों को गंभीरता पर ध्यान देना होगा वरना हल्केपन का परिणाम वही होगा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया पर हिन्दी फिल्मों पर आधारित कार्यक्रमों की लोकप्रियाता तो बढ़ी, किंतु हिन्दी की कई फिल्म पत्रिकाएं लड़खड़ा कर बंद हो गई। इसके बावजूद किताबों के प्रकाशन के क्षेत्र में बाहर से हालात इतने बुरे नजर नहीं आते। हिन्दी में किताबें खूब छप रही हैं। प्रकाशकों की भी संख्या बढ़ी है। फिर पाठकीयता के संकट तथा किताबों की मौत की चर्चाएं आखिर क्यों चलाई जा रही हैं? सवाल का उत्तर तलाशें तो पता चलेगा कि हमारे प्रकाशकों को हिन्दी साहित्य से खासा प्रेम है। इसके चलते ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों पर पुस्तकों का खासा अभाव है। सिर्फ साहित्य की पुस्तकों के प्रकाशन के चलते हिन्दी में मनोरंजन, पर्यटन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कला, संस्कृति जैसे विषयों पर किताबों बहुत कम मिल पाती हैं। हां। अध्यात्म की किताबों का प्रकाशन जरूर बड़ी मात्रा में होता है, हालांकि उसके बिक्री एवं प्रकाशन का गणित सर्वथा अलग है। हिन्दी प्रकाशकों के साहित्य प्रेम के विपरीत अंग्रेजी किताबों के प्रकाशन बमुश्किल 10 प्रतिशत किताबें ही ‘साहित्य’ पर छापते हैं। इसके चलते विविध रुचियों से जुड़े पाठक अंग्रेजी पुस्तकों की शरण में जाते हैं। बाजार की इसी समझ ने ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों पर अंग्रेजी का रुतबा कायम रखा है।

राज्याश्रय में पलता प्रकाशन उद्योग[सम्पादन]

हिन्दी प्रकाशन उद्योग की सबसे बड़ी समस्या उसका जनता से कटा होना है। सूचनाओं के महासमुद्र में गोते लगाने एवं अच्छी कृतियों को समाने लाने से वे बचना चाहते हैं। सरकारी खरीद एवं पाठयक्रमों के लिए किताबें छापना प्रकाशकों का प्रमुख ध्येय बन गया है। सरकारी खरीद होने में होने वाली कमीशनबाजी के चलते किताबों के दाम महंगे रखे जाते हैं। 50 रुपए की लागत की कोई भी किताब छापकर प्रकाशक उसे 75 रुपए में बेचकर भी लाभ कम सकता है, पर यहां कोई गुना खाने की होड़ में, कमीशन की प्रतिस्पर्धा में 50 रुपए की किताब की कीमत 200 रुपए तक पहुंच जाती है। फिर साहित्य के इतर विषयों पर हिन्दी पाठकों को किताबें कौन पहुंचेगा? अनुवाद के माध्यम से बेहतर किताबें लोगों तक पहुंच सकती हैं, लेकिन इस ओर जोर कम है, प्रायः प्रकाशक किसी किताब के एक संस्करण की हजार प्रतियां छापकर औन-पौने बेचकर लाभ कमाकर बैठ जाते हैं। उन्हें न तो लेखकर को रायल्टी देने की चिंता है, न ही किताब के व्यापक प्रसार की। सरकारी खरीद और पुस्तकालयों में पांच सौ हजार प्रतियां ही उन्हें लागत एवं मुनाफा दोनों दे जाती हैं। इससे ज्यादा कमाने की न तो हमारे प्रकाशकों की इच्छा है, न ललक। प्रकाशकों का यह ‘संतोषवाद’ लेखक एवं पाठक दोनों के लिए खतरनाक है। प्रकाशक प्रायः यह तर्क देते हैं कि हिन्दी में पाठक कहां है? वास्तव में यहा तर्क भोथरा एवं आधारहीन है। मराठी में लिखे गए उपन्यास ‘मृत्युंजय’ (शिवाजी सावंत) के अनुवाद की बिक्री ने रिकार्ड तोड़े। प्रेमचंद, बंगला के शरदचंद्र, देवकीनंदन खत्री, हाल में सुरेन्द्र वर्मा की ‘मुझे चांद चाहिए’ ने बिक्री के रिकार्ड बनाए। विभिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रारंभ किए गए पेपरबैक सस्करणों को मिली लोकप्रियता यह बताती है कि हंदी क्षेत्र में लोग पढ़ना चाहते हैं, पर कमीशनबाजी और राज्याश्रय के रोग ने पूरे प्रकाशन उद्योग को जड़ बना दिया है। पाठकों तक विविध विषयों की पुस्तकें पहुंचाने की चुनौती से भागता प्रकाशन उद्योग न तो नए बाजार तलाशना चाहता है, न ही बदलती दुनिया के मद्देनजर उसकी कोई तैयारी दिखती है। प्रायः लेखकों की रायल्टी खाकर डकार भीन लेने वाला प्रकाशन उद्योग यदि इतने बड़े हिन्दी क्षेत्र में पाठकों का ‘टोटा’ बताता है तो यह आश्चर्यनजक ही है।

पाठक और किताब का रिश्ता[सम्पादन]

पाठक और किताब का रिश्तों पर नजर डाले तो वह काफी कुछ बदल चुका है। प्रिंट मीडिया पर इलेक्ट्रानिक माध्यमों से लेकर तमाम सूचना आधारित वेबसाइटों के हमले और सामाजिक-आर्थिक दबावों ने किताबों और आदमी के रिश्ते बहुत बदल दिए हैं। किताबों ने तय तक कर लिया है कि व महानगरों में ही रहेंगी, जबकि हिंदुस्तान की एक बड़ी आबादी गांवों में रहती है। किताब पढ़ने का उनका संस्कार नहीं है, यह मान लेना भी गलत होगा बरना रामचरित मानस, पंचतंत्र, चंद्रकांता संतति जैसा साहित्य गांवों तक न पहुंचता। शायद किताबों का इस संकट में कोई कुसूर नहीं है। दुनिया के महानगरीय विकास ने हमारी सोच, समझ और चिंतन को भी ‘महानगरीय’ बना दिया है। वैश्वीकरण की हवा ने हमें ‘विश्व नागरिक’ बना दिया। ऐसे में बेचारी किताबें क्या करें? बड़े शहरों तक उनकी पहुच है। परिणाम यह है कि वे (किताबें) विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों के पुस्तकालयों की शोभ बढ़ा रही हैं। ज्यादा सुविधाएं मिलीं तो सरकारी या औद्योगिक प्रतिष्ठानों के राजभाषा विभागों, पुस्तकालयों में वे सजी पड़ी हैं। पुस्तक मेंलों जैसे आयोजन भी राजधानियों के नीचे उतरने को तैयार नहीं है। जाहिर है आम आदमी इन किताबों तक लपककर भी नहीं पहुच सकता।

विश्व-फ़लक पर हिन्दी: कुछ सुझाव[सम्पादन]

हिन्दी की साहित्यिक गरिमा और लिपि की वैज्ञानिकता से सभी विद्वजन परिचित हैं। अनेक बाधाओं, व्यवधानों और उतार-चढ़ाव के बावज़ूद भी आज हिन्दी विश्व-मंच पर अपना स्थान बनाने जा रही है, यह हमारे देश के लिए बहुत ही गर्व की बात है। हिन्दी भाषा आज के युग की भाषा बने, विज्ञान और नई तकनीक की भाषा बने, यह आज के युग की माँग है और हमें चाहिए कि हम इस ओर कुछ ठोस कदम उठाएं।

भारत वैदिक काल से ही साहित्यिक, सांस्कॄतिक और वैज्ञानिक दॄष्टि से अति समृद्ध रहा है, लेकिन उसके इस समृद्ध-कोश को विदेशियों द्वारा कभी चुराया गया तो कभी नष्ट किया गया है। आज आवश्यकता है कि हम अपने पुराने ज़ख्मों को भूलें. उन पर मरहम रखते हुए फ़िर से दुनिया के साथ आगे बढ़ें और भारत की उस गरिमा को प्राप्त करे जो वैदिक युग में थी।

आज संस्कृत की अपेक्षा हिन्दी बहुगम्य भाषा होती जा रही है और विश्व में अपना स्थान बना रही है तो क्यों नहीं हम उसके माध्यम से  विभिन्न विषयों सम्बन्धी ज्ञान को सरल भाषा में विकसित करें। हिन्दी मंच पर न केवल साहित्यिक विद्वानों को वरन् वैज्ञानिक, सामाजिक और शैक्षिणिक विद्वानों को भी स्थान मिलना चाहिए, जिससे हम यह जान सकें कि इन विषयों में हिन्दी-प्रयोग की क्या-क्या कठिनाइयाँ आ रही हैं, जिनके कारण हिन्दी वह स्थान नहीं ले पा रही है जो अंग्रेज़ी भाषा को प्राप्त है।

वैसे कई समस्याओं का हल काफ़ी हद तक हो रहा है, परंतु उनकी गति बहुत ही धीमी है। जो भारतीय विदेशों में कार्यरत हैं और जिनका हिन्दी- भाषा पर पूरा अधिकार है, वे ऐसे तकनीकी मार्ग खोज सकते हैं। स्पष्टत: कहूँ तो हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी यह रही है कि हिन्दी- भाषा को साहित्य से ही अधिक जोड़ कर देखा जाता है, विभिन्न भाषाओं से अनुवाद भी अधिकांशत: साहित्य का ही होता हैं, जबकि आज के युग की प्रबल माँग है कि विज्ञान और तकनीकी विषयों का अनुवाद हिन्दी में सरल, मानक और बोधगम्य रूप में हो। क्लिष्ट शब्द और त्रुटिपूर्ण अनुवाद लोगों को हिन्दी से दूर कर रहे हैं। कितने ही ऐसे विषय हैं जिनका हिन्दी में ठीक से अनुवाद नहीं हो पा रहा है, जो वर्तमान युग के लिए महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि अंग्रेज़ी हर व्यक्ति की ज़रूरत बनती जा रही है। अत: हमारा प्रयत्न यह होना चाहिए कि नई पीढ़ी सक्षम अनुवादकों/भाषान्तरकारों की होनी चाहिए जिनका अंग्रेज़ी-हिन्दी पर समानाधिकार हो, साथ ही उन्हें विज्ञान और तकनीकी की पूर्ण जानकारी हो।

भाषा के दो मुख्य स्वरूप हैं : १.मौखिक २- लिखित। हिन्दी भाषा का मौखिक स्वरूप तो बहु-लोकप्रिय है और हो रहा है। आँकड़े बता रहे हैं कि आज हिन्दी विश्व में सबसे अधिक बोली और समझी जानेवाली भाषा कही जा सकती है, परंतु इसका दूसरा पहलू जो लेखन और लिपि से सम्बन्धित है, उसमें सरलता और सहजता की अत्यन्त आवश्यकता है, जिससे लिखने में  भी इसका प्रयोग अधिकाधिक हो सके। इसके लिए यद्यपि काफ़ी कार्य हुआ है, मानक रूप भी तैयार हुआ है तथापि अभी तक भी वह इतना सरल नहीं हुआ है कि लोग इसे आसानी से अपना सकें। जन-सामान्य में अभी भी काफ़ी भ्रांतियाँ हैं, मुख्यत: अनुस्वार और चन्द्रबिन्दु को लेकर, साथ ही ‘नुक्ते’ का प्रयोग भी उन्हें भटकाता है, कहाँ लगाए, कहाँ न लगाएं की स्थति तो पैदा करता ही है, लिखने में अथवा टाइप करने में भी व्यवधान उत्पन्न करता है। अत: साहित्य को छोड़ कर इनके प्रयोग में उदारता बरती जाए और सरलीकरण की ओर कदम बढ़ाएं जाएं,तो लोग रोमन-लिपि का सहारा लेना छोड़ सकते हैं।

कंप्यूटर हिन्दी में सहज होना चाहिए। हिन्दी के मनीषी कंप्यूटर की जानकारी बहुत कम रखते हैं, जिसके कारण वे अपनी बात अन्तर्जाल(internet) पर नहीं कह पाते हैं अत: हमें कुछ ऐसे युवा-वर्ग की आवश्यकता है जो इस कार्य का दायित्व  अपने कंधों पर उठाएं। आज हो यह रहा है कि जो वर्ग कंप्यूटर जानता है, उनका हिन्दी ज्ञान कम है और जिनको हिन्दी-ज्ञान है, वे कंप्यूटर नहीं जानते। यही कारण है कि अन्तर्जाल पर हिन्दी के माध्यम से जो सूचनाएं मिलनी चाहिए वे सब अंग्रेज़ी में सहज उपलब्ध हैं इसीलिए अंग्रेज़ी का प्रयोग दिन-ब दिन बढ़ता जा रहा है। इन पर हिन्दी में काम होना चाहिए और पूर्ण प्रचार-प्रसार होना चाहिए जिससे जन-सामान्य भी इसका उपयोग कर सकें। उदाहरण के लिए जैसे - कंप्यूटर में लिखने के लिपि-अक्षर(फ़ॊन्ट्स) अब ‘य़ूनिकोड’ में बहुत सरल हो गए हैं, जिनके कारण ई-मेल में बहुत सुविधा हो गई है, लेकिन यह बात कितने लोगों को ज्ञात है? जो विभिन्न राजकीय दफ़्तरों में हिन्दी भाषा अधिकारी हैं और कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करते हैं, वे भी नहीं जानते जबकि इस प्रकार की नवीनतम जानकारी बिजली की भाँति हिन्दी-जगत में फ़ैलनी चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कंप्यूटर पर कार्य करने वाला भारतीय इसके लिए कटिबद्ध रहे और इसमें कुशलता का विकास करे।

अगली विशेष बात है ‘शब्दकोश’ की। हिन्दी–शब्दकोश का प्रयोग हिन्दी नहीं जानने वालों के लिए बड़ा उलझन भरा है। हिन्दीतर प्रदेशों के लोगों को बार-बार शब्दकोश देखने की आवश्यकता होती है,अत: शब्दकोश को वर्णमाला क्रम के अनुसार मानक और सहज बनाया जाय तो यह एक वरदान हो जाएगा। उदाहरणार्थ- वर्तमान में हिन्दी-शब्दकोश देखना सीखना होता है, पहले उसकी बारीकियों से छात्रों को अवगत करवाना पड़ता है और अभ्यास करवाना होता है कि कौन-सा वर्ण शब्दकोश में कहाँ आएगा? यदि वर्णमाला में स्वरों का क्रम देखें तो हम पाएंगे कि जो अं का  क्रम वर्णमाला में अंत में आता है, बारह्खड़ी भी इसी क्रम से सिखाई जाती है, परन्तु शब्दकोश में वही पहले आता है, जैसे- अनुस्वार/अनुनासिक वाले शब्द(अंक आदि)। फ़िर शब्दकोश में इस प्रकार का क्रम उलझन पैदा करता है। व्यंजन को बिना स्वर के अर्द्धाक्षर माना गया है, कहने का तात्पर्य यह है कि यदि यह व्यंजन का  मूल रूप है, तो शब्दकोश में पहले अर्द्धाक्षर वाले शब्द आने चाहिए, जैसे—क्या.क्यारी आदि।

इसीप्रकार संयुक्त-व्यंजन जिनका अब स्वतंत्र रूप बन गया है ( क्ष,त्र,ज्ञ,श्र,)  और जिन्हें वर्णमाला क्रम के अंत में दर्शाया जाता है, उन्हें शब्दकोश में भी बाद में ही लिया जाय तो सुविधा होगी। यह ठीक है कि इस प्रकार की परंपरा संस्कृत-काल से चली आ रही है और इसके कई शास्त्रीय कारण भी हो सकते हैं, पर मैं यहाँ एक हिन्दीतर प्रदेश के छात्र के दृष्टिकोण से बात कर रही हूँ जो सम्पर्क-भाषा के रूप में भाषा सीखना चाहता है।

अत: विद्वजनों से मेरा नम्र निवेदन है कि हिन्दी को सरल, सह्ज और बहुगम्य बनाने की राह में जो अवरोध आ रहे हैं उन पर उदारता से विचार कर निष्कर्ष निकालें और हिन्दी भाषा को सुव्यवस्थित रूप में विस्तरित होने का अवसर दें, अन्यथा भाषा तो सरिता की भाँति है जो अपना रास्ता ‘मुन्ना भाई’ की भाँति निकाल ही लेगी, जो शायद हिन्दी प्रेमियों को ग्राह्य नहीं होगा।

हमारा ध्येय होना चाहिए --- 

‘तुलसी क्यारी सी हिन्दी को,

हर आँगन में रोपना है।

यह वह पौधा है जिसे हमें,

नई पीढ़ी को सौंपना है।’

हिन्दी और विज्ञान लेखन[सम्पादन]

किसी भी ज्ञान-विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में भाषा, लेखन शैली एवं लेखन विधा का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। संभवत इसीलिए लेखन की अनेक अन्य विधाओं का विकास हुआ है, जैसे कथा, कहानी, कार्टून, गल्प, कविता, नाटक, लेख, फीचर, समाचार कथा आदि। इस कारण आज विज्ञान साहित्य भी प्रचुर मात्रा में इन विधाओं में प्राप्त हो रहा है। प्रस्तुत है विज्ञान लेखन पर सारगर्भित आलेख - संपादक

आज के युग में विज्ञान के ज्ञान को जन साधारण तक पहुँचाने का कार्य कितना महत्वपूर्ण है, इसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। विज्ञान के सरल ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना विदेशी भाषा के द्वारा  नहीं हो सकता और न ही विकास का मार्ग ही प्रशस्त हो सकता है। इस संदर्भ में भारतेन्दु हरिशचन्द की निम्न पंक्तियाँ सार्थक हैं-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय के शूल।।

ऐसा विज्ञान जो जनमानस के ज्ञानवर्द्धन के लिए रोचक ढंग से लिखा कहा या प्रदर्शित किया जाए जिससे कि सैद्धांतिक पक्षों में उलझे बिना वैज्ञानिक तथ्यों की जानकारी हो सके, लोकप्रिय विज्ञान कहलाता है। विज्ञान, साहित्य से भिन्न होता है तथा इसमें मनचाहे शब्दों का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। विज्ञान अपने आप में एक अनुशासित विषय है तथा इसकी अपनी भाषा होती है। इसमें तकनीकी शब्दावली का ही प्रयोग अपेक्षित है जिसमें शब्दार्थ एवं भावार्थ दोनों एक ही होते हैं। अतः जो लोग यह तर्क देते हैं कि शब्दावली आयोग द्वारा निर्धारित की गई पारिभाषिक शब्दावली क्लिष्ट है, सरलीकरण होना चाहिए, उन लोगों को ध्यान रखना चाहिए कि शब्द कभी क्लिष्ट नहीं होते हैं। शब्द हमेशा परिचित एवं अपरिचित ही होते हैं। जितना-जितना उनसे परिचित होने का अभ्यास होता रहेगा, वे सरल लगने लगेंगे।

आज अनुसंधानकर्त्ताओं द्वारा ऐसे तथ्यों और शब्दों का पता लगाया जा रहा है जिन्हें जन सामान्य की भाषा में व्यक्त ही नहीं किया जा सकता है, जैसे क्वांटम सिद्धांत, पार्टिकल फिजिक्स अथवा वनस्पति विज्ञान में पौधों के वर्गीकरण से संबंधित कुलों के नाम, ऐसे शब्दों को हिन्दी के किसी विशेष शब्द द्वारा नहीं समझाया जा सकता है। इनका ज्यों का त्यों प्रयोग करना ही श्रेयस्कर रहता है क्योंकि ये जन मानस में प्रचलित हो चुके हैं, जैसे हारमोन, विटामिन, एक्स-रे, अल्ट्रासाउन्ड, कम्प्यूटर, इंटरनेट, जीनोम आदि।

किसी भी ज्ञान-विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में भाषा, लेखन शैली एवं लेखन विधा का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। संभवत इसीलिए लेखन की अनेक अन्य विधाओं का विकास हुआ है, जैसे कथा, कहानी, कार्टून, गल्फ, कविता, नाटक, लेख, फीचर, समाचार कथा आदि। इस कारण आज विज्ञान साहित्य भी प्रचुर मात्रा में इन विधाओं में प्राप्त हो रहा है। बच्चों में वैज्ञानिक रूचि एवं जागृति उत्पन्न करने के लिए तो ये विज्ञान कथाएँ बहुत ही प्रभावी माध्यम हैं। अतःएव बाल विज्ञान कथा लेखन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हिन्दी विज्ञान लेखन में नाटक विधा का भी समावेश हो चुका है। इसके द्वारा वैज्ञानिक जानकारी देने, अवैज्ञानिक भ्रांतियों का निवारण करने तथा विज्ञान में रूचि उत्पन करने का सफल प्रयास किया जा सकता है। विज्ञान लेखन की एक विधा `चम्पू' भी है। इस शैली में गद्य तथा पद्य दोनों का उपयोग होता है। मोटेतौर पर इसे लोग `नौटंकी' विधा भी कहते हैं। आजकल साक्षरता के प्रचार में दूरदर्शन पर अनेक विज्ञापन इसी शैली में आते है। विज्ञान लोकप्रियकरण के सिलसिले में आयोजित नाटकों एवं नुक्कड़ नाटकों में यह विधा उपयोगी होती है। इसमें वार्तालाप के बीच-बीच में, प्रभावी कविताओं तथा शेर-शायरी का उपयोग किया जाता है। विज्ञान लेखन को ललित बनाने में यह शैली अत्यन्त ही उपयोगी है।

संचार माध्यमों में विज्ञान लेखन[सम्पादन]

विज्ञान लेखन कई विधाओं- कहानी, गल्प, कार्टून, कविता, पहेली चुटकुले, नाटक, कथा आदि में मिलता है।

संचार माध्यम : रेडियो, दूरदर्शन, समाचार पत्र में कुछ विशिष्टता है।

देहाती क्षेत्रों में रेडियो आज भी बहुत लोकप्रिय संचार माध्यम है। आकाशवाणी द्वारा समय-समय पर विज्ञान वार्ताएँ, कृषि एवं विज्ञान समाचार, मौसम संबंधी जानकारी सुलभ कराई जाती हैं। इसमें विशेषज्ञों से आलेख अथवा उन्हें परिचर्चा में आमंत्रित किया जाता है। आकाशवाणी द्वारा ज्वलंत समस्याओं एवं नवीन विषयों-एड्स, लेसर चिकित्सा, पर्यावरण प्रदूषण, जनसंख्या नियंत्रण, गर्भावस्था एवं स्वास्थ्य सुरक्षा, कम्प्यूटर सूचना प्रौद्योगिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी पर विज्ञान नाटक, कविताएँ आदि भी आमंत्रित की जाती हैं।

रेडियो पर कार्यक्रम देते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि आपके एवं श्रोता के बीच दीवार न हो। आपकी बात तभी श्रोता के मन में उतरेगी जब वह उसके काम की होगी, उसकी जानकारी बढ़ाती होगी और जिज्ञासा शांत करती होगी। श्रोता आपके सामने नहीं है। उस तक मात्र आपकी आवाज़ ही पहुँच रही है। अतः आपके सम्प्रेषण में यदि जान है तो वह आपकी बात को कभी अनसुना नहीं कर सकता। अतः आप ऐसे कार्यक्रम बोलचाल की भाषा में लिखें व पढ़ें। लिखने की भाषा में तो एक प्रबद्धता होती है परंतु बोलते समय यह जरूरी नहीं कि व्याकरण के नियमों के अनुसार ही वाक्य मुँह से निकलें।

अतः विज्ञान वार्ता में श्रोता वर्ग का ध्यान रखते हुए आप बोलने की भाषा ही लिखिए, न कि लिखने की भाषा। यदि आप स्वयं वार्ता दे रहे हैं तो आप उसे आलेख के रूप में न पढ़ें वरन बोलें, क्योंकि बतकही का एक अलग ही रस होता है, जो आपकी वार्ता में नहीं हुआ तो उसे सुनेगा कौन?

आप विज्ञान वार्ता में श्रोता वर्ग का खास ध्यान रखें। बच्चों के लिए वार्ता है तो भारी शब्द, लंबे वाक्य, संयुक्ताक्षर वाले शब्दों से बचें। आँकड़ों के मायाजाल से बचे। युवाओं के लिए संबोधित कार्यक्रमों में उनकी आकांक्षाओं और सपनों के अनुरूप विज्ञान की नयी-नयी दिशाओं का बोध कराने वाली जानकारी होनी चाहिए।

एक बात का ध्यान रखें कि आपकी वार्ता किसी अंधविश्वास का समर्थन नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह वैज्ञानिक चेतना जागृत करने में बाधक होता है। इसके अतिरिक्त आप समाचार पत्रों में, पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञान स्तंभ के अन्तर्गत ऐसा क्यों होता है, बूछो तो जाने, विज्ञान पहेली, विज्ञान कविता आदि भी लिख सकते हैं।

  • अपना वैज्ञानिक ज्ञान परखिए - चार संभावित उत्तर देते हुए विविध विषयों पर 15-20 प्रश्न बनावें।
  •          खेल-खेल में विज्ञान-साइंस मॉडल।
  •          विचित्र विज्ञान रहस्यों से संकलित समाचार।
  •          ऐसा क्यों होता है-मेंहदी का रंग, जुगनू की चमक, कम्प्यूटर की प्रणाली, दांत की सीमेन्ट।
  •          विज्ञान हमारे आस-पास प्रयोग दिखावें।
  •          विज्ञान कार्टून-चित्रों एवं कार्टून द्वारा विज्ञान विषयक जानकारी।
  •          क्या और कैसे - वैक्सीन
  •          विज्ञान क्व़िज।

आज के युग में विज्ञान लेखन में लेखकों को निम्न बिन्दुओं पर ज़रूर विचार करना चाहिए-

  •          लेखक को विषय वस्तु का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।
  •          लेखकों को पाठकों के मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा बौद्धिक स्तर का भी ज्ञान रखना चाहिए।
  •          लेखों की भाषा सरल, सुबोध तथा जन सामान्य की समझ की होनी चाहिए।
  •          इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रयोग शब्दावली के प्रचार-प्रसार के लिए करना चाहिए।
  •          विज्ञान के ज्वलंत विषयों में लोकोपयोगी साहित्य का सृजन होना चाहिए।
  •          वरिष्ठ वैज्ञानिकों को अँग्रेज़ी का मोह त्याग कर हिन्दी में लेखन करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना चाहिए।

अंत में यह कहना चाहूँगा कि आज हिन्दी में विज्ञान का भविष्य बहुत उज्जवल हो चुका है। वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, केन्दीय निदेशालय एवं हिन्दी ग्रंथ अकादमियों तथा स्वयं सेवी संस्थाओं प्रमुखत विज्ञान परिषद् प्रयाग ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। आज हिन्दी में विज्ञान विषय पर लगभग 3000 से अधिक लेखक विद्यमान हैं जिनमें 150 महिलाएँ भी सम्मिलित हैं तथा हिन्दी में विभिन्न विज्ञान विषयक लगभग एक सहस्त्र पुस्तकें प्रकाशित भी हुई हैं। आज हमें आत्मविश्वास तथा निष्ठा की ज़रूरत है। जब तक हर विज्ञान प्रेमी नित्य ही हिन्दी में लिखेगा नहीं तब तक प्रगति मंद रहेगी। इस संबंध में हमारे मनीषियों का भी यही सुझाव है कि हिन्दी का विकास तभी संभव है जब यह शीघ्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान की भाषा बन जाए। तो आइये, राज्यादेश की अनुपालना करने का संकल्प लें और हिन्दी माँ की गरिमा बढ़ायें।

मनोरंजन जगत को मालामाल करती हिंदी[सम्पादन]

आज हिन्दी की व्यापक लोकप्रियता और इसे संप्रेषण के माध्यम के रूप में मिली आम स्वीकृति किसी संवैधानिक प्रावाधान या सरकारी दबाव का परिणाम नहीं है। मनोरंजन और फिल्म की दुनिया ने इसे व्यापार और आर्थिक लाभ की भाषा के रूप में जिस तरह विस्मयजनक रूप से शनैः शनैः स्थापित किया। उसने आज इसके पारंपरिक विरोधियों व उनके दुराग्रहों का मुंह बंद कर दिया है। आज हम स्पष्ट देख रहे हैं कि आर्थिक सुधारों व उदारीकरण के दौर में निजी पहल का जो चमत्कार हमारे सामने आया है इससे हम मानें या न मानें हिन्दी दुनिया भर के दूरदराज़ के एक बड़े भू-भाग में समझी जाने वाली भाषा स्वतः बन गई है।

यदि हम पीछे मुड़कर देखें तो पाएंगे कि स्पीलबर्ग के 'जुरासिक पार्क' ने हमारे देश में जितना धन अपने हिन्दी संस्करण से अर्जित किया वह इसके अँग्रेज़ी के मूल चित्र से दुगुने से अधिक था। यही हाल स्टार या बी.बी.सी. चैनल का है जो भारत में हिन्दी कार्यक्रमों या वे सीरियल जो हिन्दी में 'वायस ओवर' के द्वारा प्रसारित किए जा रहे हैं उनका महत्व समझता है। भाषा-स्थानांतरण दुनिया के उत्कृष्ट कार्यक्रमों को हिन्दी के माध्यम से रातों-रात करोड़ों नए दर्शक दे रहा है। यह स्वतंत्र बाज़ार और प्रतिस्पर्धा का आज का स्वीकृत खेल है और अब भाषा को भावनात्मक विरोध का विषय बनाकर कुछ निजी राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित लोग हिन्दी के प्रति विषवमन सरलता से नहीं कर पाएंगे।

राजभाषा के रूप में हिन्दी को संशय से देखने वाला अँग्रेज़ी मीडिया का एक बड़ा वर्ग कितने ही पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हो या मातृभाषा के रूप में हिन्दी भाषी भी इसे संकोच या हीनता-भाव से बोले; सच तो यह है कि उपभोक्ता संस्कृति में, लाभ की भाषा, बिकने की भाषा, बाज़ार व विपणन की भाषा सबसे बड़ी होती है। हिन्दी की व्यावसायिक सामर्थ्य बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भली-भाँति समझती है। कुछ साल पहले जब विख्यात पॉप स्टार मुंबई आए उस समय 'मीडिया हाईप' द्वारा अभूतपूर्व उत्साह उत्पन्न किया गया था अँग्रेज़ी के अखबार व चैनल इसे उस वर्ष की सबसे बड़ी सांस्कृतिक गतिविधि बनाना चाहते थे। यह भी प्रचारित किया गया कि वे कुछ पंक्तियाँ हिन्दी में भी प्रस्तुत करेंगे। टाइम्स समूह के एक प्रमुख पत्र के प्रथम पृष्ठ के तीन कॉलम में फैले इस समाचार का शीर्षक था 'माइकल जैक्सन का एक रॉक-शो हिन्दी में।' उसके बाद कई दिन तक जी.टी.वी. के समाचार में माइकल जैनसन को हिन्दी में, थोड़ी मुश्किल से, यह बोलते दिखाया गया, 'मैं आ रहा हूँ, यह मेरा वादा है। जो माइकल जैक्सन के अंतर्राष्ट्रीय आयोजक पेप्सिको हिन्दी की ताकत को डालर में तौलने की क्षमता युक्त थे।

एक बात अवश्य है कि एक ओर हिन्दी भाषा बाज़ार और मुनाफ़े की कुंजी बन रही है वहीं 'हिंगलिश', 'इंडिक', 'बटलर', 'इंडिगी', 'भेल पुरी इंगलिश', 'बिरयानी इंगलिश', 'सींगलिश' या 'स्विच-स्वैप' या 'खिचड़ी इंगलिश' को हमारा मीडिया अँग्रेज़ी के बचे खुचे दंभ की ओर ही इंगित करता है। हिन्दी की सामर्थ्य स्वीकार करने के बाद भी भाँडों या विदूषकों की इस कृत्रिम भाषा से हिन्दी की शालीनता, सक्षमता और प्रभावोत्पादकता से खिलवाड़ जारी है। श्रव्य-दृश्य मीडिया में हिन्दी तो है पर इसी अघोषित लिपि रोमन हो गई है। 'स्टार के हिन्दी अवतार' पर कुछ देश के ही समाचार पत्रों ने मीडिया जगत के बेताज बादशाह रूपर्ट मर्डोक के न्यूजकार्प के हिन्दी प्रेम का मखौल भी उड़ाया था।

आज हालीवुड के फिल्म निर्माता भी भारत में अपनी विपणन नीति बदल चुके हैं। वे जानते है। कि यदि उनकी फिल्में हिन्दी में रूपांतरित की जाएगी तो यहाँ से वे अपनी मूल अँग्रेज़ी में 'निर्मित चित्रों' के प्रदर्शन से कहीं अधिक मुनाफ़ा कमा सकेंगे। पश्चिमी फिल्मों के 'ब्लाकबस्टर' कहलाने वाली हिन्दी 'प्रिंटस' की हमारे देश में जितनी खपत होती है वह अँग्रेज़ी 'प्रिंटों' की संख्या से कहीं अधिक है। इसमें यदि उन्हीं फिल्मों की भोजपुरी, तमिल या तेलगु भाषा की प्रिंटस की संख्या जोड़ी दी जाए तो आज मूल अँग्रेज़ी भाषा की फिल्मों की लोकप्रियता का भंडा स्वतः फूट जाता है।

सोनी पिक्चर्स के विक्रमजीत राम के अनुसार विदेशी फिल्मों की नई मजबूरी यह है कि अब वे भी 'स्वदेशी तड़का' लगने से ही अधिक बिकती है । चाहे 'स्पाइडर मैन 3' हो, 'कैसिनो रायल' जैसी फिल्म हो अथवा 'पाइरेट्स ऑफ द कैरेबियन' या 'हैरी पॉटर एण्ड द आर्डर ऑफ फीनिक्स'- इन सभी फिल्मों के हिन्दी संस्करण का प्रदर्शन अँग्रेज़ी फिल्मों के अनुपात में कहीं अधिक हुआ है। 'हिन्दी में डबिंग' किए हुए अँग्रेज़ी फिल्मों के इन संस्करणों ने उन्हें देश में लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचाया है। उदाहरण के लिए अँग्रेज़ी फिल्म 'कैसिनो रॉयल' के देश के कुल 427 प्रिंटस में से मात्र 130 प्रिंट अँग्रेज़ी में और बाकी 297 प्रिंट हिन्दी व भारतीय भाषाओं में थे। इस फिल्म ने बॉक्स आफिस पर 42 करोड़ रुपये कमाए थे। 'हाई हार्ड 3' नामक फिल्म के हिन्दी में 96 प्रिंटस बने जबकि अँग्रेज़ी में मात्र 50 प्रिंटस जारी किए गए ।

'स्पाइडर 2' ने देश में 35 करोड़ रुपये अर्जित किए थे। इसके 304 प्रिंटस में मात्र 94 प्रिंटस अँग्रेज़ी में थे। 'स्पाइडर मैन 3' ने कुल 66 करोड़ रुपये का व्यवसाय किया था। इसके हिन्दी प्रिंट के साथ-साथ भोजपुरी में भी 7 प्रिंटस बनाए गए थे। जिसके द्वारा इतना धन कमाया गया था कि फिल्म उद्योग से जुड़ेल लोग चकित थे। सूत्रों के अनुसार निकट भविष्य में जैकी चान की ऐक्शन व मारधाड़ वाली फिल्म 'रश आवर 3' की 100 प्रिंटस हिन्दी में और मात्र 50 प्रिंटस अँग्रेज़ी में देश भर में दिखाए जाएंगे। हालीवुड की आज की वैश्विक बाज़ार की परिभाषा में हिन्दी जानने वालों का महत्व सहसा बढ़ गया है। भारत को आकर्षित करने का उनका अर्थ अब उनकी दृष्टि में हिन्दी भाषियों को भी उतना ही महत्व देना हैं। हमारे अँग्रेज़ी भक्त बुद्धिजीवी हिन्दी क्षेत्र को सदैव 'काउबेल्ट', 'हिन्दी बैकपाएर्स', 'हिन्दी हिन्टरलैण्ड' या पिछड़ी, सुप्त, गोबरपट्टी कहते नहीं अघाते हैं पर आज बाज़ार की भाषा ने हिन्दी को अँग्रेज़ी की अनुचरी नहीं सहचरी बना दिया है।

अभी कुछ दिन पहले मुंबई की जानी मानी विज्ञापन एजेंसी के सर्वेक्षण द्वारा कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। देश में प्रकाशित मुद्रित विज्ञापन आज 70 प्रतिशत से अधिक अँग्रेज़ी में होते हैं और हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं को मात्र 11.3 प्रतिशत विज्ञापन प्राप्त होते हैं। पर टी.वी. के विविध चैनलों में यह प्रतिशत उल्टा है। आज कुल मिलाकर टी.वी पर प्रसारित हिन्दी विज्ञापनों का प्रतिशत 93.7 है। जबकि अँग्रेज़ी के विज्ञापन केवल 7 प्रतिशत हैं। आज टी.वी. देखने वालों की कुल अनुमानित संख्या जो लगभग 10 करोड़ मानी गई है उसमें हिन्दी का ही वर्चस्व है। (नलेस)

प्रबंधन और हिन्दी[सम्पादन]

  भाषाओं की नस-नस एक-दूसरे से गुथी हुई है

(मगर उलझी हुई नहीं)

हमारी साँस-साँस में उनका सौन्दर्य है

(मॉ ड र्निस टिक्) कहो मत

अभी हमें लड़ने दो

  यब स्टेज महान

मूर्खों के लिए ही है

आह यह आधुनिक स्टेज

परिस्थितियाँ हीरो हैं

और यांत्रिक राजनीति हिरोइनें

  कविता में आगे कहा है-   इस नाटक के लिए

आधुनिकतम निर्देशक अमरीका से बुलाओ

और फ़्रांस से । और जापान से

तभी हम लिखेंगे और रक्त के समान उज्ज्वल

हमारी भाषाओं का तिलक होगा।।

(शमशेर)

एक बड़ा कवि आने वाले समय की हक़ीक़त को देख ही लेता है। आज हिन्दी को वैश्विक संदर्भ में देखने का हमारा नज़रिया अब पहले जैसा नहीं रहा है। पिछली पीढ़ी को इस बात की चिंता अधिक थी कि किस तरह हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में मान्यता मिल जाए और यह कह दिया जाए कि हाँ- तुम्हारी भाषा महान् और फिर हम सिर उठा कर कहें कि हिन्दी भाषा महान्। आज उस मान्यता के अध-खुले परदे दार दरवाज़े पर खड़े हम, दो प्रकार के लोगों में विभक्त हो गए हैं। एक वही पीढ़ी, जो इसे यानी हिन्दी को राष्ट्र संघ की मान्यता दिलवाना, अपने लंबे संघर्ष का परिणाम मानती है और एक वह नयी पीढ़ी जिसे इस बात का एहसास संभवतः है कि इसमें केवल बुज़ुर्गों का संघर्ष शामिल नहीं है, बल्कि अमरीका का अस्तित्व-संघर्ष भी ज़िम्मेदार है। अब हिन्दी राष्ट्र संघ की भाषा अवश्य बनेगी क्यों कि अब अमरीका को इसकी आवश्यकता है। हिन्दी का आगामी सम्मेलन न्यूयॉर्क में तय होना तथा अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का 2007 जून से लाग होना निश्चय ही एक-दूसरे के साथ जुड़ी घटना के रूप में देखा जाना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद क्या हम हिन्दी का वज़नदार थैला उठा कर चले थे जिसे  हमने संयुक्त राष्ट्र संघ के दरवाज़े पर ही छोड़ दिया और फिर घर आ कर धुंध और धूल में पड़ी अंग्रेज़ी को अपने आँचल से बड़े प्यार से, कुछ-कुछ अपराध-भाव से, साफ़ करने और सहलाने में लग गए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस बात पर अपना ध्यान केन्द्रित करें कि कहीं कुछ ही समय के बाद थैले में पड़ी-पड़ी हमारी हिन्दी एक ख़ूबसूरत पैकिंग में किसी निश्चित पेकेज के साथ हमें एक विदेशी भाषा के रूप में पढ़ने की नौबत न आ जाए। वैश्वीकरण के इस युग में जब भाषा और लिपि यंत्र-बद्ध हो गयी है, कंप्यूटर टेक्नॉलॉजी और सॉफ़्टवैर प्रोग्रामिंग का इतना विकास हो गया है कि अब भाषा, उच्चारण, ध्वनियाँ, हिज्जे, व्याकरण - सर्व-जन-सुलभ हो गया है अतः उसमें किसी भी प्रकार के परिवर्तनों के लिए किसी की कोई बपौति नहीं है। कहीं ऐसी नौबत न आ जाए कि अँग्रेज़ीदाँ हमारी इस नई पीढ़ी को विदेशियों से हिन्दी भाषा को पढ़ना पड़े। अंग्रे़ज़ी के गढ़ में इंडियन इंग्लिश को जगह मिली अवश्य है, पर सर्जनात्मक स्तर पर। उनके प्रशासनिक कामकाज में भारतीयकृत अंग्रेज़ी को कोई स्थान नहीं है।

और अमरीका कोई यशोदा थोड़े ही हैं कि हौं तो धाय तिहारे सुत की, कृपा करत ही रहियो - कह कर हमारे सांस्कृतिक अधिकार को स्वीकार करेगा। बहु-सांस्कृतिकता वाद के इस दौर में टाट के तार-तार परदे के उस पार खड़ा है अमरीकी पठान तथा इस पार अपनी अस्मिता को बचाते वे देश तथा उनकी संस्कृति हैं, जो अमरीका के धन-वर्चस्व के सामने विवश नज़र आते हैं। तब तक कोई नया दार्शनिक सिद्धांत प्रचलित हो जाएगा जिसके तहत बहु-संस्कृति वाद के विरोधी अथवा आगे के कदम के रूप में विश्व-संस्कृति वाद की चर्चा होने लगेगी। इसके तहत यह कहा जाएगा कि चूँकि  संस्कृति- विधान, सामाजिक नियम तथा विधि-विधान मनुष्य की सुविधा के लिए बनाए गए हैं अतः सुविधाओं के बदलने के साथ-साथ सभी कुछ बदल जाता है अथवा तो बदल जाना चाहिए। अतः यह आग्रह करना ही व्यर्थ साबित हो जाएगा कि हाँ, हिन्दी हमारी है। हमारी भाषा के राज-सिंहासन पर बैठा दिलकश बाज़ार और खतरनाक शस्त्र कभी उससे अपना दिल बहलाएगा और कभी  वह खतरनाक शस्त्रों का जिरह-बख़्तर बन कर स्वयं अपने आप को लहुलुहान करती रहेगी।

विश्व मंच पर अब हिन्दी को एक सर्वथा नए विधान तथा नई चुनौतियों के साथ उपस्थित होना होगा। निश्चित् रूप से इन चुनौतियों का सामना हम नहीं करेंगे तो कोई और कर लेगा। क्योंकि वैश्वीकरण ने जिन उपकरणों का निर्माण किया है वे सभी के लिए हैं। इन चुनौतियों के कई स्वरूप हो सकते हैं। इसके अन्तर्गत हिन्दी कॉरपोरा- अर्थात् - कॉरपोरेट जगत और हिन्दी, हिन्दी कंप्यूटिंग, हिन्दी प्रबंधन आदि की बात की जा सकती है। हिन्दी भाषा प्रौद्योगिकी की गहरी उपस्थिति से यह बात अब नई नहीं रही कि भाषा भी अब एक विकास का, भौतिक विकास का उपकरण बन गयी है। वह भाषा जो आध्यात्मिक, नैतिक, संवेदनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम थी और है वह अब भौतिक विकास का भी साधन है। हिन्दी भाषा की यह माध्यम से साधन तक की गति का ही परिणाम है कि अब उसके बारे में नए ढंग से सोचने में अगर विलंब हुआ तो विश्व मंच पर हमारी भूमिका एक दर्शक-भर की रह जाएगी।

इस प्रपत्र के माध्यम से मैं हिन्दी और प्रबंधन के संदर्भ में कुछ सह-चिंतन करने का उपक्रम करना चाहती हूँ। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर अभी विशेष सोचा नहीं गया है। पहली बार सन् 1995-96 में जब भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद से मुझे यह कहा गया कि हमें हिन्दी में काम कर सके ऐसे एक व्यक्ति की नियुक्ति करनी है, पर स्थाई नहीं क्योंकि हमारे यहाँ हिन्दी का क्या काम। पर चूँकि सरकार का यह नियम और आग्रह है अतः हमें किसी को रखना होगा। हम उस पर अधिक धन नहीं खर्च करना चाहते। तब तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में मैंने यह कहा था कि आप का सोचना गलत है क्योंकि अब आपको इसकी आवश्यकता पड़ेगी। प्रबंधन में जब हमारे पास इतनी बड़ी और ख्याति-प्राप्त संस्था है तब इसके द्वारा ही हम हिन्दी की और प्रकारांतर से भारत की स्थिति विश्व में दृढ कर सकते हैं। एक सहज हिन्दी-प्रेम के कारण मेरे मन में यह बात दृढ होती गयी कि हिन्दी को लेकर यह उपेक्षा का भाव किसी भी क़ीमत पर दूर होना चाहिए। समय समय का काम करता है और जैसा कि कवि ने कहा है कि विश्व मंच पर नायिका राजनीति का ऐसा कमाल हुआ कि सन् 2007 जनवरी में विश्व हिन्दी उत्सव में बोलते हुए मैनेजमैंट गुरु श्री अरिंदन चौधरी ने कहा कि प्रबंधन के व्यावहारिक क्षेत्र में न अंग्रेजी चलती है न ही मातृ भाषा, वहाँ तो केवल हिन्दी ही चलती है। अरिंदन चौधरी के इस कथन ने मुझे बाध्य किया कि मैं अपनी उस बात को क्रिया- रुप में ढालूं। इस हेतु से प्रबंधन के पाठ्य क्रम में हिन्दी को कैसे स्थान मिल  सकता है, उसे किस प्रकार उसमें शामिल किया जा सकता है उस पर थोड़ा सोचा है। इस संदर्भ में मैंने प्रबंधन पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले युवा पीढ़ी के अध्यापकों को तथा गुजरात और गुजरात बाहर के कुछ विद्यार्थियों से भी बातचीत की है। सभी इस बात से सहमत थे कि हिन्दी को प्रबंधन पाठ्यक्रम में लाना उचित होगा। इस बात को दो-तरफा देखा जा सकता है। हिन्दी पाठ्यक्रमों में प्रबंधन और प्रबंधन के पाठ्यक्रमों में हिन्दी।

हिन्दी पाठ्यक्रमों में प्रबंधन[सम्पादन]

इस के अन्तर्गत  पाठ्यक्रम के परंपरागत युनिट्स को प्रबंधन की दृष्टि से पढ़ाया जा सकता है। जैसे रामचरितमानस का सोश्यल एंड फैमिली बिहेव्रियल मैनेजमैंट की दृष्टि से अध्ययन किया जा सकता है। चूँकि रीतिकालीन कविता में धन-प्राप्ति कवियों का एक प्रमुख उद्देश्य रहा था। साथ ही परंपरागत रूप से हीन काव्य के रूप में जाना जाने वाला चित्र-काव्य उसमें बहुतायत से लिखा गया था। वह अपने स्वरूप तथा प्रकृति में विज्ञापन की दृष्टि से नए ढंग से पढ़ाया जा सकता है। प्रयोजन मूलक पाठ्यक्रमों में, इस दृष्टि से रीतिकाल का अध्ययन किया जा सकता है। इसके अलावा अन्य विषयों पर भी सोचा जा सकता है। आज यह इसलिए भी ज़रूरी हो गया है क्योंकि समाज तथा व्यवहार-जगत में स्पष्ट दिखाई पड़ते मूल्य-ह्रास तथा मूल्य-परिवर्तन तथा बाज़ार की अंधी तथा तेज़ दौड़ में हमारे परंपरागत साहित्य के पाठ्यक्रमों पर एक प्रश्न-चिह्न लगता जा रहा है। अंग्रेज़ी के पाठ्यक्रमों में प्रयोजन मूलक, भाषा तथा साहित्य के पाठ्यक्रमों सें किसी भी प्रकार का संघर्ष इसलिए नहीं दिखाई पड़ता क्योंकि वहाँ सोच का लचीलापन अधिक है और साथ ही शाश्वतता के भ्रम-मूलक विचारों से वे मुक्त हैं। अथवा टिके रहने के लिए वे आगे बढ़ने में किसी भी प्रकार का परहेज़ नहीं करते।  

प्रबंधन के पाठ्यक्रमों में हिन्दी[सम्पादन]

प्रबंधन के पाठ्यक्रम का एक उद्देश्य यह है कि उत्पादन तथा कार्य विधि (ऑपरेशनल) की दृष्टि से नए विषयों को इसमें जोड़ा जाए। चूँकि उत्पादन का अंतिम सिरा ग्राहक है, अतः ग्राहक की भाषा अपने आप में महत्वपूर्ण हो जाती है। कार्य विधि का संबंध भी केवल अंग्रेज़ी के जानकारों या किसी एक भाषा विशेष के जानकारों की बपौती नहीं है, अतः इस पाठ्य क्रम में हिन्दी के समावेश की स्थति सहज ही बनती है, जहाँ तक भारत जैसे देश का प्रश्न है।  

  •             अगर प्रबंधन को प्रभावक बनाना है(इफेक्टिव मैनेजमैंट) तो हिन्दी से बेहतर कोई भाषा काम नहीं आ सकती। प्रबंधन की प्रकृति तथा संभावनाओं में यह एक पाठ्य बिन्दु है।

 

  •             नए लोगों की नियुक्ति में भाषा का एक महत्वपूर्ण रोल है। बीरबल की उस कथा को याद रखना चाहिए कि व्यक्ति आपत् काल में केवल अनी भाषा में ही अभिव्यक्त होता है। तथा जब उसे औचक पकड़ना हो तब केवल उसकी अपनी भाषा के द्वारा ही ऐसा संभव हो पाता है। देश के संदर्भ में भी यह सच है। आपत् काल में किसी भी देश की नब्ज को उसकी भाषा के द्वारा ही समझा जा सकता है। ख़ास कर जब वह एक लोकतांत्रिक देश हो।

 

  •              किसी भी संस्थान में नियुक्ति के लिए जो परीक्षाएं ली जाती हैं उनमें उसका विषय गत ज्ञान अवश्य ही अंग्रेजी में मालूम किया जा सकता है। परन्तु व्यक्ति की आंतरिक ताकत,  उसके स्वभाव तथा उसके चरित्र का वास्तविक परीक्षण उसकी अपनी भाषा में उससे बातचीत कर के ही लिया जा सकता है। परीक्षण का यही आधार किसी भी कंपनी की उन्नति  का आधार बन सकता है।

 

  •             मार्केटिंग, विज्ञापन, औद्योगिक संबंध एवं निजी प्रबंधन कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ हिन्दी की एक महत्व पूर्ण भूमिका है। प्रबंधन में अब तक प्रयुक्त परंपरागत भाषा अंग्रेज़ी का तुलना में हिन्दी किस तरह बेहतर परिणाम ला सकती है, ऐसे विषयों पर शोध करवाने चाहिए ताकि वस्तु स्थिति का पता चल सकता है।

 

  •             इनमें सबसे मौजूं तथा महत्वपूर्ण मुद्दा नेतृत्व एवं संप्रेषण का है। जैसे कम्युनिकेशन स्किल्स इन इंग्लिश का चलन है,  वैसे अब कम्युनिकेशन स्किल्स इन हिन्दी का समय आने वाला है। बल्कि आ गया है। हमारी सरकार भले ही अंग्रेज़ी पर भार रख कर अनेक आयोजन कर रही है। इस बात की चिंता कर रही है कि उसके कर्मचारी अच्छी अंग्रेजी में बात करें। पर इस मामले में तो यही कहा जा सकता है कि हमारी नींद देर से खुली है। वह समय पीछे निकल चुका है और हम अपने उसी पुराने समय के अनुसार जीवन जी रहे हैं। छठी शताब्दी में जगे बुद्ध 21 वीं शताब्दी में छठी शताब्दी के अनुसार रहेंगे तो पिछड़े ही कहलाएंगे। अब तो समय भारत के लिए हिन्दी का ही है। अगर राष्ट्र-प्रेम नहीं तो बाज़ार ही इस बात को सिखलाएगा तथा सिद्ध करेगा।   

 

  •             नेतृत्व तभी सफल होता है जब अपनी भाषा में किया जाता है। सोनिया गांधी तथा लालू प्रसाद जी इसके अच्छे उदाहरण है।

              यह कुछ आरंभिक सोच है जिस पर भविष्य में काम करने की इच्छा है।

संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को लाने का समय[सम्पादन]

संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को लाने का यह अनुकूल समय है। भारत सरकार को केवल डेढ़ करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करने होंगे, संयुक्त राष्ट्र के आधे से अधिक सदस्यों की सहमति लेनी होगी और उसकी कामकाज नियमावली की धारा -51 संशोधन करवाकर हिन्दी का नाम जुड़वाना होगा। इस मुद्दे पर देश के प्रायः सभी राजनीतिक दल भी सहमत हैं।

कौन भारतीय है, जो अपने राष्ट्र की भाषा को विश्व-मंच पर दमकते हुए देखना नहीं चाहेगा। जिन भारतीयों को अपने प्रांतों में हिन्दी के बढ़ते हुए वर्चस्व पर कुछ आपत्ति है, वे भी संयुक्त राष्ट्र में  हिन्दी लाने का विरोध नहीं करेंगे, क्योंकि वे जानते हैं कि विश्व मंच पर 19 भाषाएँ भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकतीं। वे यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि विश्व-मंच पर भारत ‘गूँगा’ बनकर बैठा रहे। अगर हमने संयुक्त राष्ट्र में पहले हिन्दी बैठा रहे । अगर हमने संयुक्त राष्ट्र में पहले हिन्दी बिठा दी, तो हमें सुरक्षा परिषद में बैठना अधिक आसान हो जाएगा।

1945 में संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाएँ केवल चार थीं। अँग्रेज़ी, रूसी, फ्रांसीसी और चीनी । सिर्फ ये चार इसलिए क्योंकि ये पाँच विजेता महाशक्तियों की भाषाएँ थीं । अमेरिका और ब्रिटेन दोनों की अँग्रेज़ी, रूस की रूसी, फ्रांस की फ्रांसीसी और चीन की चीनी। इन भाषाओं के मुकाबले इतालवी, जर्मन जर्मनी, जापानी आदि भाषाएँ किसी तरह कमतर नहीं थी, लेकिन वे विजित राष्ट्रों की भाषाएँ थीं। यानी जिस भाषा के हाथों तलवार थी, ताकत थी, विजय-पताका थी, वही  सिंहासन पर जा बैठी। क्या अब 62 साल बाद भी यही ताकत का तर्क चलेगा।

1945 में जो चार भाषाएँ संयुक्त राष्ट्र की अधिकृत भाषाएँ बनीं, उनमें1973 में दो भाषाएँ और जुड़ीं। हिस्पानी और अरबी ! इन दोनों भाषाओं को संयुक्त राष्ट्र में शक्ति बल के कारण नहीं, संख्या बल के कारण मान्यता मिली।

हिन्दी को तो पता नहीं, किन-किन बलों के कारण मान्यता मिलनी चाहिए। सबसे पहला कारण तो यह है कि हिन्दी को मान्यता देकर संयुक्त राष्ट्र अपनी ही मान्यता का विस्तार करेगा । उसके लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया का यह शुभारम्भ माना जाएगा। 62 साल से विजेता और विजित के खाँचे में फँसी हुई संयुक्त राष्ट्र की छवि का परिष्कार होगा। दूसरा, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र दुनिया के दूसरे के सबसे बड़े लोकतंत्र, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश और  दुनिया के चौथे सबसे मलादार देश की भाषा को मान्यता देकर संयुक्त राष्ट्र अपना गौरव खुद बढ़एगा। तीसरा, हिन्दी को मान्यता देने का अर्थ है-तीसरी दुनिया और गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों को सम्मान देना। भारत इन राष्ट्रों का नेतृत्व करता रहा है।

चौथा, हिन्दी विश्व की  सबसे अधिक समझी और बोली जाने वाली भाषा है। संयुक्त राष्ट्र की इन भाषाओं में चीन की अधिकृत भाषा ‘मेंडारिन’ को बोलने-समझने वालों की संख्या विभिन्न भाषाई-विश्व कोशों में लगभग 85 करोड़ बताई जाती है। उसे 100 करोड़ भी बताया जा सकता है, लेकिन असलियत क्या है ? असलियत के बारे में बहुत-से मतभेद हैं। चीन में दर्जनों स्थानीय भाषाएँ हैं। उन्हें लोग दुभाषियों के बिना समझ ही नहीं पाते । मैं स्वयं 8-10 बार चीन घूम चुका हूँ। एक-एक माह वहाँ रहा हूँ। मुझे कई बार दो-दो तरह के दुभाषिए एक साथ रखने पड़ते थे। अगर यह मान लें कि दुनिया में चीनी भाषियों की संख्या एक अरब है, तो भी इससे हिन्दी पिछड़ नहीं जाती। आज हिन्दी भाषियों की संख्या एक अरब है, तो भी ज्यादा है। सिनेमा और टीवी चैनलों की कृपा से अब लगभग सारे भारत के लोग हिन्दी समझ लेते हैं। और ज़रूरत पड़ने पर बोल भी लेते हैं। अगर मान लें कि दक्षिण भारत के 10-15 करोड़ लोगों को हिन्दी के व्यावहार में अब भी कठिनाई है, तो उसकी भरपाई ‘दक्षेस’ के अन्य सात राष्ट्रों में बसे लगभग 35 करोड़ लोग कर देते हैं। उनमें से ज्यादातर हिन्दी समझते हैं। उनके अलावा विदेशों में बसे दो करोड़ से ज्यादा भारतीय भी हिन्दी का प्रयोग सगर्व करते हैं। संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को प्रतिष्ठित करना दुनिया के लगभग डेढ़ अरब लोगों को प्रतिनिधित्व देना है।

पाँचवाँ, हिन्दी जितने राष्ट्रों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली-समझी जाती है, संयुक्त राष्ट्र की पहली चार भाषाएँ नहीं बोली-समझी जाती हैं। यह ठीक है कि अँग्रेज़ी, फ्रांसीसी और रूसी ऐसी भाषाएँ हैं, जिन्हें ब्रिटेन, फांस और रूस के दर्जनों उपनिवेशों में बोला जाता रहा है, लेकिन ये भाषाएँ उन उपनिवेशों के दो-चार प्रतिशत से ज्यादा लोग आज भी नहीं बोलते, जबकि हिन्दी भारत ही नहीं, पाकिस्तान, नेपाल, मॉरिशस, ट्रिनि़डाड, सूरीनाम, फिजी, गुयाना, बांग्लादेश आदि देशों की बहुसंख्यक जनता द्वारा बोली और समझी जाती है। जब इस बहुराष्ट्रीय भाषा में संयुक्त राष्ट्र की गतिविधियाँ टीवी पर सुनाई देगी, तो सोचिए कि कितने लोगों और व्यापार राष्ट्रों का संयुक्त राष्ट्र के प्रति जुड़ाव बढ़ता जाएगा।

छठा, यदि हिन्दी संयुक्त राष्ट्र में प्रतिष्ठित होगी, तो दुनिया की अन्य सैंकड़ों भाषाओं के लिए शब्दों का नया ख़जाना खुल पड़ेगा। हिन्दी संस्कृत की बेटी है। संस्कृत की एक-एक धातु से कई-कई हजार शब्द बनते हैं। एशिययाई और अफ्रीकी ही नहीं, युरोपीय और अमेरिकी भाषाओं में भी आजकल शब्दों का टोटा पड़ा रहता है अन्तरराष्ट्रीय विज्ञान और व्यापार के कारण रोज नए शब्दों की जरूरत बड़ती है। इस कमी को हिन्दी पूरा करेगी।

सातवाँ, हिन्दी के संयुक्त राष्ट्र में पहुंचते ही दुनिया की दर्जनों भाषाओं को लिबास मिलेगा। वे निवर्सन हैं। उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है। तुर्की, इंडोनेशियाई, मंगोल, उज्बेक, स्वाहिली, गोरानी आदि भाषाएँ विदेशी विपियों में लिखी जाती हैं। मजबूरी है। हिन्दी इस मजबूरी को विश्व-स्तर पर दूर करेगी। वह रोमन, रूसी और चित्र-लिपियों का शानदार विकल्प बनेगी। उसकी लिपि सरल और वैज्ञानिक है। जो बोलो, सो लिखो और जो लिखो, सो बोलो। संयुक्त राष्ट्र में बैठी हिन्दी विश्व के भाषाई मानचित्र को बदल देगी।

यदि हिन्दी संयुक्त राष्ट्र में दनदनाने लगी, तो उसके पास ठोस परिणाम सामने आएँगे। पहला, भारतीय नौकरशाही-नेताशाही को मानसिक गुलामी से मुक्ति मिलेगी। भारत के राजकाज में हिन्दी को उचित स्थान मिलेगा। दूसरा, भारतीय भाषाओं की जन्मजात एकता में वृद्धि होगी। तीसरा, ‘दक्षेस’ राष्ट्रों में ‘संगच्छध्वं संवद्ध्व’ का भाव फैलेगा । जनता से जनता का जुड़ाव बढ़ेगा। तीसरा, वैश्वीकरण की  प्रक्रिया में अँग्रेज़ी का संशक्त विकल्प तैयार होगा। चौथा, स्वभाषाओं के ज़रिए होने वाले शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान की गति तीव्र होगी। उसके कारण भारत ‘दिन-दूनी रात चौगुनी’ उन्नति करेगा । सचमुच वह विश्व-शक्ति और विश्व-गुरू बनेगा। 

हिन्दी : करवट लेती नयी चुनौतियाँ[सम्पादन]

'भाषा किसी देश की अस्मिता की द्योतक होती है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम न होकर समूची संस्कृति को स्पष्ट करने का आईना भी होती है। भाषा न केवल विचारों के आदान-प्रदान का साधन भर है, अपितु वह पूरी की पूरी परम्परा की संवाहक भी होती है।' किसी देश और राष्ट्र के स्वरूप तथा स्वाभिमान को अभिव्यक्ति देने का नाम भाषा है। भाषा देश के इतिहास एवं वर्तमान का वह आईना होती है, जिसमें भविष्य भी देखा जा सकता है।

भारत की स्वतन्त्रता के यज्ञ में जिन महापुरुषों ने आहुतियाँ  डाली थीं, उन सबने तब ही यह अनुमान लगा लिया था कि भारत के 'राष्ट्र-देव' को जगाना है तो 'हिन्दी के मन्त्र' को प्रखर करना होगा। इसी हिन्दी-मन्त्र का आधार लेकर महानायक सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज जैसी विशाल सेना खड़ी कर हिन्दुस्तान की आजादी का सपना देखा। इसी हिन्दी-मन्त्र को साध कर महात्मा गाँधी ने स्वतन्त्रता की लड़ाई में सारे भारत को एकजुट कर लिया और जीत हासिल की।   हिन्दी-मन्त्र का यह स्वर स्वतन्त्रता की पहली लड़ाई के दौर में ही गूंजने लगा था, जिसको शक्ति दी थी कलम के योध्दा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने। भारतेन्दु ने पहली बार 'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्न्ति को मूल' कहकर इसकी क्षमता को पहचानने का आव्हान किया था। स्वतन्त्रता आन्दोलन के उस दौर में हिन्दी ने जो लोकप्रियता हासिल की थी, वही आज यदि बरकरार रहती तो भारत का सांस्कृतिक परिदृश्य कुछ और होता। आज का युवा जिस सम्भ्रम की स्थित से गुजर रहा है, उससे भिन्न वह एक ठोस धरातल पर खड़ा होता।अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपना इतिहास ही व्यक्ति को अपनी निजता की पहचान कराते हैं, अभिमान तथा स्वाभिमान जगाते हैं। अभिमान और स्वाभिमान की धरती के अभाव में आकाशीय ऊंचाईयों को छूने का उपक्रम पूरी तरह से सफल नहीं हो पाता, प्रयत्न भी कुछ अधिक ही करना पड़ता है।सच तो यह है कि भारतीय जन-मानस अपने 'स्वत्व' को न पहचान सके, इसकी परिकल्पना अंग्रेजो ने वर्षों पूर्व कर ली थी। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने आप को अधिक समर्थ बनाने के लिए एक 'भाषा-नीति' बनायी थी। अपने सैनिकों को प्रशिक्षित करने के लिए कम्पनी ने 'ओरिएण्टल सेमिनरी' नामक संस्था की स्थापना की थी जो आगे चलकर 'फोर्ट विलियम कॉलेज' के रूप में प्रसिद्ध हुई। भारत की 'उच्च शिक्षा नीति' का केन्द्र यही फोर्ट विलियम कॉलेज था। 4 मई 1800 ई. को स्थापित 'ओरिएण्टल सेमिनरी' के प्रथम अध्यक्ष गिल क्राइस्ट थे, जो उर्दू के पक्षधर थे, अतः उन्होंने हिन्दी के नाम पर उर्दू को अपनाया। अपनी राजनीतिक चाल के तहत भारत के तत्कालीन राजकाज की भाषा फारसी को अपदस्थ करके अंग्रेजो ने अँगरेज़ी को राजभाषा तथा सम्भ्रान्त भारतीयों के लिए सम्पर्क भाषा के रूप में मान्यता दे दी। अंग्रेजो की भाषा-नीति निश्चित ही शैक्षिक हितों के मद्देनज़र नहीं थी। राजनीतिक हित-साधन का माध्यम बनी इसी नीति के तहत अंग्रेजों ने हिन्दी के नाम पर उर्दू को प्रोत्साहित किया, जिसका परिणाम यह निकला कि हिन्दी और उर्दू भाषियों के मध्य खींचातानी बढ़ी। भाषायी तनाव के माध्यम से अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक वैमनस्य का बीज भी बड़ी कुशलता के साथ बो दिया था।

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दौर से ही अँगरेज़ी आकाओं के प्रयत्नों से सम्पूर्ण देश में अँगरेज़ी माध्यम के मिशनरी स्कूलों का जाल बिछता गया, भारत की क्षेत्रीय भाषाएँ किनारे कर दी गयीं, हिन्दी का महत्व घटता गया और भारत का जन-मानस न केवल राजनीतिक स्तर पर, अपितु भाषा एवं संस्कृति के स्तर पर भी गुलामी की जगड़ में जकड़ता गया। भाषा को आधार बनाकर किसी समध्द-सुसंस्कृत राष्ट्र को पूरी तरह 'गुलाम' बना लिये जाने का यह एक अद्वितीय उदाहरण है।

हिन्दी भाषा अपनी अन्य सहोदरा भाषाओं के साथ अँगरेज़ी के साथ अँगरेज़ी के दबाव में ऐसी दबी कि आज लगभग 60 वर्षों के बाद भी उससे निजात पाना असम्भव प्रतीत होता है। हमारी भाषाएँ भाषायी गुलामी रूपी रेत के दलदल में फस गयी हैं। स्वतन्त्रता आन्दोलन में अगुआ बनी हिन्दी 'राजभाषा' तथा 'राष्ट्रभाषा' के नाम पर हंसी का मुद्दा बन कर हमें आईने के सामने खड़ी कर चुकी है। आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं। 'राजभाषा के रूप में हिन्दी के विकास की जितनी सम्भावनाएँ थीं, दुर्भाग्य और दुश्चक्र के कारण वे मूर्त नहीं हो सकीं। पहले राजभाषा के रूप में हिन्दी की प्रतिष्ठा की तैयारी के लिए पन्द्रह वर्ष का समय निश्चित किया गया। पन्द्रह वर्ष बाद हिन्दी राजभाषा के रूप में प्रयुक्त हो, इसके लिए उच्च प्रशासकीय अधिकारियों की मानसिक तैयारी नहीं की गयी। अँगरेज़ी को चलते रहने दिया गया। हिन्दी को जानबूझकर उपेक्षा की गयी। पन्द्रह वर्षों के बाद हिन्दी विरोध का आन्दोलन राजनीतिक कारणों से दक्षिण भारत में उग्रतापूर्वक एवं उत्तर पूर्व भारत में सामान्य रूप से छेड़ा गया और उसके बाद यह घोषणा कर दी गयी कि अँगरेज़ी तब तक राजभाषा के रूप में चलती रहेगी, जब तक एक भी राज्य ऐसा चाहेगा। इसका मतलब यह हुआ कि देश के लगभग सभी प्रमुख राज्य भी अगर हिन्दी को ही राजभाषा मानने को तैयार हों और नागालैण्ड या मेघालय जैसा छोटा राज्य भी अँगरेज़ी की माँग करे तो अँगरेज़ी को राजभाषा के पद से हटाया नहीं जा सकता। इसके कारण उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के मन में यह बात जम गई कि अँगरेज़ी अनन्त काल तक राजभाषा के रूप में चलती रहेगी। अतः राजभाषा के रूप में हिन्दी की गति अवरुध्द सी हो गयी'। अंग्रेजों के जाने के बाद अंग्रेजियत से भरी मानसिकता के चलते हिन्दी को हम वह स्थान कभी नहीं दे पाये, जिसकी वह अधिकारिणी थी। हमने न तो टर्की के कमाल पाशा से कोई सबक लिया, न ही हिब्रू जैसी मातृभाषा को पुनर्जीवित कर अपने आप को गौरवशाली मानने वाले इज़राइलियों से कोई सीख ली। हमने राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में हिन्दी जैसी सर्वप्रिय, सर्वसुलभ भाषा को दोयम दर्जे का बनाकर रख छोड़ा है।

भौतिक शास्त्र का एक नियम है कि किसी पदार्थ पर जितना अधिक दबाव डाला जाता है, वह उतना ही ऊपर उठकर आता है। न्यूटन के तीसरे सिध्दान्त के रूप में ज्ञात यह वैज्ञानिक नियम निश्चित रूप से आज 'हिन्दी' भाषा पर लागू हो रहा है। 'हिन्दी' को जितना अधिक दबा-कुचला रखा गया, वह उतनी ही उभर कर आज अपने महति अस्तित्व को विश्व-पटल पर उजागर कर रही है।हिन्दी एक बेहद लचीली, सहज-सम्भ्रान्त भाषा है। वर्षों पूर्व मध्यकाल में भी इसने अरबी-फारसी और तुर्की भाषाओं के दबाव को बेहद संजीदगी के साथ झेला और उन विदेशी भाषाओं के अनेकानेक शब्दों को आत्मसात करके स्वयं और भी अधिक सशक्त बनी। यह तो सर्वविदित है ही कि अरबी-फारसी और तुर्की भाषाओं के साथ हिन्दी की बोलियों के सह-अस्तित्व के परिणाम स्वरूप ही उर्दू भाषा का जन्म हुआ।

बीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों से 'सूचना क्रान्ति' के तहत सम्पूर्ण विश्व में अभूतपूर्व एकीकरण हुआ। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भारतीय उक्ति युगों बाद 'वैश्विक ग्राम' के रूप में साकार हुई सी लगती है। वैश्विकीकरण के इस दौर में हिन्दी भाषा ने भी एक नयी करवट ली है। आज सम्पूर्ण विश्व की दृष्टि एक व्यापार केन्द्र के रूप में भारत पर है। उत्साहजनक स्थिति यह है कि इस व्यापार की भाषा हिन्दी बनती जा रही है। भारत ने व्यापार के माध्यम से अपनी प्राचीन संस्कृति को मध्य एशिया, योरोप और चीन तक फैलाया है। आज भी यही व्यापार भिन्न रूप में न केवल भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर रहा है, हिन्दी भाषा के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

'वैश्विक बाजारवाद' के चाहे कितने ही दुष्परिणाम गिनाये जाएँ, उसका एक ही लाभ उन सबसे ऊपर स्थापित होने को पर्याप्त है कि उसके कारण हिन्दी भाषा आज वैश्विक पटल पर छा रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति बुश कहते हैं कि हिन्दी सीखों और भारत के साथ व्यापार करो। कुछ पूर्वी देशों में हिन्दी सीखने की होड़ लग गयी है। वे लोग भारत आकर काम धन्धा करना चाहते हैं।भारत के भीतर की बात करें तो आज दक्षिण भारतीय हों या पूर्वी भारतीय, गुज़राती हों या कश्मीरी, हर प्रान्त के लोग आज काम के सिलसिले में या व्यापार के खातिर हिन्दी सीख रहे हैं। इसके विपरीत धुर दक्षिणी प्रान्तों के बैंगलोर, मैसूर, हैदराबाद जैसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के सूचना प्रौद्योगिक केन्द्रों में हिन्दी क्षेत्र के विशेषज्ञों का जाना और वहाँ  रहकर काम करने में हिन्दी एक वैचारिक समरसता का पुल सिद्ध हो रही है।   अमेरिकी बाजारों या योरोप का अगोरा, पूरब का हाट हो या चीन की दुकान, हर कोई अब भारत आने को उत्सुक है और भारत आने की पहली सीढ़ी के रूप में वह 'हिन्दी' को देखता है। बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ  अपना उत्पादन बेचने के लिए आज 'हिन्दी' का ही सहारा ले रही हैं। पेप्सी हो या पिज्जा, नूडल्स हो या बर्गर, तेल-क्रीम हो या मोटर साइकल हर वस्तु की बिक्री आज हिन्दी के माध्यम से हो रही है। अधिक लोगों तक जाना, अधिक बिक्री का आधार है। अधिक लोग हिन्दी समझते हैं तो बिक्री की भाषा भी हिन्दी ही होगी।आज का युग विशेषज्ञता का है। हर कहीं, हर कोई अधिक से अधिक श्रेष्ठता अर्जित करके अपने आपको स्थापित करने के प्रयास में जुटा है। आधुनिक तकनीक के द्वारा सूचना प्रेषित करने का माध्यम एसएमएस और ई-मेल भी आज हिन्दी के रथ पर सवार हो चुके हैं। विदेशों में रहने वाले हजारों युवा जब कम्प्यूटर के जरिए भारत में अपनी माँ  या बहन से बातचीत करते हैं तो वह हिन्दी में होती है। अभी यह बातचीत रोमन लिपि में होती है, किन्तु वह दिन दूर नहीं जब देवनागरी लिपि भी अपना दबदबा कायम कर लेगी।

दबाव में जीने की आदी हो चुकी 'हिन्दी' के लिए ये नवीन परिस्थितियाँ  रेश्मी उजास से भरपूर सुबह के सुखद स्वप्न की तरह है, जो स्वप्न नहीं सच में तब्दील हो रहा है। हिन्दी भाषा के विकास की चिन्ता करने वालों के लिए यह परिदृश्य उत्साहजनक आवश्यक है। फिर भी इन तमाम खुशफहमियों के बीच कुछेक शंका-कुशंका के बादल हिन्दी के आसपास मंडरा रहे हैं, जिन्हें नज़र अन्दाज नहीं किया जा सकता। बाजारवाद से उभरती हिन्दी भाषा के सम्मुख आज निश्चित ही भिन्न प्रकार की चुनौतियाँ  आ खड़ी हुई हैं। एक ओर उसके विस्तार और विकास का आनन्द है, तो दूसरी ओर भाषायी प्रदूषण का भय भी बढ़ता जा रहा है। तमाम अन्य क्षेत्रों में जैसे बाजारवाद का प्रदूषण फैल रहा है, वैसे ही भाषा में भी इसके कई-कई रूप समाते जा रहे हैं। शुध्दि-अशुध्दि से भी आगे बढ़कर भाषा का संकुचन, विस्तार से बचने की प्रवृत्ति, लेखन में कोताही, सरलीकरण तथा इन जैसे और भी अनेकानेक दुष्प्रभाव धीरे-धीरे स्पष्ट होंगे, जिनके लिए 'हिन्दी' भाषा के पुरोधाओं को पहले से ही मोर्चा संभालना आवश्यक हो जायेगा।   इन सब नयी चुनौतियों के साथ भारत का जन-मानस यदि आत्म-सम्मान और स्वाभिमान के साथ हिन्दी को 'अपनी भाषा' का स्थान देगा तो निश्चित ही हिन्दी अपनी तमाम विरोधाभासी परिस्थितियों के जाल-जंजाल से ऊपर उठकर कमल वत खिल उठेगी। अब वैश्विक स्तर पर हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की अधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता मिलने की उम्मीद है। संयुक्तराष्ट्र के मुख्यालय न्यूयार्क में हो रहे आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में यह उम्मीद फिर जाग उठी है।

हिन्दी भाषा 'भारती' का भविष्य[सम्पादन]

प्रायः प्रत्येक हिन्दीभाषी हिन्दी को एक विश्वभाषा के रूप में देखना चाहता है, लेकिन स्थिति यह है कि भारत के हिन्दी क्षेत्र में ही यह भाषा अपने अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्षरत है। इसकी उपादेयता पर भी प्रश्नचिन्ह लग चुका है। यही कारण है कि विपन्न वर्ग के जन भी अत्यंत त्याग कर अपने बच्चों को अँगरेज़ी माध्यम में शिक्षा दिलवाते हैं। विकल्पहीनता की स्थिति में ही कोई अपने बालकों को हिन्दी माध्यम विद्यालयों में भेजता है। आज की अर्थव्यवस्था में अँगरेज़ी का बोलबाला तो निर्विवाद है। कृषि, लघु उद्यम, मजदूरी को छोड़ दें तो एक छोटी सी नौकरी पाने के लिए भी अँगरेज़ी का ज्ञान अनिवार्य योग्यता का हिस्सा हो चुका है, प्रबंधन की भाषा तो अँगरेज़ी है ही। अगर लोगों की मनोस्थिति को मापदंड मानें तो हिन्दी का एक भाषा के रूप में सम्मान तथा उपादेयता निश्चित तौर पर समाप्त हो चुकी है। इसका अस्तित्व महज मजबूरी या आनुष्ठानिक है। जहाँ  भारत का मध्यवर्ग अँगरेज़ी को अपनाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है वहीं भारतीय अभिजन में तो हिन्दी घरेलू बोलचाल की भी भाषा नहीं रह गयी है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि हिन्दी फिल्मों के अभिनेता तथा अभिनेत्रियां, जो हिन्दी में लच्छेदार सम्वाद बोलने के कारण ही भारतीय आम जनता के बीच अपनी पहचान बनाए हुए हैं और उनके पसंदीदा कलाकार हैं वे भी रोजमर्रा के निजी तथा सामाजिक जीवन में इस भाषा का प्रयोग करना अपनी तौहीन मानते हैं। यह विचार की भाषा तो रही ही नहीं गयी है। अच्छे शोध, अच्छे विचार तथा शायद अच्छे साहित्य के लिए भी हिन्दी भाषी अँगरेज़ी भाषा पर निर्भर रहते हैं। साहित्य में तो भले ही इस भाषा की महत्ता को कमतर आंकना शायद उचित नहीं होगा, लेकिन मानविकी को छोड़ें तो समाज, प्राकृतिक तथा भौतिक विज्ञानों में इस भाषा का प्रयोग श्रेष्ठ संस्थानों में अपवाद स्वरूप ही होता है। तकनीक या प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण, जिसका उद्देश्य मात्र विज्ञान को व्यवहारिक स्वरूप प्रदान करना है, वहाँ  भी भारती का प्रयोग नहीं के बराबर है। जिन लोगों ने हिन्दी को अपने शोध तथा सृजन का माध्यम बनाया हुआ है वे सामान्यतया अँगरेज़ी के प्रयोग में असमर्थ हैं। हिन्दी भाषी राज्यों के प्रशासन में अँगरेज़ी के प्रयोग को नीति के तहत हतोत्साहित किया जाता है, लेकिन उसके बावजूद निहायत ही देसी प्रकार के, आंचलिक शिक्षण संस्थानों में पढ़े, बड़े, मझोले तथा छोटे अधिकारी (ब्युरोक्रैट्स) भी मिली जुली, टूटी फूटी ही सही, अँगरेज़ी के उपयोग को अपने साहबीयत का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। यहाँ  तक कि संसद में भी हिन्दी क्षेत्र के जन प्रतिनिधि भी यदि बोलने की स्थिति में हैं तो अँगरेज़ी ही बोलते हैं। बकौल उपराष्ट्रपति सह राज्यसभा अध्यक्ष श्री भैरों सिंह शेखावत, संसद में सांसद हिन्दी बोलने से कतराते हैं या यदि बोलते हैं तो उन्हें गम्भीरता से नहीं लिया जाता है (टाइम्स ऑफ इंडिया, पटना, 31 मई 2005)। उच्चतर न्यायालयों में तो हिन्दी को अभी तक अपनाया भी नहीं गया है।

उपर्युक्त संक्षिप्त विवरण का उद्देश्य भारत देश में ही भारती का दोयम दर्जे की भाषा के रूप में पतन को रेखांकित करना है। यह अत्यंत त्रासद विडम्बना है कि किसी देश की राष्ट्रभाषा स्वदेश में ही द्वितीयक श्रेणी की भाषा सिद्ध हो रही है। हालांकि वैश्वीकरण के इस युग में भारतीयों की आंग्ल भाषा में प्रवीणता भारत की विशेषता के रूप में देखी जाती है खासकर चीन की तुलना में। चीन से जब भी भारत की तुलना आर्थिक विकास के क्षेत्र में की जाती है तो भारत में अँगरेज़ी के प्रचलन को भारत के पक्ष में देखा जाता है। चीन भी इस कमी को दूर करने में युद्ध-स्तर पर लगा हुआ है। एक आकलन के अनुसार चीन में अभी छः करोड़ लोग अँगरेज़ी का अध्ययन कर रहे हैं। ऐसा समय दूर नहीं कि जब दुनिया में सबसे ज्यादा आंग्लभाषी चीन में होंगे। अँगरेज़ी सीखना आज समय की माँग है। इसे सीखना प्रायः विश्व बाजार में प्रतियोगी रहने की आवश्यकता है। अँगरेज़ी सीखना गलत भी नहीं है और अँगरेज़ी का विरोध तो देशवासियों के लिए अत्यंत अहितकर है खासकर गरीब तबकों के लिए। यदि अँगरेज़ी हटायी जाती है तो यह सरकारी विद्यालयों से ही हटेगी तथा इसकी सबसे ज्यादा मार गरीबों पर पड़ेगी। गरीबी दूर करने का यदि एक माध्यम शिक्षा है तो शिक्षा अँगरेज़ी माध्यम में इस उद्देश्य को प्राप्त करने में और भी प्रभावी होगी। यहाँ  पैरोकारी जैसा कि स्पष्ट है कि अँगरेज़ी का विरोध नहीं है बल्कि भारती की प्रतिष्ठा तथा उपादेयता में विस्तार कर इसे अधिक ग्राहृय बनाने पर विचार करना है तथा एक दूरगामी लक्ष्य के रूप में इसे विश्वभाषा के रूप में मान्यता दिलवाना है।

उन्नति का मार्ग - हिन्दी को सशक्त बनाने का उत्तरदायित्व हर हिन्दी भाषी का है। यह उसके लिए मात्र भावनात्मक प्रश्न नहीं है। इससे उसका आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक हित जुड़ा है। साथ ही यह भी समझने की आवश्यकता है कि अँगरेज़ी भाषा का वह कितना गहन अध्ययन करे, कितना भी इसका अभ्यास करें, चूंकि यह एक विदेशी भाषा है और विदेशी संस्कृति की अभिव्यक्ति है, वह इस भाषा में उस स्तर का प्रावीण्य प्राप्त नहीं कर सकता है जो देशज भाषा में उसे सहज प्राप्त होता है। अँगरेज़ी भाषाइयों में उसकी पहचान तो एक शरणार्थी की ही रहेगी चाहे वह कुछ भी कर ले। यदि वह अँगरेज़ी में प्राकृतिक प्रवीणता हासिल कर भी लेता है तो वह ऐसा अपनी संस्कृति से बिलगाव की कीमत पर करता है। अतः प्रत्येक हिन्दी भाषी स्वयं तथा हर तरह तथा हर स्तर के संगठन, जिस पर उसका प्रभाव है, मैं प्रयास करे कि हिन्दी के प्रभाव में वृध्दि हो। ऐसी स्थिति बनने पर ही सरकारी प्रयासों में भी गम्भीरता तथा ईमानदारी दिखने की सम्भावना है।

यहाँ यह भी स्मरण रखने की आवश्यकता है कि जब भी हिन्दी के प्रसार का प्रयास हो तो उसमें किसी तरह के वर्चस्व की भावना बिलकुल नहीं होनी चाहिए। हिन्दी का प्रत्येक भारतीय भाषा से सहयोगात्मक रवैया होना चाहिए तथा नीति सहविकास की होनी चाहिए। यहाँ  तक कि हिन्दी भाषी क्षेत्र में भी हिन्दी को शिक्षण संस्थानों पर थोपना भी अनुचित होगा। यह हर सामान्य शिक्षण संस्थान का विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक को अधिकार होना चाहिए कि वह आवश्यकतानुसार अपने शोध तथा शिक्षण के माध्यम का चयन करे। आज अँगरेज़ी का विरोध वास्तव में अप्रासंगिक हो चुका है। इस भाषा में भारतीयों की प्रवीणता देश के लिए लाभदायक सिद्ध हो रही है। आज देश में जरूरत है कि ज्यादा लोग अच्छी अँगरेज़ी सीखें। यह देश की आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यकता है, लेकिन यह ध्यान रखना नितांत आवश्यक है कि अँगरेज़ी एक साधन है न कि साध्य। अँगरेज़ी सीखना चाहिए लेकिन एक उपकरण के रूप में। सीखना गलत नहीं है, लगत है अँगरेज़ी के प्रति समर्पण, उसकी आराधना। गलत है भारती का तिरस्कार, उसकी अवमानना।

जहाँ तक विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की बात है उसमें भी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति लेशमात्र नहीं होनी चाहिए। इसके विपरीत भारती के प्रसार का उद्देश्य भाषाई साम्राज्यवाद, जो वृहत्तर साम्राज्यवाद का ही हिस्सा है, का प्रतिकार होना चाहिए। साम्राज्यवाद का प्रतिकार वैकल्पिक साम्राज्यवाद नहीं वरन् अन्य भाषाओं का संरक्षण है। आज यदि विश्व की आवश्यकता जैव विविधता है तो विश्व समाज की जरूरत इसकी सांस्कृतिक विविधता की रक्षा है। भारती के प्रसार का प्रयास परस्पर आदान-प्रदान के आधार पर हो। हिन्दी भाषी विश्व की तमाम संस्कृतियों से उनकी भाषा सीखकर सीधा सम्पर्क कायम करें तथा उसके साथ ही भारती के प्रसार का प्रयास करें, यही उचित होगा।

भारती के सशकत बनाने के लिए आधारभूत आवश्यकता है कि हिन्दी भाषी क्षेत्र का आर्थिक विकास तीव्र गति से हो। भाषा की प्रतिष्ठा के लिए मात्र यह आवश्यक नहीं है कि वह भाषा कितनी बड़ी संख्या में लोगों के द्वारा बोली जाती है। महत्वपूर्ण यह है कि भाषियों की आर्थिक स्थिति क्या है? आर्थिक विकास के लिए राजनीति तथा प्रशासन को इस दिशा में प्रवृत्त करने की आवश्यकता है।

उपर्युक्त तथ्य तो मूलभूत है लेकिन जो विषय प्राथमिक तथा ज्वलंत है, वह इस क्षेत्र में शिक्षा की खासकर उच्च शिक्षा की त्रासद स्थिति है। आज इस क्षेत्र में निम्न स्तरीय राजनीति के कारण शिक्षा व्यवस्था पतन के गर्त मे है। इस क्षेत्र में शिक्षा का विश्वस्तरीय उन्नयन भारती के विकास में भी सहायक होगा। भाषा के उपादेयता तथा प्रतिष्ठा के लिए नितांत आवश्यक शर्तें हैं कि किसी भाषा में किस तरह का ज्ञान सृजित, संग्रहित तथा प्रसारित हो रहा है? हर विश्वविद्यालय में यह होना चाहिए कि वह अपने यहाँ  शोध, अध्यापन के लिए हिन्दी भाषा के लिए अलग से विशेष महाविद्यालयों की स्थापना करें। ऐसा भी हो सकता है कि प्रत्येक राज्य में एक ऐसे विश्वविद्यालय की अलग से स्थापना की जाए जहाँ  ज्ञान क्षेत्र की प्रत्येक विधा को स्थान प्राप्त हो तथा वहाँ  अध्यापन तथा शोध की आधार भाषा मात्र हिन्दी हो। इस तरह के विद्यापीठ हिन्दी में ज्ञान के उद्गम स्थल होंगे।

हिन्दी भाषा में साहित्य तथा ज्ञान-विज्ञान में लेखन को हर स्तर पर प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए भरपूर संख्या में पुरस्कारों, अनुदानों, कार्यक्रमों तथा परियोजनाओं की व्यवस्था स्थानीय, प्रांतीय, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर होनी चाहिए। विश्व के प्रत्येक देश, बड़े शहरों तथा अधिक से अधिक शिक्षण संस्थानों में हिन्दी में अध्यापन तथा शोध की व्यवस्था होनी चाहिए। खासकर अहिन्दीभाषी क्षेत्रों में तथा विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार को अभियान के अंतर्गत चलाया जाना चाहिए।

हिन्दी के पुस्तकों के प्रकाशन पर तथा उस प्रक्रिया में प्रयुक्त हर सामग्री तथा चल-अचल सम्पत्ति कर मुक्त हो तथा यथासम्भव सब्सिडी भी हिन्दी प्रकाशन उद्योग को मिले। भारत तथा समस्त विश्व के कोने-कोने में जितना ज्यादा सम्भव हो हिन्दी पुस्तकालयों की स्थापना की जाए। इसके अलावा ऐसी प्रतियोगिताओं का आयोजन हो जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग हिन्दी पढ़ने तथा बोलने को प्रेरित हों।

हिन्दी भाषी राज्यों में प्रशासन की भाषा हिन्दी मात्र होनी चाहिए। विदेशी आगंतुक, पर्यटकों तथा निवेशकों से संवाद के लिए दुभाषिये रखे जा सकते हैं। राजकीय सेवाओं में भर्ती के लिए हिन्दी का यथेष्ठ ज्ञान अनिवार्य अर्हता होनी चाहिए। यहाँ  यह भी रेखांकित करना आवश्यक है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार की प्राथमिक भूमिका हिन्दी भाषी राज्यों की है न कि केन्द्र सरकार की।

भारती का प्रसार मात्र भावनात्मक प्रश्न नहीं है, इसका महत्व आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा अंतर्राष्ट्रीय है। अतएव इसके प्रचार पर खर्च को निवेश तथा सामाजिक कल्याण के तहत अनिवार्य मानना चाहिए।

नीतिक, सांस्कृतिक तथा अंतर्राष्ट्रीय है। अतएव इसके प्रचार पर खर्च को निवेश तथा सामाजिक कल्याण के तहत अनिवार्य मानना चाहिए।

हिन्दी एवं प्रवासी भारतीयों की वर्तमान पीढ़ी[सम्पादन]

हम जब भी इंगलैण्ड में हिन्दी के विषय में बात करते हैं तो हम भावनात्मक हो जाते हैं और अपनी तर्क शक्ति को ताक पर रख देते हैं। हम यह सोच कर नाराज़गी ज़रूर ज़ाहिर करते हैं कि युनाईटेड किंगडम में कभी जी.सी.एस.सी. में हिन्दी एक एच्छिक विषय के तौर पर पढ़ाई जाती थी। आज स्कूलों में हिन्दी कहीं नहीं दिखाई देती। हिन्दी मंदिरों और निजी शिक्षकों के घरों तक सीमित हो गई है।

किसी भी विषय पर बातचीत से पहले आवश्यक है कि हम उस विषय की वस्तुस्थिति को ठीक से समझ लें। वस्तुस्थिति यह है कि एक भाषा के रूप में इंग्लैण्ड में हिन्दी का वर्तमान बहुत संतोषजनक नहीं है और इसके भविष्य के लिए भी बिना अति आशावादी बने हमें केवल कर्म करना सीखना होगा। अतीत में हिन्दी इंग्लैण्ड में स्कूलों में एक एच्छिक विषय के तौर पर पढ़ाई जाती थी, लेकिन हिन्दी स्कूलों से ग़ायब हो गई क्योंकि उन स्कूलों में हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थी मिल नहीं पा रहे थे। आजकल इंग्लैण्ड में बहुत सी ग़ैर-सरकारी संस्थाएं हिन्दी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार प्रसार के कामों में जुटी हैं। देश भर में हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिताएं करवाई जा रही हैं, कहानी कार्यशालाएं की जा रही हैं, हिन्दी में कम्पयूटर में काम काज पर ध्यान दिया जा रहा है। लेकिन बिना किसी विश्विद्यालय से पंजीकृत हुए बिना यह गतिविधियाँ आधिकारिक स्वरूप नहीं पा सकती हैं।

हमें भावनाओं को तज कर इस ओर ध्यान देना होगा कि आखिर ऐसा हुआ क्यों। निरपेक्ष रूप से किसी नतीजे पर पहुंचना होगा। जब हम भारत से इंगलैण्ड आए प्रवासियों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि भारत से इंगलैण्ड आने वालों में सबसे अधिक संख्या गुजरात एवं पंजाब प्रदेशों से है। पंजाब से आने वालों में भी सिख धर्म के अनुयायियों की संख्या कहीं अधिक है, जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं पंजाबी है। इस के अतिरिक्त तमिल, बंगाली एवं महाराष्ट्रियन भी काफ़ी संख्या में यहाँ प्रवासी बन कर आए। इन सभी के लिए हिन्दी बोलचाल की भाषा तो थी, लेकिन कहीं भी लिखने पढ़ने वाली भाषा नहीं थी। इसलिए जब पहली पीढ़ी के प्रवासियों ने पाया कि उन्हें विलायत में सबसे अधिक समस्या उन्हें अंग्रेजी न आने से हो रही है तो उन्होंने अपनी आगामी पीढ़ी से घर में तो अपनी मातृभाषा में बातचीत जारी रखी लेकिन बाहर दुनिया से संघर्ष करने के लिए उन्हें अंग्रेज़ी सीखने के लिए बढ़ावा दिया। यानी कि इंगलैण्ड आने वाले अधिकतर भारतीय मूल के परिवारों के लिए हिन्दी मात्र एक बोली थी जिस के माध्यम से वे दूसरे राज्य के रहने वालों से बातचीत कर सकते थे यानि कि संपर्क भाषा। और संपर्क भाषा भी निम्न मध्य वर्ग के लोगों के लिए। मध्य वर्ग या फिर उच्च मध्य वर्ग की संपर्क भाषा अंग्रेजी ही थी। हमे याद रखना यह होगा कि यह भी प्रवासियों की पहली पीढ़ी तक ही सीमित था। उसके बाद की पीढ़ियों की अपनी एक जबान बन चुकी थी - अँगरेज़ी।

हिन्दी बोलने वाले परिवारों में भी बच्चों को यही कहा जाता था, "अरे हिन्दी सीख लो। कल को भारत जाओगे, तो दादी और नानी से कैसे बात करोगे।'  मूलभूत समस्या यह है कि जो लोग अपने बच्चों को यह समझाया करते थे, आज वही दादा दादी और नाना नानी बन चुके हैं। और उन सबको अँगरेज़ी आती है। इसलिए उनके लिए आजके बच्चों को दादी और नानी के हवाले देकर हिन्दी सीखने के लिए कहना भी संभव नहीं।

पहली पीढ़ी के प्रवासियों के पास न तो कोई ज़रिया था और न ही हिम्मत कि वे हिन्दी के लिए समय निकाल पाते। शायद उन्हें इस की आवश्यक्ता भी नहीं थी। उस समय न तो कोई हिन्दी का रेडियो स्टेशन था और न ही किसी अँगरेज़ी के रेडियो अथवा टेलिविज़न सेन्टर से ही कोई हिन्दी के कार्यक्रम प्रसारित होते थे। जीवन इतना संघर्षपूर्ण था कि हिन्दी के लिए समय निकाल पाना लगभग अय्याशी के समान हो जाता।

अस्सी के दशक में विडियो रिकॉर्डर की लोकप्रियता और हिन्दी फ़िल्मों की कानूनी और ग़ैर-कानूनी वीडियो केसेटों ने इंगलैण्ड में हिन्दी को लोकप्रिय बनने का अचानक एक अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया। बच्चे बड़े सभी इकठ्ठे बैठ कर अमिताभ बच्चन की फ़िल्में देखा करते थे। शोले फ़िल्म के डायलॉग याद करके इंग्लैण्ड के बच्चे भारत से आने वाले अतिथियों पर अपने हिन्दी ज्ञान की धाक जमाते थे। प्रवासियों की पहली पीढ़ी को भी अचानक जैसे अपने पैरों तले एक नई ज़मीन का अहसास होने लगा था। डा हरिवंश राय बच्चन अवश्य ही हिन्दी के महान् कवियों में से एक हैं। किन्तु हिन्दी भाषा को लोकप्रिय बनाने के मामले में उनके पुत्र अमिताभ ने उन्हें कहीं पीछे छोड़ दिया।

स्कूलों में हिन्दी पढ़ने की न तो किसी को आवश्यकता महसूस होती थी और न ही किसी को इस बात का ख़्याल ही आता था। हिन्दी भाषी परिवारों को इस बात की प्रसन्नता थी कि उनकी संताने कम से कम हिन्दी बोलने तो लगी हैं। वहीं ग़ैर हिन्दी भाषी परिवारों के लिए हिन्दी फ़िल्में भारत से जुड़ने के एक साधन के रूप में उभर कर आई थीं। इंगलैण्ड में भारत से जुड़ाव के लिए हिन्दी फ़िल्मों के अतिरिक्त भारतीय क्रिकेट का भी खासा योगदान रहा। ख़ास तौर पर कपिल देव की टीम द्वारा 1984 में क्रिकेट के विश्व कप विजेता के रूप में उभर कर आने से भी यहां के बच्चों का भारत के प्रति अधिक सकारात्मक रुख पैदा हुआ। यही वह समय भी था जब बीबीसी ने रामायण और महाभारत जैसे विशुद्ध भारतीय टेलिविज़न सीरियल अपने चैनल पर दिखाने शुरू किये। भारतीय परिवारों के पास आज भी उन सीरियलों की रिकॉर्ड की गई व्हिडियो कैसेट मिल जाएंगी। भारतीय मूल के परिवारों में हिन्दी का माहौल पैदा करने में इन दो महत्वपूर्ण सीरियलों का योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता।

जी़ टीवी का आगमन इंग्लैण्ड में हिन्दी के लिए एक महत्वपूर्ण घटना माना जा सकता है। अब उन घरों की दीवारें भी हिन्दी सुन सकती थीं जहाँ पहली व दूसरी या तीसरी पीढ़ी या तो अपनी मातृभाषा में बातचीत करती थीं या फिर अँगरेज़ी में। भारत में भी हिन्दी फ़िल्में मुख्यधारा की फ़िल्में मानी जाती हैं तो अन्य भाषाओं की फ़िल्में केवल क्षेत्रीय सीमाओं में बन्ध कर रह जाती हैं। फिर मराठी, गुजराती, पंजाबी, हरियाणवी, आदि भाषाओं की आम फ़िल्मों का स्तर भी कुछ विशेष अच्छा नहीं होता। इसलिए भी ज़ी टीवी के लिए यह एक महत्वपूर्ण पल था और उनके सामने कोई प्रतियोगी भी नहीं था। लेकिन एक बात देखी गई कि भारतीय मूल के ब्रिटिश बच्चे बॉलीवुड की फ़िल्मों में तो रूचि रखते हैं वहीं टेलिविजन सीरियल क्योंकि लम्बे खिंचते जाते हैं, यहाँ के बच्चे उनसे कतराते हैं। जहाँ एक ओर सनराईज रेडियो के रवि शर्मा, सरिता सभरवाल, रिकी लोबो, राम भट्ट इत्यादि तो भारतीय मूल के बच्चों के चहेते बन जाते हैं वहीं हिन्दी टेलीविज़न सीरियल उनके साथ कोई सम्बंध स्थापित नहीं कर पाते हैं।

हिन्दी की मूलभूत समस्या यह भी है कि भारत में ही उसको उसका उचित स्थान नहीं मिल पाया है। विदेशों में अब तक हुए सभी विश्व हिन्दी सम्मेलनों में एकमत से यह प्रस्ताव पारित किया जाता रहा है कि 'हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाया जाए।' किसी भी भाषा के साथ इससे बड़ा मज़ाक हो ही नहीं सकता जो भाषा किसी देश की संसद की भाषा बनने के काबिल भी नहीं मानी जाती, उसे संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा क्यों और किसके लिए बनाया जाए। जब कोई भूतलिंगम या श्रीनिवासन संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व करेगा तो उसे स्वयं ही हिन्दी भाषा समझ नहीं आएगी। तो फिर यह नाटक किसके लिए कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाया जाए। उसे वहाँ सुनेगा कौन? जब भारतीय मूल के लोग अपने बच्चों को ले कर भारत यात्रा पर ले कर जाते हैं तो बच्चे यह देख कर हैरान हो जाते हैं कि भारत में उनके समवयस्क हिन्दी बोलना छोटेपन का द्योतक मानते हैं। वहाँ का युवावर्ग इंग्लैण्ड के युवाओं से अधिक अंग्रेज़ीदां है।

यह पूछना एक फ़ैशन सा भी बन गया है कि यदि जापान और जर्मनी बिना अँगरेज़ी के आर्थिक ऊँचाईयों तक पहुँच सकते हैं, तो फिर भारत में हिन्दी की इतनी दुर्दशा क्यों। भारत एक विशाल देश है जिसकी एक भाषा कभी भी नहीं रही। हिन्दी कभी भी भारत में राजकाज की भाषा नहीं रही है। यह कभी संस्कृत थी तो कभी फ़ारसी तो कभी उर्दू। और आज यह स्थान अँगरेज़ी के हिस्से में है। इसलिए यह प्रश्न एक प्रकार से बेमानी सा हो जाता है। जो भाषा कभी भी पूरे भारत की भाषा नहीं रही, वो भला जापानी या जर्मनी भाषा का मुक़ाबला किस प्रकार कर सकती है।

कहीं कहीं ग़लतफ़हमी यह भी है कि हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है। वास्तविकता यह है कि हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया था और जब तक हिन्दी पूरी तरह से कामकाज के काबिल नहीं बन जाती राजकाज का काम अँगरेज़ी में भी किया जाएगा। यह 'अँगरेज़ी में भी' आजतक 'अँगरेज़ी में ही' बना हुआ है। भारत सरकार पचपन वर्षों में भी हिन्दी को इतना सक्षम नहीं बना पाई है कि राज काज का काम हिन्दी में किया जा सके। 'अँगरेज़ी में भी' के स्थान पर सरकारी काम काज 'हिन्दी में भी' करवाया जाता है।

इंग्लैण्ड में जब कभी किसी भी हिन्दी अथवा किसी अन्य भारतीय भाषा के कार्यक्रम में जाने का अवसर मिलता है तो दिल में कहीं एक अन्जाना सा डर बैठने लगता है कि अगले कार्यक्रम से पहले कौन-सा पीला पत्ता पेड़ से गिर चुका होगा। उन कार्यक्रमों में आने वालों की औसत आयु पचास वर्ष के उपर ही महसूस होती है। इस देश की नई पीढ़ी को हिन्दी साहित्य के कार्यक्रमों में तो कोई रूचि नहीं है, लेकिन देखने को मिला है कि जब कभी बॉलीवुड के कार्यक्रम होते हैं या फिर ऐसे हास्य नाटकों का मंचन हो जैसे कि शादी एट बरबादी डॉट कॉम, नॉटी एट फ़ॉर्टी, हनीमून इत्यादि तो नई पीढ़ी भी हंसने के लिए पहुंच जाती है।

जिस प्रकार भारतीय उच्चायोग, यू.के. हिन्दी समिति, कथा (यूके), गीतांजलि बहुभाषी समाज, कृति यू.के., भारतीय भाषा संगम इत्यादि संस्थाएं इंग्लैण्ड में हिन्दी के प्रचार प्रसार में जुटे हैं, नि:स्सवार्थ भाव से देश भर में हिन्दी पढ़ाते अध्यापक एवं साथ ही साथ बॉलीवुड की फ़िल्मों को इंगलैण्ड के मुख्यधारा सिनेमाघरों में दिखाने की शुरूआत हुई है, उससे उम्मीद बंधती है कि हमें निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है। मंजिल दूर अवश्य हो सकती है, किन्तु यात्रा में सफलता अवश्य मिलेगी।

एक उदाहरण अपने घर से भी देना चाहूँगा। मेरी गुजराती(भाषी) पत्नी मेरे छोटे पुत्र से (जिसका जन्म लंदन में ही हुआ था) गुजराती में बात करती है। मेरा पुत्र उसे हिन्दी में जवाब देता है लेकिन मेरी ओर देखते ही अँगरेज़ी में बात करने लगता है। है न ख़ासी दिलचस्प स्थिति ! संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएँ एवं हिन्दी 

संयुक्त राष्ट्र संघ की 6 आधिकारिक भाषाएँ हैं : 1. अरबी, 2. चीनी 3. अँगरेज़ी 4. फ्रेंच, 5. रूसी 6. स्पेनिश

(देखिए- Year Book of the United Nations 1955, Vol. 49, pp. 1416-17, New York )

अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की आधिकारिक भाषाएँ :संयुक्त राष्ट्र की ये 6 आधिकारिक भाषाएँ अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की भी आधिकारिक भाषाएँ हैं। उदाहरणार्थ : (1) अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) (2) अन्तर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (IDA) (3) अन्तर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) (4) संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) (5) विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) (6) संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO) (7) संयुक्त राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय बाल-आपातिक निधि (UNICEFसंयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाएँ एवं हिन्दी : सन् 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकड़े मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था। सन् 1991 के सैन्सस आफ इण्डिया का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ जुलाई, 1997 में प्रकाशित हुआ (दे. Census of India 1991 Series 1 - India Part I of 1997, Language : India and states - Table C - 7) यूनेस्को की टेक्नीकल कमेटी फॉर द वॅ:ल्ड लैंग्वेजिज रिपोर्ट ने अपने दिनांक 13 जुलाई, 1998 के पत्र के द्वारा यूनेस्को-प्रश्नावली के आधार पर हिन्दी की रिपोर्ट भेजने के लिए भारत सरकार से निवेदन किया। भारत सरकार ने उक्त दायित्व के निर्वाह के लिए केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफेसर महावीर सरन जैन को पत्र लिखा। प्रोफेसर महावीर सरन जैन ने दिनांक 25 मई,1999 को यूनेस्को को अपनी विस्तृत रिपोर्ट भेजी।

प्रोफेसर जैन ने विभिन्न भाषाओं के प्रामाणिक आँकड़ों एवं तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि प्रयोक्ताओं की दृष्टि से विश्व में चीनी भाषा के बाद दूसरा स्थान हिन्दी भाषा का है। रिपोर्ट तैयार करते समय प्रोफेसर जैन ने ब्रिटिश काउन्सिल आफ इण्डिया से अँगरेज़ी मातृभाषियों की पूरे विश्व की जनसंख्या के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट भेजने के लिए निवेदन किया। ब्रिटिश काउन्सिल ऑफ इण्डिया ने इसके उत्तर में गिनीज बुक आफ नालेज (1997 संस्करण, पृष्ठ-57) फैक्स द्वारा भेजा। ब्रिटिश काउन्सिल द्वारा भेजी गई सूचना के अनुसार पूरे विश्व में  अँगरेज़ी मातृभाषियों की  संख्या 33,70,00,000 (33 करोड़, 70 लाख) है। सन् 1991 की जनगणना के अनुसार भारत की पूरी आबादी 83,85,83,988 है। मातृभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार करने वालों की संख्या 33,72,72,114 है तथा उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या का योग 04,34,06,932 है। हिन्दी एवं उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करने वालों की संख्या का योग 38,06,79,046 है जो भारत की पूरी आबादी का 44.98 प्रतिशत है। प्रोफेसर जैन ने अपनी रिपोर्ट में यह भी सिध्द किया कि भाषिक दृष्टि से हिन्दी और उर्दू में कोई अंतर नहीं है। इस प्रकार ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि सभी देशों के अँगरेज़ी मातृभाषियों की संख्या के योग से अधिक जनसंख्या केवल भारत में हिन्दी एवं उर्दू भाषियों की है। रिपोर्ट में यह भी प्रतिपादित किया गया कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कारणों से सम्पूर्ण भारत में मानक हिन्दी के व्यावहारिक रूप का प्रसार बहुत अधिक है। हिन्दीतर भाषी राज्यों में बहुसंख्यक द्विभाषिक-समुदाय द्वितीय भाषा के रूप में अन्य किसी भाषा की अपेक्षा हिन्दी का अधिक प्रयोग करता है जो हिन्दी के सार्वदेशिक व्यवहार का प्रमाण है।    भारत की राजभाषा हिन्दी है तथा पाकिस्तान की राज्यभाषा उर्दू है। इस कारण हिन्दी-उर्दू भारत एवं पाकिस्तान में संपर्क भाषा के रूप में व्यवहृत है।

विश्व के लगभग 93 देशों में हिन्दी का या तो जीवन के विविध क्षेत्रों में प्रयोग होता है अथवा उन देशों में हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की सम्यक् व्यवस्था है। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्या हिन्दी भाषा से अधिक है किन्तु चीनी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा सीमित है। अँगरेज़ी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा अधिक है किन्तु हिन्दी बोलने वालों की संख्या अँगरेज़ी भाषियों से अधिक है। विश्व के इन 93 देशों को हम तीन वर्गों में विभाजित कर सकते हैं -

( I )   इस वर्ग के देशों में भारतीय मूल के आप्रवासी नागरिकों की आबादी देश की जनसंख्या में लगभग 40 प्रतिशत या उससे अधिक है। इन अधिकांश देशों में सरकारी एवं गैर-सरकारी प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों में हिन्दी का शिक्षण होता है। इन देशों के अधिकांश भारतीय मूल के आप्रवासी जीवन के विविध क्षेत्रों में हिन्दी का प्रयोग करते हैं एवं अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में हिन्दी को ग्रहण करते हैं। इन देशों में निम्नलिखित देश उल्लेखनीय हैं- 1.मारीशस 2. फिजी 3. सूरीनाम 4. गयाना 5. त्रिनिडाड एण्ड टुबेगो। त्रिनिडाड के अतिरिक्त अन्य सभी देशों में हिन्दी का व्यापक प्रयोग एवं व्यवहार होता है।

( II )     इस वर्ग के देशों में ऐसे निवासी रहते हैं जो हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में सीखते हैं, पढ़ते हैं तथा हिन्दी में लिखते हैं। इन देशों की विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में प्राय: स्नातक एवं/अथवा स्नातकोत्तर स्तर पर हिन्दी की शिक्षा का प्रबन्ध है। कुछ देशों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी में शोध कार्य करने तथा डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने की भी व्यवस्था है। इन देशों में निम्नलिखित देशों के नाम उल्लेखनीय हैं -

महाद्वीप - देश

(क)   अमेरिका महाद्वीप:  6. संयुक्त राज्य अमेरिका 7. कनाडा 8. मैक्सिको  9. क्यूबा

(ख) यूरोप महाद्वीप:  10. रूस 11. ब्रिटेन (इंग्लैण्ड) 12. जर्मनी 13. फ्रांस 14. बेल्जियम 15. हालैण्ड (नीदरलैण्ड्स) 16. आस्ट्रिया17. स्विटजरलैण्ड  18. डेनमार्क 19. नार्वे 20. स्वीडन 21. फिनलैंड 22. इटली 23. पौलैंड 24. चेक 25. हंगरी 26. रोमानिया 27. बल्गारिया 28. उक्रैन 29. क्रोशिया (ग )  अफ्रीका महाद्वीप : 30. दक्षिण अफ्रीका 31. री-यूनियन द्वीप

(घ)   एशिया महाद्वीप :  32. पाकिस्तान 33. बंग्लादेश 34. श्रीलंका 35. नेपाल 36. भूटान 37. म्यंमार (बर्मा) 38. चीन 39. जापान 40. दक्षिण कोरिया 41. मंगोलिया 42. उजबेकिस्तान 43. ताजिकस्तान 44. तुर्की 45. थाइलैण्ड

(ड. ) आस्ट्रेलिया :  46. आस्ट्रेलिया

( III ) इसका उल्लेख किया जा चुका है कि भारत की राजभाषा हिन्दी है तथा पाकिस्तान की राज्यभाषा उर्दू है। इस कारण हिन्दी-उर्दू भारत एवं पाकिस्तान में संपर्क भाषा के रूप में व्यवहृत है। भारत एवं पाकिस्तान के अलावा हिन्दी एवं उर्दू मातृभाषियों की बहुत बड़ी संख्या विश्व के लगभग 60 देशों में निवास करती है। इन देशों में भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, भूटान, नेपाल आदि देशों के आप्रवासियों/अनिवासियों की विपुल आबादी रहती है। इन देशों की यह आबादी सम्पर्क-भाषा के रूप में 'हिन्दी-उर्दू' का प्रयोग करती है, हिन्दी की फिल्में देखती है; हिन्दी के गाने सुनती है तथा टेलीविजन पर हिन्दी के कार्यक्रम देखती है। इन देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, मैक्सिको, ब्रिटेन (इंग्लैण्ड), जर्मनी, फ्रांस, हालैण्ड (नीदरलैण्ड्स), दक्षिण-अफ्रीका, दक्षिण-कोरिया, उजबेकिस्तान, ताजिकस्तान, थाइलैण्ड, आस्ट्रेलिया आदि देशों के अलावा निम्नलिखित देशों के नाम उल्लेखनीय हैं:- 47. अफगानिस्तान 48.अर्जेन्टीना 49.अल्जेरिया 50.इक्वेडोर 51 इण्डोनेशिया 52.इराक 53.ईरान 54.उगांडा 55.ओमान 56. कजाकिस्तान 57.क़तर 58.कुवैत 59.केन्या 60.कोट डी'इवोइरे 61.ग्वाटेमाला 62.जमाइका 63.जाम्बिया 64.तंजानिया 65.नाइजीरिया 66.निकारागुआ 67.न्यूजीलैण्ड 68.पनामा 69. पुर्तगाल 70.पेरु 71.पैरागुवै 72.फिलिपाइन्स 73.बहरीन 74. ब्राजील 75.ब्रुनेई 76.मलेशिया 77.मिस्र 78.मेडागास्कर 79. मोजाम्बिक 80.मोरक्को 81.मौरिटानिया 82.यमन 83.लीबिया 84. लेबनान 85. वेनेजुएला 86. सऊदी अरब 87. संयुक्त अरब अमीरात 88. सिंगापुर 89. सूडान 90. सेशेल्स 91. स्पेन 92. हांगकांग (चीन) 93 होंडूरास

हिन्दी की फिल्मों, हिन्दी के गानों तथा टी.वी. कार्यक्रमों का प्रसार[सम्पादन]

हिन्दी की फिल्मों, गानों, टी.वी. कार्यक्रमों ने हिन्दी को कितना लोकप्रिय बनाया है - इसका आकलन करना कठिन है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान में हिन्दी पढ़ने के लिए आने वाले 67 देशों के विदेशी छात्रों ने इसकी पुष्टि की कि हिन्दी फिल्मों को देखकर तथा हिन्दी फिल्मी गानों को सुनकर उन्हें हिन्दी सीखने में मदद मिली। लेखक ने स्वयं जिन देशों की यात्रा की तथा जितने विदेशी नागरिकों से बातचीत की उनसे भी जो अनुभव हुआ उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिन्दी की फिल्मों तथा फिल्मी गानों ने हिन्दी के प्रसार में अप्रतिम योगदान दिया है। सन् 1995 के बाद से टी.वी. के चैनलों से प्रसारित कार्यक्रमों की लोकप्रियता भी बढ़ी है। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि जिन सेटेलाईट चैनलों ने भारत में अपने कार्यक्रमों का आरम्भ केवल अँगरेज़ी भाषा से किया था; उन्हें अपनी भाषा नीति में परिवर्तन करना पड़ा है। अब स्टार प्लस, जी.टी.वी., जी न्यूज, स्टार न्यूज, डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफिक आदि टी.वी. चैनल अपने कार्यक्रम हिन्दी में दे रहे हैं। दक्षिण पूर्व एशिया तथा खाड़ी के देशों के कितने दर्शक इन कार्यक्रमों को देखते हैं - यह अनुसन्धान का अच्छा विषय है।

सन् 1984 से सन् 1988 के बीच लेखक ने यूरोप के 18 देशों की यात्राएं कीं। यूरोप के देशों में कोलोन, बी.बी.सी., ब्रिटिश रेडियो, सनराइज, सबरंग के हिन्दी सेवा कार्यक्रमों को हिन्दी प्रेमी बड़े चाव से सुनते हैं। यूरोप के देशों में ऐसी गायिकाएं हैं जो हिन्दी फिल्मों के गाने गाती हैं तथा स्टेज शो करती हैं ।

अपने विदेश प्रवास की उक्त  अवधि में जो फिल्मी गाने विभिन्न यूरोपीय देशों में सर्वाधिक लोकप्रिय थे उनके नाम इस प्रकार हैं - 1. आवारा हूँ 2. मेरा जूता है जापानी 3. सर पर टोपी लाल, हाथ में रेशम का रूमाल, हो तेरा क्या कहना 4. जब से बलम घर आए जियरा मचल मचल जाए 5. आई लव यू 6. मुड़-मुड़ के न देख, मुड़-मुड़ के 7. ईचक दाना, बीचक दाना, दाने ऊपर दाना, छज्जे ऊपर लड़की नाचे, लड़का है दीवाना 8. मेघा छाये आधी रात, निदिंया हो गई बैरन 9. मौसम है आशिकाना, है दिल कहीं से उनको ढूँढ लाना 10. दम मारो दम, मिट जाये गम 11. सुहाना सफर है 12. तेरे बिना जिन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं 13. बोल रे पपीहरा 14.  चन्दा ओ ! चन्दा 15. यादों की बारात निकली है या दिल के द्वारे 17. जिन्दगी एक सफर है सुहाना, यहां कल क्या हो, किसने जाना 17. न कोई उमंग है, न कोई तरंग है, मेरी जिन्दगी है क्या ? एक कटी पतंग है 18. बहारों ! मेरा जीवन भी संवारों, 19. आ जा रे परदेसी, मैं तो खड़ी इस पार सन् 1995 के बाद टेलिविजन के प्रसार के कारण अब विष्व के प्रत्येक भूभाग में हिन्दी फिल्मों  तथा हिन्दी फिल्मी गानों की लोकप्रियता  सर्वविदित है ।

संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाओं की तुलना में हिन्दी मातृभाषियों की संख्या 

सन् 1998 के बाद विश्व स्तर पर हिन्दी की संख्या के आँकड़ों में परिवर्तन आ गया।भाषिक आँकड़ों की दृष्टि से सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर संयुक्त राष्ट्र संघ की 6 आधिकारिक भाषाओं की तुलना में हिन्दी के मातृभाषा वक्ताओं की संख्या निम्न तालिका में प्रस्तुत है (मिलियन में ) शेषांश........

संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाएँ एवं हिन्दी

भाषा               स्रोत (1)      स्रोत (2)        स्रोत (3) / स्रोत (4)    


चीनी मंदारिन         836           800           874          874

हिन्दी                333           550           366          366

स्पेनिश              332           400         322-358      322-358

अँगरेज़ी              322           400           341          341

अरबी                186           200            -             -

रूसी                 170           170           167          167

.फ्रांसीसी               72            90            77           77

(1) Encarta Encyclopedia—Aritcle of Dr. Bernard Comrie (1998)

(2) D. Dalby : The Linguasphere Register of the World's Languages and Speech   Communities, Cardiff, Linguasphere Press (1999)

(3)  Ethnologue, Volume 1. Languages of the World : Edited by Barbara F. Grimes, 14th. Edition, SIL International (2000)

(4)The World Almanac and Book of Facts, World Almanac Education Group, Inc (2003).


(1)एनकार्टा एन्साइक्लोपीडिया में  भाषा के बोलने वालो की संख्या की दृष्टि से जो संख्या है वह इस प्रकार है :

1. चीनी 836 मिलियन (83 करोड़ 60 लाख)

2. हिन्दी 333 मिलियन (33 करोड़ 30 लाख)

3. स्पेनिश 332 मिलियन (33 करोड़ 20 लाख)

4. अँगरेज़ी 322 मिलियन (32 करोड़ 20 लाख)

5. अरबी 186 मिलियन (18 करोड़ 60 लाख)

6. रूसी 170 मिलियन (17 करोड़)

7 फ़्रांसीसी 72 मिलियन (7 करोड़ 20 लाख)

(2) दूसरे स्रोत के ग्रन्थ में संख्या  इस प्रकार है -

1.चीनी 800 मिलियन (80 करोड़)

2.हिन्दी 550 मिलियन (55 करोड़)

3.स्पेनिश 400 मिलियन (40 करोड़)

4.अँगरेज़ी 400 मिलियन(40 करोड़)

5.अरबी 200 मिलियन (20 करोड़)

6.रूसी 170 मिलियन (17 करोड़)

7.फ्रैंच 90 मिलियन (9 करोड़)

(3) तीन एवं चार स्रोतों के ग्रन्थों के आँकड़े एक जैसे हैं। इसका कारण यह है कि द व:ल्ड अल्मानेक एण्ड बुक ऑफ फैक्ट्स (The World Almanac and Book of Facts) के आँकड़ों का आधार एथनोलॉग ही है।   इन दोनो ग्रन्थों में प्रतिपादित संख्या इस प्रकार है :

1-  चीनी 874 मिलियन (87 करोड़ 40 लाख)

2-  हिन्दी 366 मिलियन (36 करोड़ 60 लाख)

3-  स्पेनिश 322-358 मिलियन (32 करोड़ 20 लाख से 35 करोड़ 80 लाख)

4- अँगरेज़ी 341 मिलियन (34 करोड़ 10 लाख)।

इन ग्रन्थों में अरबी को रिक्त दिखाया गया है। इसका कारण इन ग्रन्थों में यह प्रतिपादित है कि अरबी एक क्लासिकल लैंग्वेज है तथा इन्होंने भाषाओं के जो ऑंकड़े दिये हैं, वे मातृभाषियों के हैं, द्वितीयभाषा वक्ताओं (सैकेन्ड लैंग्वेज स्पीकर्स) के नहीं। इस कारण इन्होनें टेबिल में अरबी लैंग्वेज को नहीं रखा है।

रूसी भाषियों की संख्या 167 मिलियन (16 करोड़ 70 लाख) तथा फ्रेंच भाषियों की संख्या 77 मिलियन (7 करोड़ 70 लाख) है।

मातृभाषियों की संख्या का अन्तर

तालिका का अध्ययन करने से यह स्पष्ट है कि इन ग्रन्थों में विभिन्न भाषाओं के मातृभाषियों की संख्या के ऑंकड़ों में एकरूपता/समानता नहीं  है। तालिका में स्रोत-2 के ग्रन्थ में हिन्दी भाषियों की संख्या है - 550 मिलियन(55 करोड़),  किन्तु तीन एवं चार स्रोत के ग्रन्थों में हिन्दी भाषियों की संख्या प्रतिपादित है - 366 मिलियन (36 करोड़ 60 लाख) । जब वैज्ञानिक ढंग से ऑंकड़े इकट्ठे हो रहे हैं तथा मातृ भाषियों की दृष्टि से ऑंकड़े प्रस्तुत किये जा रहे हैं तो यह अन्तराल क्यों है ? स्रोत 3 एवं 4 के ग्रन्थों का ध्यान से अध्ययन करने के बाद आँकड़ों के अन्तर का रहस्य उद्धाटित हो जाता है। इन ग्रन्थों में हिन्दी के क्षेत्रगत भेदों एवं शैलीगत भेदों को अलग-अलग भाषाओं के रूप में प्रदर्शित किया गया है। हिन्दी भाषा क्षेत्र के अन्तर्गत बोले जाने वाले इन क्षेत्रगत एवं शैलीगत भेदों के मातृभाषियों की जो संख्याएँ प्रतिपादित हैं उन संख्याओं को 366 मिलियन (36 करोड़ 60 लाख) संख्या में जोड़ने पर हिन्दी के मातृभाषियों की संख्या पहुँच जाती है - 553 मिलियन(55 करोड़ 30 लाख) । स्रोत-2 में हिन्दी भाषियों की संख्या का योग है- 550 मिलियन( 55 करोड़)।  स्रोत-3 एवं स्रोत-4 के ग्रन्थों में हिन्दी भाषा के जिन 11 क्षेत्रगत (Regional) तथा शैलीगत (Stylistic) भेदों के मातृभाषियों की संख्या को अलग-अलग प्रदर्शित किया गया है, उनकी संख्याओं का  योग कर देने पर  इन दोनो ग्रन्थों में  हिन्दी भाषियों की संख्या हो जाती है - 553 मिलियन (55 करोड़ 30 लाख)

संसार में ऐसा कोई भाषा क्षेत्र नहीं होता, जिसमें क्षेत्रगत भेद नहीं होते। कहावत है - चार कोस पर बदले पानी, आठ कोस पर बानी।   चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्या 700-800 मिलियन (70 करोड़ से 80 करोड़) है तथा उसका भाषा क्षेत्र हिन्दी भाषा क्षेत्र की अपेक्षा बहुत विस्तृत है। चीनी भाषी क्षेत्र में जो भाषिक रूप बोले जाते हैं वे सभी परस्पर बोधगम्य नहीं हैं। जब पाश्चात्य भाषा वैज्ञानिक चीनी भाषा की विवेचना करते हैं तो किसी प्रकार का विवाद पैदा नहीं करते किन्तु स्रोत-3 एवं 4 जैसे ग्रन्थों के विद्वान जब हिन्दी भाषा  की विवेचना करते हैं तो हिन्दी भाषा क्षेत्र के अन्तर्गत बोले जाने वाले हिन्दी भाषा के उपभाषा रूपों को भाषा का दर्जा दे देते हैं। हिन्दी भाषा क्षेत्र के अन्तर्गत भारत के निम्नलिखित राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश समाहित हैं :-1. उत्तर प्रदेश 2. उत्तराखंड 3. बिहार 4. झारखण्ड 5. मध्य प्रदेश 6. छत्तीसगढ़ 7. राजस्थान 8. हिमाचल प्रदेश 9. हरियाणा 10. दिल्ली  11. चण्डीगढ़।

हिन्दी भाषा का क्षेत्र बहुत व्यापक है। हिन्दी भाषा क्षेत्र में ऐसी बहुत सी उपभाषाएँ हैं जिनमें पारस्परिक बोधगम्यता का प्रतिशत बहुत कम है, किन्तु ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से सम्पूर्ण भाषा क्षेत्र एक भाषिक इकाई है तथा इस भाषा-भाषी क्षेत्र के बहुमत भाषा-भाषी अपने-अपने क्षेत्रगत भेदों को हिन्दी भाषा के रूप में मानते एवं स्वीकारते आए हैं। भारत के संविधान की दृष्टि से यही स्थिति है। सन् 1997 में भारत सरकार के सैन्सस ऑफ इण्डिया द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ में भी यही स्थिति है।

'खड़ी बोली' हिन्दी भाषा क्षेत्र का उसी प्रकार एक भेद है, जिस प्रकार हिन्दी भाषा के अन्य बहुत से क्षेत्रगत भेद हैं। प्रत्येक भाषा क्षेत्र में अनेक क्षेत्रगत, वर्गगत एवं शैलीगत भिन्नताएँ होती हैं। प्रत्येक भाषा क्षेत्र में किसी क्षेत्र विशेष के भाषिक रूप के आधार पर उस भाषा का मानक रूप विकसित होता है, जिसका उस भाषा-क्षेत्र के सभी क्षेत्रों के पढ़े-लिखे व्यक्ति औपचारिक अवसरों पर प्रयोग करते हैं। पूरे भाषा क्षेत्र में इसका व्यवहार होने तथा इसके प्रकार्यात्मक प्रचार-प्रसार के कारण विकसित भाषा का मानक रूप भाषा क्षेत्र के समस्त भाषिक रूपों  के बीच संपर्क सेतु का काम करता है तथा कभी-कभी इसी मानक भाषा रूप के आधार पर उस भाषा की पहचान की जाती है। प्रत्येक देश की एक राजधानी होती है तथा विदेशों में किसी देश की राजधानी के नाम से प्राय: देश का बोध होता है, किन्तु सहज रूप से समझ में आने वाली बात है कि राजधानी ही देश नहीं होता।

जिस प्रकार भारत अपने 28 राज्यों एवं 07 केन्द्र  शासित प्रदेशों को मिलाकर भारतदेश है, उसी प्रकार भारत के जिन राज्यों एवं  शासित प्रदेशों को मिलाकर हिन्दी भाषा क्षेत्र है, उस हिन्दी भाषा-क्षेत्र के अन्तर्गत जितने भाषिक रूप बोले जाते हैं उनकी समाष्टि का नाम हिन्दी भाषा है। हिन्दी भाषा क्षेत्र के प्रत्येक भाग में व्यक्ति स्थानीय स्तर पर क्षेत्रीय भाषा रूप में बात करता है। औपचारिक अवसरों पर तथा अन्तर-क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं सार्वदेशिक स्तरों पर भाषा के मानक रूप अथवा व्यावहारिक हिन्दी का प्रयोग होता है। आप विचार करें कि उत्तार प्रदेश हिन्दी भाषी राज्य है अथवा खड़ी बोली, ब्रजभाषा, कन्नौजी, अवधी, बुन्देली आदि भाषाओं का राज्य है। इसी प्रकार मध्य प्रदेश हिन्दी भाषी राज्य है अथवा बुन्देली, बघेली, मालवी, निमाड़ी आदि भाषाओं का राज्य है। जब संयुक्त राज्य अमेरिका की बात करते हैं तब संयुक्त राज्य अमेरिका के अन्तर्गत जितने राज्य हैं उन सबकी समष्टि का नाम ही तो संयुक्त राज्य अमेरिका है। विदेश सेवा में कार्यरत अधिकारी जानते हैं कि कभी देश के नाम से तथा कभी उस देश की राजधानी के नाम से देश की चर्चा होती है। वे ये भी जानते हैं कि देश की राजधानी के नाम से देश की चर्चा भले ही होती है, मगर राजधानी ही देश नहीं होता। इसी प्रकार किसी भाषा के मानक रूप के आधार पर उस भाषा की पहचान की जाती है मगर मानक भाषा, भाषा का एक रूप होता है : मानक भाषा ही भाषा नहीं होती। इसी प्रकार खड़ी बोली के आधार पर मानक हिन्दी का विकास अवश्य हुआ है किन्तु खड़ी बोली ही  हिन्दी नहीं है। तत्वत: हिन्दी भाषा क्षेत्र के अन्तर्गत जितने भाषिक रूप बोले जाते हैं उन सबकी समष्टि का नाम हिन्दी है। हिन्दी को उसके अपने ही घर में तोड़ने का षडयंत्र अब विफल हो गया है क्योंकि 1991 की भारतीय जनगणना के अंतर्गत जो भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ प्रकाशित हुआ है उसमें मातृभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार करने वालों की संख्या का प्रतिशत उत्तर प्रदेश (उत्तराखंड राज्य सहित) में 90.11, बिहार (झारखण्ड राज्य सहित) में 80.86, मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़ राज्य सहित) में 85.55, राजस्थान में 89.56, हिमाचल प्रदेश में 88.88, हरियाणा में 91.00, दिल्ली में 81.64 तथा चण्डीगढ़ में 61.06 है। हिन्दी एक विशाल भाषा है। विशाल क्षेत्र की भाषा है। अब यह निर्विवाद है कि चीनी भाषा के बाद हिन्दी संसार में दूसरे नम्बर की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।

यदि हम सम्पूर्ण प्रयोक्ताओं की संख्या की दृष्टि से बात करें जिसमें मातृभाषा वक्ता (First Language Speakers) तथा द्वितीयभाषा वक्ता(Second Language Speakers) दोनो हों तो हिन्दी भाषियों की संख्या लगभग एक हजार मिलियन (सौ करोड़) है।

दूसरे स्रोत के ग्रन्थ(The Linguasphere Register of the World's Languages and Speech Communities) में इस दृष्टि से हिन्दी भाषियों की संख्या 960 मिलियन मानी गई है । जो प्रमाणिक तथ्य प्रस्तुत हैं उनसे यह निर्विवाद है कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। (साहित्य अमृत से)

प्रवासी साहित्यः हमारा दायित्व[सम्पादन]

हिन्दी का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा है कि उसे अपनों के ही प्यार से वंचित रहना पड़ा है। राष्ट्रभाषा का गौरवशाली पद पाकर भी वह उस पर प्रतिष्ठित नहीं हो पा रही है। उसकी एक से एक कमियाँ निकालने वाले उसके अपने ही हैं। जनगणना में उसके बोलने वालों में उसकी बोलियाँ/सहभाषायें में (राजस्थानी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, मैथिली, आदि) बोलने वालों को नहीं जोड़ा जाता । धर्म और सम्प्रदाय के कारण वे लोग भी उसे अपनी मातृभाषा नहीं लिखाते जो उसके अतिरिक्त और कोई भाषा जानते ही नहीं। प्रपत्रों में मातृभाषा का स्तम्भ तो होता है। भाषा-ज्ञान का नहीं, कि उससे हिन्दी बोलने और जानने वालों की संख्या अत्याधिक बढ़ जाने की आशंका रहती है। अँगरेज़ी  माध्यम के विद्यालय सबसे अधिक हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही खुल रहे हैं, उसके अपनों के उसकी ओर से मुँह मोड़ लेने के कारण। प्रकाशन की आज की स्थिति में केवल लेखन के भरोसे जी सकना हिन्दी के लिए संभव नहीं है।

सबसे अधिक दुर्व्यवस्था का शिकार हिन्दी का प्रवासी-साहित्य है। अपनी धरती की महक से सिक्त यह साहित्य निकट-दृष्टि सम्पादकों के कारण न तो पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पा रहा है न संचार माध्यमों में और नहीं पाठ्यक्रम या साहित्येतिहास में । इससे भारतवासियों को पता ही नहीं चलता कि भारत के बाहर हिन्दी के प्रचार-प्रसार की क्या स्थिति है। प्रवासियों के सम्मेलन में भी सम्पन्न देशों के सम्पन्न (भारतवंशी) प्रवासी ही ससम्मान प्रस्तुत किए जाते हैं, और वे भी अँगरेज़ी बोलने में ही गर्व का अनुभव करते हैं।

फिजी, मारीशस सुरीनाम, गुयाना आदि में प्रवासी भारतीयों ने अपनी भाषा को न केवल जीवित रखा है वरन उसे निष्ठापूर्वक पुष्पित और पल्लवित भी किया है। वहाँ के हिन्दी-साहित्य के बारे में कभी-कभार कहीं कोई लेख आदि पढ़ने को मिल जाए तो मिल जाए। कभी वर्षों में, कृतार्थ करने के भाव से प्रकाशित, कोई रचना भी शायद देखने को मिल जाए, बिना लेखक के किसी परिचय या चित्र आदि के। विश्व हिन्दी सम्मेलन के प्रयासों से प्रवासी हिन्दी-लेखकों के बारे में यहाँ कुछ जानकारी हो पायी है और वहाँ की एकाध साहित्यिक कृतियाँ भी पढ़ने को मिल गयी है। इस सबसे अनुमान लगा है कि वहाँ भी साहित्य की लता पूरी गति से सदैव गतिशील रही है । ऐसे में हिन्दी-साहित्य का इतिहास अधूरा-अधूरा लगने लगा है। प्रवासी हिन्दी-साहित्य के समावेश के बिना उसके सर्वाग सम्पूर्ण हो सकने की संभावना नहीं है । कम से कम पिछले सौ-सवा सौ वर्षों का साहित्येतिहास संशोधित किया जाना चाहिए और उसमें प्रवासी-साहित्य की प्रवृत्तियों, शैलियों एवं अवदान का उल्लेख होना चाहिए । उसे हीन या न्यून कहकर उपेक्षित कर देना अदूरदर्शिता होगी। उसे यहाँ की परिस्थितियों से नहीं, वहाँ की परस्थितियों को ध्यान में रखकर देखना और समझना होगा।

परिचित हो जाने पर प्रवासी-साहित्य के पाठकों की संख्या बढे़गी जिससे उसे प्रकाशक मिलने की संभावनायें बढे़गी और उन देशों के भारतवांशियों के प्रति एक नई निकटता और सौहार्द का भाव उत्पन्न होगा जो लेखकों के आदान-प्रदान का द्वार उन्मुक्त करेगा। साथ ही साथ हिन्दी के पाठ्यक्रम में उनकी रचनाओं को भी स्थान मिलने की संभावनायें बढ़ेगी। क्या यह विडम्बना नहीं है कि चलचित्र-जगत के तुक्कड़ गीतकारों को पाठ्यक्रम में स्थान दिलाने के तो प्रयास हो रहे हैं, पर प्रवासी-साहित्य की ओर से आँखें पूरी तरह बंद रखी जा रही हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दी भारत के हिन्दी भाषी क्षेत्र की ही भाषा न रहकर विश्व-भाषा बन चुकी है और विश्व का शायद ही कोई बड़ा नगर या उपनगर हो जहाँ हिन्दी बोलने वालों की कुछ न कुछ संख्या न हो।

प्रत्येक स्तर पर प्रवासी-साहित्य का समावेश हिन्दी के पाठ्यक्रम में होना चाहिए और  विश्वविद्यालयों के स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर प्रवासी-साहित्य का प्रश्नपत्र होना चाहिए। जैसे अँगरेज़ी -साहित्य में अँगरेज़-साहित्यकारों के अतिरिक्त स्थानीय अँगरेज़ी-लेखकों तथा अमेरिका (अँगरेज़ी ) साहित्य का खण्ड होता है, उसी प्रकार हिन्दी साहित्य में भी होना चाहिए। इस में अन्य भाषाओं के पाठ्यक्रमों से भी प्रेरणा ली जा सकती है।

भाषा के विकास की यह प्रथम शर्त है कि उसके साहित्य को जानने-समझने का प्रयास से, उसके साहित्यकारों को उचित सम्मान मिले तथा उसके साहित्य का प्रचार-प्रसार हो। और सबसे रोचक तथ्य यह है कि पाठ्यक्रम में सम्मिलित लेखकों को ही सामान्य जन लेखक मानते हैं। यहाँ एक बात और ध्यान में रखनी होगी कि प्रवासी-साहित्य का अर्थ वहाँ की मिट्टी में रचा-बसा साहित्य ही है। दूतावासों के कर्मचारियों और अनुबंध पर सेवा- कार्य कर रहे भारतीयों को उसका अपहरण नहीं करने दिया जा सकता । अपने दाय का संरक्षण-संवर्द्धन करके ही हम वास्तविक रूप से समृद्ध हो सकेंगे।

जापान में हिंदी[सम्पादन]

‘यूजि इचिहाशि साना’

‘उपस्थित’

इकुमि सान।

‘उपस्थिति’

‘यूको हिरायशि सान।’

‘उपस्थित।’

उपस्थित, उपस्थित और उपस्थित। तोक्यो विश्वविद्यालय के कक्ष में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति की श्रृंखला। यह एक विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय है यहाँ हिन्दी विदेशी भाषा के रूप में पढ़ायी जाती है। चार वर्ष का स्नातकीय और छः वर्ष का स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम। जापानी और भारतीय प्रोफेसरों के सहयोग से हिन्दी की यह यात्रा वर्णमाला से प्रारंभ होकर महादेवी वर्मा, डॉ. हरिवंशराय बच्चन और मोहन राकेश के साहित्य के अंतिम पड़ाव को छू लेती है।

“आप अध्यापक हैं और हम सब छात्र हैं।”

“यह क्या है ?”

“वह शब्ददोष ।” वाक्यों द्वारा अधयापक और छात्रों का परिचय प्रगाढ़ से प्रगाढोत्तर होता चला जाता है। पन्द्रह छात्र-छात्राओं का समूह है यह । विश्वप्रसिद्ध तोक्यो विश्वविद्यालय में प्रवेश पाना बहुत कठिन हैं जिनमें से पाँच सौ का चयन होता है और उनमें से पन्द्रह विद्यार्थी हिन्दी विभाग में दाखिला लेते हैं । हिन्दी के अतिरिक्त, संस्कृत, बंगला और उर्दू में से किसी एक भाषा का अध्ययन और भारत भ्रमण भी पाठ्यक्रम में सम्मिलित है। जापान में रहते समय लिखने-पढ़ने और भारत में रहकर इनका बोलने पर भी अधिकार हो जाता है।

“कहाँ गये वे चालीस-चालीस लोग ?”

“यह क्या हो रहा है ? सब अपनी अपनी कहते हैं।”

विश्वविद्यालय के प्रांगण में श्री विष्णु प्रभाकर के “टूटते परिवेश” का मंचन। भारत में बदलते मूल्य, टूटते परिवेश, परिवार, बेकार युवकों की मानसिकता को प्रस्तुत करने में व्यस्त, त्रस्त छात्र-छात्राएं और दर्शकों के रूप में प्रोफेसर, बुद्धिजीवी, लेखक और पत्रकार । जापान में भला कोई कैसे स्वीकार कर ले कि नौकरी के लिए अर्जियाँ लिखते फाड़ते-फेंकते जीवन का बहुमूल्य समय गुजर जाता है, नौकरी है कि मिलने का नाम नहीं लेती । दूसरे वर्ष के छात्र वार्षिक समारोह में भारतीय रसोई का पूरी, चावल, चाय, समोसा का स्वाद चखते-चखते अन्नपूर्णा में विद्यार्थियों के झुंड के झुंड। पढ़ने का यह कक्ष कुछ दिनों के लिए भोजनालय में परिवर्तित हो जाता है। वस्तुतः भाषा के माध्यम से ये छात्र भारतीय राजनीति, सामाजिक, सास्कृतिक ढांचे तक पहुँचना ही इनका प्रमुख उद्देश्य होता है।

आखिर क्यों विश्व से अलग-थलग रहने वाले जापान को यह आवश्यकता जा पड़ी कि विदेशी भाषा का अध्ययन अध्यापन किया जाए। बहुत समय तक लगातार दूसरों देशों से कटकर वह रह नहीं सकता था इसलिये नागासाकी के द्वार से पश्चिम की संस्कृति प्रविष्ट हुई और सैन्य-द्वार से भारतीय संस्कृति की। फ्रांस की तरह जापान में भी लेखकों, कवियों और बुद्धिजीवियों को सेना से जुड़े रहना पड़ता था।

बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि हिन्दी के सुप्रसिद्ध विद्वान प्रोफेसर के. दोई किसी ज़माने में वर्मा की सेना में भरती थे। उन्होंने भारतीयों से हिन्दी के कुछ शब्द सीखे, संस्कृति की जानकारी ली और युद्ध समाप्ति के बाद इस कदर भारतमय हो गये कि हिन्दी और भारत को प्रतिष्ठित करने के लिये पूर्ण मनोयोग से जुट गए और हिन्दी विभाग को शिखर तक पहुँचा दिया। हिन्दी की प्रारंभिक स्थिति यह थी कि किसी भी प्रवासी भारतीय को आमंत्रित कर लिया जाता और साधारण कामचलाऊ बोलबाली, भाषा सीख ली जाती । आज स्थिति यह है कि अनुपलब्ध, दुर्लभ पांडुलिपियाँ पत्र-पत्रिकाएँ और हजारों दुर्लभ ग्रंथों का संग्रह करते प्रो. तोशियोतनाका काजुहिकि माचिदा।

भाषा के अतिरिक्त धर्म, इतिहास, संगीत और संस्कृति के प्रति भी छात्रों में गहरी रूचि होती है। कुछ मेहनती छात्र जापान के विदेश मंत्रालय में प्रवेश पा जाते हैं और दो वर्ष तक हिन्दी का अध्ययन कर नयी दिल्ली स्थित राजदूतावास में सचिव के रूप में काम करने लगते हैं। श्री तागा, सातों ऐसे ही परिश्रमी व्यक्तित्व है।

इसी तरह ओसाका विश्वविद्यालय में भी हिन्दी एक विभाग रूप में प्रतिष्ठत है। प्रो. कोगा और प्रो. मालवीय की हिन्दी सेवा से कौन परिचित नहीं है। पाठ्यक्रम तैयार करते समय कैसेट, हस्तलिपि को महत्व दिया जाता है, विद्यार्थियों का योग्यता का आधार वर्ष भर का कार्य है, परीक्षा नहीं। इसलिये तोक्यो विश्वविद्यालय में परीक्षा की परम्परा नहीं है।

विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त हिन्दी के विकास में रेडियो जापान का भी महत्वपूर्ण योगदान है। यहाँ से नियमित रूप से हिन्दी प्रसारण होता है। भारत-पाकिस्तान के कवियों, लेखकों, साहित्यकारों और पत्रकारों से भेट-वार्ताएं ज्ञानवर्द्धक कार्यक्रमों में मानी जाती है । यहीं मेरी भेंट फैज अहमद फैज से होती है। इनकी दास्तां दिल्ली-कराँची के इदगिर्द घूमती रही है और ये भारत की यादों को हमेशा के लिये सहेज कर रखते हैं।

जनगण मन अधिनायक जय है भारत भाग्यविधाता।

असाकुसा के पास तीन चार जापानी युवक समवेत स्वर में गाते- नमस्कार करते निकल जाते हैं। हम लोग जापान का “किमिगायो” राष्ट्रगीत जानें या न जानें लेकिन भारत के बारे में जानकारी रखने वाला हर जापानी हमारे प्रसिद्ध गीतों को बखूबी जानता है।

रेडियो जापान के अतिरिक्त हिन्दी फिल्में भी जापान में बहुत लेकप्रिय है। हिन्दी सीखने वाले वर्ग विशेष में भी एक ऐसा वर्ग है जो फिल्मों के प्रति गहरा लगाव रखता है। हिन्दी फिल्मों का जापानी अनुवाद वार्षिक समारोह रूप में छायांकन आम बात है। सिनेमा हॉल के बाहर लंबी-लंबी कतारें अवसर मिलने पर वीडियो पर भी फिल्मों देखने चली जाती हैं। आलथी-पालथी और भारतीय चाय की चुस्कियाँ। कुछ लोग वार्षिक फिल्मोत्सव का आनंद लेते हर वर्ष भारत आते हैं। इस माध्यम से सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ सागर पार पहुँच ही जाती है।

भारतीय राजनीति समाज-संस्कार अर्थव्यवस्था और हि्दी में गहरी रूचि रखने वाले प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तितत्व ही राजदूतावास में नियुक्ति पा सकते हैं। यही कारण है कि यहाँ का प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हमारे आस-पास हमसे ज्यादा दिलचस्पी लेता है। महामहिम राजदूत की पत्नी श्रीमती नोदा टीप-वर्ष पर पूजा साड़ी पहने द्वार पर रंगीली और हाथों पर मेंहदी रचाती है वे भारतीय आत्मीयता-आतिथ्य से प्रभावित है। चिड़ियों को दाना-चुगाते हाथ कुबेर से कम नहीं हैं। “लाइए में हाथ बटाती हूँ” यह पत्र पुष्प हैं, स्वीकार कीजिए कहकर आसपास को भी आत्मीयता से भर देती हैं।

जब हमारे नवयुवक हिन्दी के नाम पर नाक भोंह सिकोडते हैं तो ऐमी आयोगी देवनागरी लिपि के प्रति बेहद आकर्षित है क्योंकि यह सुंदर और आकर्षक लिपि है । कोशिश करती है कि सड़कों-चौराहें पर लिखा सभी कुछ पढ़ डालें।

आर-पार आना जाना लगा ही रहता है । श्रीमती तबाता ने भारत में रहकर दो वर्ष हिन्दी सीखी है, यदि मौका मिला तो फिर से हिन्दी सीखेंगी । क्योंकि हिन्दी सम्मानसूचक और मानवतापूर्ण भाषा है । श्रीमती सुगियामा और उनकी दो वर्षीया बेटी में होड़ लगी रहती है । बेटी है कि माँ को हरा देती है । हाथ जोड़ नमस्ते करती, और माँ की गलतियाँ निकालती है ।

श्रीमती साइगो जब नमस्कार करती अपनी बात हिन्दी में समझाती है तो उनकी सहेलियाँ खुश हो जाती हैं । कामचलाऊ स्थिति से जा पहुँचती है संस्कृति की ओर । दिल्ली में हिन्दी के अध्ययन, अध्यापन की बात करते समय श्रीमती इवासाकी को याद रखना बहुत जरुरी है उन्हें यह बताया गया कि भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेज़ी है यहाँ पहुँचने पर पता चला कि राष्ट्रभाषा हिन्दी ही है । इसी भाषा के माध्यम से ये भारतीय परिवारों से जुड़ गयी है ।

मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद् के स्वर्ण जयन्ती समारोह के अवसर पर इन जापानी महिलाओं का उल्लेख करना मेरे लिए आवश्यक हो गया है । जापान के उच्चवर्ग को पृष्ठ भूमि में भारतीय अभिवादन आतिथ्य के संस्कार तो देने ही हैं। (अध्यापक के नाते) क्योंकि यह भाषा संस्कार पूर्ण है । धीरे-धीरे इस भाषा के संस्कार लुप्त होने लगे हैं, कौन-सी भाषा इन विदेशियों को सिखायी जाए ?  वर्ष साल मास-महीना सप्ताह-हफ्ता में से कौन सा शब्द, कौन-सी हिन्दी ? रेलवे प्लेटफार्मों, बाजारों फुटपाथों, गलियारों और पुस्तकालयों में बोली जाने वाली हिन्दी का यह कौन-सा रुप ? ठीक है । कोशिश करने पर एकमानिक रुप सिखा भी दिया जाए तो हमारे यहाँ बोली जाने वाली खिचड़ी बोली का प्रभाव क्या होगा ? सेब को ‘एप्पल’ के माध्यम से पढ़ाना तो रोकना ही होगा । नहीं तो लज्जित होने की सीमा  बहुत पीछे छूट जाएगी । यदि इसी प्रकार विदेशी शब्दों और अंग्रेज़ियत की घुसपैठ जारी रहेगी तो वह दिन दूर नहीं जब अपने ही घरों में अपने ही कान “नमस्कार” सुनने को तरसे जायेंगे । जाना तो सभी को स्टेशन ही है । चाहे  “इसटेसन” कह लो या  “सटेशन”, कहने से काम नहीं चलेगा । संस्कारगत भाषा के अभाव में कोई भी साहित्य ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह सकता । यदि हमें जीवित रहना है तो सबसे पहले भाषा को जीवित रखना होगा । कम से कम इस अवसर पर यह संकल्प तो कर ही लें । यदि पाँच नये शब्द रोज़ हम सीख लें और दो नये शब्द विदेशियों को सिखा दें तो हिन्दी का शब्द कोष समृद्ध हो जाएगा ।

हमारे यहाँ के कुछ सरकारी और ग़ैर सरकारी प्रतिष्ठान हिन्दी के प्रचार-प्रसार में प्राणप्रण से जुटे हैं । हिन्दी अकादमी, साहित्य अकादमी, साहित्य कला परिषद का हिन्दी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है । अन्य कार्यक्रमों के अतिरिक्त विदेशी छात्र-छात्राओं के लिये यदि शब्दावलियाँ तैयार की जाएं तो सोने में सुहागा होगा । प्रारंभिक शिक्षण में करीब-करीब पाँच हजार शब्द आसानी से सिखाये जाते हैं उन्हें यदि पुस्तक बद्ध कर दिया जाये तो यह महत्वपूर्ण कार्य होगा । जाने-माने हस्ताक्षरों से यह ज्ञान यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हो सकता है । आज जबकि शिक्षण प्रणाली में परिवर्तन की गुंजाइश है । राष्ट्रभाषा को विदेशी अध्येताओं तक पहुँचने के लिए ऑडियो वीडियो भी तैयार कर लिए जाएं तो सोने में सुहागे का काम होगा।                                                        

संयुक्त राष्ट्र संघ और हिन्दी[सम्पादन]

हिन्दी आज एक राष्ट्र की भाषा न रहकर विश्व भाषा के रूप में अपनी ख्याति अर्जित कर चुकी है। क्योंकि हिन्दी भूमण्डलीकरण के दौर में विश्व की सबसे सरल भाषा के रूप में अपना स्थान बनाने में सफल हुई है। इसका प्रमुख कारण यह है कि हिन्दी जैसे बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है यही नहीं विश्व की सबसे प्रचलित भाषाएं जो संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपना स्थायी स्थान बनाये हुए हैं। (अंगरेज़ी, फ्रेंच, रूसी, चीनी, स्पेनिश और अरबी) इनकी भाषिक एवं वाचिक संरचना के आधार पर हमारी हिन्दी सबसे उत्कृष्ट है। भाषिक, वाचिक विशेषताओं की दृष्टि से हिन्दी ही विश्व की ऐसी भाषा है जो विस्तार एवम एक रूपकता की शक्ति रखती है। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया को देखें तो यह वास्तव में वास्कोडिगामा के समय से ही अस्तित्व में आ गयी थी। परन्तु इस प्रक्रिया के चलते जो परिवर्तन हमें परिलक्षित होते हैं उसका समर्थन करना जटिल सन्दर्भों पर निर्भर करता है। भूमण्डलीकरण की इस प्रक्रिया को आज भी कोई निश्चित ,निर्णायक राय नहीं मिल पायी है ? शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक क्षेत्रों को यदि हम छोड़ दें तो अन्य क्षेत्रों में भूमण्डलीकरण आज अपना दबदबा कायम किये हुए है। भूमण्डली करण के कारण हिन्दी का प्रभाव व्यावसायिकता पर स्पष्ट दिखने लगा है। वैश्विक परिदृश्य की बात करें तो हिन्दी की पहचान तथा हिन्दी के प्रति रूचि विश्व में उत्तरोत्तर बढ़ रही है। अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य में यदि हम देखें तो जितना हमरा देश में व्यावसायिक एवं वैधानिक दृष्टि से हिन्दी का विकास नहीं हुआ है उससे कहीं अधिक विकास विश्व में हिन्दी का हुआ है । और संयुक्त राष्ट्र संघ में जो भाषाएं स्थाई रूप से मान्यता प्राप्त किये हुए हैं उनमें हिन्दी को रखे जाने की माँग पर लगभग हर देश से इसे समर्थन मिलता शुरू हो गया है।

संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को स्थाई मान्यता दिलाये जाने का प्रकरण आज कोई नयी बात नहीं है। हिन्दी को अधिकारिक भाषा के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ में सन् 1975 से ही प्रयास जारी हैं। क्योंकि सन् 1975 ई. में नागपुर में सम्पन्न प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के माध्यम से औपचारिक रूप से यह प्रस्ताव रखा गया । इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दी राष्ट्रभाषा एवं विश्व भाषा के मानकों में कहीं पीछे हो यह बात हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी सन् 1918 से पहले ही व्यक्त कर चुके थे। हाँ इस विश्व हिन्दी सम्मेलन से यह बात तो निश्चित हो गयी थी कि हिन्दी को जो स्थान मिलना चाहिए वह वैश्विक दृष्टि से उसे नहीं मिल पा रहा है। यह बात मॉरिशस के प्रथानमेंत्री सर शिवसागर राम गुलाम स्पष्ट कर चुके थे। इस सम्मेलन की यह विशेषता रही कि सभी ने एक स्वर से हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिकारिक भाषा के रूप में दर्जा दिलाने की पुरजोर वकालत की। भारतीय संसद में समय समय पर इस पर काफी तीखी बहसें एवं सुझाव पेश किये गये और तत्कालीन समय के प्रधानमेंत्रियों इंदिरा गाँधी, नरसिम्हा राव एवं अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने-अपने स्तर पर पार्टी से सम्बन्धित नितियों के आधार पर थोड़ी बहुत कोशिश की थी परन्तु संकल्प शक्ति के वह बहस नहीं की जो उन्हें करनी चाहिये । एक ही प्रधानमेंत्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ से हिम्मत जुटाकर अपना उद्बोधन हिन्दी को अपनी ही संसद के माध्यम से वह बहस नहीं की जो उन्हें करनी चाहिए । एक ही प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ से हिम्मत जुटाकर अपना उद्बोधन हिन्दी में दिया। हालांकि इससे पहले अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री की हैसियत में नहीं थे। जब बाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने तो लोगों में आशाओं का संचार हुआ और उम्मीदें बँधी कि अब शायद हिन्दी को संवैधानिक दर्जा मिल जाये परन्तु वह सब कुछ सम्पन्न नहीं हो पाया जिससे हम वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी को लेकर अपनी बात को दमखम के साथ रखते । वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से उम्मीद की कुछ नयी किरणें बनी हैं कि शायद हमारी हिन्दी संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा बन जाये इसके लिये सर्वप्रथम यह होना चाहिये कि सर्वसम्मत से संसद द्वारा हिन्दी को प्रथम वरीयता के रूप में संवैधानिक प्रस्ताव पास करके संविधान में राष्ट्रभाषा के रूप स्थापित किया जाये तब फिर हम इसे उत्साह से संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को अधिकारिक भाषा का स्थान दिलाने के लिये प्रयास करें।

संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने की विश्व (वैश्विक देशों) की सहयोगी संस्था है। और विश्व के लगभग 150 से अधिक देश इसमें अपना सक्रिय सहयोग देते हैं। भाषिक दृष्टि से यह संस्था इस समय छह भाषाओं का प्रतिनिधित्व करती है। जिसमें चीनी, अंग्रेजी, स्पेनिश, रूसी, फ्रेंच एवं अरबी हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ अपने स्थापना तथा चार्टर 1945 के समय जब अस्तित्व ने आया तो उस समय इसमें प्रमुख रूप से पाँच देश अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन ही थे। ये ही राष्ट्र सुरक्षा परिषद के तत्कालीन सदस्य भी बने। संयुक्त राष्ट्र संघ में वर्तमान भाषाओं के बोलने वालों की बात करें (एन कार्टा एनसाइक्लोपीडिया) तो स्पेनिश 33 करोड़ 20 लाख, अंग्रेजी 32 करोड़ 20 लाख, अरबी 18 करोड़ 60 लाख, रूसी 16 करोड़ तथा फ्रेंच 4 करोड़ 20 लाख। इस प्रकार हम देखते हैं कि आज जो संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकारिक भाषाएं हैं उसने परिप्रेक्ष्य में हमारी बोलचाल की हिन्दी इस समय 80 करोड़ अभिजनों की विश्व भाषा के रूप में प्रथम स्थान पर है।  संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में यह प्रावधान है कि इसमें किसी नई भाषा को मान्यता लेने के लिये इसकी जनरल असेम्बली 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित करके अधिकारिक भाषा के रूप में इसे मान्यता दिला सकती है। तथ्यों एवं आँकड़ों पर गौर फरमायें की इस समय हिन्दी बोलने वाले विश्व में पहले स्थान पर आ गये हैं। हिन्दी अपनी विशुद्ध वैज्ञानिक लिपि तथा अनुशासित भाषाके साथ सरल, बोधगम्य व शीघ्र ही समझ में आने वाली, साथ बहुत कम समय में सीखे जाने वाली भाषा है। हिन्दी का व्याकरण सरल होने के साथ यह भाषा उच्चारण एवं समझने में सुगम है। यही कारण है कि यह विश्व के हर कोने में इसका प्रचार-प्रसार हो रहा है। विदेशों में आज हिन्दी अपने पठन-पाठन व अध्ययन के लिये सुगम भाषा के रूप में ख्याति अर्जित करती जा रही है। वास्तविकता यह है कि विदेशों में हिन्दी भाषा में रचित साहित्य की मांग दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। इतना सब होने के बावजूद भी हिन्दी के प्रति अधिकारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारा दावा इतना मजबूत नहीं हो पा रहा है। कि उसे विश्व जनमत अधिकारिक भाषा का दर्जा दे सके। आखिर ऐसी कौन सी कठिनाइयां एवं परेशानियां है जिससे हमारी हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थान नहीं मिल पा रहा है ?

प्राथमिक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को स्थापित करने के लिये तीन तरह के परेशानियां उपस्थित हो रही हैं - प्रथम दो तिहाई सदस्यों का बहुमत, दूसरे स्तर पर भारी आर्थिक खर्च, तीसरा कारण प्रमुख भाषाओं के अनुवाद की समस्या । जहाँ तक 2/3बहुमत की बात करें तो वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिये यह सबसे कठिन कार्य है। क्योंकि भारत की बढ़ती ताकत के प्रति कोई देश नहीं चाहता है कि इसे भाषिक दृष्टि से मजबूत किया जाये। अमेरिका एवं बिट्रेन की वर्तमान स्थितियों को देखते हुए यह मजबूरी सी लगती है क्योंकि इस समय इस्लामी आतंक के रूप में वह भारत का पुरजोर समर्थन प्राप्त करने के लिये अपने यहाँ हिन्दी पढ़ाने की वकालत के साथ-साथ सरकारी स्तर पर सहयोग राशि भी हिन्दी पर अधिक खर्च कर रहा हैं क्योंकि यदि वे नहीं करते हैं तो वहाँ पर रहने वाले भारतवासी अमेरिका ब्रिट्रेन को उतना आर्थिक/भावनात्मक सहयोग नहीं देंगे। दूसरे देश भारत कोसहयोग इसलिए भी नहीं दे सकते हैं कि अमेरिका एवं ब्रिट्रेन आखिर भारत को इतनी वरीयता क्यों दे रहा है। हम यह याद दिला देना लाजिमी समझते हैं कि अरबी भाषा को संयुक्त संघ ने केवल इसलिये अधिकारिक भाषा के रूप में दर्जा मिला क्योंकि अमेरिका एवं ब्रिट्रेन को तेल की राजनीति करनी थी।फिलहाल कुछ भी हो भारत को इन अनुकूल परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने के लिये एक बार पुनः जोर आजमाइश शुरू कर देना चाहिये।

संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता है कि यदि उसे स्थायी दर्जा सदस्य देश के रूप में या भाषा के रूप में जो भी मिलता है। उसको प्रतिवर्ष एक निश्चित राशि इसके बनाये हुए कोशों में जमा करनी पड़ती है। इसलिये भारत के समक्ष यह बहुत बड़ी चुनौती है कि वह अपने आर्थिक ढाँचे में सुधार कर पहले संयुक्त राष्ट्र के मानकों को पूरा करे और अपनी आर्थिक नीति एवं मुद्रा स्फीति को वैश्विक स्तर पर लाकर विश्व के देशों के समक्ष कोई ऐसा मौका न दे कि कोई हमारी अर्थव्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगा सके। तीसरी तरह की परेशानी संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत को हिन्दी भाषा के लिये अधिकारिक रूप में रखने के लिये अनुवाद की समस्या आ सकती है क्योंकि अन्य अधिकारिक भाषाओं और हिन्दी के बीच समानान्तर अनुवाद कराने का खर्च बहुत अधिक होगा। यही नहीं यांत्रिक दृष्टि से हमारी अभी अनुवाद की यांत्रिक प्रक्रिया बहुत सशक्त नहीं है कि हम दावे के साथ इस कह सकें । हमारा आशु अनुवाद यंत्रानुवाद के साथ अनुवाद प्रौद्योगिकी अभी बहुत विकसित नहीं हो पायी है। इसके लिये भारत की यंत्रानुवाद एवं सी-डेक तथा अनुवाद प्रौद्योगिकी की दिशा में महत्वपूर्ण अनुसंधान की जरूरत है। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र में प्रचलित सभी भाषाओं के साथ हिन्दी में यंत्रानुवाद के कार्यक्रमों को भारत में उत्तरोत्तर विकास की आवश्यकता है। इन सबके अलावा भारतीय सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति एवं भारतवासियों और अप्रवासी भारतीयों आदि का मानसिक/भाषिक/भावनात्मक सहयोग की दरकार भी चाहिये तभी हम हिन्दी की पताका संयुक्त राष्ट्र संघ में फहरा सकते है।

हिंदी भाषा, शिक्षा और अनुशासन[सम्पादन]

(आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी)   (द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन की अन्तिम गोष्ठी में प्रातः स्मरणीय द्विवेदी जी का भाषण)

मेरे प्यारे भाई-बहनों, साहित्य रसिको, भाषा प्रेमियो, मैं आपका हार्दिक अभिनदंन करता हूँ। अभी मैं सोच रहा था कि आप इतनी देर से इस धैर्य के साथ यह सब सुन रहे हैं । मुझे आश्चर्य हो रहा था और साथ-ही-साथ ईमानदारी की बात तो यह है कि मुझे आप पर दया भी आ रही थी । मैं समझता हूँ कि आपको मेरे ऊपर दया थोड़ी-थोड़ी आती होगी । काफी देर से हम लोग बैठे सुन रहे हैं, बड़े गंभीर विचार हमने सुने हैं। हमारा तो यह सौभाग्य था कि बगल में दयानन्द लेटे हैं। इसलिए मेरा जी तो बहुत हल्का हुआ लेकिन मैं जानता हूँ कि आप काफी थक चुके हैं। इस समय भाषा के सूक्ष्म विचार और साहित्य की गंभीर समस्याएं आपके सामने मैं नहीं रखना चाहता । पहली बात तो यह है कि प्रायः ऐसा कुछ छूटा नहीं है जो विद्वानों ने आपको बताया न हो । मुझे तो बड़ा आनंद मिला है । पठन-पाठन वस्तुतः अध्ययन-अध्यापन की जो समस्याएं हैं उनके अनेक पहलू हैं और हमारे विद्वानों ने उन पर प्रकाश डाला है। कोई पहलू कदाचित ही छूटा हो, हालांकि समय बहुत कम था, लोगों ने छू-छू कर छोड़ दिया है - सब विषयों को। लेकिन हर विषय उठाए गए हैं, हर समस्याओं पर बातें की गई हैं।

मेरी हालत रामायण के लक्ष्मण की तरह है। आप जानते हैं तुलसीदास जी ने रामायण यह लिखा है कि जब राम, सीता और लक्ष्मण वन जा रहे थे, तो रामचन्द्र जी जिस रास्ते से जाते थे उनके चरण जहाँ-जहाँ पड़े उस पर सीता जी कैसे चरण रख सकती थीं। तो उन्होंने भरसक कोशिश की कि बीच-बीच में जहाँ उनके चरण का चिन्ह नहीं था वहाँ पर पैर रखकर चलें - नहीं तो उनके चरण चिन्हों पर अपना चरण रख देने से तो बहुत अच्छा नहीं होता, मर्यादा की हानि होती, सो सीता जी बचा-बचा के चलती रहीं। अब रास्ता तो भर गया एक रामजी चले, पीछे सीताजी बीच-बीच में जो जगह बची उस पर चलीं। बेचारे लक्ष्मण की आफ़त कि अब कहाँ चलें, वे एक बार दाहिना पैर रखते और एक बार बाएं पैर रखते - शायद कूद-कूद कर चलते थे। उससे भी कठिन अवस्था हमारी हैं । इतने श्रद्धेय, पूज्य विद्वानों ने ऐसी-ऐसी सब बातें कहीं हैं उन सबको छोड़कर और उनसे अछूती कौन-सी बात कहूँ, मुझे समझ में नहीं आ रहा है। मेरी समस्या लक्ष्मण से भी कठिन है।

अभी कमला बहन ने बड़ी अच्छी एक बात कही - सूर्योदय हो रहा है। उन्होंने बड़ी आशा का संदेश दिया। मुझे दुगुना सूर्योदय दिखाई दे रहा है। यह जो विश्व हिन्दी सम्मेलन है, इसका अभी दूसरा ही वर्ष है । बहुत बालक भी नहीं, शिशु है। अभी तो यह पैदा ही हुआ है, एक-दो साल का बच्चा है। लेकिन इसको देखकर लगता है कि एक महान भविष्य का द्वार उन्मुक्त हो रहा है। ऐसा लग रहा है कि वे देश जो अब तक सताए हुए हैं,  दबाए गए हैं, उनकी अंतरात्मा का विकास हुआ है और हमारे ऊपर उन संस्कृतियों का प्रभाव इतना नहीं रहेगा जो इस बात में विश्वास करते हैं कि लोगों को दबाकर, लोगों का शोषण करके उससे अपना फायदा उठाया जाए, बल्कि उनका होगा जिन्होंने यह देखा है कि संसार में जो कुछ दिखाई दे रहा है। भगवान का रूप है। इससे भी बड़ी चीज है छोटी-छोटी सम्पत्तियों से बड़ी चीज महान् भावना, बड़े मनुष्यत्व की कल्पना से मनुष्य बड़ा होता है। जब अदिति के दो बच्चे हुए थे, एक तो अरुण हुए उनको जल्दी में उन्होंने छोड़ दिया था, लेकिन वरुण बहुत देर बाद पैदा हुए और काफी मजबूत पैदा हुए । पैदा होते ही उन्होंने कहा कि माँ बहुत भूख लगी है। तो माता ने जाकर पिता कश्यप से कहा कि लगता है कि बड़ा कुलच्छनी बेटा पैदा हो गया। पैदा होते ही कहता है बड़ी भूख लगी है। महाभारत में ऐसा प्रसंग आया है, कश्यप ने कहा कि अदिति चिंता न करो, बड़ा बेटा पैदा हुआ है। क्योंकि इसकी भूख बड़ी है। जिसकी भूख बड़ी होती है वह बेटा बड़ा होता है। हमारा यह जो विश्व हिन्दी साहित्य सम्मेलन विराट भूख लेकर निकला है सारे संसार के किसी भी साहित्य से इसका विरोध नहीं है, सबको ग्रहण करना चाहता है और सबको ग्रहण करने के बाद एक ज्योति से संसार को आलोकित करना चाहता है। विश्व हिन्दी सम्मेलन अभी छोटा दिखाई दे रहा है लेकिन बहुत बड़े भविष्य की कल्पना हमारे सामने रखता है।

दूसरा, यह जो मारीशस देश है उसे क्या सुन्दर देश विधाता ने बनाया है। विधाता ने तो शायद ऊबड़-खाबड़ ही बनाया होगा, लेकिन आपने अपने-अपने पसीने से, अपने खून से, अपने परिश्रम से, अपनी तपस्या से, इसको ऐसा सुंदर एक उद्यान बना दिया है कि जी नहीं करता कि यहाँ से जाया जाए। क्या करें कामकाज के बंधन में हूँ। बहुत ही सुन्दर देश। कई दिनों बाद जाता । रामचरित मानस आपका प्रिय ग्रंथ है इसलिए में उसी में से एकाध और बात कहना चाहता हूँ - जब रामचन्द्र जी धनुष तोड़ने के लिए आगे बढ़ने लगे तो सीता जी की माता बहुत व्याकुल हुईं कि अरे कोई आदमी ऐसा नहीं कि- “काउ न बुझाई कहइ गुर पाहीं, ए बालक असि हठ भव नाहीं।” ये छोटा सा बच्चा इसको कह रहे हैं कि धनुष तोड़े, शिव का धनुष, जिसको बड़े-बड़े लोग आकर उठा न सके, हजार-हजार लोगों ने कोशिश की, “भूप सहस दस एक हि बारा” हजार राजाओं ने मिलकर उठाने की कोशिश की, नहीं उठा और इस बालक को कह रहे हैं कि धनुष उठाएगा, तो कोई राजा से समझा कर कहो बाबा यह हठ ठीक नहीं है। तो उनकी साथी ने कहा कि नहीं बहन ऐसा मत कहो, “ तेजवंत लघु गनि अनृप रानी” जो तेजवंत होता है उसको छोटा न समझना और उसी प्रसंग में उन्होंने कहा कि “रवि मंडल देखत लघु लागा, उदय तासु त्रिभुवन तम भागा”। सूर्य का मंडल कितना छोटा सा, एक थाली जैसा उगता है लेकिन जिस दिन सूर्य का मंडल उदय हो जाता है, उसी क्षण संसार का अंधकार दूर हो जाता है। तो ये दो सूर्य उदय हो रहे हैं, हमारे सामने मारीशस को देखने में छोटा लेकिन अपार तेजस्वी रूप है। यह देखें हमारे सामने है जो संसार को निश्चित रूप से नया संदेश दे रहा है। और यही नया संदेश आगे चलकर कदाचित विश्व संस्कृति का एक आदर्श रूप बनेगा।

यह हिन्दी सम्मेलन जो देखने में छोटा लग रहा है अपार भविष्य का संदेश लेकर आया है । कोई नहीं जानता कि कितनी दूर तक यह बढ़ेगा । सारे संसार के मनीषी यहाँ एकत्र हुए हैं और हिन्दी के प्रति अपने प्रेम की चर्चा कर रहे हैं। आपने तो सिर्फ एक सूर्य देखा था, मुझे दो सूर्य दिखाई दे रहे हैं। मारीशस देश का सूर्य और विश्व हिन्दी सम्मेलन का सूर्य - दोनों की छोटे दिखाई दे रहे हैं। मारीशस भी बहुत कम दिनों में स्वाधीन हुआ है, लेकिन दोनों की अपार संभावनाएं हैं। मनुष्य अपार संभावनाओं से बढ़ता है। आप जानते हैं। हमारे देश में आत्मा की बड़ी महिमा है। कई बार सुनते-सुनते समझ में नहीं आता है कि आखिर यह आत्मा है क्या ? बहुत बार तो ये भी बताते हैं कि “अंगुष्ठ मात्रः मुरुष” । यह तो कहने का ढंग है। असल में मनुष्य के भीतर जो अपार सम्भावनाएं छिपी पड़ी हैं, उनका द्वार है आत्मा। मनुष्य देखने में इतना छोटा लग रहा है, लेकिन इसके भीतर कितनी अपार शक्ति है वह हम आत्मा शब्द से प्रकट करना चाहते है। शब्द से, कहने से ही चीज़ ज़रा छोटी जो जाती है, सीमाओं में बंध जाती है क्योंकि उसका एक अर्थ होता है। तो यह जो एक आत्म-तत्व है, उसके भीतर का जो तत्व देखा जाता है कि वह कितना प्रभावशाली है, वह क्या दूसरों को दबाने के लिए है, क्या दूसरों के ऊपर आधिपत्य जमाने की लालसा से निकला है या शांति का संदेश देने के लिए निकला है। इस समय सारे संसार की यह आशा है कि हमारा देश और आपका देश इस क्षेत्र में नेतृत्व करे क्योंकि यहाँ से आत्मज्योति का संदेश उठा है। यह संसार के छोटे-छोटे पदार्थों पर जो आसक्ति है उसके विपरीत मनुष्य की जो गहन और छिपी हुई अनंत संभावनाएं हैं, उसके ऊपर बल देता है और आज का विश्व हिन्दी साहित्य सम्मेलन उसी बल का साधन बनने वाली भाषा को आगे बढ़ाना चाहता है। इसलिए मैं, बहुत ज्यादा आपको नहीं कहूँगा, ऐसी बातें नहीं बताऊँगा जिससे कि आपको, आपके दिमाग को और अधिक परिश्रम करना पड़े लेकिन दो-तीन छोटी-मोटी बातें मैं अवश्य कहना चाहता हूँ।

एक तो यह कि अध्यापन, इसकी समस्या पर हमें विचार करना था। तो यह अध्ययन और अध्यापन साहित्य का भी का होगा, और-और विषयों की भी चर्चा हुई। हर विषय की अलग-अलग समस्याएं हैं। देश-विदेश के सामने भिन्न-भिन्न भाषाओं के बोलने वालों के सामने भाषा के सिखाने की भी अनेक समस्याएँ है। व्यावहारिक क्षेत्र में आकर ही उसको समझा जा सकता है।

साहित्य के बिना भाषा भी नहीं चल सकती है। लेकिन बहुत अधिक इधर-उधर न जाकर मैं भाषा के संबंध में थोड़ा सा आपको बताऊँगा और उसी की उंगली पकड़ कर एकाध बात अगर साहित्य के बारे में भी आ गई तो उसे भी आपके सामने रखूँगा । बहुत ज्यादा समय नहीं लूँगा । पहली बात यह है कि मनुष्य जाति मात्र की भाषा कई प्रकार के अनुशासनों ने बंधी दिखाई देती है। ऐसा साधारणतः समझा जाता है कि भाषा के दो प्रकार के अनुशासन, मर्यादा या डिसिप्लिन हैं - एक तो शब्द और अर्थ का जो व्याकरणसम्मत प्रयोग है, व्याकरण है उसकी, वाक्य-विन्यास की पद्धति है। उसके मुहावरे हैं, कहने का ढंग है इन सब  बातों में मुख्य रूप से आप कहें कि व्याकरण और वाक्य-विन्यास का अनुशासन । उसके बिना भाषा नहीं चलती। दूसरा एक अनुशासन उसको और लेना पड़ता है। व्याकरण से शुद्ध होने पर भी भाषा गलत हो सकती है। वह ऐसा है कि जैसे आज अगर आप कहें कि वह “आदमी आग से खेत सींच रहा है” तो व्याकरण की दृष्टि से कोई गलती इसमें ही है। वाक्य-विन्यास की दृष्टि से भी कोई गलती नहीं है। कर्ता अपनी जगह पर ठीक है, क्रिया अपनी जगह पर ठीक है, कर्म, करण सब ठीक है आदमी आग से खेत सींच रहा है। लेकिन एक और दूसरा अनुशासन भाषा का होता है। वह अनुशासन तर्क- सम्मत व्यवस्था है, बाह्य-जगत को उसके अनुकूल होना चाहिए। नहीं तो व्याकरण सम्मत भाषा तो पागल लोग भी बोलते हैं। लेकिन उनकी भाषा बाह्य-जगत की तर्क-सम्मत व्यवस्था के अनुकूल नहीं होती। ये दो तो ऊपरी अनुशासन भाषा के लिए है। जो कुछ भी आप कहेंगे, भाषा के संबंध में आप सिखेंगे, या दूसरे देश के लोगों को सिखाएं, यह दूसरी बोली बोलने वालो को सिखाएं, आपको इन दो अनुशासनों को तो अवश्य मानना पड़ेगा। तीसरा अनुशासन भी है। और वह अनुशासन भी बहुत मह्त्वपूर्ण है लेकिन हमने भाषा को पाकर बहुत कुछ खो भी दिया है। वस्तुतः भाषा हमारे पास पड़ा कमजोर साधन है इस बात को न भूलें । बहुत-सी  बात कहने में, भाषा के कहने में हम लोग हाथ, मुँह, नाक, कान के द्वारा अभिनय करके, तरह-तरह का स्वर बदल कर नाना प्रकार की भाव-भंगिमा के माध्यम से हम अपने भाव को आपके हृदय में प्रवेश करा पाते हैं। अगर इन चीज़ों को हटा दिया जाए तो भाषा थोड़ी और कठिन हो जाएगी। तो एक तीसरा अनुशासन भी होता है जो कि इस व्याकरण के नियम, अनुशासन और तर्क सम्मतता के अनुशासन - इन दोनों से थोड़ा ऊपर जाता है।

तीसरा अनुशासन वस्तुतः अध्यापकों के लिए विशेष रूप से माननीय है। पहले तो व्याकरण सम्मत दो अनुशासन, जिनके बिना तो भाषा चल ही नहीं सकती और विशेष करके परिनिष्ठत भाषा, जिसका आप सबके लिए सर्वसामान्य भाषा बनाना चाहते हैं उसके लिए व्याकरण और वाक्य-विन्यास का अनुशासन होना ही चाहिए । तर्कसम्मत जगत की व्यवस्था भी होनी चाहिए। लेकिन एक तीसरा और अनुशासन है जो दिखाई नहीं देता । साहित्य में तो उसके बिना कोई कारोबार चल ही नहीं सकता । यह तीसरा अनुशासन तर्कम्मत व्यवस्था के प्रतिकूल जाता है, लगता है कि प्रतिकूल जा रहा है। अभी जब मैंने आपसे कहा कि आग से खेत सींचना यह बाह्य जगत की तर्कसम्मत व्यवस्था के अनुकूल नहीं पड़ती। लेकिन कवि को कैसे रोकेंगे आप । कवि कह सकता है कि वह आग से खेत सींच रहा है और आपको उसका अर्थ निकालना पड़ा क्योंकि अगर साधारण आदमी ऐसा कहता तो हम कहते कि पागल है।  “हमही बोरी बिरह बस, कै बौरो सब गाँव, कहा जानिए कहत है शशी शीत कर नाम।” क्या मैं ही पागल हो गई हूँ या सारा गाँव पागल हो गया है, क्या जान कर यह लोग कहते हैं कि चंद्रमा ठंड़ा होता है। वस्तुतः चंद्रमा ठंडा होता है ही है। यह कोई पागल नहीं कह रहा है। लेकिन उसको क्या कहेंगे, क्या उसको पागल कहेंगे ! जो व्याकुलता उसके अन्दर में ही, भीतर की जो वेदना उसके मन में आ रही है इसी से वह कह रही है कि लोग क्या समझकर चंद्रमा को शीतल कहते हैं क्योंकि यह तो जला रहा है। तो वहाँ सोचना पड़ता है कि एक तीसरा अनुशासन भी है। वस्तुतः हमारे देश के सबसे बड़े महान कवि इस देश में तो यह कहना मुश्किल है कि सबसे बड़ा कौन था - व्यास थे कि वाल्मीकि थे, कौन थे ? लेकिन बहुत बड़े महान कवि कालिदास थे। जिनकी चर्चा आप लोग सुन चुके होंगे, पढ़ चुके होंगे, बहुतों ने उनका ग्रंथ पढ़ा होगा और जिन लोगों न न पढ़ा हो उनसे मेरा अनुरोध है कि अवश्य पढ़ें । कालिदास जैसा महान नाटकककार, महान कवि ऐसी बात कह जाता है, जो बाह्य जगत् की तर्कसम्मत व्यवस्था के प्रतिकूल है।

जब दुष्यंत राजा शकुंतला को देखता है। कि बहुत सुन्दर, कोमल, कमनीय मूर्ति शकुंतला पेड़ों को पानी से सींच रही है। राजा का मन छटपटा उठता है, व्याकुल हो उठता है कि कौन ऐसा पागल ऋषि है जिसने इस लड़की को, इतनी सुकुमार लड़की को इस काम में लगा दिया है।

“इंद लिव्याजमनोहरं वपुस्तपःक्षमं साधयितुं य इच्छति।

धुवं सेनीलेत्पलपत्रधाराया शमीलता छेत्रुमृर्ष्व्यिवस्पति।”

इस कमनीय कांति, अव्याजमनोहर वपु, अव्याज मनोहर यानी उसके सौंदर्य को कहने के लिए कोई बहाना, कोई उपमा, अलंकार बगैरह की जरूरत नहीं, अव्याजमनोहर वपु, स्वयं स्वाभाविक, ये जो सौदंर्य है, इस सुकुमार बालिका को जो तपस्या कराने के योग्य बनाना चाहता है। वह ऋषि निश्चय ही कमल की पंखुड़ियों से शमी के पेड़ को काटना चाहता है। आप समझिए बबूल के पेड़ को काटें । यह वैसा ही प्रयोग है जैसे आग से खेत सींचना। लेकिन आपको एक तीसरे अनुशासन की बात सोचनी होती है, वह है जो कि भाषा के इन सब बंधनों से परे है जब कि कवि के शब्दों में जब छंद की भाषा आती है उसके पास तो सप्तस्वर के सप्त पंख लग जाते हैं और उसमें विशाल विपुल व्योम में उड़ने की शक्ति आ जाती है। वह नई ताकत है जो कि पद्य की भाषा में नहीं आती, वह छंद की भाषा में, राग की भाषा में आती है वह कवि का कार्य है, वहाँ  पर उसको समझना पड़ता है, वहाँ प्रसंग समझना पड़ता है कि आखिर क्या बात है। दुष्यंत कोई ऐसा नासमझ आदमी तो था नहीं, ऐसी बात क्यों कहता है ? तब वहाँ समझ में आता है कि एक और भी व्यवस्था है जो कि साहित्य जगत की व्यवस्था है और उसकी हम उपेक्षा नहीं करते हैं।

सर्वप्रथम शिक्षण के लिए सबसे बड़ी बात यह है कि अध्यापक अच्छा हो । शिक्षक के हृदय में प्रेम हो इस देश में आपने बहुत परिश्रम किया। अधिकांश ऐसे लोग नहीं थे जो किसी प्रकार से प्रशिक्षित शिक्षक कहे जा सकते हों, ट्रेंड टीचर नहीं था लेकिन अपार प्रेम और उत्साह था उनके भीतर। जिसके भीतर अपार प्रेम और अपार उत्साह न हो, बच्चों के साथ जिसका हृदय बच्चा न बन जाए, वह अध्यापक क्या सिखाएगा। अध्ययन-अध्यापन की सबसे पहली शर्त है कि हृदय में अपार प्रेम हो तुलसीदासजी ने इस प्रसंग में बड़ी मजोदार बात कही है। तुलसीदासजी बालक थे और सौभाग्य से नरहरिदास उनके गुरु थे। ऐसा लोग कहते हैं कि नरहरि उनके गुरु का नाम था क्योंकि उन्होंने साफ तो नहीं कहा लेकिन इतना कहा है कि ‘कंज, कृपासिंधु पर रूपहरि’ नर रूप में हरि उनको कहा इससे अनुमान किया जाता है कि नरहरिदास उनका नाम रहा होगा।

बड़े महान अध्यापक रहे होंगे, तुलसीदास को आप जानते हैं। जिस तुलसीदास को लेकर हम इतना कहते हैं वे बड़े ही गरीब, बड़े ही दीनहीन थे, “बारे ले ललातविललातद्वार-द्वार फिरौ” बचपन से ही ललात विललात द्वार-द्वार चक्कर लगाते थे और यदि कोई उठाके हाथ में चार चने के दाना रख देता था तो समझते थे कि चारों फल मिल गए, चारों पदार्थ मिल गए । ऐसा कि, कूकर टूकर लागि, कुत्ते के लिए जो टुकड़ा फेंका जाता है उसके लिए भी ललक, इतनी भूख ओर दरिद्रता से मारा हुआ वह बालक, भगवान की कृपा थी अच्छे गुरु का उसको स्पर्श मिल गया। उन्होंने इन बात को स्वतः स्वीकार किया है कि बालकपन में समझ में नहीं आया, गुरु ने बहुत समझाने की कोशिश की, समझाया लेकिन लड़कपन था, बुद्धि इतनी नहीं थी, ‘समझी नहीं तस बालपन तब अति रहों अचेत’ उस समय बड़ा ही अचेत था। लेकिन गुरु ने हार नहीं मानी। ‘तदपि कही गुरु बारही बारा’ बारंबार उसको कहते रहे ‘समझु परि कछु मति अनुहारा’।

आजकल हम देखते हैं कि विद्यार्थियों पर दया करने की एक पद्धति चली हुई है, कि इसको समझ में नहीं आएगा इसलिए इसको कम दो। कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपने जीवन पर अपने बाल्यकाल की एक कहानी लिखी है कि उनके पिता ने कोई नौकर उनके लिए रखा था उनकी देखरेख के लिए तो वह आधा गिलास दूध ले आता था और उसको फेटता रहता था फेटते-फेटते फेन से जब पूरा गिलास भर जाता था तो उनके सामने रख देता था। आजकल शिक्षा में कुछ यही विधि अपनायी जा रही है। स्वयं गुरुदेव ने कहा है कि आजकल ये लोग फेट-फेटकर फेन से भर देना चाहते हैं गिलास को और बच्चे को कहते हैं –लो, पियो। क्योंकि तुम ज्यादा नहीं पी सकते। ज्यादा पीने से तुम को अपच हो जाएगा। ऐसी बात नहीं है। धैर्य होना चाहिए उसके भीतर “तदपि कही गुरु बारहिंबारा, समझि कछु मति अनुहारा” तो पहली शर्त तो यह है कि जो आध्यापक है उसके बीतर अगाध प्रेम होना चाहिए, स्नेह होना चाहिए । नहीं तो गुरुदेव की एक कविता है,

“तोरा फरबिनागो, पारबिना फोटा ते,

जतोई करिश जतोई मरिश, आघात

करिश, फोटा ते, तोरा पारबिनागो”

अरे तू फूल नहीं खिला सकेगा। बड़ी कोशिश करेगा, बहुत वैज्ञानिक विश्लेषण करने के बाद तुमको पता लगेगा कि इतना आक्सीजन चाहिए, इतना हीट होना चाहिए, इतना हाइड्रोजन होना चाहिए । और एक पात्र लगातार उसके नीचे, एक लैंप जलाकर और अनेक प्रकार के यंत्रों का प्रयोग कर नीचे आक्सीजन दोगे लेकिन कली फूल नहीं बनेगी। कली को फूल बनाने वाला कोई और होता है। “जे पारेशे अपनी पारे शे फूल फोटाते।” जो खिला सकता है वो खिला सकता है।

हम कोशिश में रहतो हैं कि हथौड़ा लेकर कली को चीर-चीर करके उसको विकसित पुष्प बना दें, लेकिन नहीं होगा। फूल बन भी जाएगा किसी प्रकार आपके हाथों के अत्याचार को सहकर कली के फूल के रूप में अपने को छितरा भी दे, रंग नहीं आएगा, गंध नहीं आएगी। मेरे मित्रो, बड़े धैर्य की आवश्यकता है। अध्ययन और अध्यापन का प्रथम मूल मंत्र है अगाध प्रेम और बच्चे पर अगाध निष्ठा।

इसके बाद देश-विदेश में हमने देखा है अपने देश में और बाहर भी। बाहर देखा है थोड़ा ही देखने का मौका किला है, कुछ जगह तो है, कुछ स्थानों पर तो है, लेकिन अधिकांश स्थानों पर जो चीज़ नहीं है वह है शिक्षण के लिए, अध्ययन-अध्यापन के लिए उपयुक्त वातारवरण। अपने देश में विश्वविद्यालयों में और विद्यालयों में हम बड़ा परिश्रम करते है। यहाँ आप भी ऐसा ही करते होंगे। पाठ्यक्रम बनाने में कोई गलती नहीं करते भरसक बाहर के विद्वानों को बुलाकर सलाह लेकर हम पाठ्यग्रंथ बनाते हैं। कोई त्रुटि भरसक नहीं होने देते । पढ़ाने वालों की नियुक्ति देकर दुनिया भर के अध्यापकों को बुलाते हैं, कैंडिडेट्स आते हैं। उनमें से हम अच्छा पढ़ाने वाला चुनते हैं। हम पढ़ने वालों के चुनने में भी गलती नहीं करते । भरसक हम फर्स्ट क्लास वालों को लेते हैं, उसके बाद फिर द्वितीय श्रेणी या अधम श्रेणी के लोगों को भी लेने की कोशिश करते हैं। लेकिन भरसक हम अच्छे-से-अच्छे विद्यार्थियों को लेते हैं। तो गलती कहाँ हो रही है। न हम अध्यापक चुनने में गलती करते हैं, बड़ी सावधानी बरतते हैं, न हम अध्यापक यानी विद्यार्थी चुनने में गलती करते हैं. बड़ी मेहनत करते हैं। फिर भी शिक्षा का स्तर बढ़ नहीं रहा है।

हमारे देश में विश्वविद्यालयों में प्रथा है कि कोई बड़ा आदमी आता है, कनवोकेशन ऐड्रेस देता है। उपाधि वितरण के समय बड़े-से-बड़े विचारक देश के आते हैं, महान् विद्वान् और ज्ञाता एक भाषण देते हैं। मैंने देखा है कि सन् 1899 से लेकर 1914 तक के दीक्षांत समारोहों के भाषणों में हर साल एक बात जरूर कही जाती है कि शिक्षा का स्तर गिर रहा है। गिर रहा है। गिर रहा है, गिरते-गिरते न जाने किस पाताल में पहुँचा है और कोशिश हम कम नहीं कर रहे हैं, हर जगह गलती, किस प्रकार हो रही है। पाठ्यक्रम चुनने में सावधानी बरतते हैं और ऐसे बड़े-बड़े सम्मेलनों में हम चर्चा करते हैं कि अगर कोई त्रुटि रह गई हो तो उसका परिमार्जन किया जाए। सब कहते हैं लेकिन कहीं कुछ गड़बड़ हो जाती है। ऐसी ही घटना एक बार और घटी थी।

मैं फिर आपका ध्यान कालिदास के शकुंतला नाटक की ओर ले जाना चाहता हूँ। दुष्यंत अच्छा प्रेमी था यह तो आप जानते ही हैं, गलती हो गई थी, उससे अंगूठी खो गई और उसने गलती कर दी, शकुंतला का त्याग कर दिया। लेकिन वह कम्बख्त अंगूठी फिर मिल गई, और ऐसे अवसरों पर जैसा होता है प्रेमी का हृदय व्याकुल हो उठा और अंगूठी को लेकर विलाप करने लगा। पुराने ज़माने में भले आदमियों का एक अच्छा काम था, एक तो वे राजकाज सब छोड़ देते थे। प्रेम का ज्वर चढ़ा नहीं कि राजकाज छुटा । दुष्यंत ने भी ऐसा ही किया होगा लेकिन एक काम उनका अच्छा होता था कि ऐसे अवसरों पर वे चित्रकर्म द्वारा मनोविनोद किया करते थे। सब भले आदमियों के घर में चित्रकर्म की सामग्री रहती थी। अच्छी-अच्छी तुलिका, बछड़े के काम के रोएं से बनी हुई तुलिकाएं, और बढ़िया रंगदानी, अनेक रंगों का बना हुआ और बढ़िया कागज वगैरह होता होगा। कागज न भी हो तो कोई ओर वस्तु तो होती ही होगी जिस पर वे चित्रकर्म करते थे। तो दुष्यंत ने भी सोचा कि अब इस समय तो एक मात्र साधन यह है कि शकुंतला का चित्र बनाया जाए और बनाया। अच्छा चित्रकार था, बढ़िया चित्र उसने बनाया शकुंतला की सखियां अप्सराएं थीं। वे छिप कर देख रही थीं। उनको दुष्यंत नहीं  देख रहे थे लेकिन वे देख रही थीं। वे आपस में बातें करके कहती हैं कि वह क्या सूंदर चित्र बनाया है जैसे लगता है कि सखी मेरे आगे ही बोल रही है। उनका एक साथी था विदूषक-वही एकांत का साथी था उनका विदूषक ने कहा मित्र इसे देखकर तो ऐसा लगता है कि अब बोली, अब बोली इस तरह का चित्र बना दिया तुमने, बहुत सुन्दर चित्र बनाया। लेकिन दुष्यंत परेशान था कि तस्वीर, बनी नहीं ठीक। कुछ गड़बड़ लग रहा है, कहीं जैसे हमारी शिक्षा व्यवस्था में हम लोग कहते हैं वैसे ही कहीं कुछ गड़बड़ है। कुछ ठीक नहीं हो रहा है उन्होंने कहा कि बहुत बढ़िया चित्र बनाहै, इससे बढ़िया क्या हो सकता है। कहने लगे - नहीं कुछ गड़बड़ है। फिर थोड़ी देर में उसको याद आया और बोले - नहीं मित्र, ये तो शुकंतला बहुत ही अधूरी रह गई।

कृतं नं कर्मार्पितबन्धन सखे शिरीषमागण्डविलमिबिकेसरम्।

न वा शरच्चन्द्रमरीचिकोमलं मृणालसूत्र रचितं स्तनान्तरे।।

वो झूमका तो बनाया ही नहीं, शिरीष के फूल का झुमका जो वह पहने हुए थी जो गंडस्थल तक लटक रहे थे। कपोलप्रांत तक लटके हुए झुमके तो बनाना ही भूल गया। फिर “न वा शरच्चंद्रमरीचिकोमलं” शरद काल के चंद्रमा की किरणों के समान कोमल अब आप लोग सोच लीजिए कैसा कोमल होता होगा। लेकिन सुनने में अच्छा लगता है। “शरच्चंद्रमरीचि” इस कविता का अर्थ समझने में चाहे छोड़ा-बहुत भटकें आज, लेकिन सौंदर्य शब्द ही बता देगा आपको।  शरच्चंद्रमरीचिकोमलं, मृणालसूत्र, जो मृणाल की माला को उसने धारण किया था वह तो बना ही नहीं। नहीं-नहीं मित्र इसमें शकुंतला ठीक नहीं बनी और उसने तूलिका ली, अच्छी तूलिका थी, उसने बढ़िया से शिरीष पुष्पों का झुमका भी बना दिया और मृणालसूत्रों की माला भी बना दी। कहने लगा अब ठीक हुआ। विदूषक ने कहा दोस्त अब मत छूना । अब बिलकुल ठीक हो गया, अब इससे बढ़कर कुछ नहीं होगा। लेकिन राजा कहता है नहीं दोस्त फिर कुछ गड़बड़ हो गया है तो बहुत सिर-विर खुजलाके उसने कहा - मित्र ये तो आधी शकुंतला भी नहीं बन पाई है। जो शकुंतला अपने वातावरण से विच्छिन्न है वह शकुंतला पूरी शकुंतला कैसे होगी।

‘कार्य सैकतलीनहंसमिथुना स्त्रोतावहा मालिनी’

‘पादास्तामभितो निषण्णहरिणा गौरीगुरोः पावना’

वह हिमालय की जो भूमि है, नीचे वाली तलहटी की भूमि जिसमें विश्रव्ध भाव से हरिण बिना डर बैठे-बैठे जुगाली किया करते थे, उन हरिणों का चित्र तो बना ही नहीं, और वे जो बड़े-बड़े पेड़ थे वहाँ  पर:-

‘शाखालम्बितवल्कंलस्य च तरोर्निर्मातुमिच्छाम्यधः’

उसके नीचे बड़े पेड़ के नीचे, मैं उस हरिण को बनाना चाहता हूं। आप देखिए अभी तक वह विद्ध चित्र था, जिसको पोरट्रेट पेंटिग कहते हैं, जिसका आजकल दुनिया में बड़ा मान है। हमारे देश में उसको मह्त्व नहीं देते, विद्वचित्र या पोरट्रेट पेंट को, यथावत् चित्रण को महत्व नहीं देते । उसमें रस होना चाहिए। तो अभी तक शकुंतला का चित्र तो विद्ध चित्र था। ज्यों-का-त्यों था आर्टिस्ट उसमें नहीं आता है। उसने अपना हृदय गार के उसमें नहीं डाल दिया था। तो कहता है मित्र, मैं पेड़ भी बनाना चाहता हूँ। आपने देखा होगा, हरिण को और मारीशस के भाइयों से सुना है कि हरिण नहीं होता यहाँ, हमारे देश में यानी आपके देश में भी बहुत बड़ा सींगों की एक जहाज, जहाज ही समझिए इत्ता बड़ा-बड़ा वह नुकीली निकली हुए बड़ी सींग, बड़ी-बड़ी होती है, तो वैसा ही मैं हरिण बनाना चाहता हूँ और उसकी सींग, पर अपनी बाई आंख खुजलाती हुई मृगी को बनाना चहाता हूँ । आप सोचें कि बारहसिंगा महाराज जरा सा ऐसे झटक दें तो वो आँख फूट जाए उस मृगी की । मृगी की आँख संसार में दुर्लभ है। संसार में अगर सबसे सुन्दर वस्तु है तो मृगी की आँख है और मृगी अब इतने विश्वास के सभी उसके सींग के कोने पर अपने आँख का कोना खुजला रही है कितना विश्वास है और वे अपने समाधिस्थ अवस्था में जरूर बैठे होंगे और उसके प्रेमी  उसका आस्वादन कर रहे होंगे। राजा के मन में यही तो डर है, यही तो वेदना है, यही व्याकुलता है कि उस मृगी की तरह शकुंतला भी तो मेरे पास विश्वास के साथ आई थी। ये मृग जितना उस आश्रय का समझते हैं उतना भी तो मैं नहीं समझ सकता। ‘तो मित्र मैं श्रंगे कृष्णामृगस्य वामनयन कण्डुयमानं मृगीम्’ बनाना चाहता हूँ वातारण जब नहीं होगा जिस हद तक तब तक तो शकुंतला आधी है उसमें शकुंतला फूल की तरह खिलेगी, जो विशिष्ट वातावरण उसके भीतर है वह खिलेगा।

मित्रो, मैं और ज्यादा कुछ भी नहीं कहना चाहता । शिक्षारूपी शकुंतला अभी अधूरी पड़ी हुई है, उसे भी वातावरण चाहिए। उसे पढ़ाई-लिखाई का वातावरण चाहिए जो पुस्तकालयों से बनता है, जो प्रयोगशलाओं से बनता है, लेकिन जो सबसे अधिक आदमियों से बनता है, सच्चे गुरुओं से बनता है, महान विद्वानों से बनता - जिन्होंने समर्पित जीवन जिया है। वे जब आते हैं तो वातावरण बनता है और उसके भीतर शिक्षा फूल की तरह खिलती है। तो मित्रो, ये मूल बातें है। और तो व्यावहारिक बातें है। सूरीनाम में आप कैसे हिन्दी सिखलाएंगे, यह आप यहाँ मंच पर व्याख्यान देकर नहीं सूरीनाम के लोगों की भाषा जानकर, उनकी प्रकृति जानकर, उनकी अवस्थाएं जानकर, आप उस विषय को तय कर सकते हैं व्याकरण की हमें बहुत ही जरूरत है। अभी तो मैंने कहा न कि हमारी भूख बहुत है। हमने तो अभी प्रारम्भिक काम भी नहीं किया। हम लोग तो इतना भी नहीं जानते बड़े-बड़े लोग अभी यह अंतर नहीं समझते कि स्नेह किसको कहते है ? बहुत से छोटे-छोटे लड़के भी सस्नेह लिख देते हैं। स्नेह में और प्रेम में अंतर है। बहुत छोटी-छोटी बालों का भी विभेद करने वाले जो समानार्थक शब्द है श्वारस है मैं उनकी सार को कहता हूँ श्वारस, जो शब्द की बहनें हैं इसको थेसारस अँगरेज़ी में कहते हैं लेकिन मैं समझता हूँ सूंदर शब्द है श्वसारः। तो ऐसी चीजें हमने अभी बनाई कहाँ ? अच्छा व्याकरण हमने नहीं बनाया। हमारे व्याकरण में अनेक प्रकार की त्रुटियाँ रह गई। किन कारणों से कौन-सा प्रयोग होता है जो कि हमें अच्छा लगता है। व्याकरण को शुद्ध होना चाहिए और तर्कसम्मत भी होना चाहिए ।

मेरी एक छात्रा थी। वह मुझसे मिलने आई एम.ए. की परीक्षा देने के बाद । संयोग से मैं नहीं था। तो मेरी पत्नी से मिल-मला कर वह चली गई। लौटकर उसने बहुत बढ़िया पत्र लिखा। उसमें उसने एक वाक्य लिखा था कि आपसे तो मुलाकात नहीं हो सकी लेकिन आपकी सुपुत्र कहते हैं, अब सुपत्नी नहीं कहते। कुपुत्र ओर सुपुत्र तो कहते हैं लेकिन कुपति या सुपति नहीं बोलते। ये शब्द भाषा में है ही नहीं ।पति, पति है। कुपति का क्या अर्थ है। लेकिन नालायक पति। पत्नी है उसमें कुपत्नी या सुपत्नी होने का सवाल ही  कहा उठता है।लेकिन अगर तर्कसम्मत दृष्टि से देखें तो बिलकुल ठीक था। अगर सुपुत्र और सुपुत्री कहा जा सकता है तो सुपत्नी कहने में या सुपति कहने में क्या नुकसान है ? लेकिन देख रहे हैं सब लोग हंस रहे हें । हंसने की क्या बात है भाई। भाषा तर्कसम्मत केवल नहीं होती व्यवहार की अपेक्षा रखती है। लोग कहाँ, क्यों बोलते हैं, विशेष प्रकार की भाषा बोलने वालों का विशेष प्रकार का संस्कार होता है। वह उस भाषा पर चढ़ा रहता है। बहुत-सी बातें हैं, जो वैसे तो तर्कसम्मत नहीं हैं लेकिन हमारे प्रयोग में चली आ रही है। उनको हम पढ़ते है, पढ़ाते हैं और भाषा में वे आ ही जाती हैं तो हमें एक परिनिष्ठित नई भाषा सीखनी ही होगी । इसमें कोई संदेह नहीं कि भिन्न-भिन्न प्रदेशों में, भिन्न-भिन्न देशों में वहाँ की परिस्थिति के अनुसार भाषा में भिन्न-भिन्न रूप होंगे। सब जगह का स्तर भी एक नहीं होगा।

एक परिनिष्ठित भाषा हमारे सामने अवश्य होनी चाहिए, जिसको किंग्ज इंन्लिश या क्वींस इंग्लिश कहते हैं। एक शुद्ध, परिनिष्ठित भाषा का एक आदर्श हमारे सामने रहना चाहिए। प्रयत्न करना अपना काम है हर प्रदेश के लोगों को, हर देश के लोगों को उस शुद्ध भाषा को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। बाकी जो थोड़ी-बहुत कमियाँ रहेंगी, हिन्दी भाषा बहुत उदार है, बहुत कमियाँ, बहुत गलतियाँ बर्दाश्त करने की शक्ति उसमें है हम उसकी परवाह नहीं करते । गलतियाँ भी होगी। लिंग की गलतियाँ होती है। विभक्तियों की गड़बड़ियां होंगी, हो सकती हैं। उसकी हम परवाह नहीं करते । लेकिन हर विद्यार्थी का प्रयत्न यह अवश्य होना चाहिए कि एक परिनिष्ठित शुद्ध भाषा है, जो हमारा ध्रुव-तारा है उसके निकट हमें जाना चाहिए। भिन्न-भिन्न देशों, भिन्न-भिन्न प्रांतों, भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वाले को हिन्दी सिखाते समय शिक्षक इनका ध्यान रखें और तदनुसार व्यावहारिक निर्णय करें।  भाषा-ज्ञान के लिए द्विभाषी कोश बहुत आवश्यक है। शब्द-भंडार बहुत आवश्यक है। इसी तरह से भाषा संबंधी मुहावरों का कोश बहुत आवश्यक है। इन सब चीजों की रचना होती रहनी चाहिए। अच्छी-से-अच्छी रचना होनी चाहिए। भिन्न-भिन्न प्रदेशों में उनकी जो व्यावहारिक कठिनाइयाँ है उनको समझकर उन देशों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के कोशों का हमें निर्माण करना पड़ेगा। मुझे कोई संदेह नहीं है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन आगे चलकर इन महान कार्यों को भी अपने हाथ में लेगा और हिन्दी निरंतर शुद्धरूप में परिष्कृत रूप ओर परिनिष्ठित रूप में सारे संसार में प्रतिष्ठित होगी।    

विश्व भाषा बनेगी हिंदी[सम्पादन]

राष्ट्रभाषा के रूप में खुद को साबित करने के लिए आज वस्तुतः हिन्दी को किसी सरकारी मुहर की जरूरत नहीं है। उसके सहज और स्वाभाविक प्रसार ने उसे देश की राष्ट्रभाषा बना दिया है। वह अब सिर्फ संपर्क भाषा नहीं है, इन सबसे बढ़कर वह आज बाजार की भाषा है, लेकिन हर 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के अवसर पर होने वाले आयोजनों की भाषा पर गौर करें तो यूँ लगेगा जैसे हिन्दी रसातल को जा रही है। यह शोक और विलाप का वातावरण दरअसल उन लोगों ने पैदा किया है, जो हिन्दी की खाते तो हैं, पर उसकी शक्ति को नहीं पहचानते। इसीलिए राष्ट्रभाषा के उत्थान और विकास के लिए संकल्प लेने का दिन ‘सामूहिक विलाप’ का पर्व बन गया है। कर्म और जीवन में मीलों की दूरी रखने वाला यह विलापवादी वर्ग हिन्दी की दयनीयता के ढोल तो खूब पीटता है, लेकिन अल्प समय में हुई हिन्दी की प्रगति के शिखर उसे नहीं दिखते।

अंग्रेजी के वर्चस्ववाद को लेकर हिन्दी भक्तों की चिंताएं कभी-कभी अतिरंजित रूप लेती दिखती हैं। वे एक ऐसी भाषा से हिन्दी की तुलना कर अपना दुख बढ़ा लेते हैं, जो वस्तुतः विश्व की संपर्क भाषा बन चुकी है और ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों पर उसमें लंबा और गंभीर कार्य हो चुका है। अँगरेज़ी दरअसल एक प्रौढ़ हो चुकी भाषा है, जिसके पास आरंभ से ही राजसत्ताओं का संरक्षण ही नहीं रहा वरन ज्ञान-चिंतन, आविष्कारों तथा नई खोजों का मूल काम भी उसी भाषा में होता रहा। हिन्दी एक किशोर भाषा है, जिसके पास उसका कोई ऐसा अतीत नहीं है, जो सत्ताओं के संरक्षण में फला-फूला हो । आज भी ज्ञान-अनुसंधान के काम प्रायः हिन्दी में नहीं हो रहे हैं।  उच्च शिक्षा का लगभग अध्ययन और अध्यापन अँगरेज़ी में हो रहा है। दरअसल हिन्दी की शक्ति यहाँ नहीं है, अँगरेज़ी से उसकी तुलना इसलिए भी नहीं की जानी चाहिए क्योकि हिन्दी एक ऐसे क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा है, जो विश्व मानचित्र पर अपने विस्तारवादी, उपनिवेशवादी चरित्र के लिए नहीं बल्कि सहिष्णुता के लिए जाना जाने वाला क्षेत्र है। फिर भी आज हिन्दी, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आवादी द्वारा बोली जाने वाली भाषा है, क्या आप इस तथ्य पर गर्व नहीं कर सकते ? दरअसल अँगरेज़ी के खिलाफ वातावरण बनाकर हमने अपने बहुत बड़े हिन्दी क्षेत्र को ‘अज्ञानी’ बना दिया तो दक्षिण के कुछ क्षेत्र में हिन्दी विरोधी रूझानों को भी बल दिया । सच कहें तो नकारात्मक अभियान या भाषा को शक्ति नहीं दे सकते । एक भाषा के रूप में अँगरेज़ी को सीखने तथा राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को समादर देने, मातृभाषा के नाते मराठी, बंगला या पंजाबी का इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं है। किंतु किसी भाषा को समाज में यदि प्रतिष्ठा प्राप्त करनी है तो वह नकारात्मक प्रयासों से नहीं पाई जा सकती ।

अँगरेज़ी के विस्तारवाद को हमने साम्राज्यवादी ताकतों का षडयंत्र माना और प्रचारित किया। फलतः भावनात्मक रूप से सोचने-समझने वाला वर्ग अँगरेज़ी से कटा और आज यह बात समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए गलत प्रमाण बन गई। यद्यपि अँगरेज़ी मुठ्ठीभर सत्ताधीशों, नौकरशाहों और प्रभुवर्ग की भाषा है। वह उनकी शक्ति बन गई है। तो शक्ति को छीनने का एकमेव हथियार है उस भाषा पर अधिकार । यदि देश के तमाम गांवों, कस्बों, शहरों के लोग निज भाषा के आग्रहों आज मुठ्ठी भर लोगों के ‘अकड़ और शासन’ की भाषा न होती। इस सिलसिले में भावनात्मक नारेबाजियों से परे हटकर ‘विश्व परिदृश्य’ में हो रही घटनाओं-बदलावों का संदर्भ देखकर ही कार्यक्रम बनाने चाहिए । यह बुनियादी बात हिन्दी क्षेत्र के लोग नहीं समझ सके। आज यह सवाल महत्वपूर्ण है कि अँगरेज़ी सीखकर हम साम्राज्यवादी, उपनिवेशवादी कुछ कोणों से जुझ सकेंगे या उससे अनभिज्ञ रहकर। अपनी भाषा का अभिमान इसमें कहीं आड़े नहीं आता। भारतेंदु की यह बात- ‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल’ आज के संदर्भ में भी अपनी प्रासंगिकता रखती है। आप इसी भाषा प्रेम के रुझानों को समझने के लिए दक्षिण भारत के राज्यों पर नजर डालें तो चित्र ज्यादा समझ में आएगा । मैं नहीं समझता कि किसी मलयाली भाषी, तमिल भाषी का अपनी मातृभाषा के प्रति प्रेम किसी बिहार, उ. प्र.  या म. प्र.  के हिन्दी भाषी से कम है लेकिन दक्षिण के राज्यों ने अपनी भाषा के प्रति अनुराग को बनाए रखते हुए अँगरेज़ी का भा ज्ञानार्जन किया, हिन्दी भी सीखी। यदि वे निज भाषाका आग्रह लेकर बैठ जाते तो शायद वे आज सफलताओं के शिखर न छू रहे होते। आग्रहों से परे स्वस्थ चिंतन ही किसी समाज और उसकी भाषा को दुनिया में प्रतिष्ठा दिला सकता है। भाषा को अपनी शक्ति बनाने के बजाए उसे हमने अपनी कमजोरी बना डाला। बदलती दुनिया के मद्देनजर ‘विश्व ग्राम’ की परिकल्पना अब साकार हो उठी है। सो अँगरेज़ी विश्व की संपर्क भाषा के रूप में और हिन्दी भारत में संपर्क भाषा के स्थान पर प्रतिष्ठित हो चुकी है, यह चित्र बदला नहीं जा सकता ।

हिन्दी की ताकत दरअसल किसी भाषा से प्रतिद्वंद्विता से नहीं वरन उसकी उपयोगिता से ही तय होगी। आज हिन्दी सिर्फ ‘वोट माँगने की भाषा’ है, फिल्मों की भाषा है। बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ में अभी आधारभूत कार्य होना शेष है। उसने खुद को एक लोकभाषा और जनभाषा के रूप में सिद्ध कर दिया है। किंतु ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों पर उसमें काम होना बाकी है, इसके बावजूद हिन्दी का अतीत खासा चमकदार रहा है।

नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन में स्वामी दयानंद से लेकर विवेकानंद तक लोगों को जगाने के अभियान की भाषा हिन्दी ही बनी।  गांधी ने भाषा की इस शक्ति को पहचाना और करोड़ों लोगों में राष्ट्रभक्ति का ज्वार पैदा किया तो उसका माध्यम हिन्दी ही बनी थी। दयानंद ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ जैसा क्रांतिकारी ग्रंथ हिन्दी में रचकर हिन्दी को एक प्रतिष्ठा दी।  जानकारी के लिए ये दोनों महानायक हिन्दी भाषा नहीं थे । तिलक, गोखले, पटेल सबके मुख से निकलने वाली हिन्दी ही देश में उठे जन-ज्वार का कारण बनी । यह वही दौर है जब आजादी की अलख जगाने के लिए ढेरों अखबार निकले। उनमें ज्यादातर की भाषा हिन्दी थी। यह हिन्दी के खड़े होने और संभलने का दौर था । यह वही दौर जब भारतेन्दु हरिचन्द्र ने ‘भारत दुर्दशा’ लिखकर हिन्दी मानस को झकझोरा था।

उधर पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘आज’ के संपादक बाबूराव विष्णुराव पराड़कर, माधवराव सप्रे, मदनमोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी एक इतिहास रच रहे थे। मिशनरी पत्रकारिता का यह समय ही हमारी हिन्दी पत्रकारिता की प्रेरणा और प्रस्थान बिंदु है।

आजादी के बाद भी वह परंपरा रुकी या ठहरी नहीं है। हिन्दी को विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, कार्यालयों, संसद तथा अकादमियों में प्रतिष्ठा मिली है। तमाम पुरस्कार योजनाएं, संवर्धन के, प्रेरणा के सरकारी प्रयास शुरू हुए हैं। लेकिन इन सबके चलते हिन्दी को बहुत लाभ हुआ है, सोचना बेमानी है। हिन्दी की प्रगति के कुछ वाहक और मानक तलाशे जाएं तो इसे सबसे बड़ा विस्तार जहाँ आजादी के आंदोलन ने, साहित्य ने, पत्रकारिता ने दिलाया, वहीं हिन्दी सिनेमा ने इसकी पहुँच बहुत बढ़ा दी। सिनेमा के चलते यह दूर-दराज तक जा पहुंची। दिलीप कुमार, राजकुमार, राजकपूर, देवानंद के ‘स्टारडम’ के बाद अभिताभ की दीवनगी इसका कारण बनी। हिन्दी न जानने वाले लोग हिन्दी सिनेमा के पर्दे से हिन्दी के अभ्यासी बने। यह एक अलग प्रकार की हिन्दी थी। फिर ट्रेनें, उन पर जाने वाली सवारियां, नौकरी की तलाश में हिन्दी प्रदेशों क्षेत्रों में जाते लोग, गए तो अपनी भाषा, संस्कृति, परिवेश सब ले गए । तो कलकत्ता में ‘कलकतिया हिंदी’ विकसित हुई, मुंबई में ‘बम्बईया हिंदी’ विकसित हुई। हिन्दी ने अन्य क्षेत्रीय भाषाओं से तादात्म्य बैठाया, क्योंकि हिन्दी के वाहक प्रायः वे लोग थे जो गरीब थे, वे अँगरेज़ी बोल नहीं सकते थे। मालिक दूसरी भाषा का था, उन्हें इनसे काम लेना था। इसमें हिन्दी के नए-नए रूप बने। हिन्दी के लोकव्यापीकरण की यह यात्रा वैश्विक परिप्रक्ष्य में भी घट रही थी। पूर्वीं उ. प्र. के आजमगढ़, गोरखपुर से लेकर वाराणसी आदि तमाम जिलों से ‘गिरमिटिया मजदूरों’ के रूप में विदेश के मारीशस, त्रिनिदाद, वियतनाम, गुयाना, फिजी आदि द्वीपों में गई आबादी आज भी अपनी जडो़ से जुड़ी है और हिन्दी बोलती है। सर शिवसागर रामगुलाम से लेकर नवीन रामगुलाम, वासुदेव पांडेय आदि तमाम लोग अपने देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी बने। बाद में शिवसागर रामगुलाम गोरखपुर भी आए। यह हिन्दी यानी भाषा की ही ताकत थी जो एक देश में हिन्दी बोलने वाले हमारे भारतीय बंधु हैं। इन अर्थों में हिन्दी आज तक ‘विश्वभाषा’ बन चुकी है। दुनिया के तमाम देशों में हिन्दी के अध्ययन-आध्यापन का काम हो रहा है।

देश में साहित्य-सृजन की दृष्टि से, प्रकाश-उद्योग की दृष्टि से हिन्दी एक समर्थ भाषा बनी है । भाषा और ज्ञान के तमाम अनुशासनों पर हिन्दी में काम शुरु हुआ है । रक्षा, अनुवांशिकी,  चिकित्सा, जीवविज्ञान, भौतिकी क्षेत्रों पर हिन्दी में भारी संख्या में किताबें आ रही हैं । उनकी  गुणवक्ता पर विचार हो सकता है किंतु हर प्रकार के ज्ञान और सूचना को अभिव्यक्ति देने में अपनी सामर्थ्य का अहसास हिन्दी करा चुकी है । इलेक्ट्रानिक मीडिया के बड़े-बड़े ‘अँगरेज़ी दां चैनल’ भी हिन्दी में कार्यक्रम बनाने पर मजबूर हैं । ताजा उपभोक्तावाद की हवा के बावजूद हिन्दी की ताकत ज्यादा बढ़ी है । हिन्दी में विज्ञापन, विपणन उपभोक्ता वर्ग से हिन्दी की यह स्थिति ‘विलाप’ की नहीं  ‘तैयारी’ की प्रेरणा बननी चाहिए । हिन्दी को 21वीं सदी की भाषा बनना है । आने वाले समय की चुनौतियों के मद्देनजर उसे ज्ञान, सूचनाओं और अनुसंधान की भाषा के रुप में स्वयं को साबित करना है ।

हिन्दी सत्ता-प्रतिष्ठानों के सहारे कभी नहीं फैली, उसकी विस्तार शक्ति स्वयं इस भाषा में ही निहित  है । अँगरेज़ी से उसकी तुलना करके कुढ़ना और दुखी होना बेमानी है । अँगरेज़ी सालों से शासकवर्गों तथा  ‘प्रभुवर्गों’ की भाषा रही है । उसे एक दिन में उसके सिंहासन से नहीं हटाया जा सकता । हिन्दी का इस क्षेत्र में हस्तक्षेप सर्वथा नया है, इसलिए उसे एक लंबी और सुदीर्घ तैयारी के साथ विश्वभाषा के सिंहासन पर प्रतिष्ठित होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए,  यही संकल्प सही अर्थों में हिन्दी को उसकी जगह दिलाएगा ।

विश्व हिन्दी सम्मेलन-ट्रिनिडाड को याद करते हुए[सम्पादन]

दुनिया के कोने-कोने में आज लगभग पौने दो करोड़ अनिवासी भारतीय और भारतवंशी विराजमान हैं और इनमें से बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की है जो 100-150 साल पहले मॉरिशस, फिजी, सुरीनाम, ट्रिनिडाड, गुयाना, बारबाडोस, जमैका, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में जाकर बस गये और इन सबके साथ भारतीय मिट्टी की सुगन्ध वहाँ पहुँची । इनके साथ हमारा दर्शन, हमारी जीवन शैली, गीता, रामायण आदि सब ग्रन्थ वहाँ पहुँचे और इस प्रकार उन दूर-दूर के देशों में आज भी हमारी संस्कृति, हमारी भाषा की गूंज-अनुगूंज निरन्तर सुनाई पड़ती है और जो लोग भी इन देशों की यात्रा कर चुके हैं वे सब इस बात से प्रभावित हुए हैं कि समय के लम्बे अन्तराल के बाद भी किसी प्रकार उन्होंने उन तमाम मूल्यों को जीवित रखा है । वे भारतीय सभ्यता और संस्कृति की विरासत के सच्चे हकदार माने जा सकते हैं ।

भारत के बाहर भारतवंशी तो हैं ही, इनके अतिरिक्त जो लोग भारत को भली प्रकार जानता चाहते हैं वे भी हिन्दी और भारतीय भाषाओं का पूरी रुचि के साथ अध्ययन-अध्यापन और शोध वर्षों से करते आ रहे हैं और इन क्षेत्रों में उनकी उपलब्धि सर्वथा सराहनीय रही है । यूरोप के देश या अफ्रीका के, आस्ट्रेलिया या अमरीका के और फिर एशिया के अनेकानेक देशों में हिन्दी और भारतीय भाषाओं के पठन-पाठन की व्यवस्था वर्षों से चली आ रही है और इन सभी लोगों की एक आकांक्षा रहती है कि वे भारत की भूमि के साथ भारतीय आत्मा के साथ जुड़ सकें, उनका एक सम्पर्क इस देश के साथ कायम हो जिससे कि वे अपने-अपने विषय को भली प्रकार समझ सकें, विचारों का आदान-प्रदान कर सकें और अपने कार्यों में निरन्तर प्रगति करते जाएं । जिन देशों में भारतवंशी बड़ी संख्या में निवास करते हैं वहाँ तो हिन्दी का होना स्वाभाविक है किन्तु उनके अतिरिक्त रुस, अमरीका, जर्मनी, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिकया, फ्रांस, ब्रिटेन (यू.के) के विभिन्न हिस्सों में लगभग डेढ़ सौ ऐसे विश्वविद्यालय हैं जिनमें हिन्दी के पठन-पाठन की व्यवस्था है और इन सबके साथ हमारे देश के विद्वान भी जुड़े हुए हैं और एक ऐसा तारत्मय पिछले दो दशकों से बन गया है कि निरन्तर सम्मेलन, सभा और संगोष्ठी के माध्यम से इन विद्वानों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होता रहता है । यह एक शुभ संकेत है क्योंकि हिन्दी सभी को जोड़ने वाली भाषा है, प्रेम की भाषा है ।   इन्हीं विदेशस्थ हिन्दी प्रेमियों की आशा के अनुरुप सबसे पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 1975 में नागपुर में हुआ । इस सम्मेलन का उद्घाटन हमारी प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने किया और इसकी अध्यक्षता मॉरीशस के प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम ने की । उसके कुछ ही दिन बाद अगस्त, 1976 में दूसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन मॉरीशस में आयोजित हुआ जिसको याद कर लोग कहा करते हैं, “न भूतो न भविष्यति” । इस सम्मेलन में भारत से लगभग 250 विद्वानों राजनेताओं ने भाग लिया और सभी इस बात से अत्यंत प्रफुल्लित थे कि मॉरीशस की सुन्दर भूमि पर हिन्दी का बिरवा किस प्रकार फलता-फूलता और पुष्ट होता जा रहा है । इसके बाद 1983 में तीसरा विश्व हिन्दी सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित हुआ जिसका उद्धाटन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने किया और अध्यक्षता कैम्ब्रिज के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मैग्रेगर ने की । फिर एक लम्बा अन्तराल आया और चौथा विश्व हिन्दी सम्मेलन उसी मॉरीशस की भूमि पर सम्पन्न हुआ जिसका उद्घाटन मॉरीशस के प्रधानमंत्री श्री अनिरुद्ध जगन्नाथ ने किया और इस सम्मेलन में अनेकानेक देशों के विद्वान पधारे और आपस में विचार-विनिमय करके कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये और इन सबकी यह माँग रही कि अब तक के चार विश्व हिन्दी सम्मेलनों में जो भी प्रस्ताव पारित किए गए है उनके क्रियान्वयन के लिए तत्काल कार्रवाई की जाए । भारत और मॉरीशस की सरकार को यह जिम्मेदारी दी गयी कि इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए आवश्यक कदम शीघ्रातिशीघ्र उठाए जाएँ । इसी सम्मेलन में ट्रिनिडाड के प्रतिनिधि ने यह प्रस्ताव रखा कि पाँच वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन ट्रिनिडाड में 1996 में आयोजित किया जाए क्योंकि इसी वर्ष भारतीयों के उस देश में पहुँचने के डेढ़ सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं । इस कार्यक्रम का शुभारम्भ हो  चुका है और हमारे देश के राष्ट्रपति महामहिम डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने इस वर्ष के प्रारम्भ में ही ट्रिनिडाड जाकर भारतीयों के ट्रिनिडाड में आँगन की 150 वीं जयन्ती का शुभारम्भ कर दिया है और उस देश ने यह निश्चय किया है कि 1996 के मार्च मास में विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन कर इस जयन्ती का समापन किया जाए। सभी विश्व हिन्दी सम्मेलनों में भारत सरकार, स्वैच्छिक हिन्दी संस्थाओं, हिन्दी सेवी विद्वानों, पत्रकारों, लेखकों और विचारकों, कवियों और कलाकारों ने सभी प्रकार से योगदान किया है और आशा है कि ट्रिनिडाड में अगले वर्ष आयोजित होने वाला पाँच वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन भी इस श्रृंखला की प्रमुख कडी के रूप में उभरकर सामने आयेगा।

ट्रिनिडाड में पाँचवाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है, यह सभी हिन्दी प्रेमियों के लिए स्वागत योग्य बात है और इस सन्दर्भ में यह विशेष उल्लेखनीय है कि सूरीनाम ओर ट्रिनिडाड में कई वार अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन का आयोजन इससे पहले भी हो चुका है। अंन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में स्वाभाविक है कि बाहर के विद्वान कम और स्थानीय लोगों की भागीदारी अधिक रहती है। सूरीनाम में अब तक तीन अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन सम्पन्न हो चुके हैं और अभी-अभी लगभग 2 साल पहले यानी 1993 में ट्रिनिडाड में एक अंन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें भारत सहित अनेक देशों के लोगों ने हिस्सा लिया। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत के बाहर जो लोग भी हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, जो लोग भी इस तरह का कार्यक्रम आयोजित करते हैं हम उनको समुचित प्रश्रय, प्रोत्साहन दें ताकि भारत के साथ दुनिया के तमाम देशों के साथ हमारी सांस्कृतिक भाषायी सम्पर्क सूत्र अधिकाधिक सुदृढ़ बनें और भारतीय जीवन-मूल्यों को यानी विश्व-शांति, सहिष्णुता, मैत्री और सद्भाव इन सबको बल मिले। हिन्दी की इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका रही है और हमारी भारतीय भाषाएँ एक हैं, उनकी आत्मा एक है और हिन्दी के माध्यम से हम भारत में और भारत के बाहर उसी को प्रतिबिंबित करते है।

ट्रिनिडाड विश्व हिन्दी सम्मेलन निकट भविष्य में आयोजित होने जा रहा है इसलिए इस देश में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन की विशेष चर्चा करना अप्रासंगिक नहीं होगा।

इस देश की यात्रा पहले भी मैं कई बार कर चुका हूँ और 1975 में पहली बार वहाँ पहुँचा था। हवाई अड्डे से शहर की ओर जाते हुए खुले मैदान में रामलीला का आयोजन देख चमत्कृत हुआ किन्तु अचरज हुआ यह देखकर कि मानस के दोहा चौपाई का धारा प्रवाह अंग्रेज़ी में रुपान्तर कर दर्शकों को सुनाया जा रहा था और जनसमूह इसका पूरा रसास्वादन भी कर रहा था । मूल चौपाई का हिन्दी में सस्वर पाठ और फिर अंग्रेज़ी रुपान्तर के साथ खुले मंच पर पात्रों का अभिनय देखकर मुझे यह लगा कि नई पीढ़ी से हिन्दी की डोर शायद टूट गई है और उसे फिर जोड़ना कठिन होगा । इसी यात्रा के दौरान नगर से दूर गाँधी आश्रम में आयोजित एक सभा में अपने विचार मैं हिन्दी में व्यक्त कर रहा था कि कुछ नौजवानों ने उठकर नम्र भाव से कहा कि वे मेरी बात समझ नहीं पा रहे हैं और उन्होंने रोष भरे शब्दों में कहा कि हमारी पीढ़ी की इस असमर्थता के दोषी हैं वे बुजुर्ग जो आपके साथ मंच पर विराजमान हैं । वे स्वयं तो हिन्दी  भोजपुरी बोलते हैं किन्तु इन्होंने हमें इसे सीखने का अवसर ही नहीं दिया बल्कि स्वयं हम लोगों के साथ अंग्रेज़ी में बात कर हमें साहब बनाने की चेष्टा करते रहे और परिणाम अब यह हुआ कि हम साहब तो बन नहीं पाये पूरे हिन्दुस्तानी भी नहीं रहे । सभा के बाद मैंने तमाम लोगों से इस पर चर्चा की और नई पीढ़ी के दर्द को पहचानने के प्रयास किए मुझे लगा कि उपनिवेशवाद के अनेक अवसादपूर्ण अवशेषों में यह सबसे दुखद है एक व्यक्ति ही नहीं किसी पूरे समाज को अपनी अस्मिता से दिग्भ्रमित कर एक ऐसे मायाजाल में उलझा देने जहाँ उसकी आत्मा कराहती रहे, अपनत्व के सुखद संस्पर्श के लिए उसे अपनी अंतरात्मा को अभिव्यक्त करने की असमर्थता का बोध हो तथा अपनी बात को पराई भाषा में कहने की बाध्यता का अनचाहा भार ढोना पड़े ।

कुछ परिस्थिति ही ऐसी बनी कि इस देश की नई पीढ़ी को अपने इतिहास की उस त्रासदी को भोगना पड़ रहा है । लगभग दो हजार वर्ग मील के ट्रिनिडाड ट्वैगो में बारह तेरह लाख लोग निवास करते हैं । कुछ इतर जातियाँ भी हैं जैसे यूरोपीय और चीनी आदि किन्तु बाहुल्य तो भारतीय और अफ्रीकी का है और यदि इनमें सद्भाव और समरसता बनी रहे तो देश का कल्याण है अन्यथा पारस्परिक संघर्ष तो विनाश का मार्ग ही प्रशस्त करेगा ।

इस सत्य ही ओर सबसे अधिक ध्यान दिया है भारतीय समाज ने और इनका यह प्रयास लगातार जारी है ताकि इनकी किसी भी गतिविधियों का कोई गलत अर्थ नहीं लगाये । सबसे पहले 1845 में फाटेल रजाक नामक समुद्री जहाज से सवा दो सौ भारतीय ट्रिनिडाड की राजधानी पोर्ट ऑफ स्पेन पहुँचे और 1917 तक ऐसे प्रवासी भारतीयों की संख्या इस देश में लगभग डेढ़ लाख हो गई और पीढ़ी दर पीढ़ी इन भारतीयों ने तमाम कष्ट झेलकर भी इस देश को समृद्ध , सुखद और सुन्दर बनाया है । इनके संघर्ष की कथा भी उतनी ही दर्दनाक है जैसा कि अनेक देशों में इन आप्रवासी भारतीयों पर बीता और उनकी व्यथा का बड़ा ही जीवंत चित्रण इसी देश के बहुचर्चित, सुविख्यात लेखक वी.एस. नेपाल ने अपने उपन्यास (मिमिकमेन) के नायक राल्फ सिंह की मनोभावनाओं के माध्यम से किया है । अपनी धरती से उखड़कर नये देश में बसेरा और नये परिवेश में नई ज़िंदगी की शुरूआत करना कितना दुष्कर है, इसका विवरण सुनकर भी रोमांच हो जाता है किन्तु धन्य हैं हमारे देश भारत के लोग जो घोर विषम परिस्थितियों में भी अपना सही मार्ग चुन लेते हैं और अपनी साधना और प्रतिभा के बल पर शीर्ष पर पहुँच जाते हैं । वे इसका सारा श्रेय भारतीय दर्शन, अध्यात्म, हमारे जीवन मूल्य और तुलसी, सूर, मीरा तथा कबीर जैसे श्रेष्ठ कवि मनीषी को देते हैं जिन्होंने उनकी जीवन नौका को विकट झंझावत से निकालकर सुरक्षित गंतव्य तक पहुँचा दिया ।आज ट्रिनिडाड में सर्वत्र हरियाली, खुशहाली और सम्पन्नता दिखाई देती है । आज अठानवे प्रतिशत लोग शिक्षित हैं इस देश में और लगभग चार अरब डालर का इनका सफल घरेलू उत्पाद है । पेट्रोल, प्राकृतिक गैस और असफाल्ट की बहुतायत के साथ-साथ चीनी, कहवा, काफी, फल और सब्जी की भी इस देश को सुखी बनाने में प्रभावी भूमिका रही है । जीवन स्तर इनका किसी भी विकसित देश के समकक्ष माना जायेगा और आधुनिकता की हवा का पश्चिम में लहराना तो स्वाभाविक है ही फिर भी भारत वंशी अपने मूल्यों की महत्ता को जानते हैं और वे अपने पुरखों की विरासत को भुलाकर एक बहुमूल्य निधि से वंचित होना नहीं चाहते और इसी उद्देश्य को लेकर इस देश की संस्था हिन्दी निधि ने यह अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन आयोजित किया और इसमें भाग लेने भारत से पाँच तथा यूरोप, अमरीका, दक्षिण पूर्व एशिया एवं प्रतिवेशी देशों से अनेक विद्वान आए ।

यह सम्मेलन पूरे पाँच दिनों तक चला और इसकी अनेक विशेषताएं उल्लेख योग्य हैं किन्तु सबसे अच्छी बात थी समय की पाबन्दी और विषयों का निश्चित दायरे में बाँधकर चर्चा को प्रभावी बनाना । शुभारंभ तो सम्मेलन का देश के राष्टपति श्री नूर हसन अली ने रात्रिभोज के साथ किया और विधिवत् उद्घाटन हुआ प्रधानमंत्री पैट्रिक मैनिंग के भाषण से। श्री मैनिंग ने अपने भाषण में यह आश्वासन दिया कि हम अपने दल के घोषणा पत्र के वायदे के अनुसार ट्रिनिडाड में हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की व्वस्था को सुदृढ़ बनाने को कृतसंकल्प हैं। चूकि हिन्दी भोजपुरी तो इस देश की मिट्टी में रची बसी हैं और हम उसे अपनाये बिना महाभारत, भगवद् गीता जैसे महाकाव्य और तुलसीदास की रामायण और कालिदास जैसे महाकवि को कैसे जान पायेंगे। हमारे देश में अनेक जातियाँ हैं और उनकी सांस्कृतिक बारीकियों को अपनाकर हम अपने को, अपने बहुजातीय समाज को अपने राष्ट्र की विरासत को समृद्ध और संपन्न बनायें। हमारा यह सौभाग्य है कि हमारे पास इतनी समृद्ध सांस्कृतिक सम्पदा है और हमें चाहिए कि उन्हें आत्मसात कर अपने देश और समाज को सम्पन्न बनायें । यह सम्मेलन निश्चय ही समाज को एकता के सूत्र में बांधकर मानव के सामने आज जो अनेक चुनौतियाँ हैं उनका सामना करने की शक्ति हमें देगा। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भाषा को सिखाने का काम प्रेम और सद्भाव द्वारा ही संभव है और हिन्दी की तो सांस्कृतिक गरिमा एवं वैज्ञानिक महत्ता सर्वविदित हैं। आज सांस्कृतिक नवजागरण की लहर हमारे देश में परिव्याप्त है और ऐसी स्थिति में हिन्दी निश्चय ही समाज को सभी समुदाय और जातियों को एक दूसरे के समीप लायेगी। आज इस देश में कितने ही अफ्रीका मूल के लोग रामायण और महाभारत का रसास्वादन कर रहे हैं ओर भारतीय मूल के लोग हमारे जातीय और धार्मिक समारोहों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं और यही है हमारे संबंधों का नया आयाम जिसे सम्पुष्ट करना हम सभी का कर्तव्य है। हिन्दी निधि अपने आप में एक ऐसी संस्था है जो जाति और धर्म के संकुचित दायरे से दूर राष्ट्र की प्रतिनिधि संस्था बन गई है और यह सम्मेलन निश्चित ही हमारे देश की जातीय समरसता को सुदृढ़ बनायेगा, चूंकि भाषा सभी को जोड़ने का समर्थ साधन रही है।

इस औपचारिक उद्घाटन के अवसर पर भारत के उप राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा और हमारे प्रधान मंत्री श्री पी.वी. नरसिंह राव का उत्साहवर्द्धक शुभकामना संदेश पढ़कर सुनाया गया और उसके तत्काल बाद सत्र प्रारम्भ हुए जिसमें एक अध्यक्ष और तीन चार विद्वान वक्ता अपना लिखित निबन्ध पढ़कर सुनाते तथा उन पर सक्षिप्त चर्चा सत्र के अंत में होती जिसें श्रोता की जागरूकता और इस तरह हमारी चर्चा जीवंत हो उठती तथा श्रोता की जागरूकता और अभिरुचि का प्रमाण भी हमें मिल जाता। इस सम्मेलन की एक विशेषता यह भी थी कि इसमें सभी वक्ताओं को अपना विचार हिन्दी में नहीं अंग्रेज़ी में ही अभिव्यक्त करना था। इस पर विशद् चर्चा एक दिन पहले हुई थी और कुछ लोगों का अटपटा भी लगा कि अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में माध्यम अंग्रेज़ी हो किन्तु परिस्थिति ऐसी थी कि उसके बिना कोई उपाय नहीं था और आयोजकों ने यह साफ कहा कि ट्रिनिडाड में आज पाँच प्रतिशत से अधिक लोग हिन्दी समझते नहीं अतः अंग्रेज़ी का सहारा लेना अनिवार्य है। यूरोप और अमरीका के लोगों यानी विद्वानों का तो यह रोचमर्रा का काम था और भारत सें गये प्रतिनिधियों ने भी इसे स्वीकार किया चूंकि भाषा कोई भी हो काम तो हिन्दी का ही संपन्न हो रहा था। छह सत्रों में विभाजित इस सम्मेलन में हिन्दी के विभिन्न पक्षों पर विचार-विमर्श हुआ और यूरोप तथा अमरीका से आये विद्वानों ने हिन्ही के विकास, इसकी राष्ट्रीय-अन्तराराष्ट्रीय भूमिका, इसके महान रचनाकारों द्वारा जनचेतना, राष्ट्र में नवोन्मेष तथा संसार में इस भाषा की महत्ता को अपने शोधपूर्ण आलेखों में रेखाकित किया।

भारत के प्रतिनिधि मंडल में पाच व्यक्ति थे जिनमें से सांसद शंकर दयाल सिंह, इन पंक्तियों के लेखक और श्री राजेन्द्र अवस्थी ने पहले दिन ही तीनों सत्रों की अध्यक्षता की तथा श्री यशपाल जैन, प्रो. माजदा असद ने अपने खोजपूर्ण लेख सम्मेलन में प्रस्तुत किये । इस सम्मेलन के विचार विमर्श का दायरा बड़ा ही व्यापक था और हिन्दी के अनेक प्रश्रों पर विद्वतापूर्ण, गवेषणात्मक और समीक्षात्मक भाषण हिन्दी की व्यापक, लालित्य और उपादेयता के प्रबल प्रमाण थे । भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध, खड़ी बोली तथा भारत की क्षेत्रीय भाषाओं की परम्परा और अनेक साहित्यिक महत्व पर प्रकाश डाला । भारत के ही प्रो. हरीश नवल ने अपने लेख में हिन्दी भाषा को एकता का उपादान बताया और प्रो. माजदा असद ने हिन्दी भाषा और साहित्य को हमारी एकता और सामासिक संस्कृति का प्रतीक कहा । कनाडा से आये प्रो. क्रिस्टोफर किंग ने भारतेन्दु हरिशचन्द्र और देवकी नन्दन खत्री का उल्लेख करते हुए दोनों की लेखन शैली का विवेचन प्रस्तुत किया तथा हंगरी की प्राध्यापिका ईवा अरादी ने भारतीय साहित्य में हिन्दी की वर्तमान भूमिका के संदर्भ में प्रेमचन्द का उल्लेख किया और कहा कि प्रेमचन्द जी यह भली प्रकार जानते थे भारत में हिन्दी और उर्दू का कोई विवाद नहीं वरन् सारा मसला अंग्रज़ी और राष्ट्र भाषा को लेकर है । इस बिन्दु की ओर प्रो. किंग ने भी संकेत किया । एक वक्ता ने तो यह भी कहा कि ग्रियर्सन जैसे व्यक्ति ने हिन्द, उर्दू और हिन्दुस्तानी को सामाजिक सांस्कृतिक आधार पर तीन भाषाओं के रुप में प्रस्तुत किया और दरअसल यह भारतीय जन समूह को बाँटने की एक चाल थी । इटली की प्रो. मरियोला अफरीदी ने पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रियता के प्रचार-प्रसार में बाल कृष्ण भट्ट के अद्भुत योगदान की विस्तृत व्याख्या की और यह बताया कि उनकी कलम लगातार महिलाओं के उत्थान, समाज सुधार तथा अंग्रज़ी शासन के भेदभाव पूर्ण उपनिवेशवादी नीति पर कटाक्ष करती रही औ रइस विचार का समर्थन पोलैंड के प्रो. ब्रिस्की ने भी अपने भाषण में किया और कहा कि भाषा को हम अपनी चिंतन प्रक्रिया से अलग नहीं रख सकते किन्तु आजाद़ी के बाद भारत ने ब्रिटिश पद्धति को प्रशासन के क्षेत्र में बनाये रखा ताकि उद्योग के क्षेत्र में उन्नत देशों के समूह में वह शामिल हो सके । यद्यपि गाँधीजी पूरी पद्धति में बदलाव के पक्षधर थे।

जर्मनी के तेजस्वी विद्वान डॉ. लोथार लुत्से ने बड़े प्रभावी ढंग से यह प्रतिपादित किया कि हिन्दी अपने जनजीवन की उनमुक्तता, उदारता, सुन्दरता एवं बौद्धिक सम्पदा के कारण इतनी समृद्ध है कि उसे अपने संसार की महत्वपूर्ण भाषाओं में एक मानते हैं । भाषा एक और राजनीति की ओर देखती है और दूसरी ओर साहित्य की ओर । इसका दूसरा पक्ष निश्चय ही नितांत सत्यनिष्ठ होता है । उन्होंने रघुवीर सहाय की कविता का उद्धरण देकर अपने कथन की पुष्टि की और प्रो. लुत्से के वक्त्व्य ने श्रोताओं को चमत्कृत और आह्लादित किया । बाहर से आये प्रतिनिधियों में प्रो. इकबाल ने कोरिया में हिन्दी की स्थिति पर प्रकाश डाला, सूरीनाम के डॉ. ज्ञान अदीन और महातम सिंह ने अपने विचार  प्रस्तुत करते हुए कहा कि एक से अधिक भाषा का ज्ञान हमारे व्यक्तित्व को नई निखार देता है और हमें अपने भीतर एक पूर्णता का आभास होने लगता है। हालैण्ड के प्रो. मोहन कुमार गौतम ने तो भारत से सूरीनाम तक की हिन्दी की यात्रा का जीवंत वर्णन प्रस्तुत कर यह सिद्ध किया कि हिन्दी का ज्ञान इस देशों ने सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग है। लंदन से आये  प्रो. सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने अपने भाषण में यह बताया कि एशिया के देशों से आये ब्रिटेन निवासी समूहों के बीच भाषा-ज्ञान, उसके पठन-पाठन की व्यवस्था, नई और पुरानी पीढ़ी के अन्तराल, विभिन्न सांस्कृतिक परिवेश और भिन्न जाति समूहों के मध्य पारस्परिक आदान-प्रदान के परिप्रेक्ष्य में वहाँ हिन्दी की स्थिति संसार के अन्य देशों से बिल्कुल भिन्न है और इस कार्य में लगे लोग नित्य नई उलझनों से मनोयोग पूर्वक निबट रहे हैं। फिनलैण्ड से आये प्रो. मोहन लाल सर ने “हिंदी में विनम्र एवं शिष्ट अभिव्यंजना” की चर्चा करते हुए उपनवेशवादी शासकों से अपनी परम्परा के टकराव का इतिहास बताया और इसी बिन्दु पर प्रो. बूदेव शर्मा और मोहन शाम लाल ने भी अपने विचार व्यक्त किये। ट्रिनिडाड में हिन्दी प्रयोग के सूत्रधार कमालुद्दीन मोहम्मद ने अपने जीवन वृत्तान्त के माध्यम से ट्रिनिडाड में हिन्दी के उतार-चढ़ाव की कहानी सुना दी- यानी इस देश का पूरा सामाजिक सांस्कृतिक इतिवृत्त।

सम्मेलन में चर्चा अवधि गति से चलती रही और उनमें कुछ ऐसे उत्साहवर्द्धक आलेख भी आये जो ट्रिनिडाड में हिन्दी की पुनः प्रतिष्ठा के लिए अत्यन्त उपादेय सिद्ध होंगे। अमरीका में हिन्दी के प्राध्यापक प्रो. सुरेन्द्र गम्भीर का आलेख इस दृष्टि से बड़ा ही समीचीन था। उन्होंने कहा कि संस्कृति का एक प्रमुख अंग है भाषा और ट्रिनिडाड में भारतवशियों ने अपनी सामाजिक परम्पराओं और संस्कृति को जीवित रखा है। किन्तु अनेक ऐतिहासिक सामाजिक कारणों के भाषा की रक्षा यहाँ नहीं हो सकी यानी क्रियोल ओर अंग्रेज़ी के निरन्तर प्रयोग ने हिन्दी को यहाँ पीछे छोड़ दिया लेकिन अब यह चेतना लौट आई है कि अपने पुरखों की भाषा हिन्दी भोजपुरी को हम यहाँ पुनर्जीवित करें। उन्होंने अपने खोजपूर्ण आलेख में बताया कि इस देश में अधिकांश लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से आये और इस सदी के तीसरे चौथे दशक तक भोजपुरी हिन्दी का प्रयोग पूरे धड़ल्ले के साथ पूरे समाज में हाता था किन्तु आज स्थिति ऐसी है कि पुरानी पीढ़ी के जो लोग हैं, वे तो हिन्दी का प्रयोग सीमित दायरे में अभी भी करते हैं किन्तु शहरी समाज तो इससे पूर्णतया बंचित है और विशेषकर नई पीढ़ी तो पूरी अनभिज्ञ यानी मध्यम आयु वर्ग के लोग तो इसे समझ लेते हैं किन्तु नौजवान तो सिर्फ क्रियोल और अंग्रेज़ी पर ही निर्भर हैं चूंकि उन्हें तो इसे सुनने, लिखने, पढ़ने और सीखने का कोई अवसर ही नहीं मिला। प्रो. गम्भीर ने कहा फिर भी इसमें कोई निराशा की बात नहीं चूंकि यदि हिबू जैसी भाषा को पुनर्जीवित किया जा सकता है तो हिन्दी का पुनरुत्थान ट्रिनिडाड जैसे देश में सहज ही संभव और सुगम है। उन्होंने अपने अध्यययन, अनुभव और प्रयोग के आधार पर बताया कि ट्रिनिडाड में भोजपुरी-हिन्दी को नवजीवन प्रदान करने के लिए राज्य ओर समाज को मिलकर प्रयास करना होगा तथा किसी भी प्रकार के टकराव से बचते हुए सबसे पहले हिन्दी को अपने दैनिक जीवन में उतारना होगा यानी भाषा जब तक बोली न जाये तो उसके जीवंत होने का और प्रमाण क्या हो सकता है।

इसी संदर्भ में मुझे ट्रिनिडाड के विदेश मंत्री श्री राल्फ महाराज के भाषण का वह अंश याद आ रहा है जब उन्होंने कहा कि मैं अपने बचपन में हिन्दी जानता और बोलता था और मुझमें शायद तब कुछ कवि-प्रतिभा भी थी। एक दिन मैंने अपनी नानी से कहा था- “नानी, तोर बकरी अब हम ना पकड़ी”। इस एक कथन के माध्यम से उन्होंने ट्रिनिडाड में हिन्दी के समाप्त प्राय होने की कहानी भी सुनादी। गाँव से शहर पहुँच कर हिन्दी कैसे पीढ़ी दर पीढ़ी छूटती गई यही उनका आशय था किन्तु उन्होंने कहा कि हिन्दी को हिन्दू के साथ जोड़ना मुनासिब नहीं होगा, दरअसल इस भाषा के माध्यम से प्राप्त ज्ञान हमारे समस्त राष्ट्र का पथ आलोकित करेगा और उन्होंने कहा कि हमारी सरकार ने राजधानी के प्रमुख क्षेत्र में पाँच  एकड़ भूमि आबंटित कर, भारत सरकार के सहयोग से गाँधी सांस्कृतिक संस्थान बनाने का निश्चय किया है और आवश्यकता आज इस बात की है कि हिन्दी के अध्येता और विद्वान इस भाषा के प्रचार-प्रसार में सर्वधर्म समभाव का दृष्टिकोण निरन्तर बनाये रखें और जिस हिन्दी भाषा के बल पर इस देश में कभी हिन्दू धर्म की रक्षा हुई उसके माध्यम से भविष्य में समग्र राष्ट्र का भी कल्याण निश्चय ही होगा। इस सम्मेलन के आयोजन मात्र से पूरे देश में यह आशा जगी है कि अब तक जो कठिनाइयाँ हिन्दी के मार्ग में थीं वे धीरे-धीरे दूर होंगी और हम सभी इस देश में हिन्दी को पुनर्जीवित पायेंगे ।

इन विशिष्ट विद्वानों, शोधकर्ताओं, प्राध्यापकों, राजनेता और पत्रकारों के अतिरिक्त एक ऐसे वक्ता भी इस सम्मेलन में आए, ट्रिनिडाड के सर्वाधिक तेजस्वी व्यक्ति, भारतवंशियों के सबल-सक्षम पक्षधर, संसद में विपक्ष के नेता श्री बासुदेव पाण्डे। उन्होंने उस देश में हिन्दी के विलुप्त होने के अनेक राजनीतिक सामाजिक कारण बताये और उनकी दृष्टि में हिन्दी को मिटा देने का पूरा एक सुनियोजित षड़यंत्र वहाँ  चल रहा है। हिन्दी के विरोधी  इस देश में यह कहते है कि जब भारत में ही हिन्दी की विशेष उपयोगिता सिद्ध नहीं हो पाई फिर इसके सीखने से हमें ट्रिनिडाड में क्या लाभ होगा । उनका दूसरा तर्क है कि हिन्दी की पढ़ाई स्कूलों में प्रारंभ करने पर चीनी और अफ्रीकी मूल के लोग अपनी भाषा की माँग करने लगेंगे और इसके परिणामस्वरूप समाज की एकता भंग होगी। इस प्रकार के तर्क देने वाले लोग हिन्दी के प्रचार प्रसार  को समानता और न्यायसंगत अधिकार के हमारे संघर्ष का हिस्सा मानते हैं ओर उनका हित साधन तो उपनिवेशवादी व्यवस्था के अवशेषों को कायम रखने से ही संभव है । हमारा इतिहास हमें बताता है कि आजादी के पहले इस देश में मुट्ठी भर ऐसे लोग थे जिनका हमारी अर्थवस्था पर पूरा अधिकार था, वे ही समाज के अगुआ भी थे । पहले तो हम उनका वर्ण (गौर) देखकर पहचान लेते थे लेकिन अब उनके पदचिन्हों पर चलने वाले सभी वर्ण के चन्द लोगों में यह भावना काम कर रही है कि हम समाज को “बांटो और राज करो” की नीति का अनुसरण कर अर्थतंत्र पर अपना आधिपत्य बनाए रखें ।

इस वर्ग का यही प्रमुख उद्देश्य है कि अफ्रीका मूल के लोगों के साथ भारतवंशियों का मेल मिलाप होने नहीं दें ताकि वे अलग-अलग रहकर कमजोर बने रहें और हम स्थिति का लाभ यथावत् उठाते रहें । श्री पाण्डे ने कहा कि पैसा ओर प्रचार तंत्र दोनों पर उनका कब्जा है अतः किसी भी कार्य में हमारी कठिनाई बड़ जाती है । यह उसी समुदाय का प्रचार है कि इस देश की सारी भूमि पर भारतीयों का कब्जा है और यदि राजनैतिक सत्ता भी उनके हाथ आ गई तो दूसरी जातियाँ कष्ट में पड़ जायेंगी । उद्घाटन के अवसर पर पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार मैंने भारत के उप राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा का शुभकामना संदेश पढ़कर सुनाया और उसके बाद आये ट्रिनिडाड के लोकप्रिय नौजवान नेता श्री रवि जी( रवीन्द्र नाथ महाराज) इन्हें भारत के प्रथान मंत्री श्री पी.वी. रनसिंह राव का संदेश सुनाना था । दो चार शब्द बोलने के बात रवि जी भाव विह्वल हो गये और आँखों  में अश्रु की धारा लिये बैठ गये, फिर हमारे प्रधान मंत्री जी का संदेश सुनाया अपने राजदूत प्रो. लक्ष्मणा ने और खोजबीन करने पर मुझे हिन्दी निधि के अध्यक्ष श्री सीताराम ने बताया कि रवि जी हमारी निधि के प्राण हैं और पूरी निष्ठा से इस सम्मेलन को सफल बनाने में लगे रहे हैं- आज जब यह असंभव सा दीखता समारोह मूर्तरुप में उनके सामने आया तो उन्हें आश्चर्य हुआ । हर्षातिरेक इसलिए कि कभी हमने यह सोचा भी नहीं था कि भारत जैसे विराट देश की इतनी बड़ी हस्ती यानी प्रधान मंत्री का संदेश कभी हमारे हाथ आयेगा । इसी अपूर्व उपलब्धि  ने रवि जी को चरम आनन्द की स्थिति में पहुँचाया  और वे मंच पर बोल नहीं पाये । इस सम्मेलन के आयोजकों की निष्ठा, तत्परता और आत्मीयता के साथ-साथ कर्तव्य परायणता को देखकर ऐसा लगता था जैसे भारतीय मूल की यह नई पीढ़ी उन सभी अधिकारों को प्राप्र करने में सक्षम है और सफल होगी जिनसे उपनिवेशवादी ताकतों ने इनसे पहले की पीढियों को वंचित रखा। भला ऐसा देश जहाँ हिन्दी का पठन पाठन वर्षों से बाधित रहा हो वहाँ अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन करना क्या साधारण उपलब्धि हो सकती है । सम्मेलन भी ऐसा जहाँ राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री विदेश मंत्री, संसद के अध्यक्ष, विरोधी दल के नेता, संसद सदस्य, पत्रकार, प्राध्यापक, लेखक, विचारक और पन्द्रह देशों के प्रतिनिधि उपस्थित हों और सभी ओर प्रेम तथा भाई-चारे का भाव बराबर बना रहे । आयोजकों ने यह भी व्यवस्था की थी की सभी विदेशी प्रतिनिधि अलग-अलग परिवारों के अतिथि हों ताकि कहीं किसी को कष्ट न रहे ।

मुझे और साहित्यकार सांसद शंकर दयाल सिंह को हिन्दी निधि के अध्यक्ष श्री च. सीताराम ने अपने घर ठरहाया और श्री यशपाल जैन और श्री राजेन्द्र अवस्थी श्री इदु अमीर के घर ठहरे । प्रो. माजदा असद को तो संसद की अध्यक्षा श्रीमती उषा शिवपाल अपने घर ले गईं और इसी प्रकार भाषा के बहाने भाई-चारे की भाव-भूमि भी सुदृढ़ हुई। भारत के मेहमान जैसे अपने ही घर टिक कर एक नई उभरती पीढ़ को दूर देश मे नई चुनौतियों का सामना करते देख पाये और इसने दो देशों कि अपनेपन को भी सुदृढ़ बनाया । मैंने अपने आतिथेय का नाम बराबर सुना “चांका सीताराम”। मुझे अचरज हुआ और उनसे पूछने पर पता चला कि दरअसल उनका नाम चन्द्रिका सीताराम है लेकिन पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव में भ्रान्त धारणा भी खूब प्रचारित होती है कि यदि इस देश में कोई भारतीय कभी प्रधान मंत्री बना तो पुलिस और सेना बगावत कर देगी। विदेशी शासन ने ही अफ्रीकी मूल के लोगों को उनकी अपनी संस्कृति से काटकर अपने धर्म और अपनी पश्चिमी संस्कृति में सराबोर कर दिये किन्तु बचे रह गये- ये हिन्दुस्तानी जो उनके जाल में न तब फंसे और न अब फंसते दिखाई पड़ते। इसी पृष्ठभूमि में हिन्दी को देखना होगा जो राजनीति के अखाड़े में गेंद की तरह उछाली जाती है और बार-बार किये गये वायदों के बावजूद जाति, धर्म, वर्ण और राजनीति के दलदल में फंस-फंस जाती है। लेकिन जब हमारा यह संकल्प है कि हम हिन्दी सीखेंगे, पढ़ेंगे, लिखेंगे तो हमें कोई रोक नहीं सकता। मैंने स्वयं अपने गाँव के एक बुजुर्ग से हिन्दी सीखी, हिन्दी की प्रारम्भिक पुस्तकें मंगाई, फिर पत्राचार पाठ्यक्रम और लिंग्वाफोन का सहारा लिया। आज भी हिन्दू महासभा के अनेक स्कूल हैं उनसे भी अधिक मन्दिर और मस्जिद हैं और अपने को ही हमारे हितों के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। उत्तर स्पष्ट है कि हम हिन्दी के प्रचार प्रसार के अपने प्रयास को समानता और वाजिब हकों के अपने संघर्ष के साथ जोड़कर चलायें आखिर हिन्दी को भी फ्रेंच,स्पैनिश, लैटिन और ग्रीक की तरह पढ़ाये जाने का हक तो हासिल होना ही चाहिए।

श्री वासुदेव पाण्डे के इन विचारों का समर्थन अनेक लोगों ने किया चूंकि वे उस देश कि सर्वश्रेष्ठ जुझारू नेता हैं और उनका मानना है कि उस देश की राजनीतिक शब्दावली में “नमक हराम” शब्द का अवदान नितांत उनका अपना योगदान है। उन्होंने सम्मेलन के आयोजन को एक शुभ संकेत बताया और कहा कि इस प्रकार के विचार विमर्श द्वारा ही हिन्दी के प्रचार प्रसार का मार्ग प्रशस्त करेंगे और हिन्दी निधि के पार्यकर्त्ता निश्चय ही धन्यवाद के पात्र हैं। सम्मेलन में विभिन्न विषयों पर सांगोपांग चर्चा केबाद कई प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुए जिनमें प्रमुख थे-हिन्दी के पठन पाठन की व्यवस्था को ट्रिनिडाड में सुदृढ़ करना, राष्ट्र संघ की मान्यता प्राप्त भाषाओं में हिन्दी को स्थान दिलाना तथा 1994 में जब भारतीयों के ट्रिनिडाड आगमन के डेढ़ सौ साल पूरे हों तब हिन्दी निधि एक अन्तरर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन का आयोजन करे।

इस पूरे सम्मेलन का शुभारंभ और समापन समारोह पूरे स्नेह और सद्भाव के वातावरण में सम्पन्न हुआ । पहलेदिन ही उद्घाटन के अवसर पर इस बात कासंकेत सभीकोमिल गयाथा कि ट्रिनिडाड के लोग भले ही अब हिन्दी बोलने में समर्थ सक्षम नहीं हैं किन्तु उनकाभारत प्रेम किसी इसे “चांका” बनादिया और इसी प्रकार अनेक शब्द अपना मूल रूप छोड़कर कहां पहुँच गये हैं कि उनकी खोज करना भी आसान नहीं रहा फिर भी हमारे सांस्कृतिक नवजागरण और अपनी जड़ों की खोज से एक नई ऊर्जा नई पीढ़ी में उदित हो रही है जो हमें अपनी मंजिल तक पहुंचा देगी। उनके घर में भी जो साज सज्जा थी उसमें अधिकांश भारत का प्रतिनिधित्व था और वैसा ही साज संगीत, भोजन-व्यंजन, वेश भूषा और सबसे ऊपर “अतिथि देवो भव” की भावना । भावना के साथ-साथ अभी भाषा  भी तो कुछ कुछ बची ही है और आज भी उनकी बोलचाल में चूल्हा, तवा, कलछुल,भात, दाल, चटनी, तरकारीसधान,मचान,करिखा,सतुआ, झाखी, झटहा, हंसुली, आजा, झगड़ा, वासी, पूजा, प्रसाद, लकरपेज, गंदा, ज्ञान, पागल और नमकहराम जैसे शब्द तो आमफहम हैं फिर कुछ लोग अभी भी हिन्दी बोल ही लेते हैं। अतः मन्दिर, मस्जिद, ईद, दीवाली, होली, फगवा, शिवरात्रि, जन्माष्टमी, रामनवमी, दुर्गापूजा आदि का सहारा लेकर हि्दी अपनी पुरानी स्थिति को प्राप्त कर लेगी इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं। सम्मेलन के आयोजनक इस बात से बड़े प्रसन्न थे कि भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् ने अपने पाँच  प्रतिनिधि भेजे और उनका मार्ग व्यय भी भारत सरकार ने दिया। यह बात उनको अधिर अच्छी इसलिए बी लगी चूकि विदेशी प्रतिनिधियों में से अधिकांश के मार्ग व्यय का दायित्व हिन्दी निधि को वहन करना पड़ा और वे कृतज्ञ थे कि भारत के उप राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने अनपा संदेश और प्रतिनिधि मंडल भेजकर ट्रिनिडाड का मान बढ़ाया।

इस अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के समाप्त हो जाने के बाद मुझसे ट्रिनिडाड के ऐसे सुपठित और ज्ञानी सज्जन मिलने आये जिन्होंने बताया कि इस देश में हिन्दी सदियों से संघर्ष करती आई है और अब भी हमारा रास्ता निष्कंटक हो, ऐसा नहीं है। उन्होंने बताया कि आज से पचास साल पहले एक मताधिकार आयोग का गठन हुआ था जिसने  यह सिफारिश की थी कि इस मुल्क में जिन्हें अंग्रज़ी का ज्ञान नहीं है उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। यदि यह बात मान ली जाती तो हमारे हिन्दुस्तानी भाई जो अधिकांशतः गांवों में रहते हैं-वे तो वैसे ही अपने अधिकार से वंचित हो जाते किन्तु हमने हिन्दी का दामन थामें रखा  चाहे इसे लिए हमें अंग्रेज  शासकों या उनके अंध भक्तों की लाख प्रताड़ना सहनी पड़ी। कदम कदम पर हमें यह  उपेदश दिया गया कि हम अपना धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी भाषा को भुलाकर उस महासमुद्र में विलीन हो जायें जहां हमारी अपनी पहचान मिट जाये और हम वैसे हीबन जायें जैसा हमारे मालिक हमारे स्वामी हमें बनाना चाहते हैं लेकिन हमारे परखे तो उस माटी की उपज थे जहाँ राम, कृष्ण, अशोक, अकबर, गाँधी और नेहरू पैदा हुए थे और हमारे साथ थे सूर, तुलसी,कबीर, और मीराष हम उन संत महापुरुषों की वाणी को अपना गलहार बनाकर बड़ी से बड़ी विपदा को झेल जाने की शक्ति रखते हैं ौर यही कारण है कि इस मुल्क की आजादी के पूर्व और बाद में भी जो चुनाव हुए उसमें हमने यह दिखा दिया कि हम तमाम जातियों के साथ प्रेम और सौहार्द्रपूर्वक भाई-भाई की तरह रहा जानते हैं यह हमारा कर्तव्य है, किन्तु हम अपनी अस्मिता को मिटने नहीं देंगे और हमारी पहचान की प्रतीक है हमारी भोजपुरी हिन्दी। यदि यहीमिट गई, तो हमारा बचना क्या और मिटना क्या। उन्होंने ही बताया कि आजादि के बाद धीरे-धीरे यह बात सभी मानने लगे हैं कि हिन्दी को मात्र एक जाति की भाषा के रूम में या राष्ट्रीय, जातीय समरसता के बाधक तत्व के रूप में देखते परखते रहे तो यह एक ऐतिहासिक भूल होगी और यदि हमने राष्ट्र की शक्ति, एकता के सूत्र में इसे स्वीकार किया तो हमारा देश निश्चय ही अधिक सम्पन्न और शक्तिशाली बनेगा। सम्मेलन कराने वाली संस्था हिन्दी निधि ने तो यह घोषणा पहले ही कर दी है कि इस देश में रहने वाले तमाम लोग अपने पुरखों के देश की भाषा का ज्ञान अर्जितकरें, हम एक दूसरे की भाषा क भी जाने और सीखें ताकि हमारी आपसी समझदारी बढ़े और कटुता की सभी गांठे कट जायें। सरकार भी इस सच्चाई को स्वीकार करती है और इसीका प्रमाण है कि “दिवाली नगर” के लिए हमें पन्द्रह एकड़ जमीन दी गई है  और उसे हम ऐसा केन्द्र बना रहे हैं जहां भारतीय संस्कृति की विशिष्टता, उसकी गरिमा और सुवास का आनन्द लेने एक दिन अमरीका और यूरोप के अनेक लोग आयेंगे। हिन्दी और हिन्दुस्तानी की महत्ता को दर किनार कर इस देश में कोई बहुत कुछ नहीं कर पाया और इसके प्रमाणस्वरूप उन्होंने हमेंबताया कि इस देएश में जब धर्मान्तरण की लहर चल रही थी तो सभी मिशनरी विफल रहे और कुछ सफलता मिली भी तो कनाडा के मिशन को जिसने धर्मप्रचार के लिए न्दी कासहारा लिया। हमारे हृदयच का द्वार तो हिन्दी की दस्तक ही खोल सकती है और हमें पूरी आशा है कि हमारे पुरखों का देश, जहां भारतीय संस्कृति की प्रतिमूर्ति महामान्य डॉ. शंकर दयाल शर्मा और यशस्वी विद्वान महामान्य नरसिंह राव जैसे भारत के कर्णधार विद्यमान हैं वहाँ  से हमें अपनी भाषायी सासंकृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में कभी बाधा नहीं आयेगी । चूँकि यह मात्र हमारी अपेक्षा ही नहीं बल्कि हमारा अधिकार भी है। हिन्दी की अभिवृद्धि, उसका अन्तरराष्ट्रीय क्षेत्र में विकास हमारे भारत देश के प्रेम और भाई चारे का संदेश है और हम सभी चाहते है कि “वसुधैव कुटुम्बकम्” का उदार उदात्त भाव, भारतीय भाषा और संस्कृति संसार के कोने में पहुँचे तथा कलह, कोलाहल से परिव्याप्त आज का मानव संसार सच्चा त्राण पाये और उसके समग्र कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो।

मैं और मेरा हिंदी प्रेम[सम्पादन]

लोग मुझसे पूछते है कि आपको हिन्दी से इतना प्रेम क्यों है? अपने देश मे ही जब लोग हिन्दी को लात मारकर अंग्रेजी मे बोलना अपना शान समझते है, हिन्दी मे बोलने वाले को पिछड़ा समझा जाता है । अंग्रेज़ी में बोलने वाले को ज्यादा सम्मान दिया जाता है, फिर आप क्यो हिन्दी के झन्डे गाड़ने के चक्कर मे रहते हैं ।

दरअसल मै भी दूसरे लोगों की तरह से ही था, हिन्दी मे पढाई तो जरूर की थी, लेकिन अगर कोई हिन्दी मे लिखने को बोलता था तो नानी याद आ जाती थी। हिन्दी लिखते लिखते अंग्रेजी पर आ जाता था । लेकिन मेरे को हिन्दी से सच्चा प्रेम तब हुआ जब मैने यूरोपीय देशों के लोगों और चीनी भाषियों का भाषा प्रेम देखा। जर्मनी और फ्रान्स में अंग्रे़ज़ी जानने वाले तो बहुत मिलेंगे लेकिन शायद ही आप उनको अंग्रेज़ी में बात करने पर राजी करा पायें. यही हाल लगभर यूरोप के बाकी देशों का है, मै मानता हूँ कि स्थितियाँ बदल रही है लेकिन अभी भी उनको अपनी भाषा दूसरी सभी भाषाओ से ज्यादा प्यारी है। एक फ्रांसीसी से मैने पूछा कि तुम्हे अंग्रेज़ी तो आती है फिर क्यों फ्रेंच मे बात करते हो, तो बोला कि मुझे गर्व है कि मै फ्रांसीसी हूँ,मुझे अपने देश और संस्कृति से प्यार है, इसलिये मै फ्रेन्च मे बात करता हूँ, और अंग्रेज़ी का इस्तेमाल सिर्फ तभी करता हूँ जब अत्यंत जरूरी हो । यकायक मुझे लगा क्या हम हिन्दुस्तानी अपने देश या संस्कृति से प्यार नही करते।

मै आपको अपना एक अनुभव बताता हूँ, मै लन्दन के एक म्यूजियम मे अपने मित्र के साथ टहल रहा था, किसी एक कलाकृति पर नजर डालते ही मैने अपने मित्र से कलाकृति के मुत्तालिक अंग्रेज़ी में कुछ पूछा, मित्र ने तो जवाब नही दिया लेकिन बगल मे एक बुजुर्ग फिरंगी खड़ा था, उसने ठेठ हिन्दी मे जवाब दिया, मै तो हैरान, हमने एक दूसरे को अपना परिचय दिया, इन फिरंगी महाशय की पैदाइश हिन्दुस्तान की थी,ये पता चलते ही कि मै उत्तर प्रदेश से हूँ, उस फिरंगी ने बाकायदा भोजपुरी मे बोलना शुरु कर दिया,हद तो तब हो गयी जब उसने मेरे से ठेठ भोजपुरी मे कुछ पूछा और मैने जवाब देने के लिये बगलें झाँकते हुए अंग्रे़ज़ी का प्रयोग किया.उस दिन बहुत शर्म आयी कि हम अपनी भाषा होते हुए भी अंग्रेज़ी को अपना सबकुछ मानते है । आखिर क्यों?

कुछ दक्षिण भारतीय भाइयो का यह मानना है कि हिन्दी एक क्षेत्रीय भाषा है, हालांकि मै उनकी बात से सहमत नही हूँ, फिर भी मै उनकी मजबूरी समझता हूँ कि वे हिन्दी मे लिख पढ नही सकते, इसलिये अंग्रेज़ी मे बोलते है, लेकिन कम से कम अपने उत्तर भारत मे तो हिन्दी को उसका पूरा सम्मान मिलना चाहिये । अब सुनिये मेरा हिन्दुस्तान के दौरे का वाक्या. मै दिल्ली से रूड़की जा रहा था, ट्रेन मे एक जनाब से मुलाकात हो गयी, किसी कालेज मे प्रोफेसर थे, मै नाम नही बताऊंगा, रास्ते भर मेरे से बतियाते रहे, मेरा परिचय जानकर कि मै अप्रवासी हूँ अंग्रेज़ी मे शुरु हो गये, मैने उनके सारे जवाब हिन्दी मे ही दिये, लेकिन वो थे कि अंग्रेजी से नीचे ही नही उतर रहे थे। लगातार उनकी बकझक सुनकर मैने आखिर पूछ ही लिया, क्या आपको हिन्दी मे बोलने मे शर्म आती है, वे खींसे निपोरने लगे, और बातों ही बातो मे मान लिया कि हिन्दी मे बोलने मे शर्म आती है,अंग्रेजी मे बोलना ही भद्रता की निशानी है। मैने जब उनको बताया कि दुनिया जहान के लोग अपनी अपनी भाषा से प्यार करते है,हम भारतीय क्यों नही करते। जब आप प्रोफेसर होकर ऐसी बात सोचते है तो आपके छात्रों का क्या होगा…..जनाब के पास कोई जवाब नही था। हम क्यों ऐसा करते हैं कि अच्छी अंग्रे़ज़ी बोलने वाले के पीछे लग लेते है, और हिन्दी बोलने वाले को किनारे बिठाते है।सरकार भी हिन्दी दिवस मनाकर अपनी खानापूर्ति करती है और समझती है कि हिन्दी का सम्मान हो गया.हम लोग बोलते है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है कि हिन्दी को उचित स्थान नही मिला, यह हमारी गलती है, कि हम क्यो नही हिन्दी को अपनाते। क्यों नही अपने बच्चों को हिन्दी मे बोलने के लिये प्रोत्साहित करते । कंही हम सभी तो हिन्दी के इस बदहाली के लिये जिम्मेदार नही है? आपका इस बारे मे क्या कहना है ।

मैं हिंदी में क्यों लिखता हूँ[सम्पादन]

अमां यार क्यों ना लिखे, पढे हिन्दी मे है, सारी ज़िन्दगी हिन्दी सुनकर गुजारी है। हँसे, गाए, रोये हिन्दी मे है, गुस्से मे लोगो को गालियां हिन्दी मे दी है, बास पर बड़्बड़ाये हिन्दी मे है। हिन्दी गीत, हिन्दी फ़िल्मे देख देखकर समय काटा है, क्यों ना लिखे हिन्दी? मेरा हिन्दी प्रेम तो वैसे ही बहुत पुराना है, इसलिये उस बारे मे बताकर समय व्यर्थ नही करूंगा। हिन्दी मे लिखने के लिये सबके अपने अपने कारण होंगे, क्योंकि हम सभी अंग्रेजी मे भी लिखने की क्षमता रखते है, फ़िर भी हमने हिन्दी ही चुनी। मेरे तो निम्नलिखित कारण है:

हिन्दुस्तान को छोड़ते समय लगा था, शायद हिन्दी पीछे छूट गयी और अब तो बस अंग्रेजी से ही गुजारा चलाना होगा, लेकिन कुवैत मे आकर देखा कि पूरा का पूरा हिन्दुस्तान, या ये कहो को पूरा का पूरा साउथ एशिया(अविभाजित हिन्दुस्तान) एकजुट होकर, साथ साथ रह रहा है। सबके सुख दु:ख, खुशी गम, तीज त्योहार, सभी तो एक सा है।सभी लोगो हिन्दी/उर्दु बोलते है, जो लोगो को एक दूसरे से जोड़ती है। क्या इन्डियन,क्या पाकिस्तानी और क्या बांग्लादेशी, सब एक है। मज़हब अलग अलग है तो क्या बोली तो एक है।

इन्टरनैट पर हिन्दी पिछड़ी हुई है, इसमे कोई शक नही, हम हिन्दी ब्लागर, वैब पर हिन्दी मे लिखकर, उसे मरने से बचा रहे है।हम किसी पर कोई उपकार नही कर रहे है, बल्कि हम एक विशिष्ट पाठक वर्ग ढूंढ रहे है, जो सिर्फ़ हिन्दी मे ही सोचता है, हिन्दी बोलना,सुनना,देखना चाहता है और हिन्दी मे ही पढना चाहता है, लेकिन इन्टरनैट पर उसे हिन्दी दिखती ही नहीं ।  

मै शुरु-शुरु मे सिर्फ़ अंग्रेज़ी के ब्लाग पढता था, लेकिन बाद मे पढना कम करदिये, क्योंकि अब मुझे हिन्दी मे ही अच्छा पढने को मिल जाता है। सीधी-सीधी बात है, यदि मेरे सामने हिन्दी और अंग्रेजी की इन्डिया टूडे सामने पड़ी हो तो मै हिन्दी वाली पहले उठाऊँगा।

हिन्दी बोलकर और हिन्दी मे लिखकर मुझे संतुष्टि होती है, एक दिन ब्लाग नही लिखता हूँ तो लगता है, कंही कुछ छूट रहा है। लेखन का ऐसा बुखार चढा है कि दोस्तो यारों को ब्लाग पढाकर ही दम लेता हूँ। और तो और, बहुत सारे कुवैती और मेरे कुछ पाकिस्तानी दोस्त जो हिन्दी नही पढ पाते, लेकिन समझ लेते है, वे भी रोजाना किसी ना किसी को पकड़कर हिन्दी ब्लाग पढवाते है। उनके द्वारा दिनोदिन की जाने वाली तारीफ़ बताती है कि हिन्दी चिट्ठाकारी दिन पर दिन जवां होती जा रही है।

दरअसल हिन्दी पढने वाले पढना तो चाहते है, लेकिन फ़ोन्ट वगैरहा के झमेले से डरते है। फ़िर क्या है कि अभी इन्डिया मे इन्टरनैट सिर्फ़ मनोरंजन, इमेल, चैट या जरुरी जानकारी के लिये प्रयोग होता है। अभी इन्टरनैट लोगो की जीवन शैली मे रचा बसा नही है, जैसा पश्चिम मे है, जिस दिन वो सब होगा, भारतवासी हिन्दी मे साइट ढूंढना शुरु करेंगे। सीधी सी बात है, यदि दाल रोटी सामने मिलगी तो बर्गर पिज्जा ज्यादा दिन नही तक पसन्द नही आयेगी।

मेरा अपना एक अनुभव है कि लोग बाग सेक्स, यौन और दूसरे कई अपशब्द ढूँढते हुए, ना जाने कितनी साइटो को कूदते फ़ांदते मेरी साइट पर आते है। लेकिन एक बार मेरी साइट या दूसरे ब्लागर की साइट पर लिखे लेख पढने के बाद, हिन्दी चिट्ठाकारों की साइट को बुकमार्क करने के लिये मजबूर हो जाते है। अब ये तो नही कहूँगा कि ये शब्द ढूंढने वाले ठरकी है। लेकिन एक बात तो है, बुरी बात का प्रचार प्रसार जल्दी होता है। इसलिये मेरे ब्लाग को शायद कम ही लोग जानते होंगे, ठरकी और देसी बाबा को जानने वाले हजारों मिल जायेंगे।

अब बात करते हैं दूसरी भाषाओं की, इन्टरनैट पर किसी भी भाषा का विकास तभी सम्भव है, जब उसका ज्यादा से ज्यादा कन्टेन्ट उपलब्ध हो, अच्छा बुरा, कुछ भी। हर तरह का कन्टेन्ट होना चाहिये। आप फ़ारसी भाषा देखिये, चीनी और जापानी भाषाएँ देखिये, यूरोपियन भाषायें देखिये, हर भाषा मे आपको इतनी साइट मिल जायेगी कि कन्टेन्ट की कमी नही है। और हिन्दी, अभी तो शुरुवात है, हम तो अभी अभी फ़ोन्ट शोन्ट के पंगे से बाहर निकले है, थोड़ा समय लगेगा।

आज हम जो हिन्दी लिख रहे है, निश्चय ही, आने वाले समय मे इस हिन्दी पर शोध होगा। लोग प्रोजेक्ट बनायेंगे और कार्यशालाए आयोजित करेंगे। हम ना रहेंगे, तुम ना रहोगे, हमारा लिखा जरुर रहेगा। आज भले ही हमे कुछ गिनती के लोग पढ रहे हो, लेकिन एक दिन आयेगा, जब लोग हमे याद करेंगे और हमारे हिन्दी के योगदान को सराहेंगे। बस यही कहना चाहता हूँ। सुदुर देश में हिन्दी का मह्त्व

हिन्दी हम भारतीयों कि राष्ट्रभाषा है और अनेक भारतीयों ने इसे मातृभाषा के रूप में भी स्वीकार किया हैं। विश्व में हिन्दी चंद भाषाओं में से एक है ,जिसमे उच्चारण के अनुसार शब्द लिखे और पढ़े जा सकते है , इसी कारण हिन्दी जानने वालों को अन्य भाषा के शब्दों के उच्चारण करने मे असुविधा नही होती।  जहाँ हिन्दी में मात्राओं और अक्षरों का अत्यंत मह्त्व है  उदारणार्थ -

"वह पिता है" - " वह पीता है" -" वह पीटा है"-

"वह चिता है"-" वह चीता है"-" वह चिंटा है"

वहीं हिन्दी भाषा का मह्त्व विश्व की अनेक प्रचलित भाषा की तुलना मे कोई कम नही है |  संपन्न शब्कोश से परिपूर्ण हिन्दी भाषा का प्रसार अब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नही हो पाया यह एक विडंबना ही तो है !

आमतौर पर अनिवासीय भारतीय जब मातृभूमि से बाहर सुदुर देश मे व्यवसाय, अध्ययन, धर्नाजन इत्यादि हेतु प्रस्थापित होने लगते हैं तब समय परस्थिति अनुसार उनका रीति-रिवाज़, घर-परिवार, साहित्य-भाषा और संस्कृति से संबंध क्षीण होने लगता हैं, मानो ग्रीष्म ऋतु में नदी का जल सूख कर उसे दो तटों में अलग करने का असफ़ल प्रयास कर रहा हो । हालाँकि वर्षा ऋतु के आगमन से नदी जलमग्न हो जाती है और सर्वत्र हरीयाली खुशहाली बिखराती है दोनों तट भी जुड कर एक हो जाते हैं इसी तरह यदि हिन्दी भाषी जनसमुदाय व परिवार जो दूर देशों मे बस रहें हैं हिन्दी का प्रयोग आपस की बोलचाल, वार्तालाप एवं ई-मेल आदि के लिये करने लगे तो संभव है की ये प्रयास सेतु-बंध का रूप ले जिससे नदी भी ना सूखे और उस पर निर्मित सेतु निरंतर आवागमन के लिये उपयोगी सिद्ध हो सके।

बहुत से भारतीयों का भ्रम है की अगर बच्चों से घ्रर में हिन्दी में बात की जाय तो वे अमेरिकी स्कूलों में पिछड़ जायेंगे या बुद्धू कहलायएगें । वैज्ञानिक ढंग से किये गये सर्वेक्षणों मे यह पाया गया है की एक से अधिक भाषा जानने वाले विघार्थी सशक्त विचारक होते है और अध्यन में उनकी मातृभाषा का ज्ञान बाधक नहीं बल्की सार्थक सिद्ध होता है। विदेशों में बच्चों को हिन्दी की शिक्षा दिलवाना कठिन कार्य है, इसकी सफ़लता मे परिवारजनों का योगदान अत्यंत आवश्यक एवं अनिवार्य है। प्रायः ये देखा गया है की विदेशों मे नयी पीढ़ी को इस भाषा का ज्ञान हिन्दी सिनेमा या हिन्दी- अंगरेज़ी मिश्रित टीवी मनोरंजन द्वारा ही मिलता है जो अस्थायी और अपर्याप्त है, मानो वर्षा का पानी भूमि पर बरस कर समुद्र के खारे पानी में बह कर मिल रहा हो। हिन्दी का उपयुक्त संचार करने के लिये यथा संभव बोलचाल में प्रयोग करें, हिन्दी पढ़ना और लिखना सीखें और सीखायें जिससे एक ओर हमारा युवा वर्ग अपनी राष्ट्रभाषा मे निपुण हो सके और दूसरी ओर हम स्वंय विरासत में प्राप्त इस संपदा का उपभोग कर सकें।

इस युग में समय का सदउपयोग अत्यंत अनिवार्य है साथ ही साथ मन पसंद कार्यों के लिये समय निकालना भी आवश्यक है, आजकल हिन्दी सीखने और सिखाने के प्रचुर साधन इन्टरनेट मे सामान्य क़ीमतों पर अथवा मुफ़्त मे उपल्ब्ध है।

विभिन्न हिन्दी पत्र - पत्रिकायें, चिठ्ठे ( ब्लॉग ), कविताओं के फ़ोरम जैसे माध्यम, बीते हुये युग की याद दिलाते है और पराग, चंपक, अमर चित्र कथा, धर्मयुग, सरिता-मुक्ता जैसी पत्रिकाऐं आँखों के सामने मंड़राने लगती है ! ऐसा लगता है, आते हुये समय मे हिन्दी साहित्य का अपार भंडार अन्तरजाल पर उपल्ब्ध हो जायेगा और हम लोग फ़िर जुड़ पायेंगे बीते हुये और बिछड़े हुये दौर से जिनकी यादें जीवन की आपाधापी में गायब होती जा रही है।

अमेरीकी सरकार ने हिन्दी शिक्षा हेतु अमेरिकी संस्थाओं एवं विश्वविध्यालयों मे अनेक कार्यक्रम आयोजित करवाये हैं जिससे भारतीय मूल के लोगों के अलावा अनेक देशों के विद्यार्थियों मे हिन्दी के प्रति जागरुकता बड़ी है। ऐसी अनेक स्वंयसेवी संस्थायें अमेरीका के अनेक राज्यों मे सक्रिय है जहाँ सप्ताह अंत में बच्चों को हिन्दी की शिक्षा दी जाती है। आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि अनिवासीय भारतीयों के अथक प्रयासों सें अमेरिकन स्कूलों के पाठ्यक्रम मे हिन्दी ने अपना स्थान बनाना प्रारंभ कर दिया है ।

राष्ट्रभाषा की सेवा करना हमारा उत्तरदायित्व है। हम अनुष्ठान करें कि जिस भाषा ने हमारी प्राचीन संस्कृति और सुदीर्घ साहित्य से हमें जोड़ रखा है उसका प्रचार-प्रसार करने के प्रयास हम जारी रखें, साथ ही साथ संकल्प लें कि विरासत में मिली इस धरोहर को नवयुवकों और आने वाली पीढ़ी को सौंपकर उन्हे हिन्दी समझने एवं ग्रहण करने मे सहायता करेंगे अन्यथा हमारी प्यारी हिन्दी भाषा अपनी योग्यता के अनुरूप यथास्थान पाने से वंचित न रह जाये ?

डर इस बात का भी है कि जिस तरह पिछ्ली शताब्दियों मे इसे रौदंने के प्रयास तथाकथित शासकों ने कायरता पूवर्क किया था वैसे ही आज कि परिस्तिथियों में जाने-अनजाने स्वत: हम इसे कुचल ना डाले !!

समकालीन प्रौद्योगिकी और विज्ञान से संबधित शब्दों का समावेश हिन्दी भाषा के शब्दकोश मे करना और व्यापक रूप से हिन्दी का प्रचार देश-विदेशों में जारी रखना समय की आवश्यकता है । विश्व्वविद्यालय, सरकारी-गैर सरकारी, व्यवसायिक, सामाजिक संस्थायें और व्यगक्तिगत रुप से हम सब मिलकर हिन्दी का उपयोग करते रहें। उपल्ब्ध सभी साधनों का यथा उचित प्रयोग करें तो वो दिन दूर नही जब न केवल हम भारतीय मूल के लोग अपितु विदेशी लोग भी इस समृद्धशाली भाषा के उपासक बन जायेंगे । 8 वाँ "विश्व हिन्दी सम्मेलन" जो 13-14-15 जुलाई 2007 को न्युयार्क शहर में आयोजित किया गया है उसमे इन विषयों पर न केवल चर्चा होगी बल्कि क्रियान्वन के ठोस कदम उठाये जायेंगे ऐसी आशा है ।

" बिन गुरु विध्या समझ ना पायें, बिना व्याकरण भाषा"

" काला अक्षर भैंस बराबर दुनिया लगे तमाशा"

" पढ़ो व्याकरण हिन्दी सिखो..हिन्दी अपनी भाषा"

" भारत माँ कि यह है बिन्दी.. यही देश की आशा "

गयाना में भारतीय संस्कृति और हिन्दी[सम्पादन]

दक्षिण अमरीका में छोटे-छोटे 365 द्वीपों को मिलाकर बने गयाना में 50 प्रतिशत से भी अधिक भारतीय मूल के लोग रहते हैं। इस देश मी राजधानी जार्ज टाउन सहित डेमरारा, बरबीस और एसीक्यूबो तीनों राज्यों में भारतीय तीज-त्यौहार, पूजा-पाठ बड़े उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। आज भी होली और दीपावली उनके राष्ट्रीय त्यौहार हैं तथा रामचरितामानस और गीता उनके समादृत धर्म-ग्रन्ध हैं। देश के रेडियो एवं टेलीविज़न पर हिन्दी गीतों के कार्यक्रम होते हैं तथा सिनेमाघरों में हिन्दी फिल्में निरन्तर प्रदर्शित की जाती हैं। यद्यपि गयाना की नई पीढी़ के लिए हिन्दी बोलचाल की भाषा नहीं है, लेकिन रामचरितामानस, सत्यार्थ प्रकाश, गीता आदि भी वे पढ़ते-समझते हैं।

विश्व-विख्यात नाविक कोसम्बस ने 1498 में दक्षिण अमरीका के इस उत्तर-पूर्वी तट को देखा था जिसे बाद में संसार स्वर्ण द्वीप (एल-टोराटो) के रूप में जानने लगा । चूंकि इस क्षेत्र में काफी नदियाँ थीं और अपार जल-भंडार था इसलिए इसे “गाइना” कहा जाने लगा जो एक अमरीइंडियान शब्द हैं, जिसका अर्थ होता है- अनेक जलराशियों का देश। यह वाइना से निकला हुआ शब्द है जो आज भी अमरीइडियन लोगों के बीच पानी का पर्याय है। इस स्वर्ण द्वीप की तलाश में कोलम्बस के बाद भी अनेक नाविक आए लेकिन उन्हें लेकिन उन्हें हमेशा प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। अब तक उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार 1593 में सर वाल्टर रैले एलिजाबेय साम्राज्य के विस्तार के लिए इस क्षेत्र में आए थे और उन्होंने अपने अनुभवों को “डिस्कवरी ऑफ लार्ज, रिच एंड ब्यूटीफल एंपायर ऑफ गयाना” नाम से प्रकाशित कराया। बाद में अंग्रेजी के अनेक साहित्यकारों ने गयाना की समृद्धि और सौंदर्य का वर्णन अपनी रचनाओं में किया। इन रचनाकारों में शेक्सपियर, मिल्टन, हडसन तथा कॉनन डॉयल के नाम उल्लेखनीय हैं। 83,000 वर्गमील के इस भूभाग में 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध से 19 वीं शताब्दी के प्रारंभ तक स्पेन, डच, फेंच तथा ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के आपसी संघर्ष चलते रहे। अंततः 1803 में ब्रिटेन ने इस क्षेत्र के एक बड़े भाग पर स्थायी तौर से अपना अधिकार जमा लिया तथा 1814 में ब्रिटिश गयाना उपनिवेश की स्थापना हुई । उस समय तक ब्रिटिश गयाना के गन्ने के खेतों में अफ्रीकी नीग्रो काम करते थे, जो दास प्रथा के अंतर्गत गयाना आए थे। उनके नारकीय जीवन की कहानी मानवता के इतिहास में एक शर्मनाक घटना बन चुकी थी। दास-प्रथा की निर्ममता एवं क्रूरता के प्रति ब्रिटेन में विरोध उभरा तथा 1834 में ब्रिटिश सरकार ने दास-प्रथा को समाप्त करने की घोषणा कर दी।

दास प्रथा की समाप्ति की घोषणा के बाद गयाना के बागान-मलिकों के समक्ष मजदूरों की समस्या पैदा हो गई क्योंकि नीग्रों लोग अपने को स्वतंत्र समझने लगे। उसी समय एप्रेंटिसशिप प्रावधान लागू किया गया जिसके तहत 1838 तक नीग्रो मजदूरों को दास बनकर काम करना पड़ा । इस बीच बागान मालिकों ने वेस्टइंडीज तथा मडेइरा से संविदा के आधार पर मजदूर मंगवाना शुरू किया जो गयाना के खेतों में सफल नहीं रहे। अंततः इस उपनिवेश के बीडेन-हूप तथा ब्रीडस्टेन नामक बागानों के मालिक जॉन ग्लैंडर्स एंड कंपनी को भारत से गयाना के मजदूरों को भेजने की संभावनाओं के बारे में पूछा। उस फर्म ने गलैडस्टोन को लिखा कि हम नहीं सोचते कि वेस्टइंडीज में यहाँ से मजदूरों को भेजने में कोई कठिनाई पैदा होगी क्योंकि यहाँ के लोगों को तो यह मालूम ही नहीं होगा कि वे कहाँ जा रहे हैं तथा उन्हें कितनी लंबी यात्रा कैम हॉनहाउस को 23 फरवरी 1837 को तथा ब्रिटेन के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर द कॉलोनिज लार्ड ग्लेनेलज को मार्च 1837 में पत्र भेजकर भारत से मजूदरों के आयात की अनुमति ले ली।

कलकत्ता की फर्म ने ग्लैडस्टोन को जो उत्तर भेजा उससे जाहिर होता है कि मजदूरों को यह साफ-साफ नहीं बताया जाता कि वे कहाँ और कितनी दूर जा रहे हैं। लेकिन इतना सच है जो लोग भारत से बाहर जा रहे थे वे अपने मन में बेहतर भविष्य का सपना संजोए हुए थे और इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए हर प्रकार की चुनौतियों का सामना करने को तैयार थे। इन अज्ञात महापुरुषों की अंतहीन यातना की यात्रा 1838 की मकरसंक्रांति या पोंगल के दिन 13 जनवरी को शुरू हुई जबकि व्हिटबी नामक जहाज कलकत्ता से 149 श्रमिकों को लेकर चला। ठीक उसके 16 दिन बाद 29 जनवरी को 165 श्रमिकों को लेकर हेसपरस नामक जहाज बिदा हुआ । 414 यात्रियों में से 18 की मृत्यु यात्रा के दौरान हो गई थी। अतः शेष 396 मजदूरों को लेकर दोनों जहाज 5 मई, 1838 को गयाना पहुँचे । इन मजदूरों में 150 की भर्ती छोटा नागपुर के आदिवासी इलाके से की गई थी जिन्हें अंग्रेज “हिल कुली” कहते थे तथा बाकी मजदूर बर्दवान और बांकुरा जिलों से आए थे। इस प्रकार यह सुविदित है कि भारत और गयाना के बीच संबंधों की शुरूआत आज से 150 साल पहले हुई थी जबकि “व्हिटबी” और ‘हेसपरस’ नामक दो जहाजों से लगभग 400 शर्तबंद मजदूर दक्षिण अमरीका के इस डेमरारा टापू में आए थे । उस समय यह द्वीप ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के अधीन था तथा दास प्रथा की समाप्ति के बाद अपने गन्ने के बागानोंके लिए सस्ती दर पर श्रमिकों की तलाश करते-करते उन्होंने भारत से मजदूरों का निर्यात किया था । ये शर्तबंद मजदूर पाँच वर्ष के करार पर गयाना आये थे तथा यहाँ के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। बाद में शर्तबंद मजदूर मंगवाने की प्रथा के खिलाफ़ भारत में जोरदार प्रतिक्रिया हुई । गांधी, बालकृष्ण गोखले, मदनमोहन मालवीय आदि भारतीय नेताओं ने इस अमानवीय प्रथा का घोर विरोध किया जिसके फवस्वरूप 1917 में ब्रिटिश सरकार को मजबूर होकर शर्तबंद मजदूरों के निर्यात की निर्मम एवं शर्मनाक प्रथा को बंद करने की घोषणा करनी पड़ी।

1838 से 1917 के बीच आये मजदूर अपने साथ भारतीय रीति-रिवाज, परंपरा, धर्म, भाषा और संस्कृति लाए जो आज भी गयाना में जीवित है। यही कारण है कि भारतीय भोजन, भारतीय त्यौहार जन्मोत्सव, विवाह, श्राद्ध आदि की भारतीय प्रथा तथा विशेष अवसरों पर भारतीय पोशाक आज गयाना के जीवन के अभिन्न अंग बन गये हैं। दापावली, होली, ईद जैसे भारतीय त्यौहारों को गयाना का राष्ट्रीय त्यौहार माना जाता है जो देश भर में अत्यंत हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाये जाते हैं। गयाना के प्राय सभी राजकीय उत्सवों पर गीता, कुरान तथा बाइबिल के अंशों का पाठ होता है तथा भारतीय नृत्य एवं संगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है।

इन संबंधों को सुदृढ़ आधार प्रदान करने में अनेक धर्म-प्रचारकों तथा सामाजिक कार्यक्रर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे लोगों में भारत के महान क्रांतिकारी तथा समाज-सुधारक भाई परमानंद तथा महात्मा गांधी के सहयोगी दीनबंधु सी.एफ. एंट्रयूज के नाम उल्लेखनीय हैं। भाई परमानंद ने वर्तमान शताब्दी के दूसरे दशक के प्रारंभ में गयाना में आर्य समाज मंदिर की स्थापना की तथा यहाँ के भारतीय समुदाय को हिन्दी एवं संस्कृत की शिक्षा देने की व्यवस्था करवाई। इसी प्रकार दीनबंधु सी.एफ. एंड्यूज ने गयाना आकर यहाँ के भारतीयों की समस्या का अध्ययन किया तथा उनके सामाजिक जीवन में सुधार लाने की सिफारिश की। इसके बाद से भारत से धर्म-प्रचारकों, मिशनरियों तथा समाज-सेवियों के आवागमन का क्रम चलता रहा जिसके परिणाम स्वरूप गयाना में भारत की छवि एक संघर्षशील राष्ट्र के रूप में उभरी तथा गयाना वासियों ने भारतीय संवतंत्रता संग्राम को खुले शब्दों में अपना नैतिक समर्थन प्रदान किया। 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ तो पराधीन गयाना के गाँव-गाँव में भारतीय स्वतंत्रता समारोह हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाया गया, जिसमें न सिर्फ गयाना में रहने वाले भारत मूल के लोगों ने बल्कि यहाँ की सभी जातियों और नस्लों के लोगों ने हिस्सा लिया जो गयाना तथा भारत की जनता के बीच बढ़ते हुए आत्मीय संबंधों का एक अभूतपूर्व उदाहरण था।

 जैसा कि सर्वविदित है, भारत की आजादी का उद्देश्य भारत तक ही सीमित नहीं था। महात्मा गांधी, पंडित नेहरू आदि नेताओं ने अपने संघर्ष को विस्तृत आयाम दिया था, जिसमें संसार से उपनिवेशवाद को समाप्त करना, समानता और विश्व शांति कायम करना और नस्लवाद को समाप्त करना आदि भी शामिल था। जाहिर है कि भारत ने गयाना की आजादी को अपना पूर्ण समर्थन प्रदान किया। यही कारण है कि गयाना के स्वतंत्रता संग्राम के नेता डॉ. छेदी जगन तथा उनके सहयोगी श्री बर्नहम जब भारत गए तो वहाँ उनका भव्य स्वागत किया गया। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने उनके सम्मान में आयोजित एक समारोह में गयाना की आजादी की लड़ाई में तथा आजादी के बाद स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में इसके विकास में भारत के पूर्ण समर्थन एवं सहयोग का आश्वासन दिया।

गयाना की स्वतंत्रता से पहले से ही भारत सरकार गयाना में हिन्दी तथा संस्कृति की पढ़ाई के लिए अध्यापक भेजती थी जो गयाना के गाँवों में जाकर हिन्दी तथा भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार करते रहे और जिन्होंने भारत और गयाना के द्विपक्षीय संबंधों को सौहार्दपूर्ण बनाया । आज भी गयाना के लोग भारतीय संस्ककृति के प्रचार-प्रसार में इन अध्यापकों का नाम आदर के साथ स्मरण करते हैं । इसी तरह मई 1966 में गयाना की आजादी से एक साल पहले ही भारत ने यहाँ अपना राजनयिक आयोग खोला जिसने दोनों देशों के बीच के द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई है। पिछले 22 वर्षों में भारत और गयाना राष्ट्रमंडल, गुटनिरपेक्ष आंदोलन तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में मिल-जुल कर काम कर रहे हैं। रंगभेद, गुटनिरपेक्षता, आर्थिक तथा राजनीतिक समानता एवं विश्व शांति के मामले में दोनों देशों के विचार एक जैसे हैं। गयाना में भारत के महान नेता महात्मा गांधी की स्मृति में राजधानी के एक महत्वपूर्ण बगीचे में बापू की प्रतिमा स्थापित की है, जहाँ हर रोज सैकड़ों लोग उनके दर्शन को पहुँचते है। गुटनिरपेक्षता की नीति के प्रति गयाना के पूर्ण समर्थन के प्रमाण में जार्जटाउन के ऐतिहासिक केथेडल के सामन मार्शल टीटो, नासिर, नक्रूमा और जवाहरलाल नेहरू की प्रतिमाएँ लगी हैं, जो शहर का एक आर्कषक दर्शनीय स्थल बन गया है।

भारत और गयाना के बीच सास्कृतिक अदान-प्रदान को जारी रखने के लिए 30 दिसंबर 1974 को दोनों देशों के बीच हस्ताक्षरित सांस्कृतिक समझौते के अनुसार हर वर्ष गयाना के छात्रों को मेडिकल, इंजीनियरिंग या एग्रिकल्चरल कॉलेजों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रवृत्ति तथा संगीत छात्रवृत्ति भी दी जाती है।

भारतीय आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग कार्यक्रम के अंतर्गत भारत सरकार हर वर्ष गयाना के 15 कार्मिको को लघु उद्योग, वस्त्र इंजीनियरिंग, वित्तीय एवं कार्मिक प्रबंध, विदेश-व्यापार आदि के तकनीकी प्रशिक्षण के लिए छात्रवृत्ति तथा आने-जाने का विमान किराया देती है। इसी कार्यक्रम के अंतर्गत पिछले 20 वर्षों में चमड़ा-उद्योग, रेल, सड़क-निर्माण, कृषि तथा जन-संचार के विशेषज्ञों ने गयाना आकर इन क्षेत्रों के विकास के बारे में सरकार को समुचित सुझाव दिये हैं। सरकारी दायरे के अलावा भी गयाना में अनेक भारतीय डाक्टर, इंजीनियर तथा तकनीकी विशेषज्ञ काम कर रहे हैं। इसी प्रकार भारत से प्रशिक्षित डॉक्टरों तथा अन्य तकनीकी विशेषज्ञों की भी संख्या गयाना में कम नहीं है। हालांकि इनमें अनेक अब गयाना छोड़कर दूसरे देशों में चले गये हैं।

भारत एवं  संबंधों के इतिहास में गयाना की राजधानी जार्ज टाउन में भारतीय सांस्कृतिक केंद्र की 1973 में स्थापना को एक युगांतरकारी कदम माना जाता है। इस केंद्र  में पिछले 20 वर्षों से गयाना के लोग भारतीय नृत्य-संगीत तथा हिन्दी भाषा की शिक्षा लेर हे हैं। वाद्य-यंत्रों में तबलाके अतिरिक्त अब शहनाई और बाँसुरी की कक्षा भी शूरू हो गयी हैं। भारतीय सांस्कृतिक केंद्र के छात्र-छात्राओं ने गयाना में प्रशिक्षण प्राप्त करके अपनी कला का प्रसार पूरे लैटिन अमरीका में किया है। केंद्र प्रतिभाशाली छात्रों में फिलिप मेकक्लिनटॉक का नाम अग्रगण्य है जिनकी मृत्यु 1986 में हो गयी । उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की छात्रवृत्ति पर दिल्ली जाकर कत्थक केंद्र में बिरजू महाराज से कत्थक केंद्र में बिरजू महाराज से कत्थक की शिक्षा प्राप्त की थी तथा भारत से लौटकर जार्जटाउन के राष्ट्रीय नृत्य विद्यालय में गयानावासियों को कत्थक सिखाना शुरू किया। आज भी उनकी छात्राएं दक्षतापूर्वक कत्थक नृत्य कर रही हैं। फिलिप के दूसरे सुयोग्य साथी मुमताज अली भी इस समय गयाना में कत्थक-नृ्त्य के सबसे प्रतिभाशाली कलाकार माने जाते हैं। नृत्य के क्षेत्र में भारतीय सांस्कृतिक केंद्र जार्जटाउन से प्रशिक्षित मार्लिन बोस, नादिरा एवं इंद्राणी आज गयाना से बाहर भी कत्थक नृत्य का शानदार प्रदर्शन  कर भारत एवं की गरिमा को बढ़ा रही है।  

गयाना में हिन्दीगीत, भजन, ग़ज़ल आदि काफी लोकप्रिय है। हर गाँव तथा शहरों की हर गलियों में आप टेप पर बजते हिन्दी गीतों का आनंद ले सकते हैं। मंदिरों में हिन्दी भजनों एवं संस्कृत श्लोकों का उच्चारण 5 वर्ष के शिशु से 100 वर्ष के वृद्ध तक इतनी शुद्धता से करते हैं कि भारतीय राष्ट्रिकों को उनके सामने सामान्यतः चुप्पी साधनी होती है। गयाना की नई पीढ़ी के लोगों में हिन्दी पढ़ने का उत्साह है लेकिन वे हिन्दी बोल नहीं पाते । गीतों एवं भजनो के कैसेट सुनकर या रोमन में लिखकर उन्हें याद करते हैं। देश भर में भारत की अनुकूल तथा प्रतिकूल छवि प्रस्तुत करने में हिन्दी फिल्मों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। गयाना के गैरे भारतीय मूल के लोग भी बड़ी संख्या में हिन्दी फिल्में देखते हैं। यहाँ कई सिनेमा घर ऐसे हैं, जहाँ साल भर सिर्फ हिन्दी फिल्में दिखायी जाती है। गयाना में सूनने के स्तर तक हिन्दी को जीवित रखने में हिन्दी फिल्मों की भूमिका काफी सराहनीय रही है।

गयाना में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए तथा हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन के लिए पिछले अनेक वर्षों से जो सघन प्रयास चल रहे थे उसमें गयाना हिन्दी प्रचार सभा, महात्मा गांधी संस्थान आर्य प्रतिनिधि सभा एवं अन्य स्वैच्छिक संस्थाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज से 25-30 वर्ष पहले तथा गयाना में हिन्दी का एक छोटा सा मुद्रणालय भी था जिसमें इस संस्थाओं द्वारा छोटी-मोटी पत्रिकाएं, निमंत्रण-पत्र आदि प्रकाशित एवं मुद्रित किए जाते थे। बाद में गयाना विश्वविद्यालय तथा गयाना के कुछ हाई स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई प्रारम्भ हुई। इनके अतिरिक्त गयाना स्थित भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र में भी हिन्दी के अध्यापन की व्यवस्था है। भारतीय उच्चायोग एवं भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र के पुस्त्कालयों में हिन्दी की पुस्तकें उपलब्ध हैं लेकिन रोजगार और व्यावसाय में हिन्दी की भूमिका नगण्य रहने के कारण वहां हिन्दी के अध्ययन और अध्यापन में निरन्तर कमी आ रही है। हिन्दी को वे मातृभाषा तो नहीं लेकिन अपनी मातृभूमि की भाषा मानते हैं तथा जब वेनीग्रो जाति के साथ अपनी तुलना करते हैं तो वहाँ की नई पीढ़ी को अपनी अस्मिता के लिए यह आवश्यक प्रतीक होता है कि वे अपने मूल देश की भाषा हिन्दी का ज्ञान अर्जित करें। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर गयाना की पंडित कौसिल, सनातन धर्म सभा, आर्य प्रतिनिधि सभा आदि संस्थाओं ने अपने मन्दिरों में हिन्दी कक्षाओं को चलाने की व्यवस्था की है। भारत सरकार एवं भारत की हिन्दी प्रेमी संस्थाओं का यह कर्त्तव्य हो जाता है कि इन संस्थाओं को हिन्दी पुस्त्कें एवं अन्य शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराकर उस देश में हिन्दी के प्रचार-प्रसार को आगे बढ़ाएँ । इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय हैं कि गयाना से प्रति वर्ष कुछ छात्र हिन्दी सीखने के लिए भारत आते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संचालित केन्द्रीय हिन्दी संस्थान में उन्हें हिन्दी की शिक्षा प्रदान की जाती है। मेरे विचार में यह आवश्यक है कि गयाना, त्रिनिडाड,सूरीनाम आदि से आने वाले छात्रों के लिए एक विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया जाए जिससे वे अपने देश पहुँचकर हिन्दी अध्यापकों को भी प्रशिक्षित कर सकें। आज मारीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिडाड,गयाना में हिन्दी प्रचार-प्रसार को आगे बढ़ाने के लिए वहाँ ऐसे लोगों को भारत से भेजने की आवश्यकता है जो पूर्ण मनोभाव,समर्पण एवं प्रतिबद्धता के साथ हिन्दी भाषा एवं भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर सकें। गयाना में भारतीय संस्कृति की परम्परा पूर्ण तथा जीवन्त है। भारतीय भाषा और साहित्य की इस फुलवारी को भारत से गए श्रमिकों ने अपने खून और पसीने से सींचा है तथा गंगाजल से पवित्र किया है। अतः उनके मन में भारतीय संस्कृति और हिन्दी भाषा के प्रति अगाध स्नेह एवं श्रद्धा विद्यमान है जो हमारे दोनों देशों के सम्बन्धों को आगे बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि गयाना में हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं अध्ययन-अध्यापन की गति को तेज किया जाए तथा दोनों देशों के साहित्यकार, विचारक, संगीतकार, नाटककार एवं अभिनेता आदि तक दूसरे देश की यात्रा करें और दोनों देशों की जनता के बीच सौहार्द्र एवं सद्भावन बढ़ाएँ।

हिंदी की मूरति[सम्पादन]

तुलसी ने प्रभु के लिए लिखा है, 'जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी'। आजकल हिन्दी भी प्रभु की मूरति हो गई है और अनेक रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर रही है । किसी के लिए हिन्दी विवशता है, किसी के लिए नौकरी, किसी के लिए अपनी अस्मिता की पहचान का प्रतीक, किसी के लिए अपनी अभिव्यक्ति को रचनात्मक एवं सौंदर्यपूर्ण आकार देने का माध्यम और किसी के लिए राजनीति के अखाड़े में दंगल करने का यंत्रा और मंत्रा । अपनी-अपनी भावना के अनुरूप कुछ हिन्दी के चरणों में नतमस्तक हैं और कुछ के चरणों में हिन्दी नतमस्तक है । जिनकी मातृभाषा हिन्दी है, वे इस माता का ऐसे ही उपयोग और तिरस्कार समान भाव से करते हैं जैसे संयुक्त परिवार में रहने वाला विवाहित पुत्रा अवसरानुसार एवं निर्देशानुसार करता है तथा जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं रही है वे अपनी विदेशी हो चुकी मां का सम्मान ऐसे ही करते हैं जैसे हम विदेशी हिन्दी विद्वानों का करते हैं ।

हिन्दी का भी भूमंडलीकरण हो गया है । हिन्दी मात्रा अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में एक भाषा ही नहीं है अपितु वह बाजार को विवश कर रही है कि वह उसकी ताकत को स्वीकारे । कभी भाषा और पानी कुछ कोस बाद बदल जाते थे परन्तु आज हालात यह हैं कि हर कदम पर बोतल में बंद एक ही स्वाद से युक्त तथाकथित मिनरल जल मिलता है और दिल्ली जैसे नगर के किसी भी कोने में एक साथ हिन्दी के अनेक रूप कानों में रस घोलने लगते हैं। दूरदर्शन पर ही लगता है कि जैसे प्रत्येक चैनल की हिन्दी अपना ही इस्टाईल मार रही है । विज्ञापनों की भाषा, समाचारों की भाषा, धारावहिकों की भाषा और हिन्दी फिल्मों से अपनी रोजी - रोटी ( ! ) चलाने वाले बेचारे हीरो हिरोईन की कब्जीयुक्त हिन्दी-भाषा ने आपके कानों में अनेक प्रकार के रस घोले ही होंगें । वैसे तो आपके पब्लिक स्कूली होनहार की अध्यापिका या अध्यापक आपसे हिन्दी में बात करके अपना स्तर नहीं गिरायेगी  गिरायेगा और अगर उसने गिरा भी लिया तो जो हिन्दी उनके श्रीमुख से निकलेगी उसे सुन आप ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि हिन्दी का जो होना है हो, भाषा के कारण इनका स्तर न गिरे । सरल आसान आम आदमी की भाषा आदि के नाम पर हिन्दी से जो बलात्कार हो रहा है उसे एक अच्छे नागरिक की तरह आप नज़र अंदाज कर ही रहे होंगें । 'चैनली हिन्दी समाचारों' में भाषा की सरलता के नाम पर जो अंग्रेज़ी का कुमिश्रण होता है उसे देखकर तो यही लगता है बेचारी हिन्दी बहुत गरीब है जिसके पास शब्द नहीं हैं और समर्थ अंग्रेज़ी कितनी उदार है कि वह हिन्दी को शब्द दे रही है । मैंनें अनेक हिन्दी समाचारों में 'आसान हिन्दी' के नामपर अंग्रेज़ी शब्दों का जो मिश्रण देखा है उससे तो अनेक बार भ्रम होने लगता है कि यह समाचार हिन्दी के हैं या अंग्रेज़ी के । फिर मेरा देसी मन मुझे डांटता है कि रे जड़ तूने कभी अंग्रेज़ी के समाचारों में हिन्दी के वाक्यों को सुना है जो ऐसी शंका करता है । अंग्रेज़ों ने हमपर शासन किया था कि हमने उनपर ! आज जो वे अपने माल को बेचने के लिए तेरी तुच्छ हिन्दी का प्रयोग कर रहे हैं, तेरी हिन्दी को अपनी अंग्रेज़ी से समृद्ध कर रहे हैं तो तूं उनका अहसान मान और नतमस्तक हो जा । अंग्रेज़ी बोलने में जो गौरव है वो हिन्दी बोलने में कहाँ । दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ते समय मैंनें अक्सर अनुभव किया कि विद्यार्थी हिन्दी और उसके पढ़ाने वाले को बहुत फालतू-सी वस्तु समझते हैं ।

अत: आज से चार वर्ष पूर्व जब मुझसे कहा गया कि मैं सुदूर, सहस्त्रों मील लांघकर, वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाने जाउँ तो मेरा चौकना स्वाभाविक था । मैं वेस्ट इंडीज को क्रिकेट की शब्दावली में जानता था और त्रिनिडाड का नाम मैंनें 1996 में होने वाले विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर 'गगनांचल ' के विशेषांक की तैयारी के लिए सामग्री संकलित करते हुए कुछ जाना था । कुछ - कुछ जाना कि वहाँ 46 प्रतिशत जनसंख्या भारतीय मूल के लोगों की है, जाना कि वहाँ भारतीय संस्कृति और हिन्दी भाषा के लिए भूख है । उस देश के बारे में उत्सुकता जागी और धीरे-धीरे समय के आवरण ने उसे ढंक दिया । परन्तु तीन वर्ष बाद ही जब वहाँ जाने का अवसर मिला तो अनेक उत्सुकताओं ने प्रच्छन्न प्रश्नों से घेर लिया । शब्द किसी भी स्थल का खाका तो खींच सकते हैं और उन शब्दों से हम किसी भी स्थल को शब्द-शिल्पी की दृष्टि से जान सकते हैं परन्तु उसे अपने अनुभव का हिस्सा तो हम उसे अनुभूत करके ही बना सकते हैं ।

बीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्ष के प्रथम माह, 13 जनवरी, 1999, में जब मैं त्रिनिडाड के लिए चला तो एक लम्बी हवाई-यात्रा के सुखद अनुभव पाने की कल्पना से अधिक भरा हुआ था और अपनों से दूर एक अनजान देश जाने की आशंका से कम । वहाँ जाकर हिन्दी ही तो पढ़ानी थी जिसे मैं पिछले 27 वर्षों से पढ़ाता रहा हूँ और एक ऐसे देश में ही तो रहना था जहाँ 46 प्रतिशत भारतीय मूल के लोग हैं । इसमें आशंका का क्या प्रश्न ! परन्तु अनेक बार जो चीजें सरल लगती हैं वही बहुत कठिन होती है । पहली बार अनुभव हुआ कि आप अपनों से जितना दूर जाते हैं उतना ही उनके करीब हो जाते हैं । पहली बार जाना कि अपने देश की मिट्टी गंध क्या होती है । मैंनें अपने इस अनुभव को अपने एक लेख में लिखा भी है कि संतों का कहना है कि पहला प्यार, पहला भ्रष्टाचार, पहली रचना, पहला पति/पत्नी, अर्थात् जो भी पहला हो वह सदा याद रहता है । सन् 1999 से के आरम्भ में मेरे जीवन में बहुत कुछ पहला- पहला घट गया । यह पहला अवसर था कि मैंनें हजारों किलोमीटर की हवाई यात्रा की और पहली बार त्रिनिडाड पहुंच गया । यह पहला अवसर था कि मैं स्वदेश, स्वजन, स्वपत्नी, स्वमित्रों आदि ‘स्वों’ से दूर एक लम्बे अंतराल के लिए भीड में भी अकेला रहने को विवश हुआ । ऐसी 'पहली' उर्वर-भूमि उपस्थित हो तो त्रिनिडाड जैसे देश से पहली नजर में प्यार होना स्वाभाविक ही है । प्रथम- प्रेम दृष्टि में ऐसी धुंध उत्पन्न करता है कि दूर दृष्टि धुँधला जाती है और सावन के अंधे सा व्यक्ति सब कुछ हरा ही देखता है । भारत से बाहर निकलते ही मन हिन्दी और हिंदुस्तान के लिए भावुक हो जाता है । विदेश में कोई भारतीय चेहरा दिखाई दे तो मन उसे लपककर पकडना चाहता है और यदि 'एतराज' न हो तो गले भी लगाना चाहता है । टूटी-फूटी ही सही, हिन्दी सुनने को मिल जाए तो मन गदगद हो जाता है । ऐसी ही भावुकता ने मेरे मन मे भी जन्म ले लिया । (ऐसे जन्म देने के लिए अपनी धरती बहुत उपजाउ है ।) त्रिनिडाड हवाई अड्डे पर मुझे भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों के अतिरिक्त वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय के डीन श्री विष्णुदत्त सिंह भी लेने आए थे । मैंने जब यह नाम सुना तो लगा कोई अपना मिल गया । कार में बैठा तो 'बैजू बावरा' फिल्म के गीत, 'तू गंगा की मौज मैं जमुना का धारा' ने किया । मन झूम उठा । मैंनें सोचा कि यह एक भारतीय के स्वागत का त्रिनिडाडीय तरीका हो सकता है - गाने का टेप लगा दिया ।

त्रिनिडाड पहुँचने पर मुझे लगा कि मेरे सामने अनेक चुनौतियाँ हैं । यहाँ हिन्दी पढ़ाना ऐसा नहीं है जैसे मैं भारत में, एक बन बनाऐ ढर्रे पर, पढ़ाता रहा हूँ । अनेक विसंगतियों से भरा है यहाँ का भारतीय समाज । यहाँ के निवासी चाहे भारतीय मूल के हैं : रोटी, करेली, बैंगन, निमकहराम, चोखा, आदि दैनिक व्यवहार में हिन्दी के शब्द हैं, परन्तु हिन्दी उनके दैनिक व्यवहार की भाषा नहीं है । हिन्दी के शब्द एफएम स्टेशनों के द्वारा हिन्दी फिल्मों के गीतों के रूप में चौबीसों घंटे हवा में तैरते हैं परन्तु उनके अर्थ समझने वाले एक प्रतिशत लोग भी नहीं हैं । हर त्यौहार पर मन्दिरों में लोग बढ़ी श्रद्धा से भजन गाते हैं, भारतीय संगीत प्रत्येक कार्यक्रम का अभिन्न अंग है और उसकी धुन उनके हृदयों का स्पर्श अवश्य करती है परन्तु अर्थ उन तक पहुँच नहीं पाते हैं । पिछले लगभग पन्द्रह वर्षों से भारत से हिन्दी के अध्यापक विश्वविद्यालय निहरेस्ट में हिन्दी पढ़ाने आ रहे हैं परन्तु हिन्दी के कदम आगे नहीं बढ़ रहे हैं । हिन्दी के अनेक ऐसे छात्रा हैं जो हिन्दी के प्रति अपनी असीम भूख के कारण एक ही पाठयक्रम को बार- बार पढ़ रहे हैं, क्योंकि उनके लिए उच्च शिक्षा का पाठयक्रम ही नहीं है । निश्चित पाठयक्रम पर आधारित हिन्दी की नियमित शिक्षा मात्र वेस्ट इडीज विश्वविद्यालय में दी जाती है और यह शिक्षा भी प्राथमिक-स्तर की है । अतिथि आचार्यों ने पाठयक्रमों में बदलाव के प्रयत्न किए पर वह सम्भव नहीं हुए । तुलसी और कबीर के प्रशंसकों के इस देश में इनके साहित्य की शिक्षा का कोई प्रबंध नहीं । किसी भी भाषा के शिक्षण के लिए उस भाषा का माध्यम के रूप में प्रयोग होना चाहिये परन्तु यहाँ अंग्रेज़ी की बैसाखी की आवश्यकता है । अनेक वर्षों तक हिन्दी का अध्ययन करने के पश्चात् भी ट, ठ, ड आदि का उच्चारण एवं ड़ के स्थान पर र का उच्चारण आदि अनेक समस्याएं थी जो अपना समाधान चाहती थीं ।

कुछ महीनों में मुझे समझ आ गया कि इनकी हिन्दी का विद्वान् बनने में कोई रुचि नहीं है, ये तो बस थोड़ी-सी हिन्दी और थोड़ा हिन्दू धर्म और संस्कृति से संतुष्ट होने वाले जीव हैं । मुझे समझ आ गया कि परम्परागत रूप से मात्रा हिन्दी पढ़ाना ही मेरा धर्म नहीं होगा अपितु भाषा और संस्कृति के दूत के रूप में मुझे कार्य करना होगा । आधुनिक कम्प्यूटर तकनीक का प्रयोग करना होगा । इनके विकास के लिए साहित्य की अहम् भूमिका को पाठयक्रम का हिस्सा बनाना होगा । तुलसी-साहित्य के माध्यम से, भक्ति से साहित्य की ओर उन्मुख कर भाषा के सार्थक रूप से इनका परिचय कराना होगा । भाषा के व्यावहारिक पक्ष पर बल देना होगा ।

मैंनें पाया कि मन्दिरों, रेडियो, वैवाहिक अवसरों और त्योहारों पर हिन्दी के शब्द चाहे सुनाई देते हैं परन्तु हिन्दी बोलने के अवसर न के बराबर हैं । हिन्दी जानने वाला भी हिन्दी बोलने मे संकोच करता है । ज़ोर देने पर, टूटे-फूटे एक दो वाक्य हिन्दी के बोलने के बाद भारतवंशी अंग्रेज़ी पर उतर आते हैं । हिन्दी सब जगह है पर कहीं नहीं है । हिन्दी बोलने वालों के लिए कोई वातावरण नहीं है । आवश्यकता ने एक प्रयोग करवाया, बातचीत सभा का । मई 1999 को अपने अच्छे मित्रा और शिष्य राजन महाराज के सहयोग से 'बातचीत सभा ' का प्रयोग कर डाला। थोड़ी बहुत हिन्दी से लेकर अच्छी हिन्दी जानने वाले प्रत्येक शनिवार शाम का दो - तीन घंटे के लिए एकत्रित होंगे और कैसी भी हिन्दी में कुछ भी बोलेंगे । शर्त यही थी की जो भी बोलेंगें केवल हिन्दी में बोलेंगे । सभी के लिए यह नया और आकर्षक प्रयोग था और वे उत्साही भी थे । 30 के लगभग हिन्दी प्रेमी आए, 16 से 50 वर्ष तक की आयु के । साढ़े पांच बजे आरम्भ हुई सभा बातचीत के अभाव में साढ़े छह बज तक बहुत कठिनाई से खिंचकर समाप्त हो गई । मुझे लगा प्रयोग असफल रहा और कोई नहीं आएगा परन्तु अगले शनिवार 35 लोग आए । हमारी सभा बहुत ही अनौपचारिक रहती, कहानियाँ चुटकले, फिल्मी गीतों के अर्थ, छोटी-छोटी कविताओं तथा मेरी पत्नी के चाय पकौड़े और विभिन्न भारतीय व्यंजनों के कंधे चढ़ी ये बातचीत सभा लगभग दो वर्ष तक चलती रही और सिल्विया मूदी ने अपने सेंटर फॉर लर्निंग लैंग्वेज तथा राजन महाराज जैसे अनेक हिन्दी अध्यापकों ने इसका प्रयोग अपने-अपने क्षेत्रों में किया । इसी प्रकार एक मिनट में आप हिन्दी के कितने शब्द बोल लेते हैं जैसी प्रतियोगिताओं ने हिन्दी को नये रूप में सिखाया । उच्चायोग द्वारा त्रिनिडाड हिन्दी सेवियों को सम्मानित करने के शुभारम्भ ने हिन्दी प्रेमियों में अतिरिक्त उत्साह भरा ।

हिन्दी दिवस को भारतीय उच्चयोग के परिसर के अतिरिक्त रवि महाराज के हिन्दू प्रचार केन्द्र तथा प्रोफेसर हरिशंकर आदेश के भारतीय विद्या संस्थान में आयोजित करना एक अच्छी शुरुआत रही । त्रिनिडाड में हिन्दी की एक मात्रा संस्था 'हिन्दी निधि' है जो चंका सीताराम की अध्यक्षता में सक्रिय है परन्तु प्रो0 हरिशंकर आदेश का भारतीय विद्या संस्थान और रविजी का हिन्दू प्रचार केंद्र हिन्दी के प्रचार - प्रसार में बहुत सक्रिय हैं । प्रो0 आदेश त्रिनिडाड क्या पूरे कैरेबियाई देशों का एक मात्र ऐसा साहित्यिक व्यक्तित्व जो संगीत में भी पारंगत है । उनके लिखे अनेक हिन्दी गीत और भजन त्रिनिडाड और टुबैगो के आकाश मे गूँजते हैं । भारतीय विद्या भवन अनेक स्तरों पर हिन्दी के अध्ययन अध्यापन के पाठयक्रम चलाता है । रवि महाराज ने मेरे साथ मिलकर मई 2002 में त्रिनिडाड में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के सफलतापूर्वक सम्पन्न होने पर योजना बनाई थी कि उन्हीं दिनों आरम्भ हुए 'शक्ति' एफएम चैनल पर प्रति रविवार दस मिनट के हिन्दी में समाचार प्रसारित किए जाएं परन्तु कुछ कारणों से वह योजना सफल नहीं हो पाई । भारतीय उच्चायुक्त विरेन्द्र गुप्ता ने त्रिनिडाड वासियों का हिन्दी फिल्मों गीतो और भजनों के प्रति प्रेम और उन्हें समझ न पाने की विवशता को देखते हुए सौ लोकप्रिय गीतों के अनुवाद उच्चायोग द्वारा प्रकाशित करने की योजना बनाई है ।

सूरीनाम, फिजी, गुयाना, जमैइका, मॉरिशस, त्रिनिडाड और टुबैगो आदि ऐसे देश हैं जहाँ रहने वाले भारतवंशियों का चरित्र बहुत कुछ एक जैसा है । आर्थिक परिस्थितियों की विवशता में अपनों से दूर गए इन भारतवंशियों ने इन देशों में एक ऐसे लघु भारत का निर्माण किया है तथा भाषा और संस्कृति को जो जिंदा रखा है, इसके कारण इन पर गर्व होता है । बाहर से देखने पर इनमें एक यह समानता दिखाई देती है । परन्तु जैसे वेस्ट इंडीज क्रिकेट शब्दावली में एक है परन्तु अर्थव्यवस्था की और राजनैतिक व्यवस्था भिन्न है वेसे कैरेबियाई देशों में भारतीय संस्कृति, धर्म और हिन्दी के प्रति भूख तो एक जैसी है पर ग्रहण और प्रस्तुति के स्तर पर भिन्नताएं भी है । हिन्दी की जो स्थिति गुयाना में है वो सूरीनाम में नहीं और जो सूरीनाम में है वो त्रिनिडाड में नहीं । कैरेबियाई देशों में हिन्दी का स्वर मुख्य रूप से सूरीनाम, गुयाना, जमैइका और त्रिनिडाड टेबैगो में तो सुनाई देता है ही साथ ही गुऑडलूप, बारबोडॉस, कुरासॉव जैसे अनेक छोटे द्वीपों में भी सुनाई देता है । पर एक बात इन सभी देशों में समान रूप से पाई जाती है, भाषा और संस्कृति के प्रति अनन्य भूख और सम्मान का भाव । यहाँ हिन्दी बोलने वाला शर्मिंदा नहीं होता है अपितु गर्व से सर उठता है । हिन्दी के अतिथि आचार्य के के रूप में सम्मान और प्रतिष्ठा मुझे अपेक्षा से अधिक मिली है ।

इस क्षेत्र में हिन्दी व्यावसायिक दृष्टि से भी अपनी भूमिका निभा रही है, परन्तु इसकी मात्रा बहुत कम है । हिन्दी के प्रति भूख के कारण हिन्दी अध्यापको की पर्याप्त मांग है, परन्तु यह मांग हिन्दी-अध्यापन को दिशाहीन भी कर रही है । मात्र दो-तीन वर्ष तक हिन्दी का अध्ययन करने वाला विद्यार्थी हिन्दी का अध्यापक बन जाता है और बिना किसी उचित प्रशिक्षण के पढाना आरम्भ कर देता है । अधिकांक्ष हिन्दी अध्यापक बिना किसी नियमित पाठयक्रम तथा पाठय पुस्तक के पढ़ा रहे हैं । अधिकांश उपलब्ध पाठय-पुस्तकें भारतीय परिवेश को ध्यान में रखकर लिखी गई हैं, स्थानीय चरित्र के अनुरूप पाठय-पुस्तकों को तैयार करवाया जाना बहुत ही आवश्यक है । उच्चारण पर ध्यान नहीं दिया जाता है। अत: इस क्षेत्र के हिन्दी अध्यापकों के लिए समुचित प्रशिक्षण के साथ-साथ नियमित पाठयक्रम की अत्यधिक आवश्यकता है।    आवश्यकता है इन क्षेत्रों में हिन्दी के कार्यक्रमों को दिशा देने की । कैरेबियाई क्षेत्रों में होने वाले सम्मेलन इस क्षेत्र में काम करने वालों का उत्साह बढ़ाते हैं परन्तु आवश्यकता इस बात की भी है कि इन सम्मेलनों को मेलो का रूप देकर ही समापन न किया जाए अपितु उसे सार्थक दिशा दी जाए । संसार को आजादी का संदेश दे सकती है हिन्दी ।

इंदिरा गाँधी[सम्पादन]

मेरे सम्माननीय साथियो,  तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है। मेरा जन्म ऐसी नगरी में हुआ है, जो भारतीय संस्कृति की केन्द्र है और ऐसे समय जब राष्ट्रीयता की हवा जोरों से उठी थी। तब काम अधिकतर उर्दू में होता था और पढ़े-लिखे लोग अक्सर फारसी के आलिम होते थे। उसका असर मेरे दादा और परिवार पर भी था। लेकिन साथ ही उन्होंने हिन्दी के महत्व को उस समय समझा और मोतीलालजी ने अहिन्दी भाषियों के लिए हिन्दी पढ़ाने की पाठशाला का शिलान्यास नासिक में बहुत वर्षों पहले किया था। मेरे पिता जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के पहले भी हिन्दी के लिए बहुत काम किया और देश के स्वतंत्र होने पर हिन्दी के विकास के लिए विद्वानों के परामर्श से अनेक योजनाएं चलाई, जिससे हिन्दी में विश्वकोश, शब्दसागर तथा सैकड़ों ज्ञान-विज्ञान के ग्रन्थ लिखे जा सके।

विश्व हिन्दी सम्मेलन का अपना विशेष महत्व है। यह किसी सामाजिक या राजनीतिक प्रश्न अथवा संकट को लेकर नहीं, बल्कि हिन्दी भाषा तथा साहित्य की प्रगति और प्रसार से उत्पन्न प्रश्नों पर विचार के लिए आयोजित किया गया है।

मुझे खेद है कि इतने वर्ष बीच में बीत गए जब हम मिल नहीं सके। आप सब हिन्दी के प्रेमी और विद्वान् हैं। अपने सामने मुझे बड़े-बड़े कवि, लेखक और दूसरे ऐसे लोग दिखाई पड़ रहे हैं। आप में से बहुत से ऐसे भी होंगे जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है। भारत से ही नहीं, संसार के सभी अंचलों से हिन्दी प्रेमी यहां एकत्रित हुए हैं और आप देख रहे हैं कि यह हाल कैसे भरा हुआ है। मैं आप सबका हार्दिक स्वागत करती हूं। हिन्दी हमारी राजभाषा और विश्व-भाषा है। सबके मन में लालसा है कि हिन्दी एक महान भाषा बने।

विदेशों में हिन्दी अधिकतर हमारे मजदूर भाइयों-बहनों के साथ गई। उनकी यह सांस्कृतिक धरोहर रही और अपने सत्व से वहां कायम रही। हिन्दी का जन्म संस्कृत और जनता की आम भाषा के मिलने से हुआ। इस भाषा को अहिन्दी भाषा-भाषियों ने संवारा और बढ़ाया। केशवचंद्र सेन, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी जैसे अहिन्दी भाषा-भाषी महान पुरुषों ने इसका प्रचार किया और इसे बल दिया। विदेशी विद्वानों ने भी इसकी सेवा की और ग्रियर्सन जैसे व्यक्तियों ने हिन्दी में ज्ञान का खजाना बढ़ाया। महात्मा गांधी ने कहा है कि यदि भारत को एक राष्ट्र बनना है तो चाहे कोई माने या न माने, राष्ट्र भाषा तो हिन्दी ही बन सकती है। तमिल के महाकवि सुब्रह्मण्य भारती ने भी राष्ट्र की एकता के लिए राष्ट्रभाषा हिन्दी पर जोर दिया।

हमारे स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दी, उर्दू तथा भारत की दूसरी भाषाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। देश के निर्माण के लिए इस भूमिका को और बढ़ाना है। विदेशों के लिए इसे प्रेम और सद्भाव की वाहिका बनाना है। हमारे कवियों और साहित्यकारों ने जेलों में भारतीय भाषाओं और हिन्दी-उर्दू के गीत गा और सुनकर प्रेरणा ली और दी तथा कभी न बुझनेवाले स्वतंत्रता के दीप में स्नेह-दान किया।

भारत में अनेक भाषाएं हैं। हिन्दी के प्रेमी यह जानते हैं कि ये सब आपस में बहनें हैं। जितना ही इनमें स्नेह और समझ बढ़ेगी उतना ही हिन्दी को बल मिलेगा और दूसरी भाषाओं को भी।

गांधीजी ने कहा था कि 'हिन्दी के जरिए प्रांतीय भाषाओं को दबाना नहीं चाहता ताकि एक प्रांत दूसरे से सजीव संबंध जोड़ सके।' गांधीजी ने हिन्दी का उपयोग स्वाधीनता संघर्ष की वाणी के रूप में किया। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी भाषा में एक नई जान पड़ी, एक नया तेवर और स्वर पैदा हुआ।

हिन्दी को सभी भारतीय भाषाओं के बीच संपर्क का काम करना है। हिन्दी इसलिए मान्य नहीं हुई कि वह सबसे संपन्न भाषा है बल्कि इसलिए कि अहिन्दी भाषाभाषियों ने इसे अपनाया। उस पर उनका भी स्वत्व और अधिकार है। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखा कि भारतीय भाषाएं नदियां हैं, हिन्दी महा नदी। हिन्दी में यदि और नदियों का पानी आना बन्द हो जाए तो हिन्दी स्वयं सूख जाएगी और ये नदियां भी भरी-पूरी नहीं रह सकेंगी।

आधुनिक युग विज्ञान और तकनीकी का है। इसकी मानव की प्रगति के लिए बहुत आवश्यकता है। ज्ञान दिन-प्रति-दिन तीव्र गति से बढ़ रहा है। हिन्दी में विज्ञान और तकनीकी के साहित्य को बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ाना चाहिए। विश्व का अन्य संपन्न भाषाओं से जितना ज्यादा ज्ञान आएगा उतनी ही जल्दी हिन्दीवाले उसकी जानकारी से लाभ उठा उन्नति कर सकेंगे। इसी कारण आवश्यक है कि हमारे बड़े-बड़े वैज्ञानिक हिन्दी के माध्यम से सोचना और सीखना शुरू करें। मुझे खुशी है कि अब बच्चों के जो कार्यक्रम हैं उनमें इसका अधिक उपयोग हो रहा है। हिन्दी तब बढ़ेगी जब उसमें विज्ञान और ज्ञान का ऐसा साहित्य रचा जाए जिसे विश्व की अन्य भाषाएं ग्रहण करने के लिए लालायित रहें। हिन्दी को गुणों से भरना है और ऐसे विचारों से भरना है कि यह जनता के हित में अधिक से अधिक ज्ञान दे सके।

शब्द को भारत में ब्रह्म कहते हैं। ऐसे ही हिन्दी को व्यापक होना चाहिए। शब्दों का तो बहुत बड़ा खजाना है, किन्तु यह खजाना उपयोगी तभी होगा जब शब्दकोशों में बंद न रहे और उसका प्रयोग हो, हमारे प्रतिदिन के जीवन में। अब हिन्दी में लाखों नए शब्द हैं। इससे हिन्दी का विस्तार स्पष्ट है। हिन्दी का प्रचार-प्रसार तभी संभव है जब इसे सभी लोगों का विश्वास प्राप्त हो और साथ ही हिन्दीभाषी दूसरी भाषाओं को मान दें।

भाषा आदान-प्रदान का माध्यम है। राजनीतिक भेदभाव लाने से उसका महत्व घटता है। इसी प्रकार धर्म के नाम को राजनीति में लाना धर्म को संकीर्ण करता है।

हिन्दी में नवीन विचार, ज्ञान एवं मनुष्य के दु:ख-दर्द का साहित्य बढ़ाना चाहिए ताकि लोगों को उससे संतुष्टि हो और अपनापन दिखे। हमारे देश में त्रिभाषा सूत्र है। मातृभाषा तो आवश्यक है ही, राष्ट्रभाषा अन्य भाषाओं के बीच की कड़ी है और एक बाहरी भाषा अंतरराष्ट्रीय कड़ी के रूप में चाहिए। इससे राष्ट्र की एकता को बल मिलेगा,  अंतरराष्ट्रीय मैत्री बढ़ेगी और संसार से ज्ञान लेने और देने के लिए दरवाजे खुले रहेंगे।

भारत सरकार ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए यथाशक्ति प्रयास किए और कर रही है। हजारों पुस्तकें सरकारी सहायता से लिखी गई और छपीं। पांच-छह लाख पृष्ठों का अनुवाद हुआ। भारत सरकार ने सभी राज्य सरकारों को एक-एक करोड़ रुपये अपनी-अपनी भाषाओं में ज्ञान और विज्ञान के उच्च साहित्य प्रकाशन के लिए दिए जिनसे कई हजार अच्छी किताबें छपीं। सरकार ने वैज्ञानिकों और तकनीशियनों के सहयोग से पांच लाख पारिभाषिक शब्दों का निर्माण कराया, जिनका पुस्तकों में प्रयोग हो रहा है। अहिन्दी भाषा-भाषियों को हिन्दी सीखने के लिए पूरे अवसर दिए जाते हैं। संसार की बहुत-सी भाषाओं और हिन्दी के शब्दकोश विद्वानों द्वारा बनाए जा रहे हैं। इन सब प्रयत्नों से हिन्दी ने प्रगति की है, यद्यपि हमें अभी बहुत कुछ करना है।

भाषा को अपने विकास के लिए केवल सरकार पर निर्भर नहीं रहना है। सभी समर्थ लोगों एवं संस्थाओं को भारत तथा विदेश में प्रचार के लिए सद्भावनापूर्वक प्रयास करते रहना चाहिए। इस समय जैसे कि हमारे शिक्षामंत्री ने कहा है कि संसार के अनेक देशों में और बहुत से विश्वविद्यालयों और संस्थानों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है और हिन्दी पर शोध हो रहा है। अब विश्व में हिन्दी और भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि बढ़ी है। कल ही मैं एक सभा में जा रही हूं जिन्हें 'रोमा लोग कहते हैं' वे लोग समझते हैं कि बहुत वर्ष पहले, सदियों पहले वे भारत से ही निकले और दुनिया के हर भाग में फैले। आज भी उनकी भाषा में बहुत से शब्द हिन्दी, पंजाबी और कुछ दूसरी भारतीय भाषाओं के हैं। लोग भारत और उसके बारे में अधिक जानना चाहते हैं। हिन्दी के पठन-पाठन की कुछ व्यवस्था विदेशों में पहले से ही थी। सैंकड़ों वर्षों से थोड़े से विदेशी साहित्यकार हिन्दी के साहित्य को रच रहे हैं। उन्होंने हिन्दी की पुस्तकों का अनुवाद भी अपने देशों में किया है।

अब चर्चा है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी भी मानी जाए। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी के लिए यह वास्तव में बड़ी बात होगी, किन्तु उससे बड़ी बात यह होगी कि भारत में मौलिक साहित्य इतना आगे बढ़े कि शोध तथा अन्वेषण का वह माध्यम बने और हिन्दी का साहित्य इतनी उच्च-कोटि का हो कि संसार के लोगों को हिन्दी न जानने से अभाव लगे।

भाषा की टेक्नालाजी तेजी से बढ़ रही है। अनुवाद के लिए कप्यूटर आदि का प्रयोग हो रहा है। हिन्दी के वैज्ञानिकों और तकनीशियनों को इस दिशा में समय के साथ ही नहीं, दूर का सोचना चाहिए जिससे हिन्दी और हमारी दूसरी भाषाएं पिछड़ न जाएं।

हिन्दी में पत्रिकाएं और उनके पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी है। सिनेमा और फिल्म-संगीत ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बड़ी सहायता की है। जो पत्र-पत्रिकाएं और फिल्में जनता तक पहुंचती हैं, उन्हें रचनात्मक और गुणात्मक होना चाहिए ताकि भारत जैसे महान देश की सांस्कृतिक चेतना वे प्रकट कर सकें।

हमारी सरकार ने एक हिन्दी विश्व-विद्यालय की स्थापना पर विचार करने के लिए कुछ समय पहले ही कमेटी नियुक्त की थी और मेरी आशा है कि उसका काम तेजी से आगे बढ़ा है।

हिन्दी सारे विश्व में मैत्री और सद्भाव की ध्वजा फहराए। हमारे अमूल्य संदेश-सह-अस्तित्व, शांति और अहिंसा- को दुनिया के दूर से दूर स्थान में फैलाए। यह हम सबकी कामना होगी चाहिए। यही इसकी सार्थकता होगी।

काका साहब कालेलकर कहा करते थे कि 'अहिंसात्मक लड़ाई लड़नेवाली यह भाषा सारे संसार को आजादी का संदेश दे सकती है और दमन के खिलाफ आवाज उठा सकती है।' मैं यह कहूंगी कि विश्व-शांति और दलित मानव के उत्थान में इसकी भूमिका प्रेरणात्मक होनी चाहिए तभी सब मानव जाति की सेवा यह भाषा कर सकेगी।

मैं आशा करती हूँ कि इस सम्मेलन से हिन्दी का अधिक प्रचार होगा और सही मायने में विश्वभाषा हिन्दी बन सकेगी। आप सबका मैं फिर से स्वागत करती हूँ और इस शुभ अवसर पर अपनी शुभकामनाएं देती हूँ। धन्यवाद!   (तीसरे विश्व हिन्दी सम्मेलन में दिया गया अभिभाषण)  

विश्व-हिंदी' के साथ-साथ 'विश्व-नागरी' भी चले[सम्पादन]

( विनोबा भावे )   विश्व बहुत नजदीक आ गया है। छोटा हो गया है। संस्कृत में हमेशा हम कहते हैं- वसुधैव कुटुम्बकम्। मैंने यह कई दफे समझाया है कि 'कुटुम्ब' और 'कुटुम्बकम्' में अंतर है। 'कुटुम्बकम्' यानी छोटा सा कुटुम्ब। पूरे सौर-मंडल में वसुधा का एक छोटा सा कुटुम्ब है। सृष्टि में कई लाख ग्रह हैं। परमात्मा की सृष्टि अनंत है। उनमें एक पृथ्वी है। इसलिए वह हमारा छोटा सा कुटुम्ब है। हम तो विश्व व्यापक हैं। हमारा कुटुम्ब दूर तक फैला है। चंद्र, मंगल, सब हमारे कुटुम्ब में आते हैं। पृथ्वी हमारा छोटा सा कुटुम्ब है- इतनी व्यापक दृष्टि हमारे पूर्वजों की थी। वेद में शब्द आया है- 'विश्वमानुष' अर्थात् 'मैं विश्व मानव हूं।'   आज के इस विज्ञान (साइंस) के जमाने में सारे विश्व को एक छोटा सा कुटुम्ब मानकर चलना पड़ेगा। इसलिए 'बाबा' एक ओर ग्रामदान बोलता है और दूसरी ओर 'जय जगत्'। 'जय भारत' और 'जय हिन्द' अब पुराने पड़ गए हैं। विज्ञान के कारण अब सारे विश्व को एक होना पड़ेगा। संपूर्ण विश्व के साथ संबंध रखना पड़ेगा।   विज्ञान और आत्मज्ञान का संबंध घनिष्ठ होना चाहिए। जैसे मोटर में दो यंत्र होते हैं- एक गति बढ़ाने या कम करने वाला और दूसरा दिशा दिखानेवाला, मोटर के लिए दोनों की आवश्यकता है। तो हमारे लिए गति देने वाला यंत्र है- विज्ञान, और दिशा दिखाने वाला है- आत्मज्ञान- अध्यात्म (spirituality)। आने वाले युग में दो शक्तियां काम करेंगी। इनमें मैंने एक शक्ति और जोड़ दी है।   बाबा का श्लोक है-

वेदान्तो विज्ञानः विश्वासश्चेति शक्तयः तिस्त्रः

यासां स्थैर्ये शांति समृद्धि भविष्यति जगति।   विश्वास तीसरी शक्ति है। विश्वास की शक्ति अहिंसा जैसी है। जो हिंसा करेगा उसे हम अहिंसा से जीतेंगे। उसी प्रकार अविश्वास को विश्वास से जीतना है। सामनेवालाहम पर जितना अविश्वास करेगा, हम उस पर उतना अधिक विश्वास करेंगे। वह हमें कतल करने को तैयार हो जाए, तो उससे कहना चाहिए- मैं तुम्हारी गोद में सो जाऊंगा, ताकि तुम्हें कतल करने के लिए दूर न जाना पड़े। मैं मर जाऊंगा तो भी मैं अपना विश्वास नहीं छोड़ूंगा। तात्पर्य यह है कि तीनों शक्तियों का विकास होगा, तब दुनिया में शांति होगी- एकता होगी।  

हिन्दी

विश्व हिन्दी सम्मेलन हो रहा है- यह बड़ी प्रसन्नता की बात है। यूनो (UN) में स्पेनिश को स्थान है, अगरचे स्पेनिश बोलने वाले 15-16 करोड़ ही हैं। हिन्दी का यूनो में स्थान नहीं है, यद्यपि उसके बोलनेवालों की संख्या लगभग 26 करोड़ है।   (इसका कारण यह है कि बिहारवालों ने अपनी भाषा सेंसस में मैथिली, भोजपुरी लिखी है। राजस्थानवालों ने अपनी भाषा राजस्थानी बनाई है। इन कारणों से हिन्दी बोलने वालों की संख्या 15 करोड़ रह गई। अगर हम इन सबकी गिनती करते तो हिन्दी बोलने वालों की संख्या कम से कम 22 करोड़ होती। इसके अलावा उर्दू भी एक प्रकार से हिन्दी ही है, जिसे बोलने-वालों की संख्या करीब चार करोड़ है)।   इंग्लिश बोलनेवालों की संख्या 30 करोड़ है। चीनी भाषा 70 करोड़ लोग बोलते हैं- ऐसा यूनो में लिखा गया है। सत्तर करोड़ की वह भाषा मानी जाती है। यह उनकी (चीनी बोलनेवालों की) कुशलता है। चीन में कम से कम 30-40 भाषाएं हैं। परंतु उन सबकी लिपि चित्रलिपि है। उसके साढ़े तीन-चार हजार चित्र हैं। उन चित्रों के अनुसार वे अपनी-अपनी भाषा पढ़ लेते हैं। कोई भी समझ सकता है कि इतने लंबे-चौड़े प्रदेश में एक भाषा हो ही नहीं सकती।   इसका अर्थ यह हुआ कि दुनिया में बोलनेवाले लोगों की संख्या की दृष्टि से नंबर एक हैं- इंग्लिश बोलनेवाले और नंबर दो हैं- हिन्दी बोलनेवाले।  

देवनागरी

'विश्व-हिन्दी' के साथ-साथ 'विश्व-नागरी' भी चले। इस काम में देर करने की आवश्यकता नहीं है। कुछ लोगों का विचार है कि इस दिशा में हमको धीरे-धीरे आगे बढ़ना होगा, जिससे कुछ भय मालूम न हो। मैं ऐसा नहीं मानता। देवनागरी लिपि, हिन्दी की ही लिपि न मानी जाए। वह 'संस्कृत लिपि' है- ऐसा माना जाए। संस्कृत, मराठी, हिन्दी, पालि, मागधी, अर्धमागधी, नेपाली- इन सभी भाषाओं की लिपि देवनागरी है। जब संस्कृत विश्व-भाषा बनने की योग्यता रखती है, तो उसकी लिपि देवनागरी को 'विश्व-नागरी' के रूप में फैलाने में किसी बाधा का भय क्यों होना चाहिए? विश्व की तमाम भाषाएं यदि देवनागरी अथवा विश्व-नागरी लिपि में भी लिखी जाने लगें, तो 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का स्वप्न शीघ्र साकार होगा।   संस्कृत भाषा के लगभग 3000 शब्द इंग्लिश में कुछ बदले हुए रूप में विद्यमान हैं। मदर (माता), फादर (पिता), ब्रदर (भ्रातृ), नोज (नासा) आदि। नी (जानु)- 'नी' में 'के' का उच्चार नहीं होता। वास्तव में वह 'क्नी' है। अंग्रेजी के अनेक शब्द धातु संस्कृत से बने हैं।   जापानी भाषा में भी लगभग 300-350 संस्कृत शब्द मुझे मिले हैं। अपने कोश में मैंने उन पर चिन्ह लगा दिया है। अन्य कई भाषाओं में भी संस्कृत शब्दों की कमी नहीं है। इसलिए जब हम हिन्दी को 'विश्व हिन्दी' बनाने की कल्पना करते हैं, तब देवनागरी लिपि को भी 'विश्व नागरी' बनाने की बात सोचना उचित ही माना जाएगा।   (यह आलेख प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर पढ़ा गया था । विनोबाजी उक्त सम्मेलन में स्वयं उपस्थिति नहीं पो पाये थे सो उन्होंने इसे अपने संदेश के रूप में भेजा था। )    

समापन समारोह है, तो मन भारी है[सम्पादन]

( महादेवी वर्मा   )   आज समापन-समारोह है। यानि आज जा रहे हैं तो मन भारी है। विदा अच्छी लगती नहीं है, लेकिन क्या करूं विदा में ही मुझे बोलना है। मैं प्रयाग की पुण्यभूमि से आई हूं, जहां यमुना, गंगा में विलीन हो जाती है। अंत:शरीरा सरस्वती अपना परिचय नहीं देती और रहती है साथ, क्योंकि यह तो साक्षात् मिलनभूमि है और आज भी एक प्रकार का पर्वस्थान है। तीर्थ है जिसमें हम सब मिले हैं।

देखिए, देश तो भिन्न हो सकते हैं जैसे फूल रंगों से भिन्न होते हैं। आकृति में भिन्न होते हैं। परन्तु उनके सौरभ को मिलने से कोई रोक नहीं सकता। वह एक होता है। इसी तरह हमारा स्नेह, हमारा सौहार्द्र, हमारी बंधुता एक है और इसी कारण विदेश से इतने बंधु आ गए हैं हमारे प्रेम के कारण, हिन्दी प्रेम के कारण। उन सबका मैं अभिनंदन करती हूं। उन सबको अपनी वंदना देती हूं।

भारत बड़ा राष्ट्र है और उसके एक-एक भूखंड में एक-एक देश है, लेकिन बड़े राष्ट्र को जोड़ने के लिए, एक रखने के लिए, संवाद के लिए हमको एक भाषा चाहिए। बिना इसके नहीं चलेगा। और वह भाषा हिन्दी हो सकती है। हिन्दी सच्चे अर्थ में भूमिजा है, वाटर वर्क्स नहीं है। वह दूब है जिसको लेकर हम संकल्प करते हैं। वास्तव में हिन्दी की विशेषता देखकर ही उसे देश की राजभाषा का पद दिया गया था। अब संयोग ऐसा हुआ है कि वह बेचारी वहीं है और अंग्रेजी प्रेत की तरह हमारे सिर पर सवार है। और हमारा शासन और विचित्र है। वह कहता है भाषा को पहले समर्थ बनाओ। इससे अद्भुत कुछ बात नहीं है। प्रयोग में बिना लाए कोई भाषा समर्थ कैसे होती है। भाषा का समर्थन रूप प्रयोग में आने पर ही होता है। हमने क्या किया है कि घोड़े को गाड़ी के पीछे बांध दिया है और कहते हैं गाड़ी चलेगी। वह कभी नहीं चलेगी। न सौ वर्ष, न दो सौ वर्ष। कभी नहीं चलेगी। अब सब कहते हैं, अरे आपके पास तो साहित्य नहीं है। विज्ञान का ज्ञान जब हो जाएगा तब देखा जाएगा। मैं आपको इतना बताती हूं कि हर विभाग के लिए इतनी पुस्तकें, इतनी सहायिकाएं छप चुकी है कि कोई भी अगर थोड़ा कष्ट उठाकर उनका प्रयोग करना चाहे तो कर सकता है। लेकिन हमारी पुस्तकों को कोई देखता नहीं है।

देखिए, बैंकिंग का सारा काम, पारिभाषिक शब्दावली हमारे पास है। न्याय कहता है सब कुछ हमारे पास है। डाकखाने का समय और कार्य सब है, लेकिन कौन देखे, उसको कोई देखता नहीं है। जाएं तो देखिए कि वहां सब साहित्य है, विधि का सारा साहित्य है, लेकिन टंकण नहीं है। टाइपराइटर नहीं है।   अच्छा और देखेंगे। अंग्रेजी में निर्णय लिया जाता है। हिन्दी में लिख सकता है, लेकिन नहीं लिखता है। बेचारा जो न्यायालय में जाता है, वह वकील से हाथ जोड़ता हुआ घूमता है, क्या हुआ, वकील साहब हारे या जीते। कौन क्या बोला- वह नहीं जानता और किसी कार्यालय में दो-चार जो हिन्दी में काम करते हैं, वह पूरी वर्णव्यवस्था में मानों शूद्र हैं। सब उनको हीन मानते हैं, छोटा मानते हैं। जितनी प्रतियोगिताओं की परीक्षाएं होती हैं, प्रश्नपत्र अंग्रेजी में आते हैं। आप हिन्दी में काम कीजिए, परीक्षा अंग्रेजी में दीजिए।

तो वास्तव में अंग्रेजी के प्रेत से हमें मुक्ति कैसे मिले। आपके संकल्प से हो सकती है। जो आपको मैं इतना ही कहती हूं कि आप यह न सोचिए कि भाषा समर्थ नहीं है। समर्थ है वह। उसके ज्ञान, विज्ञान और जितनी विधियां है, आप देखा कीजिए- हरेक तहखाने में भरे हुए हैं, तल भरे हुए हैं। कोई देखता नहीं क्या होता है उनका। और आप सोचिए कि एक विधि पर वह पुस्तक लिखता है। बेचारा मर-मरके लिखता है, भूखा मरके लिखता है और वह आपके कटघरे में बंद है, बाहर आती नहीं है। तो एक बात यह भी मान लीजिए। हमको लेखा-जोखा बताइए कितनी पुस्तकें कितने पारिभाषिक शब्द छप चुके हैं। एक बार आप लेखा-जोखा ले लीजिए। मेरे पास तो बहुत हैं। क्योंकि जो लिखता है, रोता-धोता मेरे पास भेज देता है। मैं कुछ नहीं कर सकती हूं। लेकिन आपस में कहती हूं कि इसको समारोह मत मानिए। मेले में आदमी खो जाता है। एक दिन बहुत अच्छा समारोह करते हैं। आप इतने लोग बैठे हैं, अगर आप संकल्प लें तो कल क्या नहीं हो सकता। लेकिन हम नहीं करते हैं।

तो वास्तव में आज आपके संकल्प का दिन है। मैं यह नहीं मानती कि जब सब विदा हो जाएंगे तो आप कुछ काम करेंगे। करेंगे नहीं कल से खो जाएंगे। और हो सकता है, सात वर्षों में फिर मिलें। यह सात वर्ष का जो अंतर है, वह बहुत भयंकर है। जब हिन्दी को पंद्रह वर्ष के लिए रोका था कि पंद्रह वर्षों के बाद यह भाषा राजभाषा हो जाएगी, तो मैंने टंडनजी से कहा था कि पंद्रह वर्ष तक इसको आप फांसी पर लटकाएंगे और जब उतारेंगे तो कहेंगे आधी मर गई। तो आज ही कीजिए। छोटे-छोटे देशों में देखिए, उन्होंने अपनी भाषा को दूसरे दिन राष्ट्रभाषा बना दिया है।

हम हिन्दी प्रदेशों में भी राजभाषा नहीं बना पाए हैं। और तमाशा है कि उन्होंने हमें उर्दू से उलझा दिया है जिसका कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि हिन्दी- उर्दू दोनों एक भाषा है, वाक्य-विन्यास एक है। व्याकरण एक है, सर्वनाम एक हैं, ग्रंथ एक हैं, एक ही भाषा है। हम संस्कृत लाते हैं, वे फारसी के शब्द लाते हैं। इतना ही अंतर है। अंतर लिपि में है। तो हमारी लिपि नागरी लिपि अधिक व्याकरण सम्मत हैं। विज्ञान के साथ है और विदेशी नहीं है। आपकी उसी ब्राह्मी के क्रम से आई है। वास्तव में हमने लिपि को लेकर के उलझन फिर उत्पन्न कर दी है। देहात में जाकर देखिए तो जो हिन्दू बोलता है, वही भाषा मुस्लिम बोलता है। अब उन्होंने कहा कि नहीं दो भाषाएं हैं। अब इसी को लेकर लड़ाई है। वास्तव में अगर युद्ध ही चलेगा, रात-दिन विवाद चलेगा, विद्रोह चलेगा तो यह देश गूंगा रहेगा और आप जानते हैं न जो गूंगे हैं, वे बहरे भी होते हैं। न वह सुनेगा, न वह बोलेगा। तो जो सुनेगा, बोलेगा नहीं तो आपका इतने बड़े देश का क्या होगा। इसको कौन बांधेगा, कैसे बांधेगा। तो आज जब आप सब इकट्ठे हुए हैं, देख के मन बड़ा प्रसन्न हो जाता है। लेकिन जब शक्ति उसकी देखते हैं, तो लगता है कि अब क्या होगा। यह तो आज सब जगह से बादल घिरा और चला गया बरस के।

तो वास्तव में आपको एक व्रत लेना ही होगा कि हमको अपने राष्ट्र को वाणी देना है, यानी अपने को ही देना है। कोई विचार कोई जनतंत्र बिना भाषा के नहीं आता। तो मुझे जब बहुत आपने अभिनंदन, वंदन दिया तो मैंने कहा कि भई देवता को आपने बाहर कर दिया है और पुजारी को आप अभिनंदन दे रहे हैं। तो हम जो हिन्दी के नाम से बैठे हैं, अगर हिन्दी को लाते नहीं हैं और हिन्दी ऐसे ही रखते हैं, तो हिन्दी के नाम से एक एकत्र होकर क्या करेंगे और जो विदेश के बंधु आए हैं, वे बेचारे मन ही मन क्या सोचेंगे।

हम अक्सर ऐसी बात करते हैं, राष्ट्रसंघ की बात करते हैं उधर की बातें करते हैं। बिना अंतरराष्ट्रीय हुए हम जी नहीं सकते और राष्ट्रीय होने की हमें चिंता नहीं है। तो यह तो ऐसे ही हुआ कि पेड़ को आप काट दीजिए और फिर संगमरमर के चबूतरे पर रोप दीजिए। अंतरराष्ट्रीय वही हो सकती है जिसकी राष्ट्र में जड़ें हों। जिसके राष्ट्र में जड़ ही नहीं है, वह क्या अंतरराष्ट्रीय होगा।

आप ही सोचिए कि आप तो राष्ट्रसंघ में उधार लेकर अंग्रेजी में बोलेंगे। आप कहेंगे राष्ट्रसंघ में कि भारत की भाषा अंग्रेजी है। बताइए लोग नहीं हतोत्साहित होंगे? कहते होंगे इतना विशाल देश और इतना हिन्दी का सौहार्द्र और इसके पास बोलने के लिए कुछ है ही नहीं। यह समुद्र पार से उधार लाकर बोलता है। अब तो ऐसी अच्छी अंग्रेजी नहीं जानता। बल्कि गलत-सलत बोलता है। तो मैं कहती हूं यही हीनता की भावना है। इसको दूर करना चाहिए। पहले इसको आप कर सकते हैं।

जिस दिन आप संकल्प करेंगे, उसी दिन कर देंगे। आपमें असीम शक्ति है। लेकिन आपके पास कोई स्वप्न न हो, कोई आदर्श न हो, आपके पास राष्ट्र की चेतना न हो, तो राष्ट्र कैसे बनेगा। कुछ नहीं बनेगा। बाहर के लोग आ जाते हैं, और आ करके बड़े उदास हो जाते हैं। स्नेह के मारे आ जाते हैं, हमारे सौहार्द्र के नाते आ जाते हैं और आके यहां बड़े उदास हो जाते हैं। जब मुझे बोलते हैं, तो यहीं बातें कहते हैं कि हम क्या करें। हमसे तो कोई हिन्दी में बोलता ही नहीं। जहां बात करते हैं, वहां अंग्रेजी ही आ जाती है। हम लोग आज तक अपनी उस हीनता की भावना को नहीं भूले हैं।

इतने साल हो गए हैं, अभी हमारी हीनता नहीं गई और जब तक नहीं जाती तब तक राष्ट्र अपने वर्चस्व को नहीं पाता। अस्मिता को नहीं पाता।

विश्व में उसकी वाणी को कैसे कौन सुनेगा, जब उसके पास कोई भाषा नहीं है। यह कहना कि जब इसमें विज्ञान लिखा जाएगा, जब इसमें ज्ञान लिखा जाएगा, तब वह हो जाएगा। आप देखिए तो क्या इसमें लिखा गया है। किसी ने देखा है, कोई पढ़ता है, हिन्दी की पुस्तक। कभी नहीं पढ़ता। आप देखिए जरा, तो आप जब जानते ही नहीं हैं, तो वही मेरी बात आ जाती है कि गाड़ी के पीछे आप घोड़े को बांध दीजिए। गाड़ी चलेगी? कभी चलेगी नहीं। मैं यही कहती हूं कि यह समय का संकेत है। अधिक बात करना भी कठिन है। आप इतने थक गए हैं, मैं स्वयं भी थक गई हूं। लेकिन आपसे कहती हूं कि एक व्रत आपको लेना है। संकल्प आपको लेना है। मंदिर की मूर्ति अगर खंडित हो जाती है तो उसे हम फेंक देते हैं, पूजा नहीं करते। परन्तु हम अपने टूट संकल्पों को लेकर पूजा कर रहे हें। हमें दूसरा संकल्प लेना चाहिए और सोचना चाहिए कि अगर हमारे राष्ट्र को वाणी नहीं मिलती हैं, तो हमारा वर्चस्व नहीं है, हमारी अस्मिता नहीं है। फिर हमारा ज्ञान-विज्ञान के लेखन में भी मन नहीं लगेगा। हम लोग आए हैं, विश्वविद्यालयों से पढ़कर लेकिन अगर हम अंग्रेजी में कविता करते तो? वास्तव में वाणी मनुष्य का परिचय है। वाणी राष्ट्र का परिचय है। उसमें उसका व्यक्तित्व है। आप अपने व्यक्तित्व को खंडित मत कीजिए। आपके संकल्प ऐसे हों, आपके स्वप्न ऐसे हों, आपके आदर्श ऐसे हों कि आप राष्ट्र को जोड़ सकें। देखिए, सूर्य के ताप से धरती में बड़ी दरारें पड़ जाती हैं, लेकिन एक बादल जब बरस जाता है तो सब दरारें मिट जाती हैं। ऐसा ही हमारा स्नेह हों, हमारा सौहार्द्र हो, हमारी ऐसी ही बंधुता हो कि हम सब लोगों को मिला सकें और अन्य देशों में भी हमारी बात सुनी जा सके। अब आपको मैं अधिक थकाऊंगी नहीं। आपसे केवल इतना कहती हूं कि यह विदा की बेला है। परन्तु इसको मत मानिए। स्नेह में कोई विदा होती है? लेकिन हमारा सौहार्द्र, हमारा स्नेह, आप ले जाएंगे। हम एक-दूसरे के निकट रहेंगे। मैं समझती हूं अगर आप निश्चय करें तो एक साल में हमको वाणी मिल जाएगी। अगर हम कुछ भी नहीं करेंगे तो हमें अनंत काल तक वह नहीं मिलेगी। इन शब्दों के साथ मैं आपको अपना प्रणाम देती हूं। धन्यवाद।   (तीसरे विश्व हिन्दी सम्मेलन के समापन समारोह में महादेवीजी मुख्य अतिथि थीं।)  

परदेशों में हिन्दी का बढता प्रभाव[सम्पादन]

आज दुनिया का कौन-सा कोना है, जहाँ भारतीय न हों । अनिवासी भारतीय सपूर्ण विश्व में फैले हुए हैं । दुनिया के डेढ सौ से अधिक देशों में दो करोड़ से अधिक भारतीयों का बोलबाला है। अधिकांश प्रवासी भारतीय आर्थिक रूप से समृध्द हैं । 1999 में मशीन ट्रांसलेशन शिखर बैठक में में टोकियो विश्वद्यालय के प्रो. होजुमि तनाका ने जो भाषाई आंकड़े प्रस्तुत किए थे, उनके अनुसार विश्व में चीनी भाषा बोलने वालों का स्थान प्रथम और हिन्दी का द्वितीय तथा अंग्रेजी का तृतीय है ।   हिन्दी विश्व के सर्वाधिक आबादी वाले दूसरे देश भारत की प्रमुख भाषा है तथा फारसी लिपि में लिखी जाने वाली भाषा उर्दू हिन्दी की ही एक अन्य शैली है । लिखने की बात छोड़ दें तो हिन्दी और उर्दू में कोई विशेष अंतर नहीं रह जाता सिवाय इसके कि उर्दू में अरबी, फारसी, तुर्की आदि शब्दों का बहुलता से इस्तेमाल होता है ।  एक ही भाषा के दो रूपों को हिन्दी और उर्दू, अलग-अलग नाम देना अंग्रेजों की कूटनीति का एक हिस्सा था ।   विदेशों में चालीस से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिन्दी पढार्ऌ जा रही हैं । भारत से बाहर जिन देशों में हिन्दी का बोलने, लिखने-पढने तथा अध्ययन और अध्यापक की दृष्टि से प्रयोग होता है, उन्हें हम इन वर्गों में बांट सकते हैं - 1. जहां भारतीय मूल के लोग अधिक संख्या में रहते हैं, जैसे - पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बंगलादेश, म्यांमार, श्रीलंका और मालदीव आदि । 2. भारतीय संस्कृति से प्रभावित दक्षिण पूर्वी एशियाई देश, जैसे- इंडोनेशिया, मलेशया, थाईलैंड, चीन, मंगोलिया, कोरिया तथा जापान आदि । 3.  जहां हिन्दी को विश्व की आधुनिक भाषा के रूप में पढाया जाता है अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोप क देश। 4. अरब और अन्य इस्लामी देश, जैसे- संयुक्त अरब अमरीरात (दुबई) अफगानिस्तान, कतर, मिस्र, उजबेकिस्तान, कज़ाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि ।  

मॉरिशस[सम्पादन]

यहां भारतीय मूल के लोगों की जनसंख्या कुल आबादी की आधे से अधिक है । मॉरिशस की राजभाषा अंग्रेजी है और फ्रेंच की लोकाप्रेम है । फ्रेंच के बाद हिन्दी ही एक ऐसी महत्वपूर्ण एवं सशक्त भाषा है जिसमें पत्र-पत्रिकाओं तथा साहित्य का प्रकाशन होता है । मॉरिशस में भारतीय प्रवासियों का विधिवत आगमन चीनी उद्योग के बचाव तथा उसके विकास हेतु 1834 में शुरू हुआ था । यूरोप में चीनी की बढती मांग को ध्यान में रखकर तत्कालीन प्रशासकों ने भारतीयों को सशर्त यहां लाकर स्थायी रूप से बसने का प्रावधान किया । मॉरिशस में भारतीय प्रवासी वर्ष 1834 से बंधुआ मजूदरों के रूप में आने लगे थे । ये लोग अधिकांशत: भारत के बिहार प्रदेश के छपरा, आरा और उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, बलिया, गोंडा आदि जिलों के थे । भारतीय श्रमिकों ने विकट परिस्थितियों से गुजरते हुए भी अपनी संस्कृति एवं भाषा का परित्याग नहीं किया । अपने प्रवासकाल में महात्मा गांधी जब 1901 में मॉरिशस आए तो उन्होंने भारतीयों को शिक्षा तथा राजनीतिक क्षेत्रों में सक्रिय भाग लेने के लिए प्रेरित किया । हिन्दी प्रचार कार्य में हिंदुस्तानी पत्र का योगदान महत्वपूर्ण है ।   धार्मिक तथा सामाजिक संस्थाओं के उदय होने से यहां हिन्दी को व्यापक बल मिला । वर्ष 1935 में भारतीय आगमन शताब्दी समारोह मनाया गया । उस समय यहां से हिन्दी के कई समाचारपत्र प्रकाशित होते थे, जिनमें आर्यवीर, जागृति आदि उल्लेखनीय है । वर्ष 1941 में हिन्दी प्रचारिणी सभा ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा हिन्दी पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन किया । 1943 में हिन्दू महायज्ञ का सफल आयोजन किया गया। 1948 में जनता के प्रकाशन के माध्यम से दर्जनों नवोदित हिन्दी लेखक साहित्य सृजन  क्षेत्र में आए ।    वर्ष 1950 में यहां हिन्दी अध्यापकों का प्रशिक्षण प्रारंभ हुआ और  1954 से भारतीय भाषाओं की विधिवत पढार्ऌ शुरू हुई।  मॉरिशस सरकार ने स्कूलों में छठी कक्षा तक हिन्दी पढाने की व्यवस्था की । वर्ष 1961 में मॉरिशस हिन्दी लेखक संघ की स्थापना हुई । यह संघ प्रतिवर्ष साहित्यिक प्रतियोगिताओं, कवि सम्मेलनों, साहित्यकारों की जयंतियां आदि का आयोजन करता है । मॉरिशस में हिन्दी भाषा का स्तर ऊंचा उठाने में हिन्दी प्रचारिणी सभा का योगदान अतुलनीय है । यह संस्था हिन्दी साहित्य सम्मेलन (प्रयाग) की परीक्षाओं का प्रमुख केन्द्र है । औपनिवेशिक शोषण और संकट के समय 1914 में हिन्दुस्तानी, 1920 में टाइम्स और 1924 में मॉरिशस मित्र दैनिक पत्र थे । आज मॉरिशस में वसंत, रिमझिम, पंकज, आक्रोश, इन्द्रधनुष, जनवाणी एवं आर्योदय हिन्दी में प्रकाशित होते हैं । वर्ष 2001 में विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना भी मॉरिशस में हो चुकी है ।   

फिजी[सम्पादन]

फिजी दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित 322 द्वीपों का समूह है । यहा के मूल निवासी काईबीती है । देश की आबादी लगभग 8 लाख है । इसमें 50 प्रतिशत काईबीती, 44 प्रतिशत भारतीय तथा 6 प्रतिशत अन्य समुदाय के हैं।  5 मई 1871 में प्रथम जहाज लिओनीदास ने 471 भारतीयों को लेकर फिजी में प्रवेश किया था। गिरमिट प्रथा के अंतर्गत आए प्रवासी भारतीयों ने फिजी देश को जहां अपना खून-पसीना बहाकर आबाद किया वहीं हिन्दी भाषा की ज्योति भी प्रज्जवलित की जो आज भी फिजी में अपना प्रकाश फैला रही है।   फिजी की संस्कृति एक सामासिक संस्कृति है, जिसमें काईबीती, भारतीय, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड के निवासी है । इनकी भाषा काईबीती (फीजियन) हिन्दी तथा अंग्रेजी है । फिजी का भारतीय समुदाय हिन्दी में कहानी, कविताएं लिखता है । हिन्दी प्रेमी लेखकों ने हिन्दी समिति तथा हिन्दी केन्द्र बनाए हैं जो वहां के प्रतिष्ठित लेखकों के निर्देशन में  गोष्ठियां, सभा तथा प्रतियोगिताएं आयोजित करते हैं । इनमें हिन्दी कार्यक्रम होते हैं कवि और लेखक अपनी रचनाएं सुनाते हैं ।   फिजी में औपचारिक एवं मानक हिन्दी का प्रयोग पाठशाला के अलावा शादी, पूजन, सभा आदि के अवसरों पर होता है । शिक्षा विभाग द्वारा संचालित सभी बाह्य परीक्षाओं में हिन्दी एक विषय के रूप में पढार्ऌ जाती है । फिजी के संविधान में हिन्दी भाषा को मान्यता प्राप्त है । कोई भी व्यक्ति सरकारी कामकाज,अदालत तथा संसद में भी हिन्दी भाषा का प्रयोग कर सकता है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में पत्र-पत्रिकाओं तथा रेडियो कारगर माध्यम हैं । हिन्दी के प्रचार-प्रसार में फिजी हिन्दी साहित्य समिति वर्ष 1957 से बहुमूल्य योगदान दे रही है । इस संस्था का मुख्य उद्देश्य है हिन्दी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति को बढावा देना । फिजी में हिन्दी प्रगति के पथ पर है तथा इसका भविष्य उज्ज्वल है ।  

नेपाल[सम्पादन]

भौगोलिक और राजनीतिक दृष्टि से भारत और नेपाल संप्रभु राष्ट्र है, दोनों देशों के बीच पौराणिक काल से संबंध चला आ रहा है, खुली सीमाएं, तीज-ज्यौहार, धार्मिक पर्व-समारोह तथा इन्हें मानाने की शैली और पध्दति की समानता के अतिरिक्त नेपाल में हिन्दी-प्रेम हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए काफी है । नेपाली भाषा हिन्दी भाषी पाठकों लिए सुबोध है । यदि इसमें कोई अंतर है तो लिप्यांतरण का है ।   प्रचीन काल में नेपाली में संस्कृत की प्रधानता थी ।  हिन्दी और नेपाली दोनों भाषाओं में संस्कृत के तत्सम और तद्भव शब्दों की प्रचुरता और इनके उदार प्रयोग के अतिरिक्त नेपाली भाषा में अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी एवं कई अन्य विदेशी शब्दों का हिन्दी के समान ही प्रयोग हिन्दी और नेपाली भाषी जनता को एक दूसरे की भाषा समझने में सहायक रहा है ।  प्रारंभिक दिनों में नेपाल के तराई क्षेत्रों में स्कूलों में तो शिक्षा का माध्यम हिन्दी बना । काठमांडू से हिन्दी में पत्र-पत्रिका का प्रकाशन हाता है । प्रख्यात नेपाली लेखक, कहानीकार एवं उपन्यासकार डा. भवानी भिक्षु ने तो अपने लेखन कार्य का श्रीगणेश हिन्दी से ही किया । गिरीश वल्लभ जोशी, रूद्रराज पांडे, मोहन बहादुर मल्ल, हृदयचंद्र सिंह प्रधान आदि की एक न एक कृति हिन्दी में ही है ।  

श्रीलंका[सम्पादन]

श्रीलंका में भारतीय रस्म-रिवाज, धार्मिक कहानियां जैसे जातक कथा का भंडार आज भी सुरक्षित है । श्रीलंका की संस्कृति वही है जो भारत की है । वहां हिन्दी का प्रचार अत्यंत सुचारू एवं सुव्यवस्थित ढंग से होता रहता है । फिल्म प्रदर्शन, भाषण विचार गोष्ठी आदि का आयोजन होता रहता है । भारत से आई पत्र-पत्रिकाओं जैसे बाल भारती, चंदा मामा, सरिता आदि श्रीलंका में बड़े चाव से पढी ज़ाती हैं । श्रीलंका रेडियो पर भारतीय शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम प्रसारित होते हैं । वहां विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाई जा रही है ।  

यू.ए.ई.[सम्पादन]

संयुक्त अरब अमीरात देश की पहचान सिटी ऑफ गोल्ड दुबई से है ।  यूएई में एफ. एम. रेडियो के कम से कम तीन ऐसे चैनल हैं, जहां आप चौबीसों घंटे नए अथवा पुराने हिन्दी फिल्मों के गीत सुन सकते हैं । दुबई में पिछले अनेक वर्षों से इंडो-पाक मुशायरे का आयोजन होता रहा है, जिसमें हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के चुनिंदा कवि और शायर भाग लेते रहे हैं । हिन्दी के क्षेत्र में खाड़ी देशों की एक बड़ी उपलब्धि है, दो हिन्दी (नेट) पत्रिकाएं जो विश्व में प्रतिमाह 6,000 से अधिक लोगों द्वारा 120 देशों में पढी ज़ाती हैं । अभिव्यक्ति व अनुभूति (इंटरनेट) पर भी उपलब्ध हैं । इन पत्रिकाओं की संरचना सही अर्थों में अंतर्राष्ट्रीय है क्योंकि इनका प्रकाशन और संपादन संयुक्त अरब अमीरात से, टंकण कुवैत से, साहित्य संयोजन इलाहाबाद से और योजना व प्रबंधन कनाडा से होता है ।

ब्रिटेनवासियों ने हिन्दी के प्रति बहुत पहले से रुचि लेनी आरंभ कर दी थी । गिलक्राइस्ट, फोवर्स-प्लेट्स, मोनियर विलियम्स, केलाग होर्ली, शोलबर्ग ग्राहमवेली तथा ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने हिन्दीकोष व्याकरण और भाषिक विवेचन के ग्रंथ लिखे हैं । लंदन, कैंब्रिज तथा यार्क विश्वविद्यालयों में हिन्दी पठन-पाठन की व्यवस्था है। यहां से प्रवासिनी, अमरदीप तथा भारत भवन जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है । बीबीसी से हिन्दी कार्यक्रम प्रसारित होते हैं ।

संयुक्त राज्य अमेरिका में येन विश्वविद्यालय में 1815 से ही हिन्दी की व्यवस्था है । वहां आज 30 से अधिक विश्वविद्यालयों तथा अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा हिन्दी में पाठ्यक्रम आयोजित किए जाते हैं । 1875 में कैलाग ने हिन्दी भाषा का व्याकरण तैयार किया था । अमरीका से हिन्दी जगत प्रकाशित होती है ।

रूस में हिन्दी पुस्तकों का जितना अनुवाद हुआ है, उतना शायद ही विश्व में किसी भाषा का हुआ हो। वारान्निकोव ने तुलसी के रामचरितमानस का अनुवाद किया था । त्रिनीडाड एवं टोबेगो में भारतीय मूल की आबादी 45 प्रतिशत से अधिक है । युनिवर्सिटी ऑफ वेस्टइंडीज में हिन्दी पीठ स्थापित की गई है । यहां से हिन्दी निधि स्वर पत्रिका का प्रकाशन होता है । गुयाना में 51 प्रतिशत से अधिक लोग भारतीय मूल के हैं। यहां विश्वविद्यालयों में बी.ए. स्तर पर हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था की गई है । पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू है, जो हिन्दी का ही एक रूप है । मात्र लिपि में ही अंतर दिखाई देता है । मालदीव की भाषा दीवेही भारोपीय परिवार की भाषा है । यह हिन्दी से मिलती-जुलती भाषा है । फ्रांस, इटली, स्वीडन, आस्ट्रिया, नार्वे, डेनमार्क तथा स्विटजरलैंड, जर्मन, रोमानिया, बल्गारिया और हंगरी के विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पठन-पाठन की व्यवस्था है । 

इस प्रकार हिन्दी आज भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के विराट फलक पर अपने अस्तित्व को आकार दे रही है । आज हिन्दी विश्व भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त करने की ओर अग्रसर है । अब तक भारत और भारत के बाहर सात विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं । पिछले सात सम्मेलन क्रमश:  नागपुर(1975), मॉरीशस (1976), नई दिल्ली (1983), मॉरीशस (1993), त्रिनिडाड एंड टोबेगो (1996), लंदन (1999), सूरीनाम (2003) में हुए थे । अगला विश्व हिन्दी सम्मेलन 2007 में न्यूयार्क में होगा । इसके अतिरिक्त विदेश मंत्रालय क्षेत्रीय हिन्दी सम्मेलन का भी आयोजन करता रहा है। अभी तक ये सम्मेलन ऑस्ट्रेलिया और अबूधाबी में फरवरी, 2006 तथा तोक्यो में जुलाई 2006 में किए गए थे । अभी हाल ही में शुक्रवार, 18 अगस्त, 2006 को विदेश मंत्रालय ने हिन्दी वेबसाइट का शुभारंभ किया है। यह वेबसाइट माइक्रोसॉपऊट विंडोज प्रोग्राम और यूनीकोड पर आधारित है । इसे देखने के लिए कोई फॉन्ट डाउनलोड करने की आवश्यकता नहीं है। 

वर्तमान में आर्थिक उदारीकरण के युग में बहुराष्ट्रीय देशों की कंपनियों ने अपने देशों (अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन आदि) के शासकों पर दबाव बढाना शुरू कर दिया है ताकि वहां हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार तेजी से बढे और हिन्दी जानने वाले एशियाई देशों में वे अपना व्यापार उनकी भाषा में सुगमता से कर सकें । अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की प्रगति यदि इसी प्रकार होती रही तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ में एक अधिकारिक रूप हासिल कर लेगी ।

Suggestion:

Why not create a Federation For Simple National Language Script,India?

In the past India has spent so much time in creating new language scripts under different rulers.Now in the internet age some languages may disappear if they are not simplified or made translatable.

As you know that Gujarati Script is a simplified version of Devnagari script without horizontal lines. In fact it’s a developed Devnagari script where you write comparatively lesser times lifting the pen.

Sure,Hindi is spoken by more peoples in India but it’s not technical and very cluttered language with horizontal lines.It’s writings in newspapers look like an old Sanskrit language.If you look all Indian languages in Google Transliteration IME you will find Gujarati script very simple computer-usable language Script.Gujarati alphabet is very very easy for foreigners to learn and practice.

We all know that Devnagari is not the script of Hindi to begin with.Basically it is the script of Sanskrit,unquestionably the language of India,not any region.

Sanskrit language used horizontal lines for grammatical lengthy meaningful words.

Besides languages in a Devnagari script which Indian old or current languages or world languages use horizontal lines to make words more cluttered in appearance?Why draw lines if not needed?

As you know China has simplify it’s language to make it computer usable.Also most of European countries and other world countries use Roman Script for their national languages.

Think,Why most Hindi song lyrics are written in English but not in Hindi?

People don’t mind learning Hindi but India needs one easy Script for all languages and that’s Gujarati Script.But let the people of India decide what they want.

Please do express your opinion about this.