राष्ट्रीय अस्मिता और अंग्रेजी

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लेखक - ऋषिकेश राय

लेखक परिचय : जन्म 13 जून 1967 को गाजीपुर (उ.प्र.) में। शिक्षा-एम.ए. (हिन्दी, इतिहास) पी.एच.डी. अनुवाद में डिप्लोमा। विभिन्न पत्रिकाओं में कविताएं और आलेख प्रकाशित। वर्तमान में भारत सरकार, वाणिज्य मंत्रलय के संस्थान टी बोर्ड में उप-निदेशक (राजभाषा) के पद पर कार्यरत। सम्पर्कः टी.बोर्ड, 14, बी.टी.एम. सरणी (ब्रोबोर्न रोड) कोलकाता-700001, फोन नं. 09903700542


अस्मिता का आधाररूप संस्कृति होती है। भाषा वैज्ञानिकों द्वारा प्रदत्त भाषा की परिभाषाओं में इस संकल्पना की पुष्टि होती है। भाषा ध्वनिरूप होती है एवं किसी सामाजिक समूह की परस्पर अन्तःक्रिया और सहयोग का माध्यम भी। सामान्य व्यवहार में भाषा को सम्प्रेषणीयता का पर्याय समझा जाता है। शब्दों में स्थित प्रतीकात्मकता सम्प्रेषण का आधार है। भाषा सहज स्नायविक नहीं होती। इसकी निर्मिति का रहस्य व्यक्ति के द्वारा उच्चरित रूपों की परम्परित अभिव्यक्ति तथा समाज के अन्य सदस्यों की उन्हें उसी परम्परित अर्थ में ग्रहण करने की स्वीकृति में निहित है। इसीलिए भाषा को अर्जित और सांस्कृतिक कार्य कहा जाता है। मानवता का इतिहास एक सुगठित भाषा को प्रारम्भ से ही आधार बनाकर चला है। इसी कारण वान्द्रिएज ने लिखा है, "मानव का अधिकार भाषा पर न होता तो वह विधि द्वारा नियत जीवन के इतने महत्त्वपूर्ण ध्येय की पूर्ति न कर पाता।"1 समाजों की स्थापना में भाषा का महत्त्व अन्यतम है। विचार की साधना और सहायक भाषा ने ही मानव को स्वत्व की चेतना प्रदान की।

मानवीय चेतना और संस्कृति का विकास भी प्रतीकात्मक ध्वनि व्यवस्था अर्थात भाषा पर निर्भर है। मनुष्य की राजनैतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक उन्नति उसके द्वारा किए गए आविष्कारों पर निर्भर होती है, जिनका निर्माण तथा प्रसार भाषा के माध्यम से ही सम्भव है। भाषा के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया को सरल बनाया जाता है और इस प्रकार जीवन की किसी विधि विशेष की निरन्तरता तथा परिवर्तनशीलता दोनों ही प्राप्त होती है। भाषा समाजीकरण की प्रक्रिया का आधार है। सामाजिक अन्तःक्रियाओं को भाषा के द्वारा ही स्पष्ट तथा मूर्त रूप प्राप्त होता है। भाषा सामाजिक एकीकरण के अभूतपूर्व साधन के रूप में कार्य करती है। किसी समाज में सदस्यों को संगठित करने तथा उनमें एकरूपता लाने के लिए कितनी ही व्यवस्थाओं का निर्माण क्यों न कर लिया जाए भाषा जैसी एकता दूसरी संस्था में सम्भव नहीं। एक समाज में भाषा सभी व्यक्तियों को एक विशेष प्रकार के कार्य तथा व्यवहार करने को प्रोत्साहित करती है। इस तरह भाषा समानता की चेतना उत्पन्न करने का महत्त्वपूर्ण आधार है। भाषा एक ऐसा माध्यम है जो जैविकीय प्राणी को मानवीय प्राणी में रूपान्तरित करती है।

सामाजिक नियंत्रण में भी भाषा की अहम भूमिका होती है। सामाजिक नियंत्रण की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता "भावनात्मक नियंत्रण" की पूर्ति भाषा के माध्यम से बखूबी होती है। यही भावनात्मक नियंत्रण व्यक्तियों में हम की भावना और एक राष्ट्र की भावना को परिपुष्ट करता है। वस्तुतः भाषा के आधार पर सामाजिक एकीकरण का रूप प्रत्येक क्षेत्र में देखने को मिलता है। एक भाषा बोलने वाले व्यक्ति परस्पर मिलकर एक अन्तःसमूह (Ingroup) का निर्माण करते हैं।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भाषा केवल विचारों की अभिव्यक्ति का साधन मात्र नहीं है बल्कि वह स्वयं में एक कथ्य भी है जो सामाजिक अस्मिता और द्वेष का कारण बनता है। उसकी इस भूमिका का कारण उसका जातीय स्मृतियों का अधिकोश होना है। वह पीढ़ियों से उपार्जित ज्ञान तथा रागात्मक संवेदनाओं को उत्तरवर्ती पीढ़ियों को अंतरित करती है। ऐसा करने के क्रम में वह उस भाषिक समुदाय की आत्मिक संस्कृति और जातीय आत्मचेतना का निर्माण करती है। यही आत्मचेतना अस्तित्वगत रूप में अस्मिता का चोला धारण करती है। औपनिवेशिक शोषण एवं दमन के प्रतिरोध में यह अस्मिता जातीय जीवन को नया अर्थ प्रदान करती है एवं सक्रिय रूप में उस जाति के सांस्कृतिक प्रतिमानों और आचरणों में अभिव्यक्ति पाती है। ये सांस्कृतिक प्रतिमान आत्मिक संस्कृति के अभिलक्षण होते हैं जिसे व्याख्यायित करते हुए बोरिस क्लूयेव ने लिखा है "आत्मिक संस्कृति अपने में किसी भी मानव समष्टि की सामूहिक स्मृति में अस्तित्वमान उस सूचना को द्योतित करती है जो पीढ़ी दर पीढ़ी वर्णन और प्रदर्शन द्वारा प्रेषित होती है और आचरण के कुछ रूपों में निर्धारित होती है।"2 भाषा प्रकार्यात्मक रूप से सम्प्रेषण एवं जातीय चेतना के निर्माण के रूप में दोहरी भूमिका का पालन करती है। मनुष्य अपने अनुभव अनुवर्ती पीढ़ियों को सौंपता है जो उसके लिए विरासत का आधार बन जाते हैं। मूल्यों का क्रमिक संचयन समय के साथ स्वयंसिद्ध सत्य का रूप ले लेते हैं। समय बीतने के साथ धीरे-धीरे वे जीवन पद्धति बन जाते हैं। यह जीवन पद्धति अन्य पद्धतियों से भिन्न होती है। किसी भी जातीय समुदाय की विशिष्ट संस्कृति और इतिहास के निर्माण एवं विकास का यही आधार है। इस विशिष्ट संस्कृति में वे सभी नैतिक तथा सौन्दर्यबोधक मूल्य समाहित होते हैं जिनके जरिए विश्व में हम अपने स्थान को निर्दिष्ट करते हैं। अपने स्थान और स्थिति की चेतना ही अस्मिता का निर्माण करती है। इसको स्पष्ट करते हुए न्गुगी वा थ्योंगे लिखते हैं " जनसमुदाय की अस्मिता और मानव समुदाय का सदस्य होने के विशिष्ट बोध का आधार ये मूल्य ही हैं और इन सारे मूल्यों के वाहक का काम भाषा करती है।"3 इस तरह मानव समुदाय की विशिष्टता का बोध पैदा करने के साथ भाषा अपने बोलने वाले समुदाय के चरित्र का प्रतिनिधित्व भी करती है। डब्लू वॉन हम्बोल्ट ने लिखा है "भाषा ज्ञात तथ्यों की अभिव्यक्ति मात्र ही नहीं करती, बल्कि वह तथ्यों का आविष्कार भी करती है"4

इस तरह कोई भी भाषा उस भाषिक समुदाय के मनोमस्तिष्क एवं चिन्तन प्रक्रिया को बहिर्जगत में प्रस्तुत करने का एक सशक्त अभिलक्षण है। स्वयं किसी भाषा का विकास, बहिर्जगत भाषा की प्रकृति तथा जातीय भाषिक समुदाय की विशिष्टताओं की अन्तःक्रिया के फलस्वरूप होता है। इसीलिए कोई भी व्यक्ति जो भाषा पहले सीखता है वह उसके लिए प्राकृतिक होती है। चिन्तन एवं अभिव्यक्ति के लिए किसी दूसरी भाषा की परिकल्पना भी वह नहीं कर सकता।

अर्न्स्ट कैसिरर ने भाषाई मध्यवर्ती विश्व (Linguistic intermediary World) नामक पद का प्रयोग करते हुए भाषा को विश्व दृष्टि नियामक वस्तु स्वीकार किया। उनके अनुसार व्यक्ति की मानसिक क्रियाएं उसकी अपनी व्यक्तिगत विशिष्टताओं की अपेक्षा उसकी भाषा में निहित विश्व दृष्टि द्वारा निर्धारित होती है। विभिन्न समाज अपनी-अपनी भाषा द्वारा निर्मित अलग-अलग दुनिया में रहते हैं। उनकी अवधारणाएं भी अपनी सामाजिक संरचना एवं प्रकारांतर से उनके द्वारा प्रयुक्त भाषा पर निर्भर होती हैं। बेंजामिन ली व्होर्फ के अनुसार "भाषा हमारे विचारों को अभिव्यक्ति ही नहीं देती बल्कि उन्हें रूपायित भी करती है।"5 आत्मिक संस्कृति के रूप में भाषा अपने भाषिक समुदाय की चेतना का निर्माण करती है। भाषा जनता की विशिष्ट सृजनात्मक क्रियाशीलता को प्रदर्शित करने के कारण किसी भी संस्कृति के सर्वाधिक जातीय तत्त्वों में से अन्यतम है। इसको स्पष्ट करते हुए रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव लिखते हैं "भाषा मानसिक संकल्पना होने के साथ-साथ एक सामाजिक यथार्थ भी है। व्याकरणिक इकाई होने के साथ-साथ वह संस्थागत प्रतीक भी है और सम्प्रेषण का अन्यतम उपकरण होने के साथ वह हमारी सामाजिक अस्मिता का एक सशक्त माध्यम भी है।"6 भावना चिन्तन और जीवन दृष्टि का निर्माण करने के कारण भाषा किसी समुदाय को आपस में बांधती है, भाषा की यही शक्ति व्यक्ति "मैं" को समुदाय के "हम" में विस्तारित करती है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भाषा और संस्कृति का घनिष्ठ सम्बन्ध है। बिना भाषा के संस्कृति गूंगी होती है और बिना संस्कृति के भाषा आत्माहीन।

किसी भाषिक समाज से उसकी भाषा को छीन लेना उसकी सांस्कृतिक विरासत से उस समुदाय को रहित कर देना है। संस्कृति के अभाव में कोई भी समुदाय संवेदना विहीन और सर्जनात्मकता से च्युत हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसके समक्ष अपनी जातीय स्मृति से निर्मूलन एवं विसंस्कृतिकरण का खतरा मंडराने लगता है। अपनी सांस्कृतिक साम्राज्यवादी एवं वर्चस्ववादी भूमिका में औपनिवेशिकता अचेतन रूप में संस्कृति परिवर्तन का प्रयास करती हैं उपनिवेशवाद में यह कार्य प्रत्यक्ष रूप से भौगोलिक आधिपत्य के माध्यम से किया जाता है जबकि उत्तर औपनिवेशिक स्थितियों में बौद्धिक उपनिवेशीकरण द्वारा यह प्रक्रिया संचालित होती है। अन्तरराष्ट्रीय व्यापार, तकनीकों का हस्तान्तरण, आधुनिकीकरण के माध्यम के रूप में औपनिवेशिक भाषाओं के प्रचार प्रसार ऐसे तरीके हैं जिनके उत्तर औपनिवेशिक वर्चस्ववादी संस्कृति का प्रसार किया जाता है। इनका उद्देश्य है एशिया अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका के देशों के संसाधनों का योरोप एवं अमेरिका के हित में दोहन। इस वर्चस्ववादी औपनिवेशक संस्कृति के प्रसार में उनकी भाषाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। एशिया एवं अफ्रीका में अंग्रेजी, फ्रेंच एवं पुर्तगाली तथा लैटिन अमेरिका में पुर्तगाली एवं स्पेनी की भूमिका साम्राज्यवादी विचारधारा के पोषक एवं उपकरण की रही है। भारत में अंग्रेजी की भूमिका की विवेचना भी इसी सन्दर्भ में की जा सकती है। भारत में अंग्रेजी की भूमिका को तीन पृथक चरणों में उसके प्रयोग, प्रभाव एवं उद्देश्य को व्याख्यायित करते हुए समझा जा सकता है जो औपनिवेशिकता के विकास तथा इसके समानान्तर अंग्रेजी की परिवर्तनकारी स्थितियों की परिचायक है। पहला चरण भारत में कम्पनी के शासन की स्थापना तथा धर्म प्रचार एवं अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार की कम्पनी की इच्छा से सम्बन्धित है।

शिक्षा माध्यम के रूप में पौर्वात्य एवं पाश्चात्य भाषाओं की उपयुक्तता एवं ज्ञान विज्ञान के साधन के रूप में उनकी महत्ता इस दौर की बहसों के केन्द्र में थे। दूसरा दौर मैकाले एवं कम्पनी के चार्टर द्वारा अंग्रेजी शिक्षा को माध्यम रूप में चयन तथा सरकारी नौकरियों के लिए उसकी अनिवार्यता का दौर है। सच्चे अर्थों में एक औपनिवेशिक भाषा एवं साम्राज्यवादी उपकरण एवं वर्चस्व माध्यम के रूप में अंग्रेजी की प्रतिष्ठा की कालावधि भी यही है। मैकाले के सपनों के अनुसार अंग्रेजी मानस एवं शिक्षा में रचा बसा एक शिक्षित मध्यवर्ग इसी समय अस्तित्व में आने लगा था। इस वर्ग के लिए इतिहास में एक निश्चित भूमिका का विधान था, जिसका गहरा सम्बन्ध इस देश की नियति से भी जुड़ा था। अंग्रेजी के प्रभाव में गुणात्मक परिवर्तन का एक निर्णायक मोड़ 1913 में आया जब रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कृति "गीतांजलि" के अंग्रेजी अनुवाद को साहित्य का नोबल पुरस्कार दिया गया। इसके फलस्वरूप मध्यवर्ग में अंग्रेजी की लोकप्रियता में भारी इजाफा दर्ज किया गया। 1947 ई. के बाद वैश्विक स्थितियों में हुई क्रान्तिकारी परिवर्तन एवं स.रा. अमेरिका के विश्व शक्ति के रूप में उभार ने सत्ता के केन्द्रों को यूरोप से प्रतिस्थापित कर अमेरिका में केन्द्रित कर दिया। नवसाम्राज्यवाद की प्रतिनिधि भाषा के रूप में ब्रिटिश अंग्रेजी के स्थान पर अमेरिकी अंग्रेजी की प्रतिष्ठा हुई। ब्रिटिश अंग्रेजी भी अपनी साम्राज्यवादी भूमिका में उपनिवेशवाद के सुदृढ़ीकरण के उपकरण के रूप में लाई गयी थी। परन्तु योरोपीय नवजागरण के मूल्यों से समृद्ध इसके साहित्य ने कम से कम अंग्रेजी में दीक्षित मध्यवर्ग में एक अदम्य मुक्तिकामी चेतना पैदा की। बाद में इसी वर्ग ने दबे स्वर में ही सही स्वतंत्रता के लिए जद्दोजहद की शुरूआत की। किन्तु आजादी के बाद एवं विशेषतः 20वीं सदी के अन्तिम दशक में अमेरिकी अंग्रेजी ने देश में उपभोक्तावादी अपसंस्कृति का जो प्रचार शुरू किया उसने हमारी जातीय-राष्ट्रीय अस्मिता के समक्ष गम्भीर चुनौती प्रस्तुत की है। छोटी-छोटी अस्मिताओं को राष्ट्रीय चेतना के समक्ष उभारना तथा बाजारवादी रूझानों से, राष्ट्रीय संस्कृति एवं अस्मिता का विघटन इसकी पसंदीदा प्रवृत्तियां हैं। विसंस्कृतिकरण की प्रबल आंधी के पीछे सक्रिय निहितार्थों एवं मुक्तमंडी का भोगवादी दर्शन इसके ग्लोबल खेल हैं। यह सारा खेल संचरणशील पूंजी का है जिसके सांस्कृतिक मोर्चे पर अंग्रेजी अपने साम्राज्यवादी एवं विभेदमूलक आशयों के साथ डटी हुई है। अंग्रेजी की इस भूमिका की पड़ताल के पूर्व भारत में उसके विकास के विभिन्न चरणों एवं उनके सांस्कृतिक-सामाजिक प्रभावों का क्रमिक विवेचन करना समीचीन होगा। 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद कम्पनी की सत्ता का उभार पूरी तरह होना आरम्भ हो गया। 1763 ई. में तीसरे फ्रांसीसी युद्ध में विजयी होने के बाद कम्पनी के सामने अब कोई विदेशी प्रतिद्वंद्वी न रह गया था। 1765 ई. में बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी प्राप्त कर कम्पनी "कम्पनी बहादुर" बन गयी थी। प्रशासक के रूप में कम्पनी व्यापार-वाणिज्य के अलावा भारत की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर भी चिंतन करने लगी। ऐसा करना इंगलैण्ड की शासन परम्परा के अनुसार ही था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना 1960 ई. में हुई थी। धार्मिक शिक्षा के प्रसार की आकांक्षा कम्पनी के मन में तभी से दी। 1914 ई. में कुछ कर्मचारियों को ईसाई धर्म में दीक्षित कर उनकी शिक्षा की व्यवस्था की गयी थी। राजसत्ता प्राप्त करने के बाद कम्पनी के सामने भारत की जनता की सदभावना प्राप्त करने का प्रश्न भी उपस्थित हुआ। इसी ध्येय की प्राप्ति के लिए भारतीय जनता के दोनों महत्त्वपूर्ण अंगों हिन्दू तथा मुसलमान के लिए क्रमशः बनारस संस्कृत कॉलेज और कलकत्ता मदरसा की स्थापना सर जोनाथन डंकन और वारेन हेस्टिंग्स द्वारा की गयी। हिन्दू और मुसलमानों को अलग करने का ब्रिटिश राजसत्ता का यह पहला प्रयास था जो 1947 ई. तक चलता रहा। प्रारम्भ में कम्पनी की नीति शिक्षा तथा धर्मसम्बन्धी मामलों में दखलदांजी न करने की थी। इन विषयों को लेकर कम्पनी के मन में संशय था। किन्तु धीरे-धीरे कम्पनी की सत्ता के सुदृढ़ीकरण के साथ वैकल्पिक विचारधारा का विकास भी होने लगा। इस विचारधारा के प्रस्तोता थे चार्ल्स ग्रांट। चार्ल्स ग्रांट मैकाले के पिता जकारी मैकाले के मित्र एवं विलियम विल्बरफोर्स के साथी थे। ये दोनों इवांजलिस्ट सम्प्रदाय के ईसाई थे। यह सम्प्रदाय क्लेपहम सेक्ट के नाम से परिचित था। चार्ल्स ग्रांट भारतीय जनता को अज्ञान तथा अंधकार से उबारना चाहते थे, उनका यह आचरण उनके शासक होने के अनुकूल था। इसी आशय से 1792 ई. में उन्होंने एक प्रस्ताव तैयार किया जिसे उन्होंने "आब्जर्वेशन" के नाम से 1797 ई. में लंदन में छपवाया था। एक शासक के रूप में अपने खुदाई कर्तव्य का ध्यान कर भारत की जनता का धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक अवस्था का दयनीय चित्रण उन्होंने इस प्रस्ताव में किया। उनका उद्देश्य था पार्लमेंट के सदस्यों के मन में भारतीय जनता के प्रति ईसाई सद्भावना जगाना। कम्पनी का चार्टर बीस वर्षों में एक बार नवीकृत होता था। 1793 ई. में इसे नवीकरण के लिए संसद के सम्मुख प्रस्तुत किया जाना था। भारतीय शिक्षा के प्रति कम्पनी को उसके दायित्वों की याद दिलाने के लिए प्रस्ताव की प्रतियां ग्रांट ने सांसदों के मध्य वितरित करवायी। ग्रांट एक निर्भीक विचारक थे जिनकी समाज सेवा में भी गहरी रूचि थी। विल्बरफोर्स के साथ मिलकर वे दासप्रथा के खिलाफ लड़ चुके थे। इसी सेवाभाव और ईसाई धार्मिक सुधारवादी दृष्टिकोण से प्रेरित होकर उन्होंने प्रस्ताव में कुछ सुझाव दिए थे जो आगे चलकर भारतीय शिक्षा एवं शासकीय भाषा के सम्बन्ध में नींव के पत्थर साबित हुए। उनके प्रमुख सुझाव थे-

  • भारत में शिक्षा का प्रसार कम्पनी सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी हो।
  • भारत में पाश्चात्य शिक्षा पद्धति लागू की जाए।
  • शिक्षा में विज्ञान, कला कौशल और इंजीनियरिंग को प्रमुखता मिले।
  • अंग्रेजी भाषा को शिक्षामाध्यम और सरकारी भाषा बनाया जाए।
  • अंग्रेजी वह माध्यम है, जिससे भारत के लिए विचारों के नए द्वारा खुल जाएंगे और अंग्रेजी स्कूलों में नौजवानों की भीड़ लग जाएगी।

अंग्रेजी की संस्तुति करते हुए ग्रांट ने ऐतिहासिक तर्कों का सहारा लिया। उनके अनुसार मुगलों ने भी राज्य स्थापना के साथ अपनी भाषा लागू की थी। कम्पनी सरकार को भी मुगलों से शिक्षा लेनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि वर्षों से शासन करने के कारण अंग्रेजों का यह अधिकार था कि वे भाषा माध्यम का चुनाव कर सकें। यह विचारधारा निसंदेह साम्राज्यवादी विचारतंतुओं से निर्मित थी। परन्तु ऐसा करते समय चार्ल्स ग्रांट ने यह तथ्य बहुत सफाई से भुला दिया कि ब्रिटेन से भी ग्यारहवीं सदी से लेकर चौदहवीं सदी तक लगभग चार सौ वर्ष तक अंग्रेजी के स्थान पर फ्रेंच राजभाषा थी। 1362 ई. में पार्लमेंट ने प्रस्ताव पारित कर अंग्रेजी को राजभाषा बना दिया था।

परन्तु चार्ल्स ग्रांट की वाणी शासकों की भावनाओं को मुखर कर रही थी। वे अंग्रेजी के माध्यम से भारत में पश्चिम से ज्ञान के एक अभिनव सूर्य का उदय चाहते थे। वे अंग्रेजी, सांइस और ईसाइयत को एकरूप मानते थे उनके लिए अंग्रेजी ज्ञान विज्ञान की भाषा थी और ईसाइयत वैज्ञानिक दर्शन से सम्पन्न सहज एवं नैसर्गिक पंथ। वे हिन्दू धर्म को अन्य ईसाइयत के प्रचारकों की तरह, अंधविश्वासों का पुलिंदा मानते थे। उनका विश्वास था कि उच्च ईसाई मूल्यों और पूर्ण ईश्वर में विश्वास से हिन्दू धर्म के सभी आडम्बर ढह जायेंगे।

ज्ञान-विज्ञान, अंग्रेजी शिक्षा और ईसाई सद्भावना की बात करते हुए भी चार्ल्स ग्रांट कम्पनी के प्रमुख उद्देश्य व्यापार को नहीं भूले। उन्होंने कहा कि धर्म एवं संस्कृति के प्रचार से इतना आर्थिक लाभ होगा कि वारे-न्यारे हो जाएंगे। यह सत्य भी था, अंग्रेजी भाषा और अंगरेजियत की लोकप्रियता से ब्रिटिश माल की मांग वृद्धि का सीधा सम्बन्ध था, जिसे उनका धर्मसुधारक व्यक्तित्व भली भांति समझ रहा था। ग्रांट का दृढ़ विश्वास था कि साहित्य और शिक्षा से सभ्यता परिवर्तन होगा। नयी सभ्यता के साधन सीधे इंगलैण्ड से आने थे। ग्रांट के प्रस्तावों ने अंग्रेज सत्ताधारियों को आकर्षित तो किया परन्तु उनकी आशांकाओं का समाधान फिर भी न हो सका। कम्पनी के अधिकारियों को भय था कि अंग्रेजी शिक्षा से यहां वैचारिक सांस्कृतिक क्रान्ति आएगी और इंगलैण्ड की तर्ज पर संस्थाओं को स्थापित करने की मांग जोर पकड़ लेगी। ग्रांट ने इन आशंकाओं का उतर देते हुए कहा था कि शाकाहारी होने के कारण एवं गर्म जलवायु में रहने के कारण भारतीय इतने नर्म पड़ चुके हैं कि वे किसी को भी चुनौती नहीं दे सकते। वे स्वतंत्रता के बारे में सोच भी नहीं सकते। भारत सदा के लिए ब्रिटेन का राजनीतिक अंग बना होगा।

स्पष्टतया यह एक साम्राज्यवादी विचार था, कि भारतीयों को अनैतिक और कमजोर समझा जाए। किन्तु अन्त में ग्रांट ने यह भी कहा कि यदि भारतीय अंग्रेजी पढ़कर ब्रिटिश राज को चुनौती देने लगे, तो भी हमें साहस और संतोष के साथ उसका सामना करना होगा। 1793 ई. के चार्टर एक्ट में दो प्रस्ताव पेश किए गए थे। दूसरे प्रस्ताव में ग्रांट के सुझावों को अन्तर्भुक्त किया गया था, किन्तु यह ब्रिटिश संसद की सम्पत्ति प्राप्त न कर सका। दूसरे अनुच्छेद की अस्वीकृति के पीछे ब्रिटिश राजसत्ता का वह भय सक्रिय था, जिसकी उत्पत्ति अमरीका में 1773 ई. में सत्ता खोने के कारण हुई थी। अमेरिकी राज्यों ने ब्रिटिश संसद द्वारा प्रणीत कानूनों को अस्वीकार कर स्वतंत्रता के लिए युद्ध छेड़ दिया था। इस कटु अनुभव के आधार पर वे भारत में किसी भी नए प्रयोग से हिचक रहे थे। इस भावना को प्रकट करते हुए ब्रिटिश पार्लियामेंट के वरिष्ठ सदस्य रैंडल जैक्सन ने कहा था "हम अपनी शिक्षा और विचारधारा के फलस्वरूप अमरीकन राज्यों से हाथ धो बैठे हैं। हमें भारत में वैसा नहीं करना चाहिए।"7 वस्तुतः उस दौर में अंग्रेजी सत्ता प्रतिष्ठान का यह मानना था कि हिन्दू और मुसलमानों की शिक्षा पद्धति, कानूनी, सामाजिक और शासकीय व्यवस्था उनकी अपनी परम्परा के अनुसार उचित है तथा उसमें किसी प्रकार का हस्तक्षेप वांछनीय नहीं है। हेस्टिंग्स ने मैन्सफील्ड को इस आशय का पत्र भी लिखा था। कई अंग्रेज भारतीय वेशभूषा पहनते और हुक्का भी पीते थे। पं. सुन्दरलाल ने अपनी पुस्तक "भारत में अंग्रेजी राज" तथा विलियम डेलीरिम्पल ने "द व्हाइट मुगल्स" में इनका वर्णन किया है। यद्यपि ग्रांट-विल्बरफोर्स का प्रस्ताव क्रियात्मक रूप में सफल न हो सका किन्तु यह आने वाले समय के लिए एक दिशानिर्देश बन गया जिसकी परिणति भविष्य के गर्भ में आकार ले चुकी थी। ग्रांट ने कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाए थे, इनकी विवेचना करना अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि आज तक हमारा भाषिक सांस्कृतिक जीवन उन प्रश्नों के आवर्त से उन्मुक्त नहीं हो पाया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी लगभग सभी शिक्षा आयोगों ने उसी बात को घुमा फिराकर दुहराया है। हमारे शैक्षाणिक-संस्कृति जगत का यह दुर्भाग्य रहा है कि हम इन प्रश्नों को सर्वथा नए प्रश्न मानकर उन पर बहस मुबाहिसे में मुब्तितला है। आश्चर्य है कि समाधानविहीन इन प्रश्नों के प्रति हमारे मानस में कोई विरक्ति भाव भी पैदा नहीं होता। चार्ल्स ग्रांट देशीय भाषाओं को जंगली लोगों की भाषा मानते थे। परंतु वे यह भी मानते थे किः

  • 1. देशी भाषाओं का विकास अंग्रेजी की सहायता से किया जा सकता है।
  • 2. पाठय पुस्तकों को अंग्रेजी से अनुवाद कराकर तैयार किया जाना चाहिए।
  • 3. नये शिक्षा कार्यक्रम के लिए द्विभाषी अध्यापक तैयार करने पड़ेंगे।
  • 4.अंततोगत्वा भारतीयों की शिक्षा भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही हो सकती है। इस कार्य के लिए 25 वर्ष की अवधि पर्याप्त समझी गयी थी।

ये बातें 1835 ई. में मैकाले ने भी दुहरायी। उसके बाद ये बातें 1854, 1881, 1902, 1915, 1917, 1919, 1927, 1948-49, 1956, 1964, 1986 में भी दुहराई गयी। आज भी शिक्षा आयोग, शिक्षाधिकारी निष्काम भाव से यही माला फेर रहे हैं। 1813 ई. में चार्टर के पुनःसंशोधित होने का समय आ गया था। अब तक कम्पनी शासन की जड़े गहरें धंस चुकी थीं। अब कम्पनी शिक्षा तथा मिशन दोनों ध्ययों के लिए तैयार हो चुकी थी। 1813 ई. में संसद ने एक लाख रुपये वार्षिक व्यय की अनुमति शिक्षा सम्बन्धी कार्यों के लिए प्रदान कर दी। इस तरह 1793 ई. के बीस वर्षों बाद दूसरा कदम उठाया गया। जिसने अंग्रेजी शिक्षा की दिशा में महत्त्वपूर्ण आधार का काम किया। इसी आधार पर 1835 ई. में मैकाले ने अंग्रेजी के साम्राज्य का शिलान्यास किया। लार्ड विलियम बेंटिक जिन्होंने टी.बी. मैकाले के प्रस्तावों पर स्वीकृति की मुहर लगायी थी, उनके (मैकाले के) पिता के मित्र थे। मैकाले उनसे मानस पुत्र थे। 1835 ई. में कम्पनी के चेयरमैन चार्ल्स ग्रांट के बड़े पुत्र ग्रांट जूनियर थे। 1813 ईमें चार्टर में साहित्य के "रिवाईवल" और "इम्प्रूवमेंट" दोनों की चर्चा थी। निश्चित रूप से पहले का सम्बन्ध भारतीय एवं दूसरे का अंग्रेजी साहित्य से था। परन्तु 1835 ई. में टी.बी

मैकाले ने निश्चय करवाया कि वास्तविक साहित्य तो अंग्रेजी का ही था, भारतीय भाषाएं तो उनकी दृष्टि से साहित्य रचना के योग्य ही नहीं थीं। कम्पनी लाभार्जन के उद्देश्य से संचालित थी, जिसका प्रधान लक्ष्य था, अपने अंशधारकों को अधिकाधिक लाभांश का वितरण। इसके लिए प्रशासन के व्यय में कमी लाना एवं सस्ते नौकर जुटाने जरूरी थे। 1820 से 1830 तक कम्पनी सरकार पर उसके डायरेक्टर्स खर्च कम करने के लिए दबाव डाल रहे थे। उनका सुझाव था कि सरकारी पदों पर आधारित भारतीयों को नियुक्त किया जाए। अंग्रेज मालिकों के लिए तो हिन्दुस्तानी नौकर से सस्ता तो घोड़ा भी नहीं था। वास्तव में शिक्षा आदि का प्रश्न तो ब्रिटिश राजसत्ता के समक्ष गौण था, उसकी शासन पद्धति वित्तीय हितों से पूरी तरह संचालित थी। भारतीयों की बौद्धिक और नैतिक उन्नति के लिए दी जाने वाली शिक्षा का स्वरूप भी धीरे-धीरे प्रकट होने लगा था। वास्तव में इस शिक्षा का उद्देश्य नौकरी के लिए उम्मीदवार तय करना था। इसका परिणाम यह हुआ कि सीमित स्तर पर सीमित वर्ग को ही शिक्षा देना पर्याप्त समझा गया। 1813 ईमें चार्टर एक्ट में शिक्षा के लिए प्रतिवर्ष एक लाख रुपये की व्यवस्था की गयी थी, परन्तु साथ में यह शर्त भी आयद की गयी थी कि यह व्यय प्रशासनिक खर्चों से बच गयी राशि से ही हो सकता था। परन्तु 1833 ई. के चार्टर के बाद यह स्थिति बदलनी थी, क्योंकि सरकार खुद शिक्षा का प्रबन्ध करने जा रही थी। कम्पनी ने भारत में शिक्षा के प्रश्न को राजनैतिक हितों के अतिरिक्त आर्थिक हितों से जोड़ दिया था। 1826 में भारतीयों को नौकरी के अपने पत्र में डायरेक्टर्स ने यह बात स्पष्ट कर दी थी कि अंग्रेजी शिक्षा केवल उच्च वर्ग को दी जाएगी। इसके पीछे यह दृष्टिकोण काम कर रहा था कि उच्चवर्ग के लोग दूसरे वर्गों के मन पर प्रभाव डाल सकते हैं। जनसमूह की शिक्षा एक व्ययसाध्य कार्य था, जिसका फायदा कम्पनी सरकार को नहीं मिलना था। लेकिन कम्पनी के इस कदम ने कम से कम एक बात तो तय कर ही दी कि भारत में अंग्रेजी शिक्षा एक वर्ग विशेष की शिक्षा होगी। डॉ. तुलसीराम ने लिखा है "इसी वर्ग विशेष में से सम्भवतः एक वर्ग विशिष्ट का गठन भी किया जा सकेगा जो भारत की जनता के बीच अंग्रेजी ब्राह्मणों या ब्राउन गोरों का काम करेगा, अर्थात सरकार की नौकरी करेगा और स्वामीभक्त बनकर सरकार और जनता के बीच सम्पर्क का माध्यम बनेगा। थोड़े स्कूल, थोड़ी पूंजी, लाभांश निश्चित और पक्का। योजना ठीक थी।"8 1813 ई. के चार्टर में ईसाई मिशनरियों को धर्म प्रचार की छूट भी दे दी गयी। मिशनरियों ने प्रारम्भ से ही बड़ी मछलियों अर्थात समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को पकड़ने में रुचि ली। अंग्रेजी शिक्षा ने भी इसमें पर्याप्त योगदान दिया। कलकत्ते के एक पत्र द इंग्लिशमैन ने तो यहां तक लिखा कि लोगों को उनके जंगली और बर्बर रूढ़िवाद और व्यर्थ कर्मकांड से छुड़ाने का पक्का और सबसे अच्छा तरीका केवल यह है कि उनमें अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार किया जाए।9

अलेक्जेंडर डफ धर्म परिवर्तन के काम में बड़े सफल रहे। 1832 ई. में उन्होंने कृष्णमोहन बैनर्जी को ईसाई बनाया। फिर महेशचन्द्र घोष, कैलाश चन्द्र मुखर्जी, प्यारे मोहन रूद्र और माइकेल मधुसूदन दत्त भी ईसाई बन गये। नयी हवा में उड़नेवाले ये लोग अंग्रेजी भाषा और ईसाइयत के नशे में देश को किधर ले जाएंगे, यह निश्चित न था। भारत की पुनर्जागृति के पहले स्वप्नद्रष्टा राजा राममोहन राय सामाजिक और आर्थिक समृद्धि में भारत को इंगलैंड की तरह बनाना चाहते थे। वे भारत की उन्नीसवीं सदी को इंगलैंड और यूरोप की पन्द्रहवीं सदी के बराबर मानते थे और अंग्रेजी के माध्यम से नवजागृति लाने की कामना रखते थे। राजा साहब अंग्रेजी के घनघोर समर्थक थे, जिसे वे नयी रोशनी और तरक्की का जरिया मानते थे। इसी भावना से 1823 ई. में कलकत्ता में संस्कृत कॉलेज खोलने का उन्होंने विरोध किया था। प्रतिवाद में उन्होंने लार्ड एमहस्र्ट को लिखा था। उन्होंने भारत के लिए भी मध्यकालीन दर्शन के स्थान पर बेकन और पश्चिमी विज्ञान की पैरोपकारी की थी। वे पूरी भारतीय सभ्यता, भाषा और साहित्य में आमूल परिवर्तन के हिमायती थे। उनके विचार में भारतीय समाज और साहित्य पूरी तरह जर्जर हो चुके थे और इस समूचे ढांचे को बदलना जरूरी था। उनकी दृष्टि में समाज का पुनर्नवन ज्ञान विज्ञान के पश्चिमी संस्करण से ही सम्भव था। भाषा के क्षेत्र में राजा साहब के दृष्टिकोण में एक बुनियादी कमी थी। यूरोप में नवजागरण के फलस्वरूप आई वैचारिक और वैज्ञानिक क्रान्ति वहां की लोकभाषाओं द्वारा सम्पन्न हुई थी। राजा साहब यह भी भूल गए कि बेकन के दर्शन ग्रंथ लैटिन में लिखे गये थे, अंग्रेजी में नहीं। नवजागरण के पुरोधा यह नहीं समझ पाए कि अगर जागृति प्राचीन भाषा से नहीं आ सकती तो कम से कम विदेशी भाषा के माध्यम से उसका साकार होना तो लगभग असम्भव था।

ज्ञान विज्ञान और दर्शन में प्राचीन और नवीन के युग्म का आश्रय लेते हुए राजा राममोहन ने संस्कृत और लैटिन की प्राचीनता पर अंग्रेजी की नवीनता और वैज्ञानिक चेतना को वरीयता दी। परन्तु अंग्रेजी इंगलैंड के लिए नई भाषा थी, भारत के लिए नहीं। भारत की आधुनिक भाषाऐं यहां की लोकभाषाएं थीं। इंगलैंड की लोकभाषा भारत की लोकभाषा नहीं थी। अतः राममोहन राय ने लोक की बात नहीं की, उनके चिन्तन के केन्द्र में भद्रलोक था। शास्त्रीय भाषा बनाम जनभाषा के बीच जनभाषा का पक्ष लेते हुए राजा साहब भूल गये कि अंग्रेजी भारत में बोलचाल की भाषा नहीं थी।

यूरोप ने अपने नवजागरण के लिए अपनी भाषाएं जो लोक में प्रयुक्त थीं, को चुना। जबकि भारत का औपनिवेशिकता में डूबा बुद्धिजीवी अंग्रेजी के माध्यम से नयी चेतना का प्रसार और नए समाज की रचना का आकांक्षी था। लोकभाषा वर्तमान और अतीत के बीच में पुल का काम करती है और प्रगति के पथ पर अग्रसर होने में हमारी सहायक सिद्ध होती है। स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे संस्कृतज्ञ उस बात को बखूबी समझ गए जिसे राजा साहब अपनी तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद पकड़ न सके। परन्तु अंग्रेजी के पक्ष में कई राजनैतिक एवं व्यापारिक हित भी सक्रिय थे। ऐसा प्रतीत होता है कि राजा साहब भी इन कारणों से प्रभावित थे। राजा साहब के समर्थन से नवजागरण की आड़ में भाषाई साम्राज्यवाद का जो जहर हमारी चेतना में घोला गया जिसने भारतीय समाज में एक नये वर्गवाद जन्य वैषम्य को जन्म दिया। राजा साहब के परिवार को स्थायी भूमि योजना से काफी लाभ पहुंचा था। उनके भूमि सम्बन्धी और वित्तीय हित अंग्रेजी शासन से जुड़े हुए थे। उनके पिता इस योजना के बाद एक बड़े जमींदार बन गये थे। ब्रिटिश एजेंसियों विशेषकर मैकिन्तोश एंड कम्पनी में उन्होंने काफी रुपया लगाया। 1831 में यह कम्पनी घाटे में चली गयी थी। इसको उबारने के लिए राजा साहब काफी सक्रिय थे एवं इस उद्देश्य के लिए उन्होंने इंगलैंड की यात्र की। 1833 ई. में चार्टर पर बहस के दौरान मैकाले ने जिन भारतीय अंग्रेजी समर्थक मित्र का जिक्र किया था वे राजा राममोहन राय ही थे।

आश्चर्य है कि भाषाई साम्राज्यवादी परियोजना के मंसूबों को राजा साहब समझ न सके। इस भूल का परिणाम अंग्रेजी के नकारात्मक और समाजविरोधी फलागमों में प्रकट हुआ। 1793 से 1833 ई. तक राज की प्रतिष्ठा प्रशासन की आवश्यकता, अंग्रेजी भाषा के माध्यम से वर्ग विशेष से सम्बन्ध और सानिध्य सभ्यता और ईसाइयत का प्रचार और अंग्रेजीकरण के सूत्र में भारत को आबद्ध करना, ब्रिटिश नीति के मूल उद्देश्य यही थे। इन उद्देश्यों की प्राप्ति की प्रक्रिया और उनके क्रियान्वयन के बारे में कम्पनी प्रशासन पहले तो फूंक-फूंक कर कदम उठा रहा था, परन्तु टी.बी. मैकाले के आने से इस स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन आया। टामस बबिंग्टन मैकाले ( 1800-1859) चार्ल्स ग्रांट का मानस पुत्र था एवं भारत के प्रति उसका दृष्टिकोण शुद्ध साम्राज्यवादी था। मैकाले अत्यन्त प्रतिभाशाली था। उसने दस वर्ष की आयु में कविता लिखना शुरू कर दिया था। कहा जाता है कि इसी उम्र में विश्व इतिहास पर एक ग्रंथ लिखने की शुरूआत भी उसने की थी। 1857 ई. में महारानी विक्टोरिया ने उन्हें बैरन ऑफ राथली की उपाधि प्रदान की थी। इंडियन पीनल कोड उन्हीं की देन है। 1832 में मैकाले कम्पनी के बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल के सचिव नियुक्त किए गए। उस समय चार्ल्स ग्रांट के पुत्र इस बोर्ड के चेयरमैन थे। मैकाले साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से प्रभावित होने के कारण भारत, भारतीयों तथ उनकी भाषा, संस्कृति, सभ्यता और विश्वास को हीन मानते थे। उनका मानना था कि भारतीय लोग जंगली हैं उनकी भाषा भी जंगली है। अंग्रेज चूंकि उन पर राज कर रहे हैं, अतः उन्हें यह अधिकार है कि वे भारतीयों की शिक्षा प्रणाली और माध्यम भाषा का निर्णय कर सकें। उनका दृढ़ विश्वास था कि भारतीय कायर, दब्बू और डरपोक है, शिक्षा पाकर स्वतंत्रता की ओर वे कभी भी अग्रसर नहीं हो सकेंगे। वे केवल ठोकर की भाषा समझते हैं समादर और शिष्टाचार की नहीं। उनकी नजर में भारत की प्राचीन विधाए अंधविश्वास की जननी थीं। उन्होंने अपने शिक्षा प्रस्ताव में लिखा है कि हिन्दुओं का इतिहास, मेटाफिजिक्स, फिजिक्स और थियोलॉजी सब वाहियात है। उनका विश्वास था कि यदि उनकी शिक्षा योजना पर ठीक से काम किया गया तो तीस वर्षों के भीतर बंगाल के भद्रलोक में एक भी मूर्तिपूजक नहीं बचेगा।10

1835 में जब मैकाले का प्रस्ताव लिखा गया था उसी वर्ष कलकत्ता के चर्च जरल असेम्बली को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि पाश्चात्य ज्ञान की प्रत्येक शाखा हिन्दू सिस्टम के तद्विषयक किसी न किसी भाग को नष्ट कर देगी और इस प्रकार हिन्दू धर्म के विशाल किन्तु भयंकर भवन का एक-एक पत्थर नीचे गिर जाएगा। शिक्षा के विस्तृत कार्यक्रम के पूरे होने तक इस भवन का हर हिस्सा टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। उपर्युक्त कथन से स्पष्ट है कि मैकाले एवं ग्रांट दोनों का उद्देश्य एक ही था किन्तु दोनों ने इसकी पूर्ति के लिए अलग साधनों का आश्रय लेने पर जोर दिया। ग्रांट मूलरूप से एक ईसाई मिशनरी थे और उसके साथ राज एवं शिक्षा सेवी जबकि मैकाले आधारभूत रूप से शिक्षा सेवी ही रहे। ग्रांट चाहते थे धर्म परिवर्तन मैकाले चाहते थे शिक्षा सभ्यता परिवर्तन। ग्रांट की पद्धति के अंग थे भय और आशंका जबकि मैकाले की पद्धति की बुनियाद आत्मविश्वास और कूटनीति पर स्थापित थी। मैकाले 1834 में भारत पहुंचे और सामान्य लोकशिक्षा समिति के अध्यक्ष बनाए गए। उस समय अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के समर्थकों के बीच विवाद चल रहा था। भारतीय पद्धति के समर्थक संस्कृति और अरब के माध्यम से प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति को पुनः चलाना चाहते थे। अंग्रेजी पद्धति के समर्थक विज्ञान, कला एवं साहित्य की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम पर आकर केन्द्रित हो गया। मैकाले ने 1813 के चार्टर में वर्णित "लिटरेचर" का अर्थ अंग्रेजी साहित्य के रूप में लेते हुए भारतीय भाषाओं की जड़ की काट दी। अंग्रेजी के समक्ष अब संस्कृत और अरबी ही उसके प्रतिपक्षी के रूप में रह गयी थीं। मैकाले ने मुख्य प्रहार संस्कृत भाषा, संस्कृत साहित्य और उससे सम्बद्ध धर्मशास्त्र पर किया। मैकाले ने संस्कृत साहित्य का मूल्यांकन कर उसकी तुलना सैक्सन और नार्मन साहित्य से की और सैक्सन नार्मन साहित्य संपदा के बरक्स संस्कृत की निधि को तुच्छ और हीन ठहरा दिया। उसने लिखा है कि किसी भी यूरोपियन लाइब्रेरी की एक आलमारी में जो साहित्य रखा है वह सारे भारत और अरब के साहित्य के बराबर है। संस्कृत साहित्य के मूल्य पर आघात करते हुए उन्होंने लिखा, "संस्कृत साहित्य का मूल्य इतना भी नहीं है जितना उस कागज का जिस पर वह छपा है। उसने यह भी पूछा कि ऐसे साहित्य को पढ़ाने का क्या लाभ जिसमें झूठे इतिहास, झूठे ज्योतिष और झूठे आयुर्वेद के सिवाय और कुछ भी नहीं? क्या उसे केवल इसलिए पढ़ाते चले जाएं कि वह एक झूठे धर्म से जुड़ा है और साथ में वाहियात अंधविश्वास को जन्म देता है।"11

संस्कृत भाषा और उसकी परम्परा को न्यूनीकृत करने के बाद उसी तेवर में उसने अंग्रेजी की समृद्ध वैज्ञानिक परम्परा का महिमामंडन किया। दर्शन, नीति, प्रशासन, विधि विधान, व्यापार आदि सभी विषयों पर गूढ़ एवं मौलिक ग्रंथों की अंग्रेजी में उपलब्धता को रेखांकित करते हुए उसने कहा कि जो भी इस भाषा को जानता है उसे वह सारा ज्ञान भंडार खुले तौर पर उपलब्ध है जिसका सर्जन 90 पीढ़ियों से विद्या के क्षेत्र में शिरोमणि जातियों ने किया है। निसंदेह यह कहा जा सकता है कि इस भाषा में आज जो साहित्य उपलब्ध है वह संसार की समूची जातियों के समूचे साहित्य से श्रेष्ठ है।12

इन तर्कों के आधार पर मैकाले जिस निष्कर्ष पर पहुंचे, उसको उसने अपने प्रस्तावों में जगह दी। किन्तु समिति अभी भी बंटी हुई थी। अपने कासि्ंटग वोट का प्रयोग करते हुए मैकाले ने भारत के इतिहास में एक ऐसा अध्याय लिखा जिसका प्रभाव वह अपने सार्वजनिक जीवन से लेकर अपनी अन्तरात्मा तक झेल रहा है जिसके विकल्प की तलाश सारे राष्ट्र के सामने एक चुनौती बना हुआ है।

7 मार्च, 1835 को तत्कालीन गर्वनर जनरल बेंटिक ने यह सिफारिश मान ली। उसी दिन जारी अध्यादेश में योरोपियन साहित्य और विज्ञान के प्रसार तथा सरकारी धन केवल अंग्रेजी शिक्षा के लिए खर्च करने की घोषणा की गयी। भारतीय साहित्य के प्रकाशन पर सरकारी सहायता बन्द कर दी गयी। सम्पूर्ण शिक्षा अनुदान अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों के लिए उपबंधित कर दिया गया।

यह अध्यादेश भारत में अंग्रेजीकरण की शुरूआत था। मैकाले का एकमात्र उद्देश्य था भारतीयता का उन्मूलन और पाश्चात्य सभ्यता का बीजारोपण, और यह सब किया गया राज की सेवा में। मैकाले की प्रस्तावित शिक्षा पद्धति ने आधुनिक भारतीय भाषाओं को अविकसित कहा था। प्राचीन भाषाएं जैसे संस्कृत और अरबी आदि उसकी दृष्टि में अनुपयोगी थीं। इन दोनों आधारों पर इनको रद्द किया गया था। किन्तु आश्चर्य की बात है कि इंगलैंड के सन्दर्भ में मैकाले के विचार प्राचीन भाषा, फलित ज्योतिष कीमियाई विज्ञान और अविकसित भाषाओं के बारे में, हिन्दुस्तानी सन्दर्भ में व्यक्त किए गये विचारों से बिल्कुल अलग थे। संसद में एक बार ब्रिटिश शिक्षा पद्धति पर बोलते हुए उसने क्लासिकल भाषाओं को प्रशासनिक निपुणता की कसौटी घोषित किया था। मैकाले ने फलित ज्योतिष की चर्चा करते हुए कहा कि हमारी (ब्रिटिश) यूनिवर्सिटियों में फलित ज्योतिष भी पढ़ाई जाए, तो जो नौजवान उत्तम जन्म कुंडली बनाएगा वही सबसे अच्छा होगा। विचारणीय विषय है कि 1813 में संस्कृत के जिन ग्रंथों को "एक्सलेंट ट्रीटीज" कहा गया था, वे 1824 तक आते-आते वाहियात घोषित कर दिए गये। वास्तव में इंगलैंड और भारत में शिक्षा के उद्देश्य एकदम अलग थे। इंगलैंड में शिक्षा प्रशासकों को निपुण बनाने के लिए दी जानी थी, किन्तु भारत में शिक्षा प्रशासकों को सस्ते किरानी और अधीनस्थ उपलब्ध करवाने के लक्ष्य से संचालित थी। भारत में प्रारम्भ की गयी अंग्रेजी शिक्षा का नजरिया साम्राज्यवादी अभिप्रायों पर आधारित था। यह नजरिया उच्च शिक्षित भारतीय नौजवानों को भी संदेशवाहक से अधिक स्वीकार नहीं करता था। स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता उनमें नहीं थी।

साम्राज्यवाद की पहुंच बहुत लम्बी होती है। हथियारों से साम्राज्य विजित किए जाते हैं उसके बाद मानसिक विजय का अभियान संचालित होने लगता है। औपनिवेशिकता का यह लक्षण तब भी था जो उत्तर उपनिवेशवादी दौर में अधिक सूक्ष्म और बहुआयामी हो गया है। मैकाले मानसिक विजय से ऐसी वैचारिक क्रान्ति पैदा करना चाहते थे जिसके कवच में साम्राज्य सुरक्षा की आश्वस्ति हो। उसका दृढ़ विश्वास था कि यदि अंग्रेजों को कभी भारत छोड़ना पड़ा तो अंग्रेजी सभ्यता के रंग में रंगे पाश्चात्य संस्कृति के पुजारी, अंग्रेजी माध्यम से सोचने वाले, बोलने वाले सांवले साहब उस साम्राज्य की रक्षा करते रहेंगे। काल के प्रवाह ने साबित कर दिया कि इन वचनों का वक्ता एक सफल भविष्यद्रष्टा था, जिसका फलादेश उसकी भविष्यवाणी से कई गुणा अधिक प्रतिफलित हुआ। एक विशाल देश की नियति और उसके सांस्कृतिक भविष्य के बारे में परिकल्पित तथ्यों के सत्य सिद्ध होने की घटनाएं इतिहास में भले अनेक हों, पर उनका इतना प्रभाव किसी भी देश की पीढ़ियों के मानसिक संस्कार और अभिरूचियों पर कम ही होगा, जितना मैकाले के इस कथन का भारतीय सन्दर्भ में है।

चार्ल्स ट्रेवल्यन मैकाले के ब्रदर इन लॉ थे। उन्होंने 1838 में "एजुकेशन ऑफ दि पिपुल ऑफ इंडिया" नाम की पुस्तक लिखी थी और प्रयास किया था कि सभी भारतीय भाषाओं की लिपि एक हो जाए। उनका विचार था कि अंग्रेजी राज को यदि कोई खतरा कभी होगा तो अनपढ़ भारतीयों से होगा, अंग्रेजी शिक्षित भारतीयों से नहीं। यह भविष्यवाणी 1857 से चार वर्ष पूर्व की गयी थी। उन्होंने सुझाव दिया कि भारत में अंग्रेजी उसी तरह पढ़ाई जाए जिस तरह ब्रिटेन में रोमन भाषा और साहित्य पांचवी सदी में पढ़ाए गए थे। 1813 के चार्टर में और उसके बाद शिक्षा पद्धति सम्बन्धी विवाद में बार-बार अंग्रेजी समर्थकों द्वारा यह दलील दी जाती थी कि उनका जोर अंग्रेजी माध्यम से ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा देने पर था। परन्तु 1835 में अध्यादेश जारी होने के बाद कम्पनी के कर्णधारों की प्राथमिकता बदल गयी और अंग्रेजी माध्यम के स्थान पर अंग्रेजी साहित्य पर बल दिया जाने लगा। विज्ञान की भाषा निर्वर्ण होती है, उसमें सभ्यता, संस्कृति और धर्म सम्बन्धी भावनात्मक रंग नहीं होता। अंग्रेजियत का रंग चढ़ाने के लिए साहित्य की जरूरत होती है। "साहित्य मनुष्य की भावनाओं को छूता है, और नौजवानों के स्वप्नों के संसार में अंग्रेजी जैसा समृद्ध लौकिक साहित्य तो उनकी भावनाओं को बिजली की तरह छूता है।"13

मैकाले का लक्ष्य था भारतीयता का उन्मूलन और पाश्चात्य संस्कृति का बीजारोपण और यह कार्य किया जाना था, अंग्रेजी के माध्यम से। 1844 में लार्ड हार्डिंग ने एक घोषणापत्र जारी किया जिसके द्वारा सरकारी नौकरियों के लिए कर्मचारियों का चयन केवल अंग्रेजी भाषा ज्ञान और अंग्रेजी शिक्षा के आधार पर किया जाने लगा। इसका परिणाम हुआ, केवल अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी सेवा, स्वयं सेवा, राज सेवा जीवन के नए प्रतिमान बन गए। दूसरी तरफ साम्राज्यवादी परिकल्पनाएं भी फलीभूत होने लगीं। मैकाले के स्वप्नों को काले अंग्रेजों ने जन्म लेना शुरू कर दिया। इस समूचे विवरण का उद्देश्य अंग्रेजी के भारत की मिट्टी में बीजारोपण की परिस्थितियों और उसकी भविष्य में साकार होने वाली भूमिका और उसके नियोजन की उपनिवेशवादी अभिप्रायों की पड़ताल है।

मुगलों के शासनकाल में, भारतीयों का एक वर्ग फारसी में प्रवीण होकर राजसत्ता से जुड़ चुका था। उसने अपनी एक निश्चित वर्गीय पहचान विकसित कर ली थी और वह विशेषाधिकारों का उपयोग कर रहा था। इस वर्ग के उत्तराधिकारियों ने नयी परिस्थितियों में शासन और सत्ता के केन्द्र को पहचान लिया और वहां तक पहुंचने के सूत्र रूप में अंग्रेजी की साधना में आकंठ डूब गये। 19वीं शताब्दी के सातवें दशक में इस वर्ग का चरित्र उभरकर स्पष्ट हो रहा था, जिसका अभिलेख तत्कालीन साहित्य में मिलने लगा था। 1863 में एच. एच. बिल्सन ने राजभक्त स्नातकों के बारे में कहा कि अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त नौजवानों के मन में अपने देश के लिए कोई सहानुभूति या सद्भावना नहीं रह गयी है।14 इस वर्ग की सामाजिक संस्कृति पर कटाक्ष करते हुए बंकिम चन्द्र चटर्जी ने 1873 में लिखा था, "ये बाबू काफी बातूनी एक खास विदेशी भाषा में पारंगत और अपनी मातृभाषा को नीची निगाह से देखने वाले होंगे। कुछ बेहद योग्य बाबू तो ऐसे भी होंगे जो अपनी ही भाषा में बातचीत तक कर पाने में अक्षम होंगे-विष्णु की तरह उनके भी दस अवतार होंगे-क्लर्क, अध्यापक, ब्रह्म समाज के सदस्य, मुनीम, डॉक्टर, वकील, मजिस्ट्रेट, सम्पादक, जमींदार और बेरोजगार-ये बाबू घर में जलपान और दोस्तों के घर पर सुरापान करेंगे। ये तवायफों के अड्डों पर गालियां और मालिकों के यहां फटकार खाएंगे।"15

औपनिवेशिकता की कोख से निकला यह वर्ग धीरे-धीरे प्रभावी होता गया और उसकी वृद्धि के साथ अंग्रेजी का वर्चस्व सार्वजनिक जीवन में दृढ़ से दृढ़तर होता गया। अंग्रेजी शिक्षा के सम्पर्क में आने पर यह वर्ग भी कारलाईल, बेंथम और मिल के स्वतंत्र विचारों से रूबरू हुआ और उनमें भी अंग्रेजी ढंग की संस्थाओं की स्थापना की इच्छा जगने लगी। महात्मा गांधी के राष्ट्रीय जीवन के पटल पर केन्द्र में आने पर राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रवृत्ति और चरित्र में मूलगामी परिवर्तन लाने के पहले तक हमारा राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम मध्यवर्गीय सुधार भावना से अभिप्रेरित था। अनुनय-विनय, ध्यानाकर्षण और पिटीशन की राजनीति के केन्द्र में यही अंग्रेजी शिक्षित मध्यवर्ग था। आश्चर्य नहीं कि 20वीं शताब्दी के दूसरे दशक के मध्य तक कांग्रेस की प्रमुख मांग आई.सी.एस. की परीक्षा का भारत में भी आयोजित किया जाना था। 1854 में कड डिस्पैच में शिक्षा के भातीयकरण के उद्देश्य से कुछ कदम उठाए गए थे, परन्तु विषय वस्तु के आधार के सुदृढ़ न होने के तर्क के अनुसार उनकी उपेक्षा जारी रही। शिक्षा की विषय वस्तु थी, अंग्रेजी साहित्य और पाश्चात्य विज्ञान। इन पर भारतीय भाषाओं में पुस्तकें उपलब्ध नहीं थीं। यह बात भुला दी गयी कि प्रत्येक भाषा की विषय वस्तु उसके अनुरूप ही हुआ करती है। 1860 के दशक में जब भारत में ये घटनाएं घट रही थीं, तब जापान पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से एक नये तरीके और सन्दर्भ में मुखामुखम कर रहा था। पश्चिम के क्रान्तिकारी वैज्ञानिक अनुसंधानों को पश्चिमी भाषा माध्यमों में प्रचारित करने के स्थान पर उसने उस ज्ञान को जापानी भाषा में अन्तरित करना प्रारम्भ किया। कई जापानी विशेषज्ञों को पश्चिमी औद्योगिकृत देशों की यात्रओं पर सरकारी प्रयत्नों से प्रायोजित किया गया। 15-20 वर्षों की कालावधि में ही जापान ने भाषिक उपनिवेशवाद के दुष्चक्र में न फंसते हुए भी वैज्ञानिक जानकारी का एक मजबूत ढांचा कायम कर दिया। देशीय भाषा में होने के कारण वह इसका उपयोग देशज तरीकों से कर सका एवं इसके प्रसार को व्यापकता हासिल हुई। इसके विपरीत भारत में वैज्ञानिक चिन्तन और ज्ञान विज्ञान का व्यापक प्रसार न हो सका और वह नवजागरण की अधूरी उपलब्धि ही कर पाया। यहां का अंग्रेजी पढ़ा लिखा वर्ग देश की जमीनी सच्चाइयों से पूरी तरह कट गया और उसके आदर्श और प्रेरणाएं जनसमुदाय की आकांक्षाओं से कट गयी। पूरे औपनिवेशिक दौर में जनशिक्षा की समस्या की अवहेलना की गई। कड डिस्पैच में घोषणा के बावजूद जनशिक्षा के सवाल को अपने हाल पर छोड़ दिया गया। मैकाले ने अंग्रेजी पढ़े लिखे वर्ग की परिकल्पना ब्राऊन साहबों के रूप में की थी। निम्न उदाहरण से उसकी सार्थकता समझी जा सकती है। 1962 में लंदन में बी.बी.सी. द्वारा श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित का इंटरव्यू प्रसारित किया गया था जिसमें उन्होंने कहा कि उनके पिता को इंपोर्टेड क्राकरी, कटलरी और टेपेस्ट्री का जादू का-सा शौक था। निश्चित रूप से मैकाले ने अपने कब्र में सुकून की लम्बी सांस ली होगी।

इस देश के लिए दुर्भाग्य की इससे बड़ी कोई और बात नहीं थी कि हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में सोचकर अंग्रेजी तथा अंग्रेजी में सोचकर भारतीय भाषाओं में लिखने वाला यह परोपजीवी वर्ग हमारे सार्वजनिक जीवन में अगुवाई की भूमिका में आ चुका था। अंग्रेज बुद्धिजीवी साम्राज्यवाद की दर्प चेतना में डूबकर इस वर्ग की अटपटी अंग्रेजी और राष्ट्रीय अस्मिता भ्रंश को कौतूहल से देख रहे थे। भारतीय विद्वानों में सबसे पहले इस वर्ग की अनुकरण की प्रवृत्ति और खोखलेपन को पहचानने वाले बंकिमचन्द्र और महात्मा गांधी थे। 1878 में "बंगदर्शन" में लिखे अपने लेख "लोकशिक्षा" में बंकिम ने लिखा "अंग्रेजी शिक्षा के कारण शिक्षितों और अशिक्षितों के बीच कोई सहानुभूति, कोई संवाद नहीं है। शिक्षित समुदाय अशिक्षित समुदाय के दिल की धड़कन को महसूस करने में असमर्थ है। यही नहीं, शिक्षित अशिक्षितों की तरफ नजर उठाकर भी नहीं देखते। कृषकराम की अगर खेत जोतते-जोतते थककर मौत भी हो जाती है तो हमें क्या? जब तक मुर्ग मुसल्लम और मच्छी का स्वादिष्ट झाल सुलभ है, हमें फिकर क्यों? कृषकराम कैसे जीवन यापन करता है, उसकी रुचि क्या है, अंग्रेजियत में रंगे बंगाली युवकों को इन सवालों से कोई मतलब नहीं। उनकी चिन्ता है तो यह कि इंगलिस्तान के साहब सर ओसले इडन उनके भाषणों से खुश हैं कि नहीं, और नहीं तो कैसे उन्हें खुश किया जाए। कृषकराम भाड़ में जाए, हमें इससे क्या मतलब?"16

अंग्रेजी शिक्षित वर्ग की खुदगर्जी और सामान्य जनता से पूरी तरह अलग-थलग रहने के बावजूद, किरानी से हाकिम बनने की तीव्र ललक में, अंग्रेजी शिक्षा की लोकप्रियता शिखर चूमने को बेताब हो उठी। सम्पन्न वर्ग के लोग अपने लड़कों को अंग्रेजी शिक्षा के लिए इंगलैंड भी भेजने लगे। ऐसे ही एक युवक थे मोहनदास करमचन्द गांधी जिन्होंने तीन वर्ष इंगलैंड में रहकर बैरिस्टरी की पढ़ाई की।

दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए गांधी जी ने देश के सन्दर्भ में अंग्रेजी की अनिष्टकारी भूमिका को पहचान लिया था। वे पिछली सदी में व्यक्त बंकिमचन्द्र के विचारों पर चलना चाहते थे और भारत के कल्याण के लिए भारतीय भाषाओं के प्रयोग के हिमायती थे। वे यूरोपीय नगर प्रधान सभ्यता के स्थान पर ग्राम और किसान की संकल्पना के आधार पर एक वैकल्पिक दर्शन और जीवन व्यवहार के आकांक्षी थे। वे "लोकशिक्षा" और भारतीय भाषाओं की परम्परा के पुनरुज्जीवन के माध्यम से वर्चस्ववादी साम्राज्यवादी सांस्कृतिक संदर्भों की चूलें हिला देना चाहते थे। वे समझ चुके थे कि राष्ट्र की खोई हुई सांस्कृतिक अस्मिता, स्वदेश की परम्परागत लोकशिक्षा माध्यमों को पुनर्जागृत करके ही प्राप्त की जा सकती है। ऐसा करने के लिए औपनिवेशिकता के सांस्कृतिक वर्चस्व की सर्वाधिक शक्तिशाली प्रतिनिधि अंग्रेजी की प्रतिस्थापना भारतीय भाषाओं से करना सांस्कृतिक मुक्ति संघर्ष का अहम हिस्सा था। दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान गांधी जी अंग्रेजी शिक्षा की चकाचौंध के पीछे छुपी औपनिवेशिक मंशा को अच्छी तरह समझ चुके थे। उनके इस चिन्तन की झलक हिन्द स्वराज में मिलनी शुरू हो गयी थी। उन्होंने लिखा था कि करोडों लोगों को अंग्रेजी शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। स्वराज्य की बात भी हम पराई भाषा में करते हैं। इससे बड़ी मानसिक दरिद्रता और क्या हो सकती है? गांधी जी ने अंग्रेजी शिक्षा के दुष्परिणामों को गिनाते हुए लिखा कि इससे दम्भ, द्वेष और अत्याचार में वृद्धि हुई है। भारत को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्रेजी जानने वाले लोग ही हैं। जनता की हाय अंग्रेजों को नहीं हमको लगेगी। अपने उपर्युक्त कथन द्वारा गांधीजी ने अंग्रेजी को आधुनिकता और ज्ञानोदय का संवाहक समझने और समझाने वाले चन्द भारतीयों, जो अभिजन वर्ग से थे के दावे को खोखला और बेबुनियाद साबित कर दिया। गांधीजी के शिक्षा तथा भाषा सम्बन्धी विचारणा के सार को प्रस्तुत करते हुए श्रीभगवान सिंह लिखते हैं, "गांधी जी की दृष्टि में भारत जैसे धर्मप्रधान देश के लिए ऐसी शिक्षण पद्धति वांछनीय थी जिसमें धर्म और नीति की शिक्षा को प्रधानता हो और यह शिक्षा अनिवार्य रूप से मातृभाषा के जरिए दी जाए तभी उसके अन्दर राष्ट्रीय स्वाभिमान का भाव जाग्रत हो सकता है।"17

जनवरी, 1915 में भारत आने के बाद गांधी जी का भारतीय पद्धति से शिक्षा का अभियान तेजी से आगे बढ़ा और उनके प्रयासों से यह सांस्कृतिक स्वराज्य प्राप्ति का महत् अभियान बन गया। एक तरफ जहां गांधीजी का सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष चल रहा था, वहीं दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर अंग्रेजी का साम्राज्यवादी वर्चस्व अपने उफान पर पहुंच गया था। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेजी ने पहली बार अन्तरर्राष्ट्रीय कूटनीति के प्रांगण में फ्रेंच की समकक्षता हासिल की। युद्धोपरान्त वर्साय की संधि की शर्तें पहली बार तत्कालीन अन्तरर्राष्ट्रीय संचार की भाषा फ्रेंच के साथ-साथ अंग्रेजी में भी लिपिबद्ध की गयी। यह एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु है, जहां से अंग्रेजी को अन्य औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धी भाषाओं यथा फ्रेंच, स्पेनी और पुर्तगाली आदि पर वरीयता मिलने लगी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका के वैश्विक शक्ति के रूप में उभार ने अंग्रेजी को नये सिरे से विश्व मंच पर एक प्रमुख अंतरर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने में काफी मदद की। अमेरिकी अंग्रेजी के रूप में दुनिया ने सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की एक नयी भाषा से साक्षात्कार किया जो ब्रिटिश अंग्रेजी से अधिक आक्रामक एवं विसंस्कृतिकरण की प्रक्रिया में अधिक तीव्रगामी थी। ब्रिटिश अंग्रेजी ने, अपनी तमाम साम्राज्यवादी-वर्चस्ववादी भूमिका के बावजूद, अपने साहित्य में मौजूद उदारवाद और मुक्तिकामी चेतना से सीमित स्तर पर ही सही, भारतीय प्रबुद्ध वर्ग को आलोड़ित किया था। कार्लाइल, मिल और बेंथम के स्वातं=य सम्बन्धी चिन्तन ने अंग्रेजी साहित्य से परिचित युवाओं की चेतना में जगह बनायी थी। परन्तु अमेरिकन पूंजी पोषित एवं तकनीकी सम्पन्न अंग्रेजी की भूमिका पूरे तौर पर उपभोक्तावाद, विसंस्कृतीकरण और पतनशील संस्कृति के प्रसार की रही है। यहां अंग्रेजी के वैश्विक स्तर पर प्रसार तथा उसकी साम्राज्यवादी भूमिका का विवेचना करना समीचीन होगा।

रूपक की भाषा में कहा जाए तो ऐसा कहा जाता है कि कभी ब्रिटेन का राज्य दुनिया भर के समुद्रों पर था, आज अंग्रेजी का है। अंग्रेजी ने ब्रिटिश साम्राज्य की जगह ले ली है। इसके कारण क्या है? आक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोश के सम्पादक ने भाषाई विपन्नता की तुलना गरीबी, दुर्भिक्ष और रोगग्रस्तता से करते हुए इसे अंग्रेजी न जानने के रूप में परिभाषित किया है। यह एक साम्राज्यवादी दृष्टिकोण है, परन्तु अंग्रेजी एवं अभावग्रस्तता, रोग आदि का कोई आकस्मिक सम्बन्ध ध्यान से देखने पर नहीं प्रतीत होता। इस भाषा का सम्बन्ध विश्व स्तर पर साम्राज्यवाद एवं दास व्यापार से रहा है। ये तथ्य औपनिवेशिक दौर से सम्बद्ध हैं। आज स्थिति में आमूल परिवर्तन के कारण यह भाषा विज्ञान, तकनीकी, चिकित्सा, सूचना प्रौद्योगिकी आदि की प्रभुत्वशाली माध्यम के रूप में उभर चुकी है। वह अन्तरर्राष्ट्रीय व्यापार, विमानन, नौवहन, और अंतरर्राष्ट्रीय राजनय के क्षेत्र में वर्चस्वशाली भूमिका का निर्वहन कर रही है। युवा संस्कृति एवं मनोरंजन से सम्बद्ध यह भाषा दुनिया में सीखी जाने वाली दूसरी भाषाओं (सेकंड लैंगुएज) में अग्रणी है। अनुसंधान तथा विकास के नए डोमेन में इसकी पैठ बहुत मजबूत है।

अन्य भाषाओं के पूर्व में प्रसार के कारणों के विपरीत भौगोलिक प्रसार एवं नये विषयों में पहुंच के मामले में अंग्रेजी ने सबको पीछे छोड़ दिया है। इसके इस अभूतपूर्व विस्तार के कारणों को विश्लेषित करते हुए वाशिंगटन स्थित अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान केन्द्र के निदेशक ने लिखा है, "अंग्रेजी का आधुनिक युग में प्रचार कम्प्यूटरों के प्रचार के समान ही महत्त्वपूर्ण है। जब उपलब्ध सूचनाओं को मनुष्य संभाल न सका तो परिदृश्य पर कम्प्यूटरों का उदय हुआ। जब भाषाई सीमाओं ने अन्तरर्राष्ट्रीय संचार को बाधित करना शुरू किया जो अंग्रेजी का प्रयोग विस्तारित हुआ और उसने अन्तरर्राष्ट्रीय संचार की प्रणाली को बदल दिया।"18

उपर्युक्त कथन से ऐसा प्रतीत हो सकता है मानो अन्तरर्राष्ट्रीय संचार के गतिरोध को समाप्त करने में अंग्रेजी का उदय और उसके प्रसार के पीछे नैसर्गिक प्रक्रियाओं की भूमिका हो। किन्तु ध्यान से देखने पर अंग्रेजी के विश्वव्यापी प्रसार के पीछे 1950 तक उपनिवेशवाद और उसके बाद उसके बौद्धिक संस्करण की सक्रिय और प्रत्यक्ष भूमिका रही है। इसके प्रसार के पीछे सुनिश्चित राजनीतिक, आर्थिक और औपनिवेशिक हित रहे हैं एवं अंग्रेजी का प्रसार मात्र सयोंग नहीं है। 1600 ई. में एक अल्पसंख्यक भाषा से आरम्भ कर मात्र चार शताब्दियों में विश्व संचार की प्रमुखतम भाषा के रूप में अंग्रेजी के रूपातंरण का इतिहास ब्रिटिश विजयों, उपनिवेशों तथा व्यापार का इतिहास रहा है। किन्तु स.रा. अमेरिका के विश्व सैन्य शक्ति के रूप में उभार ने इसके विजय अभियान में अप्रत्याशित त्वरा ला दी। इस प्रक्रिया में अंग्रेजी मूल भाषी देशों यथा आस्टेªलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, इंगलैंड एवं अमरीका की सरकारों और निजी फाउंडेशनों द्वारा खर्च किए गए अरबों डालरों/पौंडों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह राशि किसी भाषा के प्रसार हेतु की जानेवाली, इतिहास की सर्वाधिक राशि है। खर्च की गयी इस प्रभूत राशि का परिणाम अंग्रेजी के सबसे लोकप्रिय दूसरी भाषा के रूप में उदय द्वारा हुआ। इसके वर्चस्व का दूसरा उदाहरण इसकी शब्दावली, पदबन्धों तथा मुहावरों का विश्व की अनेक भाषाओं में मिश्रण की परिघटना में मिलता है। अंग्रेजी की इस आक्रामकता का प्रतिरोध करने के लिए फ्रांस तथा स्लोवेनिया जैसे देशों ने विधायी इंतजाम किये हैं। इस आक्रामक भाषाई-सांस्कृतिक आधिपत्य को "एंग्लोमानिया" की संज्ञा दी गयी है। अंग्रेजी का विश्वव्यापी शिक्षण दो रूपों में संचालित होता है। पहला विदेशी भाषा के रूप में तथा द्वितीय भाषा यानि मातृभाषा के अतिरिक्त इतर भाषा के रूप में। दूसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी शिक्षण को प्रायोजित तरीके से विकास और समृद्धि के समरूप सिद्ध किया जाता है। फोर्ड फाउंडेशन के अनुसार केवल स.रा. अमरीका ही नहीं बल्कि इंडोनेशिया, फीलीपींस, थाईलैंड, भारत, तुर्की, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, मिस्र, नाईजीरिया, कोलम्बिया और पेरू जैसे देशों के विकास और औद्योगिक प्रगति की कुंजी अंग्रेजी है। ग्राम्शी के अनुसार ये विचार वर्चस्ववादी हैं। ये विचार दबाए गये समूहों द्वारा भी आत्मसात कर लिये गये हैं यद्यपि ये उनके हित में नहीं हैं। आज अंग्रेजी विश्व भर में निर्यात होने वाली एक प्रमुख पण्य बन चुकी है। उत्तर उपनिवेशवादी दौर में नवस्वतंत्र राष्ट्रों में वही वर्ग सत्ताधीश बन बैठा है जिसकी चर्चा ऊपर की गयी है। यह वर्ग शासन तथा सत्ता के लिए वैज्ञानिक प्रगति और आधुनिकता के छल छद्म को जिन्दा रखना चाहता है। इस उद्देश्य में अंग्रेजी उनकी सबसे बड़ी सहायक है। यह वर्ग अंग्रेजी सहित सभी पूर्व औपनिवेशक भाषाओं को शैक्षणिक एवं सामाजिक रामबाण के रूप में महत्त्व देता है। उनके लिए अंग्रेजी विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा यूनेस्को की तरह एक विश्व संस्था है। इसकी भूमिका असंदिग्ध और प्रश्नातीत मानी जाती है। इसके बरक्स अंग्रेजी की विश्व पूंजीवादी व्यवस्था के प्रमुख औजार के रूप में पहचान भी बुद्धिजीवियों और विश्लेषकों ने की है। पूंजीवाद का हित पूरे भूमंडल में व्याप्त है, इस तथ्य की पुष्टि करते हुए कैस्पर वेनबर्गर ने 20 मई, 1984 में "गार्जियन" के साप्ताहिक अंक में लिखा था-विश्व का कोई ऐसा कोना नहीं है, जो इतना सुदूर हो, कोई राष्ट्र इतना अमहत्त्वपूर्ण नहीं, जो स.रा. अमेरिका के हितों के लिए उपयोगी न साबित हो।

मई, 1990 में सोवियत संघ के पतन तथा पूर्वी यूरोप में समाजवादी व्यवस्था के पतन पर ब्रिटिश विदेश मंत्री ने घोषणा की थी, कि उनका लक्ष्य था, पूर्वी यूरोप के देशों में दूसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी द्वारा रूसी का प्रतिस्थापन। निश्चित रूप से ब्रिटेन किसी धार्मिक अथवा मानवतावादी धारणा से प्रेरित होकर ऐसा नहीं कर रहा था। जोशुआ फिशमैन, जो प्रसिद्ध समाज भाषा वैज्ञानिक हैं, ने अंग्रेजी को जातीय एवं विचारधारात्मक नजरिए से निरपेक्ष भाषा माना था। परन्तु एक दशक बाद उनके विचारों में अन्तर आया एवं वे अपने पूर्ववर्ती मूल साध ारणीकरणों में सुधार की मांग के पक्षपाती बन गए। आज के इस उत्तर-औपनिवेशिक समय में अंग्रेजी को पश्चिमीकरण, आधुनिकीकरण, वैज्ञानिक प्रगति, अंतरर्राष्ट्रीय युवा संस्कृति, लोकप्रिय प्रौद्योगिकी एवं उपभोक्तावाद से सम्बद्ध माना जाता है। ये सभी परिघटनाएं विचारात्मक रूप से निरपेक्ष अथवा अरंजित नहीं है। इन सभी के केन्द्र पश्चिमी औद्योगिकीकरण समाजों में है, जो अपने लाभ और हित में इनका संचालन करते हैं। मैनफ्रेड गोरलाच ने तीसरी दुनिया में अंग्रेजी की भूमिका की विवेचना करते हुए लिखा है कि अंग्रेजी के कारण इन देशों में विभेदक शैक्षणिक एवं सामाजिक विभाजन पैदा हुआ है। जोशुआ फिशमैन ने भी अंग्रेजी प्रसार की प्रवृत्ति को प्रश्नांकित करते हुए पूछा था, "इसका प्रसार कैसे होगा? एक विनम्र सहयोग के रूप में अथवा आधुनिकता के फैलते कैंसर के रूप में?19

तीसरी दुनिया के उन सभी देशों में जहां अंग्रेजी एक प्रमुख भाषा है, इसकी विशेषता है, इसके द्वारा प्राप्त धन का असमान संवितरण। ऐसे देशों की अर्थव्यवस्थाएं अंतरर्राष्ट्रीय शक्ति संतुलन में काफी कमजोर हैं। हाल के दशकों में इनके और पश्चिमी देशों के बीच की आर्थिक वैषम्य की खाई और चौड़ी होती गयी है। ऐसा तमाम तरह की सहायताओं और वैज्ञानिक-आर्थिक प्रगति के अंग्रेजी के दावे के बावजूद हुआ है।

अंग्रेजी शिक्षण को ब्रिटेन और अमेरिका की सरकारें अन्तरराष्ट्रीय कूटनीति का अंग मानती हैं तथा एक बड़ी राशि का प्रावधान इसके लिए किया जाता है। तीसरी दुनिया में अंग्रेजी शिक्षकों, पुस्तकों तथा छात्रवृत्तियों आदि के माध्यम से ब्रिटिश काउंसिल एवं फोर्ड फाउंडेशन जैसी संस्थाएं भाषाई एवं सांस्कृतिक वर्चस्व की स्थापना एवं उसके सम्पोषण में योगदान देती हैं। इन संस्थाओं द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम पिछडे़, जड़ एवं नैतिक अवबोध से शून्य होते हैं। इनमें पश्चिम के पतनशील मूल्यों की संस्तुति और वर्णन होता है। खाड़ी देश की किसी राष्ट्रीय विश्वविद्यालयीन संस्था के अंग्रेजी विभाग द्वारा आमंत्रित होने पर, उसके पाठयक्रम के बारे में एडवर्ड सईद ने कहा था "यहां अंग्रेजी भाषा को एक तुच्छ तकनीकी भाषा के रूप में न्यूनीकृत कर दिया गया है, जिसमें अभिव्यक्ति एवं सौंदर्यपरक विशेषताएं नदारद हैं, साथ में इसमें आत्मचेतना के संधान और विश्लेषण की रत्तीभर क्षमता भी नहीं है।"20

प्रत्येक भाषा का एक निश्चित चरित्र एवं भावबोध होता है। अंग्रेजी ऐतिहासिक कारणों से साम्राज्य की विस्तारवादी भावना से जुड़कर औपनिवेशिक चरित्र का वहन करने लगी है। ब्रिटिश अंग्रेजी साम्राज्यवादी चेतना का वाहक थी, जबकि अमेरिकन अंग्रेजी नव-उपनिवेशवाद की प्रतीक बन चुकी है। लेनिन ने अपनी पुस्तक "साम्राज्यवाद, पूंजीवाद की उच्चतम अवस्था" में साम्राज्यवाद को पूंजीवाद की एकाधिकारी अवस्था में जोड़ा है। लेनिन की स्थापनाओं का आधार आर्थिक प्रणाली है। साम्राज्यवाद की बाद की व्याख्याओं में इसके राजनैतिक सामाजिक और वैचारिक पहलुओं की पड़ताल भी की गयी है। सामग्रिक रूप से ये सभी वैश्विक असमानता के कारण हैं। आज हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जो लैंगिक, राष्ट्रीय, नस्ल, वर्ग, आय और भाषा सम्बन्धी विभेदों से आक्रांत है। तीसरी दुनिया के देशों में राजनीतिक एवं आर्थिक असमानता के लिए अंग्रेजी साम्राज्यवादी चेतना के वैधीकरण के प्रयास साक्षात रूप से उत्तरदायी हैं। निरपेक्ष एवं गैर राजनीतिक छद्म में चलने वाली अंग्रेजी शिक्षण व्यवस्था, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के बीच सांस्कृतिक अलगाव और विभेदमूलक पार्थक्य के लिए दोषी है। यह प्रणाली संरचनात्मक व्यवस्था के अंगों जैसे संस्थानों तथा वित्तीय आवंटनों के माध्यम से इस विभेदमूलकता में इजाफा करती है। यह भाषा ऐसी संरचनाओं को जन्म देती है, जो इसके तहत प्रभावी विचारों, व्यवहारों तथा रवैयों के माध्यम से सत्ता एवं संसाध नों के असमान वितरण को विधिमान्य एवं प्रभावी बनाकर पुनरुत्पादित करती है। ये संसाधन भौतिक और अभौतिक दोनों प्रकृति के होते हैं। अंग्रेजी अपनी इस साम्राज्यवादी भूमिका में "भाषावाद" को पैदा करती है।

संरचनागत एवं सांस्कृतिक असमानता अंग्रेजी के पक्ष में अधिक मात्र में भौतिक संसाधनों के आवंटन को सुनिश्चित करती है। यह आवंटन अन्ततः उन लोगों के लिए विशेषाधिकारी स्थिति का निर्माण करता है, जो इस भाषा में प्रवीण हैं। यह स्थिति भाषिक वर्चस्व और भाषावाद को जन्म देती है। यह भाषावाद दृष्टि से "आंग्लकेन्द्रिकता" को स्थान देता है, जिसमें अन्य संस्कृतियों का मूल्यांकन एवं आकलन अंग्रेजी विश्वदृष्टि से किया जाता है। यह दृष्टि देसी भाषाओं को पिछड़ी "वर्नाक्यूलर" मानती है और अमेरिका के मूलवासियों को रेड इंडियन। इस तरह सभी भाषाओं के लिए अंग्रेजी एक पैमाना बन जाती है। अंग्रेजी शिक्षण में पेशेवर नजरिए की वकालत तो खूब होती है, परन्तु उसके सामाजिक प्रतिफलन की चर्चा कहीं नहीं होती। समकालीन ज्ञानदर्शन में उत्तर के औद्योगिक राष्ट्रों तथा दक्षिण के विकासशील (यह पद पश्चिम द्वारा प्रदत्त) राष्ट्रों के बीच के सम्बन्धों को विश्लेषित करने के लिए दो सिद्धान्त प्रतिपादित किए गये हैं। ये सिद्धान्त क्रमशः आधुनिकता और साम्राज्यवादी थ्योरी के रूप में जाने जाते हैं।

नव उपनिवेशवाद में प्रभुत्वकारी राष्ट्र अविकसित राष्ट्रों के समक्ष विकास के प्रतिमान निर्धारित करते हैं। वे इन अविकसित राष्ट्रों को आधुनिकता से मोहाविष्ट कर उनको अपनी तरह बनाने का सब्जबाग दिखाते हैं, जिसमें इन राष्ट्रों के सत्ताधारी वर्ग के प्रतिनिधि फंस जाते हैं। जबकि वास्तविकता है कि उपनिवेशों के अबाध लूट से समृद्ध हुए पश्चिमी देशों की समृद्धि के स्तर को छूने के लिए, पृथ्वी से बड़े आकार का एक ग्रह चाहिए, जिसका अंधा-धुंध दोहन किया जा सके। अविकसित एवं पिछड़े देशों में से अधिकांश ने, पश्चिमी मॉडल की आधुनिकता और विकास पद्धति को पिछले आधी सदी से चुन रखा है, किन्तु पश्चिमी देशों के समान विकास की कौन कहे, वे निरन्तर कर्ज में डूबते गए हैं। अंग्रेजी शिक्षा को मानवीय सम्पदा का श्रेष्ठ निर्माता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस शिक्षा में दीक्षित अधिकांश मेधावी जनों की शिक्षा की सार्थकता, अमेरिकी यूरोपीय संस्थानों की चाकरी में साकार होती है। बौद्धिक उपनिवेशवाद पश्चिमी औद्योगिकीकृत देशों की सहायता राजनीति की परिणति के रूप में भी संस्थानीकृत होता है। आर्थिक सहायता के बाद पिछड़े देशों के सामने "संरचनात्मक समायोजन" की शर्त रखी जाती है। इसका अर्थ है, विकसित देशों के हितों के अनुकूल अपनी अर्थव्यवस्थाओं का समायोजन। विश्व बैंक और आई.एम.एफ (अंतरर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष) की भूमिका इस पूरे उपक्रम में औद्योगिक देशों के अभिकर्ता की रही है। गरीब देशों के इस अनुभव को तंजानिया के पूर्व राष्ट्रपति जूलियस लेरेरे के निम्नलिखित कथन में अभिव्यक्ति मिली है। सैनिक बेड़ों के विपरीत आर्थिक ताकत का इस्तेमाल एकतरफा होता है, जिसका उद्देश्य ताकतवर की इच्छा लागू करना होता है। आई. एम.एफ. कमोबेश सम्पन्न राष्ट्रों का औजार बन गया है, जो गरीब देशों का आर्थिक और वैचारिक नियंत्रण करना चाहता है।

गालतुंग ने भाषाई साम्राज्यवाद की विवेचना करते हुए इसे अन्य प्रकार के साम्राज्यवादी वर्चस्वों की सापेक्षता में समझने का प्रयास करते हुए, उनके बीच अन्तरसम्बन्धों की तलाश की है। वे भाषाई साम्राज्यवाद को सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का एक उपरूप स्वीकार करते हैं। इसके सक्रिय घटकों में वैश्विक निगम, मीडिया, तकनीक और शैक्षणिक संस्थानों को शामिल किया गया है। सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के ये अंशक एक व्यापक सामाजिक-राजनैतिक संरचना में सक्रिय होते हैं जो स्वयं कई अन्तर्विरोधों से ग्रस्त होता है। भाषाई साम्राज्यवाद को भाषा वैज्ञानिकों ने कई प्रकार से परिभाषित किया है। कलै वटे इसे भाषाई नस्लवाद के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। घाना के समाजभाषा वैज्ञानिक गिल्बर्ट एन्स्रे ने इसे निम्नांकित शब्दों में व्याख्यायित किया है।

"इस परिघटना में किसी भाषा के बोलने वाले लोगों के दिमाग तथा जीवन पर किसी अन्य भाषा का इतना प्रभुत्व स्थापित हो जाता है कि वे सोचने लगते हैं कि जीवन के उन्नत संदर्भों जैसे शिक्षा, दर्शन, साहित्य, प्रशासन एवं न्याय व्यवस्था आदि में उन्हें विदेशी भाषा में संव्यवहार करना चाहिए। भाषाई साम्राज्यवाद अत्यंत सूक्ष्म तरीके से मानसिकता, व्यवहार तथा आकांक्षाओं में परिवर्तन कर देता है, जिससे अभिजात तबका भी प्रभावित हो जाता है। वह देसी भाषाओं की क्षमताओं को समझने में अशक्तय हो जाता है।"21

नस्लवाद के स्थापित होने का तरीका भी यही है। भाषाई साम्राज्यवाद के अंशकों में वैज्ञानिक प्रभुत्व भी महत्त्वपूर्ण है। साम्राज्यवादी देश हमेशा पाठ्यक्रम निर्माण के लिए आदर्श स्रोत समझे जाते हैं। ईसाई धर्म के उपदेशों से लेकर आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के उपदेशों तक, शिक्षण सामग्री की सार्थकता तथा मानकता का निर्धारण इन देशों के संस्थानों का विशेषाधिकार बन चुका है। एशिया तथा अफ्रीका के बारे में अध्ययन अमेरिका, इंगलैंड तथा पश्चिमी देशों के संस्थानों तथा व्यक्तियों द्वारा सम्पादित किए जाते हैं। वे इन गरीब देशों से पुरातात्विक सामग्री, जीव वनस्पति, शिलाएं, आंकड़े विचार, अभिमत, व्यवहार प्रणाली आदि संग्रहित करते हैं, जिनका विश्लेषण और प्रसंस्करण यूरो-अमेरिकी केन्द्रित दृष्टिकोण से किया जाता है। प्राप्त निष्कर्ष और विचार उपभोग और जनमत निर्माण के लिए वापस इन एशियाई अफ्रीकी देशों में निर्यात कर दिए जाते हैं।

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद उन सभी प्रक्रियाओं का समुच्चय है, जिनके द्वारा किसी समाज को आधुनिक विश्व व्यवस्था में शामिल किया जाता है, तथा उस समाज के प्रभुत्वकारी तबके को, उस देश की सामाजिक संस्थाओं को पश्चिमी देशों के मानकों के अनुकूल बनाने के लिए आकर्षित तथा मजबूर किया जाता है। कभी-कभी इनके लिए प्रभावशाली वर्ग को घूस भी दी जाती है। परिणामस्वरूप मूल्यों और संरचनाओं को पश्चिमी केन्द्रों की इच्छा के अनुसार ढाला जाता है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कई तरह के संसाधन उपयोग में लाये जाते हैं। इनमें सभी तरह के वाणिज्यिक उत्पाद, फिल्में तथा टेलीविजन धारावाहिक शामिल हैं। प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि स.रा. अमेरिका दूरसंचार एवं उपग्रह प्रणाली में विश्व में अग्रणी भूमिका रखता है। इसके अलावा वैश्विक विज्ञापन एजेंसियां, युवा संस्कृति और अंतरर्राष्ट्रीय राजनय द्वारा भी सांस्कृतिक प्रतिमानों को अनुकूलित करने का प्रयास किया जाता है। उच्च शिक्षा तथा शिक्षा माध्यम को प्रभावित करके भी इस प्रक्रिया में योग दिया जाता है। इसे शैक्षणिक साम्राज्यवाद की संज्ञा दी जा सकती है।

इन सभी प्रकार के साम्राज्यवादी प्रभुत्वों के केन्द्र में अंग्रेजी भाषा है जो एशिया, अफ्रीका के देशों की राष्ट्रीय भाषाओं को प्रतिस्थापित करती है। यह इन भाषाओं की कीमत पर बढ़ती है। यह इन देशों की प्रमुख भाषाओं और स्थानीय भाषाओं के बीच विभेद पैदा करती है। यह देशों में भाषाओं की एक पदानुक्रमिक व्यवस्था कायम कर देती है। इस व्यवस्था के शीर्ष पर अंग्रेजी स्वयं आरूढ़ हो जाती है तथा अपने लिए देसी अभिजात वर्ग को समर्थन सुनिश्चित कर लेती है। यह बहुभाषी समाजों की लघु जातीयताओं में बड़ी जातियों का डर और उनके प्रभुत्व का हौवा खड़ा कर देती है। छोटी अस्मिताओं को देश की महान परम्परा और राष्ट्रीय अस्मिता के खिलाफ उभाड़कर स्वयं निरपेक्ष दशा का भ्रम स्थापित करने में यह सफल रहती है। तंजानिया में अंग्रेजी प्रभुत्वशाली भाषा है जो वहां की प्रमुख भाषा स्वाहिली के खिलाफ अन्य अल्पसंख्यक भाषा भाषियों के बीच अविश्वास और शंका पैदा करती है। इसी प्रकार स्वतंत्रता के उपरांत भी फ्रेंच की माली में अभिभावी स्थिति हैं। यह स्थिति केवल अफ्रीका के देशों की नहीं है, यहां तक कि नार्डिक देशों में भी इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों से अंग्रेजी की पैठ बढ़ी है।

इन विस्तारवादी गतिविधियों के पीछे केवल सरकारी प्रयत्नों की भूमिका ही नहीं हैए बल्कि निजी उपक्रमों का अवदान भी महत्त्वपूर्ण है। इन उपक्रमों को सरकारी सहायता नेपथ्य से उपलब्ध रहती है। राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सरकारी सहायता से ष्रीडर्स डाईजेस्टष्ए ष्टाईमष् एवं ष्लाईफष् का प्रकाशन विश्व युद्धों की बाद की अवधि में किया गया। इन प्रकाशनों के लिए अमेरिकी सरकार ने काफी अनुदान दिया। यूरोपीय लोगों में अमेरिकी रुचियों और विचारों को लोकप्रिय बनाने में इन पत्रिकाओं ने काफी योगदान दिया। ब्रिटिश सरकारी सहायता द्वारा पुस्तकों का प्रकाशन तथा उनका प्रसार भी इन सांस्कृतिक वर्चस्ववादी गतिविधियों में शामिल है। ये पुस्तकें पुराने कीटनाशकों और दवाइयों की तरह तीसरी दुनिया के देशों में डम्प की जाती है।

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की प्रक्रिया में औद्योगीकृत देशों के उत्पाद (बौद्धिक उत्पाद भी) तीसरी दुनिया के लिए मॉडल बन जाते हैं एवं प्रक्रिया में स्थानीय सांस्कृतिक सृजनशीलता तथा सामाजिक नवोन्मेषों कोए जो सदियों के अनुभवों से जन्म लेते हैंए को नष्ट कर देते हैं। धीरे.धीरे यह स्थानीय समाजों में विसंस्कृतिकरण की प्रक्रिया को जन्म देता है। इस प्रक्रिया में अंग्रेजी की भूमिका की पड़ताल उसके सम्प्रेषण माध्यम होने के साथ.साथ संस्कृति की वाहक के रूप में पहचान कर की जा सकती है। अंग्रेजी यूरोप के देशों में सम्प्रेषण माध्यम के रूप में प्रयुक्त होती है। यह उन देशों की संस्कृति की वाहक भाषा नहीं है। अधिकांशए समाजों में लिखने और बोलने की भाषाएं एक होती हैं। वे एक दूसरे का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस रूप में यह संवेदनों और जीवनानुभवों से जुड़ी होती है। यह संस्कृति की अभिव्यक्ति की भाषा बन जाती है। किन्तु उपनिवेशवाद इन भाषाओं को अपदस्थ कर अपनी भाषाओं की प्रतिष्ठा करता है। ये भाषाएं सीमित अर्थों में सम्प्रेषण यानी लिखित सम्प्रेषण की भाषा बन जाती है। इनका सम्बन्ध उस समाज की संवेदना और संस्कृति से नहीं होता यह मात्र व्यावसायिकता की भाषा होती है। समाज में इसके प्रभुत्व से जातीय स्मृतियां विलीन होने लगती हैं। इनके महत्त्व के प्रति समाज शंकालु होने लगता है। स्मृतियों से विच्छिन्न समाज के समक्ष अस्मिता काए पहचान का संकट उत्पन्न हो जाता है। अस्मिता का यह संकट प्रायः परम्परा और आधुनिकता के द्वंद्व के रूप में प्रकट होता है। इसे ग्रामीण बनाम शहरी के अन्तर्विरोध के रूप में भी परिलक्षित किया जाता है। मूल्यों के टकराव का कारण भी इस विभाजन को समझा जाता है। आधुनिक उद्योगए विज्ञान और टेक्नोलॉजी को परम्परा और किसान संस्कृति के प्रतिपक्ष में देखा जाता हैए जबकि इनको उपयुक्त ढंग से अधिकृत और नियंत्रित किया जाए तो देहातों का आर्थिक रूपांतरण एवं पिछड़ी जनता का सांस्कृतिक नवनिर्माण सम्भव है।

औपनिवेशिक प्रणाली ग्रामीण अंचलों एवं शहरी क्षेत्रें को आत्मनिर्भर द्वीपों में बदल देती है। पूंजीवादी विकास की उच्चतर अवस्थाओं में ग्रामीण क्षेत्रें की शहरों पर अधीनता बढ़ती जाती है। विकासशील देशों की गरीबीए निरक्षरताए रोगग्रस्तता के लिए साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। नवउपनिवेशवाद के दौर में भी साम्राज्यवाद का प्रभाव इन विकासशील देशों के सत्ताधारी वर्ग पर है। साम्राज्यवाद अपने विचारों के अनुसार दुनिया का निर्माण करना चाहता है। इसके लिए सांस्कृतिक प्रभुत्व की आवश्यकता पड़ती है। मानसिक नियंत्रण के बिना आर्थिक और राजनैतिक नियंत्रण सम्भव नहीं होता। जनता की भाषाओं का विनाश और साम्राज्यवादी भाषाओं को थोपने के पीछे यही प्रेरणाएं हैं। औपनिवेशिक प्रणाली कभी भी समूची आबादी को सांस्कृतिक तौर पर गुलाम नहीं बना सकती है। इसके लिए पूर्व उपनिवेशों में वे एक औपनिवेशिक अभिजात वर्ग पैदा करते हैं, जो पश्चिमी बुर्जुआ की छाया होता है। "द रेचेड ऑफ द अर्थ" में फ्रेंज फैनन ने इस वर्ग की निर्माण प्रक्रिया का सटीक वर्णन किया है।

दुर्भाग्य से इन नव स्वतंत्र राष्ट्रों में यही वर्ग सत्ता में है। यह नव उपनिवेशवादी संस्कृति के प्रसार के लिए कटिबद्ध है। इस संस्कृति का सबसे बड़ा अन्तर्विरोध राष्ट्रीय अस्मिता और आत्म चेतना से है। अंग्रेजी इस नव उपनिवेशावादी चेतना का सबसे बड़ा प्रतिमान है। इसकी भूमिका षडयंत्रकारी और विभेदक रही है। अपनी विघटनकारी भूमिका में साम्राज्यवाद लघु अस्मिताओं को भड़काकर देश में विखंडन की चुनौती प्रस्तुत कर रहा है। उसके प्रमुख औजार अंग्रेजी की भूमिका देश में वर्गीय विभाजन की और विषमतामूलक रही है। प्रारम्भ से ही यह राष्ट्रीय आत्मचेतना के प्रतिपक्ष में रही है, आज भी हम उसे उसी भूमिका में पा रहे हैं।

सन्दर्भ[सम्पादन]

1. जे वान्द्रिएज भाषा (अनुवादक जगवंत किशोर बलबीर) हिन्दी समिति सूचना विभाग, लखनऊ, पृ. 31 2. बोरिस क्लूयेब, स्वतंत्र भारत जातीय एवं भाषाई समस्या, पीपुल्स पब्लिशिंग हाऊस, मास्को, 1986, पृ. 301

3. न्गुगीवा थ्योंगे, भाषा संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता, सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली 1994, पृ. 25

4. राबर्ट एल.कपूर एवं बनार्ड स्पोल्सकी (सं.) इन्फ्रलूएंस ऑफ लैंगुएज ऑन कल्चर एंड थॉट, माऊटन डी ग्रूययटर, न्यूयार्क, 1991, पृ. 14

5.वही पृ. 47

6. श्रीवास्तव रवीन्द्रनाथ, भाषाई अस्मिता और हिन्दी, वाणी प्र., 1996, पृ. 17

7.एस. मुखर्जी, हिस्ट्री ऑफ एजूकेशन इन इण्डिया (बड़ौदा, 1951) पृ. 32

8. तुलसीराम, भारत में अंग्रेजीः क्या खोया क्या पाया, वाणी प्रकाशन, पृ. 40

9. एड्वर्डज, ब्रिटिश इंडिया, पृ. 141

10.आर्थर मे“यू द एजूकेशन ऑफ इंडिया, पृ. 15

11. कलकत्ता यूनिवर्सिटी कमीशन रिपोर्ट, टप् पृ. 17

12. वही पृ. 17

13. तुलसीराम, भारत में अंग्रेजीः क्या खोया क्या पाया, पृ. 79

14. सुन्दरलाल, भारत में अंग्रजी राज भाग प्प्प् पृ. 1144, 1148

15. पवन कुमार वर्मा, मध्यवर्ग की अजीब दास्तान, राजकमल, 1999, पृ. 22 से उद्धृत।

16. श्रीभगवान सिंह, गांधी और दलित भारत जागरण, पृ. 166 से उद्धृत

17.श्रीभगवान सिंह, गांधी और दलित भारत जागरण, पृ. 170

18. राबर्ट फिलिपसन, लिंग्युस्टिक इम्पीरियलिज्म, पृ. 6

19. वही पृ. 11

20. वही पृ. 15

21.वही पृ. 56

बाहरी कड़ियाँ[सम्पादन]

यह लेख संवेद के जनवरी, २०१० अंक से साभार लिया गया है।