वनवासी राम के बहाने समकालीन कथासाहित्य पर कुछ बातें
वनवासी राम के बहाने समकालीन कथासाहित्य पर कुछ बातें'
रामनाथ शिवेंद्र

तमाम बिडंबनाओं के बावजूद हमें ‘राम, कृष्ण और शिव’ की चर्चित कथायें सदैव प्रभावित करती रही हैं। इन कथाओं के अलावा दुनिया के लोग शायद ही किसी दूसरी कथा को जानते होंगे जो इन कथाओं के मर्म को फलांग सकंे। इन कथाओं के अपूर्व होने पर मुझे सन्देह नहीं। ‘राम’ का वनवासी रूप हमें आज के भौतिकवादी समय में जितना प्रभावित करता है उतना किसी और कथापात्र का नहीं। कथा पढ़ते या सुनते ही सांसें फूलने लगती हैं। लगता है कि कोई ऐसा व्यक्ति हो ही नहीं सकता जो मर्यादा के बंधन में खुद को जकड़ ले क्योंकि बंधन कुदरती नहीं होता है। व्यक्ति सदैव स्वतंत्र रहने का आकांक्षी होता है। यह बात अलग है कि उसकी स्वतंत्रतायें बाधित कर दी जांयें या छीन ली जायें, जैसा कि हुकूमतें हर काल में किया करती रही हैं। मानव सभ्यता के विकासक्रम में कोई ऐसा काल नहीं जब मानव सभ्यता की कुदरती आजादी को तमाम पाबन्दियों में न रखा गया हो, भले ही वह काल दीर्घ न रहा हो, अल्प ही रहा हो। सत्ता तो हर काल में व्यवस्था और शान्ति स्थापनाओं के नाम पर तमाम तरह के रंगीन कानूनों के द्वारा अपने नागरिकों को आच्छादित करती रही है। बहरहाल यह प्रसंग सत्ता कौतुकों के विमर्श की तरफ ले जाता है जिसे यहां प्रस्तुत करना प्रासंगिक नहीं होगा। समझना होगा कि यह जो राम का मर्यादा वाला रूप है, खुद को नियंत्रित व प्रतिबंधित करने वाला (राम तो राज कुमार थे, उनकी आजादी को भला कौन बांध सकता था) क्या सरल और तरल है, क्या उसे बचाने में एक मनुष्य के नाते राम की जो स्वतंत्रतायें थीं, वे छिन नहीं गयीं? या उन्हांेने खुद से अपनी स्वतंत्रताओं का परित्याग नहीं किया? क्या यह अचरज नहीं है कि ‘राम’ अपनी वैयक्तिक स्वतंत्रताओं के त्याग के बाद भी पूरी मानवीय गरिमा के साथ सामान्य मनुष्य की तरह कथासमय के साथ भाग रहे हैं, यह जो राम की समान्यता है, राजा से परजा बनने की तरफ की छलांग है, विचारणीय है, जबकि ऐसा होता नहीं। लोग तो खुद को समाज के विशेषाधिकार प्राप्त खानों में स्थापित करने के लिए ही लालायित व उत्सुक रहते हैं। पर ‘राम’ ऐसा नहीं करते, वे तो राजा से परजा की तरफ छलांग लगाते हैं। आखिर खुद को नियंत्रित कर सामान्य बने रहने का चयन ‘राम’ ने क्यों किया? उनका काल था त्रेता वाला, सत्युग के ठीक बाद वाला, कहीं उसका प्रभाव तो ‘राम’ पर नहीं था? माना जाता है कि सत्युग का काल संपूर्ण मानवीय स्वतंत्रता व समत्व वाला काल था। उसके बाद के काल का नायक भी तो सत्गुण वाला ही होगा भला वह तामस प्रवृत्ति का कैसे हो सकता है? ‘राम’ का वनगमन दुनिया के इतिहास में एक असाधारण घटना है। वे वनगमन का चयन करके वनवासी हो जाते हैं पर सत्ता व्यवस्थापन पर सवाल नहीं उठाते, अपने सामान्य से अधिकारों के लिए भी सवाल नहीं उठाते, कम से कम इतना तो सत्ता व्यवस्था से पूछ ही सकते थे कि उन्हें वन में क्यों निर्वासित किया जा रहा है या उनके उŸाराधिकार को क्यों छीना जा रहा है, वह भी बिना कारण बताये। ‘राम’ का वनवास या निर्वासन तत्कालीन सत्ता व्यवस्था पर सवाल की तरह चिपका हुआ है। थोड़ा गंभीरता से सोचने पर स्पष्ट हो जाता है कि हर काल का सत्ता प्रबंधन एक ही तरह से काम करता रहा है, भले ही वह काल राम का ही क्यों न रहा हो। सत्ता प्रबंधन से जुडी कैकेई की इच्छा राज्यादेश में तब्दील हो जाती है। किसी व्यक्ति की इच्छा का राज्यादेश में तब्दील होने का यह एक चिंतित करने वाला उदाहरण है। मजा यह कि राम उस आदेश को सहर्ष स्वीकर लेते हैं और वनगमन कर जाते हैं, वे प्रतिकार नहीं करते उनके सामने मर्यादा का सवाल था, वे किसी भी हाल में मर्यादा नहीं तोड़ सकते थे। मर्यादा और अधिकार पर विमर्श का एक जरूरी आधार राम वनगमन के द्वारा छोड़ जाते हैं। सवाल है मर्यादा और अधिकार के बीच के फर्क का। मर्यादा क्या होती है और कैसे बनती है, यह सारा कुछ वैयक्तिक होता है, व्यक्ति उसका खुद मानक और प्रमाण होता है। मर्यादा निजता के अन्तर्वोध की उपज होती है, जहां चित्त और चेतना एकाकार हो कर समूहगत हो जाती हैं, वहां ‘निज’ जैसा कुछ नहीं होता। जबकि अधिकार तो सत्ता प्रबंधन द्वारा प्रदान किया गया महज एक औजार होता है जो सामन्य से विशेष की तरफ ले जा कर वगीकृत करता है। आज की उपभोक्तावादी समय में मर्यादा और अधिकार में से किसी एक का चयन करना हो तो अधिकार का पक्ष ही चुना जायेगा मर्यादा का नहीं, पर राम के लिए संकट है। वे मर्यादा का चयन करते हैं और वनगमन कर जाते हैं, वे प्रतिवाद नहीं करते। वे अपने अधिकारों को मर्यादा से ऊपर नहीं रखते। तो ये हैं राम, जो स्वेच्छया अपने कुदरती अधिकारों का परित्याग करते हैं और मर्यादा के कठिन और जटिल रास्तों पर निकल पड़ते हैं। वनगमन के अलावा आप देखें पूरी रामकथा में सीता का अपहरण एक ऐसी दूसरी परिघटना है जो राम के संपूर्ण व्यक्तित्व को खोलने का काम करती है और इस घटना के घटने का कारण होता है राज्यादेश के अनुपालन के लिए राम का वनगमन। तो यह जो राम का वनगमन है पूरी दुनिया के लिए एक कथानक के रूप में अपूर्व और अद्भुत है। ऐसे वनगमन का कथानक दुनिया के किसी सभ्यता में नहीं है। राम चाहते तो अयोध्या छोड़ कर किसी दूसरे राज्य में जा कर अपना आश्रय तलाश कर सकते थे, उन्हें उस समय का कोई राज्य राज्याश्रय दे ही देता। पर राम ऐसा नहीं करते। राज्यादेश के अनुपालना में वे सहर्ष वनगमन करते हैं, तो हमें देखना है कि यह जो राम के द्वारा लिया गया वनगमन का निर्णय है, वह क्या रामकथा को आगे छलांग लगाने भर का निर्णय है या इसके अर्थ कुछ दूसरे हैंं। जहां तक मुझे पता है राम के वन गमन वाले निर्णय पर गंभीरता से विचार ही नहीं किया गया है, जबकि पूरी रामकथा में यह जो राम का वनगमन है अपूर्व और अद्भुत कथानक है। ऐसी कथा मानव सभ्यता के इतिहास में कहीं नहीं है। किसी संभावित राजा के वनगमन का निर्णय सरल नहीं है आखिर वन ही क्यों? राम तो नागर समाज के थे पर हमें ध्यान देना है कि राम मर्यादा पुरुष हैं, मर्यादा के बंधन से बंधे हुए हैं, वे जानते हैं कि उनके लिए वन ही वह स्थान है जहां वे अपने चिŸा और चेतना दोनों को नियंत्रित रख सकते हैं। वन एक ऐसा स्थान है जहां सामाजिक व राजनीतिक प्रबंधन में कोई घालमेल नहीं है, रिश्तों में चालाकियां और कलाबाजियां नहीं होती हैं, वन के लिए नागर और अरण्यक का कोई अर्थ नहीं। सो वे वनगमन करते हैं। यह जो राम का वनगमन है, रामकथा के शुभेच्छुओं के लिए चिंतन मनन के कई दरवाजे खोल सकता है, अगर वे चाहें तब। वे मानवीय भिन्नता के भेदों के रहस्यों तक भी इस कथा के माध्यम से पहुंच सकते हैं, समझ सकते है कि आदमी और आदमी में भेद नहीं होता। हर आदमी प्रकृति का बेहतर उत्पाद होता है। राम वनगमन न करते तो सीता का अपहरण नहीं होता, बालि नहीं मारा जाता, उन्हें हनुमान जैसा भक्त भी नहीं मिलता और नही लंका विजय होता। तो ये सारे घटनाक्रम राजप्रबंधन से जुड़े हुए हैं पर जो शबरी वाला प्रसंग है वह तो दूसरी कथा के रूप में रामकथा में महत्वपूर्ण स्थान पाता है जो राम के वनवासी होने के रूप को उद्घाटित करता है। वनवासी राम और अयोध्या के राम में कोई तुलना नहीं क्योंकि अयोध्या के राम के लिए तो कुछ करना ही नहीं था। एक राजा की तरह वे उŸाराधिकार का ही तो वे सुख भोग सकते थे। जबकि वनवासी होकर राम पूरी तरह अरण्यक सभ्यता के नागरिक बन जाते हैं अरण्यक यानि आदिवासी सभ्यता, वन की सभ्यता, जो कुदरती होती है, कुदरती जमीन पर उगती है, जहां स्वामित्व और नियंत्रण के रोग नहीं होते पूरी तरह समत्व पर आधारित एक ऐसी सभ्यता जिसका जीवन ही वन हो, वन की तरह हरा भरा, उन्मुक्त, जीवन के रागों को गुनगुनाता। आदिवासियों के बीच राम का जो रूप है वह अयोध्या वाला नहीं है, वे वहां राजा नहीं हैं, वनवासी हैं, सबके प्रिय हैं, चित्त और चेतना के साधक हैं, प्रकृति की तरह प्रकृतिमय है। आदिवासियों की लोककथाओं में सीता के अपहरण का प्रसंग बहुत ही अश्रुपूर्ण है, उनकी लोक कथाओं से यह मालूम नहीं होता कि रावण विद्वान था केवल इतना पता चलता है कि रावण अत्याचारी था और उसने छल करके सीता का अपहरण किया था। यह भी मिलता है कि रावण लंका का राजा था। धांगरों और खरवार जनजातियों में एक गीत गाया जाता है जिसके बीच में आता है..
‘सीता मइया के भगाय ले गयल बभना हो, उहै बभना जवन देलेस भगाय, बिभीसन के रजवा (राज्य) से हो।
सीता के अपहरण का कथानक आदिवासियों के गीतों में कई तरह से ढला हुआ है। यहां यह ध्यान देने लायक है कि उनके गीतों में रावण को राजा के रूप में नहीं देखा जाता है, रावण उनके गीतों में उपस्थित है एक ब्राह्मण के रूप में। इससे यह पता चलता है कि आदिवासियों में सत्ता प्रबंधन या राजा के बारे में कोई विमर्श नही था, वहां विमर्श है जाति पर। ऐसा लगता है कि राम के काल में भी जाति के सवाल मौजूद रहे हैं भले ही वे प्रमुख न रहे हों, पर रहे हैं। इस गीत से दूसरी सूचना मिलती है कि वनवासी राम आदिवासियों में वनप्रसंगों के कारण अधिक लोकप्रिय हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि वे अयोध्या के राम के रूप में कम लोकप्रिय हैं। आदिवासियों के विस्थापन की कहानियां किसे नहीं मालूम। राम भी अयोध्या से विस्थापित किये गये थे। संभव है नागर सभ्यता के पोषकों ने उस समय भी तमाम अवोध व कमजोर लोगों को विस्थापित किया हो। और जंगल में विस्थापितों का ही वर्गसमूह निवास करता रहा हो, वे भला राम को क्यों नहीं मान, सम्मान देंगे? हम जानते है कि आधुनिक सभ्यता ने कारखाना बनाने के नाम पर मुख्यतः आदिवासियों, वनवासियों को ही विस्थापित किया है, उनसे सरकारों ने वन की अंतरंगता को छीन लिया है, विस्थापन की इस स्थिति पर एक आदिवासी गीत देखें जो राम को समर्पित है... ‘जनमवा काहे देला राम!
भात भात लरिका नरियांय, बनिया मांगे दाम.. जनमवा काहे देला राम! करजा काढि खेतवा रोपली, उहो गयल झुराय, बरधा बेचि के दरोगवा के देहली, बनवा से देलेस निकाल। जनमवा काहे देला राम!’
राम को समर्पित इस गीत से स्पष्ट है कि आदिवासी समूहों में राम उनके यहां भी उनके अन्य राजा लाखन, मघन्त, दूल्हा देव, बड़ा, भासुरिया, भैरव माता, आदि देवी देवताओं की तरह पूज्य हैं। पूज्य तो उनके गीतों व पारंपरिक पूजाओं में हनुमान, काली माई आदि भी हैं। सामान्यतया आज के आदिवासी पहले वाले नागर और अरण्यक सभ्यता में विखंडित आदिवासी नहीं हैं, वे अब मुख्य धारा की तरफ लौटते हुए लोगों में हैं, वे बदल रहे है, पूजा और आराधना के क्षेत्रों में तो उनमें उल्लेखनीय बदलाव हुए हैं। हां वे आर्थिक रूप से भी बदलना चाह रहे है पर यह जो स्वामित्व और पूंजी पर टिकी सŸाा है उनके बदलावों के प्रति उदार नहीं है। जहां तक आदिवासी समाज में राम की उपस्थिति का सवाल है वह एक अलग तरह का सवाल है। राम तो सभी के हैं, राम के लिए नागर और अरण्यक का कोई मतलब नहीं। पूरी रामकथा चाहे वह जिस किसी के द्वारा लिखी गयी हो उसमें वर्णित राम को किसी जाति विशेष के खानों में नहीं बांटा जा सकता। राम की असल कथा तो वनगमन से प्रारंभ होती है। वे वनगमन के बाद ही शबरी से मिल पाते हैं, वनगमन के बाद ही उन्हें पता चलता है बालि के बारे में। तो यह जो बाली और सुग्रीव है, यह जो शबरी है, सभी आदिवासी हैं। राम कथा प्रसंगों में निषाद, राक्षस, शबर, वानर, नाग आदि जैसी जन जाति का संदर्भ आता है, जाहिर है राम का संपूर्ण मानवीय कर्म वन में ही फलित होता है। अयोध्या का लंका तक का फैलाव उस और में कोई साधारण कार्य भार नहीं था पहले तो अयोध्या केवल अयोध्या था उसका फैलाव लंका तक नहीं था। इस संदर्भ में यहां डा. लोहिया को उल्लिखित करना आवश्यक है। ये वही लोहिया जी हैं जोे रामायण मेले का आयोजन अयोध्या में करवाते रहे हैं। पहली बार किसी राजनेता ने राम कथा को राजनीति की कथा की तरह देखा था, और कहा था.. ‘धर्म दूरगामी राजनीति है और राजनीति अल्पकालीन धर्म’ ‘राम का जीवन बिना हड़पे (राज्य) हुए ही फैलने की कहानी है। उनका निर्वासन देष को एक षक्तिकेन्द्र के अन्दर बांधने का एक मौका था। इसके पहले प्रभुत्व के दो प्रतिस्पर्धी केन्द्र थे, अयोध्या और लंका। अपने प्रवास में राम अयोध्या से दूर लंका की ओर गये। रास्ते में अनेक राज्य और राजधानियां थीं जो एक या दूसरे केन्द्र की मातहत थीं। मर्यादित पुरुष राम की नीति निपुणता की सबसे अच्छी अभिव्यक्ति तब हुई जब राम ने रावण के राज्यों में एक बड़े राज्य को जीता, उसका राजा बालि था। बालि से उसके भाई सुग्रीव, और सेनापति हनुमान दोनों अप्रसन्न थे, वे रावण के राज्य से निकल कर राम की मित्रता और सेवा में आना चाहते थे।’^भारत माता धरती माता, डा.. राममनोहर लोहिया पृ. 69 तो यह है राम का सार्वभौम मानवीय व्यक्तित्व। वे अयोघ्या का फैलाव लंका तक कर जाते हैं पर बिना किसी साम्रज्यवादी क्रूरता से। राम सुग्रीव की व्यथा का साक्षी बनते हैं और उन्हें ही बालि के जीते हुए राज्य का राजा बना देते हैं। ये वही सुग्रीव हैं जो लंका विजय अभियान में पूरी निष्ठा के साथ राम का सहयोग करते हैं। और हनुमान, जो कभी सुग्रीव के सेनापति हुआ करते थे वे तो राम के अपूर्व भक्त हो ही जाते हैं तो ये हैं राम, अपनत्व के प्रतीक, जो भी उनके करीब आया उनका हो गया। यहां विभीषण का उल्लेख करना भी आवश्यक है, राम पूरी आत्मीयता और सहृदयता से विभीषण का साथ देते हैं और लंका विजय के बाद उन्हें लंका का राजा बनवा देते हैं। पूरे निर्वासन के दौरान हुए संघर्षों से पाया हुआ कोई भी चीज राम अयोध्या नहीं ले आते सब वहीं छोड़ देते हैं, चाहे लंका का संदर्भ हो चाहे बालि के राज्य का, दोनों राज्यों को राम स्वतंत्र छोड़ देते हैं, उन्हें पराधीन नहीं बनाते, कुल मिला कर अयोध्या में नहीं मिलाते जैसा कि साम्राज्यवादी ताकतें किया करती हैं। राम ऐसा नहीं करते। जाहिर है कि राम पराधीनता का दर्द जानते थे सो वे लंका और सुग्रीव के राज्य को स्वतंत्र ही रहने देते हैं उन्हें अयोध्या में विलीन नहीं कराते। तो यह है राम के कृत्रित्व की मानवीय समीपता। राम दूसरे राजाओं से जिस मैत्रीपूर्ण रिश्ते का निर्वहन करते हैं और जिस तौर तरीके से करते हैं उसे कम से कम उन देशों को नकल करने की आवश्यकता है जो राज्यों को हड़प करना आपना कर्तव्य मानते व जानते हैं, पर क्या ऐसा हो सकेगा? राम के वनगमन के कथानक की स्वीकार्यता का सवाल पूरी सभ्यता के स्वीकार्यता से जुड़ा हुआ है। शबरी के जूठे बैर खाने वाला कथानक तो अपने आप में एक अपूर्व उदाहरण हैं जिससे संभावना बनती है कि राम और शबरी में निश्चित रूप से कोई विशेष लगाव या बंधन रहा होगा नहीं तो समान्यतया कोई किसी का जूठा नहीं खाता। बंधन और लगाव के संदर्भ में यह प्रसंग विचारणीय है। रामकथा या केवल राम को आदिवासियों की स्वीकार्यता से परखने का प्रयास करना मानवीयता के दायरों की सीमाओं का अतिक्रमण करना होगा। राम सभी के हैं। हम जानते हैं कि बाल्मिकी रामायण के सृजन की कथा ही क्रौंच वध से शुरू होती है, क्रौंच का वध करने वाला एक निषाद था। राम के वनगमन और वनप्रवास का कथानक ही आदिवासियों के लिए प्रिय बन जाता है। आदिवासियों के लिए भी राम की कथा एक पवित्र कथा है उनके यहां दूसरी ‘करमा’ आदि कथाओं की तरह। फिर भी यह सच है कि आदिवासी समूहों में वनवासी राम ही अधिक प्रिय हैं, अयोध्या के राम नहीं। हमें सोचना होगा कि राम की कथा आज भी लोकमन का हिस्सा क्यों है, क्या सिर्फ इस लिए कि राम के चरित्र का दैवीकरण कर दिया गया है। केवल इतना भर नहीं है, संभव है कि राम के चरित्र के दैवीकरण का भी लोकमन पर प्रभाव पड़ा हो पर केवल ऐसा ही नहीं है। रामकथा का लोकमन पर जो प्रभाव आज भी कायम है वह उनका लोकसंघर्ष है, वे समय की अराजक सŸााव्यवस्था से निष्काम ढंग से टकराते हैं तथा प्रमाणित करते हैं कि उनके लिए राजा बनने का जो उत्तराधिकार है उसका कोई मतलब नहीं। वे इस प्रकार से उत्तराधिकार को खारिज करते हैं कुल मिला कर रामकथा में सत्ताप्रबंधन का मानवीय समीपता के कारकों वाला द्वन्द भी है। आधुनिक कथा साहित्य के लिए राम का वन्य जीवन, वहां का संघर्ष आदर्श हो सकता है।