वर्षा जल संचयन और भू-जल संभरण के जरिए पेयजल सुरक्षा

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जल अधिकार और पारंपरिक जल संचयन का भारत में लंबा इतिहास रहा है। पारंपरिक जल संचयन प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लोगों को खुद इनका निर्माण करने और प्रबंधन करने का अधिकार है। देशभर में इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि ऐतिहासिक काल में जल-तंत्रों के प्रबंधन , यहां तक यदि वे सरकार की मदद से बने हों तो भी, एवं उनके जल के वितरण की पूरी अंतिम जिम्मेदारी स्थानीय लोगों पर डाल दी जाती थी।

पारंपरिक जल संचयन भी स्थानों पर आज की जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं है। कई क्षेत्रों में जल संचयन तंत्र बुरी तरह नष्ट हो गए हैं। ऐसे में परंपरागत के साथ बड़े एवं आधुनिक जल अवसंरचनाओं की संतुलित व्यवस्था जरूरी है। लेकिन पहली प्राथमिकता उस परंपरागत जल प्रबंधन प्रणाली को दी जानी चाहिए जिसकी स्थानीय लोगों की अच्छी समझ है और जिसका वे अपने श्रम और धन से प्रबंधन कर सकते हैं।

भारत में भू-जल संसाधन विकास सरकार के साथ-साथ किसानों एवं उद्योगों द्वारा भी व्यक्तिगत रूप से किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के लिए भू-जल ही सबसे बड़ा स्रोत है लेकिन उसके सतत दोहन एवं विभिन्न मौसमों में भू-जल स्तर में उतार-चढाव का भूजल स्रोतों की क्षमता प्रभावित होती है और पानी की गुणवत्ता भी बिगड़ती जा रही है।

परिवारों को व्यक्तिगत रूप से पेयजल उपलब्ध कराने के लिए छत के उपर वर्षा जल संचयन के अलावा भारी बारिश के दौरान भूतल पर बाढ पानी के संग्रहण एवं भंडारण को, सूखा के दौरान पेयजल सुरक्षा से संबंधित मौजूदा योजनाओं के पूरक के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। छत पर संग्रहित जल को बंद पड़ चके कुंओं, खराब चापाकलों, संभरण पिट्स , शैपऊट आदि के माघ्यम से भूजल स्तर बढाने में उपयोग किया जा सकता है। वर्षा जल संचयन प्रणाली को अपनाने को बढावा देने के लिए पंचायती राज संस्थाओं , गैर सरकारी संगठनों और सामुदायिक संगठनों का क्षमता विकास करना बहुत ही महत्वपूर्ण है।

एक दृष्टांत[सम्पादन]

मध्यप्रदेश में दतिया जिले के दतिया प्रखंड में 641 की जनसंख्या वाला हमीरपुर गांव बुंदेलखंड क्षेत्र में पड़ता है जहां अनियमित बारिश की वजह से पानी की भारी कमी है और काफी समय से सूखे की स्थिति बनी हुई है। बुंदेलखंड में जहां दो दशक पहले करीब 100 दिन बारिश होती थी अब वहीं महज 40 दिन ही बारिश होती है। गांव में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति बहुसंख्यक हैं।

स्थानीय पहल[सम्पादन]

स्वजलधारा कार्यक्रम के तहत हमीरपुर में जलापूर्ति योजना शुरू करने के लिए ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति (वीडब्ल्यूएससी) गठित की गयी और सामुदायिक योगदान के तहत 40 हजार रूपये भी एकत्रित किए गए लेकिन आवश्यक अनुमोदन नहीं मिले। इस समिति को पेयजल समिति के नाम से भी जाना जाता है।

यह एहसास किया गया कि जबतक गांव में संगठित जलापूर्ति व्यवस्था नहीं हो जाती है तबतक आर्थिक प्रगति हासिल कर पाना संभव नहीं है क्योंकि ज्यादातर समय तो दूरदराज से पानी लाने में बीत जाता है।

नयी अवधारणा[सम्पादन]

ग्रामीणों ने कई बैठकों के बाद अपनी पहल करने का फैसला किया और गांव में भू-जल स्तर में सुधार एवं निकट भविष्य में जलापूर्ति योजना को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए समेकित जल संसाधन प्रबंधन अपनाया। भूजल स्तर को ऊपर उठाने एवं वर्षा जल संचयन के लिए सभी घरों में वर्षाजल संचयन ढांचा बनाने तथा उपयोग में नहीं आ रहे कुंओं को गहरा करने एवं बांधों के निर्माण की योजना बनाई गई।

उन्होंने गांव से बाहर एक ऐसे स्थान की पहचान की जहां से घर एवं सड़कें बनाने के लिए मिट्टी खोदी जा सकती है और चापाकलों तथा भूजल स्रोतों के संभरण के लिए एक बड़े तालाब का निर्माण हो।

जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग ने गांव में बड़े-बड़े पत्थरों से बांध एवं अन्य गांवों में नाला पर बांध बनाए जिससे चापाकलों में पानी आने लगा। वीडब्ल्यूएससी ने सभी 75 घरों, स्कूलों और आंगनवाड़ी केंद्रों पर जलसंचयन ढांचे के निर्माण का भी काम शुरू किया। एक स्थानीय गैर सरकारी संगठन परहित ने हर परिवार को 500-500 रूपये प्रदान किए और शेष 1000-1200 रूपये हितधारकों ने अपनी तरफ से लगाए।

हमीरपुर गांव के लिए सभी परिवारों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के प्रयास के साथ यह यात्रा प्रारंभ हुई और समेकित जल संसाधन प्रबंधन एवं बड़े पैमाने पर वर्षाजल संचयन ढाचों के निर्माण के साथ ही लोगों को पर्याप्त पेयजल मुहैया हो सका। यह एक अभिनव प्रयोग था जिसका सुखद परिणाम सामने आया।

वित्तीय वर्ष 1987-88 में राष्ट्रीय पेयजल मिशन शुरू होने के साथ ही वर्षा जल संचयन उन क्षेत्रों में शामिल हो गया जिनपर पेयजल आपूर्ति विभाग विशेष ध्यान देता है। बाद में इस मिशन का नाम बदलकर राजीव गांधी पेयजल मिशन कर दिया गया।

विभाग ने न्न वैज्ञानिक स्रोत खोज, जल संरक्षण एवं भूजल स्रोतों का संभरण न्न नामक उपमिशन शुरू किया जिसके तहत वर्षाजल संचयन पर विशेष बल दिया गया और सभी राज्यों को विशेष कोष उपलब्ध कराया गया। इस कोष के लिए केंद्र 75 प्रतिशत धनराशि सहायता प्रदान करता है जबकि शेष 25 प्रतिशत धनराशि राज्य अपने संसाधन से जुटाते हैं। ग्रामीण जलापूर्ति कार्यक्रम के तहत न्न वर्षा जल संचयन न्न तथा न्न संपोषणीयता के लिए प्रौद्यागिकी एवं जल गुणवत्ता न्न पर एक एक पुस्तिकाएं प्रकाशित की गयी और उन्हें राज्यों में वितरित की गयीं।

पेयजल आपूर्ति संपोषणीयता योजना के तहत ग्रामीण पेयजल स्रोतों की संपोषणीयता सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न जल संचयन प्रौद्योगिकियों पर मई, 2007 एवं जून, 2009 में राष्ट्रीय कार्यशालाएं आयोजित की गयीं।

राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत आवंटन की 20 प्रतिशत धनराशि जलस्रोतों की संपोषणीयता के लिए चिह्नित की गयी हैं। राज्यों को पेयजल स्रोतों के संभरण एवं वर्षा जल संचयन के वास्ते जलसंभरण ढांचाओं के निर्माण के लिए केंद्र सरकार से शत-प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा।

भारत निर्माण[सम्पादन]

ग्रामीण पेयजल आपूर्ति भारत निर्माण के छह अवयवों में एक है। 04 अप्रैल, 2005 को भारत निर्माण कार्यक्रम के प्रारंभ होने पर राज्यों ने रिपोर्ट दी कि देश की 16.61 लाख ग्रामीण बस्तियों में से पेयजल कार्यक्रम से अछूते 55,067 बस्तियों, गंभीर जल संकट झेल रही 3.31 लाख बस्तियों और जल गुणवत्ता प्रभावित 2.17 लाख बस्तियों में गुणवत्तापूर्ण पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करना था। पेयजल कार्यक्रम से अछूते 55067 बस्तियों में भारत निर्माण अवधि के दौरान गुणवत्तापूर्ण पेयजल उपलब्धता सुनिश्चित कराना था, लेकिन अप्रैल, 2009 तक 54,440 बस्तियों में ऐसा कराया जा सका। शेष बस्तियों में यह काम 2011 तक पूरा किया जाना है।

गंभीर जलसंकट झेल रही 3,31,604 बस्तियों के लक्ष्य में कुछ राज्यों द्वारा वृध्दि की गयी और कुछ अपने लक्ष्य पूरे भी नहीं कर पाए। इन बस्तियों में पानी का संकट शुरू होने की वजह जलस्रोंतों का सूखना, भूजल स्तर का घटना, जलढांचों का बहुत पुराना पड़ जाना और जनसंख्या वृध्दि आदि हैं। इसलिए इन बस्तियों की संख्या घटती बढती रहती हैं। राज्य अपनी वार्षिक कार्ययोजना में इन बस्तियों की इस समस्या का समाधान ढूंढेगी।

गुणवत्ता प्रभावित 2,16,968 बस्तियों में से 50,168 बस्तियों में क्रियान्वित परियोजनाओं के द्वारा पेयजल की आपूर्ति हो रही है। इस प्रकार की शेष बस्तियों को भारत निर्माण तथा नवचिह्नित गुणवत्ता प्रभावित बस्तियों में मौजूदा परियोजनाओं और शुरू की जाने वाली परियोजनाओं के तहत पेयजल उपलब्ध कराये जाने का प्रस्ताव है। जल की गुणवत्ता से संबंधित परियोजनाएं वर्ष 2009 में पूरी नहीं हो पाएंगी। इन लक्ष्यों को ग्यारहवीं योजना भारत निर्माण के दूसरे चरण में यानि 2011 तक हासिल किये जाने की उम्मीद है।

मिजोरम, राजस्थान और अन्य राज्यों की भांति सभी राज्यों को ग्रामीण क्षेत्रों में हर घरों पर और खासकर पंचायत एवं स्कूल भवनों की छतों पर वर्षाजल संचयन ढांचों की व्यवस्था करनी चाहिए। इस संबंध में तमिलनाडु सरकार के नियम की तर्ज पर इन ढांचों का निर्माण अनिवार्य बना दिया जाना चाहिए। पूर्वोत्तर राज्यों और अन्य पहाड़ी राज्यों, सूखे एवं अर्ध-सूखे क्षेत्रों और तटीय इलाकों में वर्षाजल संचयन को पहला विकल्प समझा जाना चाहिए।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, समेकित जलसंभर विकास कार्यक्रम, पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कार्यक्रम, बारहवीं वित्त आयोग अनुदान तथा अन्य कार्यक्रमों के साथ इस कार्यक्रम का समन्वय वर्षा जल संचयन को बढावा देने और पेयजल स्रोतों की संपोषणीयता के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है।