सामग्री पर जाएँ

विकिपुस्तक वार्ता:अन्य

पृष्ठ की सामग्री दूसरी भाषाओं में उपलब्ध नहीं है।
विषय जोड़ें
विकिपुस्तक से

भागवत पुराण संपूर्ण ओम नमो भगवते वासुदेवाय श्रीमद्भागवत महात्मा पहला अध्याय देवर्षि नारद की भक्ति से भेंट सच्चिदानंद स्वरुप भगवान श्रीकृष्ण को हम नमस्कार करते हैं जो जगत की उत्पत्ति स्थिति और विनाश के हेतु तथा आध्यात्मिक आधिदैविक आधिभौतिक तीनों प्रकार के पापों का नाश करने वाले हैं जिस समय श्री शुकदेव जी का यज्ञोपवीत संस्कार भी नहीं हुआ था तथा लौकिक वैदिक कर्मों के अनुष्ठान का अवसर भी नहीं आया था तभी उन्हें अकेले ही सन्यास लेने के लिए घर से जाते देखकर उनके पिता व्यास जी विरह से कातर हो कर पुकारने लगे बेटा बेटा तुम कहां जा रहे हो उस समय वृक्षों ने तन्मय होने के कारण श्री सुखदेव जी की ओर से उत्तर दिया था ऐसे सर्वभूत हिते स्वरुप श्री शुकदेव मुनि को मैं नमस्कार करता हूं एक बार भागवत कथामृत का रसास्वादन करने में कुशल हो वसनत जीने नहीं निसार अन्य क्षेत्र में विराजमान महामति सूत जी को नमस्कार करके उनसे पूछा सौनक जी बोले सूत जी आपका ज्ञान अज्ञान अंधकार को नष्ट करने के लिए करोड़ों सूर्य के समान है आप हमारे कानों के लिए रसायन अमृत स्वरूप सारगर्भित कथा कहिए भक्ति ज्ञान और वैराग्य से प्राप्त होने वाले महान विवेक की वृद्धि किस प्रकार होती है तथा वैष्णव लोग किस तरह इस माया मुंह से अपना पीछा छुड़ा दें इस गोर कलिकाल में जीव प्रायः आसुरी स्वभाव के हो गए हैं विविध क्लेशों से आक्रांत इन जीवो को शुद्ध देवी शक्ति संपन्न बनाने का सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है जी आप हमें कोई ऐसा शाश्वत साधन बताइए जो सबसे अधिक कल्याणकारी तथा पवित्र करने वालों में भी पवित्र हो तथा जो भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति करा दे चिंतामणि केवल अलौकिक सुख दे सकती है और कल्पवृक्ष अधिक से अधिक स्वर्गीय संपत्ति दे सकता है परंतु गुरुदेव प्रसन्न होकर भगवान का योगी दुर्लभ नृत्य वैकुंठ धाम दे देते हैं जी ने कहा सोनाक्षी तुम्हारे हृदय में भगवान का प्रेम है इसलिए मैं विचार कर तुम्हें संपूर्ण सिद्धांतों का निष्कर्ष सुनाता हूं जो जन्म मृत्यु के भय का नाश कर देता है जो भक्त के प्रवाह को बढ़ाता है और भगवान श्रीकृष्ण की प्रसन्नता का प्रधान कारण है मैं तुम्हें वह साधन बतलाता हूं उसे सावधान होकर सुनो श्री सुखदेव जी ने कलयुग में जीवो के काल रुपीस अरब के मुख का ग्रास होने के त्रास का आत्यंतिक ना करने के लिए श्रीमद्भागवत शास्त्र का प्रवचन किया है मन की शुद्धि के लिए इससे बढ़कर कोई साधन नहीं है जब मनुष्य के जन्म जन्मांतर का पुण्य उदय होता है तभी उसे इस भागवत शास्त्र की प्राप्ति होती है जब शुकदेव जी राजा परीक्षित को यह कथा सुनाने के लिए सभा में विराजमान हुए तब देवता लोग उनके पास अमृत का कलश लेकर आए देवता अपना काम बनाने में बड़े कुशल होते हैं अतः यहां भी सब ने शुकदेव मुनि को नमस्कार करके कहा आप यह अमृत लेकर बदले में हमें कथामृत का ध्यान दीजिए इस प्रकार परस्पर विनिमय हो जाने पर राजा परीक्षित अमृत का पान करें और हम सब श्रीमद्भागवत रूप अमृत का पान करेंगे इस संसार में कहां कहां और कहां महा मूल्य मणि तथा कहां सुधा

Start a discussion about विकिपुस्तक:अन्य

Start a discussion